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सरकारी टेंडर पर असंतोष: एथनॉल उत्पादकों ने चेताया – नई नीति से बिगड़ सकता है देश का एथनॉल इकोसिस्टम
ग्रेन एथनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) के अनुसार, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) द्वारा एथनॉल सप्लाई ईयर (ESY) 2025–26 के तहत अपनाई गई आवंटन पद्धति घाटे वाले क्षेत्रों (deficit zones) में नई इकाइयों को बढ़ावा देती है, जबकि अधिशेष राज्यों के स्थापित उत्पादकों को नुकसान पहुंचा रही है
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago
भारत के एथनॉल निर्माताओं ने सरकार के हालिया खरीद टेंडर को लेकर गंभीर चिंता जताई है. उनका कहना है कि मौजूदा आवंटन मॉडल देश के एथनॉल इकोसिस्टम को असंतुलित कर सकता है, क्योंकि इससे अधिशेष (surplus) वाले क्षेत्रों की सैकड़ों सक्रिय डिस्टिलरियों को दरकिनार किया जा रहा है.
नए क्षेत्रों को प्राथमिकता, पुराने को नुकसान
ग्रेन एथनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) के अनुसार, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) द्वारा एथनॉल सप्लाई ईयर (ESY) 2025–26 के तहत अपनाई गई आवंटन पद्धति घाटे वाले क्षेत्रों (deficit zones) में नई इकाइयों को बढ़ावा देती है, जबकि अधिशेष राज्यों के स्थापित उत्पादकों को नुकसान पहुंचा रही है.
टेंडर दस्तावेज़ के मुताबिक, जिन ज़ोनों में स्थानीय डिस्टिलरियों की आपूर्ति मांग से कम है, उन्हें घाटे वाला क्षेत्र माना जाएगा और वहां से आने वाले ऑफर को “पूरी तरह स्वीकार” किया जाएगा. हालांकि यह नीति स्थानीय आपूर्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से लाई गई है, लेकिन GEMA का कहना है कि इसका असर उल्टा पड़ रहा है — अधिशेष उत्पादन वाले क्षेत्रों की इकाइयों को पर्याप्त ऑर्डर नहीं मिल पा रहे हैं.
GEMA ने कहा, “इस नीति के चलते 350 से अधिक डिस्टिलरियों को पर्याप्त ऑर्डर नहीं मिल रहे, जबकि उनके पास मौजूदा क्षमता और पूर्व प्रतिबद्धताएं हैं.” संगठन ने बताया कि इन इकाइयों में से कई को पहले सरकारी पहल के तहत स्थापित किया गया था या फिर OMCs के साथ दीर्घकालिक ऑफटेक एग्रीमेंट (LTOA) और एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI-1) के आधार पर निवेश किया गया था.
अधिशेष इकाइयां फंसीं, उत्पादन ठप
GEMA ने चेताया कि यह नीति कई राज्यों में कृत्रिम अधिशेष पैदा कर रही है, जिससे उत्पादन इकाइयां ठप हो रही हैं और उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है. “आवंटन में असंतुलन के कारण OMCs द्वारा ही स्वीकृत और प्रोत्साहित क्षमता अब निष्क्रिय पड़ी है,” संगठन ने कहा.
एथनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम का उद्देश्य पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण को बढ़ावा देना, आयात निर्भरता कम करना, उत्सर्जन घटाना और कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन देना था. लेकिन GEMA का कहना है कि मौजूदा नीति इन लक्ष्यों को कमजोर कर सकती है, क्योंकि इससे ऐसे क्षेत्रों में नई क्षमता बनाई जा रही है जहां पर्याप्त फीडस्टॉक नहीं है, जबकि पहले से संचालित इकाइयों को अनदेखा किया जा रहा है.
GEMA ने कहा, “जिस नीति का उद्देश्य क्षेत्रीय असंतुलन दूर करना और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करना था, वही अब अक्षमता पैदा कर रही है. इसका नतीजा है संसाधनों का असमान वितरण, अनावश्यक लॉजिस्टिक लागत और चालू इकाइयों के लिए वित्तीय संकट.”
संगठन ने यह भी कहा कि नीति का क्षेत्रीय झुकाव पर्यावरणीय दृष्टि से भी प्रतिकूल है, क्योंकि एथनॉल को अब लंबी दूरी तक ढोना पड़ेगा, जिससे लागत और कार्बन उत्सर्जन दोनों बढ़ेंगे.
नीति पर पुनर्विचार की मांग
GEMA के अध्यक्ष सी. के. जैन ने कहा कि सरकार को एक “समग्र खरीद मॉडल” अपनाने की जरूरत है, जो मौजूदा क्षमता, निवेश और OMCs के साथ पूर्व समझौतों को ध्यान में रखे. उन्होंने कहा, “एक पारदर्शी और संतुलित दृष्टिकोण न केवल मौजूदा ढांचे को बचाएगा, बल्कि निवेशकों के विश्वास को भी बनाए रखेगा.”
उद्योग जगत के पर्यवेक्षकों का मानना है कि मौजूदा आवंटन प्रक्रिया बाजार संकेतों को विकृत कर रही है और भविष्य के निवेश को हतोत्साहित कर सकती है. कई उत्पादकों ने मांग आवंटन और मूल्य निर्धारण को लेकर अनिश्चितता के चलते अपने विस्तार योजनाओं को फिलहाल रोक दिया है.
GEMA ने नीति निर्माताओं से अपील की है कि वे मौजूदा खरीद पद्धति की समीक्षा करें और ऐसा ढांचा अपनाएं जो अधिशेष और घाटे दोनों क्षेत्रों को समान रूप से समर्थन दे. “संचालनशील अधिशेष इकाइयों को अनदेखा करते हुए घाटे वाले क्षेत्रों में नए निवेश को बढ़ावा देना बाजार को विकृत करेगा और एथनॉल इकोसिस्टम की दीर्घकालिक स्थिरता को कमजोर करेगा,” संगठन ने कहा.
भारत ने अपने एथनॉल मिश्रण मिशन में उल्लेखनीय प्रगति की है, और हाल के महीनों में राष्ट्रीय औसत मिश्रण दर 12 प्रतिशत से अधिक रही है. हालांकि, GEMA ने चेताया कि यदि आवंटन नीति को निष्पक्ष भागीदारी और संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग के अनुरूप नहीं बदला गया, तो इस कार्यक्रम के व्यापक लक्ष्य खतरे में पड़ सकते हैं.
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