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क्या पूरी तरह लदने वाले हैं डीजल कारों के दिन? सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
डीजल वाहनों को लेकर लोगों का क्रेज कम होता जा रहा है. पहली तिमाही में डीजल से ज्यादा CNG वाले यात्री वाहनों की बिक्री हुई है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
एक जमाना था जब डीजल इंजन वाले वाहनों का बाजार में दबदबा था, लेकिन अब तस्वीर काफी हद तक बदल गई है. मेकर से लेकर बायर्स तक डीजल व्हीकल्स का क्रेज तेजी से घट रहा है. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश में कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस यानी CNG वाले यात्री वाहनों की बिक्री ने डीजल वाहनों को पीछे छोड़ दिया है. अब तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि डीजल से ज्यादा CNG वाले वाहनों की बिक्री हुई है.
इस वजह से हुआ इजाफा
एक रिपोर्ट बताती है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के दौरान कुल 10.3 लाख पैसेंजर व्हीकल्स बेचे गए. इनमें 1,89,699 (18.49%) सीएनजी और 1,88,868 (18.41%) डीजल वाहन थे. CNG वाहनों को अधिक पसंद किए जाने की कई वजह हैं. जैसे कि सीएनजी स्टेशनों की संख्या में वृद्धि और CNG फिटेड कारों के बूट स्पेस में पहले की अपेक्षा अधिक जगह. टाटा मोटर्स ने दो सिलेंडर वाली CNG गाड़ी पेश करके बूट स्पेस को पहले से अधिक कर दिया है.
CNG में मारुति आगे
ऑटोमोबाइल बाजार में सीएनजी की हिस्सेदारी जून 2023 के 13.63% के मुकाबले जून 2024 में बढ़कर 18.5% हो गई है. CNG गाड़ियां बेचने के मामले में फिलहाल मारुति सुजुकी सबसे आगे है. कंपनी इस कैटेगरी में 70 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी रखती है. तिमाही के दौरान मारुति द्वारा घरेलू बाजार में बेची गई हर तीन कारों में से एक सीएनजी थी. बता दें कि हाल ही में हुंडई मोटर इंडिया ने आई 10 निओस को डबल सिलेंडर के साथ उतारा है, जिसकी शुरुआती कीमत 7.75 लाख रुपए है.
खास फायदा नहीं मिलता
अब डीजल वाहनों की बात करें, इनकी बिक्री के आंकड़े पिछले कुछ समय से नीचे की तरफ जाते दिखाई दे रहे हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ साल पहले तक देश के ऑटो मार्केट में डीजल कारों की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा थी, यानी पेट्रोल से ज्यादा डीजल गाड़ियां खरीदी जाती थीं. लेकिन अब यह 20 फीसदी से भी नीचे आ गई है. डीजल कारों के क्रेज में कमी की तमाम वजह हैं, जिसमें सबसे पहली है पेट्रोल-डीजल की कीमतों में घटता अंतर. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने से पहले तक पेट्रोल और डीजल की कीमतें इतनी ज्यादा नहीं थीं. इसके अलावा, दोनों की कीमतों में अंतर भी ज्यादा था. यानी डीजल सस्ता था और पेट्रोल महंगा. अब दोनों में कोई खास अंतर नहीं रह गया है.
बढ़ती जा रही है लागत
डीजल कारों की मेंटनेंस पेट्रोल वाहनों की तुलना में ज्यादा रहती है. कम कीमत और ज्यादा एवरेज के चलते लोग डीजल कारों को पसंद किया करते थे, अब जब दोनों की कीमतों में कोई खास अंतर रहा नहीं है, तो लोग लो-मेंटनेंस वाली पेट्रोल गाड़ियों को तवज्जो दे रहे हैं. इसके अलावा, एनवायरनमेंट को लेकर की जा रही सख्ती ने भी डीजल वाहनों के मार्केट को प्रभावित किया है. एक तरफ जहां, BS एमिशन नॉर्म्स के अनुरूप डीजल इंजन बनाने की लागत पेट्रोल की तुलना में ज्यादा हो गई है. इसकी वजह से डीजल व्हीकल्स और भी ज्यादा महंगे हो गए हैं. इसके अलावा, दिल्ली-NCR में 10 साल से अधिक पुरानी डीजल कारों पर प्रतिबंध है. इस फैसले ने नई डीजल कार खरीदने के लोगों के फैसले को प्रभावित किया है. पुरानी कारों की रीसेल वैल्यू भी घट गई है.
कई कंपनियों ने की तौबा
डीजल कारें न बायर्स के लिए फायदे का सौदा रह गई हैं और न ही कंपनियों के लिए, इसलिए उनका प्रोडक्शन कम हो रहा है. इतना ही नहीं, कई कंपनियों ने डीजल वैरिएंट बनाने बंद कर दिए हैं. इसमें देश की सबसे बड़ी कार निर्माता मारुति सुजुकी भी शामिल है. कंपनी की नई ग्रैंड विटारा ब्रेजा केवल पेट्रोल और CNG में उपलब्ध है. इसी तरह, कई दूसरी कंपनियों ने भी भारत में डीजल कार बनाना बंद कर दिया है. टाटा अब कम क्षमता वाले डीजल इंजन पर काम नहीं कर रही है. 2012-13 में पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में डीजल के वाहनों की हिस्सेदारी करीब 54 फीसदी थी, जो आज घटकर 18% के आसपास रह गई है. आने वाले समय में इसमें और गिरावट देखने को मिल सकती है.
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