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Gameskraft के पूर्व CFO का बड़ा दावा, 250 करोड़ रुपये के फंड डायवर्जन की जानकारी संस्थापकों को थी
प्रभु ने ED को बताया कि डायवर्ट किए गए फंड को उनके Zerodha खाते के माध्यम से फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) ट्रेडिंग में निवेश किया गया था.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 hours ago
ऑनलाइन गेमिंग यूनिकॉर्न Gameskraft से कथित 250 करोड़ रुपये के फंड डायवर्जन का मामला संभवतः किसी एक अधिकारी द्वारा की गई व्यक्तिगत गड़बड़ी नहीं था. यह बात पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) रमेश प्रभु से जुड़े एक बयान से सामने आती है, जिसे कर्नाटक हाईकोर्ट के एक आदेश में उद्धृत किया गया है.
प्रभु, जिन पर पहले Gameskraft ने कंपनी के फंड को व्यक्तिगत फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) ट्रेडिंग में लगाने का आरोप लगाया था, ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को बताया कि ये ट्रांसफर कंपनी के संस्थापकों के निर्देश पर किए गए थे और इन्हें आंतरिक रूप से ऐसे निवेश के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिन्हें बाद में व्यवसाय में वापस लाया जाना था.
ED द्वारा की गई गिरफ्तारियों की वैधता की जांच करने वाले 16 जून के कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले में उद्धृत यह बयान, Gameskraft के प्रमोटरों के खिलाफ एजेंसी की मनी लॉन्ड्रिंग जांच का एक प्रमुख आधार बन गया है.
आदेश के अनुसार, प्रभु ने 18 नवंबर 2025 को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 50 के तहत ED द्वारा भेजे गए समन का जवाब ईमेल के माध्यम से दिया था. उस संचार में उन्होंने कथित तौर पर कहा कि फंड का डायवर्जन संस्थापकों विकास तनेजा, दीपक सिंह अहलावत, पृथ्वीराज सिंह और दीपक कुमार झा के "निर्देशों के तहत" किया गया था.
'कंपनी का पैसा सुरक्षित रखने' की योजना
अदालत द्वारा उद्धृत बयान में प्रभु ने इस व्यवस्था की शुरुआत वर्ष 2019 से बताई है, जब RummyCircle संचालित करने वाली Games24x7 ने Gameskraft के कुछ संस्थापकों के खिलाफ सोर्स कोड और ग्राहक डेटाबेस की कथित चोरी को लेकर कानूनी कार्रवाई शुरू की थी.
प्रभु का दावा है कि इस मुकदमेबाजी के कारण संस्थापकों को कंपनी में जमा हो रहे फंड को लेकर चिंता हुई. उनके बयान के अनुसार, उनसे कहा गया था कि धीरे-धीरे कंपनी से पैसा बाहर निकालकर उसे शेयर बाजार में निवेश किया जाए, ताकि बाद में उसे वापस लाया जा सके. अदालत में उद्धृत संचार के अनुसार प्रभु ने कथित रूप से कहा, "उन्होंने मुझसे कहा था कि जब हमें मुनाफा होगा, तो हम पैसा वापस कंपनी में ले आएंगे."
व्यक्तिगत खातों के जरिए F&O ट्रेडिंग
प्रभु ने ED को बताया कि डायवर्ट किए गए फंड को उनके Zerodha खाते के माध्यम से फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस ट्रेडिंग में निवेश किया गया था. उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने अपनी पत्नी की जानकारी के बिना उनके नाम पर एक और ट्रेडिंग खाता खोला था. बयान के अनुसार, Gameskraft से ट्रांसफर किया गया पूरा पैसा अंततः डेरिवेटिव ट्रेडिंग में डूब गया. उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें इन लेन-देन से कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं हुआ.
यह दावा Gameskraft की पहले की पुलिस शिकायत से बिल्कुल अलग है, जिसमें इस मामले को एक वरिष्ठ वित्तीय अधिकारी द्वारा अकेले किए गए अनधिकृत फंड डायवर्जन के रूप में पेश किया गया था.
म्यूचुअल फंड एंट्री और कथित फर्जीवाड़ा
प्रभु के बयान का संभवतः सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इन लेन-देन को कंपनी की पुस्तकों में किस प्रकार दर्ज किया गया. प्रभु ने दावा किया कि उनके खातों में ट्रांसफर की गई राशि को Gameskraft के वित्तीय विवरणों में म्यूचुअल फंड निवेश के रूप में दिखाया गया था. उन्होंने आगे आरोप लगाया कि संस्थापकों ने उनसे ऑडिट के लिए फर्जी म्यूचुअल फंड स्टेटमेंट तैयार करने को कहा था. आदेश में उद्धृत बयान के अनुसार, उन्होंने वित्त वर्ष 2023-24 और 2024-25 के दौरान ऐसा करने से इनकार कर दिया.
