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जियो की शानदार लिस्टिंग: पहले दिन किसने खरीदे शेयर और किसने कमाए ₹3,300 करोड़?

एनएसई पर अकेले 24,276 करोड़ रुपये के शेयरों का कारोबार हुआ. एंकर निवेशकों के शेयर लॉक-इन में हैं. बाजार बंद होने तक बिकने योग्य हर तीन में से दो शेयरों के नए मालिक बन चुके थे. तो आखिर किसने पैसा कमाया और कौन इन शेयरों को अपने पास रखकर रह गया?

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

पलक शाह

जियो के शेयरों का बड़ा हस्तांतरण

सुबह 10 बजे जियो एक लॉटरी टिकट जैसा था.

दोपहर 3:30 बजे तक यह भारतीय शेयर बाजारों में एक ही कारोबारी सत्र में अब तक की सबसे बड़ी नकदी निकासी बन चुका था.

कई अमीर निवेशकों ने 1,350 रुपये पर खरीदारी के ऑर्डर लगाए थे. उन्हें उम्मीद थी कि लिस्टिंग के दिन शेयर की कीमत में गिरावट आएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस शेयर पर नजर रखने वाले बाजार प्रतिभागियों का कहना है कि किसी को पता नहीं चल पा रहा था कि यह मांग कहां से आ रही है. लेकिन इसका संदेश स्पष्ट था: जियो नीचे नहीं गिरेगा.

कारोबार बंद होने तक अकेले एनएसई पर 24,276 करोड़ रुपये के शेयरों का लेनदेन हो चुका था. यह रकम भारत की ज्यादातर कंपनियों के कुल बाजार मूल्य से भी अधिक है. और यह कारोबार ऐसे शेयर में हुआ, जो एक दिन पहले तक एक्सचेंज पर मौजूद ही नहीं था.

इश्यू प्राइस 1,119 रुपये था. बाजार खुलते ही शेयर 1,358 रुपये पर पहुंच गया. बाजार बंद होने पर इसकी कीमत 1,419 रुपये थी.

छह घंटे में 26.8 फीसदी की बढ़त.

लेकिन तेजी तो सिर्फ आतिशबाजी थी. असली खेल इसके पीछे चल रहा था: शेयरों का एक बड़ा हिस्सा एक समूह के हाथों से निकलकर दूसरे समूह के पास जा रहा था. इस दौरान एक सवाल लगातार बड़ा होता गया.

आखिर कौन अमीर बन गया और किसने इसकी कीमत चुकाई?

बाकी सभी निवेशक बाहर थे

बुधवार को क्या हुआ, यह समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि कौन इसमें कारोबार नहीं कर सकता था.

मुकेश अंबानी की रिलायंस शेयर नहीं बेच सकती थी. मेटा शेयर नहीं बेच सकती थी. गूगल शेयर नहीं बेच सकता था. साल 2020 में जियो में निवेश करने वाले सॉवरेन फंड और प्राइवेट इक्विटी फर्म भी शेयर नहीं बेच सकते थे. आईपीओ खुलने से पहले 7.25 करोड़ शेयर खरीदने वाले एंकर निवेशक भी इन्हें नहीं बेच सकते थे.

वे सभी लॉक-इन में थे और बाकी लोगों की तरह स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हुए थे.

इसका मतलब था कि बाजार खुलने के समय जियो के ऐसे शेयर केवल एक समूह के पास थे, जिन्हें बेचने पर कोई रोक नहीं थी: आईपीओ में शेयर पाने वाले लोग. इनमें खुदरा निवेशक, हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs), गैर-एंकर संस्थागत निवेशक, रिलायंस के शेयरधारक और जियो के कर्मचारी शामिल थे.

इन सभी के पास कुल 19.75 करोड़ शेयर थे. यही जियो के वे सभी शेयर थे, जिनका बाजार में स्वतंत्र रूप से कारोबार किया जा सकता था.

फिर बाजार खुला.

बाजार में शेयरों की बाढ़

कारोबार बंद होने तक एनएसई पर 17.73 करोड़ और बीएसई पर 1.68 करोड़ शेयरों का कारोबार हुआ.

इस तरह एक ही कारोबारी सत्र में कुल 19.4 करोड़ शेयरों का लेनदेन हुआ, जो बाजार में स्वतंत्र रूप से कारोबार के लिए उपलब्ध कुल शेयरों का 98 फीसदी था.

