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भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन लक्ष्य 2032 तक बढ़ाया, वैश्विक नीतिगत देरी का असर

सरकार ने 5 मिलियन टन के उत्पादन लक्ष्य को दो वर्ष आगे बढ़ा दिया है और इसे यूरोपीय नीतियों तथा शिपिंग ईंधन मानकों में हुई देरी से जोड़ा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

भारत सरकार ने अपने महत्वाकांक्षी ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन लक्ष्य को दो वर्ष आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है. अब 5 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन का लक्ष्य वित्त वर्ष 2031-32 (FY32) तक पूरा करने की योजना है. नवीकरणीय ऊर्जा सचिव संतोष कुमार सारंगी ने इसकी पुष्टि की, यह बताते हुए कि यह फैसला वैश्विक नीतिगत अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है.

नीतिगत देरी बनी मुख्य वजह

सारंगी ने बताया कि यूरोप, जो भारत के लिए एक प्रमुख निर्यात बाजार है, वहां की नीतिगत अनिश्चितताएं इस देरी की बड़ी वजह हैं. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने अपने ग्रीन फ्यूल मैंडेट को एक वर्ष के लिए स्थगित कर दिया है, जबकि यूरोपीय संघ के "Renewable Energy Directive-3" के कार्यान्वयन में भी देरी हुई है. इन वैश्विक कारकों के कारण भारतीय उद्योग जगत के कई निवेश निर्णय भी टल गए हैं.

कुछ कंपनियां अब भी आगे बढ़ रही हैं

सारंगी ने कहा, “सभी कंपनियों ने अपने निर्णय स्थगित नहीं किए हैं. कुछ ने साझेदारी के अवसर तलाशे हैं और सफलता भी पाई है. सरकार को उम्मीद है कि ये कंपनियां जल्द निवेश के फैसले लेंगी.” उन्होंने यह भी बताया कि सरकार का अगला कदम ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत शिपिंग उद्योग से ग्रीन मेथनॉल की मांग एकत्र करना होगा. इसके लिए एक नया टेंडर लाने की तैयारी है.

शिपिंग फ्यूल पर सब्सिडी की जरूरत नहीं

सारंगी ने संकेत दिया कि शिपिंग ईंधन पर सब्सिडी की आवश्यकता नहीं पड़ सकती, क्योंकि आने वाले IMO मैंडेट से मूल्य अंतर अपने आप संतुलित हो जाएगा. उन्होंने कहा कि शिपिंग कंपनियों को यह बताना होगा कि उन्हें कितनी मात्रा में ग्रीन मेथनॉल की आवश्यकता होगी.

50 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा योजना पर पुनर्विचार संभव

सरकार अपने 50 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के टेंडर कार्यक्रम पर भी पुनर्विचार कर सकती है. सारंगी ने कहा कि इस योजना की प्रगति को “वास्तविक मांग” के अनुरूप दोबारा आंका जाएगा ताकि ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र की जरूरतों के साथ सामंजस्य बना रहे.

वैश्विक नीतिगत परिदृश्य से तालमेल की चुनौती

ग्रीन हाइड्रोजन लक्ष्य में यह बदलाव इस बात को दर्शाता है कि राष्ट्रीय ऊर्जा रणनीति को तेजी से बदलते वैश्विक नियामक ढांचे के साथ तालमेल बिठाना कितना चुनौतीपूर्ण है. भारत, जो ग्रीन ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर है, अब अपने लक्ष्यों को यथार्थवादी और व्यावहारिक समयसीमा के अनुसार समायोजित कर रहा है.
 


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