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अमेरिका में राहत के बाद अडानी की वापसी, वैश्विक बाजारों में बदलने लगी धारणा

अमेरिका ने गौतम अडानी को नष्ट नहीं किया. उसने उन्हें अपने भीतर समाहित कर लिया. अमेरिकी DOJ मामला खत्म हो चुका है. SEC मामला सुलझ चुका है. अब आगे क्या होता है, उसकी कहानी पहले सामने आए ड्रामे से कहीं ज्यादा दिलचस्प और कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

पलक शाह

न्यूयॉर्क का ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट यूं ही किसी पर आरोप तय नहीं करता. यही वह अभियोजन तंत्र है जिसने गैम्बिनो क्राइम फैमिली के खिलाफ कार्रवाई की, HSBC को घुटनों पर ला दिया, और अपनी प्रतिष्ठा इस बात पर बनाई कि अमेरिकी कानून उसकी सीमाओं से बहुत दूर तक असर डालता है. जब ब्रुकलिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली कारोबारियों में से एक पर रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के आरोपों के साथ चर्चा में आता है, तो वैश्विक वित्तीय जगत तुरंत प्रतिक्रिया देता है. संस्थागत पूंजी अदालतों द्वारा दोष या निर्दोष साबित किए जाने से बहुत पहले ही अनिश्चितता से दूरी बना लेती है.

उसी प्रवृत्ति ने लगभग रातोंरात वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में गौतम अडानी की स्थिति बदल दी थी. एक बड़े फंड मैनेजर का कहना है कि न्यूयॉर्क की निवेश समितियों से लेकर सिंगापुर के प्राइवेट बैंकों तक, अडानी नाम को अब इंफ्रास्ट्रक्चर स्टोरी के रूप में नहीं देखा जा रहा था. यह अब प्रतिष्ठा से जुड़े जोखिम की कहानी बन चुका था. और आधुनिक वित्तीय व्यवस्था में प्रतिष्ठा का जोखिम कई बार परिचालन कमजोरी से भी ज्यादा महंगा साबित होता है. निवेशकों ने यह पूछना बंद कर दिया था कि क्या अडानी की परिसंपत्तियां आकर्षक हैं. वे अब एक आसान सवाल पूछ रहे थे: “क्या कोई व्यक्ति अमेरिकी न्याय विभाग (US DOJ) के आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे अरबपति के पक्ष में खड़े होकर अपना करियर दांव पर लगाएगा?” अडानी फाइल को किनारे कर दिया गया था. बाजार नैतिक व्यवस्था नहीं होते. वे सिर्फ मूल्य निर्धारण की व्यवस्था होते हैं.

अब विडंबना देखिए. जिस हफ्ते DOJ ने गौतम अडानी के खिलाफ सभी आपराधिक आरोप स्थायी रूप से हटा दिए हमेशा के लिए खारिज कर दिए, उसी समय भारत में चर्चा का बड़ा हिस्सा नॉर्वे के सॉवरेन वेल्थ फंड और अडानी ग्रीन को कथित “गंभीर भ्रष्टाचार” के आरोपों के आधार पर बाहर रखने पर केंद्रित रहा.

लेकिन अमेरिका से जो संकेत आ रहा है, वह यह है कि वही पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था जिसने 18 महीनों तक अडानी को रेडियोधर्मी संपत्ति की तरह देखा, अब उसके पास रुख बदलने के लिए हर संस्थागत कारण मौजूद है. और जब इतने बड़े सिस्टम दिशा बदलते हैं, तो वे धीरे-धीरे नहीं चलते. वे खरबों डॉलर की चाल चलते हैं.

पिछले 18 महीनों के बड़े हिस्से में अडानी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऐसे व्यक्ति बन चुके थे, जिनसे संस्थान दूरी बनाए रखना चाहते थे. इसलिए नहीं कि उनके कारोबार रुक गए थे. बंदरगाहों पर माल ढुलाई जारी रही. एयरपोर्ट यात्रियों से भरे रहे. ट्रांसमिशन लाइनें पूरे भारत में बिजली पहुंचाती रहीं. रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स का विस्तार चलता रहा.

