ग्रामीण भारत, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र निर्माण की नई कथा ‘उड़ चल अपने देस’

रक्षा मंत्रालय में निदेशक अभिषेक चौहान ने अपनी नई पुस्तक 'उड़ चल अपने देस' के माध्यम से अपने अनुभवों, सामाजिक अवलोकनों और सांस्कृतिक सरोकारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है.

रितु राणा by
Published - Tuesday, 16 June, 2026
Last Modified:
Tuesday, 16 June, 2026
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ग्रामीण भारत की बदलती तस्वीर, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के प्रति बढ़ती उदासीनता, पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता, मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियाँ और राष्ट्र निर्माण में आम नागरिक की भूमिका, ये सभी विषय अभिषेक चौहान की पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ के केंद्र में हैं. भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के आयुक्त स्तर के अधिकारी तथा वर्तमान में रक्षा मंत्रालय में निदेशक की भूमिका निभा रहे अभिषेक चौहान ने अपने अनुभवों, सामाजिक अवलोकनों और सांस्कृतिक सरोकारों को इस पुस्तक के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है.

मध्य प्रदेश के भिंड जिले में पालन-पोषण व प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने वाले अभिषेक चौहान का बचपन चंबल-यमुना दोआब के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में बीता. प्रकृति, भारतीय दर्शन, ग्रामीण जीवन और सामाजिक चेतना उनकी इस पुस्तक के प्रमुख विषय हैं. उनकी नई पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ पर BW हिन्दी की वरिष्ठ संवाददाता रितु राणा ने उनसे विस्तार से बातचीत की. इस चर्चा में पुस्तक की प्रेरणा, इतिहास और साहित्य के संबंध, युवा पीढ़ी के लिए संदेश, पर्यावरण संरक्षण, मानसिक स्वास्थ्य, राष्ट्र निर्माण और लेखन की यात्रा जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर खुलकर संवाद हुआ. प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

प्रश्न: आपकी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देश’ लिखने की प्रेरणा क्या थी? क्या इसके पीछे कोई व्यक्तिगत अनुभव या ऐतिहासिक घटना रही है?

अभिषेक चौहान: इस प्रश्न का उत्तर कई स्तरों पर मौजूद है. यदि संक्षेप में कहूँ तो इस पुस्तक की प्रेरणा मेरे व्यक्तिगत अनुभवों, अपने क्षेत्र के प्रति गहरे लगाव और इतिहास व संस्कृति के प्रति मेरी स्वाभाविक रुचि से मिली है.

मेरा बचपन ब्रज-बुंदेलखंड क्षेत्र में बीता है. उस क्षेत्र की मिट्टी, वहां के लोकजीवन, लोगों की सोच, उनकी जीवनशैली और सांस्कृतिक परंपराओं ने मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. एक सरकारी सेवक के रूप में मैं देश की सेवा कर रहा हूँ, लेकिन मेरे मन में हमेशा यह प्रश्न उठता रहा कि जिस भूमि ने मुझे संस्कार दिए, जिस समाज ने मुझे गढ़ा, उसके प्रति मेरा योगदान क्या है.

यही विचार धीरे-धीरे इस पुस्तक की प्रेरणा बन गया. बचपन में सुनी हुई कहानियाँ, लोककथाएँ, लोगों के संघर्ष, उनकी संवेदनाएँ और समय के साथ देखे गए सामाजिक परिवर्तन मेरे मन में लगातार जमा होते रहे. जब मैंने इन अनुभवों को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखना शुरू किया, तब लगा कि इन्हें केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक भी पहुँचाना चाहिए.

जहाँ तक ऐतिहासिक संदर्भों की बात है, इतिहास ने भी इस पुस्तक की संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. मेरा मानना है कि किसी भी समाज को समझने के लिए उसकी ऐतिहासिक स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत को समझना आवश्यक है. इसलिए पुस्तक में इतिहास, लोकविश्वास और समकालीन यथार्थ को एक साथ पिरोने का प्रयास किया गया है.

मेरा उद्देश्य केवल एक कथा लिखना नहीं था, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना को संरक्षित करना था जो धीरे-धीरे आधुनिक जीवन की गति में कहीं पीछे छूटती जा रही है.

पुस्तक में कई पात्र ऐसे हैं जिनमें एक नहीं, बल्कि अनेक वास्तविक व्यक्तियों की विशेषताओं को समाहित किया गया है. मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का चित्रण करना नहीं था, बल्कि समाज के विभिन्न चरित्रों और प्रवृत्तियों को सामने लाना था. इसलिए पुस्तक में पाठकों को यथार्थ भी मिलेगा और साहित्यिक कल्पना का विस्तार भी.

प्रश्न: पुस्तक के पात्र और घटनाएँ वास्तविकता से कितनी प्रेरित हैं और इसमें कल्पना का कितना विस्तार है?

अभिषेक चौहान: किसी भी लेखक की सबसे बड़ी पूंजी उसके अनुभव होते हैं. व्यक्ति अपने आसपास के लोगों, परिस्थितियों और समाज से जो कुछ सीखता है, वही उसके लेखन का आधार बनता है. इसलिए इस पुस्तक के अधिकांश भाव, परिस्थितियाँ और अनुभव वास्तविक जीवन से प्रेरित हैं. हालाँकि साहित्य केवल दस्तावेजीकरण नहीं होता. यदि लेखक हर व्यक्ति और घटना को ज्यों-का-त्यों लिख दे तो वह साहित्य नहीं, बल्कि विवरण मात्र रह जाएगा. इसलिए रचनात्मक स्वतंत्रता की भी आवश्यकता होती है.

इस पुस्तक में कई पात्र ऐसे हैं जिनमें एक से अधिक वास्तविक व्यक्तियों के गुणों का समावेश किया गया है. किसी पात्र की संवेदनशीलता एक व्यक्ति से प्रेरित हो सकती है, उसकी जीवन-दृष्टि किसी दूसरे से और उसका संघर्ष किसी तीसरे व्यक्ति से. इस प्रकार कई वास्तविक अनुभवों को एक पात्र या एक घटना में समेटा गया है.

मैं कहूँगा कि पुस्तक का भाव और उसकी आत्मा पूरी तरह वास्तविक है, लेकिन उसे साहित्यिक रूप देने के लिए कल्पना और रचनात्मक संरचना का सहारा लिया गया है. यही कारण है कि पाठकों को इसमें अपने जीवन और अपने आसपास के समाज की झलक दिखाई दे सकती है.

प्रश्न: आपने पुस्तक के कुछ अंशों को AI आधारित वीडियो के रूप में प्रस्तुत किया है. क्या आपको लगता है कि AI साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है?

अभिषेक चौहान: बिल्कुल. मैं मानता हूँ कि समय के साथ संवाद के माध्यम बदलते हैं और साहित्य को भी बदलते समय के अनुरूप नए माध्यमों को अपनाना चाहिए. आज की पीढ़ी सूचना और तकनीक के ऐसे दौर में जी रही है जहाँ दृश्य और श्रव्य माध्यमों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया है. पुस्तक पढ़ने की आदत अभी भी मौजूद है, लेकिन उसकी प्रकृति बदल रही है. युवा वर्ग कम समय में अधिक सामग्री ग्रहण करना चाहता है.

