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दुर्लभ अर्थ मैग्नेट की कमी भारत की ऑटो इंडस्ट्री के लिए बड़ा खतरा, जानिए कैसे?
एक रिपोर्ट के अनुसार चीन द्वारा सप्लाई चेन में रुकावट से भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर के उत्पादन और विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago
भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर एक अहम मोड़ पर खड़ा है, जहां इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की ओर तेज़ी से बढ़ते कदमों को अब एक छोटे लेकिन महत्वपूर्ण घटक 'दुर्लभ पृथ्वी मैग्नेट' (Rare Earth Magnet) की आपूर्ति में संकट धीमा कर सकता है. चीन द्वारा लगाए गए नए निर्यात प्रतिबंधों और मंजूरी प्रक्रिया में देरी के चलते भारत में ईवी के उत्पादन और लॉन्च योजनाओं पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. अगर यह बाधा लंबे समय तक बनी रहती है, तो ऑटो इंडस्ट्री की विकास रफ्तार पर गंभीर असर पड़ सकता है, खासकर तब जब देश EV क्रांति की ओर तेजी से बढ़ रहा है. क्रिसिल (CRISIL) ने इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है. आइए जानते हैं रिपोर्ट में क्या है?
45 दिन की देरी और EV प्लान गड़बड़
क्रिसिल द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार दुर्लभ पृथ्वी मैग्नेट जो कम लागत के साथ एक अत्यंत आवश्यक घटक हैं. चीन द्वारा निर्यात प्रतिबंध और शिपमेंट की मंजूरी में देरी जारी रहती है तो, यह भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए एक बड़ा आपूर्ति संकट बन सकते हैं. अगर यह संकट एक महीने से अधिक समय तक चलता है, तो इससे इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की लॉन्चिंग टल सकती है, उत्पादन प्रभावित हो सकता है और पूरे सेक्टर की विकास गति पर असर पड़ सकता है.
ईवी में इस्तेमाल होने वाले परमानेंट मैग्नेट सिंक्रोनस मोटर्स (PMSMs) में ये मैग्नेट मुख्य भूमिका निभाते हैं, जो उच्च टॉर्क, ऊर्जा दक्षता और कॉम्पैक्ट डिज़ाइन प्रदान करते हैं. हाइब्रिड वाहनों की प्रणोदन क्षमता भी इन्हीं मैग्नेट्स पर निर्भर करती है. आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाले वाहनों मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक पावर स्टीयरिंग और अन्य मोटर चालित प्रणालियों में इनका उपयोग सीमित है. अप्रैल 2025 में दुनिया का प्रमुख निर्यातक है चीन ने सात दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और तैयार मैग्नेट्स के निर्यात पर प्रतिबंध लगाते हुए निर्यात लाइसेंस अनिवार्य कर दिया. अब निर्यात के लिए विस्तृत एंड-यूज़ जानकारी और ग्राहक घोषणाएं देनी होती हैं, जिसमें यह पुष्टि शामिल है कि उत्पाद रक्षा में नहीं इस्तेमाल होंगे और अमेरिका को पुनः निर्यात नहीं किए जाएंगे. यह मंजूरी प्रक्रिया कम से कम 45 दिन ले रही है, जिससे अनुमतियों में देरी हो रही है और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ रहा है.
भारत, जो पिछले वित्तीय वर्ष में अपने लगभग 540 टन मैग्नेट आयात का 80% चीन से करता था, अब इस संकट का प्रभाव महसूस करने लगा है. मई 2025 के अंत तक भारतीय कंपनियों द्वारा की गई लगभग 30 आयात अनुरोधों को भारतीय सरकार ने समर्थन दिया था, लेकिन चीनी अधिकारियों से अब तक कोई मंजूरी नहीं मिली, और कोई शिपमेंट भारत नहीं पहुंचा है.
क्रिसिल रेटिंग्स के सीनियर डायरेक्टर अनुज सेठी के अनुसार, “यह आपूर्ति संकट ऐसे समय में आया है जब ऑटो सेक्टर ईवी के आक्रामक लॉन्च की तैयारी में है. 12 से अधिक नए ईवी मॉडल लॉन्च की कतार में हैं, जिनमें से अधिकांश PMSM प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं. भले ही ऑटो निर्माता फिलहाल 4-6 हफ्ते की इन्वेंट्री रखते हैं, लेकिन अगर देरी लंबी खिंचती है, तो जुलाई 2025 से उत्पादन पर असर दिखने लगेगा."
वित्तीय वर्ष 2026 में घरेलू पैसेंजर वाहन (PV) वॉल्यूम में 2-4 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद है, जबकि इलेक्ट्रिक PV में 35-40% तक की तेज वृद्धि हो सकती है (हालांकि कम आधार पर). इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों (2W) की वृद्धि दर ~27% रहने की संभावना है, जो कि पारंपरिक 2W की 8-10% वृद्धि से अधिक है. लेकिन अगर सप्लाई में कड़ाई बनी रही, तो यह रफ्तार धीमी हो सकती है , खासकर ईवी सेगमेंट में इसका बुरा असर पड़ेगा.
कोविड-19 महामारी के दौरान, दुर्लभ पृथ्वी मैग्नेट की आपूर्ति स्थिर रही थी, जबकि सेमीकंडक्टर्स की नहीं, जिससे ऑटो कंपनियों में ‘जस्ट-इन-टाइम’ इन्वेंट्री पर भरोसा बढ़ा. परंतु जहां सेमीकंडक्टर्स के लिए वैश्विक सप्लाई बेस विविध है, वहीं 90 प्रतिशत से अधिक मैग्नेट प्रसंस्करण केवल चीन में केंद्रित है.
क्रिसिल रेटिंग्स की डायरेक्टर पूनम उपाध्याय कहती हैं, “दुर्लभ पृथ्वी मैग्नेट की कमी ऑटो कंपनियों को सप्लाई चेन रणनीति पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर रही है. वाहन की कुल लागत में यह घटक भले ही 5% से कम हो, लेकिन ईवी मोटर्स और इलेक्ट्रिक स्टीयरिंग सिस्टम्स के लिए यह अनिवार्य है."
कई निर्माता अब वियतनाम, इंडोनेशिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से बातचीत कर रहे हैं, जबकि मौजूदा स्टॉक का अधिकतम उपयोग करने की रणनीति भी अपनाई जा रही है. लंबे समय तक यदि संकट बना रहता है, तो ICE मॉडल्स को वरीयता दी जा सकती है, जो कम मैग्नेट उपयोग करते हैं — इससे ईवी वृद्धि और अधिक प्रभावित हो सकती है.
सरकार और वाहन निर्माता दो मोर्चों पर काम कर रहे हैं —
1. अल्पकालिक उपायों में रणनीतिक इन्वेंट्री बनाना, वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति सुनिश्चित करना और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के तहत घरेलू असेंबली तेज करना शामिल है.
2. दीर्घकालिक रणनीति में दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की खोज, घरेलू उत्पादन क्षमता का निर्माण और रीसाइक्लिंग अवसंरचना में निवेश प्रमुख होंगे.
इस समय चीन की निर्यात मंजूरियों की रफ्तार इस संकट का प्रमुख संकेतक बनी हुई है. सप्लाई स्रोतों के विविधीकरण और सरकारी प्रयासों के समन्वय से भारतीय ऑटो उद्योग इस चुनौती का समाधान खोजने की कोशिश में है.
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