जुलाई 2025 में थोक महंगाई दर (WPI) घटकर -0.58% पर आना देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
देश की थोक महंगाई दर (WPI) जुलाई 2025 में घटकर -0.58% पर आ गई है. यह लगातार दूसरा महीना है जब थोक स्तर पर महंगाई निगेटिव रही है. पिछली जुलाई (2024) की तुलना में इस बार थोक बाजार में कीमतें औसतन कम दर्ज की गई हैं.
कीमतों में गिरावट के पीछे ये मुख्य कारण
इस गिरावट के पीछे मुख्य वजह खाद्य पदार्थों, मिनरल ऑयल, कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस और बेसिक मेटल्स की कीमतों में आई कमी है. इन प्रमुख वस्तुओं में सस्ते होने के चलते कुल मिलाकर थोक बाजार में महंगाई का दबाव कम हुआ है.
जून की तुलना में मामूली बढ़त
हालांकि महीने-दर-महीने आधार पर देखा जाए तो जुलाई में थोक महंगाई दर में थोड़ी बढ़ोतरी दर्ज हुई है. जून 2025 की तुलना में WPI में 0.39% की वृद्धि देखी गई.
प्राथमिक वस्तुएं हुईं महंगी
जुलाई में प्राथमिक वस्तुओं की कीमतों में 1.18% की बढ़त दर्ज की गई. इसमें कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कीमतों में 2.56% की बढ़त, नॉन-फूड आर्टिकल्स में 2.11% की वृद्धि, खाद्य पदार्थों में 0.96% की बढ़ोतरी हुई. वहीं, खनिजों की कीमतों में 1.08% की गिरावट आई.
ईंधन और बिजली क्षेत्र में मिला-जुला असर
ईंधन और बिजली की श्रेणी में 1.12% की औसत बढ़ोतरी दर्ज की गई. मिनरल ऑयल 1.98% महंगा हुआ. जबकि कोयला 0.44% और बिजली 0.36% सस्ती हुई.
निर्मित वस्तुओं में 0.14% की गिरावट
मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स यानी निर्मित वस्तुओं के दामों में 0.14% की कमी आई. 22 श्रेणियों में से 9 में कीमतें बढ़ीं (जैसे ट्रांसपोर्ट इक्विपमेंट, फर्नीचर, नॉन-मेटैलिक मिनरल प्रोडक्ट्स), 9 में गिरावट आई (जैसे बेसिक मेटल्स, मेटल प्रोडक्ट्स, फूड प्रोडक्ट्स, केमिकल्स) और 4 श्रेणियों में कोई बदलाव नहीं हुआ.
खाद्य महंगाई दर भी निगेटिव में
जुलाई 2025 में WPI फूड इंडेक्स बढ़कर 191.3 पर पहुंच गया, जो जून में 190.2 था. इसके बावजूद, सालाना आधार पर खाद्य महंगाई दर -2.15% रही, जो जून में -0.26% थी.
मई के आंकड़े हुए फाइनल
मई 2025 के लिए फाइनल डेटा के अनुसार, WPI इंडेक्स 153.7 रहा और उस महीने की थोक महंगाई दर 0.13% दर्ज की गई. उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) हर महीने थोक महंगाई दर के आंकड़े जारी करता है. अगस्त 2025 के आंकड़े 15 सितंबर 2025 को प्रकाशित किए जाएंगे.
राइड-हेलिंग सुरक्षा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने वाले ये उद्योग में पहली बार पेश किए गए फीचर हैं. कंपनी ने पूरे राइड-हेलिंग उद्योग में सुरक्षा मानकों को और बेहतर बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
यात्रियों और ड्राइवरों की सुरक्षा को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से उबर सुरक्षा कार्यक्रम में मंगलवार को कई नए और उद्योग में पहली बार पेश किए गए सुरक्षा फीचर्स लॉन्च करने की घोषणा की है. कंपनी ने ‘रिकॉर्ड माई राइड’ फीचर पेश किया है, जिसके माध्यम से ड्राइवर यात्रा के दौरान अपने मोबाइल फोन का उपयोग करके उबर ऐप के भीतर सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड इन-कैब वीडियो रिकॉर्ड कर सकेंगे.
मेडिकल लॉजिस्टिक्स सेवा
इसके अलावा, आपातकालीन सहायता को मजबूत करने के लिए उबर ने मेडिकल लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदाता डायल 4242 के साथ साझेदारी की है, जिसके तहत प्लेटफॉर्म पर सीधे एम्बुलेंस सहायता सुविधा को जोड़ा गया है. ये नई पहल हाल के वर्षों में उबर द्वारा सुरक्षा के क्षेत्र में किए गए नवाचारों को आगे बढ़ाती हैं.
कंपनी पहले ही ऑडियो रिकॉर्डिंग, महिला राइडर वरीयता, हेलमेट सेल्फी सत्यापन और सीटबेल्ट रिमाइंडर जैसे उद्योग में पहली बार पेश किए गए फीचर्स उपलब्ध करा चुकी है. इसके अलावा, तकनीक और मानवीय हस्तक्षेप पर आधारित कई अन्य उपाय भी हर यात्रा को अधिक सुरक्षित और जवाबदेह बनाने के लिए लागू किए गए हैं.
सुरक्षित परिवहन को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों में निवेश
तकनीकी नवाचारों के अलावा, उबर सुरक्षित परिवहन को बढ़ावा देने वाली साझेदारियों और कार्यक्रमों में भी निवेश कर रही है. कंपनी सड़क सुरक्षा अभियान के तहत सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की साझेदार रही है और अपने प्लेटफॉर्म के माध्यम से गति से अधिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने के प्रति जागरूकता फैलाने का काम कर रही है.
साथ ही, कंपनी ड्राइवरों की सुरक्षा को मजबूत करने और परिवारों के लिए विशेष सेवाएं विकसित करने की दिशा में भी कार्य कर रही है. इसके अंतर्गत उबर फॉर टीन्स और उबर फॉर सीनियर्स जैसे उत्पाद शामिल हैं.
उबर इंडिया एवं दक्षिण एशिया में सुरक्षा संचालन प्रमुख सूरज नायर ने कहा, “जो चीज आज नवाचार लगती है, वह कल एक सामान्य अपेक्षा बन जाती है. सुरक्षा का विकास भी इसी तरह होना चाहिए. हमारा मानना है कि सुरक्षा संबंधी नवाचार उद्योग का बुनियादी मानक बनने चाहिए, न कि केवल प्रतिस्पर्धात्मक अंतर. हमारे उद्योग में पहली बार पेश किए गए सुरक्षा फीचर और साझेदारियां सुरक्षा मानकों को लगातार बेहतर बनाने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं. जैसे-जैसे अपेक्षाएं बढ़ेंगी, हमें उम्मीद है कि पूरा उद्योग भी उन पर खरा उतरेगा.”
नए फीचर्स
1. रिकॉर्ड माई राइड
ड्राइवर यदि यात्रा के दौरान असुरक्षित महसूस करते हैं तो वे अपने मोबाइल फोन की मदद से उबर ऐप के भीतर सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड वीडियो रिकॉर्ड कर सकेंगे. यह रिकॉर्डिंग लागू कानूनों के अनुरूप होगी और पूरी तरह एन्क्रिप्टेड रहेगी. न तो ड्राइवर और न ही उबर इन रिकॉर्डिंग्स तक पहुंच सकेगा. केवल तब ही इनका उपयोग किया जाएगा जब ड्राइवर किसी सुरक्षा रिपोर्ट के साथ इन्हें साझा करने का निर्णय लेगा.
2. एम्बुलेंस सहायता
डायल 4242 के साथ साझेदारी में उबर ने एम्बुलेंस सहायता सुविधा शुरू की है, जिससे प्लेटफॉर्म पर यात्रा के दौरान दुर्घटना होने की स्थिति में यात्री और ड्राइवर तुरंत चिकित्सीय सहायता प्राप्त कर सकेंगे. यह सुविधा उबर की मौजूदा 24x7 सेफ्टी लाइन के माध्यम से उपलब्ध होगी.
3. डोंट टाइप एंड ड्राइव*
ड्राइविंग के दौरान ध्यान भटकने की समस्या को कम करने के लिए उबर ड्राइवर ऐप में वाहन के चलते समय मैन्युअल टाइपिंग की सुविधा सीमित कर दी जाएगी. ड्राइवरों को संदेशों का जवाब देने से पहले सुरक्षित स्थान पर वाहन रोकने के लिए प्रेरित किया जाएगा.
