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जानते हैं संपत्ति की बिक्री पर कैसे होती है टैक्‍स की गणना? 

किसी भी संपत्ति को कई सालों तक रखने के बाद उसे बेचने पर होने वाले लाभ पर टैक्‍स की गणना में कई कारक अहम होते हैं. उन सभी की जानकारी होना जरूरी है. 

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

क्‍या बीते हुए साल में आपने अपनी कोई ऐसी प्रॉपर्टी बेची है जिसे आपने कई साल पहले खरीदा था. अगर ऐसा है तो आपको उस पर टैक्‍स देना होगा. पहली नजर में ऐसी डील पर टैक्‍स काउंट जितना आसान होता है वास्‍तव में वो उतना आसान होता नहीं है. हालांकि आप उस पर अपने लाभ को तुरंत काउंट कर सकते हैं. उसमे पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन) की गणना के कुछ नियम हैं. इन्‍हें गहराई से जानना जरूरी है. 

उस प्रॉपर्टी पर आपके स्‍वामित्‍व की अवधि 
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऐसे मामलों में पूंजीगत लाभ की गणना के अपने कुछ नियम हैं. इनमें सबसे अहम होता है कि आपने वो प्रॉपर्टी ली कब है और कितने साल बाद आपने उसे किसी को बेच दिया. आपने उस प्रॉपर्टी को अपने पास कितने साल के लिए रखा. वो समय महत्‍वपूर्ण होता है. कर विभाग रियल एस्टेट सहित विभिन्न पूंजीगत संपत्तियों के लिए अलग-अलग टाइम पीरियड बांटा गया है. विशेष रूप से, आवासीय प्रॉपर्टी के संदर्भ में, यदि बिक्री के समय आपके द्वारा उस प्रॉपर्टी को रखे जाने का समय 24 महीने से कम है, तो लेनदेन से प्राप्त प्रॉफिट को अल्पकालिक पूंजीगत लाभ (एसटीसीजी) कहा जाता है. दूसरी ओर, ये समय 24 महीने से अधिक है, तो लाभ को दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) के रूप में बांटा गया है. 

अधिग्रहण की लागत क्‍या रही 
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जब कभी भी अचल संपत्ति की बिक्री पर पूंजीगत लाभ की गणना की जाती है उस समय अधिग्रहण की लागत महत्‍वपूर्ण होती है. आयकर नियमों के अनुसार, किसी संपत्ति के अधिग्रहण की लागत उसे कहा जाता है जिस पर बायर ने वास्‍तव में उस प्रॉपर्टी को खरीदा है. इसमें प्रॉपर्टी टाइटल से लेकर उसे खरीदने में किए गए दूसरे प्राकृतिक खर्चे शामिल हैं. उदाहरण के लिए, संपत्ति खरीदते समय, संपत्ति को कानूनी रूप से आपके नाम पर स्थानांतरित करने के लिए स्टांप शुल्क,  रजिस्‍ट्री चार्ज और ट्रांसफर चार्ज (हस्तांतरण शुल्क) जैसे अतिरिक्त खर्च किए जाते हैं. इन खर्चों को अधिग्रहण की लागत का हिस्सा माना जाता है. अन्य लागत जैसे ब्रोकरेज शुल्क और कानूनी शुल्क को भी अधिग्रहण की कुल लागत में जोड़ा जा सकता है.

अगर संपत्ति निर्माणाधीन है तो उसे खरीदने में लगने वाले जीएसटी को भी अधिग्रहण की लागत निर्धारित करने में इस्‍तेमाल किया जा सकता है. यही नहीं प्रॉपर्टी को खरीदने से लेकर रहने योग्‍य बनाने में होने वाले खर्च को भी इसमें जोड़ा जाता है. जबकि घर का फर्नीचर और घर को सुंदर बनाने में किया गया खर्च इसमें शामिल नहीं होता है.  इसके अलावा, यदि आपने संपत्ति के अधिग्रहण के लिए पैसा जुटाने में लोन लिया है तो उसका ब्‍याज भी अधिग्रहण की लागत के हिस्से के रूप में शामिल होने के योग्य हो सकता है, बशर्ते आपने पहले से ही पिछली कर में कटौती के रूप में इसका दावा नहीं किया हो. 

मुद्रास्‍फीति भी है एक बड़ा कारण 
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार महंगाई को ध्‍यान में रखते हुए अधिग्रहण की लागत को काउंट करना अपने आप में महत्‍वपूर्ण. इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि अगर कोई प्रॉपर्टी आपके दादा ने 100 रुपये में खरीदी और आज उसकी कीमत बढ़ गई है. ऐसे में इसका मूल्‍य काफी बढ़ जाएगा. बिक्री और लागत के बीच का अंतर जितना ज्‍यादा होगा टैक्‍स उतना ही ज्‍यादा देना होगा. ऐसे में सरकार की ओर से करदाताओं को राहत प्रदान करने के लिए, लागत मुद्रास्फीति सूचकांक (सीआईआई) का उपयोग करने की सुविधा देती है.

सरकार हर साल सीआईआई नंबर घोषित करती है, जिससे आपकी लागत मूल्य कृत्रिम रूप से बढ़ जाता है. सीआईआई मुद्रास्फीति को ध्यान में रखने में मदद करता है और बिक्री और लागत मूल्यों के बीच अंतर को कम करता है. नतीजतन, यह समायोजन आपकी कर देनदारी, विशेष रूप से पूंजीगत लाभ कर को कम करता है.

कैसे होती है सीआईआई की गणना 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मान लीजिए किसी शख्‍स ने 2013-14 में 31 लाख रुपये में घर खरीदा और 2022-23 में इसे 50 लाख रुपये में बेच दिया. अधिग्रहण लागत की गणना करने के लिए, 2013-14 और 2022-23 के लिए www.incometaxindia.gov.in पर जाकर सीआईआई मूल्यों का पता लगाएं. खरीद और बिक्री के वर्षों के लिए सीआईआई क्रमशः 220 और 331 है तो, अधिग्रहण की अनुक्रमित लागत 51,60,423 रुपये [31,00,000 x (220/331)] होगी. ऐसे में उसकी दीर्घकालिक पूंजी हानि (LTCL) 1,60,423 रुपये (50,00,000 - 51,60,423) होगी. तो शुरू में जो 19 लाख रुपये का महत्वपूर्ण लाभ प्रतीत होता था, वह मुद्रास्फीति के मुकाबले समायोजन के बाद घाटे का सौदा बन गया. 
 


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