मैंने अपने आसपास भी देखा है कि हिंदी भाषी परिवारों में पले-बढ़े बच्चे भी धीरे-धीरे हिंदी साहित्य से दूर होते जा रहे हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी रुचि समाप्त हो गई है, बल्कि माध्यम बदल गए हैं. ऐसे में यदि साहित्य को ऑडियो-विज़ुअल स्वरूप में प्रस्तुत किया जाए तो वह अधिक सहजता से लोगों तक पहुँच सकता है.

AI इस दिशा में एक महत्वपूर्ण साधन बन सकता है. यदि किसी पुस्तक के विचार, पात्र और भावनाएँ दृश्य माध्यम के जरिए पाठकों तक पहुँचें तो वे उसे अधिक आसानी से समझ सकते हैं और उससे जुड़ाव महसूस कर सकते हैं. मेरा मानना है कि AI साहित्य का विकल्प नहीं, बल्कि उसका विस्तार है. यह नई पीढ़ी को पुस्तक तक लाने का एक प्रभावी पुल बन सकता है.

प्रश्न: ‘उड़ चल अपने देश’ शीर्षक अपने आप में भावनात्मक और देशभक्ति की भावना जगाता है. पाठकों के लिए इसका मूल संदेश क्या है?

अभिषेक चौहान: मेरे लिए ‘देश’ केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं है. देश उन लोगों, संस्कृतियों, मूल्यों और स्मृतियों का समुच्चय है जो हमें हमारी पहचान देते हैं. आज अक्सर युवाओं के मन में यह प्रश्न होता है कि वे देश की सेवा कैसे कर सकते हैं. बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनेताओं, बड़े उद्योगपतियों, सैन्य अधिकारियों या आर्थिक रूप से सक्षम लोगों की जिम्मेदारी है. मैं इस धारणा से सहमत नहीं हूँ.

मेरा मानना है कि राष्ट्र निर्माण का आरंभ व्यक्ति से होता है. यदि कोई शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाता है, कोई किसान पूरी निष्ठा से खेती करता है, कोई सरकारी कर्मचारी अपने दायित्वों का पालन करता है और कोई नागरिक अपने सामाजिक कर्तव्यों को समझता है, तो वह भी उतनी ही महत्वपूर्ण राष्ट्र सेवा कर रहा है.

इस पुस्तक के माध्यम से मैं यही संदेश देना चाहता हूँ कि देशभक्ति केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में किए जाने वाले छोटे-छोटे जिम्मेदार कार्यों का नाम है. जब प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी समझेगा, तभी एक मजबूत और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव होगा.

प्रश्न: आपने पुस्तक में इतिहास के अनेक संदर्भों का उल्लेख किया है. इसके पीछे क्या उद्देश्य रहा?

अभिषेक चौहान: मेरा मानना है कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि किसी समाज की सामूहिक स्मृति और उसकी सांस्कृतिक चेतना का आधार होता है. इसी सोच के साथ मैंने पुस्तक में विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों, पात्रों और प्रसंगों का उल्लेख किया है.

पुस्तक में जहाँ-जहाँ आवश्यकता महसूस हुई, वहाँ बुद्धकाल, महाभारतकाल, कालिदास के युग तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े अनेक संदर्भों को कथा के भीतर स्वाभाविक रूप से पिरोने का प्रयास किया गया है. मैंने 'वंदे मातरम्' और उससे जुड़े साहित्यिक स्रोतों का भी उल्लेख किया है, क्योंकि अक्सर हम कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को सामान्य ज्ञान के रूप में तो जानते हैं, लेकिन उनके पीछे की पूरी कहानी जानने का प्रयास नहीं करते.

दरअसल मेरा उद्देश्य पाठकों को इतिहास पढ़ाना नहीं था, बल्कि उनकी जिज्ञासा को जागृत करना था. यदि कोई पाठक कहानी पढ़ते समय किसी ऐतिहासिक पात्र, घटना या ग्रंथ का उल्लेख देखकर उसके बारे में आगे जानने की इच्छा महसूस करे, तो मैं इसे अपनी सफलता मानूँगा. आज AI, इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों के दौर में जानकारी तक पहुँचना पहले से कहीं अधिक आसान है. ऐसे में साहित्य पाठकों को इतिहास और संस्कृति की ओर प्रेरित करने का एक प्रभावी माध्यम बन सकता है.

मैंने यह भी महसूस किया है कि नई पीढ़ी के एक वर्ग में इतिहास के प्रति उदासीनता बढ़ रही है. अक्सर यह तर्क सुनने को मिलता है कि जो बीत गया, उसके बारे में जानकर क्या लाभ. लेकिन मेरा मानना है कि इतिहास कभी निरर्थक नहीं होता. वह हमें बताता है कि किन परिस्थितियों में कौन-से निर्णय लिए गए, उनके परिणाम क्या रहे, और उनसे वर्तमान के लिए क्या सीख ली जा सकती है. इतिहास हमें केवल अतीत नहीं बताता, बल्कि भविष्य के प्रति भी सजग बनाता है.

इसीलिए मैंने इतिहास को पुस्तक में अलग विषय की तरह प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसे कथा का स्वाभाविक हिस्सा बनाया है, ताकि पाठक मनोरंजन के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ सकें. यदि इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों में इतिहास, साहित्य और अपनी जड़ों को जानने की थोड़ी-सी भी रुचि पैदा होती है, तो मैं अपने प्रयास को सार्थक मानूँगा.

प्रश्न: क्या पुस्तक के ऐतिहासिक संदर्भ पूरी तरह तथ्यात्मक हैं या उनमें साहित्यिक कल्पना का भी समावेश है?

अभिषेक चौहान: इतिहास से जुड़े सभी संदर्भों का आधार वास्तविक घटनाएँ, पात्र और परंपराएँ हैं. हालाँकि यह कोई इतिहास की पुस्तक नहीं है, बल्कि एक साहित्यिक कृति है. इसलिए कथा की आवश्यकता के अनुसार कुछ प्रसंगों को प्रतीकात्मक और साहित्यिक रूप में प्रस्तुत किया गया है. मैंने यथार्थ, लोकस्मृतियों, सुनी-सुनाई बातों और अपनी कल्पना, इन सभी का संतुलित उपयोग किया है, ताकि कहानी प्रभावी भी बने और उसका मूल संदेश भी पाठकों तक पहुँच सके.

प्रश्न: आपकी पुस्तक में ग्रामीण भारत का चित्रण काफी प्रमुख दिखाई देता है. इसके पीछे क्या सोच रही?

अभिषेक चौहान: मेरी परवरिश जिस सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में हुई, उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से मेरे लेखन में दिखाई देता है. मैंने ग्रामीण भारत के उन अनुभवों, मान्यताओं, संघर्षों और विशेषताओं को सहेजने का प्रयास किया है, जिन्हें मैंने स्वयं देखा, सुना और महसूस किया है.

मेरा विश्वास है कि बदलते समय में बहुत-सी सामाजिक स्मृतियाँ धीरे-धीरे विलुप्त हो जाती हैं. साहित्य उन्हें संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है. इसलिए मैंने ग्रामीण जीवन के कुछ ऐसे पहलुओं को कथा में स्थान दिया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए उस दौर का एक सांस्कृतिक दस्तावेज बन सकें.

