'BW बिजनेस वर्ल्ड’ का लिटरेचर फेस्टिवल IBLF आज गुरुग्राम में, शामिल होंगी ये हस्तियां

अब गुरुग्राम स्थित ‘द लीला’ (The Leela) होटल में इसका आयोजन किया जाएगा.

Last Modified:
Tuesday, 10 January, 2023
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नई दिल्लीः देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान ‘BW बिजनेस वर्ल्ड’ द्वारा एक फिर ‘इंडिया बिजनेस लिटरेचर फेस्टिवल’ (IBLF) कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है. तीन दिसंबर, 2022 को नई दिल्ली के एरोसिटी स्थित रोजेट हाउस में इस कार्यक्रम के भव्य आयोजन के बाद अब गुरुग्राम स्थित ‘द लीला’ (The Leela) होटल में इसका आयोजन किया जाएगा. 11 जनवरी यानी आज सुबह नौ बजे से होने वाले इस कार्यक्रम में देश-विदेश के शीर्ष लेखक, शिक्षाविद, विद्वान और प्रकाशक शामिल होंगे और अपने विचार रखेंगे. कार्यक्रम में बातचीत, पैनल चर्चा और रीडिंग शामिल होंगे.

बता दें कि तीन संस्करणों की शानदार सफलता के बाद यह इस कार्यक्रम का चौथा संस्करण है, जो 16 शहरों में आयोजित किया जाना है, जिसमें दिल्ली के बाद अब गुरुग्राम चैप्टर का आय़ोजन किया जा रहा है.

गौरतलब है कि बिजनेस एक सतत विकसित और बहुआयामी क्षेत्र है. बिजनेस को कैसे चलाया जाए और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में कैसे इसे आगे रखा जाए, यह प्रमुख विषय है. हालांकि, इस विषय पर पहले भी काफी बोला-लिखा और पढ़ा जा चुका है, लेकिन अभी भी इसमें इस दिशा में काफी गुंजाइश है.

यही कारण है कि IBLF एक बहु-विषयक कार्यक्रम के तौर पर उभर रहा है, जो भारत और विदेशों के शीर्ष लेखकों, शिक्षाविदों, विद्वानों और पब्लिशर्स को एक मंच प्रदान करता है. यह साहित्य में रुचि रखने वाले समान विचारधारा वाले लोगों का एक ऐसा संगम है, जो व्यक्तिगत और व्यावसायिक सिद्धांत और व्यवहार पर प्रभाव डालता है और उनके पास बिजनेस और इसके विभिन्न पहलुओं में योगदान देने के लिए बहुत कुछ है.

अक्सर यह देखा जाता है कि किसी कंपनी में वरिष्ठता बढ़ने के साथ-साथ पढ़ने का समय उत्तरोत्तर कम होता जाता है. ‘आईबीएलएफ’ का विचार ऐसे शीर्ष नेतृत्व में पढ़ने की आदत फिर से डालना है. एक बार जब वरिष्ठ नेतृत्व लगातार पढ़ने और सीखने की आदत विकसित कर लेता है, तो उनके लिए अपनी कंपनी में युवा पेशेवरों को इसका पालन करने के लिए प्रेरित करना आसान हो जाता है.

जहां हम यह स्वीकार करते हैं कि पढ़ना एक अच्छी आदत है और इसे विकसित करना चाहिए, वहीं प्रभावी ढंग से लिखना भी काफी कठिन कार्य है. ऐसे में आईबीएलएफ का उद्देश्य उन सभी के कार्यों को एक नई पहचान और मंच देना है, जो अपने विचारों को स्पष्ट और प्रभावी तरीके से सामने रखने जैसे कठिन कार्य को पूरा कर रहे हैं.  

IBLF के गुरुग्राम चैप्टर में तमाम प्रतिष्ठित वक्ताओं में शामिल किया जा रहा है, जिनमें ‘RenewPower’ के चेयरमैन और सीईओ सुमंत सिन्हा, ‘Jindal Global Law School’ की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ऐश्वर्या पंडित, ‘Rothschild & Co India’ की चेयरपर्सन और ‘Advent International Private Equity, India’ की सीनियर एडवाइजर नैना लाल किदवई, ‘Aditya Birla Group’ के ग्रुप एग्जिक्यूटिव प्रेजिडेंट (Corporate Strategy and Business Development) डी. शिवकुमार, ‘Deloitte India’ के पार्टनर और चीफ टैलेंट ऑफिसर एस.वी, नाथन, ‘Randstad Japan’ के चेयरमैन और सीईओ पॉल डुपोइस (Paul Dupuis), ‘RachnaRestores’ की फाउंडर रचना छाछी (Rachna Chhachhi), भारत सरकार के पूर्व वित्त एवं आर्थिक मामलों के सचिव और ‘SUBHANJALI’ के इकनॉमिक व फाइनेंस एडवाइजर सुभाष चंद्रा शामिल हैं.

इनके अलावा इस लिस्ट में ‘Caprihans India Ltd’ के प्रेजिडेंट और सीईओ रॉबिन बनर्जी, लेखक, कॉलमिस्ट और ‘NASSCOM’ के पूर्व प्रेजिडेंट डॉ. किरण कार्निक, ‘Centre for China Analysis and Strategy’ के प्रेजिडेंट जयदीप रानाडे, ‘Leadership Works’ के फाउंडर और सीईओ प्रकाश अय्यर, ‘Central Association of Private Security Industry’ के चेयरमैन कुंवर विक्रम सिंह, ‘Bharadwaj Bharadwaj & Associates Architects’ के पार्टनर और ‘Dr Satyakam Bharadwaj Vedic Research Foundation के प्लानर्स व फाउंडर ट्रस्टी दक्ष भारद्वाज आदि का नाम भी शामिल है. बता दें कि इन जाने-माने लेखकों की किताबें मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं और जीवन के अनुभवों को पठनीय रूप में प्रस्तुत करती हैं.


 


ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हुए आर. वैरामुथु, बोले- साहित्य ने ही जीवन को दिशा दी

वैरामुथु ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले तीसरे तमिल साहित्यकार और पहले तमिल कवि बन गए हैं. उन्होंने इस सम्मान को पूरी तमिल भाषा और भारतीय साहित्य जगत का गौरव बताया. 

रितु राणा by
Published - Tuesday, 14 July, 2026
Last Modified:
Tuesday, 14 July, 2026
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प्रख्यात तमिल कवि, साहित्यकार और गीतकार आर. वैरामुथु को भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान 60वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. नई दिल्ली में आयोजित समारोह में पूर्व केंद्रीय मंत्री कर्ण सिंह ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया. इस उपलब्धि के साथ वैरामुथु ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले तीसरे तमिल साहित्यकार और पहले तमिल कवि बन गए हैं. इस विशेष अवसर पर आर. वैरामुथु को सम्मन के रूप में 11 लाख रुपये की पुरस्कार राशि, मां सरस्वती (वाग्देवी) की कांस्य प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र भेंट किया गया. यह समारोह उनकी जन्मतिथि के अवसर पर आयोजित किया गया था.

तीसरे तमिल साहित्यकार, पहले तमिल कवि

ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के साथ आर. वैरामुथु तमिल भाषा के तीसरे साहित्यकार और पहले तमिल कवि बन गए हैं, जिन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला है. उन्होंने इस सम्मान को पूरी तमिल भाषा और भारतीय साहित्य जगत का गौरव बताया.  सम्मान ग्रहण करने के बाद वैरामुथु ने कहा कि यह पुरस्कार उन्हें नई ऊर्जा और प्रेरणा के साथ साहित्य सृजन जारी रखने का उत्साह देगा. उन्होंने कहा,  मेरे लिए साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि जीवन को समझने और उसे अभिव्यक्त करने का माध्यम रहा है. विद्यालय ने मुझे अक्षर सिखाए, जीवन के संघर्षों ने मुझे संवेदनाएं दीं और इन्हीं दोनों ने मिलकर मुझे कविता तक पहुंचाया. जीवन की तमाम कड़वाहटों के बीच भाषा ही मेरे लिए सबसे बड़ी मिठास बनी. उसी ने मेरे भीतर साहित्य के प्रति ऐसी भूख जगाई, जिसने मुझे लगातार सृजन की राह पर आगे बढ़ाया. मेरी कविताओं का विषय कहीं बाहर से नहीं आया, बल्कि मेरे जीवन, मेरे अनुभवों और मेरी संवेदनाओं से जन्मा.

गर्व के साथ-साथ गहरी जिम्मेदारी का क्षण

उन्होंने आगे कहा जब मैं सोचता हूं कि जिस परंपरा में सुमित्रानंदन पंत, अमृता प्रीतम, महाश्वेता देवी, गुलजार, प्रतिभा राय, एम. टी. वासुदेवन नायर और अनेक महान साहित्यकारों का नाम दर्ज है, उसी पंक्ति में आज मेरे लिए भी स्थान बनाया गया है, तो यह मेरे लिए गर्व के साथ-साथ गहरी जिम्मेदारी का भी क्षण है.

