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जिनेवा का नेटवर्क पाकिस्तान पर प्रभावशाली, भारत की बैंकिंग व्यवस्था में भी मौजूदगी के दावे

इस्लामाबाद के सेरेना होटल में 21 घंटों तक अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस और ईरान के संसदीय अध्यक्ष रेड ज़ोन कॉन्फ्रेंस रूम में युद्ध रोकने की कोशिश करते रहे. जब काफिले निकले, तो पाकिस्तानी सरकार होटल का बिल नहीं चुका सकी. लेकिन जिनेवा में पंजीकृत एक निजी संस्था ने आगे आकर भुगतान कर दिया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

पलक शाह
सेरेना होटल का बिना भुगतान किया गया बिल सिर्फ पाकिस्तान की शर्मिंदगी नहीं था, यह भारत के लिए एक चेतावनी थी. जिनेवा आधारित एक नेटवर्क पाकिस्तान के सबसे बड़े बैंक का मालिक है, उसकी सरकार को आर्थिक सहारा देता है, परमाणु कूटनीति की मेजबानी करता है और 41 वर्षों से ग्रामीण भारत में गहरी पैठ के बाद एक भारतीय अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक में प्रमोटर का दर्जा और बोर्ड तक पहुंच रखता है.

इस्लामाबाद के सेरेना होटल में 21 घंटों तक अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस और ईरान के संसदीय अध्यक्ष रेड जोन कॉन्फ्रेंस रूम में युद्ध रोकने की कोशिश करते रहे. जब काफिले निकले, तो पाकिस्तानी सरकार होटल का बिल नहीं चुका सकी. लेकिन जिनेवा में पंजीकृत एक निजी संस्था ने आगे आकर भुगतान कर दिया.

यह केवल “चैरिटी” नहीं था, बल्कि एक “गुडविल जेस्चर” जैसा था. 24 करोड़ आबादी वाला परमाणु संपन्न देश, जिसकी दुनिया की छठी सबसे बड़ी सेना है, उसे अपने ही देश में हुए सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक आयोजन के लिए एक होटल मालिक से सहायता लेनी पड़ी.

वह मालिक था आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क.

पाकिस्तान में समानांतर प्रभाव और नियंत्रण

यह वही नेटवर्क है जो अब पाकिस्तान में सह-शासक जैसी भूमिका निभा रहा है. यह न केवल पाकिस्तान के वित्तीय ढांचे में गहराई तक मौजूद है, बल्कि भारत के वित्तीय सिस्टम और ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसकी मजबूत मौजूदगी है. यह कहानी केवल परोपकार की नहीं है, बल्कि शक्ति और नियंत्रण की है.

पाकिस्तान पर वास्तविक नियंत्रण

AKFED (आगा खान फंड फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट) पाकिस्तान के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक हबीब बैंक लिमिटेड में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है. यह बैंक 1,700 शाखाओं और 3.7 करोड़ ग्राहकों के साथ पाकिस्तान की वित्तीय रीढ़ है.

यह सेरेना होटल चेन का मालिक है, जो परमाणु दौर की कूटनीति के लिए सुरक्षित मानी जाती है. यह देश के सबसे संवेदनशील उत्तरी क्षेत्रों में अस्पताल, स्कूल और टेलीकॉम सेवाएं भी चलाता है.

जब पाकिस्तान को किसी बड़े आयोजन की जरूरत होती है, तो उसे AKFED पर निर्भर रहना पड़ता है. और जब वह भुगतान नहीं कर पाता, तो AKFED भुगतान करता है. यह व्यापार नहीं बल्कि गहरी संरक्षक व्यवस्था है. इसका केंद्र जिनेवा में है.

आगा खान तृतीय, जिन्होंने इस संस्था की नींव रखी, पाकिस्तान आंदोलन और मोहम्मद अली जिन्ना की ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रमुख समर्थकों में से थे. उनकी वंश परंपरा अब आगा खान नेटवर्क का संचालन करती है.

स्विट्जरलैंड का पुराना उदाहरण, भारत पर प्रभाव

दिसंबर 1999. कंधार एयरपोर्ट का रनवे.

