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क्यों बढ़ा एफडी का चलन? सेविंग्स डिपॉजिट में आई बड़ी गिरावट

एफडी की ओर बढ़ता झुकाव बताता है कि ग्राहक अब ज्यादा जागरूक और रिटर्न-फोकस्ड हो चुके हैं. आने वाले महीनों में यदि ब्याज दरें और घटती हैं, तो एफडी का यह ट्रेंड और तेज हो सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago

बैंकिंग सेक्टर में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है, लोग सेविंग्स अकाउंट का पैसा निकालकर बड़े पैमाने पर फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में लगाने लगे हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की लगातार रेपो रेट कटौती और आगे दरों में और गिरावट की उम्मीद ने ग्राहकों को मौजूदा ऊंची ब्याज दरें लॉक करने की ओर प्रेरित किया है. इसका नतीजा यह है कि कुल बैंक डिपॉजिट में एफडी की हिस्सेदारी दो साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है.

एफडी की हिस्सेदारी बढ़ी, सेविंग्स डिपॉजिट में गिरावट

आरबीआई के सितंबर 2025 तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि फिक्स्ड डिपॉजिट की हिस्सेदारी बढ़कर 62% हो गई है, जो मार्च 2023 में 57% थी. इसके उलट, सेविंग्स अकाउंट की हिस्सेदारी 33% से घटकर 29% पर आ गई है, जिससे साफ है कि जमाकर्ता उच्च ब्याज दरों को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं.

दरें गिरने से पहले ब्याज लॉक करना बन रहा पहली पसंद

फिलहाल निवेशकों के सामने सबसे बड़ी वजह यह है कि वे भविष्य में ब्याज दरों में संभावित गिरावट से पहले ऊंची दर पर एफडी करा लेना चाहते हैं. RBI इस साल अब तक रेपो रेट में 1% कटौती कर चुका है और माना जा रहा है कि आगे भी दरों में कमी संभव है. ऐसे में ग्राहकों को लगता है कि अभी एफडी कराने पर बेहतर रिटर्न मिल सकता है.

बढ़ती जागरूकता और डिजिटल बैंकिंग से ट्रेंड तेज

फेडरल बैंक के कंज्यूमर बैंकिंग हेड विराट दीवानजी के मुताबिक, जून और सितंबर 2025 की तिमाही में टर्म डिपॉजिट में बड़ी तेजी देखी गई. डिजिटल बैंकिंग के प्रसार ने भी भूमिका निभाई है, ग्राहक ऐप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आसानी से तुलना कर पा रहे हैं कि किस बैंक में ज्यादा ब्याज मिल रहा है.

बैंकों की कैश क्रंच ने एफडी रेट्स बनाए आकर्षक

2024 से 2025 की शुरुआत तक बैंकों को तरलता की कमी का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उन्होंने एफडी रेट्स बढ़ाए. TMB के एमडी एवं सीईओ सली नायर बताते हैं कि लोन की डिमांड डिपॉजिट की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ रही थी. इसलिए बैंकों ने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए स्पेशल एफडी स्कीम्स और ऊंचे ब्याज दरें पेश कीं. साथ ही, शेयर बाजार में तेजी आने से SIP और म्यूचुअल फंड में भारी निवेश हुआ, जिसने सेविंग्स अकाउंट में पैसे के आवागमन को और कम कर दिया.

बैंकों की बढ़ी चिंता: मुनाफे पर दबाव

सेविंग्स अकाउंट पर बैंक 2–3% ब्याज देते हैं, जबकि एफडी पर 7–8% तक ब्याज चुकाना पड़ता है. एफडी की बढ़ती हिस्सेदारी से बैंकों की लागत बढ़ रही है, जिससे उनकी नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर दबाव पड़ रहा है.

एफडी रेट घटाने में क्यों हिचकिचा रहे बैंक?

फरवरी 2025 से रेपो रेट में कुल 100 बेसिस पॉइंट की कटौती हो चुकी है, मगर इसके बावजूद एफडी रेट्स बहुत कम नहीं हुए हैं. बैंकर्स का कहना है कि बढ़ती लोन मांग और तरलता बनाए रखने के लिए उन्हें लगातार डिपॉजिट की जरूरत है. ऐसे में वे एफडी रेट्स में कटौती करने से बच रहे हैं.

महत्वपूर्ण आंकड़े एक नजर में

1. 62% – सितंबर 2025 में कुल डिपॉजिट में एफडी की हिस्सेदारी
2. 57% – मार्च 2023 में एफडी की हिस्सेदारी
3. 29% – सितंबर 2025 में सेविंग्स अकाउंट का योगदान
4. 33% – मार्च 2023 में सेविंग्स अकाउंट की हिस्सेदारी
5. 36% – प्राइवेट बैंकों में एफडी की हिस्सेदारी (जून 2023 के 33% से बढ़कर)
6. 58% – सरकारी बैंकों की एफडी हिस्सेदारी (61% से नीचे)

 


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