मेरा विश्वास है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को सबसे अधिक समृद्ध हमारी नदियों और हमारे साहित्य ने किया है. साहित्य केवल यथार्थ का चित्रण नहीं करता, बल्कि मनुष्य को आशा, संवेदना और परिवर्तन की प्रेरणा भी देता है. यदि जीवन हमारी इच्छाओं के अनुसार न चले, तो साहित्य हमें परिस्थितियों को स्वीकारना सिखाता है और यदि आवश्यकता हो, तो उन्हें बदलने का साहस भी देता है.

साहित्य मनुष्य की कल्पना को असीम विस्तार देता है. वह केवल शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा को समृद्ध करने वाली शक्ति है. यही मेरे लेखन का उद्देश्य रहा है और यही मेरी सबसे बड़ी आस्था भी है. आप सभी का हृदय से धन्यवाद.

साहित्य और सिनेमा दोनों में छोड़ी गहरी छाप

आर. वैरामुथु ने कविता, उपन्यास, निबंध और फिल्मी गीतों के जरिए भारतीय साहित्य और तमिल सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई है. उनकी रचनाएं सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं.

कई बड़े सम्मानों से हो चुके हैं सम्मानित

वैरामुथु के चर्चित उपन्यास 'कल्लिक्कट्टु इथिहासम' को वर्ष 2003 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. इसके अलावा उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए सात राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है.

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता

समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री कर्ण सिंह ने कहा, भारतीय ज्ञानपीठ का अध्यक्ष रहने के दौरान मुझे लगभग नौ वर्षों तक देश की विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों और विद्वानों से मिलने और उनके साहित्य को पढ़ने का अवसर मिला. यह मेरे जीवन के सबसे समृद्ध और यादगार अनुभवों में से एक रहा. भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता है. हमारी अनेक भारतीय भाषाएं मिलकर देश की साहित्यिक विरासत को समृद्ध बनाती हैं और तमिल उन सबसे प्राचीन एवं समृद्ध भाषाओं में से एक है. मेरा हमेशा से मानना रहा है कि किसी भी देश को उसके भूगोल या इतिहास से नहीं, बल्कि उसके साहित्य से सबसे बेहतर समझा जा सकता है. भारत जैसा बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक साहित्य संसार दुनिया में बहुत कम देशों के पास है. यही हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक ताकत है. आज के सम्मानित ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता को मैं हार्दिक बधाई देता हूं और उनके उज्ज्वल साहित्यिक योगदान को नमन करता हूं.

इस अवसर पर भारतीय ज्ञानपीठ के महाप्रबंधक आर. एन. तिवारी और चयन समिति की अध्यक्ष प्रतिभा रे सहित कई साहित्यकार और गणमान्य लोग उपस्थित रहे. समारोह में वैरामुथु की साहित्यिक यात्रा और भारतीय भाषाओं के प्रति उनके योगदान को विशेष रूप से सराहा गया.


दोहरीघाट से दिल्ली, संस्कारों की विरासत’: संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश

यह पुस्तक केवल लेखक की व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत, भारतीय पारिवारिक मूल्यों, माता-पिता के संघर्ष, संस्कारों और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच मानवीय संवेदनाओं की कहानी को प्रस्तुत करती है.

रितु राणा by
Published - Monday, 29 June, 2026
Last Modified:
Monday, 29 June, 2026
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नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 27 जून को कैनरा बैंक के पूर्व जनरल मैनेजर रवि प्रकाश जायसवाल की पुस्तक ‘दोहरीघाट से दिल्ली, संस्कारों की विरासत’ का विमोचन हुआ. यह पुस्तक केवल लेखक की व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत, भारतीय पारिवारिक मूल्यों, माता-पिता के संघर्ष, संस्कारों और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच मानवीय संवेदनाओं की कहानी को प्रस्तुत करती है. कार्यक्रम में BW बिजनेसवर्ल्ड एवं एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा, अयोध्या से आए पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार में श्री राम सर्किट के चेयरमैन डॉ. राम अवतार शर्मा सहित साहित्य, मीडिया, बैंकिंग और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे.  

पूर्वांचल की संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को समर्पित है यह पुस्तक

इस अवसर पर लेखक रवि प्रकाश जायसवाल ने कहा कि इस पुस्तक की परिकल्पना कई वर्षों से उनके मन में थी, लेकिन उसे शब्दों में ढालने का अवसर उन्हें सेवा निवृत्ति के बाद मिला.

उन्होंने कहा, "आज हम अपने नायकों को फिल्मों, राजनीति, खेल, साहित्य और समाज में तलाशते हैं, लेकिन हमारे सबसे बड़े नायक हमारे अपने घरों में होते हैं. मेरे लिए मेरे माता-पिता सबसे बड़े आदर्श, सबसे बड़े नायक और सबसे बड़े हस्ताक्षर रहे हैं. जिनकी छत्रछाया में हम पलते-बढ़ते हैं, उनसे ही जीवन के संस्कार और मूल्य प्राप्त करते हैं, लेकिन हम उन्हें नायक के रूप में स्वीकार करने का अवसर बहुत कम देते हैं."

उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में वर्णित पात्र भले ही मेरे माता-पिता हों, लेकिन उनकी संवेदनाएं, संघर्ष, त्याग और संस्कार हर परिवार की कहानी हो सकते हैं. यदि पाठकों को इनमें अपने माता-पिता दिखाई दें, तो यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी सफलता होगी. लेखक ने कहा कि उन्होंने पूर्वांचल के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश को पुस्तक में विशेष स्थान दिया है.

उन्होंने कहा, "पूर्वांचल केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि संस्कारों, परंपराओं और मानवीय मूल्यों की भूमि है. दोहरीघाट केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृतियों, वैदिक परंपराओं और आस्था का केंद्र है. परिवेश बदल जाते हैं, परिवार बदल जाते हैं, भाषाएं बदल जाती हैं, लेकिन मनुष्य की संवेदनाएं और अनुभूतियां नहीं बदलतीं. यह पुस्तक किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि भारतीय समाज की साझा स्मृतियों और मूल्यों की कहानी है."*

पुस्तक में लेखक ने अपनी माता पार्वती देवी के संघर्ष, त्याग और साहस को भी प्रमुखता से स्थान दिया है. उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों, सामाजिक मर्यादाओं और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच एक महिला की करुणा, साहस और संस्कारों की शक्ति इस पुस्तक की मूल प्रेरणा है.

परिवार की सबसे बड़ी पूंजी माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कार

डॉ. राम अवतार शर्मा ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि किसी भी परिवार की सबसे बड़ी पूंजी माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कार होते हैं. उन्होंने कहा, "लेखक के परिवार को जो संस्कार मिले हैं, उनका सबसे बड़ा श्रेय माता-पिता को जाता है. इसके साथ ही दोहरीघाट की उस पावन भूमि को भी इसका श्रेय जाता है, जहां भगवान श्रीराम और भगवान परशुराम के मिलन की मान्यता है. जिस भूमि पर ऐसे आदर्शों की परंपरा रही हो, वहां के संस्कार पीढ़ियों तक दिखाई देते हैं."

उन्होंने कहा, "रवि प्रकाश जायसवाल ने यह पुस्तक किसी से सुनकर, पढ़कर या नकल करके नहीं लिखी है. यह उनके अपने जीवन, अपने अनुभवों और अपने हृदय की भावनाओं से निकली हुई रचना है. जो बातें हृदय से लिखी जाती हैं, वे लंबे समय तक समाज और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करती हैं. पहले हमें स्वयं इस पुस्तक को पढ़ना चाहिए और फिर अपने बच्चों को इसे पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए."

'दोहरीघाट से दिल्ली' भारतीय पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों का दस्तावेज 

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपने माता-पिता, अपने मूल्यों और अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं. उन्होंने कहा, "‘दोहरीघाट से दिल्ली, संस्कारों की विरासत’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों का दस्तावेज है. यदि दो या चार लोग भी इस पुस्तक को पढ़कर अपने माता-पिता के साथ अधिक समय बिताने लगें, उनकी सेवा और सम्मान करने लगें, तो यह पुस्तक अपने उद्देश्य में सफल होगी."

डॉ. बत्रा ने कहा कि किताबें जीवन बदलने की क्षमता रखती हैं. उन्होंने कहा, किताबें आपका जीवन बदल सकती हैं, जीवन में मैंने जो भी हासिल किया है, उसमें मेरे माता-पिता के आशीर्वाद, उनके संस्कार और पुस्तकों से मिली सीख का बड़ा योगदान है. सफलता का पूरा श्रेय हमें स्वयं को नहीं देना चाहिए, बल्कि अपने माता-पिता, दादा-दादी, गुरुओं और उन सभी लोगों को देना चाहिए, जिन्होंने हमारी सफलता की नींव रखी है."

उन्होंने जीवन में तीन H को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा, "पहला Hope यानी आशा, दूसरा Hard Work यानी कठिन परिश्रम और तीसरा Humility यानी विनम्रता, यदि व्यक्ति के जीवन में ये तीनों गुण हों, तो वह किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है."