4. सेट योर ओन पिन
यात्री अब अपनी यात्रा सत्यापन प्रक्रिया के लिए स्वयं अपना विशिष्ट पिन सेट, प्रबंधित और अनिवार्य कर सकेंगे. इससे यात्रा की पुष्टि प्रक्रिया पर उनका पूर्ण नियंत्रण रहेगा. इन नए फीचर्स के अलावा उबर पहले से ही राइडचेक, 24x7 सेफ्टी लाइन, सेफ्टी प्रेफरेंसेस, फोन और पता गोपनीयता जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है, जो यात्रा से पहले, यात्रा के दौरान और यात्रा के बाद यात्रियों एवं ड्राइवरों की सुरक्षा में मदद करती हैं. इनमें से कई सुविधाएं सबसे पहले उबर द्वारा शुरू की गई थीं और अब वे राइड-हेलिंग सेवाओं से यात्रियों की सामान्य अपेक्षाओं का हिस्सा बन चुकी हैं. ये पहल तकनीक और विशेषज्ञों के सहयोग के माध्यम से बेहतर सुरक्षा प्रदान करने के प्रति उबर की प्रतिबद्धता को और मजबूत करती हैं.
गडकरी ने बताया कि बेहतर और सुरक्षित ड्राइविंग को बढ़ावा देने के लिए देश में 2,500 ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल स्थापित किए जा रहे हैं.
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रितु राणा
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने उबर के सुरक्षा कार्यक्रम में कहा कि सड़क दुर्घटनाएं भारत और दुनिया के लिए एक गंभीर समस्या हैं. उन्होंने कहा कि सड़क हादसों के कारण देश को हर साल जीडीपी का करीब 3 प्रतिशत नुकसान उठाना पड़ता है. गडकरी ने कहा कि आतंकवाद, युद्ध और अन्य आपदाओं की तुलना में सड़क दुर्घटनाओं में सबसे अधिक लोगों की जान जाती है.
अपने संबोधन के दौरान गडकरी ने एक पुरानी घटना का जिक्र करते हुए बताया कि वर्ष 1999 में महाराष्ट्र में उनका भी एक गंभीर सड़क हादसा हुआ था. उन्होंने कहा कि ट्रक के नीचे लगी सुरक्षा संरचना की वजह से उनकी और उनके परिवार की जान बच सकी. इस घटना के बाद उन्होंने सड़क सुरक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर लिया.
ब्लैक स्पॉट सुधारने पर 50 हजार करोड़ रुपये खर्च
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार ने देशभर में दुर्घटना संभावित ब्लैक स्पॉट की पहचान की है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन वाले क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इन स्थानों को सुरक्षित बनाने के लिए करीब 50 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार हो रहा सड़क निर्माण
गडकरी ने कहा कि नई सड़कों और हाईवे के निर्माण में अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाया जा रहा है. बेहतर साइनेज, मार्किंग सिस्टम, अंडरपास और अन्य सुरक्षा सुविधाओं को शामिल किया जा रहा है ताकि सड़क दुर्घटनाओं को कम किया जा सके.
कैब कंपनियों से मांगा सहयोग
उन्होंने कहा कि देश में कैब सेवाओं का क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है और उबर की इसमें बड़ी हिस्सेदारी है. ऐसे में कैब कंपनियों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है. उन्होंने उबर और अन्य प्लेटफॉर्म से सड़क सुरक्षा अभियान में सक्रिय सहयोग देने की अपील की.
वाहन सुरक्षा और हेलमेट नियमों को किया सख्त
गडकरी ने बताया कि सरकार ने ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग और वाहन सुरक्षा मानकों में कई सुधार किए हैं. दोपहिया वाहन चालकों के लिए हेलमेट पहनना अनिवार्य किया गया है. साथ ही वाहन कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे बाइक बेचते समय हेलमेट भी उपलब्ध कराएं, ताकि लोगों की जान बचाई जा सके.
दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वालों को मिलेगा पुरस्कार
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने वाले लोगों को पुलिस या प्रशासन की ओर से किसी तरह की परेशानी नहीं होगी. सरकार ऐसे 'गुड सेमेरिटन' लोगों को 25 हजार रुपये का पुरस्कार भी देती है.
दुर्घटना पीड़ितों के इलाज का खर्च उठाएगी सरकार
उन्होंने कहा कि देश की किसी भी सड़क पर दुर्घटना होने के बाद घायल व्यक्ति को किसी भी अस्पताल में भर्ती कराया जा सकता है. सरकार सात दिनों तक इलाज के लिए अधिकतम एक लाख रुपये तक का खर्च वहन कर रही है. इस योजना का लाभ हजारों लोगों को मिल चुका है.
देशभर में खुलेंगे 2,500 ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल
गडकरी ने बताया कि बेहतर और सुरक्षित ड्राइविंग को बढ़ावा देने के लिए देश में 2,500 ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल स्थापित किए जा रहे हैं. इसके अलावा परिवहन विभाग की 16 सेवाओं को ऑनलाइन कर दिया गया है, जिससे लोगों को सुविधा मिलेगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा.
हिट एंड रन मामलों में बढ़ाया गया मुआवजा
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हिट एंड रन मामलों में मुआवजा राशि बढ़ा दी गई है. अब ऐसे मामलों में मृत्यु होने पर पीड़ित परिवार को दो लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता दी जाती है, जिससे परिवार को तत्काल राहत मिल सके.
अपने संबोधन के अंत में नितिन गडकरी ने कहा कि सड़क सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है. इसमें कैब कंपनियों, परिवहन क्षेत्र से जुड़े हितधारकों और आम नागरिकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने सभी से मिलकर सड़क दुर्घटनाओं को कम करने और सुरक्षित परिवहन व्यवस्था बनाने की अपील की.
सरकार से 418 करोड़ रुपये के FDI को मंजूरी मिलने के बाद Invesco की करीब तीन साल बाद Zee Entertainment में वापसी हो गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
करीब तीन साल बाद वैश्विक निवेश प्रबंधन कंपनी Invesco ने एक बार फिर Zee Entertainment में वापसी की है. भारत सरकार ने OFI Global China Fund LLC के जरिए किए गए 418 करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को मंजूरी दे दी है. ऐसे समय में यह निवेश आया है, जब कंपनी अपने विस्तार और दीर्घकालिक विकास योजनाओं को गति देने के लिए 2,300 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी कर रही है.
तीन साल बाद हुई वापसी
Zee Entertainment Enterprises Limited में OFI Global China Fund LLC के जरिए 418 करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को केंद्र सरकार से मंजूरी मिल गई है. उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के अनुसार यह निवेश वित्त वर्ष 2025-26 की जनवरी-मार्च तिमाही के दौरान शेयर खरीद के माध्यम से किया गया. यह प्रस्ताव उस अवधि में सरकार द्वारा स्वीकृत 1,141 विदेशी निवेश प्रस्तावों में शामिल था.
2,300 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी
यह निवेश ऐसे समय में हुआ है, जब Zee Entertainment अपनी दीर्घकालिक विकास रणनीति को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 2,300 करोड़ रुपये जुटाने की योजना पर काम कर रही है. कंपनी इक्विटी आधारित वित्तीय साधनों के जरिए पूंजी जुटाएगी. इस राशि का उपयोग डिजिटल कारोबार, स्पोर्ट्स बिजनेस और अन्य प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों में निवेश के साथ-साथ कंपनी की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में किया जाएगा.
2023 में बेची थी पूरी हिस्सेदारी
गौरतलब है कि Invesco ने अप्रैल 2023 में Zee Entertainment में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच दी थी. उस समय OFI Global China Fund LLC ने करीब 5.11 प्रतिशत हिस्सेदारी ब्लॉक डील के जरिए बेची थी. लगभग 4.91 करोड़ शेयर 204.50 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बेचे गए थे और इस सौदे का कुल मूल्य करीब 1,004 करोड़ रुपये था. इसी के साथ कंपनी और निवेशक के बीच कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद भी समाप्त हो गया था.
बढ़ा विदेशी निवेशकों का भरोसा
सरकार से 418 करोड़ रुपये के FDI को मंजूरी मिलने के बाद Invesco की करीब तीन साल बाद Zee Entertainment में वापसी हो गई है. इसे कंपनी की विकास योजनाओं और भविष्य की संभावनाओं में विदेशी निवेशकों के बढ़ते भरोसे के रूप में देखा जा रहा है.
यह कोई आर्थिक हमला नहीं है. यह राजनीतिक हमला भी नहीं है. बल्कि यह एक सतत, बहु-मोर्चीय अभियान है जिसका उद्देश्य एक राष्ट्र का स्वयं पर से विश्वास खत्म करना है और इसका समय भी संयोग नहीं है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
"जनभावना ही सब कुछ है. जनभावना के साथ कोई भी चीज असफल नहीं हो सकती और उसके बिना कोई भी चीज सफल नहीं हो सकती."