प्रश्न: क्या आप अपनी पुस्तक को केवल एक उपन्यास मानते हैं या सामाजिक दस्तावेज भी?

अभिषेक चौहान: मेरे लिए यह केवल एक कहानी नहीं है. मैं इसे अपने समय, समाज और परिवेश के कुछ महत्वपूर्ण अनुभवों को दर्ज करने का प्रयास मानता हूँ. निश्चित रूप से यह एक साहित्यिक कृति है, लेकिन इसके भीतर सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक स्मृतियाँ और सामुदायिक अनुभव भी मौजूद हैं.

मैं यह दावा नहीं करूँगा कि यह किसी कालखंड का संपूर्ण दस्तावेज है, क्योंकि ऐसा कोई भी लेखक नहीं कर सकता. लेकिन मैंने अपने सीमित अनुभवों और समझ के आधार पर उस समय और समाज की कुछ महत्वपूर्ण झलकियों को सहेजने का ईमानदार प्रयास अवश्य किया है.

प्रश्न: आप रक्षा मंत्रालय में निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं. इतनी व्यस्त जिम्मेदारियों के बीच लेखन के लिए समय कैसे निकालते हैं?

अभिषेक चौहान: मैं हमेशा एक बात में विश्वास करता हूँ कि *“जहाँ इच्छा होती है, वहाँ रास्ता भी निकल आता है.”* वास्तव में समय किसी के पास अतिरिक्त नहीं होता. हम सभी को दिन के वही 24 घंटे मिलते हैं, अंतर केवल इस बात का होता है कि हम अपनी प्राथमिकताएँ कैसे निर्धारित करते हैं.

मेरे लिए लेखन कोई अचानक शुरू हुआ शौक नहीं है, बल्कि यह आत्म-अभिव्यक्ति और समाज से संवाद का एक माध्यम रहा है. जब आपके भीतर कोई विचार लंबे समय तक आकार ले रहा हो और आप उसे शब्दों में ढालने की जिम्मेदारी महसूस करते हों, तब आप स्वाभाविक रूप से उसके लिए समय निकाल लेते हैं.

इस पुस्तक को पूरा करने में मुझे एक वर्ष से अधिक का समय लगा. इस दौरान कार्यालय की जिम्मेदारियाँ अपनी जगह थीं और उनका निर्वहन हमेशा मेरी प्राथमिकता रहा. लेखन का अधिकांश कार्य मैंने अपने व्यक्तिगत समय में किया. निश्चित रूप से इसके लिए कुछ व्यक्तिगत सुविधाओं और अवकाश के क्षणों में समझौता करना पड़ा, लेकिन जब किसी कार्य के पीछे स्पष्ट उद्देश्य और आंतरिक प्रतिबद्धता हो, तो वह बोझ नहीं लगता.

मेरा मानना है कि यदि किसी व्यक्ति के पास कोई सार्थक लक्ष्य है, तो समय कभी सबसे बड़ी बाधा नहीं बनता. अनुशासन, निरंतरता और धैर्य के साथ दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाया जा सकता है. यही प्रयास मैंने भी किया है.

प्रश्न: क्या रक्षा मंत्रालय में काम करने के आपके अनुभवों का इस पुस्तक पर कोई प्रभाव पड़ा है?

अभिषेक चौहान: प्रत्यक्ष रूप से नहीं. रक्षा मंत्रालय देश के सबसे संवेदनशील मंत्रालयों में से एक है और मैंने पूरी सावधानी रखी है कि पुस्तक की कथा, पात्रों, घटनाओं या विचारों का मंत्रालय अथवा किसी सरकारी कार्यप्रणाली से कोई प्रत्यक्ष संबंध न स्थापित हो. पुस्तक का संसार पूरी तरह स्वतंत्र है और इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए.

हालाँकि, यदि व्यापक स्तर पर बात करें, तो किसी भी व्यक्ति के कार्यस्थल और अनुभव उसके दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं. रक्षा मंत्रालय में कार्य करते हुए देश, समाज और राष्ट्रीय हितों से जुड़े अनेक विषयों को निकटता से देखने और समझने का अवसर मिलता है. इससे राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और व्यापक दृष्टि का भाव निश्चित रूप से मजबूत होता है.

लेकिन मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूँगा कि देशप्रेम की भावना मेरे भीतर किसी पद या दायित्व के कारण नहीं आई. यह भावना मेरे संस्कारों, पारिवारिक परिवेश और सामाजिक अनुभवों का हिस्सा हमेशा से रही है. रक्षा मंत्रालय में कार्य करने से उस भावना को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य अवश्य मिला है, परंतु पुस्तक की मूल प्रेरणा मेरे अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत अनुभवों से निकली है.

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि पुस्तक पर रक्षा मंत्रालय का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं है, लेकिन राष्ट्र, समाज और अपने परिवेश के प्रति जो संवेदनशीलता मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है, वह कहीं न कहीं पुस्तक के भावबोध में अवश्य दिखाई दे सकती है.

प्रश्न: आपकी पुस्तक में क्या कोई केंद्रीय नायक है, या आपने कथा को सामूहिक पात्रों के माध्यम से आगे बढ़ाया है?

अभिषेक चौहान: हाँ, पुस्तक में एक केंद्रीय पात्र अवश्य है, जिसका नाम ओमकार है. लेकिन मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैंने इस कथा को पारंपरिक अर्थों में ‘नायक-केंद्रित’ बनाने का प्रयास नहीं किया है.

मेरे विचार से समाज का निर्माण किसी एक व्यक्ति के प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और समूह की शक्ति से होता है. इसलिए यद्यपि ओमकार कथा की वैचारिक धुरी है और घटनाओं को दिशा देता है, फिर भी मैं उसे अकेला नायक नहीं मानता. उसके साथ जुड़े लोग, उसके साथी और उसके विचारों को आगे बढ़ाने वाले सभी पात्र कथा के समान रूप से महत्वपूर्ण अंग हैं.

वास्तव में, मैंने पुस्तक में व्यक्तिवाद से अधिक संगठन और सामूहिकता की भावना को महत्व दिया है. इतिहास गवाह है कि कई बार नायक-पूजा अनजाने में अधिनायकवाद की ओर भी ले जाती है. इसलिए मैंने यह प्रयास किया है कि पाठक किसी एक व्यक्ति से अधिक उस विचार, उस समूह और उस सामाजिक चेतना को समझें, जो परिवर्तन का वास्तविक आधार बनती है. इस दृष्टि से देखें तो ओमकार एक पात्र मात्र नहीं, बल्कि एक विचार का प्रतिनिधि है, जबकि उसके साथ चलने वाले सभी लोग उस विचार को जीवंत बनाने वाली शक्ति हैं.

प्रश्न: यदि भविष्य में आपकी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देश’ पर फिल्म या वेब सीरीज़ बनती है, तो आप ओमकार की भूमिका में किस अभिनेता को देखना चाहेंगे?

अभिषेक चौहान: यह एक रोचक प्रश्न है. सच कहूँ तो इस विषय पर मैंने कई बार विचार किया है और मित्रों के साथ भी चर्चा हुई है. जब मैं कॉलेज में था, तब फिल्म 'स्वदेस' ने मुझ पर गहरा प्रभाव छोड़ा था. उस फिल्म में जिस संवेदनशीलता, सामाजिक प्रतिबद्धता और देश के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को प्रस्तुत किया गया, वह मेरे मन में आज भी कहीं न कहीं मौजूद है.