डॉ. बत्रा ने तीन G का भी उल्लेख करते हुए कहा, "पहला Gratitude यानी कृतज्ञता, जो हमें माता-पिता, गुरुओं, बड़ों और ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करना सिखाती है. दूसरा Grit यानी कठिन परिस्थितियों में भी डटे रहने की क्षमता और तीसरा Grace यानी जीवन में संतुलन, सहजता और ईश्वर की कृपा को स्वीकार करने का भाव. ये मूल्य व्यक्ति को न केवल सफल बनाते हैं, बल्कि उसे बेहतर इंसान भी बनाते हैं."

कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने पुस्तक को भारतीय परिवार व्यवस्था, सामाजिक स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण दस्तावेज बताते हुए इसकी सराहना की. वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, अपने परिवार और अपने संस्कारों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी.


'क्लाइमेट जस्टिस' केवल कानूनी विश्लेषण नहीं, प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का दस्तावेज: राजीव

राजीव मलिक ने पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, यह पुस्तक अंतरात्मा की ऐसी कृति, जिसे कानून की भाषा में व्यक्त किया गया है.

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2026
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सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और ट्रस्ट लीगल, एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के संस्थापक एवं मैनेजिंग पार्टनर सुधीर मिश्रा की बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘Climate Justice – Celebrating 75 Years of Supreme Court of India: 75 Judgments that Built Climate Jurisprudence in India’ का नई दिल्ली में भव्य विमोचन हुआ. इस पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर इन चीफ डॉ. अनुराग बत्रा,  LG Electronics India (नोएडा मैन्युफैक्चरिंग) में लीगल लीडर व साइबर लॉ, मध्यस्थता, वाणिज्यिक विवाद और बौद्धिक संपदा अधिकारों के विशेषज्ञ राजीव मलिक सहित कई बड़ी हस्तियां शामल रहीं. पर्यावरणीय न्याय और जलवायु कानून पर केंद्रित इस पुस्तक को कानूनी और कॉर्पोरेट जगत से खूब सराहना मिल रही है. 

पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए राजीव मलिक ने कहा, यह पुस्तक अंतरात्मा की ऐसी कृति, जिसे कानून की भाषा में व्यक्त किया गया है. राजीव मलिक ने कहा कि पुस्तक के लेखक सुधीर मिश्रा ने इसमें केवल कानूनी विद्वता का प्रदर्शन नहीं किया है, बल्कि एक ऐसे विधि-व्यवसायी की समझ भी प्रस्तुत की है जो अदालत में उन तत्वों की ओर से खड़ा होता है जो स्वयं अपनी बात नहीं कह सकते. उनके अनुसार, पुस्तक में शामिल 75 फैसले केवल न्यायिक मील के पत्थर नहीं हैं, बल्कि ऐसे अवसर हैं जब कानून ने व्यापक नैतिक मूल्यों को अपने दायरे में समाहित किया.

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक याद दिलाती है कि पर्यावरणीय न्याय केवल कानूनों और नजीरों का विषय नहीं है, बल्कि उस दुनिया के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न है, जिसे हम विरासत में प्राप्त करते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़कर जाते हैं.

पर्यावरण न्याय को बताया नैतिक दायित्व

राजीव मलिक के अनुसार, पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह पर्यावरण संरक्षण को केवल कानूनी विमर्श तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी के रूप में भी प्रस्तुत करती है. उन्होंने कहा कि किसी भी कानूनी लेखक के लिए इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता कि उसकी रचना केवल विश्लेषण तक सीमित न रहकर व्यापक चिंतन का आधार बने.

कविता 'इम्तिहान' के माध्यम से की सराहना

पुस्तक से प्रेरित होकर राजीव मलिक ने "इम्तिहान" शीर्षक से एक कविता भी लिखी, जिसमें उन्होंने प्रकृति, न्याय और मानवीय जिम्मेदारी के संबंध को रेखांकित किया. कविता की कुछ प्रमुख पंक्तियां हैं-

जब हवाओं में जहर घुला,
जब नदियों ने नीर नहीं, नीरवता बहाई,
जब दरख़्तों को दुआओं की
जरूरत पड़ने लगी.

तब किसी ने शोर नहीं किया,
धीर रखा.

फिर एक विचार परवान चढ़ा.

कि मुक़दमे केवल इंसानों के नहीं होते,
कभी-कभी मौसम भी फरियादी होते हैं.

कभी कोई नदी
अपने किनारों की तरफ़ से अर्जी देती है.

कभी कोई जंगल
पत्तों की भाषा में पैरवी करता है.

कभी कोई पर्वत
अपनी खामोशी से गवाही देता है.

ये पचहत्तर फैसले.
महज फैसले नहीं,
जिनमें इंसान ने पहली बार
खुद से पूछा-

"धरती हमारी विरासत है,
या आने वाली नस्लों की अमानत?"

यही सवाल
इंसाफ को इबादत से जोड़ता है.

क्योंकि दरख़्त लगाना इंसानियत है,
पर नदी में माँ का स्वर सुनना रूहानियत है.

नदी की हिफाजत नीति है,
पर नदी से रिश्ता जोड़ना रूहानियत है.

और शायद इसीलिए,
कुछ लोग केस नहीं लड़ते,
वे करुणा को क़ानून की भाषा देते हैं.

वे दलील नहीं देते,
वे आने वाले कल की साँसों को
आवाज देते हैं.

आज जब यह सफर
एक किताब का रूप लेकर हमारे सामने है,
तो यह केवल फैसलों का संकलन नहीं,
कुदरत को बचाने की कवायद है.

यह स्मृति का संरक्षण है.
और स्मृति से बड़ा कोई न्याय नहीं.

"सु" का सुकून,
"धीर" का ध्यान,
जब दोनों मिल जाएँ,
तो जन्म लेता है
एक सुधीर,

जो केवल इंसान नहीं,
एक विचार बन जाता है.

अंत में बस इतना ही कहूँगा-

नदी ने न फरियाद लिखी,
न दरख्यो ने बयान दिया,
इंसान की खातिर कुदरत ने,
इंसान को इम्तिहान दिया.

और सुधीर भाई, इस इम्तिहान में आप सफल हुए.

मलिक ने कहा कि यह पुस्तक केवल न्यायिक फैसलों का संकलन नहीं है, बल्कि प्रकृति संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक प्रयास है. उनके अनुसार, यह कृति जलवायु न्याय, पर्यावरणीय अधिकारों और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारियों पर गंभीर विमर्श को आगे बढ़ाने का काम करेगी.

बता दें, राजीव मलिक वर्तमान मेंतथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और विधि के क्षेत्र में भी सक्रिय रूप से विचार प्रस्तुत करते रहे हैं.


ग्रामीण भारत, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र निर्माण की नई कथा ‘उड़ चल अपने देस’

रक्षा मंत्रालय में निदेशक अभिषेक चौहान ने अपनी नई पुस्तक 'उड़ चल अपने देस' के माध्यम से अपने अनुभवों, सामाजिक अवलोकनों और सांस्कृतिक सरोकारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है.

रितु राणा by
Published - Tuesday, 16 June, 2026
Last Modified:
Tuesday, 16 June, 2026
BWHindia

ग्रामीण भारत की बदलती तस्वीर, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के प्रति बढ़ती उदासीनता, पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता, मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियाँ और राष्ट्र निर्माण में आम नागरिक की भूमिका, ये सभी विषय अभिषेक चौहान की पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ के केंद्र में हैं. भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के आयुक्त स्तर के अधिकारी तथा वर्तमान में रक्षा मंत्रालय में निदेशक की भूमिका निभा रहे अभिषेक चौहान ने अपने अनुभवों, सामाजिक अवलोकनों और सांस्कृतिक सरोकारों को इस पुस्तक के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है.

मध्य प्रदेश के भिंड जिले में पालन-पोषण व प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने वाले अभिषेक चौहान का बचपन चंबल-यमुना दोआब के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में बीता. प्रकृति, भारतीय दर्शन, ग्रामीण जीवन और सामाजिक चेतना उनकी इस पुस्तक के प्रमुख विषय हैं. उनकी नई पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ पर BW हिन्दी की वरिष्ठ संवाददाता रितु राणा ने उनसे विस्तार से बातचीत की. इस चर्चा में पुस्तक की प्रेरणा, इतिहास और साहित्य के संबंध, युवा पीढ़ी के लिए संदेश, पर्यावरण संरक्षण, मानसिक स्वास्थ्य, राष्ट्र निर्माण और लेखन की यात्रा जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर खुलकर संवाद हुआ. प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

प्रश्न: आपकी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ लिखने की प्रेरणा क्या थी? क्या इसके पीछे कोई व्यक्तिगत अनुभव या ऐतिहासिक घटना रही है?

अभिषेक चौहान: इस प्रश्न का उत्तर कई स्तरों पर मौजूद है. यदि संक्षेप में कहूँ तो इस पुस्तक की प्रेरणा मेरे व्यक्तिगत अनुभवों, अपने क्षेत्र के प्रति गहरे लगाव और इतिहास व संस्कृति के प्रति मेरी स्वाभाविक रुचि से मिली है.