— अब्राहम लिंकन, 1858
सेनाएं क्षेत्र पर कब्जा कर सकती हैं. चुनाव सरकारें बदल सकते हैं. लेकिन विजय का सबसे टिकाऊ रूप वह होता है जो न तो क्षेत्र पर कब्जा करता है और न ही सरकार पर. वह जनमानस पर कब्जा करता है. यही सबसे पुराना राजनीतिक हथियार है.
भूराजनीति और सूचना युद्ध का यह स्थापित सिद्धांत इंटरनेट, टेलीविजन और संभवतः प्रिंटिंग प्रेस से भी पहले का है. यदि आप किसी सरकार को चुनाव के माध्यम से पराजित नहीं कर सकते, तो आप उसे माहौल के माध्यम से पराजित करते हैं. आप वातावरण को भारी बना देते हैं. भविष्य को अंधकारमय महसूस कराते हैं. वर्तमान को ऐसी स्थिति में दिखाते हैं मानो देश किसी खाई के किनारे खड़ा हो. और फिर जब वास्तविक आर्थिक मंदी आती है, जैसा कि हर अर्थव्यवस्था में कभी न कभी होता है, तब आप उस चिंगारी को प्रज्वलित करते हैं जिसे आपने वर्षों तक धैर्यपूर्वक तैयार किया होता है.
साल 2026 का भारत ठीक इसी रणनीति का अनुभव कर रहा है. और जिस परिष्कृत तरीके से इसे अंजाम दिया जा रहा है, वह गंभीर और निष्पक्ष विश्लेषण की मांग करता है.
विनाश की भविष्यवाणी करने वाला समूह
किसी भी नैरेटिव युद्ध का पहला चरण होता है शोर, आपको निराशा का ऐसा आधार तैयार करना होता है कि जब वास्तविक आर्थिक दबाव सामने आए, तो वह संयोग नहीं बल्कि पुष्टि जैसा लगे.
राहुल गांधी लगातार इसी वाद्ययंत्र को बजाते रहे हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "भारतीय अर्थव्यवस्था मर चुकी है. मोदी ने इसे मार दिया." उन्होंने कहा, "भारत अपने इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहा है और आपदा की ओर बढ़ रहा है." एक अन्य बयान में कहा गया, "मोदी द्वारा निर्मित आपदाओं के नीचे भारत दबा हुआ है."
यह भाषा केवल आलोचनात्मक नहीं है, बल्कि सर्वनाश की चेतावनी देने वाली है, जिसे अधिकतम प्रभाव और न्यूनतम जटिलता के लिए तैयार किया गया है. प्रत्येक बयान विश्लेषण के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी हेडलाइन के रूप में सामने आता है जिसे वायरल होने के लिए तैयार किया गया हो.
अब यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि शोर और वास्तविक संकेतों में अंतर कैसे किया जाए.
वास्तविक आर्थिक तस्वीर यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ वास्तविक चुनौतियां हैं. खुदरा महंगाई दर 3.48 प्रतिशत है, जो भारतीय रिजर्व बैंक के संतोषजनक दायरे में है. वित्त वर्ष 2026 में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 94.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. विनिर्माण क्षेत्र का पीएमआई 56.6 और सेवा क्षेत्र का पीएमआई 58.9 है, जो स्वस्थ विस्तार का संकेत देते हैं. मई 2026 में ई-वे बिल जनरेशन में 12.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.
ये आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं. ये सरकारी आंकड़े हैं, जिनकी पुष्टि की जा सकती है.
लेकिन यहां वह बारीकी है जिसे विपक्ष दबाता है. एक वास्तविक और संरचनात्मक आर्थिक मंदी वास्तव में आ रही है, और इसकी उत्पत्ति का नई दिल्ली में कौन बैठा है, उससे कोई संबंध नहीं है.
वह एआई तूफान जिसे भारत ने आते नहीं देखा
भारत की वर्तमान आर्थिक कमजोरी को समझने के लिए यह समझना आवश्यक है कि पिछले तीन दशकों में भारत के मध्यम वर्ग की समृद्धि का निर्माण किसने किया. वह था आईटी सेवा उद्योग.
टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल केवल कंपनियां नहीं थीं. वे एक सामाजिक सीढ़ी थीं, जिन्होंने छोटे शहरों से लाखों लोगों को उठाकर आरामदायक शहरी जीवन तक पहुंचाया. उन्होंने विदेशी मुद्रा अर्जित की, रुपये को सहारा दिया, पुणे से लेकर हैदराबाद तक रियल एस्टेट बाजारों को गति दी और उपभोग के पूरे तंत्र को जन्म दिया.
अब यह मॉडल अस्तित्वगत दबाव में है. इसका कारण कोई सरकारी नीति नहीं है, बल्कि वह तकनीकी क्रांति है जो भारत से लगभग 10,000 किलोमीटर दूर घटित हो रही है.
वैश्विक ग्राहक, जो पहले भारतीय आईटी कंपनियों को काम सौंपते थे, अब वही काम एआई प्लेटफॉर्म की ओर भेज रहे हैं. मानव-घंटे पर आधारित वह मॉडल, जिसे भारत ने 30 वर्षों में विकसित किया, अब स्वचालन के कारण समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है.
आंकड़े एक गंभीर तस्वीर प्रस्तुत करते हैं. टीसीएस ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी छंटनी की घोषणा करते हुए 12,000 पद समाप्त किए. भारत की शीर्ष पांच आईटी कंपनियों ने मिलकर वित्त वर्ष 2026 में 7,000 कर्मचारियों की संख्या कम की. उद्योग के अनुमान बताते हैं कि वर्ष 2031 तक आईटी से जुड़े करीब 27 लाख रोजगार प्रभावित हो सकते हैं.
भारत के प्रमुख शहरों में वर्ष 2026 की पहली तिमाही में घरों की बिक्री में 13 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और विश्लेषकों ने इसका सीधा संबंध आईटी क्षेत्र में आय की असुरक्षा से जोड़ा है.
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, जो कभी भारतीय आईटी कंपनियों में भारी निवेश करते थे, अब अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं. जब एक्सेंचर की आय संबंधी चेतावनी ने आईटी सेवाओं पर एआई के प्रभाव की गहराई को उजागर किया, तब एक ही कारोबारी सत्र में इंफोसिस का शेयर 8 प्रतिशत और टीसीएस का शेयर 6 प्रतिशत गिर गया.
और यहीं पर नैरेटिव की मशीन सक्रिय होती है.
वैश्विक एआई बदलाव के कारण किसी एक क्षेत्र में विदेशी निवेशकों की बिकवाली को "वैश्विक ग्राहक एआई प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहे हैं" के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता. इसे इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि "वैश्विक निवेशकों का भारत पर से भरोसा उठ रहा है."
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मीडिया में जो शीर्षक दिखाई देता है और फिर घरेलू राजनीति में वापस लौटता है, वह कभी जटिल नहीं होता. वह हमेशा सरल होता है.
और वह सरल संदेश यही कहता है, भारत में कुछ गलत हो रहा है.
कमरे में तिलचट्टा, जेन जेड विद्रोह का निर्माण
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 16 मई 2026 को अपना पदार्पण किया. यह अभिजीत दिपके की रचना थी, जो बोस्टन विश्वविद्यालय की पृष्ठभूमि वाले एक राजनीतिक संचार रणनीतिकार हैं और भारत के डिजिटल रूप से संचालित विरोध प्रदर्शनों के पारिस्थितिकी तंत्र से पूर्व राजनीतिक संबंध रख चुके हैं. सबसे बढ़कर, वह एक दलित चेहरा हैं.
6 जून को जंतर-मंतर पर आयोजित एक प्रदर्शन को आकर्षक सोशल मीडिया पैकेजिंग, एक नकली घोषणापत्र और "आलसी और बेरोजगारों की आवाज़" जैसी ब्रांडिंग के साथ प्रस्तुत किया गया, जिसे ट्रेंड कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया था.
महत्वपूर्ण रूप से, सीजेपी को तत्काल अखिलेश यादव, महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद जैसे स्थापित विपक्षी नेताओं का समर्थन मिला. ये ऐसे राजनेता हैं जो भलीभांति समझते हैं कि जेन जेड की इस सौंदर्यात्मक राजनीति की उपयोगिता क्या है.
इस आंदोलन को स्वाभाविक और स्वतःस्फूर्त युवा आक्रोश के रूप में प्रस्तुत किया गया. लेकिन यह न तो स्वाभाविक था और न ही स्वतःस्फूर्त. इतनी सटीक संचार संरचना केवल निराशा से उत्पन्न नहीं होती. यह उन लोगों द्वारा बनाई जाती है जो राजनीतिक संदेशों को समझते हैं और पहले भी ऐसा कर चुके हैं. साथ ही, इसके लिए वित्तीय और रणनीतिक समर्थन की भी आवश्यकता होती है.