कारोबार की कुल मात्रा में किसी शेयर को हर बार गिना जाता है, जब वह एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता है. इसलिए यह आंकड़ा खरीद-बिक्री की हलचल बताता है, न कि वास्तविक बिक्री की मात्रा. यह जानने के लिए कि कितने शेयर वास्तव में अपने मालिकों के पास से निकले, डिलीवरी के आंकड़ों पर नजर डालनी होगी.

एनएसई: 68.56 फीसदी डिलीवरी, यानी करीब 12.16 करोड़ शेयर.

बीएसई: 73.06 फीसदी डिलीवरी, यानी करीब 1.23 करोड़ शेयर.

इसका मतलब है कि 13.4 करोड़ शेयर दिन के अंत में ऐसे डीमैट खातों में थे, जो कारोबारी सत्र की शुरुआत में उनके मालिक नहीं थे. यह जियो के उन सभी शेयरों का करीब 68 फीसदी है, जिन्हें बेचा जा सकता था.

चूंकि बाजार खुलने के समय बिना लॉक-इन वाले शेयर केवल आईपीओ में शेयर पाने वालों के पास थे, इसलिए इस निष्कर्ष से बचना मुश्किल है कि भारत के सबसे बड़े आईपीओ का बड़ा हिस्सा लिस्टिंग के दिन ही बिक गया.

कमाई का दिन

अब बात पैसे की.

इश्यू प्राइस के हिसाब से इन 13.4 करोड़ शेयरों की कीमत करीब 15,000 करोड़ रुपये थी. एनएसई पर 1,369 रुपये के औसत कारोबार मूल्य के हिसाब से इनकी बिक्री से करीब 18,300 करोड़ रुपये मिले.

यानी एक ही दोपहर में करीब 3,300 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ. इसमें टैक्स और ब्रोकरेज शामिल नहीं हैं.

खुदरा निवेशक के लिए इसका हिसाब मोबाइल स्क्रीन पर ही समझ आ जाता है. 23 अक्टूबर को 12 शेयरों के एक लॉट के लिए 13,428 रुपये चुकाएं. 28 अक्टूबर को कुछ घंटे इंतजार करें. फिर उसे 17,028 रुपये में बेच दें.

दिवाली से पहले 3,600 रुपये का मुनाफा. ज्यादातर निवेशकों ने यह देखने के लिए इंतजार नहीं किया कि क्या यह मुनाफा 4,000 रुपये तक पहुंच सकता है.

रहस्यमयी खरीदार

जो पैसा बाजार से बाहर गया, वह कहीं न कहीं से आया भी होगा.

किसी ने करीब 18,000 करोड़ रुपये नकद देकर ऐसे शेयर खरीदे, जो महज पांच दिन पहले 1,119 रुपये में उपलब्ध थे. खरीदारों ने बिकवाली के दबाव वाले बाजार में भी प्रति शेयर 250 रुपये अधिक देने में हिचक नहीं दिखाई.

और यह जानने के लिए किसी को आपको बताने की जरूरत नहीं है कि वे कौन हैं.

किसी बड़े सौदे का खुलासा तभी होता है, जब कोई ग्राहक कंपनी की इक्विटी का 0.5 फीसदी से अधिक कारोबार करता है. जियो के मामले में इसका मतलब 4.6 करोड़ से अधिक शेयर या एक ही नाम पर 6,000 करोड़ रुपये से अधिक का सौदा है. कोई फंड जियो के हजारों करोड़ रुपये के शेयर छोटे-छोटे हिस्सों में खरीद सकता है और उसका नाम कभी खुलासे की सूची में नहीं आएगा.

जिस दिन करीब 18,000 करोड़ रुपये के जियो शेयर नए हाथों में गए, उस दिन विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों ने पूरे बाजार में मिलाकर केवल 1,515 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की. इससे दो संभावनाएं बनती हैं और दोनों ही असाधारण हैं. या तो संस्थानों ने दूसरे शेयर बेचकर जियो खरीदा — इस दौरान रिलायंस का शेयर 3.46 फीसदी गिरकर 52 सप्ताह के निचले स्तर के करीब पहुंच गया और एयरटेल में भी गिरावट आई — या फिर बड़ी मात्रा में खरीदारी संस्थागत निवेशकों के दायरे से बाहर के लोगों ने की. इनमें अमीर व्यक्ति, फैमिली ऑफिस, कंपनियां और अपने खाते से कारोबार करने वाले डेस्क शामिल हो सकते हैं.