ओमकार का चरित्र भी कुछ हद तक उसी प्रकार का है, वह एक साथ आधुनिक भी है और अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ भी. उसमें संवेदनशीलता है, नेतृत्व क्षमता है और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव भी है. इसलिए यदि मुझे किसी एक अभिनेता का नाम लेना हो, तो मैं शाह रुख खान को इस भूमिका के लिए उपयुक्त मानूँगा. हालाँकि आमिर खान जैसे कलाकार भी इस प्रकार के विचारप्रधान और सामाजिक सरोकारों वाले पात्रों को प्रभावशाली ढंग से निभाने की क्षमता रखते हैं. लेकिन यदि मेरी व्यक्तिगत पसंद पूछी जाए, तो ओमकार के चरित्र में मैं शाहरुख खान को देखना पसंद करूँगा, क्योंकि उनमें संवेदनशीलता और जनसरोकारों को अभिव्यक्त करने की एक विशिष्ट क्षमता है. हालाँकि अंततः यह निर्णय निर्देशक और निर्माता की रचनात्मक दृष्टि पर निर्भर करेगा.

प्रश्न: आपकी पुस्तक युवा पीढ़ी को क्या संदेश देती है?

अभिषेक चौहान: यह पुस्तक मुख्य रूप से युवा पीढ़ी को समर्पित है. मेरा मानना है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं की सोच, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना पर निर्भर करता है. इसलिए मैंने इस पुस्तक के माध्यम से युवाओं तक कुछ ऐसे संदेश पहुँचाने का प्रयास किया है, जो केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहकर समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से भी जुड़े हों.

पुस्तक युवाओं को अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने का संदेश देती है. आधुनिकता और वैश्विक दृष्टिकोण आवश्यक हैं, लेकिन अपनी पहचान और अपने मूल स्रोतों को भूल जाना किसी भी समाज के लिए उचित नहीं है. मेरा विश्वास है कि जो व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही भविष्य की ओर अधिक आत्मविश्वास के साथ बढ़ सकता है.

इसके साथ ही पुस्तक पर्यावरण के प्रति जागरूकता का भी संदेश देती है. हम अक्सर राष्ट्रसेवा को बहुत बड़े कार्यों से जोड़कर देखते हैं, जबकि अपने आसपास के समाज, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी राष्ट्र निर्माण का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवेश के प्रति सजग हो जाए, तो बड़े परिवर्तन स्वतः संभव हो सकते हैं.

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा है. आज के समय में तनाव, अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं. मेरा मानना है कि समाज को ऐसे लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील और सहायक बनने की आवश्यकता है. कई बार किसी व्यक्ति को केवल थोड़े से अपनत्व, संवाद और सहयोग की आवश्यकता होती है. यदि हम अपने आसपास के लोगों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाएँ, तो अनेक समस्याओं को प्रारंभिक स्तर पर ही कम किया जा सकता है.

अंततः यह पुस्तक युवाओं को यह संदेश देती है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों या कुछ विशेष लोगों की जिम्मेदारी नहीं है. हर नागरिक, चाहे वह शिक्षक हो, किसान हो, व्यापारी हो, छात्र हो या किसी भी क्षेत्र में कार्यरत हो, अपने छोटे-छोटे सकारात्मक प्रयासों के माध्यम से देश के विकास में योगदान दे सकता है. जब व्यक्ति अपने समाज, पर्यावरण और लोगों के प्रति जिम्मेदारी महसूस करने लगता है, तभी वास्तविक अर्थों में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया मजबूत होती है.

प्रश्न: आपकी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देश’ कब पाठकों के लिए उपलब्ध होगी और उनसे आपकी क्या अपेक्षाएँ हैं?

अभिषेक चौहान: मेरी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ प्रकाशित हो चुकी है, केवल इसके विमोचन का इंतजार है और जून में ही इसका विमोचन हो जाएगा. मैं आपको बताना चाहूंगा कि एक लेखक के रूप में मेरी सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि पाठक इसे केवल एक कहानी के रूप में न पढ़ें, बल्कि इसके भीतर निहित विचारों, सामाजिक सरोकारों और अपने समाज व परिवेश के प्रति जिम्मेदारी के भाव को भी महसूस करें. यदि यह पुस्तक पाठकों को अपनी जड़ों, अपने समाज और अपने देश के प्रति थोड़ा अधिक सजग और संवेदनशील बना सके, तो मैं अपने लेखन को सार्थक मानूँगा.

निष्कर्ष

‘उड़ चल अपने देस’ केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, पर्यावरण और राष्ट्र के प्रति नागरिक जिम्मेदारी का एक विचारोत्तेजक दस्तावेज भी है. पुस्तक के माध्यम से अभिषेक चौहान युवाओं को अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने का संदेश देते हैं. साथ ही वे मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता, सामुदायिक सहयोग, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्र निर्माण में व्यक्तिगत योगदान की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं.

लेखक का मानना है कि देशभक्ति केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आसपास के समाज, लोगों और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार में निहित है। इतिहास से सीख लेते हुए, वर्तमान चुनौतियों को समझते हुए और भविष्य के प्रति सजग रहते हुए ही एक मजबूत और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव है. ‘उड़ चल अपने देस’ इसी चेतना को जागृत करने का एक सार्थक प्रयास है, जो पाठकों को केवल कहानी नहीं, बल्कि अपने समाज और देश के प्रति एक नई दृष्टि भी प्रदान करती है.


मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, भोपाल में 91 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

बशीर बद्र अपनी गजलों और यादगार शेरों के लिए हमेशा याद किए जाएंगे. उनकी कई रचनाएं आज भी लोगों की जुबान पर हैं और उर्दू साहित्य में उनका योगदान हमेशा अमर रहेगा.

Last Modified:
Friday, 29 May, 2026
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प्रसिद्ध हिंदी-उर्दू शायर और साहित्य जगत की चर्चित हस्ती डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर भोपाल स्थित उनके आवास पर निधन हो गया. उनके बेटे तैयब बद्र ने इसकी पुष्टि की. वह 91 वर्ष के थे. उनके निधन की खबर के बाद साहित्य और कला जगत में शोक की लहर फैल गई है.

लंबे समय से चल रही थी बीमारी

परिवार के मुताबिक बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया (स्मृतिलोप) और उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे. पिछले कुछ महीनों में उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी और उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग दूरी बना ली थी. बताया गया कि उनकी स्मरण शक्ति काफी हद तक खत्म हो चुकी थी और वे अपने करीबियों को भी पहचान नहीं पा रहे थे. गुरुवार को बकरीद के दिन उन्होंने भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली.

उर्दू शायरी की सबसे प्रभावशाली आवाजों में थे शामिल

पद्मश्री और साहित्य अकामदी सम्मान से सम्मानित बशीर बद्र को आधुनिक उर्दू शायरी की सबसे प्रभावशाली आवाजों में गिना जाता था. उनकी शायरी ने कई पीढ़ियों के पाठकों और कविता प्रेमियों को गहराई से प्रभावित किया. मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों और जिंदगी के एहसासों को उन्होंने बेहद सरल लेकिन असरदार अंदाज में अपनी गजलों में पिरोया. यही वजह रही कि उन्हें देश-विदेश में अपार सम्मान और लोकप्रियता मिली.