दिपके स्वयं सावधानीपूर्वक सीजेपी की तुलना नेपाल और बांग्लादेश से करने से बचते रहे. इसका कारण भी महत्वपूर्ण है. क्योंकि जो कार्यप्रणाली अपनाई गई है, वह काफी हद तक वही है जो बांग्लादेश और नेपाल में देखने को मिली थी, और उस तुलना को खुलकर स्वीकार करना पूरी संरचना को उजागर कर सकता था.
जुलाई 2024 में बांग्लादेश में जेन जेड की "क्रांति" ने शेख हसीना की सरकार को गिरा दिया. यह एक स्वतःस्फूर्त छात्र आंदोलन के रूप में दिखाई दिया, जो नौकरी में आरक्षण के विरोध से शुरू हुआ था.
सितंबर 2025 में नेपाल में जेन जेड के विरोध प्रदर्शनों ने, जो केवल पांच दिनों तक चले लेकिन जिनमें 76 लोगों की मौत हुई, केपी शर्मा ओली की सरकार को गिरा दिया.
दोनों मामलों में पैटर्न एक जैसा था. वास्तविक शिकायतें, सोशल मीडिया के माध्यम से विस्तार, आकर्षक और "गैर-राजनीतिक" ब्रांडिंग, तथा पृष्ठभूमि में राजनीतिक लाभार्थियों की मौजूदगी.
बांग्लादेश में लाभार्थियों के ऐसे नेटवर्कों से गहरे संबंध थे जो भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण माने जाते हैं. नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता ने ऐसी स्थिति पैदा की जिसका लाभ चीन ने शांत तरीके से उठाया.
यह पैटर्न कोई संयोग नहीं है. यह एक तरीका और एक संरचना है.
भारत में इस मॉडल को दोहराने का प्रयास संभवतः उसी स्तर तक नहीं पहुंच पाएगा. भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं अधिक मजबूत हैं, इसकी संघीय संरचना अधिक व्यापक है और इसकी सुरक्षा व्यवस्था अधिक परिष्कृत है.
लेकिन किसी आंदोलन को प्रभावी होने के लिए सरकार गिराने की आवश्यकता नहीं होती. उसे केवल आर्थिक मंदी के समय निराशा के माहौल को बढ़ाना होता है.
जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शनों के दृश्य, यदि संदर्भ से अलग कर दिए जाएं, तो वे अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों की सामग्री बन जाते हैं. यह सामग्री "भारत संकट में है" वाले नैरेटिव को मजबूत करती है. वही नैरेटिव विदेशी निवेशकों की धारणा को प्रभावित करता है और फिर विपक्ष के आर्थिक संदेशों को बल देता है.
यह एक ऐसा चक्र है जो स्वयं को लगातार मजबूत करता रहता है.
द्वीप की बाजी, पर्यावरण को भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना
यहीं पर नैरेटिव का यह युद्ध वास्तव में खतरनाक क्षेत्र में प्रवेश करता है.
भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना इस पीढ़ी में देश द्वारा किए गए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक निवेशों में से एक है.
यह परियोजना मलक्का जलडमरूमध्य से लगभग 40 समुद्री मील की दूरी पर स्थित है. इसी मार्ग से चीन के 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात गुजरते हैं. यदि ग्रेट निकोबार में भारत का सैन्य और लॉजिस्टिक केंद्र पूरी तरह विकसित हो जाता है, तो भविष्य में बीजिंग के साथ किसी भी टकराव की स्थिति में भारत के हाथ में एक असाधारण रणनीतिक कार्ड होगा.
यह ऐसा रणनीतिक अवरोध बिंदु है जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल सकता है. ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य की भूमिका ने यह दिखाया भी था.
चीन इस बात को अच्छी तरह समझता है. बीजिंग भारत की द्वीप-श्रृंखला रणनीति को ध्यान से देख रहा है.
पूर्व में वाईएएनआई श्रृंखला (यांगून–अंडमान–निकोबार–सबांग) और पश्चिम में एलएमडी श्रृंखला (लक्षद्वीप–मालदीव–डिएगो गार्सिया) को चीन काफी रणनीतिक चिंता के साथ देखता है.
चीन की 80 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा सुरक्षा उन समुद्री मार्गों पर निर्भर करती है, जिन पर भारत अब प्रभाव स्थापित करने की स्थिति में पहुंच रहा है.
इसके बाद अप्रैल 2026 में राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से ग्रेट निकोबार का दौरा किया.
5 जून, जिसे विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है और जो प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है, उस दिन उन्होंने ग्रेट निकोबार परियोजना को "झूठ" बताया.
उन्होंने आरोप लगाया कि यह परियोजना एक उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है और "सेव निकोबार" अभियान शुरू किया. उनकी अभियान वेबसाइट में भी इसे प्रमुख मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया गया.
पर्यावरण संबंधी चिंताएं अपने स्तर पर पूरी तरह निराधार नहीं हो सकतीं. यह परियोजना प्राचीन प्रवाल भित्तियों और वर्षावन पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती है.
फिर भी, परियोजना का रणनीतिक महत्व उससे कहीं अधिक बड़ा बताया गया है.
लेकिन यहां समय, प्रस्तुति और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अंडमान क्षेत्र में भारत की रणनीतिक निष्क्रियता से लाभ किसे होगा.
अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन, पर्यावरण नेटवर्क और डिजिटल प्रभावशाली व्यक्ति — जिनमें ध्रुव राठी भी शामिल हैं — एक साथ समान तर्कों को आगे बढ़ा रहे हैं.
ध्रुव राठी इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में एक विशेष स्थान रखते हैं. जर्मनी में रहने वाले इस भारतीय कंटेंट क्रिएटर की सरकार-विरोधी सामग्री, चाहे उद्देश्यवश हो या उपयोगिता के कारण, कई बार ऐसे नैरेटिव का स्रोत बनी है जिन्हें भारत के विदेशी विरोधियों ने अपने लिए उपयोगी पाया है.
जब पर्यावरण कार्यकर्ता, विपक्षी राजनेता और वैश्विक गैर-सरकारी नेटवर्क एक ही समय पर, एक ही रणनीतिक क्षेत्र के विरुद्ध और लगभग समान तर्कों के साथ सक्रिय दिखाई देते हैं, तब समन्वय के प्रश्न को केवल संदेह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता.
इसे सामान्य पैटर्न पहचान के रूप में भी देखा जा सकता है.
सेबी पैटर्न, नियमन को नैरेटिव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना
वित्तीय नियामक संस्थाएं नुकसान पहुंचाने वाली खबरों के सबसे विश्वसनीय स्रोतों में से होती हैं. सेबी का कोई आदेश वह संस्थागत महत्व रखता है जो किसी राजनीतिक भाषण में नहीं होता. और यहां भी एक ऐसा पैटर्न दिखाई देता है, जिसकी सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए.
पूर्व सेबी अध्यक्ष माधबी पुरी बुच ने भारतीय शेयर बाजारों में बार-बार "फ्रॉथ" और "बबल" जैसी स्थितियों को लेकर चेतावनी दी. इन बयानों की आवृत्ति और उनका स्वर — यहां तक कि मजबूत बुनियादी आर्थिक प्रदर्शन के दौर में भी — अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बाजार कहानी के आसपास लगातार अस्थिरता और नाजुकता का माहौल बनाता रहा. यह ऐसे समय में हुआ जब भारत को वैश्विक पूंजी के सामने एक स्थिर और उच्च विकास वाले गंतव्य के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी.
अब जून 2026 में राजेश एक्सपोर्ट्स के खिलाफ सेबी के आदेश को देखें, जिसमें 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व संबंधी गलत प्रस्तुतीकरण का दावा किया गया. यह आंकड़ा इतना बड़ा था कि उसने तत्काल अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां पैदा कर दीं और भारत को "घोटाले वाली अर्थव्यवस्था" के रूप में पेश करने वाली चर्चाओं को जन्म दिया.
वास्तविकता, यदि सावधानीपूर्वक देखी जाए, तो यह है कि राजेश एक्सपोर्ट्स संभवतः एक कमजोर प्रबंधन वाली कंपनी है, जहां कई प्रकार की कमियां मौजूद थीं. इसकी विदेशी सहायक कंपनियों के राजस्व का स्वतंत्र रूप से सत्यापन नहीं हो सका, फॉरेंसिक ऑडिटर को ईआरपी तक पहुंच नहीं दी गई और प्रमोटर पर प्रतिबंध लगाया गया. ये चिंताएं वास्तविक और वैध हो सकती हैं.
लेकिन 15.15 लाख करोड़ रुपये पारंपरिक अर्थों में कोई "घोटाला" नहीं है. यह एक ऐसी स्वर्ण व्यापार कंपनी का पांच वर्षों का संचयी कारोबार है, जो अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से धातु का व्यापार करती है.