रिलायंस का शेयर क्यों गिरा?

जियो उस दिन बाजार का सितारा था, जबकि उसकी मूल कंपनी रिलायंस को नुकसान उठाना पड़ा. जिस दिन उसकी सहायक कंपनी जश्न मना रही थी, उसी दिन रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर 3.46 फीसदी गिरकर 1,158.50 रुपये पर आ गया और 52 सप्ताह के निचले स्तर के करीब बंद हुआ.

डीलिंग रूम में इसकी अलग-अलग व्याख्याएं थीं. बाजार में चल रही चर्चाओं के मुताबिक, ट्रेजरी डेस्क, वेल्थ मैनेजर और फैमिली ऑफिस जियो में निवेश के लिए नकदी जुटाने के वास्ते रिलायंस के शेयर बेच रहे थे. यानी वे मूल कंपनी के बजाय उसकी सहायक कंपनी में सीधे निवेश कर रहे थे. उनका तर्क यह हो सकता है कि जब जियो में सीधे निवेश करने का विकल्प मौजूद है, तो रिफाइनिंग से लेकर रिटेल तक कारोबार करने वाले समूह के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से जियो का मालिकाना हक क्यों रखा जाए?

हालांकि, किसी ने इस बदलाव की पुष्टि नहीं की है. शेयर पर दबाव के दूसरे कारण भी थे, जिनमें 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कच्चे तेल की कीमत और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले से पहले निवेशकों की सतर्कता शामिल थी.

लेकिन अगर बाजार में चल रही यह चर्चा सही है, तो लिस्टिंग के पहले ही दिन जियो के कुछ शेयरों की खरीद के लिए प्रभावी रूप से रिलायंस के अपने शेयरों का इस्तेमाल हुआ.

इसका जवाब उन आंकड़ों में छिपा है, जो कई हफ्तों तक सार्वजनिक नहीं होंगे. तब तक बाजार संकेतों से ही निष्कर्ष निकाल रहा है.

किसने जियो के पीछे दौड़ लगाई?

वे निवेशक जो आईपीओ में शेयर पाने से चूक गए: एंकर निवेशकों की सूची से बाहर के संस्थागत निवेशकों ने 329 करोड़ शेयरों के लिए बोली लगाई थी. उन्हें केवल 4.9 करोड़ शेयर मिले. यह ऐसा था, जैसे 67 पिज्जा ऑर्डर करने पर सिर्फ एक पिज्जा मिले. बुधवार को वे जितने चाहें उतने शेयर खरीद सकते थे. बस उन्हें प्रति शेयर 250 रुपये अतिरिक्त चुकाने थे.

इंडेक्स में शामिल होने की उम्मीद रखने वाले निवेशक: 13 लाख करोड़ रुपये के मूल्यांकन के साथ जियो अब भारत की दूसरी सबसे मूल्यवान कंपनी है. उसने भारती एयरटेल और एचडीएफसी बैंक को पीछे छोड़ दिया है. देर-सवेर प्रमुख बेंचमार्क इंडेक्स में इसे शामिल करना होगा और इंडेक्स फंड को किसी भी कीमत पर शेयर खरीदने पड़ेंगे. बुधवार को खरीदारी करने वालों के लिए यह भविष्य में एक संभावित खरीदार होगा.

वे फंड मैनेजर जिनके पास विकल्प नहीं है: अगर भारत का दूसरा सबसे बड़ा शेयर तेजी से बढ़ता है और आपके पोर्टफोलियो में उसका हिस्सा नहीं है, तो निवेशकों के सामने आपकी स्थिति कमजोर हो सकती है. अब जियो में कम निवेश रखना भी अपने आप में एक दांव बन गया है.

डे ट्रेडर्स: एनएसई पर कारोबार की करीब एक-तिहाई मात्रा में वास्तविक डिलीवरी नहीं हुई. इन सौदों में पैसा बाजार बंद होने से पहले खरीद-बिक्री करके और कीमतों के अंतर से कमाई करके निकल गया.

