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भारत जोड़ो यात्रा से राजनीतिक समर में उतरे राहुल गांधी चुनावी राज्यों से दूर क्यों रहे?

राहुल गांधी और कांग्रेस दो मोर्चे पर अलग-अलग लड़ाई लड़ रहे हैं. राहुल गांधी दीर्घकालिक वैचारिक स्तर पर... जिसे हम ब्रैंड में छवि गढ़ना कहते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • प्रकाश नारायण सिंह, पॉलिटिकल एनालिस्ट

सियासत में जीत मायने रखती है, इसके बाद बाकी बातें नेपथ्य में चली जाती हैं. सत्ता के शिखर तक पहुंचना ही आज के राजनीतिज्ञों का आखिरी उद्देश्य है. आज आलम यह है कि राजनीतिक संग्राम में सियासी षडयंत्रों को मेन स्ट्रीम मीडिया मास्टर स्ट्रोक कह रही है. ऐसा क्यों हो रहा है? चुनाव में मुद्दे अब आम आदमी से जुड़े नहीं रहते हैं, ऐसा क्यों? क्या यह उदारवाद के बाद ऐसा हुआ है जब व्यवस्था से आम आदमी के मुद्दे गायब हो गये हों? चुनाव में पैसों की खपत बढ़ने के बाद क्या बदला है? ये चंद ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर में व्यवस्था के खुराफात छुपे हैं.

यह दावा करते हैं राहुल गांधी

चलिए बृहद चर्चा इस पर फिर कभी लेकिन साधारण शब्दों में कहें तो बड़े राजनीतिक घराने, उद्योगपति, लॉबिस्ट और इलीट क्लास मीडिया यह सभी मिलकर आम आदमी के मुद्दे गोल कर देते हैं. इतना ही नहीं आम आदमी को आज यहां तक समझाने में सफल हो गए हैं कि सियासत में आम आदमी का हिस्सा सिर्फ वोट देने तक सीमित है. आम आदमी भी आज यही समझ रहा है कि राजनीति में उसका योगदान सिर्फ वोट देने तक है. व्यवस्था के इसी बुने जाल को कुतरने का दावा कर रहे हैं राहुल गांधी. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी के दिये बयानों की विवेचना करने पर स्पष्ट हो रहा है कि राहुल गांधी चुनावी सफलता या असफलता के आगे कुछ करना चाहते हैं.

मीडिया पर राहुल गांधी के बयान के मायने
राहुल गांधी ने कहा कि 'जब मैं राजनीति में आया तो देश का सारा मीडिया 2008-09 तक 24 घंटे मेरे लिए 'वाह, वाह' करता था. आपको याद है? फिर मैंने दो मुद्दे उठाए और सब कुछ बदल गया.' राहुल गांधी ने कहा कि 'आपको याद है? राजनीति में प्रवेश करते ही मैंने दो मुद्दे उठाए. एक था नियमगिरी और दूसरा मुद्दा भट्टा पारसौल का था, मैंने गरीबों की बात की. जब मैंने जमीन पर गरीबों के अधिकारों की रक्षा की बात की तो मीडिया का तमाशा शुरू हो गया. हम आदिवासियों के लिए पेसा कानून और उनके भूमि अधिकार के लिए नए कानून लाए. ठीक इसके बाद मीडिया ने 24 घंटे मेरे विरोध में लिखना शुरू कर दिया.' दरअसल राहुल गांधी मीडिया के कंधे पर बंदूक रखकर कॉर्पोरेट कांस्पीरेसी थ्योरी की तरफ इशारा कर रहे हैं. इस बयान से स्पष्ट होता है कि व्यवस्था आम लोगों को मजबूत करने के बजाए खास को तवज्जो देने में जुटा रहता है. वह आम लोगों  

राहुल गांधी के महाराष्ट्र में सावरकर पर बयान के मायने
महाराष्ट्र में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी सावरकर के माफीनामे का जिक्र करते हैं. इस पर महाराष्ट्र की सभी पार्टियों की तीखी प्रतिक्रिया आती है. कांग्रेस के साथ गठबंधन में शामिल शिवसेना भी इस बयान पर कड़ा रूख दिखाती है. महाराष्ट्र में आखिर राहुल गांधी ने सावरकर पर क्यों बोला? अपने गठबंधन को खतरे में डालने से परहेज नहीं किये, क्यों? इसी सवाल के उत्तर में छुपी है राहुल गांधी की सोच. दरअसल राहुल गांधी देश की जनता के सामने अपनी वैचारिक स्थिति को रखना चाहते हैं. सत्ता के लिए विचार से समझौता से इनकार करने का दावा करते दिखना चाह रहे हैं.

