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रुपये में ऐतिहासिक गिरावट, डॉलर के मुकाबले पहली बार 96.89 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा

रुपये की कमजोरी और महंगे कच्चे तेल का असर सीधे महंगाई पर पड़ सकता है. तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ने का खतरा रहता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

भारतीय रुपये में कमजोरी लगातार गहराती जा रही है. बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले पहली बार 96 के स्तर से नीचे फिसल गया और शुरुआती कारोबार में 96.89 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और मजबूत अमेरिकी डॉलर ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है. पिछले कुछ कारोबारी सत्रों में आई तेज गिरावट ने बाजार और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है.

लगातार पांचवें सत्र में कमजोर हुआ रुपया

मंगलवार को रुपया 96.53 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था, जबकि बुधवार को इसकी शुरुआत 96.86 के स्तर पर हुई. कारोबार के दौरान रुपया 96.89 तक फिसल गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है. पिछले पांच कारोबारी सत्रों में भारतीय मुद्रा करीब 1 रुपये तक कमजोर हो चुकी है, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव साफ दिखाई दे रहा है.

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का बड़ा असर

रुपये पर सबसे ज्यादा दबाव कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है और बुधवार को यह करीब 111 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा.

पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता के कारण तेल बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है, इसलिए तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है.

स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज को लेकर बढ़ी चिंता

वैश्विक बाजारों में स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज को लेकर चिंता बढ़ गई है. यह दुनिया का बेहद अहम समुद्री मार्ग है, जहां से लगभग 20% वैश्विक तेल सप्लाई गुजरती है. अगर इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा आती है, तो वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है. इसी आशंका के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है.

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और मजबूत डॉलर का असर

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और वैश्विक अनिश्चितता के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं. इससे डॉलर मजबूत हो रहा है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है. भारतीय रुपया भी इसी वैश्विक दबाव का सामना कर रहा है, जिसके चलते विदेशी निवेशकों की सतर्कता बढ़ी हुई है.

पहले भी उछल चुकी हैं तेल कीमतें

इससे पहले 30 अप्रैल को ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जबकि 9 मार्च को पश्चिम एशिया तनाव बढ़ने के बाद इसमें 27% तक की तेजी दर्ज की गई थी. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो तेल कीमतों और रुपये दोनों पर दबाव बना रह सकता है.

महंगाई बढ़ने का खतरा

रुपये की कमजोरी और महंगे कच्चे तेल का असर सीधे महंगाई पर पड़ सकता है. तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ने का खतरा रहता है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार और Reserve Bank of India के सामने महंगाई नियंत्रित करने की चुनौती और बढ़ सकती है.
 


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