मेरा बचपन ब्रज-बुंदेलखंड क्षेत्र में बीता है. उस क्षेत्र की मिट्टी, वहां के लोकजीवन, लोगों की सोच, उनकी जीवनशैली और सांस्कृतिक परंपराओं ने मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. एक सरकारी सेवक के रूप में मैं देश की सेवा कर रहा हूँ, लेकिन मेरे मन में हमेशा यह प्रश्न उठता रहा कि जिस भूमि ने मुझे संस्कार दिए, जिस समाज ने मुझे गढ़ा, उसके प्रति मेरा योगदान क्या है.

यही विचार धीरे-धीरे इस पुस्तक की प्रेरणा बन गया. बचपन में सुनी हुई कहानियाँ, लोककथाएँ, लोगों के संघर्ष, उनकी संवेदनाएँ और समय के साथ देखे गए सामाजिक परिवर्तन मेरे मन में लगातार जमा होते रहे. जब मैंने इन अनुभवों को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखना शुरू किया, तब लगा कि इन्हें केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक भी पहुँचाना चाहिए.

जहाँ तक ऐतिहासिक संदर्भों की बात है, इतिहास ने भी इस पुस्तक की संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. मेरा मानना है कि किसी भी समाज को समझने के लिए उसकी ऐतिहासिक स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत को समझना आवश्यक है. इसलिए पुस्तक में इतिहास, लोकविश्वास और समकालीन यथार्थ को एक साथ पिरोने का प्रयास किया गया है.

मेरा उद्देश्य केवल एक कथा लिखना नहीं था, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना को संरक्षित करना था जो धीरे-धीरे आधुनिक जीवन की गति में कहीं पीछे छूटती जा रही है.

पुस्तक में कई पात्र ऐसे हैं जिनमें एक नहीं, बल्कि अनेक वास्तविक व्यक्तियों की विशेषताओं को समाहित किया गया है. मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का चित्रण करना नहीं था, बल्कि समाज के विभिन्न चरित्रों और प्रवृत्तियों को सामने लाना था. इसलिए पुस्तक में पाठकों को यथार्थ भी मिलेगा और साहित्यिक कल्पना का विस्तार भी.

प्रश्न: पुस्तक के पात्र और घटनाएँ वास्तविकता से कितनी प्रेरित हैं और इसमें कल्पना का कितना विस्तार है?

अभिषेक चौहान: किसी भी लेखक की सबसे बड़ी पूंजी उसके अनुभव होते हैं. व्यक्ति अपने आसपास के लोगों, परिस्थितियों और समाज से जो कुछ सीखता है, वही उसके लेखन का आधार बनता है. इसलिए इस पुस्तक के अधिकांश भाव, परिस्थितियाँ और अनुभव वास्तविक जीवन से प्रेरित हैं. हालाँकि साहित्य केवल दस्तावेजीकरण नहीं होता. यदि लेखक हर व्यक्ति और घटना को ज्यों-का-त्यों लिख दे तो वह साहित्य नहीं, बल्कि विवरण मात्र रह जाएगा. इसलिए रचनात्मक स्वतंत्रता की भी आवश्यकता होती है.

इस पुस्तक में कई पात्र ऐसे हैं जिनमें एक से अधिक वास्तविक व्यक्तियों के गुणों का समावेश किया गया है. किसी पात्र की संवेदनशीलता एक व्यक्ति से प्रेरित हो सकती है, उसकी जीवन-दृष्टि किसी दूसरे से और उसका संघर्ष किसी तीसरे व्यक्ति से. इस प्रकार कई वास्तविक अनुभवों को एक पात्र या एक घटना में समेटा गया है.

मैं कहूँगा कि पुस्तक का भाव और उसकी आत्मा पूरी तरह वास्तविक है, लेकिन उसे साहित्यिक रूप देने के लिए कल्पना और रचनात्मक संरचना का सहारा लिया गया है. यही कारण है कि पाठकों को इसमें अपने जीवन और अपने आसपास के समाज की झलक दिखाई दे सकती है.

प्रश्न: आपने पुस्तक के कुछ अंशों को AI आधारित वीडियो के रूप में प्रस्तुत किया है. क्या आपको लगता है कि AI साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है?

अभिषेक चौहान: बिल्कुल, मैं मानता हूँ कि समय के साथ संवाद के माध्यम बदलते हैं और साहित्य को भी बदलते समय के अनुरूप नए माध्यमों को अपनाना चाहिए. आज की पीढ़ी सूचना और तकनीक के ऐसे दौर में जी रही है जहाँ दृश्य और श्रव्य माध्यमों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया है. पुस्तक पढ़ने की आदत अभी भी मौजूद है, लेकिन उसकी प्रकृति बदल रही है. युवा वर्ग कम समय में अधिक सामग्री ग्रहण करना चाहता है.

मैंने अपने आसपास भी देखा है कि हिंदी भाषी परिवारों में पले-बढ़े बच्चे भी धीरे-धीरे हिंदी साहित्य से दूर होते जा रहे हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी रुचि समाप्त हो गई है, बल्कि माध्यम बदल गए हैं. ऐसे में यदि साहित्य को ऑडियो-विज़ुअल स्वरूप में प्रस्तुत किया जाए तो वह अधिक सहजता से लोगों तक पहुँच सकता है.

AI इस दिशा में एक महत्वपूर्ण साधन बन सकता है. यदि किसी पुस्तक के विचार, पात्र और भावनाएँ दृश्य माध्यम के जरिए पाठकों तक पहुँचें तो वे उसे अधिक आसानी से समझ सकते हैं और उससे जुड़ाव महसूस कर सकते हैं. मेरा मानना है कि AI साहित्य का विकल्प नहीं, बल्कि उसका विस्तार है. यह नई पीढ़ी को पुस्तक तक लाने का एक प्रभावी पुल बन सकता है.

प्रश्न: ‘उड़ चल अपने देस’ शीर्षक अपने आप में भावनात्मक और देशभक्ति की भावना जगाता है. पाठकों के लिए इसका मूल संदेश क्या है?

अभिषेक चौहान: मेरे लिए ‘देश’ केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं है. देश उन लोगों, संस्कृतियों, मूल्यों और स्मृतियों का समुच्चय है जो हमें हमारी पहचान देते हैं. आज अक्सर युवाओं के मन में यह प्रश्न होता है कि वे देश की सेवा कैसे कर सकते हैं. बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनेताओं, बड़े उद्योगपतियों, सैन्य अधिकारियों या आर्थिक रूप से सक्षम लोगों की जिम्मेदारी है. मैं इस धारणा से सहमत नहीं हूँ.

मेरा मानना है कि राष्ट्र निर्माण का आरंभ व्यक्ति से होता है. यदि कोई शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाता है, कोई किसान पूरी निष्ठा से खेती करता है, कोई सरकारी कर्मचारी अपने दायित्वों का पालन करता है और कोई नागरिक अपने सामाजिक कर्तव्यों को समझता है, तो वह भी उतनी ही महत्वपूर्ण राष्ट्र सेवा कर रहा है.

इस पुस्तक के माध्यम से मैं यही संदेश देना चाहता हूँ कि देशभक्ति केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में किए जाने वाले छोटे-छोटे जिम्मेदार कार्यों का नाम है. जब प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी समझेगा, तभी एक मजबूत और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव होगा.

प्रश्न: आपने पुस्तक में इतिहास के अनेक संदर्भों का उल्लेख किया है. इसके पीछे क्या उद्देश्य रहा?

अभिषेक चौहान: मेरा मानना है कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि किसी समाज की सामूहिक स्मृति और उसकी सांस्कृतिक चेतना का आधार होता है. इसी सोच के साथ मैंने पुस्तक में विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों, पात्रों और प्रसंगों का उल्लेख किया है.

पुस्तक में जहाँ-जहाँ आवश्यकता महसूस हुई, वहाँ बुद्धकाल, महाभारतकाल, कालिदास के युग तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े अनेक संदर्भों को कथा के भीतर स्वाभाविक रूप से पिरोने का प्रयास किया गया है. मैंने 'वंदे मातरम्' और उससे जुड़े साहित्यिक स्रोतों का भी उल्लेख किया है, क्योंकि अक्सर हम कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को सामान्य ज्ञान के रूप में तो जानते हैं, लेकिन उनके पीछे की पूरी कहानी जानने का प्रयास नहीं करते.

दरअसल मेरा उद्देश्य पाठकों को इतिहास पढ़ाना नहीं था, बल्कि उनकी जिज्ञासा को जागृत करना था. यदि कोई पाठक कहानी पढ़ते समय किसी ऐतिहासिक पात्र, घटना या ग्रंथ का उल्लेख देखकर उसके बारे में आगे जानने की इच्छा महसूस करे, तो मैं इसे अपनी सफलता मानूँगा. आज AI, इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों के दौर में जानकारी तक पहुँचना पहले से कहीं अधिक आसान है. ऐसे में साहित्य पाठकों को इतिहास और संस्कृति की ओर प्रेरित करने का एक प्रभावी माध्यम बन सकता है.

