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बॉम्बे रेयॉन: प्रमोटर परिवार का समानांतर साम्राज्य
बॉम्बे रेयॉन पर ₹7,358 करोड़ का सार्वजनिक धन बकाया रहते हुए कंपनी का अंत हो गया. तारापुर में एक समानांतर कपड़ा साम्राज्य अब भी चल रहा है. क्या बॉम्बे रेयॉन के कर्जदाताओं, परिसमापक और जांच एजेंसियों को इसकी जानकारी है?
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
पलक शाह
तारापुर में कपड़ा साम्राज्य
बॉम्बे रेयॉन के परिसमापक के पास नीलामी के लिए फ्लैट, दो कारें और 196 लूम कार्ड बचे थे. कंपनी के कर्मचारियों को प्रति रुपये के दावे पर सिर्फ 14 पैसे मिले. लेकिन उसी औद्योगिक क्षेत्र में कपड़ा कारोबार की एक दूसरी कंपनी चल रही है. इसमें 41.13% हिस्सेदारी रखने वाली निजी कंपनी ने कभी कंपनी रजिस्ट्रार के पास बॉम्बे रेयॉन के अपने ईमेल पते का इस्तेमाल करते हुए दस्तावेज दाखिल किए थे.
बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड खुद को भारत की सबसे बड़ी शर्ट निर्माता कंपनी बताती थी. इसके 13 प्लांट थे. कंपनी हर साल 10 करोड़ मीटर कपड़ा बनाती थी और इसमें करीब 38,000 कर्मचारी काम करते थे. एक समय इसके शेयर ₹400 से ऊपर कारोबार करते थे.
2013 से 2017 के बीच भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की अगुवाई वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एक समूह ने कंपनी को तीन बार संकट से उबारा. अगस्त 2018 में एसबीआई ने ₹2,260.79 करोड़ के अपने कर्ज एक्सपोजर को ₹900 करोड़ में बेच दिया. जून 2022 में ₹1.61 करोड़ का बकाया रखने वाले एक धागा कारोबारी की याचिका पर कंपनी को दिवाला प्रक्रिया में शामिल किया गया. 9 नवंबर 2023 को ₹7,358.95 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के साथ कंपनी को परिसमापन में भेजने का आदेश दिया गया.
बैंकों की ओर से कंपनी को बचाने की ये तीनों कोशिशें सामान्य प्रक्रिया नहीं थीं. 2013 में एसबीआई के नेतृत्व वाले कर्जदाताओं के समूह ने कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग (सीडीआर) व्यवस्था के तहत बॉम्बे रेयॉन के करीब ₹4,000 करोड़ के कर्ज का पुनर्गठन किया. 2016 में मामला ज्वाइंट लेंडर्स फोरम के पास पहुंचा. 2017 में एक खबर आई कि कंपनी ने कर्मचारियों के भविष्य निधि (पीएफ) अंशदान का दुरुपयोग किया है. इसके बाद एसबीआई ने कंपनी को स्ट्रेस्ड एसेट्स के सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग की योजना (एस4ए) के तहत रखा. इस व्यवस्था में प्रमुख बैंक को प्रमाणित करना होता है कि मौजूदा नकदी प्रवाह से कम से कम आधे कर्ज का भुगतान किया जा सकता है.
इस प्रमाणन के 14 महीने बाद एसबीआई ने ₹1,361 करोड़ के डिस्काउंट पर कर्ज बेच दिया. पांच साल बाद कंपनी का परिसमापन हो गया.
2,027 कर्मचारियों ने कुल ₹29.93 करोड़ का दावा किया था, लेकिन इनमें से सिर्फ ₹4.10 करोड़ स्वीकार किए गए.
जुलाई 2024 में परिसमापक ने पूरी बची हुई कंपनी को चालू कारोबार के रूप में ₹18.32 करोड़ के आरक्षित मूल्य पर बेचने की पेशकश की. इसके बाद से वह बेंगलुरु में फ्लैट, एक टोयोटा इनोवा, एक स्कोडा कोडियाक, बेल्लारी में एक पवनचक्की और 196 इलेक्ट्रिकल लूम कार्ड की नीलामी करता रहा है. रिकॉर्ड में सबसे हालिया नोटिस 10 जून 2026 का है.
बॉम्बे रेयॉन का अंत यहीं हो गया
लेकिन कॉरपोरेट पतन का एक ऐसा पहलू भी है, जिसकी कोई जांच नहीं करता.
