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पश्चिम एशिया संघर्ष का असर. बीमा, व्यापार और बैंकिंग पर बढ़ा जोखिम प्रीमियम: रिपोर्ट

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत की वित्तीय प्रणाली पर इस संकट का सबसे बड़ा असर धीरे-धीरे सामने आएगा. लंबे समय तक जारी तनाव MSME और रिटेल सेक्टर में एसेट क्वालिटी पर दबाव बढ़ा सकता है और आर्थिक स्थिरता को चुनौती दे सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत की वित्तीय प्रणाली पर साफ दिखने लगा है. EY India की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह भू-राजनीतिक संकट अब आर्थिक झटके में बदल चुका है, जो बैंकिंग, बीमा और ट्रेड सेक्टर की लागत, तरलता और मुनाफे को प्रभावित कर रहा है.

बहु-स्तरीय आर्थिक दबाव बढ़ा

रिपोर्ट के मुताबिक, जो संकट पहले सिर्फ भू-राजनीतिक था, अब वह ऊर्जा बाजार, व्यापार मार्ग, बीमा क्षमता और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के जरिए व्यापक आर्थिक व्यवधान में बदल गया है. कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, विदेशी मुद्रा पर दबाव और मरीन, एविएशन व ट्रेड क्रेडिट में 40–50% तक बढ़े वॉर रिस्क प्रीमियम ने लागत को तेजी से बढ़ा दिया है.

भारत पर तात्कालिक प्रभाव

भारत में इसका असर बढ़ते फ्रेट और बीमा खर्च के रूप में दिख रहा है. साथ ही रुपये पर दबाव बढ़ा है और यह डॉलर के मुकाबले 100 रुपये के स्तर को छूने की आशंका जता रहा है. हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि असली असर धीरे-धीरे बैंक मार्जिन, वर्किंग कैपिटल और घरेलू आय पर पड़ेगा.

बैंकिंग सेक्टर में बढ़ती चुनौती

भारतीय बैंक “नॉन-लीनियर ट्रांसमिशन” के दौर से गुजर रहे हैं, जहां दबाव पहले मार्जिन पर, फिर वर्किंग कैपिटल और अंत में आय पर पड़ता है. इससे कैश फ्लो में अस्थिरता बढ़ रही है और पारंपरिक क्रेडिट रिस्क मॉडल चुनौती में आ गए हैं.

किन सेक्टर्स पर ज्यादा असर

तेल, एविएशन, लॉजिस्टिक्स और केमिकल जैसे सेक्टर तुरंत दबाव में हैं, जहां लागत बढ़ने और ट्रांजिट टाइम लंबा होने से मार्जिन घट रहा है. वहीं ऑटो एंसिलरी, सीमेंट और MSME मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में यह असर धीरे-धीरे दिख रहा है.

AI और रोजगार पर असर

रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका को भी जोखिम बढ़ाने वाला बताया गया है. खासकर IT और BPO सेक्टर में रोजगार पर असर पड़ रहा है, जिससे रिटेल लोन लेने वाले ग्राहकों पर महंगाई और आय अनिश्चितता, दोहरी मार पड़ रही है.

MSME और सप्लाई चेन पर दबाव

MSME सेक्टर में वर्किंग कैपिटल का संकट गहराता जा रहा है. कंपनियां बढ़ती लागत और लंबी भुगतान अवधि के कारण बैंकों पर अधिक निर्भर हो रही हैं. एक्सपोर्ट आधारित सेक्टर्स जैसे अपैरल, केमिकल और लॉजिस्टिक्स पर इसका ज्यादा असर है.

ट्रेड फाइनेंस और भुगतान में बाधाएं

लॉजिस्टिक्स में रुकावट और सख्त नियमों के कारण ट्रेड फाइनेंस प्रभावित हो रहा है. लेटर ऑफ क्रेडिट और अंतरराष्ट्रीय भुगतान में देरी से कंपनियों की लिक्विडिटी और कमजोर हो रही है.

बीमा सेक्टर में तेज उछाल

बीमा सेक्टर में वॉर रिस्क प्रीमियम में भारी वृद्धि हुई है. प्रमुख शिपिंग रूट्स पर यह 1000% से ज्यादा बढ़ चुका है, जबकि एविएशन में 50–70% तक की वृद्धि दर्ज की गई है. ट्रैवल इंश्योरेंस क्लेम में 35% और लाइफ इंश्योरेंस क्लेम में 10–15% तक बढ़ोतरी देखी गई है.

रेमिटेंस और पेमेंट पर असर

भारत को मिलने वाली कुल रेमिटेंस का 35–40% हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. अगर संघर्ष लंबा खिंचता है तो वहां रोजगार पर असर पड़ सकता है, जिससे रेमिटेंस घटने की आशंका है. वहीं एयरस्पेस बंद होने और बढ़ती लागत से ट्रैवल और क्रॉस-बॉर्डर खर्च भी प्रभावित हो रहे हैं.

आगे का रास्ता और संभावित अवसर

रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों को अब पारंपरिक जोखिम प्रबंधन से आगे बढ़कर सक्रिय रणनीति अपनानी होगी. इसमें सेक्टर-आधारित विश्लेषण, स्ट्रेस टेस्टिंग और अर्ली वार्निंग सिस्टम शामिल हैं. साथ ही, मजबूत बैलेंस शीट वाली कंपनियों के लिए यह समय अवसर भी लेकर आया है, जहां वे बाजार में अपनी पकड़ मजबूत कर सकती हैं.

 


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