यह आरोप Gameskraft की अपनी पुलिस शिकायत से मेल खाता है, जिसमें कहा गया था कि फंड डायवर्जन छिपाने के लिए फर्जी निवेश रिकॉर्ड और नकली म्यूचुअल फंड स्टेटमेंट का इस्तेमाल किया गया.
'दोनों हस्ताक्षरकर्ताओं को अलर्ट मिलते थे'
पूर्व CFO ने इस संभावना को भी खारिज किया कि ये ट्रांसफर किसी की नजर से बच सकते थे. प्रभु ने ED को बताया कि जिस RBL बैंक खाते से फंड ट्रांसफर किया गया, उसके लिए दो अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं की आवश्यकता थी, वह स्वयं और सह-संस्थापक पृथ्वीराज सिंह. उनका दावा है कि हर लेन-देन होने पर दोनों हस्ताक्षरकर्ताओं को ईमेल और SMS अलर्ट प्राप्त होते थे. यह दावा जांचकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि वे यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि फंड की आवाजाही की जानकारी किसे थी और कब थी.
IPO का दबाव
प्रभु के बयान में आगे आरोप लगाया गया है कि जब Gameskraft संभावित पब्लिक लिस्टिंग की तैयारी कर रही थी, तब गायब हुए पैसे को वापस दिखाने का दबाव बढ़ गया. अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, उनका दावा है कि कंपनी दो वर्षों के भीतर IPO लाने की योजना बना रही थी और उसे अपने खातों में यह राशि दिखाने की आवश्यकता थी. चूंकि पैसा पहले ही F&O ट्रेडिंग में डूब चुका था, इसलिए उन्होंने आरोप लगाया कि संस्थापकों ने नुकसान का दोष उन पर मढ़ दिया और बाद में उन्हें यह आश्वासन देते हुए देश छोड़ने के लिए कहा कि वे "स्थिति संभाल लेंगे." उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संस्थापक लिखित संचार से बचते थे और लेन-देन से संबंधित निर्देश मौखिक रूप से देते थे.
ED की मनी लॉन्ड्रिंग थ्योरी
ED ने अपना मामला तैयार करने में प्रभु के बयान पर काफी हद तक भरोसा किया है. हाईकोर्ट द्वारा उद्धृत गिरफ्तारी के आधारों में एजेंसी ने आरोप लगाया कि Gameskraft के संस्थापक और पूर्व CFO आपस में "मिलीभगत" से काम कर रहे थे और उन्होंने फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस तथा म्यूचुअल फंड निवेश के नाम पर 250 करोड़ रुपये का डायवर्जन और मनी लॉन्ड्रिंग की. एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि अपराध से अर्जित आय का एक हिस्सा निवेश संरचनाओं और डिविडेंड भुगतान के माध्यम से धन शोधन कर परिवार-नियंत्रित संस्थाओं और संपत्तियों में पहुंचाया गया.
कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश में इन आरोपों की सत्यता पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया है. फैसले का मुख्य उद्देश्य यह जांचना था कि क्या ED के पास PMLA के तहत गिरफ्तारी को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद थी. हालांकि, प्रभु का बयान इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है. जहां Gameskraft की मूल शिकायत में उन्हें वर्षों से चल रहे कथित धोखाधड़ी के मास्टरमाइंड के रूप में पेश किया गया था, वहीं पूर्व CFO ने अब आरोप लगाया है कि यह निवेश योजना कंपनी के शीर्ष नेतृत्व की जानकारी और निर्देश पर चलाई गई थी. यही दावा ED की विस्तारित जांच के केंद्र में है.
संस्थापकों को जेल से रिहाई
प्रवर्तन निदेशालय (ED) को बड़ा झटका देते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने मंगलवार को Gameskraft के संस्थापक दीपक सिंह, पृथ्वीराज सिंह और विकास तनेजा की गिरफ्तारी को अवैध करार दिया और उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया. अदालत ने कहा कि केंद्रीय एजेंसी धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत गिरफ्तारी से जुड़े वैधानिक सुरक्षा प्रावधानों का पालन करने में विफल रही.
यह आदेश न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने पारित किया. उन्होंने 7 और 8 मई को ED द्वारा की गई तलाशी के बाद संस्थापकों की गिरफ्तारी की वैधता पर दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था.
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