बैंक अपने नुकसान को बट्टे खाते में डाल देता है, कर्मचारियों को प्रति रुपये पर 14 पैसे मिलते हैं, फाइल परिसमापक के पास चली जाती है और कहानी खत्म हो जाती है. लेकिन इस मामले में सार्वजनिक रिकॉर्ड बताते हैं कि कहानी खत्म नहीं हुई. बॉम्बे रेयॉन से जुड़े लोग और उसके आसपास की संरचनाएं कंपनी के साथ गायब नहीं हुईं.
प्रमोटर परिवार के उपनाम वाली एक कंपनी, जिसमें बॉम्बे रेयॉन के अपने वित्त प्रमुख और कर्मचारी हिस्सेदार हैं, उसी औद्योगिक क्षेत्र में एक चालू स्पिनिंग मिल को नियंत्रित करती है. इस तथ्य को साबित करने वाले सभी दस्तावेज सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं. कोई भी बैंक अधिकारी, समाधान पेशेवर या जांचकर्ता इन्हें देख सकता है. इनके लिए किसी विशेष वारंट या समन की जरूरत नहीं है.
गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) ने जांच शुरू कर दी है. फाइलों में उसे क्या मिलेगा, यह इस रिपोर्ट में बताया गया है.
समानांतर साम्राज्य: लिनेन आर्ट
मुंबई से 80 किलोमीटर उत्तर में एमआईडीसी तारापुर औद्योगिक क्षेत्र स्थित है. इसी क्षेत्र में बॉम्बे रेयॉन का प्रोसेसिंग कॉम्प्लेक्स था. यहां एक दूसरी कपड़ा कंपनी भी चल रही है.
लिनेन आर्ट प्राइवेट लिमिटेड प्लॉट डी-8 में 12,544 स्पिंडल संचालित करती है. एक क्रेडिट रेटिंग आकलन में इसे भारत का तीसरा सबसे बड़ा लिनेन यार्न निर्माता बताया गया है. इसका परिचालन लाभ 2020-21 में ₹24.64 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में ₹35.21 करोड़ हो गया. कंपनी के पास मशीनरी, कर्मचारी और ऑडिट किए गए खाते हैं.
लिनेन आर्ट का गठन 27 दिसंबर 2013 को हुआ था. यह बॉम्बे रेयॉन के बोर्ड द्वारा 19 जुलाई 2013 को पहले कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग को मंजूरी दिए जाने के पांच महीने बाद की बात है.
कंपनी के रिकॉर्ड में इसके संस्थापक निदेशकों के रूप में प्रशांत जनार्दन अग्रवाल और अमन अग्रवाल के नाम दर्ज हैं. उस समय दोनों बॉम्बे रेयॉन फैशंस के निदेशक थे.
31 मार्च 2023 की स्थिति के अनुसार, लिनेन आर्ट के सदस्यों का रजिस्टर 11 नामों का है. कुल 3.89 करोड़ शेयरों में से सबसे बड़ी हिस्सेदारी एशवेल टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड के पास है. इसके पास 1.60 करोड़ शेयर यानी 41.13% हिस्सेदारी है.
इसके अतिरिक्त 21.98% हिस्सेदारी छह कंपनियों के पास है. इन सभी कंपनियों का पंजीकृत पता एक ही है: रूम नंबर 5, सातवीं मंजिल, 2ए गणेश चंद्र एवेन्यू, कोलकाता 700013.
लेकिन इस कहानी में एशवेल टेक्सटाइल्स सबसे महत्वपूर्ण है.
8 दिसंबर 2007 को एशवेल टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड, जिसका सीआईएन U17299MH2006PTC163103 है, ने कंपनी रजिस्ट्रार के पास फॉर्म 20बी पर अपना वार्षिक रिटर्न दाखिल किया.
कंपनी के वैधानिक ईमेल पते वाले कॉलम में, जिसके माध्यम से कंपनी रजिस्ट्रार उससे संपर्क करता है, यह पता दर्ज था: [mail@bombayrayon.com]
इस रिटर्न पर निदेशक चंद्रेश कल्याणजी देधिया ने डिजिटल हस्ताक्षर किए थे. उनका डीआईएन 01436487 है. हस्ताक्षर के साथ जुड़े प्रमाणपत्र में ईमेल पता [chandresh.dedhia@bombayrayon.com]दर्ज है.
उस वर्ष की शेयरधारिता एक ही श्रेणी में दर्ज की गई थी: “निदेशक या निदेशकों के रिश्तेदार — 100.00”. दो शेयरधारक थे. चुकता पूंजी ₹1,00,000 थी, जबकि अधिकृत पूंजी ₹3.5 करोड़ थी.