मैंने यह भी महसूस किया है कि नई पीढ़ी के एक वर्ग में इतिहास के प्रति उदासीनता बढ़ रही है. अक्सर यह तर्क सुनने को मिलता है कि जो बीत गया, उसके बारे में जानकर क्या लाभ. लेकिन मेरा मानना है कि इतिहास कभी निरर्थक नहीं होता. वह हमें बताता है कि किन परिस्थितियों में कौन-से निर्णय लिए गए, उनके परिणाम क्या रहे, और उनसे वर्तमान के लिए क्या सीख ली जा सकती है. इतिहास हमें केवल अतीत नहीं बताता, बल्कि भविष्य के प्रति भी सजग बनाता है.

इसीलिए मैंने इतिहास को पुस्तक में अलग विषय की तरह प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसे कथा का स्वाभाविक हिस्सा बनाया है, ताकि पाठक मनोरंजन के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ सकें. यदि इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों में इतिहास, साहित्य और अपनी जड़ों को जानने की थोड़ी-सी भी रुचि पैदा होती है, तो मैं अपने प्रयास को सार्थक मानूँगा.

प्रश्न: क्या पुस्तक के ऐतिहासिक संदर्भ पूरी तरह तथ्यात्मक हैं या उनमें साहित्यिक कल्पना का भी समावेश है?

अभिषेक चौहान: इतिहास से जुड़े सभी संदर्भों का आधार वास्तविक घटनाएँ, पात्र और परंपराएँ हैं. हालाँकि यह कोई इतिहास की पुस्तक नहीं है, बल्कि एक साहित्यिक कृति है. इसलिए कथा की आवश्यकता के अनुसार कुछ प्रसंगों को प्रतीकात्मक और साहित्यिक रूप में प्रस्तुत किया गया है. मैंने यथार्थ, लोकस्मृतियों, सुनी-सुनाई बातों और अपनी कल्पना, इन सभी का संतुलित उपयोग किया है, ताकि कहानी प्रभावी भी बने और उसका मूल संदेश भी पाठकों तक पहुँच सके.

प्रश्न: आपकी पुस्तक में ग्रामीण भारत का चित्रण काफी प्रमुख दिखाई देता है. इसके पीछे क्या सोच रही?

अभिषेक चौहान: मेरी परवरिश जिस सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में हुई, उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से मेरे लेखन में दिखाई देता है. मैंने ग्रामीण भारत के उन अनुभवों, मान्यताओं, संघर्षों और विशेषताओं को सहेजने का प्रयास किया है, जिन्हें मैंने स्वयं देखा, सुना और महसूस किया है.

मेरा विश्वास है कि बदलते समय में बहुत-सी सामाजिक स्मृतियाँ धीरे-धीरे विलुप्त हो जाती हैं. साहित्य उन्हें संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है. इसलिए मैंने ग्रामीण जीवन के कुछ ऐसे पहलुओं को कथा में स्थान दिया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए उस दौर का एक सांस्कृतिक दस्तावेज बन सकें.

प्रश्न: क्या आप अपनी पुस्तक को केवल एक उपन्यास मानते हैं या सामाजिक दस्तावेज भी?

अभिषेक चौहान: मेरे लिए यह केवल एक कहानी नहीं है. मैं इसे अपने समय, समाज और परिवेश के कुछ महत्वपूर्ण अनुभवों को दर्ज करने का प्रयास मानता हूँ. निश्चित रूप से यह एक साहित्यिक कृति है, लेकिन इसके भीतर सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक स्मृतियाँ और सामुदायिक अनुभव भी मौजूद हैं.

मैं यह दावा नहीं करूँगा कि यह किसी कालखंड का संपूर्ण दस्तावेज है, क्योंकि ऐसा कोई भी लेखक नहीं कर सकता. लेकिन मैंने अपने सीमित अनुभवों और समझ के आधार पर उस समय और समाज की कुछ महत्वपूर्ण झलकियों को सहेजने का ईमानदार प्रयास अवश्य किया है.

प्रश्न: आप रक्षा मंत्रालय में निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं. इतनी व्यस्त जिम्मेदारियों के बीच लेखन के लिए समय कैसे निकालते हैं?

अभिषेक चौहान: मैं हमेशा एक बात में विश्वास करता हूँ कि “जहाँ इच्छा होती है, वहाँ रास्ता भी निकल आता है.” वास्तव में समय किसी के पास अतिरिक्त नहीं होता. हम सभी को दिन के वही 24 घंटे मिलते हैं, अंतर केवल इस बात का होता है कि हम अपनी प्राथमिकताएँ कैसे निर्धारित करते हैं.

मेरे लिए लेखन कोई अचानक शुरू हुआ शौक नहीं है, बल्कि यह आत्म-अभिव्यक्ति और समाज से संवाद का एक माध्यम रहा है. जब आपके भीतर कोई विचार लंबे समय तक आकार ले रहा हो और आप उसे शब्दों में ढालने की जिम्मेदारी महसूस करते हों, तब आप स्वाभाविक रूप से उसके लिए समय निकाल लेते हैं. इस पुस्तक को पूरा करने में मुझे एक वर्ष से अधिक का समय लगा. लेखन का अधिकांश कार्य मैंने अपने व्यक्तिगत समय में किया.  मेरा मानना है कि यदि किसी व्यक्ति के पास कोई सार्थक लक्ष्य है, तो समय कभी सबसे बड़ी बाधा नहीं बनता. अनुशासन, निरंतरता और धैर्य के साथ दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाया जा सकता है. यही प्रयास मैंने भी किया है.

प्रश्न: क्या रक्षा मंत्रालय में काम करने के आपके अनुभवों का इस पुस्तक पर कोई प्रभाव पड़ा है?

अभिषेक चौहान: प्रत्यक्ष रूप से नहीं. रक्षा मंत्रालय देश के सबसे संवेदनशील मंत्रालयों में से एक है और मैंने पूरी सावधानी रखी है कि पुस्तक की कथा, पात्रों, घटनाओं या विचारों का मंत्रालय अथवा किसी सरकारी कार्यप्रणाली से कोई प्रत्यक्ष संबंध न स्थापित हो. पुस्तक का संसार पूरी तरह स्वतंत्र है और इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए.

हालाँकि, यदि व्यापक स्तर पर बात करें, तो किसी भी व्यक्ति के कार्यस्थल और अनुभव उसके दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं. रक्षा मंत्रालय में कार्य करते हुए देश, समाज और राष्ट्रीय हितों से जुड़े अनेक विषयों को निकटता से देखने और समझने का अवसर मिलता है. इससे राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और व्यापक दृष्टि का भाव निश्चित रूप से मजबूत होता है.

लेकिन मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूँगा कि देशप्रेम की भावना मेरे भीतर किसी पद या दायित्व के कारण नहीं आई. यह भावना मेरे संस्कारों, पारिवारिक परिवेश और सामाजिक अनुभवों का हिस्सा हमेशा से रही है. 

प्रश्न: आपकी पुस्तक में क्या कोई केंद्रीय नायक है, या आपने कथा को सामूहिक पात्रों के माध्यम से आगे बढ़ाया है?

अभिषेक चौहान: हाँ, पुस्तक में एक केंद्रीय पात्र अवश्य है, जिसका नाम ओमकार है. लेकिन मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैंने इस कथा को पारंपरिक अर्थों में ‘नायक-केंद्रित’ बनाने का प्रयास नहीं किया है.

मेरे विचार से समाज का निर्माण किसी एक व्यक्ति के प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और समूह की शक्ति से होता है. इसलिए यद्यपि ओमकार कथा की वैचारिक धुरी है और घटनाओं को दिशा देता है, फिर भी मैं उसे अकेला नायक नहीं मानता. उसके साथ जुड़े लोग, उसके साथी और उसके विचारों को आगे बढ़ाने वाले सभी पात्र कथा के समान रूप से महत्वपूर्ण अंग हैं.

वास्तव में, मैंने पुस्तक में व्यक्तिवाद से अधिक संगठन और सामूहिकता की भावना को महत्व दिया है. इतिहास गवाह है कि कई बार नायक-पूजा अनजाने में अधिनायकवाद की ओर भी ले जाती है. इसलिए मैंने यह प्रयास किया है कि पाठक किसी एक व्यक्ति से अधिक उस विचार, उस समूह और उस सामाजिक चेतना को समझें, जो परिवर्तन का वास्तविक आधार बनती है. इस दृष्टि से देखें तो ओमकार एक पात्र मात्र नहीं, बल्कि एक विचार का प्रतिनिधि है, जबकि उसके साथ चलने वाले सभी लोग उस विचार को जीवंत बनाने वाली शक्ति हैं.

प्रश्न: यदि भविष्य में आपकी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देश’ पर फिल्म या वेब सीरीज़ बनती है, तो आप ओमकार की भूमिका में किस अभिनेता को देखना चाहेंगे?

अभिषेक चौहान: यह एक रोचक प्रश्न है. सच कहूँ तो इस विषय पर मैंने कई बार विचार किया है और मित्रों के साथ भी चर्चा हुई है. जब मैं कॉलेज में था, तब फिल्म 'स्वदेस' ने मुझ पर गहरा प्रभाव छोड़ा था. उस फिल्म में जिस संवेदनशीलता, सामाजिक प्रतिबद्धता और देश के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को प्रस्तुत किया गया, वह मेरे मन में आज भी कहीं न कहीं मौजूद है.

