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17 साल के निचले स्तर पर FPI हिस्सेदारी, फिर भी नहीं टूटा बाजार! DII ने संभाला पूरा मोर्चा

NSE की मई 2026 मार्केट पल्स रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर 15.8 फीसदी रह गई है, जो पिछले 17 वर्षों का सबसे निचला स्तर है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago


भारतीय शेयर बाजार में इस समय एक दिलचस्प तस्वीर देखने को मिल रही है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) लगातार पैसा निकाल रहे हैं, लेकिन घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की रिकॉर्ड खरीदारी बाजार को मजबूती से थामे हुए है. खास बात यह है कि मौजूदा हालात बिल्कुल साल 2003 जैसे संकेत दे रहे हैं, जब विदेशी निवेशकों की वापसी के बाद बाजार में ऐतिहासिक तेजी आई थी. ऐसे में अब निवेशकों की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराने वाला है. 

17 साल के निचले स्तर पर पहुंची विदेशी हिस्सेदारी
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की मई 2026 मार्केट पल्स रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर 15.8 फीसदी रह गई है, जो पिछले 17 वर्षों का सबसे निचला स्तर है. पूरे वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) के दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 19 अरब डॉलर की बिकवाली की. सबसे ज्यादा दबाव वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में देखने को मिला, जब कुल बिकवाली का लगभग 72 फीसदी हिस्सा इसी अवधि में हुआ.

मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, विदेशी निवेशकों के इस रुख के पीछे कई वैश्विक कारण हैं. दक्षिण कोरिया, ताइवान, जापान और हांगकांग जैसे एशियाई बाजार फिलहाल भारत की तुलना में ज्यादा सस्ते और आकर्षक दिखाई दे रहे हैं. वहीं अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की बढ़ती यील्ड ने भी निवेशकों को इक्विटी बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर मोड़ दिया है. हालांकि, एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि 2020 के बाद से अब तक भारत में FPI निवेश की कुल वैल्यू में 18 फीसदी से ज्यादा की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ (CAGR) दर्ज की गई है.

घरेलू निवेशकों ने संभाला बाजार

विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई. इसकी सबसे बड़ी वजह घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की मजबूत खरीदारी रही. जहां FPIs ने FY26 में करीब 19.7 अरब डॉलर के शेयर बेचे, वहीं DII ने रिकॉर्ड 95.8 अरब डॉलर का निवेश किया. यानी घरेलू निवेशकों की खरीदारी विदेशी बिकवाली से लगभग पांच गुना ज्यादा रही. इसी मजबूत घरेलू नकदी प्रवाह ने बाजार को स्थिर बनाए रखा. नतीजतन, Q4FY26 तक कंपनियों में DII की हिस्सेदारी बढ़कर 19.6 फीसदी तक पहुंच गई, जो FPI हिस्सेदारी से भी अधिक है.

किन सेक्टर्स से दूर हो रहे विदेशी निवेशक?

विदेशी निवेशकों की रणनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. अब वे उन NIFTY50 शेयरों से दूरी बना रहे हैं, जहां पहले से भारी निवेश मौजूद है. Ace Equity के आंकड़ों के मुताबिक, लगातार चार तिमाहियों से विदेशी निवेशक केवल चुनिंदा कंपनियों में ही हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं, जबकि 10 प्रमुख कंपनियों से लगातार पैसा निकाल रहे हैं.

सेक्टोरल स्तर पर इंडस्ट्रियल सेक्टर में सबसे ज्यादा बिकवाली हुई है. वहीं कंज्यूमर स्टेपल्स और आईटी सेक्टर में दबाव अपेक्षाकृत कम रहा. फाइनेंशियल सेक्टर में विदेशी निवेशकों का भरोसा अब भी बना हुआ है, जबकि कम्युनिकेशन सेक्टर में उनकी ओवरवेट पोजीशन लगातार 17वीं तिमाही तक कायम है.

2003 जैसा ऐतिहासिक संकेत क्यों अहम?

घरेलू निवेशकों की बढ़ती ताकत बाजार में एक बड़े ऐतिहासिक ट्रेंड की ओर इशारा कर रही है. यह लगातार छठी तिमाही है जब DII की हिस्सेदारी FPI से ज्यादा रही है. भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में ऐसा आखिरी बार साल 2003 में देखने को मिला था. उस समय भी विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी कमजोर हुई थी, लेकिन बाद में उनकी जोरदार वापसी ने बाजार में अगले 12 महीनों के भीतर करीब 70 फीसदी की तेजी ला दी थी.

क्या फिर लौटेगी बड़ी तेजी?

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इतिहास हमेशा खुद को पूरी तरह नहीं दोहराता, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां भविष्य में विदेशी निवेशकों की मजबूत वापसी की जमीन जरूर तैयार कर रही हैं. अगर आने वाले समय में भारतीय कंपनियों की कमाई मजबूत रहती है और शेयरों का वैल्युएशन आकर्षक बना रहता है, तो विदेशी निवेशक दोबारा भारतीय बाजार की ओर रुख कर सकते हैं. ऐसे में बाजार में एक और बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है.
 


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