अयोध्या से अलीगढ़ और फिर भोपाल तक का सफर

15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे डॉ. बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और पीएचडी पूरी की थी. बाद में उन्होंने मेरठ कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में लंबा समय तक सेवाएं दीं. शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान बेहद अहम माना जाता है.

जावेद अख्तर ने दी श्रद्धांजलि

प्रख्यात गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने भी बशीर बद्र को श्रद्धांजलि अर्पित की. उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, “आज हमारी भाषा उर्दू थोड़ी और गरीब हो गई. बेहद मधुर शायर बशीर बद्र हमारी महफिल से हमेशा के लिए रुखसत हो गए. यह शायर और उसकी शायरी हमेशा हमारी यादों में जिंदा रहेगी.”

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जताया दुख

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी बशीर बद्र के निधन पर दुख जताया. उन्होंने कहा, “पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध शायर डॉ. बशीर बद्र जी के निधन पर विनम्र श्रद्धांजलि. उनकी रचनाओं ने संवेदनशीलता, आत्मीयता और इंसानियत के साथ जीवन जीने का संदेश दिया. ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति और परिजनों व प्रशंसकों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करे.”

 


तुषार मेहता की पुस्तकें न्याय व्यवस्था में बदलाव और चुनौतियों को गहराई से समझने में मददगार: अमित शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को भारत मंडपम में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की पुस्तकों ‘द बेंच, द बार, एंड द बिजार’ और ‘द लॉफुल एंड द ऑफुल’ का विमोचन किया.

Last Modified:
Monday, 11 May, 2026
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नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में रविवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दो पुस्तकों ‘द बेंच, द बार, एंड द बिजार’ और ‘द लॉफुल एंड द ऑफुल’ के विमोचन का भव्य आयोजन हुआ. 1500 सीटों वाला सभागार पूरी तरह भरा हुआ था और इस कार्यक्रम में विशेष रूप से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हुए. 

अमित शाह और तुषार मेहता की 30 साल पुरानी दोस्ती

पुस्तक विमोचन के दौरान अमित शाह ने अपने संबोधन में तुषार मेहता के साथ अपनी लंबी मित्रता का जिक्र करते हुए कहा, “तुषार के साथ मेरी दोस्ती 30 साल पुरानी है.” उन्होंने यह भी बताया कि तुषार मेहता को बचपन से ही उर्दू शायरी, किताबों और साहित्य से गहरा लगाव रहा है.

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था दुनिया के लिए उदाहरण

कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय लोकतंत्र और संविधान की 76 वर्षों की यात्रा पर विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था लगातार मजबूत हुई है और यह दुनिया के लिए उदाहरण है. उन्होंने कहा, “1947 से आज तक इस देश में संसद और विधानसभाओं के माध्यम से जितने भी परिवर्तन हुए, उन्हें बिना किसी खून-खराबे के स्वीकार किया गया, जो भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है.”

अमित शाह ने न्यायपालिका के सामने आ रही नई चुनौतियों, विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक के प्रभाव पर भी बात की. उन्होंने कहा कि तुषार मेहता की ये पुस्तकें न्याय व्यवस्था में आने वाले बदलावों और संभावित चुनौतियों को गहराई से समझने में मदद करती हैं. शाह ने कहा कि तकनीक का उपयोग बढ़ेगा, लेकिन उसके प्रभावों का मूल्यांकन भी जरूरी है.

“मातृत्व को समर्पित भावनात्मक संदेश”

अमित शाह ने इस अवसर पर तुषार मेहता द्वारा अपनी मां को पुस्तक समर्पित करने को बेहद भावुक और प्रतीकात्मक कदम बताया. उन्होंने कहा कि मदर्स डे के दिन यह समर्पण विशेष महत्व रखता है और भारत में हर दिन मातृत्व का सम्मान किया जाता है.

तुषार मेहता का आभार और पारिवारिक उपस्थिति

तुषार मेहता ने अमित शाह का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि वे अपने परिवार के साथ कार्यक्रम में शामिल हुए. इस अवसर पर उनकी पत्नी सोनल और बहू ऋषिता उपस्थित थीं. उन्होंने कहा कि अमित शाह, अगर गृह मंत्री न भी होते, तब भी वे उनके पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होते. साथ ही उन्होंने सोनल भाभी और ऋषिता का भी आभार व्यक्त किया.

यह कार्यक्रम कानूनी जगत में एक महत्वपूर्ण विमर्श की शुरुआत माना जा रहा है, खासकर न्याय व्यवस्था, AI और तकनीक के बदलते प्रभावों के संदर्भ में.
 

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वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता की नई किताब ‘Revolutionary Raj’ आज होगी लॉन्च, मोदी के 25 साल के सफर की तस्वीरें और विश्लेषण

यह किताब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 25 वर्षों के राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन को तस्वीरों और विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 21 February, 2026
Last Modified:
Saturday, 21 February, 2026
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वरिष्ठ पत्रकार और पद्मश्री सम्मानित आलोक मेहता आज अपनी नई कॉफी-टेबल बुक “Revolutionary Raj – Narendra Modi’s 25 Years” का लोकार्पण करने जा रहे हैं. यह किताब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 25 वर्षों के राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन को तस्वीरों और विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करती है. कार्यक्रम शाम 4 बजे नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित होगा.  यह किताब गुरुग्राम की शुभी पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित की गई है. कार्यक्रम का संचालन बिजनेस वर्ल्ड और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा करेंगे.

 

कार्यक्रम में शामिल होंगे कई बड़े नेता

इस कार्यक्रम में कई वरिष्ठ नेताओं और गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रहेगी. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, अर्थशास्त्री और 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एन. के. सिंह, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंहऔर पूर्व केंद्रीय मंत्री के. जे. अल्फोंस मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे. किताब की भूमिका (Foreword) केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लिखी है, जो इसे और भी विशेष बनाती है.

किताब की खासियत

“Revolutionary Raj” नरेंद्र मोदी के 25 साल के राजनीतिक और प्रशासनिक सफर को विस्तार से पेश करती है. इसमें उनके नेतृत्व, निर्णय, और देश में आए बदलावों को तस्वीरों और विश्लेषण के माध्यम से समझाया गया है.

किताब में पंचायत स्तर पर हुए सुधार, ग्रामीण विकास, बिजली और पानी की उपलब्धता, औद्योगिक विकास, सामाजिक सुधार, स्वास्थ्य योजनाएं जैसे आयुष्मान भारत, शिक्षा, और विदेश नीति समेत अन्य प्रमुख पहलुओं को शामिल किया गया है.

आलोक मेहता का संदेश

आलोक मेहता देश के जाने-माने पत्रकार हैं और कई बड़े अखबारों व संस्थानों से जुड़े रहे हैं. उन्होंने कार्यक्रम में आमंत्रित सभी लोगों को शामिल होने का न्यौता दिया है और कहा कि यह किताब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और देश के परिवर्तन के 25 वर्षों का संकलित दस्तावेज है.


