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इथेनॉल एक्सप्रेस: कैसे गडकरी परिवार ने नीति को मुनाफे में बदला

गडकरी परिवार की इथेनॉल कंपनी ने एक साल में 1400% की छलांग लगाई, दिखाते हुए कि भारत में कारोबार और राजनीति कितनी खूबसूरती से मिल सकते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

पलक शाह

यह है “द ग्रेट इंडियन एथेनॉल स्टोरी”, जहाँ गन्ना सोना बन जाता है और नीति मुनाफे में बदल जाती है.

2014 में, हमेशा मुस्कुराने वाले, मूंछों वाले “हाईवे मैन ऑफ इंडिया,” नितिन गडकरी ने भारत की सड़कों की कमान संभाली, लेकिन जब वह एक्सप्रेसवे पर रिबन काटने में व्यस्त थे, उनके दिमाग में एक और ईंधन था 'इथेनॉल' वह हर रैली में गरजते थे, आधे पर्यावरण योद्धा, आधे सेल्समैन की तरह “इसे पेट्रोल में मिलाओ, धरती बचाओ, किसानों को सशक्त बनाओ!”.

2025 तक आते-आते भारत गर्व से 90,000 पेट्रोल पंपों पर E20 ईंधन भर रहा है, तय समय से पाँच साल पहले. सरकार जश्न मना रही है स्वच्छ हवा, कम तेल आयात, और खुशहाल किसान. कागज पर, यह सबके लिए जीत है.

लेकिन शायद यह संयोग थोड़ा ज़्यादा परफेक्ट है.

क्योंकि जब मंत्री गडकरी ने इथेनॉल नीति को फास्ट लेन में डाला, परिवार के गडकरी ने चुपचाप कार बना ली.

नागपुर में, परिवार का पुराना चीनी और एग्रो साम्राज्य “पुरती ग्रुप” कभी एक फीका पड़ चुका अवशेष माना जाता था. लेकिन उसकी राख से दो परिचित नाम उभरे: माणस एग्रो और सिआन एग्रो, दोनों अब गडकरी के बेटों द्वारा संचालित. निखिल गडकरी “विजनरी” एमडी के रूप में सिआन चलाते हैं. भाई सारंग माणस चलाते हैं, जिसे अब सिआन में मिला दिया गया है.

आगे जो हुआ, उसने दलाल स्ट्रीट तक को शर्मा दिया.

सिआन, जो कभी साबुन और मसाले के तेल बनाने वाली एक सुस्त एग्रो-प्रोसेसिंग कंपनी थी, अचानक एथेनॉल की खोज में जुट गई और सिर्फ खोज ही नहीं उसने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया. राजस्व ₹17 करोड़ (Q1 FY24) से बढ़कर ₹511 करोड़ (Q1 FY26) हो गया यानी 30 गुना छलांग. मुनाफा? एक तिमाही में 52,000 प्रतिशत की वृद्धि. शेयर मूल्य? ₹40 से ₹3,138 तक सिर्फ 16 महीनों में, इस हफ्ते 52-सप्ताह के उच्च स्तर पर. मार्केट कैप? ₹9,222 करोड़ की चोटी छू गई.

और यह सब ठीक उन्हीं सालों में जब गडकरी सीनियर 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग के लिए लॉबिंग कर रहे थे.

संयोग? या फिर परिवार की सुनियोजित तैयारी?

विपक्षी पार्टियाँ चिल्ला उठीं: “हितों का टकराव! मंत्री नीति बनाते हैं; बेटे मुनाफा कमाते हैं.” सोशल मीडिया ने भी तंज कसा एक वायरल पोस्ट में लिखा गया: “@nitin_gadkari, जब हाइवे और नैतिकता दोनों ढह रहे हैं, तब आप इतनी शांति से कैसे सोते हैं?”

गडकरी का जवाब वही पुराना इनकार: “मेरा कोई रोल नहीं! सिआन सिर्फ 0.5% इथेनॉल उत्पादन करती है. 450 से अधिक कंपनियाँ काम कर रही हैं, कीमतें कैबिनेट तय करती है.”

कागज पर सही बात है लेकिन आलोचक मानने को तैयार नहीं. उनका कहना है कि सिआन की अचानक की गई अधिग्रहण मुहिम जैसे सेक-वन सेल्स जैसी शीरे की ट्रेडिंग कंपनियों को खरीदना और माणस से विलय भारत की इथेनॉल पुश के साथ बड़ी खूबसूरती से मेल खाती है.

उधर उपभोक्ता फँसे हैं महँगा पेट्रोल, कम माइलेज, बिना ब्लेंडेड ईंधन का कोई विकल्प नहीं, और शहर अब उस पराली के धुएँ में दम घोंट रहे हैं जो अब एग्जॉस्ट में बदल गया है. लेकिन सिआन के शीशे के ऑफिस में, गडकरी बंधु बायो-सीएनजी, ग्रीन हाइड्रोजन, निर्यात के अवसर अब और बड़े सपने देख रहे हैं. 

हाँ, किसानों की आमदनी बढ़ी है. लेकिन परिवार की कमाई? आसमान छूती.

नहीं, जब शेयर एक साल तक लगातार चढ़ रहा था, तब एक्सचेंजों ने उसे निगरानी में नहीं डाला; कोई सेबी कार्रवाई नहीं, कोई जाँच नहीं बस चार्ट और भौंहें, दोनों ऊपर उठती रहीं. दिखने में हालांकि सब अच्छा नहीं लगता. जब किसी मंत्री की पसंदीदा नीति उसके बेटों को एथेनॉल करोड़पति बना देती है, तब टकराव साबित करने की ज़रूरत नहीं बस उसकी गंध आने लगती है.

आख़िर में, भारत की एथेनॉल कहानी सिर्फ स्वच्छ ईंधन की नहीं यह इस बारे में है कि कारोबार और राजनीति कितनी अच्छी तरह एक-दूसरे में घुल सकते हैं. जो परिवार साथ में मिक्स करता है, वही साथ में बैंक करता है.

गन्ना पास करें, गडकरी पहले ही जश्न मना रहे हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और *The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.

19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)

 

 

 


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