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Primus Partners रिपोर्ट का दावा, सिंधु घाटी सभ्यता से हो सकता है मॉडर्न अर्बन प्लानिंग का हल
भारत में शहरीकरण की दर 2011 में 31% थी, जो 2036 तक बढ़कर अनुमानित 40% हो सकती है. इस तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण से मौजूदा बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव पड़ा है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अगर भारत अपने शहरों की योजना बनाने में सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) के तरीके अपनाए, तो कई आधुनिक शहरी समस्याओं का समाधान हो सकता है. यह रिपोर्ट, जिसे कंसल्टिंग फर्म Primus Partners ने तैयार किया है, का शीर्षक है ‘प्राचीन ज्ञान की वापसी: भारत में आधुनिक शहरी योजना के लिए सिंधु घाटी सभ्यता से सबक’ (Reviving Ancient Wisdom: Lessons from the Indus Valley Civilization for Modern Urban Planning in India). इसमें कहा गया है कि अगर इन पुराने तरीकों को अपनाया जाए, तो शहरों के बेतरतीब फैलाव (urban sprawl) को 25% तक कम किया जा सकता है.
भारत में शहरी जनसंख्या 2036 तक 600 मिलियन (60 करोड़) तक पहुंचने की संभावना है, और शहर देश की 75% GDP (कुल आर्थिक उत्पादन) में योगदान देंगे. इसलिए, इस रिपोर्ट में अच्छी योजना और संरचना की जरूरत पर जोर दिया गया है ताकि इस तेज़ी से बढ़ती आबादी को सही तरीके से संभाला जा सके.
भारत में शहरीकरण की दर 2011 में 31% थी, जो 2036 तक बढ़कर 40% हो सकती है. इस तेजी से बढ़ते शहरीकरण की वजह से बुनियादी सुविधाओं पर भारी दबाव पड़ रहा है, जिससे घर की कमी, गंदगी की समस्या और पर्यावरण से जुड़े खतरे बढ़ रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, शहरी इलाकों का अनियंत्रित फैलाव चिंता का विषय है और इसे रोकने के लिए सिंधु घाटी सभ्यता के शहरी नियोजन (urban planning) से सीखे गए तरीके कारगर हो सकते हैं.
मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे प्राचीन शहर ग्रिड (सीधी रेखाओं) में बने होते थे, जहां रहने के और सार्वजनिक स्थानों के लिए स्पष्ट रूप से अलग-अलग क्षेत्र होते थे. इनके पास बेहतरीन जल प्रबंधन प्रणाली थी, जिसमें हर मोहल्ले के लिए सामूहिक कुएं और भूमिगत नालियां होती थीं, जो गंदे पानी को ठीक से बाहर निकालती थीं. रिपोर्ट में कहा गया है कि आधुनिक शहरी सुविधाओं में भी ऐसे तरीकों को अपनाया जाए, जिससे संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG) 6, यानी साफ पानी और स्वच्छता की सुविधा सबके लिए उपलब्ध कराने का लक्ष्य हासिल किया जा सके.
अध्ययन में यह भी बताया गया है कि विकास में मानकीकरण (standardisation) की अहम भूमिका होती है. रिपोर्ट के अनुसार, जिन शहरों में स्पष्ट नियम और योजनाएं होती हैं, वहां शहरी मानकों का पालन 30% बेहतर होता है. इससे बेहतर शासन और बुनियादी ढांचे का प्रबंधन संभव हो सकता है.
इसके अलावा, भारत ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स (Global Climate Risk Index) में सातवें स्थान पर है, जो यह दर्शाता है कि भारत जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है. रिपोर्ट में जलवायु के अनुकूल शहरी नियोजन (climate-resilient planning) पर जोर दिया गया है. सिंधु घाटी सभ्यता में जलवायु के अनुसार निर्माण सामग्री और टिकाऊ (sustainable) शहरी ढांचे का उपयोग किया जाता था, जिसे आधुनिक भारतीय शहरों में पर्यावरणीय जोखिम कम करने के लिए अपनाया जा सकता है.
हालांकि शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन भारतीय शहर रहने की गुणवत्ता (liveability) के वैश्विक स्तर पर पिछड़ रहे हैं. ग्लोबल लाइवेबिलिटी इंडेक्स (Global Liveability Index) के टॉप 100 शहरों में कोई भी भारतीय शहर शामिल नहीं है. भारत में सबसे ऊंची रैंकिंग वाले शहर बेंगलुरु की "Ease of Living Index" पर स्कोर सिर्फ 66.7 है, जिसे आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (Ministry of Housing and Urban Affairs) ने विकसित किया है. रिपोर्ट का कहना है कि इसका मुख्य कारण बिना योजना के शहरी विस्तार और कमजोर बुनियादी ढांचा है.
अध्यान में कई सिफारिशें (recommendations) दी गई हैं, जैसे कि शहरी योजनाओं को संरचित (structured) तरीके से तैयार करना ताकि ट्रैफिक की समस्या हल हो सके, नालियों और ड्रेनेज सिस्टम को सुधारना ताकि स्वच्छता बेहतर हो, सार्वजनिक हरे-भरे क्षेत्र बढ़ाना ताकि जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो, और जलवायु के अनुकूल निर्माण (climate-conscious building practices) अपनाना ताकि ऊर्जा की खपत कम हो। रिपोर्ट का कहना है कि ये उपाय भारतीय शहरों को अधिक कुशल और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार बना सकते हैं.
रिपोर्ट की सह-लेखिका आरती हरभजनका ने कहा कि प्राचीन शहरी योजनाओं को समझकर, आधुनिक शहरों को अधिक टिकाऊ (sustainable) बनाया जा सकता है. एक और सह-लेखक संदीप रेड्डी ने बताया कि प्राचीन शहरों की सुव्यवस्थित योजना से आधुनिक शहरी समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है.
यूरोपीय संघ (EU) और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने पहले भी सुझाव दिया था कि तेजी से बढ़ते शहरों में जीवन की गुणवत्ता और स्थिरता बढ़ाने के लिए योजनाबद्ध शहरी विकास जरूरी है. भारत में शहरी आबादी लगातार बढ़ रही है, इसलिए सुनियोजित विकास रणनीति (strategic approach to development) अपनाना बेहद ज़रूरी है.
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