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पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारतीय कंपनियों पर बढ़ा जोखिम: लागत दबाव और प्रोजेक्ट चुनौतियां गहराईं

रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियों ने अब तक मजबूती दिखाई है, लेकिन बदलते भू-राजनीतिक हालात लागत, प्रोजेक्ट निष्पादन और मुनाफे पर दबाव बढ़ा रहे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago

पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय कंपनियां लगातार जोखिम के दायरे में बनी हुई हैं. भले ही अब तक उनका संचालन काफी हद तक स्थिर रहा है, लेकिन लागत में बढ़ोतरी और प्रोजेक्ट निष्पादन से जुड़ी चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं. Rubix Data Sciences और Vayana TradeXchange की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कंपनियां व्यापार, ऊर्जा निर्भरता और रणनीतिक निवेश के जरिए पश्चिम एशिया से गहराई से जुड़ी हुई हैं, जिससे वे किसी भी बड़े भू-राजनीतिक झटके के प्रति संवेदनशील बनी हुई हैं.

220 अरब डॉलर का व्यापार, बड़ा घाटा

रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में भारत का 13 प्रमुख पश्चिम एशियाई देशों के साथ कुल व्यापार 220 अरब डॉलर रहा. इसमें आयात 155 अरब डॉलर और निर्यात 66 अरब डॉलर रहा, जिससे 89 अरब डॉलर का व्यापार घाटा दर्ज हुआ. यह आंकड़े इस क्षेत्र के साथ भारत की गहरी आर्थिक निर्भरता को दर्शाते हैं.

अस्थायी राहत, लेकिन खतरा बरकरार

हालांकि युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से फिलहाल तनाव कुछ कम हुआ है, लेकिन रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि हालात फिर बिगड़ते हैं तो सप्लाई चेन बाधित हो सकती है, ऊर्जा की कीमतें बढ़ सकती हैं और बाजार में अस्थिरता तेज हो सकती है.

इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित

भारतीय कंपनियों का सबसे ज्यादा एक्सपोजर इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में देखा जा रहा है. इंजीनियरिंग कंपनी Larsen & Toubro अपनी 33 प्रतिशत आय और 37 प्रतिशत ऑर्डर बुक पश्चिम एशिया से प्राप्त करती है. इसके अलावा वित्त वर्ष 2026 के लगभग एक-तिहाई नए ऑर्डर भी इसी क्षेत्र से जुड़े हैं. तनाव के बावजूद कंपनी के 95 प्रतिशत प्रोजेक्ट साइट्स चालू हैं, जो ऑपरेशनल मजबूती को दर्शाता है.

 बढ़ते जोखिम: बीमा और लॉजिस्टिक्स महंगे

रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनियों को अब बढ़ते बीमा प्रीमियम, लॉजिस्टिक बाधाओं और प्रोजेक्ट में देरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. खासकर संघर्ष क्षेत्रों के पास चल रहे प्रोजेक्ट्स में जोखिम अधिक है. लॉजिस्टिक्स सेक्टर में अडानी पोर्ट्स का इजरायल के हाइफा पोर्ट में निवेश लंबे समय तक तनाव रहने पर महंगा साबित हो सकता है, क्योंकि इससे बीमा लागत बढ़ने और कार्गो बाधित होने की आशंका है.

ऊर्जा क्षेत्र में सबसे बड़ा खतरा

ऊर्जा क्षेत्र में जोखिम सबसे ज्यादा बना हुआ है. ONGC Videsh के पश्चिम एशिया के कई देशों में एसेट्स हैं, जिन पर प्रतिबंध, अस्थिरता और परिचालन अनिश्चितता का असर पड़ सकता है. भारत की कच्चे तेल पर निर्भरता, जो कुल खपत का लगभग 88 प्रतिशत है, इस जोखिम को और बढ़ा देती है.

सप्लाई चेन पर भी असर

पश्चिम एशिया भारत के लिए कच्चे तेल, एलएनजी, उर्वरक और पेट्रोकेमिकल्स का बड़ा स्रोत है. इनका बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है. ऐसे में इस मार्ग में कोई भी बाधा अलग-अलग सेक्टरों की लागत बढ़ा सकती है और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव डाल सकती है.

तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव

मार्च 2026 में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 60 प्रतिशत की तेजी देखी गई और यह 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था. हालांकि बाद में इसमें कुछ नरमी आई. रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल 13–14 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.

आईटी सेक्टर भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं

आईटी कंपनियां जैसे Tata Consultancy Services और Wipro भले ही पश्चिम एशिया में स्थिर संचालन बनाए हुए हैं, लेकिन आर्थिक अनिश्चितता के चलते वहां के क्लाइंट्स खर्च कम कर सकते हैं, जिससे इन कंपनियों की ग्रोथ प्रभावित हो सकती है.

निवेश और रेमिटेंस से जुड़ी निर्भरता

पश्चिम एशिया से भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 31.7 अरब डॉलर है, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात का हिस्सा लगभग 79 प्रतिशत है. यह निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर, फाइनेंशियल सर्विसेज और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है.

इसके अलावा, भारत को वित्त वर्ष 2025 में 135.4 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिला, जिसमें से 37.9 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आया. ऐसे में वहां की आर्थिक स्थिति में गिरावट का सीधा असर भारत की खपत पर पड़ सकता है.

 


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