किसी ने औपचारिक रूप से इस बदलाव की घोषणा नहीं की. कोई प्रेस रिलीज जारी नहीं हुई जिसमें अडानी को “अछूत” कहा गया हो. लेकिन बदलाव सूक्ष्म तरीकों से दिखने लगा. मुलाकातें तय करना मुश्किल होने लगा. कर्जदाताओं ने ज्यादा सुरक्षा की मांग शुरू कर दी. ESG से जुड़ी पूंजी सूखने लगी. बीमा लागत बढ़ गई. विश्लेषक ज्यादा सतर्क हो गए. और उन कमरों में वकील दिखाई देने लगे जहां आमतौर पर बैंकर हावी रहते हैं.

अडानी समूह वह बोझ उठा रहा था जिसे फाइनेंसर निजी तौर पर “अछूत डिस्काउंट” कहते हैं, अनिश्चितता से जुड़ा एक अदृश्य लेकिन बेहद महंगा प्रीमियम, बिना किसी प्रतिबंध या सजा के भी बाजार अडानी का मूल्यांकन सिर्फ बंदरगाहों, एयरपोर्ट या पावर एसेट्स के आधार पर नहीं कर रहा था, बल्कि इस डर पर कर रहा था कि शायद सबसे बुरा अभी बाकी है.

और जब करीब ₹3 लाख करोड़ के कर्ज वाला कोई समूह थोड़ी भी ज्यादा उधारी लागत चुकाने लगता है, तो उसका असर विस्तार योजनाओं से लेकर लंबी अवधि की परियोजनाओं की अर्थव्यवस्था तक हर जगह दिखाई देता है. मुंबई का कोई भी इक्विटी ब्रोकर आपको यह साधारण बात बता देगा.

फिर कुछ असाधारण हुआ.

अमेरिका ने गौतम अडानी को नष्ट नहीं किया… उसने उन्हें अपने भीतर समाहित कर लिया

उस बदलाव के शुरुआती संकेत कुछ हफ्ते पहले ही चुपचाप दिखाई देने लगे थे. 6 मई को मैंने वॉशिंगटन डी.सी. से रिपोर्ट किया था कि अडानी अमेरिकी रेगुलेटर्स के साथ पर्दे के पीछे समझौते की दिशा में बढ़ रहे हैं, एक ऐसी संभावना जो आरोपों के तूफान के चरम पर बेहद अविश्वसनीय लग रही थी. लेकिन अब समझौते की संरचना यह संकेत देती है कि असली लड़ाई अदालतों से हटकर बातचीत की मेज पर पहुंच चुकी थी.

18 मई तक SEC ने अपनी सिविल कार्यवाही का निपटारा कर लिया. ट्रेजरी से जुड़े मामले भी सुलझा लिए गए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि DOJ ने गौतम और सागर अडानी के खिलाफ आपराधिक आरोपों को स्थायी रूप से वापस ले लिया, जिससे उसी मामले में भविष्य की किसी भी कानूनी कार्रवाई का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया.

लेकिन मुंबई के बाजार पर्यवेक्षकों के मुताबिक असली बदलाव रणनीतिक था. एक वरिष्ठ कॉरपोरेट वकील कहते हैं, “जो बदला वह सिर्फ अडानी की कानूनी स्थिति नहीं थी. उनकी वित्तीय स्थिति भी बदल गई थी.”

रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका के भीतर अडानी की कानूनी रणनीति अदालत की दलीलों से कहीं आगे बढ़ चुकी थी. Sullivan & Cromwell के रॉबर्ट जियुफ्रा जूनियर ने कथित तौर पर अभियोजन की बुनियाद को आक्रामक तरीके से चुनौती दी. उन्होंने अधिकार क्षेत्र की सीमा, सबूतों की मजबूती और निवेशकों को सीधे नुकसान न होने जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए, खासकर तब जब बॉन्ड दायित्वों का भुगतान लगातार जारी रहा था. बता दें, यह डोनाल्ड ट्रंप के भी वकील भी रह चुके हैं. 