बड़े स्तर पर सोने का व्यापार वास्तविक लाभ मार्जिन की तुलना में अत्यधिक नाममात्र का राजस्व उत्पन्न करता है. स्वयं सेबी के अनुसार शेयरधारकों की संपत्ति में 12,726 करोड़ रुपये की कमी आई, जो 15 लाख करोड़ रुपये की चोरी के दावे से पूरी तरह अलग बात है.
महत्वपूर्ण रूप से, प्रवर्तन निदेशालय की जांच में कोई असामान्य संपत्ति नहीं मिली. राजेश एक्सपोर्ट्स ने सेबी के आदेश को चुनौती नहीं दी, जिसने बाजार को आश्चर्यचकित किया. वहीं, सुर्खियों और वास्तविक स्थिति के बीच का अंतर काफी हद तक अनदेखा रह गया.
इसके बाद अयोध्या का मामला भी है. राम मंदिर में दान प्रबंधन से जुड़ी प्रशासनिक कमियों — जो वास्तविक थीं और जिनमें वास्तविक गिरफ्तारियां भी हुईं — को "20 मिलियन रुपये के मंदिर फंड घोटाले" के रूप में प्रस्तुत किया गया.
यह मामला वर्तमान राजनीतिक दौर की सबसे प्रतीकात्मक संस्थाओं में से एक को लक्ष्य बनाता दिखाई दिया.
यहां भी वही सूत्र दिखाई देता है. एक सीमित और वास्तविक समस्या को अधिकतम नैरेटिव प्रभाव के लिए बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना और ऐसे लक्ष्य को चुनना जिसका प्रतीकात्मक महत्व वित्तीय महत्व से कहीं अधिक हो.
इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखाई देता है. एक वैध लेकिन सीमित समस्या को लें. उसके आकार को सबसे नाटकीय सुर्खी तक बढ़ा दें. उस सुर्खी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलने दें. और फिर उसे विदेशी विश्वसनीयता के साथ घरेलू राजनीतिक विमर्श में वापस आते हुए देखें.
सिद्धांत का खुलासा
फरवरी 2023 में अरबपति निवेशक जॉर्ज सोरोस ने दावोस में सार्वजनिक रूप से कहा था कि अडाणी समूह के आसपास पैदा हुआ संकट नरेंद्र मोदी को कमजोर कर सकता है और भारत में उस चीज का मार्ग प्रशस्त कर सकता है जिसे उन्होंने "लोकतांत्रिक पुनर्जागरण" कहा.
यह कोई निवेश संबंधी टिप्पणी नहीं थी. यह दुनिया के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक वित्तपोषकों में से एक द्वारा खुलकर व्यक्त किया गया एक राजनीतिक उद्देश्य था.
ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस के माध्यम से जॉर्ज सोरोस की संस्थाओं की पूर्वी यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई राजनीतिक परिवर्तनों में प्रलेखित भूमिकाएं रही हैं.
यहां महत्व केवल सोरोस का नहीं था. महत्व उस असाधारण स्पष्टता का था, जिसके साथ पहली बार किसी प्रमुख वैश्विक राजनीतिक व्यक्ति ने खुलकर कहा कि आर्थिक अस्थिरता भारत में राजनीतिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है.
इस बयान ने एक सिद्धांत को उजागर किया. और जब कोई सिद्धांत सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर दिया जाता है, तो उसके क्रियान्वयन को पहचानना आसान हो जाता है.
अब देखें कि व्यवहार में यह प्रक्रिया कैसी दिखाई देती है.
घरेलू विवाद, जिन्हें विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र के खिलाड़ी उत्पन्न करते हैं या बढ़ाते हैं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय मीडिया संस्थान उठाते हैं — जैसे भारत पर बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री, न्यूयॉर्क टाइम्स की लोकतंत्र संबंधी रिपोर्टिंग, ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्टें या पर्यावरणीय गैर-सरकारी संगठनों के अभियान.
इसके बाद विदेशी संस्थागत निवेशक इन्हें एक प्रकार की पुष्टि के रूप में ग्रहण करते हैं. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की धारणा बदलती है. बाजार पर दबाव बढ़ता है. घरेलू विपक्ष उस दबाव को शासन की विफलता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है. फिर अंतरराष्ट्रीय मीडिया उसी चक्र को दोबारा चलाता है.
यह कोई षड्यंत्र सिद्धांत नहीं है. यह एक प्रलेखित फीडबैक लूप है, जिसे दुनिया के कई राजनीतिक संदर्भों में देखा गया है.
ब्राजील में बोल्सोनारो के दौर से लेकर हंगरी तक, पाकिस्तान के पीटीआई दौर से लेकर बांग्लादेश के 2024 के राजनीतिक परिवर्तन और नेपाल तक, इस प्रकार की प्रक्रिया विभिन्न रूपों में दिखाई देती है.
इस चक्र को संचालित करने के लिए किसी केंद्रीकृत समन्वय की आवश्यकता नहीं होती. इसके लिए केवल किसी विशेष परिणाम में साझा रुचि और ऐसे पर्याप्त पारिस्थितिकी तंत्र के खिलाड़ियों की आवश्यकता होती है, जो उस संकेत को समझते हों.
कूटनीतिक शतरंज की बिसात, जहां भारत वास्तव में जीत रहा है
यह वही बात है जिसे यह शोर छिपाने के लिए बनाया गया है.
चीन मोर्चा
साल 2017 का डोकलाम गतिरोध भारत की वह रेखा थी, जिसके आगे पीछे हटना संभव नहीं था. यह 73 दिनों तक चला एक ऐसा टकराव था जिसने यह प्रदर्शित किया कि भारत एक महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र के निकट चीनी बुनियादी ढांचे के विस्तार को शारीरिक रूप से रोकने के लिए तैयार है.
अक्टूबर 2024 में डेपसांग बुल्ज और डेमचोक को लेकर हुए अलगाव समझौते के बाद, जो 2020 के गतिरोध के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा के अंतिम विवादित क्षेत्र थे, चीन की उकसावे वाली गतिविधियों में उल्लेखनीय कमी आई है.
फरवरी 2025 में बीजिंग ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह सीमा संबंधी समझौतों को "व्यापक और प्रभावी तरीके" से लागू कर रहा है.
यह शांति सद्भावना का परिणाम नहीं है. चीन भावनाओं को नहीं बल्कि रणनीतिक गणना को समझता है.
वह जानता है कि भारत ने वह भूमिका नहीं निभाई, जिसकी अपेक्षा अमेरिका की विदेश नीति व्यवस्था उससे करती रही है — अर्थात चीन के विरुद्ध एक अग्रिम मोर्चे वाले एशियाई नाटो सहयोगी की.
भारत ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की निंदा नहीं की. उसने पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल खरीदा. उसने ब्रिक्स मुद्रा व्यवस्था पर चर्चाओं में भाग लिया और ईरान के प्रति स्वतंत्र रुख बनाए रखा.
एक ऐसा भारत, जो रणनीतिक रूप से स्वतंत्र बना रहता है और पश्चिम का उपकरण नहीं बनता, चीन के लिए एक अधिक जटिल प्रतिद्वंद्वी है.
सीमा पर तनाव में कमी आना आंशिक रूप से इसी रणनीतिक गणना का परिणाम है.
चीन पर कभी भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता और उसकी रणनीतिक धैर्य की अवधि दशकों में मापी जाती है. लेकिन वर्तमान संतुलन एक वास्तविक और कठिन परिश्रम से हासिल की गई उपलब्धि है.
डिएगो गार्सिया / चागोस उपलब्धि
सितंबर 2025 में भारत ने एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की, जिस पर लगभग कोई चर्चा नहीं हुई.
जब ब्रिटेन-मॉरीशस संधि के तहत चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को हस्तांतरित की गई, तब भारत ने, जिसने लंबे समय से मॉरीशस के उपनिवेशवाद समाप्ति के दावे का समर्थन किया था, अपनी कूटनीतिक पूंजी का लाभ उठाया.
भारत ने विस्तारित चागोस विशेष आर्थिक क्षेत्र के भीतर एक उपग्रह टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और संचार स्टेशन स्थापित करने के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए.
इसके अतिरिक्त, भारत ने मॉरीशस के लिए 680 मिलियन डॉलर के विशेष आर्थिक पैकेज के हिस्से के रूप में समुद्री निगरानी सहायता प्रदान करने का भी वादा किया.
यह रणनीतिक भूगोल का वास्तविक बुनियादी ढांचे में बदलना है.
अब भारत के पास हिंद महासागर के मध्य में स्थायी निगरानी क्षमता है, ठीक उन समुद्री मार्गों पर जहां से चीनी नौसैनिक जहाज प्रशांत और हिंद महासागर के बीच आवागमन करते हैं.
