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भारत का नेट-जीरो रोडमैप: पवन ऊर्जा में 25% हिस्सेदारी जरूरी

पवन ऊर्जा न केवल भारत के लिए सस्ती और सतत ऊर्जा का स्रोत है, बल्कि यह भारत को वैश्विक स्तर पर ग्रीन एनर्जी सप्लायर के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखती है.

रितु राणा 8 months ago

भारत में हरित ऊर्जा की दिशा में पवन ऊर्जा को एक अहम आधार माना जा रहा है. हालिया वैश्विक और राष्ट्रीय आकलनों से संकेत मिले हैं कि भारत 2030 तक न केवल 100 गीगावॉट के लक्ष्य को पार कर सकता है, बल्कि 150 गीगावॉट से अधिक क्षमता हासिल करने की दिशा में अग्रसर है. इसी संदर्भ में मंगलवार को ग्लोबल विंड एनर्जी काउंसिल (GWEC) ने नई दिल्ली में "विंड एट द कोर: ड्राइविंग इंडियाज़ ग्रीन एम्बिशन्स एंड इंटरनेशनल इनफ्लुएंस" शीर्षक से अपनी ताजा रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट के अनुसार, भारत की स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 2030 तक 51 गीगावॉट से बढ़कर 107 गीगावॉट तक पहुंच सकती है. इस अवसर पर नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी भी मौजूद रहे.

संतोष कुमार सारंगी ने जानकारी देते हुए कहा केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने भी अपने संशोधित आकलन में कहा है कि भारत 2030 तक लगभग 152 गीगावॉट पवन ऊर्जा क्षमता हासिल कर सकता है. वहीं, अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां इस क्षमता को 121 गीगावॉट से 164 गीगावॉट के बीच आंक रही हैं. यह संकेत है कि भारत अपनी हरित ऊर्जा मांग को समय से पहले पूरा कर सकता है.

नेट-जीरो लक्ष्य में पवन ऊर्जा की निर्णायक भूमिका

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. इसका अर्थ है कि देश अपने कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को इतनी ही मात्रा में कम करेगा या संतुलित करेगा जितना वह अवशोषित कर सके. इस दिशा में पवन ऊर्जा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है. संतोष कुमार सारंगी के अनुसार भारत को यह लक्ष्य हासिल करना है तो नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की टोकरी में पवन ऊर्जा का योगदान कम से कम 20-25% होना चाहिए. पवन ऊर्जा की यह हिस्सेदारी इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि केवल सौर ऊर्जा के आधार पर नेट-जीरो लक्ष्य को प्राप्त करना संभव नहीं है. सौर ऊर्जा दिन के समय ही उपलब्ध होती है, जबकि सुबह और शाम के पीक आवर्स तथा रात के समय पवन ऊर्जा उत्पादन अधिक रहता है. इस पूरक संबंध (Complementarity) के कारण पवन और सौर ऊर्जा का संयुक्त उपयोग एक संतुलित और विश्वसनीय ऊर्जा मिश्रण (Balanced Energy Mix) तैयार करता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नवीकरणीय ऊर्जा में पवन की हिस्सेदारी कम हुई तो भारत को अपने नेट-जीरो पथ पर अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ेगी, जिससे ऊर्जा की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसके विपरीत, पवन ऊर्जा का विस्तार न केवल सस्ती बल्कि स्थायी और राउंड-द-क्लॉक ग्रीन एनर्जी उपलब्ध कराने में मदद करेगा.

यही कारण है कि नीति आयोग से लेकर ऊर्जा मंत्रालय तक यह लगातार जोर दिया जा रहा है कि आने वाले वर्षों में भारत की हरित ऊर्जा रणनीति में पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाना अनिवार्य है.

सौर और पवन का पूरक संयोजन

विशेषज्ञों का मानना है कि पवन और सौर ऊर्जा का पूरक संयोजन ऊर्जा सुरक्षा के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है. दिन के समय सौर ऊर्जा उपलब्ध रहती है, वहीं शाम और रात के समय पवन ऊर्जा उत्पादन बेहतर रहता है. इस प्रकार दोनों मिलकर राउंड द क्लॉक (RTC) ग्रीन एनर्जी उपलब्ध कराने में सक्षम हैं.

घरेलू विनिर्माण क्षमता में मजबूती

भारत की पवन ऊर्जा विनिर्माण क्षमता भी लगातार बढ़ रही है. आज देश में लगभग 20 गीगावॉट नासेल, 16 गीगावॉट ब्लेड और 15 गीगावॉट टावर बनाने की क्षमता मौजूद है. यह न केवल भारत को आत्मनिर्भर बना रही है बल्कि निर्यात के अवसर भी बढ़ा रही है. स्थानीय सामग्री (Local Content) के मामले में पवन ऊर्जा क्षेत्र 64% पर है, जबकि सौर ऊर्जा क्षेत्र मात्र 20% पर है. आने वाले वर्षों में इस हिस्सेदारी को 85% तक ले जाने का लक्ष्य है.

सरकार की नीतिगत पहल

सरकार ने हाल ही में ऑफशोर विंड एनर्जी परियोजनाओं के लिए 7,442 करोड़ रुपये का वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) पैकेज स्वीकृत किया है. इसके तहत गुजरात और तमिलनाडु के तटों पर 1 गीगावॉट ऑफशोर प्रोजेक्ट स्थापित किए जाएंगे. इसके साथ ही भूमि उपयोग और परियोजना विकास को सुगम बनाने के लिए नई नीतियां लागू की जा रही हैं.
 


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