यानी प्रमोटर परिवार के उपनाम वाली एक निजी कंपनी कंपनी रजिस्ट्रार से उसी सूचीबद्ध कंपनी के ईमेल डोमेन के जरिए संपर्क कर रही थी.
बारह साल बाद एशवेल टेक्सटाइल्स के पास 29,19,150 शेयर और 21 शेयरधारक थे. इनमें से चार नाम सामान्य निवेशकों के नहीं हैं.
ए. आर. मुंद्रा — आशाराम मुंद्रा, डीआईएन 00019234 — बॉम्बे रेयॉन फैशंस के कार्यकारी निदेशक (वित्त) और मुख्य वित्त अधिकारी थे. वह 31 दिसंबर 2021 तक इस पद पर रहे. कंपनी के पतन के दौरान उसके खातों पर हस्ताक्षर करने वाले इस व्यक्ति के पास उस कंपनी के 23,450 शेयर हैं, जो लिनेन आर्ट को नियंत्रित करती है.
5.93% हिस्सेदारी रखने वाले गंगाधर कोटियन बॉम्बे रेयॉन के कर्मचारी हैं. उनका नाम 5 अगस्त 2026 के एसएफआईओ समन में भी है, जिसने इस जांच की शुरुआत की. बॉम्बे रेयॉन की दिवाला प्रक्रिया के दौरान उन्होंने खुद ₹28,64,199 का दावा दाखिल किया, जिसे पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया. उन्होंने 33 कर्मचारियों के दावों के लिए अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में भी काम किया. इनमें कंपनी के चेयरमैन अमन जनार्दन अग्रवाल का ₹2,15,15,008 का दावा भी शामिल था. पूरी फाइल में यह एकमात्र कर्मचारी दावा था, जिस पर “संबंधित पक्ष: हां” का निशान लगा था. इसे भी पूरी तरह स्वीकार किया गया.
सुधीर गोयल और स्मिता गोयल के पास नवी मुंबई के ऐरोली स्थित एक ही फ्लैट के पते पर दर्ज हिस्सेदारी है. दोनों के पास मिलाकर 8.54% हिस्सेदारी है. सुधीर गोयल ने बॉम्बे रेयॉन के खिलाफ कर्मचारी के रूप में ₹22,81,041 का दावा किया था, जिसे पूरा स्वीकार कर लिया गया. वह प्राध्वी मल्टीट्रेड और ग्रीन शील्ड एंटरप्राइजेज के निदेशक भी हैं. ये उन चार कंपनियों में शामिल हैं, जिनके बॉम्बे रेयॉन के खिलाफ ₹162 करोड़ के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया गया था.
चंद्रेश देधिया और नाजिम खान, जो 2007 में मूल शेयरधारक थे और जिन्होंने बॉम्बे रेयॉन के ईमेल पते वाले दस्तावेज दाखिल किए थे, अब भी शेयरधारकों के रजिस्टर में मौजूद हैं.
बाकी शेयरधारकों के पते सामान्य आवासीय इलाकों के हैं. इनमें कांदिवली, बोरीवली, मलाड, मुलुंड, ठाणे, वसई और गोरेगांव के फ्लैट शामिल हैं. एक शेयरधारक, जिसके पास 5.20% हिस्सेदारी है, ने घाटकोपर पश्चिम में एक चॉल का पता दिया है.
21 में से 19 शेयरधारकों की हिस्सेदारी 3.6% से 7.0% के बीच है. किसी की भी हिस्सेदारी 7.04% से अधिक नहीं है. रजिस्टर में किसी भी कॉरपोरेट इकाई का नाम नहीं है. कागजों पर कोई भी कंपनी को नियंत्रित नहीं करता.
एशवेल टेक्सटाइल्स ने अपने 2019 के लेटरहेड पर पंजीकृत कार्यालय का पता 402, चौथी मंजिल, कमला हब, एन.एस. रोड नंबर 1, जुहू स्कीम, विले पार्ले (पश्चिम) दर्ज किया है. यही पता एपिक यार्न्स प्राइवेट लिमिटेड ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को दिया है. एपिक यार्न्स का गठन अगस्त 2019 में प्रशांत अग्रवाल के बेटों आयुष और अक्षत अग्रवाल ने किया था.
दोनों रजिस्टरों पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति
31 मार्च 2019 की तारीख वाली एशवेल टेक्सटाइल्स के 21 शेयरधारकों की सूची के निचले हिस्से में निदेशक शितांशु बिपिन वोरा के हस्ताक्षर हैं.