ओमकार का चरित्र भी कुछ हद तक उसी प्रकार का है, वह एक साथ आधुनिक भी है और अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ भी. उसमें संवेदनशीलता है, नेतृत्व क्षमता है और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव भी है. इसलिए यदि मुझे किसी एक अभिनेता का नाम लेना हो, तो मैं शाह रुख खान को इस भूमिका के लिए उपयुक्त मानूँगा. हालाँकि आमिर खान जैसे कलाकार भी इस प्रकार के विचारप्रधान और सामाजिक सरोकारों वाले पात्रों को प्रभावशाली ढंग से निभाने की क्षमता रखते हैं. लेकिन यदि मेरी व्यक्तिगत पसंद पूछी जाए, तो ओमकार के चरित्र में मैं शाहरुख खान को देखना पसंद करूँगा, क्योंकि उनमें संवेदनशीलता और जनसरोकारों को अभिव्यक्त करने की एक विशिष्ट क्षमता है. हालाँकि अंततः यह निर्णय निर्देशक और निर्माता की रचनात्मक दृष्टि पर निर्भर करेगा.

प्रश्न: आपकी पुस्तक युवा पीढ़ी को क्या संदेश देती है?

अभिषेक चौहान: यह पुस्तक मुख्य रूप से युवा पीढ़ी को समर्पित है. मेरा मानना है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं की सोच, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना पर निर्भर करता है. इसलिए मैंने इस पुस्तक के माध्यम से युवाओं तक कुछ ऐसे संदेश पहुँचाने का प्रयास किया है, जो केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहकर समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से भी जुड़े हों.

पुस्तक युवाओं को अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने का संदेश देती है. आधुनिकता और वैश्विक दृष्टिकोण आवश्यक हैं, लेकिन अपनी पहचान और अपने मूल स्रोतों को भूल जाना किसी भी समाज के लिए उचित नहीं है. मेरा विश्वास है कि जो व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही भविष्य की ओर अधिक आत्मविश्वास के साथ बढ़ सकता है.

इसके साथ ही पुस्तक पर्यावरण के प्रति जागरूकता का भी संदेश देती है. हम अक्सर राष्ट्रसेवा को बहुत बड़े कार्यों से जोड़कर देखते हैं, जबकि अपने आसपास के समाज, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी राष्ट्र निर्माण का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवेश के प्रति सजग हो जाए, तो बड़े परिवर्तन स्वतः संभव हो सकते हैं.

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा है. आज के समय में तनाव, अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं. मेरा मानना है कि समाज को ऐसे लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील और सहायक बनने की आवश्यकता है. कई बार किसी व्यक्ति को केवल थोड़े से अपनत्व, संवाद और सहयोग की आवश्यकता होती है. यदि हम अपने आसपास के लोगों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाएँ, तो अनेक समस्याओं को प्रारंभिक स्तर पर ही कम किया जा सकता है.

अंततः यह पुस्तक युवाओं को यह संदेश देती है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों या कुछ विशेष लोगों की जिम्मेदारी नहीं है. हर नागरिक, चाहे वह शिक्षक हो, किसान हो, व्यापारी हो, छात्र हो या किसी भी क्षेत्र में कार्यरत हो, अपने छोटे-छोटे सकारात्मक प्रयासों के माध्यम से देश के विकास में योगदान दे सकता है. जब व्यक्ति अपने समाज, पर्यावरण और लोगों के प्रति जिम्मेदारी महसूस करने लगता है, तभी वास्तविक अर्थों में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया मजबूत होती है.

प्रश्न: आपकी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देश’ कब पाठकों के लिए उपलब्ध होगी और उनसे आपकी क्या अपेक्षाएँ हैं?

अभिषेक चौहान: मेरी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ प्रकाशित हो चुकी है, केवल इसके विमोचन का इंतजार है और जून में ही इसका विमोचन हो जाएगा. इसके अलावा पुस्तक की प्री-बुकिंग भी शुरू हो गई है और यह अमेजन व फ्लिपकार्ट पर खरीदारी के लिए उपलब्ध है. 

मैं आपको बताना चाहूंगा कि एक लेखक के रूप में मेरी सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि पाठक इसे केवल एक कहानी के रूप में न पढ़ें, बल्कि इसके भीतर निहित विचारों, सामाजिक सरोकारों और अपने समाज व परिवेश के प्रति जिम्मेदारी के भाव को भी महसूस करें. यदि यह पुस्तक पाठकों को अपनी जड़ों, अपने समाज और अपने देश के प्रति थोड़ा अधिक सजग और संवेदनशील बना सके, तो मैं अपने लेखन को सार्थक मानूँगा.

निष्कर्ष

‘उड़ चल अपने देस’ केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, पर्यावरण और राष्ट्र के प्रति नागरिक जिम्मेदारी का एक विचारोत्तेजक दस्तावेज भी है. पुस्तक के माध्यम से अभिषेक चौहान युवाओं को अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने का संदेश देते हैं. साथ ही वे मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता, सामुदायिक सहयोग, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्र निर्माण में व्यक्तिगत योगदान की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं.

लेखक का मानना है कि देशभक्ति केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आसपास के समाज, लोगों और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार में निहित है। इतिहास से सीख लेते हुए, वर्तमान चुनौतियों को समझते हुए और भविष्य के प्रति सजग रहते हुए ही एक मजबूत और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव है. ‘उड़ चल अपने देस’ इसी चेतना को जागृत करने का एक सार्थक प्रयास है, जो पाठकों को केवल कहानी नहीं, बल्कि अपने समाज और देश के प्रति एक नई दृष्टि भी प्रदान करती है.


मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, भोपाल में 91 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

बशीर बद्र अपनी गजलों और यादगार शेरों के लिए हमेशा याद किए जाएंगे. उनकी कई रचनाएं आज भी लोगों की जुबान पर हैं और उर्दू साहित्य में उनका योगदान हमेशा अमर रहेगा.

Last Modified:
Friday, 29 May, 2026
BWHindia

प्रसिद्ध हिंदी-उर्दू शायर और साहित्य जगत की चर्चित हस्ती डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर भोपाल स्थित उनके आवास पर निधन हो गया. उनके बेटे तैयब बद्र ने इसकी पुष्टि की. वह 91 वर्ष के थे. उनके निधन की खबर के बाद साहित्य और कला जगत में शोक की लहर फैल गई है.

लंबे समय से चल रही थी बीमारी

परिवार के मुताबिक बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया (स्मृतिलोप) और उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे. पिछले कुछ महीनों में उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी और उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग दूरी बना ली थी. बताया गया कि उनकी स्मरण शक्ति काफी हद तक खत्म हो चुकी थी और वे अपने करीबियों को भी पहचान नहीं पा रहे थे. गुरुवार को बकरीद के दिन उन्होंने भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली.

उर्दू शायरी की सबसे प्रभावशाली आवाजों में थे शामिल

पद्मश्री और साहित्य अकामदी सम्मान से सम्मानित बशीर बद्र को आधुनिक उर्दू शायरी की सबसे प्रभावशाली आवाजों में गिना जाता था. उनकी शायरी ने कई पीढ़ियों के पाठकों और कविता प्रेमियों को गहराई से प्रभावित किया. मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों और जिंदगी के एहसासों को उन्होंने बेहद सरल लेकिन असरदार अंदाज में अपनी गजलों में पिरोया. यही वजह रही कि उन्हें देश-विदेश में अपार सम्मान और लोकप्रियता मिली.

अयोध्या से अलीगढ़ और फिर भोपाल तक का सफर

15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे डॉ. बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और पीएचडी पूरी की थी. बाद में उन्होंने मेरठ कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में लंबा समय तक सेवाएं दीं. शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान बेहद अहम माना जाता है.

जावेद अख्तर ने दी श्रद्धांजलि

प्रख्यात गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने भी बशीर बद्र को श्रद्धांजलि अर्पित की. उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, “आज हमारी भाषा उर्दू थोड़ी और गरीब हो गई. बेहद मधुर शायर बशीर बद्र हमारी महफिल से हमेशा के लिए रुखसत हो गए. यह शायर और उसकी शायरी हमेशा हमारी यादों में जिंदा रहेगी.”

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जताया दुख

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी बशीर बद्र के निधन पर दुख जताया. उन्होंने कहा, “पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध शायर डॉ. बशीर बद्र जी के निधन पर विनम्र श्रद्धांजलि. उनकी रचनाओं ने संवेदनशीलता, आत्मीयता और इंसानियत के साथ जीवन जीने का संदेश दिया. ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति और परिजनों व प्रशंसकों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करे.”

 


तुषार मेहता की पुस्तकें न्याय व्यवस्था में बदलाव और चुनौतियों को गहराई से समझने में मददगार: अमित शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को भारत मंडपम में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की पुस्तकों ‘द बेंच, द बार, एंड द बिजार’ और ‘द लॉफुल एंड द ऑफुल’ का विमोचन किया.