अडानी को लेकर माहौल बदलने वाली चीज एक बड़े भू-राजनीतिक और आर्थिक प्रस्ताव का उभरना था.

एक फंड मैनेजर के मुताबिक, “टेलीविजन स्टूडियो से पहले शेयर बाजारों ने इस बदलाव को समझ लिया था.”

ठीक उसी समय जब ट्रंप युग का अमेरिका खुद को इंफ्रास्ट्रक्चर पुनर्निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग विस्तार और ऊर्जा प्रभुत्व के इर्द-गिर्द फिर से परिभाषित कर रहा था, अडानी ने खुद को सिर्फ आरोपों से लड़ने वाले प्रतिवादी के रूप में नहीं, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में संभावित निवेशक के रूप में पेश किया.

और फिर वह तत्व सामने आया जिसे *The New York Times* ने “असामान्य प्रस्ताव” कहा: अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 10 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता, जो आपराधिक मामले पर बातचीत के साथ सामने आई. यह पूरी तरह नया नहीं था. नवंबर 2024 में ट्रंप की चुनावी जीत के तुरंत बाद अडानी 10 अरब डॉलर के अमेरिकी ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश की घोषणा कर चुके थे. लेकिन आपराधिक मामले के साथ इसके स्पष्ट जुड़ाव ने इसे अलग बना दिया — कानूनी परिधान में लिपटा एक भू-राजनीतिक सौदा.

डी.सी. के कानूनी हलकों में चर्चाओं से संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन, जिसने “अमेरिका में निवेश और नौकरियां लाओ” को अपना केंद्रीय आर्थिक नैरेटिव बनाया है, उसे इससे एक साफ निकास रास्ता मिल गया. DOJ इस परिणाम को अभियोजन विवेकाधिकार के रूप में पेश कर सकता था. अडानी को स्थायी राहत मिल गई. और अमेरिका को ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर, बंदरगाहों, डेटा सेंटर, LNG और रिन्यूएबल सेक्टर में 10 अरब डॉलर का विदेशी निवेशक मिल गया — कोई प्रतिवादी नहीं, एक लॉबिस्ट का कहना है.

डॉलर मार्केट का अब क्या मतलब है

अडानी ग्रुप पर लगभग 2.78 लाख करोड़ रुपये यानी करीब 32 अरब डॉलर का नेट कर्ज है. इसमें से 41 प्रतिशत वैश्विक बैंकों और अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों से लिया गया है. इसका मतलब है कि अडानी के करीब 13 अरब डॉलर के कर्ज की कीमत उन पश्चिमी संस्थानों द्वारा तय की जाती है जो न्यूयॉर्क कोर्ट के दस्तावेज पढ़ते हैं, कंप्लायंस वॉचलिस्ट जांचते हैं और हर बेसिस पॉइंट में जोखिम प्रीमियम जोड़ते हैं.

DOJ अवधि के दौरान यह जोखिम प्रीमियम बढ़ गया था. बॉन्ड निवेशकों ने अधिक रिटर्न की मांग की. सिंडिकेटेड लेंडर्स ने “अडानी क्लॉज” जोड़ दिए. Environmental Social and Governance (ESG) से जुड़ी ग्रीन फाइनेंसिं,  जिसकी जरूरत अडानी ग्रीन को अपने रिन्यूएबल विस्तार के लिए है, संरचनात्मक रूप से पहुंच से बाहर हो गई थी. अंतरराष्ट्रीय साझेदारों ने कॉन्ट्रैक्ट्स में सुरक्षा संबंधी भाषा जोड़ दी थी.

अब यह सब बदल रहा है. डॉलर बॉन्ड जारी करना फिर से संभव हो रहा है और रीफाइनेंसिंग लागत घट सकती है. ग्रीन बॉन्ड बाजार अब फिर से उस कंपनी के लिए उपलब्ध हो रहे हैं जिसका मुख्य कारोबार रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर है. एयरपोर्ट फाइनेंसिंग, पोर्ट फाइनेंसिंग, डेटा सेंटर फाइनेंसिंग, जिन सभी को लंबी अवधि और कम लागत वाले अंतरराष्ट्रीय कर्ज की जरूरत होती है, अब संरचनात्मक रूप से कहीं अधिक आसान हो सकते हैं.