पाकिस्तान आधारित आतंकियों ने IC-814 विमान का अपहरण किया. अपहरणकर्ताओं को यह नहीं पता था कि एक यात्री रॉबर्टो जियोरी थे, स्विस-इटैलियन उद्योगपति, जिनकी कंपनी दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत बैंक नोट छापती थी.

इसके बाद स्विस सरकार सक्रिय हो गई. एक विशेष संकट सेल सीधे फेडरल काउंसिल को रिपोर्ट करने लगा.

तत्कालीन विदेश मंत्री जोसेफ डीस ने जसवंत सिंह को फोन कर कहा: “जियोरी को सुरक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाए.” स्विट्जरलैंड ने अपने राजदूत को तालिबान क्षेत्र में भेजा, जो एक तटस्थ देश के लिए असाधारण कदम था. अमेरिका ने भी “आर्थिक स्थिरता” का हवाला देकर दबाव का समर्थन किया.

भारत ने तीन आतंकियों को रिहा कर दिया, जिनमें मसूद अजहर भी शामिल था. बाद में उसने जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना की.

भारत में गहरी मौजूदगी

1977 से AKFED भारत के वित्तीय ढांचे में मौजूद है. यह HDFC लिमिटेड के सह-संस्थापकों में शामिल था, जो आज भारत के सबसे बड़े निजी बैंक का आधार है.

वर्तमान में AKFED और इसकी सहयोगी संस्था प्लैटिनम जुबली इन्वेस्टमेंट्स DCB बैंक के आधिकारिक प्रमोटर हैं, जो एक RBI-मान्यता प्राप्त वाणिज्यिक बैंक है, जिसमें 469 शाखाएं और 25 लाख ग्राहक हैं.

गुजरात में आगा खान रूरल सपोर्ट प्रोग्राम 41 वर्षों से 3,500 से अधिक गांवों में काम कर रहा है, जिससे लगभग 40 लाख लोगों के जीवन से जुड़ा डेटा एकत्र किया गया है.

गंभीर नियामकीय सवाल

2017 में न्यूयॉर्क के नियामकों ने AKFED के नियंत्रण वाले हबीब बैंक पर 225 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया था. आरोपों में आतंक वित्तपोषण और मनी लॉन्ड्रिंग शामिल थे. इसके बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इसे DCB बैंक के “फिट एंड प्रॉपर” प्रमोटर के रूप में बनाए रखने और 2025 में हिस्सेदारी बढ़ाने की अनुमति देने पर सवाल उठते हैं.

प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने उठने वाले सवाल

1. क्या 2017 के अमेरिकी आदेश के बाद RBI ने AKFED की दोबारा पूर्ण जांच की?
2. क्या इसके वास्तविक मालिक और फंडिंग स्रोतों की जांच हुई?
3. क्या इसके ग्रामीण भारत में 41 वर्षों से एकत्र डेटा की निगरानी किसी एजेंसी ने की?
4. क्या पाकिस्तान और भारत के बीच डेटा सुरक्षा के लिए कोई फायरवॉल मौजूद है?
5. क्या एक ऐसे नेटवर्क को भारतीय बैंक में प्रमोटर बने रहने दिया जाना चाहिए जो पड़ोसी देश में सह-शासक जैसी भूमिका निभाता है?

भारत ने वर्षों से विदेशी संरचनाओं पर सख्त निगरानी व्यवस्था बनाई है. यह उसी प्रणाली को लागू करने का समय है.

सेरेना होटल का बिना भुगतान किया गया बिल पाकिस्तान की शर्मिंदगी नहीं, भारत के लिए चेतावनी संकेत है.

जो नेटवर्क चुपचाप पाकिस्तान की व्यवस्था में गहराई से जुड़ा है, वह लगभग 50 वर्षों से भारत में भी मौजूद है. अब सवाल यह नहीं है कि किसी ने इसे देखा या नहीं, सवाल यह है कि क्या शीर्ष स्तर पर अब इस पर कार्रवाई होगी.

सभी तथ्य सार्वजनिक रिकॉर्ड, RBI फाइलिंग, अमेरिकी नियामकीय आदेश, AKDN के बयानों और अप्रैल 2026 की रिपोर्टिंग पर आधारित हैं. यह किसी व्यक्ति पर आरोप नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रश्न हैं.

AKFED, DCB बैंक और संबंधित सभी संस्थानों से प्रतिक्रिया अपेक्षित है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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