Last Modified:
Monday, 11 May, 2026
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नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में रविवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दो पुस्तकों ‘द बेंच, द बार, एंड द बिजार’ और ‘द लॉफुल एंड द ऑफुल’ के विमोचन का भव्य आयोजन हुआ. 1500 सीटों वाला सभागार पूरी तरह भरा हुआ था और इस कार्यक्रम में विशेष रूप से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हुए. 

अमित शाह और तुषार मेहता की 30 साल पुरानी दोस्ती

पुस्तक विमोचन के दौरान अमित शाह ने अपने संबोधन में तुषार मेहता के साथ अपनी लंबी मित्रता का जिक्र करते हुए कहा, “तुषार के साथ मेरी दोस्ती 30 साल पुरानी है.” उन्होंने यह भी बताया कि तुषार मेहता को बचपन से ही उर्दू शायरी, किताबों और साहित्य से गहरा लगाव रहा है.

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था दुनिया के लिए उदाहरण

कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय लोकतंत्र और संविधान की 76 वर्षों की यात्रा पर विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था लगातार मजबूत हुई है और यह दुनिया के लिए उदाहरण है. उन्होंने कहा, “1947 से आज तक इस देश में संसद और विधानसभाओं के माध्यम से जितने भी परिवर्तन हुए, उन्हें बिना किसी खून-खराबे के स्वीकार किया गया, जो भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है.”

अमित शाह ने न्यायपालिका के सामने आ रही नई चुनौतियों, विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक के प्रभाव पर भी बात की. उन्होंने कहा कि तुषार मेहता की ये पुस्तकें न्याय व्यवस्था में आने वाले बदलावों और संभावित चुनौतियों को गहराई से समझने में मदद करती हैं. शाह ने कहा कि तकनीक का उपयोग बढ़ेगा, लेकिन उसके प्रभावों का मूल्यांकन भी जरूरी है.

“मातृत्व को समर्पित भावनात्मक संदेश”

अमित शाह ने इस अवसर पर तुषार मेहता द्वारा अपनी मां को पुस्तक समर्पित करने को बेहद भावुक और प्रतीकात्मक कदम बताया. उन्होंने कहा कि मदर्स डे के दिन यह समर्पण विशेष महत्व रखता है और भारत में हर दिन मातृत्व का सम्मान किया जाता है.

तुषार मेहता का आभार और पारिवारिक उपस्थिति

तुषार मेहता ने अमित शाह का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि वे अपने परिवार के साथ कार्यक्रम में शामिल हुए. इस अवसर पर उनकी पत्नी सोनल और बहू ऋषिता उपस्थित थीं. उन्होंने कहा कि अमित शाह, अगर गृह मंत्री न भी होते, तब भी वे उनके पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होते. साथ ही उन्होंने सोनल भाभी और ऋषिता का भी आभार व्यक्त किया.

यह कार्यक्रम कानूनी जगत में एक महत्वपूर्ण विमर्श की शुरुआत माना जा रहा है, खासकर न्याय व्यवस्था, AI और तकनीक के बदलते प्रभावों के संदर्भ में.
 

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वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता की नई किताब ‘Revolutionary Raj’ आज होगी लॉन्च, मोदी के 25 साल के सफर की तस्वीरें और विश्लेषण

यह किताब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 25 वर्षों के राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन को तस्वीरों और विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 21 February, 2026
Last Modified:
Saturday, 21 February, 2026
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वरिष्ठ पत्रकार और पद्मश्री सम्मानित आलोक मेहता आज अपनी नई कॉफी-टेबल बुक “Revolutionary Raj – Narendra Modi’s 25 Years” का लोकार्पण करने जा रहे हैं. यह किताब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 25 वर्षों के राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन को तस्वीरों और विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करती है. कार्यक्रम शाम 4 बजे नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित होगा.  यह किताब गुरुग्राम की शुभी पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित की गई है. कार्यक्रम का संचालन बिजनेस वर्ल्ड और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा करेंगे.

 

कार्यक्रम में शामिल होंगे कई बड़े नेता

इस कार्यक्रम में कई वरिष्ठ नेताओं और गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रहेगी. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, अर्थशास्त्री और 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एन. के. सिंह, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंहऔर पूर्व केंद्रीय मंत्री के. जे. अल्फोंस मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे. किताब की भूमिका (Foreword) केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लिखी है, जो इसे और भी विशेष बनाती है.

किताब की खासियत

“Revolutionary Raj” नरेंद्र मोदी के 25 साल के राजनीतिक और प्रशासनिक सफर को विस्तार से पेश करती है. इसमें उनके नेतृत्व, निर्णय, और देश में आए बदलावों को तस्वीरों और विश्लेषण के माध्यम से समझाया गया है.

किताब में पंचायत स्तर पर हुए सुधार, ग्रामीण विकास, बिजली और पानी की उपलब्धता, औद्योगिक विकास, सामाजिक सुधार, स्वास्थ्य योजनाएं जैसे आयुष्मान भारत, शिक्षा, और विदेश नीति समेत अन्य प्रमुख पहलुओं को शामिल किया गया है.

आलोक मेहता का संदेश

आलोक मेहता देश के जाने-माने पत्रकार हैं और कई बड़े अखबारों व संस्थानों से जुड़े रहे हैं. उन्होंने कार्यक्रम में आमंत्रित सभी लोगों को शामिल होने का न्यौता दिया है और कहा कि यह किताब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और देश के परिवर्तन के 25 वर्षों का संकलित दस्तावेज है.


Rupa Publications ने 'Case for Ram' नामक नई किताब के विमोचन की घोषणा की

किताब में धर्म, कानून और समाज के संगम को दर्शाया गया; बताई गई वह कानूनी यात्रा जो सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले तक पहुंची

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 29 September, 2025
Last Modified:
Monday, 29 September, 2025
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Rupa Publications ने अनिरुद्ध शर्मा और श्रीधर पोटाराजु द्वारा लिखी गई नई किताब Case for Ram: The Untold Story of Faith, Law, and a Legal Battle that Shaped a Nation के आने वाले विमोचन की घोषणा की.

प्रकाशक के अनुसार, यह किताब धर्म, कानून और समाज के बीच के जटिल संबंधों का विश्लेषण करती है. इसमें वह कानूनी यात्रा विस्तार से बताई गई है, जो भारत के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले तक पहुंची और देश के न्यायिक परिदृश्य को आकार दिया.

अनिरुद्ध शर्मा और श्रीधर पोटाराजु ने इस किताब में मामले के सामाजिक, सांस्कृतिक और कानूनी आयामों का समग्र चित्रण किया है, जिससे पाठकों को न केवल कानूनी प्रक्रिया बल्कि उसके पीछे की संवेदनशीलताओं की भी समझ मिलती है.

Rupa Publications का कहना है कि यह किताब देशभर के पाठकों के लिए उपलब्ध होगी और यह समाज, कानून और धर्म के जटिल मेल को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत साबित होगी.

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Westland Books ने प्रोफेसर प्रतीक राज की नई किताब "Atypical" के रिलीज की घोषणा की

यह किताब मैनेजमेंट के रणनीति (Strategy) विषय पर आधारित है और बिज़नेस की जरूरतों को समझने के लिए एक मजबूत सिद्धांतिक ढांचा (Theoretical Framework) प्रस्तुत करती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 19 February, 2025
Last Modified:
Wednesday, 19 February, 2025
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Westland Books, अपने बिज़नेस इम्प्रिंट Westland Business के तहत, " Atypical: नई दुनिया के लिए पाँच रणनीतिक नियम" नामक किताब लॉन्च कर रहा है. यह किताब UCL और IIMB के प्रोफेसर प्रतीक राज द्वारा लिखी गई है और यह दिखाती है कि कंपनियां पारंपरिक तरीकों से अलग सोचकर और नए रास्ते अपनाकर कैसे सफल हो सकती हैं.  

"Atypical" में प्रतीक राज ने वास्तविक जीवन की कहानियों के ज़रिए यह बताया है कि बिज़नेस तेजी से बदलती दुनिया में कैसे बदलाव लाते हैं, नए विचार अपनाते हैं और आगे बढ़ते हैं. यह किताब मैनेजमेंट के रणनीति (Strategy) विषय पर आधारित है और बिज़नेस की जरूरतों को समझने के लिए एक मजबूत सिद्धांतिक ढांचा (Theoretical Framework) प्रस्तुत करती है. खासतौर पर, यह किताब बिज़नेस लीडर्स और मैनेजर्स के लिए बहुत उपयोगी है; 

प्रतीक राज का कहना है कि "मैंने IIM बैंगलोर में MBA छात्रों को Strategic Stewardship कोर्स पढ़ाया, जिसमें हम कार्यस्थल संस्कृति, कॉर्पोरेट व्यवहार, सार्वजनिक सेवाएँ, स्वास्थ्य, पूंजीवाद और काम के भविष्य जैसे विषयों पर चर्चा करते थे. जब Westland Books के कमीशनिंग एडिटर, औरोदीप ने मुझसे संपर्क किया, तो मुझे लगा कि यह सही समय है. मेरे पास कोर्स की संरचित नोट्स तो थे, लेकिन मैं केवल उन्हें किताब में बदलना नहीं चाहता था. 