Rupa Publications ने 'Case for Ram' नामक नई किताब के विमोचन की घोषणा की

किताब में धर्म, कानून और समाज के संगम को दर्शाया गया; बताई गई वह कानूनी यात्रा जो सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले तक पहुंची

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 29 September, 2025
Last Modified:
Monday, 29 September, 2025
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Rupa Publications ने अनिरुद्ध शर्मा और श्रीधर पोटाराजु द्वारा लिखी गई नई किताब Case for Ram: The Untold Story of Faith, Law, and a Legal Battle that Shaped a Nation के आने वाले विमोचन की घोषणा की.

प्रकाशक के अनुसार, यह किताब धर्म, कानून और समाज के बीच के जटिल संबंधों का विश्लेषण करती है. इसमें वह कानूनी यात्रा विस्तार से बताई गई है, जो भारत के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले तक पहुंची और देश के न्यायिक परिदृश्य को आकार दिया.

अनिरुद्ध शर्मा और श्रीधर पोटाराजु ने इस किताब में मामले के सामाजिक, सांस्कृतिक और कानूनी आयामों का समग्र चित्रण किया है, जिससे पाठकों को न केवल कानूनी प्रक्रिया बल्कि उसके पीछे की संवेदनशीलताओं की भी समझ मिलती है.

Rupa Publications का कहना है कि यह किताब देशभर के पाठकों के लिए उपलब्ध होगी और यह समाज, कानून और धर्म के जटिल मेल को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत साबित होगी.

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Westland Books ने प्रोफेसर प्रतीक राज की नई किताब "Atypical" के रिलीज की घोषणा की

यह किताब मैनेजमेंट के रणनीति (Strategy) विषय पर आधारित है और बिज़नेस की जरूरतों को समझने के लिए एक मजबूत सिद्धांतिक ढांचा (Theoretical Framework) प्रस्तुत करती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 19 February, 2025
Last Modified:
Wednesday, 19 February, 2025
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Westland Books, अपने बिज़नेस इम्प्रिंट Westland Business के तहत, " Atypical: नई दुनिया के लिए पाँच रणनीतिक नियम" नामक किताब लॉन्च कर रहा है. यह किताब UCL और IIMB के प्रोफेसर प्रतीक राज द्वारा लिखी गई है और यह दिखाती है कि कंपनियां पारंपरिक तरीकों से अलग सोचकर और नए रास्ते अपनाकर कैसे सफल हो सकती हैं.  

"Atypical" में प्रतीक राज ने वास्तविक जीवन की कहानियों के ज़रिए यह बताया है कि बिज़नेस तेजी से बदलती दुनिया में कैसे बदलाव लाते हैं, नए विचार अपनाते हैं और आगे बढ़ते हैं. यह किताब मैनेजमेंट के रणनीति (Strategy) विषय पर आधारित है और बिज़नेस की जरूरतों को समझने के लिए एक मजबूत सिद्धांतिक ढांचा (Theoretical Framework) प्रस्तुत करती है. खासतौर पर, यह किताब बिज़नेस लीडर्स और मैनेजर्स के लिए बहुत उपयोगी है; 

प्रतीक राज का कहना है कि "मैंने IIM बैंगलोर में MBA छात्रों को Strategic Stewardship कोर्स पढ़ाया, जिसमें हम कार्यस्थल संस्कृति, कॉर्पोरेट व्यवहार, सार्वजनिक सेवाएँ, स्वास्थ्य, पूंजीवाद और काम के भविष्य जैसे विषयों पर चर्चा करते थे. जब Westland Books के कमीशनिंग एडिटर, औरोदीप ने मुझसे संपर्क किया, तो मुझे लगा कि यह सही समय है. मेरे पास कोर्स की संरचित नोट्स तो थे, लेकिन मैं केवल उन्हें किताब में बदलना नहीं चाहता था. 

उन्होंने कहा कि मैं चाहता था कि यह किताब क्लासरूम चर्चाओं को वास्तविक दुनिया से जोड़े और नए विचारों को जन्म दे. इस किताब में बताया गया है कि 21वीं सदी की जटिलताओं का सामना करने के लिए संगठनों को कैसे विकसित होना चाहिए.यह किताब उन असामान्य और अक्सर अनदेखे किए गए हितधारकों (Stakeholders) पर केंद्रित है, जो भविष्य की इनोवेटिव और प्रभावी रणनीतियों की कुंजी हो सकते हैं."
 


स्मृति शेष- दिल्ली में मालवा की धड़कन और खुशबू की तरह महकते थे डॉ. हरीश भल्ला!

दिल्ला के सांस्कृतिक सम्राट डॉ. हरीश भल्ला का 10 जनवरी 2025 को निधन हो गया. ‘इंडिया न्यूज’ चैनल पर हरीश भल्ला का शो ‘एक कहानी विद डॉ. हरीश भल्ला काफी लोकप्रिय था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 25 January, 2025
Last Modified:
Saturday, 25 January, 2025
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महानगर दिल्ली की निष्ठुर आत्मा में लगातार हलचल मचाए रखने वाली शानदार इंदौरी टीम से जुड़ी हुई एक और शख्सियत इस दुनिया को अलविदा कह गई. करीब दो साल पहले डॉ. वेदप्रताप वैदिक अचानक चले गए थे. अब हाल ही में दिल्ली के सांस्कृतिक सम्राट के रूप में पहचाने जाने वाले डॉ हरीश भल्ला भी हमें छोड़कर चले गए. राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के जाने का दुख खत्म ही नहीं हुआ था कि अब डॉ. भल्ला का निधन हो गया. दिल्ली की गुल्लक में बिना किसी ब्याज के जमा इंदौर के खरे सिक्के जैसे एक-एक करके नियति का शिकार हो रहे हैं. मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के जावरा में जन्मे डॉ. भल्ला ने इंदौर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की. दिल्ली में चिकित्सक और नशामुक्ति विशेषज्ञ के रूप में अपनी सेवाएं देने के साथ-साथ, वे कला, संस्कृति, संगीत और थिएटर के प्रति अपने जुनून के लिए प्रसिद्ध थे.

डॉ भल्ला सिर्फ एक कुशल मनोचिकित्सक ही नहीं थे और भी बहुत कुछ थे. वे केंद्र की राजधानी में इंदौर-मालवा के स्वयं-नियुक्त सांस्कृतिक राजदूत थे. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से दिल्ली की यात्रा पर जाने वाली मालवी आत्माओं के लिए एक ठिकाना थे, आत्मीयता का खजाना थे, मदद का सहारा थे. साल 1971 में जब प्रभाष जोशी जी के साथ काम करने के लिए दिल्ली में राजघाट कॉलोनी स्थित गांधी स्मारक निधि को मैंने अपना ठिकाना बनाया तो सबसे नजदीक उपलब्ध जिस दूसरे परिचित व्यक्ति का ख्याल आया वे डॉ हरीश भल्ला थे. डॉ भल्ला तब राजघाट कॉलोनी से सिर्फ पंद्रह मिनिट की पैदल दूरी पर स्थित पंत हॉस्पिटल में कार्यरत थे. डॉ वैदिक तब दूर सफदरजंग एंक्लेव में रहते थे.