इन खरीदारों और विक्रेताओं के नाम अंततः सामने आएंगे. इसके लिए फंड के प्रवाह के आंकड़ों, फंड फैक्टशीट और जियो की पहली शेयरधारिता रिपोर्ट का इंतजार करना होगा. तब तक जियो में 18,000 करोड़ रुपये की खरीदारी के पीछे के चेहरे सामने नहीं हैं.

लंच तक विश्लेषकों के अनुमान से आगे निकला जियो

नोमुरा ने जियो पर कवरेज शुरू करते हुए 1,340 रुपये का लक्ष्य मूल्य दिया था. एलारा कैपिटल ने 1,367 रुपये का लक्ष्य रखा था.

जियो ने बाजार खुलते ही नोमुरा का लक्ष्य पार कर लिया और बाजार बंद होने तक एलारा के लक्ष्य से भी आगे निकल गया.

अब प्रकाशित अनुमानों में केवल नोमुरा का सबसे बेहतर संभावित परिदृश्य 1,690 रुपये का है, जो मौजूदा कीमत से ऊपर है.

1,119 रुपये के इश्यू प्राइस पर भी जियो का मूल्यांकन वित्त वर्ष 2026 के EV/EBITDA के करीब 13.5 गुना था, जबकि एयरटेल के लिए यह लगभग 10 गुना था. बुधवार की 27 फीसदी तेजी ने इस अंतर को और बढ़ा दिया. 1,419 रुपये पर खरीदारी करने वाले निवेशक आज के जियो के लिए भुगतान नहीं कर रहे हैं. वे उन टैरिफ बढ़ोतरी की उम्मीद पर दांव लगा रहे हैं, जिनकी अभी घोषणा नहीं हुई है, और उस विकास पर भरोसा कर रहे हैं, जो अभी आया नहीं है.

जियो की कीमत अब रिलायंस के आधे से ज्यादा

रिलायंस के पास जियो की 64.5 फीसदी हिस्सेदारी है. बुधवार को बाजार बंद होने के समय इस हिस्सेदारी का मूल्य करीब 8.4 लाख करोड़ रुपये था.

लिस्टिंग से एक दिन पहले रिलायंस की पूरी कंपनी का मूल्य करीब 16.2 लाख करोड़ रुपये था.

इसका मतलब है कि टेलीकॉम कारोबार की यह सहायक कंपनी अब अपनी मूल कंपनी के आधे से अधिक मूल्य की हो चुकी है. रिलायंस के बाकी सभी कारोबार, जिनमें रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल्स, रिटेल स्टोर और नवीकरणीय ऊर्जा में बड़ा निवेश शामिल है, का प्रभावी मूल्य जियो से कम आंका जा रहा है.

हालांकि, यह पैसा रिलायंस के खाते में नकद के रूप में नहीं आया है. आईपीओ नए शेयर जारी करके लाया गया था और इससे प्राप्त करीब 27,500 करोड़ रुपये जियो इन्फोकॉम के कर्ज को चुकाने में इस्तेमाल होंगे.

लेकिन गुरुवार सुबह तक मुंबई के हर रिलायंस विश्लेषक से एक ही सवाल पूछा जाएगा: होल्डिंग कंपनी पर लागू मूल्यांकन की छूट अब कहां जाएगी?

शेयरों का असली हस्तांतरण अभी बाकी है

बुधवार का दिन सिर्फ एक झलक था.

2020 में मेटा, गूगल और कई वैश्विक फंडों ने जियो में 5 लाख करोड़ रुपये से कम के इक्विटी मूल्यांकन पर निवेश किया था. आज बाजार में इसका मूल्य करीब 13 लाख करोड़ रुपये है. यानी यह 2.7 गुना बढ़ चुका है.

उन निवेशकों के शेयर अब भी लॉक-इन में हैं. लॉक-इन की अवधि खत्म होगी. इंडेक्स में शामिल होने से ऐसे खरीदार आएंगे, जिनके पास खरीदारी से इनकार करने का विकल्प नहीं होगा.

जब 2020 के निवेशक अपने शेयर बेचने का फैसला करेंगे, तो शेयरों का वह ढेर बुधवार को बेचे गए 13.4 करोड़ शेयरों को भी छोटा बना देगा.

28 अक्टूबर को भारत के नए शेयरधारकों ने बाजार को शेयर बेचे और 3,300 करोड़ रुपये लेकर चले गए.

अगली बार विक्रेता वैश्विक दिग्गज होंगे और खरीदार आपका इंडेक्स फंड होगा.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.


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