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में, जहां प्रोजेक्ट 30 वर्षों तक चलते हैं और फाइनेंसिंग लागत उनकी व्यवहार्यता तय करती है, वहां 32 अरब डॉलर के कर्ज पर उधारी स्प्रेड में सिर्फ 50 बेसिस पॉइंट का सुधार हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये की बचत में बदल सकता है. कुछ सौ मिलियन डॉलर की कानूनी सुलह भविष्य की फाइनेंसिंग क्षमता में अरबों डॉलर का रास्ता खोल सकती है. यह कोई प्रचार नहीं है. यह इंफ्रास्ट्रक्चर का गणित है.

वह साम्राज्य जो कभी रुका नहीं

यह रुककर याद करने लायक है कि अडानी वास्तव में क्या है, क्योंकि कानूनी विवाद अक्सर इतने बड़े औद्योगिक साम्राज्य को सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा में बदल देते हैं.

यह समूह 13 बड़े बंदरगाह संचालित करता है जो भारत के लगभग 30 प्रतिशत कार्गो को संभालते हैं. यह मुंबई, अहमदाबाद और लखनऊ समेत सात अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट चलाता है. यह दुनिया के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स में से एक है, जिसके पास 20GW+ का पोर्टफोलियो है और 50GW तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा है.

कानूनी संकट के दौरान यह साम्राज्य रुका नहीं था. जो रुक गया था, वह इसकी पूरी गति से विस्तार करने की क्षमता थी. विदेशी अधिग्रहण ठहर गए. रणनीतिक साझेदारियां धीमी पड़ गईं. वैश्विक लेंडर्स ने नई क्रेडिट लाइनों पर ज्यादा सख्त जांच शुरू कर दी. विस्तार की मशीन आधी रफ्तार पर चल रही थी.

अब वह रफ्तार फिर खुल चुकी है और इसके शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक सिंगापुर की सॉवरेन वेल्थ कंपनी टेमासेक और अल्फा वेव ग्लोबल, अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स में करीब 1.3 अरब डॉलर के निवेश पर विचार कर रहे हैं. इस डील में एयरपोर्ट बिजनेस का मूल्यांकन करीब 18 अरब डॉलर आंका जा रहा है.

अल्फा वेव खुद शेख तहनून बिन जायद अल नाहयान की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी से जुड़ी है, जो अडानी ग्रुप के सबसे अहम रणनीतिक समर्थकों में से एक है. हिंडनबर्ग संकट के बाद, जब वैश्विक फाइनेंस पीछे हट रहा था, तब शेख तहनून पहले ही अडानी कंपनियों में अरबों डॉलर का निवेश कर चुके थे.

अब उम्मीद की जा रही है कि रुकी हुई डील्स फिर शुरू होंगी, विदेशी पूंजी दोबारा लौटेगी और अधिग्रहणों की रफ्तार बढ़ेगी. संकट के दौरान भी समूह की आय लगभग 20 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ती रही, यह दिखाता है कि मूल कारोबार कभी अपनी गति नहीं खो रहा था, भले ही उसके ऊपर का वित्तीय ढांचा डगमगा गया था.

जो कभी गायब नहीं होता

यहीं पर बौद्धिक ईमानदारी थोड़ी देर रुकने की मांग करती है. कानूनी समाधान इतिहास को मिटा नहीं देता. जनवरी 2023 की हिंडनबर्ग रिपोर्ट जिसने 150 अरब डॉलर की मार्केट कैप गिरावट शुरू की थी और समूह पर दशकों तक स्टॉक मैनिपुलेशन और ऑफशोर अकाउंटिंग के आरोप लगाए थे, ऐसे मामलों का कभी किसी अदालत में पूरी तरह फैसला नहीं हुआ. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की बाद की जांचों ने कुछ व्यक्तियों को विशेष आरोपों में राहत दी, लेकिन शॉर्ट सेलर्स द्वारा उठाए गए व्यापक गवर्नेंस सवाल अब भी संस्थागत स्मृति में मौजूद हैं.

