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IPO से पहले NSE का बड़ा कदम, पुराने विवाद निपटाने के लिए सेबी को 1,491 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव
को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों के निपटारे की तैयारी, MSEI ने भी 857 करोड़ रुपये के मुआवजे का दावा किया.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 hours ago
देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने अपने बहुप्रतीक्षित आईपीओ (IPO) से पहले वर्षों पुराने कानूनी विवादों को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. एक्सचेंज ने बाजार नियामक सेबी (SEBI) के साथ चल रहे को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों के निपटारे के लिए 1,491.21 करोड़ रुपये का सेटलमेंट प्रस्ताव दिया है. इसके साथ ही प्रतिद्वंद्वी मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (MSEI) की ओर से 856.99 करोड़ रुपये के मुआवजे का दावा भी एनएसई के सामने चुनौती बना हुआ है. हालांकि, एनएसई ने स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित राशि का पूरा बोझ उस पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह पहले ही विभिन्न आदेशों के तहत बड़ी रकम सेबी के पास जमा करा चुका है.
वास्तविक वित्तीय बोझ कितना होगा?
पहली नजर में 1,491 करोड़ रुपये का सेटलमेंट प्रस्ताव काफी बड़ा दिखाई देता है, लेकिन वास्तविक वित्तीय प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है. एनएसई पहले ही विभिन्न मामलों में सेबी के पास करीब 1,107 करोड़ रुपये जमा करा चुका है. ऐसे में यदि सेबी संशोधित प्रस्ताव को मंजूरी देता है, तो एक्सचेंज को केवल शेष राशि का भुगतान करना होगा. फिलहाल को-लोकेशन और डार्क फाइबर से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं.
क्या है डार्क फाइबर विवाद?
डार्क फाइबर मामला ट्रेडिंग में कथित अनुचित लाभ से जुड़ा है. आरोप था कि कुछ चुनिंदा ट्रेडिंग सदस्यों को एक अनधिकृत इंटरनेट सेवा प्रदाता के माध्यम से तेज कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई गई, जिससे उन्हें अन्य निवेशकों की तुलना में बाजार संबंधी जानकारी पहले प्राप्त हो जाती थी.
इस मामले में सेबी ने 2019 में एनएसई को ब्याज सहित 62.58 करोड़ रुपये लौटाने और 2022 में 7 करोड़ रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया था. हालांकि, बाद में सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने दोनों आदेशों को रद्द कर दिया. इसके बाद सेबी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. विवाद के निपटारे के लिए एनएसई ने मार्च 2026 में 267.65 करोड़ रुपये का सेटलमेंट प्रस्ताव पेश किया.
को-लोकेशन मामला क्यों है अहम?
को-लोकेशन विवाद को एनएसई के इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में गिना जाता है. आरोप था कि कुछ चुनिंदा ब्रोकर्स को एक्सचेंज के सर्वर के करीब अपने सिस्टम स्थापित करने की विशेष सुविधा दी गई थी, जिससे उन्हें बाजार का डेटा अन्य प्रतिभागियों से पहले मिल जाता था.
इस मामले में सेबी ने 2019 में एनएसई पर 624.89 करोड़ रुपये जमा करने का आदेश दिया था. हालांकि, 2023 में SAT ने इस आदेश को रद्द करते हुए एनएसई को केवल निवेशक शिक्षा एवं संरक्षण कोष (IEPF) में 100 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया.
सेबी ने इस फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. मामले को समाप्त करने के लिए एनएसई ने मार्च 2026 में 1,223.56 करोड़ रुपये के भुगतान का संशोधित प्रस्ताव दिया.
MSEI का 857 करोड़ रुपये का दावा
एनएसई की कानूनी चुनौतियां केवल सेबी तक सीमित नहीं हैं. एक्सचेंज ने अपने आईपीओ दस्तावेजों में मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (MSEI) के साथ करीब 15 वर्ष पुराने विवाद का भी उल्लेख किया है.
MSEI का आरोप है कि एनएसई ने करेंसी डेरिवेटिव्स बाजार में अपनी मजबूत स्थिति का दुरुपयोग करते हुए फीस को अत्यधिक कम रखा, जिससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई और अन्य एक्सचेंजों को नुकसान पहुंचा.
वर्ष 2011 में प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने एनएसई पर 55.5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था, जिसे 2014 में COMPAT ने भी बरकरार रखा. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस जुर्माने की वसूली पर रोक लगा रखी है.
इसके अलावा MSEI ने कथित कारोबारी नुकसान के लिए 856.99 करोड़ रुपये के मुआवजे और उस पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की मांग की है.
IPO से पहले पारदर्शिता पर जोर
एनएसई द्वारा दाखिल ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) में इन सभी लंबित विवादों का विस्तृत उल्लेख किया गया है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आईपीओ से पहले कानूनी मामलों का खुलासा और उनके निपटारे की पहल निवेशकों का भरोसा बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.
एनएसई का यह प्रयास ऐसे समय में सामने आया है जब बाजार लंबे समय से देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज के बहुप्रतीक्षित आईपीओ का इंतजार कर रहा है.
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