उन्होंने कहा कि मैं चाहता था कि यह किताब क्लासरूम चर्चाओं को वास्तविक दुनिया से जोड़े और नए विचारों को जन्म दे. इस किताब में बताया गया है कि 21वीं सदी की जटिलताओं का सामना करने के लिए संगठनों को कैसे विकसित होना चाहिए.यह किताब उन असामान्य और अक्सर अनदेखे किए गए हितधारकों (Stakeholders) पर केंद्रित है, जो भविष्य की इनोवेटिव और प्रभावी रणनीतियों की कुंजी हो सकते हैं."
 


स्मृति शेष- दिल्ली में मालवा की धड़कन और खुशबू की तरह महकते थे डॉ. हरीश भल्ला!

दिल्ला के सांस्कृतिक सम्राट डॉ. हरीश भल्ला का 10 जनवरी 2025 को निधन हो गया. ‘इंडिया न्यूज’ चैनल पर हरीश भल्ला का शो ‘एक कहानी विद डॉ. हरीश भल्ला काफी लोकप्रिय था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 25 January, 2025
Last Modified:
Saturday, 25 January, 2025
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महानगर दिल्ली की निष्ठुर आत्मा में लगातार हलचल मचाए रखने वाली शानदार इंदौरी टीम से जुड़ी हुई एक और शख्सियत इस दुनिया को अलविदा कह गई. करीब दो साल पहले डॉ. वेदप्रताप वैदिक अचानक चले गए थे. अब हाल ही में दिल्ली के सांस्कृतिक सम्राट के रूप में पहचाने जाने वाले डॉ हरीश भल्ला भी हमें छोड़कर चले गए. राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के जाने का दुख खत्म ही नहीं हुआ था कि अब डॉ. भल्ला का निधन हो गया. दिल्ली की गुल्लक में बिना किसी ब्याज के जमा इंदौर के खरे सिक्के जैसे एक-एक करके नियति का शिकार हो रहे हैं. मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के जावरा में जन्मे डॉ. भल्ला ने इंदौर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की. दिल्ली में चिकित्सक और नशामुक्ति विशेषज्ञ के रूप में अपनी सेवाएं देने के साथ-साथ, वे कला, संस्कृति, संगीत और थिएटर के प्रति अपने जुनून के लिए प्रसिद्ध थे.

डॉ भल्ला सिर्फ एक कुशल मनोचिकित्सक ही नहीं थे और भी बहुत कुछ थे. वे केंद्र की राजधानी में इंदौर-मालवा के स्वयं-नियुक्त सांस्कृतिक राजदूत थे. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से दिल्ली की यात्रा पर जाने वाली मालवी आत्माओं के लिए एक ठिकाना थे, आत्मीयता का खजाना थे, मदद का सहारा थे. साल 1971 में जब प्रभाष जोशी जी के साथ काम करने के लिए दिल्ली में राजघाट कॉलोनी स्थित गांधी स्मारक निधि को मैंने अपना ठिकाना बनाया तो सबसे नजदीक उपलब्ध जिस दूसरे परिचित व्यक्ति का ख्याल आया वे डॉ हरीश भल्ला थे. डॉ भल्ला तब राजघाट कॉलोनी से सिर्फ पंद्रह मिनिट की पैदल दूरी पर स्थित पंत हॉस्पिटल में कार्यरत थे. डॉ वैदिक तब दूर सफदरजंग एंक्लेव में रहते थे.

इंदौर मेडिकल कॉलेज के एक चर्चित छात्र नेता थे डॉ. भल्ला

डॉ भल्ला से जुड़ी यादों को 1971 से भी पीछे ले जाना हो तो इंदौर मेडिकल कॉलेज के एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में छवि मन में उभरती है, जो कलरफुल शर्ट्स पहने हुए घूमता था और एक चर्चित छात्र नेता के तौर पर कॉलेज और जिला प्रशासन की नाक में दम किए रहता था. मेडिकल कॉलेज में हरीश भल्ला की तूती बोलती थी. कॉलेज का प्रिंस हॉस्टल जिसकी रियासत थी.  इंदौर के निकट रतलाम जिले के छोटे से शहर जावरा से निकलकर पहले इंदौर और फिर राजधानी में ‘दिल्ली के सांस्कृतिक जार ’(Cultural Czar of Delhi) के रूप में स्वयं को स्थापित करने वाले डॉ भल्ला ने अपने घर का नाम ही ‘जावरा हाउस’ रखा हुआ था. ‘हुसैन टैकरी’ के लिए मशहूर जावरा ब्रिटिश भारत में जावरा रियासत की राजधानी था.

डॉ भल्ला से जुड़ा जावरा का एक अन्य परिचय यह है कि पंडित जवाहर नेहरू के निकटस्थ रहे कश्मीरी राजनेता और 1957 से 1962 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे डॉ कैलाशनाथ काटजू का जन्म भी जावरा में ही हुआ था. जावरा से लगा मंदसौर डॉ काटजू का चुनाव क्षेत्र था. डॉ. काटजू के मुख्यमंत्रित्वकाल में पंडित नेहरू ने जावरा की यात्रा भी की थी. उस दौरान हुए एक कार्यक्रम में तब स्कूली छात्र हरीश भल्ला ने एक सराहनीय सांस्कृतिक प्रस्तुति भी दी थी. जावरा के कारण डॉ भल्ला काटजू परिवार के सभी सदस्यों के साथ अंत तक जुड़े रहे. सांसद विवेक तनखा के साथ तो वे कई संस्थाओं और गतिविधियों में संबद्ध थे.

डॉ. भल्ला से मिलने का ठिकाना था इंडिया इंटरनेशनल सेंटर 

दिल्ली में प्रसाद नगर स्थित डॉ भल्ला का छोटा सा फ्लैट मालवा के लोगों के लिए सराय था और लोदी रोड स्थित प्रतिष्ठित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बाहर से मिलने पहुँचे लोगों से मिलने का ठिकाना. वे दिल्ली में मालवा की कला-संस्कृति और संगीत की धड़कन थे. मेडिकल, राजनीति और  सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़ा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का ऐसा कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं था जो डॉ भल्ला के संपर्क में नहीं आया हो.

संगीत के क्षेत्र में नाम कमाने वाली भारत और पाकिस्तान की ऐसी कोई हस्ती नहीं थी, जिससे डॉ भल्ला के आत्मीय संबंध नहीं रहे हों. ग़ुलाम अली को मित्रों ने उनके घर की महफ़िलों में सुना है. चार दशक होने आए डॉ भल्ला के हवाले से लोक गायिका रेशमा के साथ मैंने खुद इंदौर में एक लंबी बातचीत अपने अंग्रेजी अखबार ‘फ्री प्रेस जर्नल’ के लिए की थी.

शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध गायिका शुभ मुदगल तो डॉ भल्ला को बड़ा भाई मानती थीं और नवोदित कलाकारों को मंच और आवाज देने के लिए उनके साथ मिलकर ‘इंटरनेशनल मेलोडी फाउंडेशन’ की स्थापना की थी.

डॉ हरीश भल्ला और भी बहुत कुछ थे, बहुत कुछ करते थे, काफी कुछ करना चाहते थे. सब कुछ दूसरों के लिए, अपने लिए न तो किसी सम्मान की मांग की और न किसी पुरस्कार के लिए संघर्ष किया. जीवन भर दूसरों के लिए ही सिफारिशें करते रहे, लड़ते रहे. मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी अदालती लड़ाई तो तब देश भर में चर्चा का विषय बन गई थी.

नशामुक्ति के लिए किया काम

डॉ भल्ला मूलतः एक मनोचिकित्सक थे. इस नाते वे एक बड़ी संख्या में ऐसे मरीजों के संपर्क में आए जो दिल्ली की गलियों में चलने वाले नशे के अवैध व्यापार के शिकार हो रहे थे. ऐसे लोगों की व्यथा का अध्ययन कर उन्होंने नशामुक्ति के लिए काम किया. इस दिशा में उनका सबसे बड़ा योगदान दूरदर्शन के लिए ‘ अंधी गलियाँ ‘ नामक शृंखला की प्रस्तुति था, जिसमें नशे के व्यापार और उससे पीड़ित लोगों की सच्ची कहानियों को उन्होंने देश के सामने उजागर किया.

ऐसे याद आएंगे डॉ. भल्ला

डॉ भल्ला की कमी उन तमाम स्नेहियों को अब खलने वाली है, जो राजधानी पहुँचते ही पहला फोन उन्हें करके कहते थे : ‘भैया मैं दिल्ली पहुँच गया हूँ. मुलाकात कब और कहाँ हो सकती है?’ शेर उर्दू का यह है कि शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक, डॉ भल्ला ऐसे परवाने थे जो जिंदगी की शाम होने तक अपने आपको हर रंग में जलाते रहे. डॉ भल्ला के बिना दिल्ली में इंदौर और मालवा की सांस्कृतिक खुशबू की कल्पना नहीं की जा सकेगी.

लेखक-श्रवण गर्ग