पश्चिमी निवेशक जब अडानी के पास लौटेंगे, तो अपनी स्मृति के साथ लौटेंगे. वे ज्यादा मजबूत डिस्क्लोजर, बेहतर गवर्नेंस छवि, संबंधित पक्षों के लेनदेन की अधिक पारदर्शी रिपोर्टिंग और साफ-सुथरे फ्री-फ्लोट स्ट्रक्चर की मांग करेंगे. जो कंप्लायंस विभाग पहले हट गए थे, वे लौटेंगे, लेकिन इस बार ज्यादा लंबी चेकलिस्ट के साथ.

नॉर्वे का सवाल

भारत में अडानी को लेकर चर्चा का बड़ा हिस्सा नॉर्वे के सॉवरेन वेल्थ फंड द्वारा कथित “गंभीर भ्रष्टाचार या अन्य गंभीर वित्तीय अपराध” के आरोपों के आधार पर अडानी ग्रीन को बाहर किए जाने पर केंद्रित रहा. लेकिन असली महत्व निवेश के आकार का नहीं था. वह संस्थागत संकेत था. नॉर्वे का एक्सक्लूजन फ्रेमवर्क काफी हद तक DOJ और SEC की सक्रिय कार्यवाहियों पर आधारित था, जिसने वैश्विक कंप्लायंस सिस्टम्स को अडानी से जुड़े जोखिम को “उच्च जोखिम” के रूप में वर्गीकृत करने का आधार दिया.

अब वह संदर्भ बदल चुका है. जिस फंड ने वित्तीय अपराध के आरोपों का हवाला देकर निवेश हटाया था, और जो आरोप अब कानूनी रूप से समाप्त हो चुके हैं, उसके सामने अब एक वैध नीति सवाल खड़ा है: क्या यह प्रतिबंध हटेगा? अगर नॉर्वे औपचारिक समीक्षा शुरू करता है, तो दुनिया के सबसे बड़े सॉवरेन वेल्थ फंड पोर्टफोलियो में अडानी की वापसी खुद एक बड़ा वैश्विक बाजार संकेत बन सकती है.

वैश्विक फाइनेंस धीरे चलता है, लेकिन जब जोखिम का गणित बदलता है, तो पैसा उसका पीछा करता है. और अडानी को लेकर जोखिम का यह गणित मई 2026 के एक असाधारण सप्ताह में पूरी तरह और स्थायी रूप से बदल गया.

साथ ही, “जांच के दायरे में होना” और “अछूत होना” इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क है. जांच का मतलब है कि आपको थोड़ा ज्यादा प्रीमियम चुकाना पड़ेगा और रोड शो में कठिन सवालों का सामना करना पड़ेगा. अछूत होने का मतलब है कि आपके कमरे में आते ही लोग बाहर निकल जाएं. 18 महीनों तक अडानी अछूत थे. अब वह दौर खत्म हो चुका है. ट्रंप के अमेरिका में, जहां लेन-देन आधारित पूंजीवाद तेजी से राजनीतिक और आर्थिक रिश्तों को आकार दे रहा है, इसका बिल्कुल अलग महत्व था.

इसके बाद बाजार से एक और संकेत आया. अमेरिकी समझौतों से ठीक पहले, दुनिया के सबसे बड़े एसेट मैनेजर्स में से एक कैपिटल ग्रुप इंटरनेशनल, (लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर की संपत्तियों का प्रबंधन करता है) ने कथित तौर पर सैकड़ों मिलियन डॉलर की बड़ी खरीद के जरिए अडानी पोर्ट्स में निवेश किया. ये घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बड़े संस्थागत निवेशक शायद ही कभी आवेग में कदम उठाते हैं. सॉवरेन फंड्स और ट्रिलियन डॉलर एसेट मैनेजर्स सिर्फ बैलेंस शीट नहीं खरीदते, वे जोखिम का गणित खरीदते हैं. और अडानी को लेकर वही जोखिम गणित अब बदलना शुरू हो चुका है.

इसके बाद जो होगा, वह कोई वापसी की कहानी नहीं है. यह री-रेटिंग है.

