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कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर होने पर भारत की GDP गिरकर 6.5% तक आ सकती है: रिपोर्ट
रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें भारत की आर्थिक वृद्धि और महंगाई की दिशा तय करने में एक महत्वपूर्ण कारक बनी रहेंगी. मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह जोखिम और अधिक बढ़ गया है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकती हैं. CareEdge Ratings की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो वित्त वर्ष 2026–27 में भारत की GDP वृद्धि दर घटकर लगभग 6.5% रह सकती है.
ऊर्जा कीमतों का असर, विकास दर पर दबाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि लगातार ऊंची ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितताओं, खासकर पश्चिमी एशिया तनाव के कारण आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है. जब कच्चे तेल की कीमत 60–70 डॉलर प्रति बैरल के बीच थी, तब भारत की विकास दर करीब 7.2% रहने का अनुमान था, लेकिन जैसे-जैसे कीमतें बढ़ीं और लगभग 90 डॉलर तक पहुंचीं, यह अनुमान घटाकर 6.7% कर दिया गया.
तेल महंगा होने पर और गिर सकती है GDP
CareEdge के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक बनी रहती है, तो भारत की GDP वृद्धि दर लगभग 6.5% तक सीमित हो सकती है. वहीं, यदि कीमतें और बढ़कर 110 डॉलर तक पहुंचती हैं, तो वृद्धि दर घटकर करीब 6.1% रह सकती है. इसके अलावा, यदि कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक चला जाता है, तो आर्थिक विकास दर 6% से भी नीचे आ सकती है. ये अनुमान इस बात को दर्शाते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति काफी संवेदनशील है.
आयात बिल और चालू खाते पर असर
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से देश का आयात बिल बढ़ जाएगा. इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ने की आशंका है और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) पर भी दबाव पड़ सकता है.
महंगाई भी बढ़ने के संकेत
रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ महंगाई दर में भी इजाफा हो सकता है. जब तेल की कीमत 60–70 डॉलर प्रति बैरल थी, तब महंगाई लगभग 4.3% आंकी गई थी. वहीं, यदि कीमतें औसतन 90 डॉलर प्रति बैरल रहती हैं, तो महंगाई 4.5% से 4.7% के बीच रहने की संभावना है, जिससे आम लोगों पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है.
कारोबार और उपभोक्ता दोनों पर असर
ऊंची ऊर्जा कीमतों का असर न केवल कंपनियों पर पड़ेगा, बल्कि उपभोक्ताओं पर भी दिखाई देगा. उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ने से कंपनियों का खर्च बढ़ेगा, जिससे मुनाफे और निवेश गतिविधियों पर असर पड़ सकता है. वहीं, महंगाई बढ़ने से लोगों की क्रय शक्ति कम होगी, जिससे उपभोक्ता खर्च में कमी आ सकती है.
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