इंदौर मेडिकल कॉलेज के एक चर्चित छात्र नेता थे डॉ. भल्ला

डॉ भल्ला से जुड़ी यादों को 1971 से भी पीछे ले जाना हो तो इंदौर मेडिकल कॉलेज के एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में छवि मन में उभरती है, जो कलरफुल शर्ट्स पहने हुए घूमता था और एक चर्चित छात्र नेता के तौर पर कॉलेज और जिला प्रशासन की नाक में दम किए रहता था. मेडिकल कॉलेज में हरीश भल्ला की तूती बोलती थी. कॉलेज का प्रिंस हॉस्टल जिसकी रियासत थी.  इंदौर के निकट रतलाम जिले के छोटे से शहर जावरा से निकलकर पहले इंदौर और फिर राजधानी में ‘दिल्ली के सांस्कृतिक जार ’(Cultural Czar of Delhi) के रूप में स्वयं को स्थापित करने वाले डॉ भल्ला ने अपने घर का नाम ही ‘जावरा हाउस’ रखा हुआ था. ‘हुसैन टैकरी’ के लिए मशहूर जावरा ब्रिटिश भारत में जावरा रियासत की राजधानी था.

डॉ भल्ला से जुड़ा जावरा का एक अन्य परिचय यह है कि पंडित जवाहर नेहरू के निकटस्थ रहे कश्मीरी राजनेता और 1957 से 1962 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे डॉ कैलाशनाथ काटजू का जन्म भी जावरा में ही हुआ था. जावरा से लगा मंदसौर डॉ काटजू का चुनाव क्षेत्र था. डॉ. काटजू के मुख्यमंत्रित्वकाल में पंडित नेहरू ने जावरा की यात्रा भी की थी. उस दौरान हुए एक कार्यक्रम में तब स्कूली छात्र हरीश भल्ला ने एक सराहनीय सांस्कृतिक प्रस्तुति भी दी थी. जावरा के कारण डॉ भल्ला काटजू परिवार के सभी सदस्यों के साथ अंत तक जुड़े रहे. सांसद विवेक तनखा के साथ तो वे कई संस्थाओं और गतिविधियों में संबद्ध थे.

डॉ. भल्ला से मिलने का ठिकाना था इंडिया इंटरनेशनल सेंटर 

दिल्ली में प्रसाद नगर स्थित डॉ भल्ला का छोटा सा फ्लैट मालवा के लोगों के लिए सराय था और लोदी रोड स्थित प्रतिष्ठित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बाहर से मिलने पहुँचे लोगों से मिलने का ठिकाना. वे दिल्ली में मालवा की कला-संस्कृति और संगीत की धड़कन थे. मेडिकल, राजनीति और  सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़ा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का ऐसा कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं था जो डॉ भल्ला के संपर्क में नहीं आया हो.

संगीत के क्षेत्र में नाम कमाने वाली भारत और पाकिस्तान की ऐसी कोई हस्ती नहीं थी, जिससे डॉ भल्ला के आत्मीय संबंध नहीं रहे हों. ग़ुलाम अली को मित्रों ने उनके घर की महफ़िलों में सुना है. चार दशक होने आए डॉ भल्ला के हवाले से लोक गायिका रेशमा के साथ मैंने खुद इंदौर में एक लंबी बातचीत अपने अंग्रेजी अखबार ‘फ्री प्रेस जर्नल’ के लिए की थी.

शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध गायिका शुभ मुदगल तो डॉ भल्ला को बड़ा भाई मानती थीं और नवोदित कलाकारों को मंच और आवाज देने के लिए उनके साथ मिलकर ‘इंटरनेशनल मेलोडी फाउंडेशन’ की स्थापना की थी.

डॉ हरीश भल्ला और भी बहुत कुछ थे, बहुत कुछ करते थे, काफी कुछ करना चाहते थे. सब कुछ दूसरों के लिए, अपने लिए न तो किसी सम्मान की मांग की और न किसी पुरस्कार के लिए संघर्ष किया. जीवन भर दूसरों के लिए ही सिफारिशें करते रहे, लड़ते रहे. मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी अदालती लड़ाई तो तब देश भर में चर्चा का विषय बन गई थी.

नशामुक्ति के लिए किया काम

डॉ भल्ला मूलतः एक मनोचिकित्सक थे. इस नाते वे एक बड़ी संख्या में ऐसे मरीजों के संपर्क में आए जो दिल्ली की गलियों में चलने वाले नशे के अवैध व्यापार के शिकार हो रहे थे. ऐसे लोगों की व्यथा का अध्ययन कर उन्होंने नशामुक्ति के लिए काम किया. इस दिशा में उनका सबसे बड़ा योगदान दूरदर्शन के लिए ‘ अंधी गलियाँ ‘ नामक शृंखला की प्रस्तुति था, जिसमें नशे के व्यापार और उससे पीड़ित लोगों की सच्ची कहानियों को उन्होंने देश के सामने उजागर किया.

ऐसे याद आएंगे डॉ. भल्ला

डॉ भल्ला की कमी उन तमाम स्नेहियों को अब खलने वाली है, जो राजधानी पहुँचते ही पहला फोन उन्हें करके कहते थे : ‘भैया मैं दिल्ली पहुँच गया हूँ. मुलाकात कब और कहाँ हो सकती है?’ शेर उर्दू का यह है कि शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक, डॉ भल्ला ऐसे परवाने थे जो जिंदगी की शाम होने तक अपने आपको हर रंग में जलाते रहे. डॉ भल्ला के बिना दिल्ली में इंदौर और मालवा की सांस्कृतिक खुशबू की कल्पना नहीं की जा सकेगी.

लेखक-श्रवण गर्ग


 'India’s Green Startups' : जलवायु संकट के समाधान में नवाचार और उद्यमिता की भूमिका

पूर्व केंद्रीय वित्त और नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा और संदीप भामर द्वारा लिखित 'India’s Green Startups' भारत के ग्रीन नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र पर एक गहरी नजर डालती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 22 January, 2025
Last Modified:
Wednesday, 22 January, 2025
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भारत में ग्रीन स्टार्टअप्स का तेजी से बढ़ता हुआ इकोसिस्टम जलवायु संकट से निपटने और देश को एक टिकाऊ भविष्य की ओर ले जाने के लिए महत्वपूर्ण साबित हो रहा है. इस संदर्भ में पूर्व केंद्रीय वित्त और नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा और  ग्रीन फ्रंटियर कैपिटल के संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर संदीप भामर ने मिलकर 'India’s Green Startups' पुस्तक लिखी है. यह पुस्तक ग्रीन नवाचार की दिशा में भारत की कोशिशों को प्रदर्शित करती है. यह पुस्तक इस बात पर ध्यान केंद्रित करती है कि कैसे ग्रीन स्टार्टअप्स जलवायु परिवर्तन के समाधान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और भारत की अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने में मदद कर रहे हैं.

भारत के ग्रीन स्टार्टअप्स की दिशा

भारत के ग्रीन स्टार्टअप्स' पुस्तक को 21 जनवरी, 2024 को लॉन्च किया गया. इसे चिकी सरकार की लीडरशिप वाले जगर्नॉट बुक्स (Juggernaut Books) ने प्रकाशित किया है और इसमें इंफोसिस (Infosys) के सह-संस्थापक और यूआईडीएआई आधार के संस्थापक अध्यक्ष नंदन निलेकणी का एक प्रेरक प्रस्तावना है. पुस्तक में ग्रीन स्टार्टअप्स के साथ-साथ उनके उद्यमियों की यात्रा का भी वर्णन किया गया है, जिन्होंने व्यवसायिक समझ और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को एक साथ जोड़ा है. इसमें 14 ऐसे अग्रणी उद्यमियों की कहानियाँ हैं जिन्होंने पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान किया और व्यापार को एक स्थिर मार्ग पर रखा.

