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चीन की वापसी और सख्त वैश्विक नियमों के बीच भारतीय एग्रोकेमिकल निर्यातकों की राह कठिन

FY25 में 22,147 करोड़ रुपये का व्यापार अधिशेष दर्ज करने के बावजूद भारत को नवाचार, अनुसंधान और अनुपालन में और निवेश करने की जरूरत

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय एग्रोकेमिकल उद्योग ने 22,147 करोड़ रुपये का व्यापार अधिशेष दर्ज किया, जो कि वैश्विक बाजार में जेनेरिक एग्रोकेमिकल्स की मजबूत मांग के चलते संभव हो पाया. लेकिन वैश्विक परिदृश्य अब तेजी से बदल रहा है, और निर्यातकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं.

वित्त वर्ष 2023-24 में वैश्विक मांग में भारी गिरावट के बाद अब रिकवरी के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन भारतीय कंपनियां अब दोहरी मार झेल रही हैं - एक ओर चीन के सस्ते उत्पादों के साथ आक्रामक वापसी, और दूसरी ओर अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे बाजारों में सख्त हो रहे नियामकीय नियम.

FY24 में निर्यात में 22% गिरावट
Rubix Data Sciences की रिपोर्ट के मुताबिक, FY24 में भारत के एग्रोकेमिकल निर्यात में करीब 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. ब्राजील और अमेरिका जैसे प्रमुख बाजारों में वितरकों ने अतिरिक्त भंडार और कम लाभ मार्जिन के कारण ऑर्डर घटा दिए. वहीं, चीन ने अपने पर्यावरणीय प्रतिबंधों में ढील देकर सस्ते उत्पादों के साथ फिर से बाजार में प्रवेश किया.

INVasset के बिजनेस हेड भाविक जोशी ने कहा, “विश्वभर में वितरकों ने गिरती कीमतों के बीच अतिरिक्त स्टॉक संभालने के लिए खरीद कम कर दी, जबकि चीनी कंपनियों ने बेहद प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उत्पाद पेश किए, जिससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ी.”

गुणवत्ता और अनुपालन बने नई जरूरत
हालांकि निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव बने रहने की आशंका है, लेकिन दीर्घकालिक मांग मजबूत बनी हुई है. लैटिन अमेरिका, खासकर ब्राजील और अर्जेंटीना, के साथ अमेरिका और जापान जैसे देश भारत से बड़े पैमाने पर कीटनाशक, फफूंदनाशक और खरपतवारनाशक आयात कर रहे हैं. लेकिन अब यह मांग अधिक से अधिक अनुपालन मानकों - जैसे मैक्सिमम रेसिड्यू लिमिट (MRL), ट्रेसबिलिटी और टिकाऊ निर्माण—पर निर्भर करती है.

Matix Fertilisers and Chemicals के चेयरमैन न‍िशांत कनोड‍िया ने कहा, “जापान अब भारतीय हर्बीसाइड्स का एक बड़ा आयातक बन रहा है, जो भारतीय गुणवत्ता और अनुपालन पर बढ़ते विश्वास का संकेत है.”

‘मेक इन इंडिया’, विशेष रासायनिक पार्क (दहेज और विशाखापत्तनम), RoDTEP प्रोत्साहन योजना और GST में सुधार जैसे सरकारी प्रयासों से भारतीय कंपनियों को कुछ हद तक लागत में राहत मिली है.

धनुका एग्रीटेक के चेयरमैन एम.के. धनुका ने कहा, “ये योजनाएं देश में निर्माण को प्रोत्साहित करती हैं, आयात पर निर्भरता घटाती हैं और बुनियादी ढांचे व तकनीक में निवेश को बढ़ावा देती हैं। केमिकल पार्क में एकीकृत सुविधाएं, बेहतर लॉजिस्टिक्स और साझा यूटिलिटी मिलती है, जिससे उत्पादन लागत कम होती है.”

हालांकि उद्योग जगत मांग कर रहा है कि एग्रोकेमिकल्स को उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI) में शामिल किया जाए, ताकि नवाचार और उच्च मूल्य वाले अणुओं के विकास को बढ़ावा मिल सके।

लागत से नवाचार की ओर: लंबा सफर बाकी
दुनिया के चौथे सबसे बड़े एग्रोकेमिकल उत्पादक देश के रूप में भारत ने लागत और प्रोसेस के जरिये प्रतिस्पर्धा हासिल की है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात में दीर्घकालिक लचीलापन के लिए अब अनुसंधान और नवाचार पर फोकस जरूरी है. भाविक जोशी ने कहा, “हम अभी भी R&D पर केवल 2–3% राजस्व खर्च करते हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा कहीं अधिक होता है। अगर हमें नेतृत्व करना है तो मजबूत पेटेंट पाइपलाइन और शिक्षाविदों के साथ सहयोग जरूरी है.”

हालांकि कुछ अग्रणी कंपनियां जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) और जैव-आधारित फॉर्मूलेशन की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन कई मध्यम आकार की कंपनियां अभी भी अनुपालन और ट्रेसबिलिटी में पिछड़ रही हैं. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया अभी भी धीमी और महंगी बनी हुई है.

चीन+1 रणनीति और घरेलू समर्थन के चलते भारत को वैश्विक बाजार में अवसर तो मिल रहे हैं, लेकिन उन्हें बनाए रखना आसान नहीं होगा. चीनी कंपनियों की वापसी और सख्त होते आयात नियमों के बीच भारत को नवाचार, गुणवत्ता और अनुपालन में अग्रणी बनना ही होगा। नहीं तो आज जो बढ़त हासिल की गई है, वह हाथ से निकल भी सकती है.


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