यह ऐसी शांत, धैर्यपूर्ण और परिणामकारी कूटनीति है, जो टेलीविजन की सुर्खियां नहीं बनती, लेकिन रणनीतिक मानचित्र को बदल देती है.
द्वीप श्रृंखला की रणनीति
जिसे राहुल गांधी पर्यावरणीय खतरा बता रहे हैं, उसे रणनीतिक विश्लेषक और भारतीय नौसेना एक पीढ़ी में मिलने वाला बुनियादी ढांचे का अवसर मानते हैं.
ग्रेट निकोबार, लक्षद्वीप, मॉरीशस और सेशेल्स के माध्यम से भारत हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति का एक व्यापक चक्र बना रहा है.
चीन की "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" रणनीति — जिसके तहत ग्वादर, हम्बनटोटा और चिटगांव जैसे बंदरगाहों के माध्यम से भारत को घेरने की कोशिश की गई — अब उसका जवाब दिया जा रहा है.
ग्रेट निकोबार के विरुद्ध विपक्ष का पर्यावरणीय अभियान, चाहे उसकी घोषित मंशा कुछ भी हो, इस प्रतिरक्षा रणनीति के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु को लक्ष्य बनाता दिखाई देता है.
राजनीतिक विरोध और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के हितों के इस मेल को कम से कम स्वीकार करना आवश्यक है.
मनोस्थिति का युद्ध
इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े संघर्ष अब केवल भूभाग के लिए नहीं लड़े जाते. वे लोगों की मनःस्थिति के लिए लड़े जाते हैं.
हर बड़ी अर्थव्यवस्था और हर बड़ा लोकतंत्र निर्मित नैरेटिव युद्ध के चक्रों का सामना कर रहा है.
संयुक्त राज्य अमेरिका ने इसका अनुभव किया है. यूनाइटेड किंगडम ने ब्रेक्जिट के दौरान सूचना तंत्र के प्रभाव को देखा. फ्रांस, जर्मनी और ब्राजील भी इस प्रकार की प्रक्रियाओं से गुजरे हैं.
जो बात उन देशों को अलग करती है जो इन परिस्थितियों का सामना कर लेते हैं और उन देशों से जो टूट जाते हैं, वह वास्तविक समस्याओं की अनुपस्थिति नहीं है. हर देश के पास वास्तविक समस्याएं होती हैं.
महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्थागत स्पष्टता मौजूद हो — वैध आलोचना और रणनीतिक नैरेटिव युद्ध के बीच अंतर करने की क्षमता.
वास्तविक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई निराशा के सामने आत्मसमर्पण न करना और नागरिकों तक वास्तविक स्थिति को पहुंचाना, जो लगातार सूचनात्मक शोर से घिरे हुए हैं.
भारत के आईटी क्षेत्र की चुनौतियां वास्तविक हैं और उन्हें ईमानदार उत्तर की आवश्यकता है.
पुनः कौशल विकास, एआई-तैयारी नीतियां और ऐसे नए आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण, जो उस प्रतिभा को समाहित कर सकें जिसे पुराना मॉडल खो रहा है, आवश्यक हैं.
वैश्विक आर्थिक मंदी आने वाले कई तिमाहियों में आय पर दबाव डालेगी और भारत इसके विपरीत होने का दावा नहीं कर सकता.
लेकिन यह नैरेटिव कि भारत आर्थिक विनाश की ओर बढ़ रहा है, कि उसके बाजार एक घोटाला हैं, कि उसकी रणनीतिक अवसंरचना पर्यावरणीय विनाश है और कि उसके युवा क्रांति के कगार पर हैं, यह विश्लेषण नहीं है.
यह एक घेराबंदी है.
और इसे उसी रूप में पहचानना, इसका मुकाबला करने की दिशा में पहला कदम है.
पिछले एक दशक में भारत ने शांत लेकिन महत्वपूर्ण तरीके से वास्तविक कूटनीतिक सफलताएं, रणनीतिक संपत्तियां और आर्थिक आधार तैयार किए हैं.
इसके आसपास निर्मित की जा रही कृत्रिम निराशा की संरचना पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि भारत और भारतीय इन उपलब्धियों को भूल जाएं.
यह विश्लेषण नीति एवं खुफिया क्षेत्रों से प्राप्त स्रोतों, ओपन-सोर्स रिपोर्टिंग, बाजार आंकड़ों, रणनीतिक अनुसंधान और राजनीतिक अवलोकनों पर आधारित है. आर्थिक आंकड़े सरकारी और स्वतंत्र वित्तीय स्रोतों से लिए गए हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
MSC की टर्मिनल कंपनी TiL खरीदेगी 49% हिस्सेदारी. 2.85 अरब डॉलर वैल्यूएशन वाली इस साझेदारी से चीन और मध्य-पूर्व के बड़े पोर्ट्स को मिलेगी चुनौती.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी पोर्ट्स ने अपने महत्वाकांक्षी विझिंजम पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनियों में शामिल MSC समूह की टर्मिनल इकाई TiL के साथ 1.397 अरब डॉलर (करीब 13 हजार करोड़ रुपये) की रणनीतिक साझेदारी की है. इस निवेश के बाद केरल स्थित विझिंजम पोर्ट को हिंद महासागर क्षेत्र के प्रमुख ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह पोर्ट भविष्य में चीन और मध्य-पूर्व के बड़े बंदरगाहों को कड़ी चुनौती दे सकता है.
TiL खरीदेगी 49 फीसदी हिस्सेदारी
अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड (APSEZ) ने मेडिटेरेनियन शिपिंग कंपनी (MSC) समूह की टर्मिनल कंपनी टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (TiL) के साथ एक निर्णायक समझौता किया है. इसके तहत TiL, अडानी विझिंजम पोर्ट प्राइवेट लिमिटेड (AVPPL) में 49 फीसदी हिस्सेदारी खरीदेगी.
इस निवेश की कुल राशि 1.397 अरब डॉलर है, जबकि कंपनी का कुल मूल्यांकन 2.85 अरब डॉलर आंका गया है. डील पूरी होने के बाद APSEZ के पास 51 फीसदी हिस्सेदारी बनी रहेगी और कंपनी का प्रबंधन नियंत्रण भी उसके पास रहेगा.
दो चरणों में होगा निवेश
कंपनी के मुताबिक TiL का निवेश दो चरणों में किया जाएगा. पहले चरण में 539 मिलियन डॉलर का निवेश कर 49 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी जाएगी. वहीं, शेष 858 मिलियन डॉलर का निवेश दिसंबर 2028 तक पोर्ट के विस्तार कार्य पूरा होने के बाद कर्ज और इक्विटी के माध्यम से किया जाएगा.
कार्गो कारोबार को मिलेगा बड़ा बढ़ावा
इस रणनीतिक साझेदारी से विझिंजम पोर्ट पर कार्गो ट्रैफिक बढ़ने की उम्मीद है. खास तौर पर बांग्लादेश और दक्षिण एशिया के अन्य देशों से आने वाले कार्गो को आकर्षित करने में मदद मिलेगी. कंपनियों का मानना है कि इससे पोर्ट की संचालन क्षमता बेहतर होगी और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी स्थिति एक बड़े ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में मजबूत होगी.
2028 तक तीन गुना से ज्यादा बढ़ेगी क्षमता
दिसंबर 2024 में शुरू हुआ विझिंजम पोर्ट भारत का पहला डीप-ड्राफ्ट मेगा ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है. वर्तमान में इसकी कार्गो हैंडलिंग क्षमता 1.6 मिलियन TEU है. पोर्ट के विस्तार के बाद दिसंबर 2028 तक इसकी क्षमता बढ़कर 5.7 मिलियन TEU तक पहुंच जाएगी, जिससे यह एशिया के प्रमुख कंटेनर हब्स में शामिल हो सकता है.
अडानी और MSC की तीसरी बड़ी साझेदारी
मुंद्रा और एन्नोर पोर्ट्स में सहयोग के बाद APSEZ और TiL के बीच यह तीसरी रणनीतिक साझेदारी है. अडानी पोर्ट्स के होल-टाइम डायरेक्टर और सीईओ अश्वनी गुप्ता ने कहा कि MSC के साथ यह सहयोग वैश्विक सप्लाई चेन को मजबूत करेगा और भारत की अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच को और बेहतर बनाएगा.
भारत के लिए क्यों अहम है यह डील?
विझिंजम पोर्ट की भौगोलिक स्थिति अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट के बेहद करीब है. ऐसे में यह पोर्ट भारत के लिए एक बड़े ट्रांसशिपमेंट केंद्र के रूप में उभर सकता है. इससे विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता कम होगी और देश के समुद्री व्यापार को नई गति मिलेगी.