लिनेन आर्ट के सदस्यों का रजिस्टर, जिसकी तारीख 9 अगस्त 2023 है और जिसमें एशवेल टेक्सटाइल्स की 41.13% हिस्सेदारी दर्ज है, उस पर भी उसी व्यक्ति ने उसी पदनाम से हस्ताक्षर किए हैं.
वह इस हिस्सेदारी के दोनों पक्षों में मौजूद हैं. वह प्रमाणित करते हैं कि लिनेन आर्ट की मालिक कंपनी का मालिक कौन है और यह भी प्रमाणित करते हैं कि उसी कंपनी के पास लिनेन आर्ट की हिस्सेदारी है.
शितांशु वोरा खुद भी लिनेन आर्ट के दूसरे सबसे बड़े शेयरधारक हैं. उनके नाम पर 19.52% हिस्सेदारी है. माटुंगा के उसी पते पर रहने वाली शीतल वोरा के पास अतिरिक्त 5,000 शेयर हैं. लिनेन आर्ट की 15.42% हिस्सेदारी रखने वाली मेयूबेन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक भी वोरा दिसंबर 2012 से हैं.
उनकी व्यक्तिगत हिस्सेदारी और जिन दो कंपनियों के बोर्ड में वह हैं, उनकी हिस्सेदारी को जोड़ने पर लिनेन आर्ट की करीब 76% हिस्सेदारी शितांशु वोरा या उनके द्वारा निर्देशित कंपनियों के नियंत्रण में आती है.
डीआईएन 00054986 के तहत दाखिल उनके कॉरपोरेट रिकॉर्ड में 22 कंपनियों का उल्लेख है. इनमें से तीन संबंध महत्वपूर्ण हैं.
वह जनवरी 2006 से जनवरी 2017 तक क्लिनवेंट रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के पूर्णकालिक निदेशक थे. नवंबर 2018 तक वह इसके बोर्ड में बने रहे. सार्वजनिक निदेशक रिकॉर्ड के अनुसार, यह कंपनी प्रशांत अग्रवाल से जुड़ी हुई है. यानी लिनेन आर्ट के अस्तित्व में आने से सात साल पहले से वह इस कंपनी में पूर्णकालिक कार्यकारी थे.
वह अगस्त 2019 में एपिक यार्न्स के गठन के दिन से अप्रैल 2021 तक इसके निदेशक रहे. एपिक यार्न्स ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के पास जो ईमेल पता दर्ज कराया था, वह [shitanshu.vora@linenart.in] है.
अक्टूबर 2019 में वह स्कॉट्स गारमेंट्स लिमिटेड के बोर्ड में शामिल हुए.** बेंगलुरु की इस कंपनी के पूर्व निदेशकों में प्रशांत और अमन अग्रवाल दोनों शामिल थे. लिनेन आर्ट में उनके सह-निदेशक विमल कुमार गोयनका भी इससे जुड़े थे. अग्रवाल आठ साल पहले इस कंपनी से जा चुके थे. लेकिन यहां एक समान क्रम दिखाई देता है: दो अलग-अलग कंपनियों में पहले अग्रवाल बोर्ड में आते हैं और बाद में वोरा तथा गोयनका.
दिसंबर 2018 से फरवरी 2020 के बीच, यानी बॉम्बे रेयॉन के तारापुर कारोबार को उससे अलग किए जाने से पहले के 18 महीनों में, वोरा ने कपड़ा और उससे जुड़े क्षेत्रों की आठ कंपनियों के बोर्ड में पद संभाले. इनमें एशवेल टेक्सटाइल्स भी शामिल थी.
एशवेल टेक्सटाइल्स की शेयरधारिता, बॉम्बे रेयॉन के ईमेल डोमेन से 2007 में दाखिल दस्तावेज और अग्रवाल परिवार की कंपनियों से उनके संबंधों पर शितांशु बिपिन वोरा और लिनेन आर्ट प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक विमल कुमार गोयनका को ईमेल के जरिए विस्तृत सवाल भेजे गए. दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया.
एशवेल नाम की दो कंपनियां
एशवेल नाम दो अलग-अलग कंपनियों में दिखाई देता है. इन दोनों के बीच का अंतर इस पूरी कहानी का अहम हिस्सा है.
एशवेल होल्डिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बॉम्बे रेयॉन की घोषित प्रमोटर इकाई थी, जिसके पास सूचीबद्ध कंपनी की 7.92% हिस्सेदारी थी. 31 मार्च 2016 की स्थिति के अनुसार, इसके शेयरधारकों के रजिस्टर में नीदरलैंड के एम्स्टेलवीन स्थित क्रिज्समैन 15-8 के पते वाली एएए यूनाइटेड बी.वी. के पास इसके कुल 86.38 करोड़ शेयरों में से 85.84 करोड़ शेयर थे. यानी 99.38% हिस्सेदारी. शेष हिस्सेदारी रेनॉल्ड शर्टिंग लिमिटेड के पास थी. अमन अग्रवाल और प्रशांत अग्रवाल के नाम पर भी 25,000-25,000 शेयर थे.
