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अगस्त में भारत का व्यापार घाटा घटकर 26.1 अरब डॉलर तक सिमट सकता है : रिपोर्ट
सोने की मांग से व्यापार गतिविधि को बल मिला है. हालांकि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में गतिरोध अब भी बना हुआ है जिससे निर्यात चुनौतियों का सामना कर रहा है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 9 months ago
अगस्त 2025 में भारत का वस्तु व्यापार घाटा मामूली रूप से घटकर 26.1 अरब डॉलर रहने का अनुमान है, जो जुलाई में 27.4 अरब डॉलर था. यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है. यह गिरावट व्यापार संतुलन में हल्के सुधार को दर्शाती है.
रिपोर्ट के अनुसार, इस मामूली सुधार का मुख्य कारण त्योहार और शादी के मौसम से पहले सोने की मांग में आई तेजी है. भले ही सोने की कीमतें ऊंची रहीं, फिर भी इसके आयात में बीते महीने लगभग दोगुनी वृद्धि देखी गई है, जिससे व्यापार गतिविधियों को सहारा मिला. वहीं दूसरी ओर, अन्य जिंसों की कीमतों से राहत सीमित रही है.
व्यापार पर दबाव अब भी बना हुआ है, खासकर भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता में चल रहे गतिरोध के कारण. अमेरिका भारत के कुल वस्तु निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा रखता है और बातचीत के ठप हो जाने से निर्यात पर प्रतिकूल असर पड़ा है.
सरकार ने इन चुनौतियों को देखते हुए एडवांस ऑथराइजेशन स्कीम के तहत नियमों में ढील दी है जिससे निर्यात उत्पादन के लिए कच्चे माल का ड्यूटी-फ्री आयात संभव हो सका है. यह कदम अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ से होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में उठाया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले समय में व्यापार घाटा ऊंचे स्तर पर बना रह सकता है. त्योहारों के दौरान सोने के आयात में वृद्धि, ऊर्जा की स्थिर मांग और इलेक्ट्रॉनिक्स व पूंजीगत वस्तुओं के आयात पर निर्भरता व्यापार घाटे को और बढ़ा सकती है.
हालांकि, वैश्विक जिंस कीमतों में गिरावट और सरकार द्वारा आयात प्रतिस्थापन की कोशिशों से कुछ राहत मिल सकती है. फिर भी वैश्विक मांग में कमजोरी और टैरिफ से जुड़ी रुकावटों के कारण निर्यात वृद्धि सुस्त बनी रह सकती है.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में अगर कोई प्रगति होती है तो यह भारत के निर्यात के लिए अहम समर्थन साबित हो सकता है. यदि टैरिफ बाधाओं को हटाया जाता है, तो अमेरिका को होने वाला निर्यात फिर से रफ्तार पकड़ सकता है.
निकट भविष्य में इससे मिलने वाले लाभ सीमित हो सकते हैं. लेकिन रिपोर्ट का मानना है कि दीर्घकालिक रूप से यह समझौता भारत के निर्यात आधार को मजबूत कर सकता है और आने वाले समय में व्यापार घाटे के दबाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है.
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