राम व सियाराम के बीच सियासी संदेश 
कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि बीजेपी और आरएसएस ने नारे से सीता को परे कर दिया है. भगवान राम की भावना यह लोग नहीं मानते हैं, इसीलिए हिंसा और नफरत फैला रहे हैं. उन्होंने कहा कि काफी पहले एक नारा हुआ करता था जो पूरे देश में चलता था जय सियाराम यानी, सीता के बिना राम नहीं और राम के बिना सीता नहीं, लेकिन अपने नारे से आरएसएस वालों ने सीता माता को निकाल दिया. केवल श्रीराम कहते हैं. राम सबका आदर करते थे, वह नफरत किसी से नहीं करते थे. राहुल ने कहा राम ने केवल प्यार की बात की थी. भाईचारे, इज्जत की बात की थी. नफरत और हिंसा की बात नहीं की थी. अब इस तरह राहुल गांधी आरएसएस और बीजेपी को महिला विरोधी के साथ रघुकुल रीत के खिलाफ रहने होने का आरोप चस्पा दिया. 

अलग-अलग लड़ाई 
अब इन बयानों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि राहुल गांधी और कांग्रेस दो मोर्चे पर अलग-अलग लड़ाई लड़ रहे हैं. राहुल गांधी दीर्घकालिक वैचारिक स्तर पर... जिसे हम ब्रैंड में छवि गढ़ना कहते हैं. राहुल गांधी अपनी छवि जनसरोकार के साथ ही साथ वैचारिक दृढ़ता की बना रहे हैं. साथ ही आरएसएस और बीजेपी की जनविरोधी व उद्योगपतियों की हितैषी गढ़ रहे हैं. दूसरी तरफ कांग्रेस को मल्लिकार्जुन खड़गे के हवाले कर संगठन व चुनावी दांवपेंच की जिम्मेदारी दे चुके हैं.

इस यात्रा से राहुल गांधी को सियासी संजीवनी?
1. चुनावी संग्राम से दूर राहुल को 2024 की बड़ी लड़ाई में इस यात्रा का लाभ मिल सकता है. G23 विवाद के बाद नेतृत्व पर उठ रहे सवाल ठहर गये. 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव हार के साथ 2014 से 2022 के बीच हुए 49 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 39 विधानसभा चुनाव हार चुकी है. ऐसे में हाईकमान पर सवाल उठा. पार्टी के अंदर ब्रैंड राहुल अब सर्वमान्य और सर्वोच्च सवालों से परे हो गये.

2. राहुल गांधी पर उनकी पार्टी के अंदर के साथ ही विपक्ष लगातार 24 घंटे सियासत में शामिल ना रहने का आरोप लगाते रहे हैं. कई ऐसे बेहद महत्वपूर्ण मौके आए जिस वक्त राहुल गांधी अनुपस्थिति रहे थे. हजारों किलोमीटर पैदल चलकर राहुल गांधी खुद को मेहनती, 24 घंटे सियासत में संलग्न, गंभीर और सर्वसुलभ दिखना चाह रहे हैं. आम से खास तरह के लोगों के साथ मिलते हुए राहुल गांधी की रोज तस्वीरें मीडिया में कांग्रेस द्वारा पेश की जा रही हैं. 

3. कार्यकर्ताओं को यूनाइट करने के साथ ही इनको स्थानीय पार्टी के भीतर की गुटबाजी और स्थानीय असली मुद्दों से भी रूबरू होने का मौका मिल रहा है. हर वक्त सफलता के शिखर में पले पढ़े राहुल गांधी के लिए यह अनुभव सर्वश्रेष्ठ साबित होगा.

4. 2024 में तीसरे मोर्चे को बनने से रोकने में भी राहुल गांधी सफल होंगे. जिस तरह चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी  खुद को विकल्प के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से आगे कर रहे हैं ऐसे में इस यात्रा से थोड़ा दबाव बढ़ेगा. 

5. यदि यह यात्रा बड़ी लकीर खींच दी तो राहुल गांधी यूपीए के सहयोगी दलों पर 2024 में गठबंधन के दौरान सीटों के बंटवारे पर दबाव में नहीं आएंगे.

वैसे हर राजनेता दो मोर्चों पर लड़ता है, पहला-वैचारिक दूसरा अपने दल को सियासत के शिखर पर पहुंचाने के लिए. राहुल गांधी भी अभी इसी सफर पर हैं.


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