यस बैंक ने कहा कि प्रस्तावित इक्विटी इश्यू के कारण मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी नहीं होगी. इससे मौजूदा निवेशकों के हितों पर सीमित प्रभाव पड़ेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंक यस बैंक (Yes Bank) ने अपनी पूंजी स्थिति को और मजबूत करने के लिए 16,000 करोड़ रुपये तक जुटाने की योजना को मंजूरी दे दी है. बैंक के निदेशक मंडल ने इक्विटी और डेट इंस्ट्रूमेंट्स के माध्यम से धन जुटाने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की है.
इक्विटी और डेट के जरिए जुटाए जाएंगे 16,000 करोड़ रुपये
बैंक द्वारा जारी नियामकीय सूचना के अनुसार, यस बैंक लगभग 7,500 करोड़ रुपये इक्विटी इंस्ट्रूमेंट्स के जरिए और 8,500 करोड़ रुपये डेट इंस्ट्रूमेंट्स के माध्यम से जुटाएगा. हालांकि बैंक ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि इसके लिए कौन-कौन से वित्तीय साधनों का उपयोग किया जाएगा और फंड जुटाने की प्रक्रिया कब तक पूरी होगी.
शेयरधारकों की हिस्सेदारी पर सीमित असर
यस बैंक ने कहा कि प्रस्तावित इक्विटी इश्यू के कारण मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी (डायल्यूशन) नहीं होगी. इससे मौजूदा निवेशकों के हितों पर सीमित प्रभाव पड़ेगा.
कारोबारी विस्तार को मिलेगा समर्थन
बैंक ने बताया कि यह फंड जुटाने की योजना भविष्य की व्यावसायिक वृद्धि और मजबूत पूंजी आधार बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है. बैंक अपने ऋण कारोबार और अन्य वित्तीय गतिविधियों के विस्तार के लिए पर्याप्त पूंजी उपलब्ध रखना चाहता है.
पूंजी पर्याप्तता अनुपात मजबूत
31 मार्च 2026 तक यस बैंक का पूंजी पर्याप्तता अनुपात (Capital Adequacy Ratio) 15.3 प्रतिशत रहा. यह एक वर्ष पहले के 15.6 प्रतिशत के स्तर से थोड़ा कम है, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित न्यूनतम 9 प्रतिशत की नियामकीय आवश्यकता से काफी अधिक है. मजबूत पूंजी आधार के कारण बैंक भविष्य में अपने कारोबार के विस्तार और संभावित जोखिमों से निपटने की बेहतर स्थिति में बना हुआ है.
सरकार ने पेट्रोल और डीजल की घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए एहतियातन ये प्रतिबंध लगाए थे. सोमवार को जारी एक आधिकारिक आदेश के अनुसार, बुधवार से सभी अस्थायी प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर इस महीने की शुरुआत में लगाए गए अस्थायी प्रतिबंधों को वापस लेने का फैसला किया है. सरकार के इस निर्णय के बाद 1 जुलाई 2026 से देशभर में ईंधन की सामान्य बिक्री फिर से शुरू हो जाएगी. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर पैदा हुई चिंताएं अब कम होती दिखाई दे रही हैं.
मध्य पूर्व संकट के बीच लगाए गए थे प्रतिबंध
सरकार ने पेट्रोल और डीजल की घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए एहतियातन ये प्रतिबंध लगाए थे. मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के चलते वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने की आशंका थी, जिसके कारण देश में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए यह फैसला लिया गया था.
1 जुलाई से सामान्य होगी बिक्री
सोमवार को जारी एक आधिकारिक आदेश के अनुसार, 1 जुलाई से सभी अस्थायी प्रतिबंध समाप्त कर दिए जाएंगे. इसके बाद देशभर के पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल और डीजल की सामान्य बिक्री फिर से शुरू हो जाएगी.
व्यावसायिक उपभोक्ताओं पर लगी थी रोक
लागू किए गए प्रतिबंधों के तहत व्यावसायिक उपभोक्ताओं को खुदरा ईंधन स्टेशनों से पेट्रोल और डीजल खरीदने की अनुमति नहीं थी. इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर ईंधन की कमी से बचने के लिए डीजल की दैनिक खरीद की सीमा भी तय की गई थी.
आपूर्ति संबंधी चिंताओं में आई कमी
सरकार का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी चिंताएं अब काफी हद तक कम हो गई हैं. इसी के मद्देनजर अस्थायी प्रतिबंधों को वापस लेने और ईंधन वितरण व्यवस्था को पूरी तरह सामान्य करने का निर्णय लिया गया है.
उपभोक्ताओं और उद्योगों को मिलेगी राहत
पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर लगी पाबंदियां हटने से आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ परिवहन, लॉजिस्टिक्स और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों को भी राहत मिलने की उम्मीद है. इससे ईंधन आपूर्ति और वितरण व्यवस्था में स्थिरता आएगी तथा बाजार में सामान्य स्थिति बहाल होगी.
सेबी से मंजूरी मिलने के बाद कंपनी आईपीओ प्रबंधन, पूंजी जुटाने की सलाह और अन्य कॉर्पोरेट फाइनेंस सेवाएं प्रदान कर सकेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की प्रमुख डिस्काउंट ब्रोकरेज कंपनी जेरोधा अब अपने कारोबार का दायरा बढ़ाने की तैयारी में है. कंपनी ने निवेश बैंकिंग कारोबार में प्रवेश के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) से कैटेगरी-1 मर्चेंट बैंकिंग लाइसेंस के लिए आवेदन किया है. मंजूरी मिलने के बाद कंपनी आईपीओ प्रबंधन, पूंजी जुटाने की सलाह और अन्य कॉर्पोरेट फाइनेंस सेवाएं प्रदान कर सकेगी.
सेबी से मांगी कैटेगरी-1 मर्चेंट बैंकिंग लाइसेंस
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेरोधा ने अपनी इकाई 'जेरोधा कॉरपोरेट एडवाइजर्स' के जरिए अप्रैल 2026 में सेबी के पास कैटेगरी-1 मर्चेंट बैंकिंग लाइसेंस के लिए आवेदन किया था. फिलहाल यह आवेदन नियामकीय मंजूरी का इंतजार कर रहा है. कंपनी ने भी इस आवेदन की पुष्टि की है, हालांकि लाइसेंस मिलने तक उसने अपने विस्तृत कारोबारी योजनाओं का खुलासा नहीं किया है.
लाइसेंस मिलने पर क्या कर सकेगी कंपनी?
कैटेगरी-1 मर्चेंट बैंकिंग लाइसेंस मिलने के बाद जेरोधा को निवेश बैंकिंग से जुड़ी कई सेवाएं देने की अनुमति मिल जाएगी. इनमें आईपीओ प्रबंधन, कंपनियों को पूंजी जुटाने संबंधी सलाह, इश्यू मैनेजमेंट, अंडरराइटिंग और अन्य कॉर्पोरेट फाइनेंस सेवाएं शामिल हैं.
तेजी से बढ़ रहा है IPO बाजार
जेरोधा का यह कदम ऐसे समय आया है जब भारत का प्राथमिक बाजार लगातार मजबूत बना हुआ है. बड़ी संख्या में स्टार्टअप, टेक्नोलॉजी कंपनियां और स्थापित कारोबारी समूह शेयर बाजार के जरिए पूंजी जुटाने की तैयारी कर रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में देश में आईपीओ गतिविधियां तेज बनी रह सकती हैं, जिससे निवेश बैंकिंग कारोबार में अवसर बढ़ेंगे.
बड़ी कंपनियों को मिलेगी चुनौती
यदि जेरोधा को सेबी से मंजूरी मिल जाती है तो कंपनी निवेश बैंकिंग क्षेत्र में पहले से मौजूद बड़ी कंपनियों को चुनौती दे सकती है. फिलहाल आईपीओ सलाह और कैपिटल मार्केट कारोबार में JM Financial, Kotak Mahindra Capital, Axis Capital और ICICI Securities जैसी कंपनियों का दबदबा है.
वित्तीय सेवाओं के विस्तार पर फोकस
पिछले कुछ वर्षों में जेरोधा ने अपनी सेवाओं का लगातार विस्तार किया है. कंपनी निवेश और वेल्थ मैनेजमेंट से जुड़े कई उत्पाद पेश कर चुकी है. हाल ही में कंपनी ने अपने Coin प्लेटफॉर्म पर फिक्स्ड डिपॉजिट निवेश की सुविधा शुरू की है, जिससे ग्राहक साझेदार बैंकों की एफडी में निवेश कर सकते हैं और एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उनका प्रबंधन कर सकते हैं.