नीदरलैंड की कंपनी एएए यूनाइटेड बी.वी. ने अप्रैल 2009 में ₹333 करोड़ में बॉम्बे रेयॉन की 20.67% हिस्सेदारी खरीदी थी. बाद में उसके पास परिवार की घोषित प्रमोटर इकाई एशवेल होल्डिंग की 99.38% हिस्सेदारी और सूचीबद्ध कंपनी की सीधे अपने नाम पर 13.83% हिस्सेदारी आ गई. इस डच कंपनी के पीछे कौन है और उसने प्रमोटर होल्डिंग कंपनी का नियंत्रण किस कीमत पर हासिल किया, इसका विवरण भारतीय रिकॉर्ड में नहीं है. एसएफआईओ, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय इसकी जांच कर सकते हैं.
दोनों कॉरपोरेट शेयरधारक खुद बॉम्बे रेयॉन के प्रमोटर समूह का हिस्सा थे. एएए यूनाइटेड बी.वी. के पास सूचीबद्ध कंपनी की सीधे 13.83% हिस्सेदारी थी, जबकि रेनॉल्ड शर्टिंग के पास 3.98% हिस्सेदारी थी.
इस तरह एक एशवेल कंपनी का स्वामित्व खुले तौर पर परिवार और एक डच इकाई के पास था. इसी कंपनी के पास उस कंपनी में परिवार की घोषित हिस्सेदारी थी, जो बाद में विफल हो गई.
दूसरी एशवेल कंपनी ने बॉम्बे रेयॉन के ईमेल पते का इस्तेमाल कर दस्तावेज दाखिल किए. इसमें कंपनी के वित्त प्रमुख और कर्मचारी हिस्सेदार हैं और यह उस कारोबार में नियंत्रणकारी हिस्सेदारी रखती है, जो अब भी चल रहा है.
दोनों कंपनियों के दस्तावेजों पर, जहां जरूरी था, एक ही निदेशक के हस्ताक्षर हैं.
यह जानने के लिए गहन जांच जरूरी है कि क्या बॉम्बे रेयॉन से कोई पैसा दूसरी जगह भेजा गया था, क्या एशवेल टेक्सटाइल्स एक नाममात्र की स्वामित्व संरचना है या इन कंपनियों का संचालन एक इकाई के रूप में किया गया था.
एसएफआईओ बॉम्बे रेयॉन की जांच कर रहा है, लेकिन उसकी प्रक्रिया और कामकाज बेहद धीमा है. जांच को अधिकृत करने वाला एसएफआईओ का आदेश 30 अक्टूबर 2025 का है. रिकॉर्ड में पहला समन नौ महीने से अधिक समय बाद, 5 अगस्त 2026 को जारी किया गया.
रिकॉर्ड एक सवाल खड़ा करते हैं, जिसका जवाब दस्तावेजों में मौजूद है.
एशवेल टेक्सटाइल्स में 21 शेयरधारकों की हिस्सेदारी के लिए पैसा किसने दिया और इसका लाभ किसे मिल रहा है?
2007 में इस कंपनी के दो शेयरधारक और ₹1 लाख की पूंजी थी. 2019 तक इसके 21 शेयरधारक, 29.19 लाख शेयर और तारापुर की एक स्पिनिंग मिल में नियंत्रणकारी हिस्सेदारी थी.
इन दोनों स्थितियों के बीच की दूरी तय करने के लिए किसी ने पैसा लगाया था.
अगली कड़ी: एक ही साल में लिनेन आर्ट में आए ₹100 करोड़, वह कर्जदाता जिसने बॉम्बे रेयॉन का कर्ज ₹1,361 करोड़ के डिस्काउंट पर खरीदा और सप्लायर के ₹483 करोड़ के वे बिल, जिनका हिसाब बॉम्बे रेयॉन की अपनी बहीखातों में नहीं मिल सका.
यह रिपोर्ट कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय, भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड और स्टॉक एक्सचेंजों के पास दाखिल रिकॉर्ड तथा बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड की वार्षिक रिपोर्टों पर आधारित है. शितांशु बिपिन वोरा और विमल कुमार गोयनका को ईमेल के जरिए विस्तृत सवाल भेजे गए थे, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
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