DOJ मामले के खत्म होने के असली असर टीवी स्क्रीन या राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखेंगे. वे वैश्विक वित्त की उस मशीनरी के भीतर चुपचाप सामने आएंगे, जहां कंप्लायंस नोट्स, लेंडिंग मॉडल, इंडेक्स क्लासिफिकेशन एल्गोरिद्म और आंतरिक जोखिम आकलन अरबों डॉलर की दिशा तय करते हैं.

बड़े संस्थानों के भीतर कहीं न कहीं भाषा बदलनी शुरू हो चुकी होगी. “सक्रिय DOJ आपराधिक जोखिम” जैसे संदर्भ आंतरिक मेमो से गायब हो सकते हैं. “Avoid” धीरे-धीरे “Review” में बदल सकता है. “High-risk exposure” अब “Re-entry opportunity” जैसा सुनाई देने लगा है.

ग्रीन फाइनेंसिंग के वे रास्ते, जो कानूनी संकट के दौरान राजनीतिक रूप से मुश्किल हो गए थे, फिर से खुल सकते हैं. वे वैश्विक लेंडर्स, जो पहले प्रतिष्ठा संबंधी प्रीमियम मांगते थे, दोबारा प्रतिस्पर्धा शुरू कर सकते हैं. जो रणनीतिक साझेदारियां रुक गई थीं, वे चुपचाप फिर शुरू हो सकती हैं.

पिछले डेढ़ साल तक अडानी को लेकर दुनिया का सबसे बड़ा सवाल बेहद सीधा था:

क्या यह समूह इससे बच पाएगा?

अब वह सवाल शायद पीछे छूट जाए.

नया सवाल यह है:

समूह अब कितनी आक्रामक तरीके से फिर विस्तार कर सकता है?

इस सवाल का जवाब इसलिए अहम है क्योंकि अडानी साम्राज्य भारत की व्यापक आर्थिक महत्वाकांक्षाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है. व्यापार प्रवाह संभालने वाले बंदरगाह, बड़े शहरों को जोड़ने वाले एयरपोर्ट, औद्योगिक विकास को ऊर्जा देने वाले ट्रांसमिशन नेटवर्क, ऊर्जा परिवर्तन को आगे बढ़ाने वाले रिन्यूएबल एनर्जी कॉरिडोर, और मैन्युफैक्चरिंग विस्तार को सहारा देने वाले लॉजिस्टिक्स सिस्टम, ये कोई परिधीय परिसंपत्तियां नहीं हैं. ये भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर भविष्य के केंद्र के बेहद करीब स्थित हैं.

यही वजह है कि अडानी की पूंजी लागत के साथ क्या होता है, इसका महत्व सिर्फ एक अरबपति से कहीं आगे तक जाता है.

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सभी साये खत्म हो गए हैं. हिंडनबर्ग के आरोप अब भी संस्थागत स्मृति में मौजूद हैं. गवर्नेंस को लेकर चिंताएं वैश्विक स्तर पर समूह का पीछा करती रहेंगी. ऑफशोर संरचनाओं, पारदर्शिता और राजनीतिक निकटता को लेकर सवाल खत्म नहीं होने वाले. गंभीर निवेशक बेहतर खुलासों और अधिक साफ-सुथरी गवर्नेंस छवि की मांग जारी रखेंगे. समूह को लेकर राजनीतिक जोखिम की धारणा भी कुछ संस्थागत दायरों में बनी रहेगी.

लेकिन जांच के दायरे में होना और अछूत होना एक जैसी चीजें नहीं हैं:

एक स्थिति अब भी पूंजी तक पहुंच देती है. दूसरी उसका दम घोंट देती है.

और यही बदलाव अब ट्रंप के अमेरिका में गौतम अडानी को लेकर दिखाई दे रहा है. बाजार यह नहीं पूछते कि कोई कारोबारी कभी राजनीतिक रूप से विवादित था या नहीं. वे यह पूछते हैं कि क्या जोखिम की कीमत दोबारा तय की गई है. गौतम अडानी के लिए, वह री-प्राइसिंग अब शुरू हो चुकी है. 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 

 


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