टेक्नोलॉजी और निवेशक नेटवर्क का मिलेगा फायदा
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि निवेश बैंकिंग कारोबार में प्रवेश से जेरोधा अपनी मजबूत तकनीकी क्षमता और बड़े रिटेल निवेशक आधार का लाभ उठा सकती है. उभरती कंपनियों और स्टार्टअप्स को पूंजी जुटाने में सहायता देने के साथ कंपनी अपने कारोबार को नई दिशा दे सकती है.
पूंजी बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
भारत का आईपीओ बाजार लगातार विस्तार कर रहा है, खासकर नई तकनीक आधारित और स्टार्टअप कंपनियों के बीच. ऐसे में जेरोधा की संभावित एंट्री निवेश बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को और तेज कर सकती है और देश के पूंजी बाजार परिदृश्य में नए बदलाव ला सकती है.
सोमवार को सेंसेक्स 372.10 अंक यानी 0.48 फीसदी टूटकर 76,728.37 अंक पर बंद हुआ था. वहीं, निफ्टी 50 इंडेक्स 109.75 अंक यानी 0.46 फीसदी गिरकर 23,946.25 अंक पर आ गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार की शुरुआत आज सतर्कता के साथ हो सकती है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक संकेतों के बीच निवेशकों की नजर सेंसेक्स और निफ्टी की चाल पर रहेगी. पिछले कारोबारी सत्र में बाजार गिरावट के साथ बंद हुआ था और आज भी भू-राजनीतिक घटनाक्रम निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं.
पिछले कारोबारी सत्र में दबाव में रहा बाजार
सोमवार को घरेलू शेयर बाजार गिरावट के साथ बंद हुआ था. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 372.10 अंक यानी 0.48 फीसदी टूटकर 76,728.37 अंक पर बंद हुआ था. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 इंडेक्स 109.75 अंक यानी 0.46 फीसदी गिरकर 23,946.25 अंक पर आ गया था. कारोबार के दौरान सेंसेक्स में 400 अंकों से अधिक की गिरावट दर्ज की गई थी, जबकि निफ्टी 24,000 के स्तर से नीचे फिसल गया था.
पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर नजर
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और उससे जुड़ी अनिश्चितताएं निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर रही हैं. कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक बाजारों के संकेत भी आज के कारोबार की दिशा तय कर सकते हैं.
इन शेयरों पर रहा था दबाव
पिछले सत्र में सेंसेक्स के 30 में से 16 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए थे. कोटक महिंद्रा बैंक में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई थी. इसके अलावा महिंद्रा एंड महिंद्रा, मारुति सुजुकी, इंडिगो, अल्ट्राटेक सीमेंट और लार्सन एंड टुब्रो के शेयरों में भी कमजोरी देखने को मिली थी. वहीं, इटरनल, ट्रेंट, बीईएल, एनटीपीसी, पावर ग्रिड और टाटा स्टील के शेयर बढ़त के साथ बंद हुए थे.
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी कमजोरी
ब्रॉडर मार्केट में भी दबाव देखने को मिला था. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 0.37 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.62 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी. सेक्टोरल इंडेक्स की बात करें तो फार्मा, मेटल और हेल्थकेयर शेयरों में मजबूती रही, जबकि ऑटो, केमिकल और ऑयल एंड गैस सेक्टर में बिकवाली देखने को मिली.
बाजर विशेषज्ञों के अनुसार, आज के कारोबार में निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया के ताजा घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक बाजारों के संकेत और रुपये की चाल पर रहेगी. इन कारकों के आधार पर बाजार की दिशा तय हो सकती है.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
30 जून को शेयर बाजार में कई बड़ी कॉरपोरेट और सेक्टोरल खबरों का असर देखने को मिल सकता है. एक्सिस बैंक और बंधन बैंक के CFO के इस्तीफे, यस बैंक के 16,000 करोड़ रुपये तक फंड जुटाने की योजना, एसआईएस के 120 करोड़ रुपये के बायबैक प्रस्ताव और जूनिपर होटल्स के CFO के इस्तीफे पर निवेशकों की नजर रहेगी. वहीं RITES और CONCOR के बीच लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर समझौता, जगसनपाल फार्मा द्वारा Aequitas Healthcare में 85 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने का फैसला, एसबीआई की 30 करोड़ डॉलर की बॉन्ड इश्यू योजना और SJVN के गुजरात को ग्रीन पावर आपूर्ति समझौते भी चर्चा में रहेंगे. इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से एविएशन, पेंट और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयरों में हलचल संभव है, जबकि ONGC और ऑयल इंडिया पर दबाव बन सकता है. Arihant Capital Markets को रेगुलेटरी मंजूरी, Muthoot Capital Services के स्ट्रेस्ड लोन सौदे और GeeCee Ventures के निवेश जैसे घटनाक्रम भी मंगलवार के कारोबार में चुनिंदा शेयरों को प्रभावित कर सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
कंपनी का लक्ष्य हर साल 67 अरब यूनिट स्वच्छ बिजली की आपूर्ति करना है, जिससे लगभग 4.7 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी लाई जा सकेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
राजस्थान देश के नवीकरणीय ऊर्जा हब के रूप में तेजी से उभर रहा है. इसी कड़ी में सेरेंटिका रिन्यूएबल्स ने राज्य में 1 लाख करोड़ रुपये निवेश करने की योजना की घोषणा की है. कंपनी इस निवेश के जरिए औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन, ऊर्जा भंडारण और चौबीसों घंटे स्वच्छ बिजली आपूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर ग्रीन एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करेगी.
कंपनी अब तक राज्य में 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर चुकी है. कंपनी की कुल सौर ऊर्जा क्षमता का 50 फीसदी से अधिक हिस्सा राजस्थान में स्थापित है. बीकानेर और जैसलमेर इसके प्रमुख केंद्र हैं, जबकि अगले चरण में भड़ला तक विस्तार किया जाएगा.
27,000 मेगावाट की पाइपलाइन पर काम
कंपनी की प्रस्तावित 27,000 मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा पाइपलाइन में राजस्थान की परियोजनाओं की अहम भूमिका है. वर्तमान में कंपनी के पास 2,500 मेगावाट से अधिक की परिचालन क्षमता है, जबकि 3,000 मेगावाट से ज्यादा की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं. कंपनी का लक्ष्य हर साल 67 अरब यूनिट स्वच्छ बिजली की आपूर्ति करना है, जिससे लगभग 4.7 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी लाई जा सकेगी.
बीकानेर में बनेगी बड़ी बैटरी स्टोरेज परियोजना
सेरेंटिका बीकानेर में क्षेत्र की सबसे बड़ी बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) परियोजनाओं में से एक विकसित कर रही है. पहले चरण में 200 मेगावाट-घंटा क्षमता स्थापित की जाएगी. इसके बाद दूसरे चरण में 800 मेगावाट-घंटा क्षमता जोड़ी जाएगी, जिसके अगले तीन महीनों में चालू होने की उम्मीद है. यह परियोजना उद्योगों को चौबीसों घंटे निर्बाध स्वच्छ बिजली उपलब्ध कराने में मदद करेगी.
फतेहगढ़ में बढ़ेगी सौर ऊर्जा क्षमता
वित्त वर्ष 2026-27 में कंपनी फतेहगढ़ स्थित अपने सौर ऊर्जा प्लेटफॉर्म का विस्तार करेगी. पहले चरण में 1,270 मेगावाट पीक क्षमता जोड़ी जाएगी. इसके बाद 500 मेगावाट अतिरिक्त सौर क्षमता और 2,500 मेगावाट-घंटा की बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली स्थापित की जाएगी.
सीईओ ने क्या कहा?
सेरेंटिका रिन्यूएबल्स के मुख्य कार्यपालक अधिकारी अक्षय हीरानंदानी ने कहा कि राजस्थान कंपनी की विकास रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह राज्य नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से अग्रणी बन रहा है. उन्होंने कहा कि उद्योगों को चौबीसों घंटे विश्वसनीय स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराना भारत के ऊर्जा परिवर्तन का अहम आधार है और बीकानेर की बैटरी स्टोरेज परियोजना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी.
सामाजिक विकास पर भी फोकस
बुनियादी ढांचे के विकास के साथ कंपनी सामाजिक क्षेत्र में भी निवेश कर रही है. एडइंडिया और 'विकास' कार्यक्रमों के माध्यम से कंपनी ने राजस्थान में शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और स्थानीय बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 3.8 करोड़ रुपये से अधिक की प्रतिबद्धता जताई है.
औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन का नया केंद्र बनेगा राजस्थान
देश में औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है. ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण के एकीकृत मॉडल के जरिए सेरेंटिका राजस्थान को स्वच्छ, किफायती और विश्वसनीय ऊर्जा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है.
इन निवेशों से न सिर्फ राज्य में ग्रीन एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा, बल्कि राजस्थान औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन के राष्ट्रीय मॉडल के रूप में भी उभर सकता है.