जलवायु संकट से निपटने के लिए ग्रीन स्टार्टअप्स जरूरी

जयंत सिन्हा, जिन्होंने 2021 में भारत का पहला नेट-जीरो विधेयक पेश किया था, पुस्तक में नीति और सततता पर गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं. वहीं, संदीप भामर ने प्रारंभिक स्तर के ग्रीन निवेश अनुभव और सतत उद्योगों में नवाचार को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता साझा करते हैं. दोनों मिलकर भारत के ग्रीन क्रांति की दिशा में स्टार्टअप्स की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करते हैं और यह दर्शाते हैं कि कैसे ग्रीन स्टार्टअप्स जलवायु संकट से निपटने के लिए सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं. यह पुस्तक उन उद्यमियों की यात्रा को दर्शाती है जिन्होंने जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए नए दृष्टिकोण और अभिनव समाधान प्रस्तुत किए हैं.

पुस्तक को लेकर प्रतिक्रिया

इस पुस्तक को व्यापार, शिक्षा और खेल जगत के कई प्रमुख व्यक्तियों से सराहना मिली है, जिनमें रजत गुप्ता, विनोद खोसला, अमिताभ कांत, प्रोफेसर तरुण खन्ना, महेन्द्र सिंह धोनी, और ऋतु मर्त्या जैसी प्रमुख हस्तियाँ शामिल हैं. पूर्व क्रिकेटर और एंजल निवेशक महेन्द्र सिंह धोनी ने टिप्पणी की है कि यह पुस्तक उन साहसी विचारों को उजागर करती है जो भारत के युवाओं के लिए एक सतत कल का निर्माण कर रहे हैं. जयंत सिन्हा ने कहा कि भारत के ग्रीन स्टार्टअप्स जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में साहसिक दृष्टिकोण और अभूतपूर्व समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं. यह पुस्तक उनके महत्वपूर्ण योगदान का प्रमाण है जो हमारे लिए एक सतत भविष्य सुनिश्चित कर रहे हैं. संदीप भामर ने कहा, यह पुस्तक उन उद्यमियों का उत्सव है जो नवाचार और दृढ़ता के साथ जलवायु संकट का समाधान कर रहे हैं, यह साबित करते हुए कि लाभ और सततता साथ-साथ चल सकते हैं. जगर्नॉट बुक्स की संस्थापक चिकी सरकार ने कहा, "भारत के ग्रीन नवप्रवर्तकों की यात्राओं को chronicling करते हुए, जयंत और संदीप ने एक ऐसी कथा तैयार की है जो प्रेरणादायक, समयसिद्ध और गहरे प्रभाव वाली है. 

यहां मिलेगी पुस्तक

'India’s Green Startups' अब अमेजन और SapnaOnline पर उपलब्ध है, और यह पुस्तक बुकस्टोर्स में भी उपलब्ध है. बता दे, जयंत सिन्हा एक प्रतिष्ठित निवेशक और विचारशील नेता हैं. वह भारत के पूर्व केंद्रीय मंत्री और दो-बार के लोकसभा सांसद रह चुके हैं, जिनका सार्वजनिक नीति और सततता में व्यापक अनुभव है. वहीं संदीप भामर ग्रीन फ्रंटियर कैपिटल के संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर हैं, जो प्रारंभिक चरण के क्लाइमेट-टेक निवेशों पर ध्यान केंद्रित करने वाली एक वेंचर कैपिटल फर्म है.

 

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केरल साहित्य महोत्सव 2025 का हुआ आगाज, 15 देश और 500 वक्ता करेंगे शिरकत

केरल के कोझिकोड के समुद्र तट पर आयोजित होने वाले केरल साहित्य महोत्सव के आठवें संस्करण में साहित्य, कला और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 10 December, 2024
Last Modified:
Tuesday, 10 December, 2024
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जनवरी 2025 में केरल साहित्य महोत्सव (KLF) के आठवें संस्करण का आयोजन केरल के कोझीकोड में होगा. इस महोत्सव में 500 से अधिक वक्ताओं की उपस्थिति की उम्मीद है और यह 6,00,000 से अधिक आगंतुकों को आकर्षित करने का अनुमान है. हाल ही में इस महोत्सव की शुरुआत दिल्ली में लेखक और राजनेता डॉ. शशि थरूर द्वारा आयोजित एक 'कर्टन रेजर' इवेंट के साथ की गई. इस दौरान फ्रांस को अतिथि राष्ट्र के रूप में नामित किया गया है, जो महोत्सव के अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है.

कर्टेन रेजर इवेंट में इन लोगों ने की शिरकत
कर्टेन रेजर इवेंट में राजनयिकों, प्रकाशकों और लेखक मौजूद हुए और उन्होंने आगामी महोत्सव के वैश्विक महत्व पर ध्यान केंद्रित किया. यूनेस्को के अधिकारी, जिनमें संस्कृति विभाग की प्रमुख जूनही हान और र्यक्रम अधिकारी आनंद कानितकर भी मौजूद रहे. कोझीकोड का यूनेस्को सिटी ऑफ लिटरेचर के रूप में दर्जा इस अवसर की प्रतिष्ठा को और बढ़ाता है, जो शहर की सांस्कृतिक महत्ता को उजागर करता है. इस दौरान फ्रांस, यूएई, लिथुआनिया, मोरक्को, तुर्की, श्रीलंका, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, आयरलैंड, कनाडा और रूस जैसे देशों के राजदूत भी मौजूद रहे.

ये देश और वक्ता होंगे शामिल
यह महोत्सव 15 अन्य देशों के प्रतिभागियों की मेजबानी करेगा, जिनमें यूके, स्पेन, जर्मनी, श्रीलंका, यूएसए, सिंगापुर, यूएई, सऊदी अरब, ग्रीस, मिस्र, तुर्की, इज़राइल, लातविया और स्वीडन शामिल हैं. सत्रों में साहित्य, विज्ञान, राजनीति से लेकर स्वास्थ्य, सिनेमा, लिंग मुद्दों और अर्थव्यवस्था तक के विषयों पर चर्चा की जाएगी. वहीं, वक्ताओं में प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा और विलियम डलरिंपल, बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया, वायलिनिस्ट डॉ. एल. सुब्रमणियम, लेखक फ्रांसेस मिराल्लेस और गोंकौर्ट अकादमी के सदस्य फिलिप क्लाउडेल जैसे लोग शामिल हैं. इस सूची में नोबेल पुरस्कार विजेता, बुकर पुरस्कार विजेता और अन्य अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक व्यक्तित्व भी होंगे.
 

फ्रांस होगा अतिथि देश
इस वर्ष फ्रांस अतिथि देश होगा, जो उत्सव की अंतर्राष्ट्रीय अपील को बढ़ाएगा. महोत्सव का फोकस अंतर-सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर होगा, विशेष रूप से फ्रांस की कला और साहित्यिक योगदानों पर जोर दिया जाएगा. उपस्थित लोग फ्रांसीसी संस्कृति के रोमांचक प्रदर्शन का आनंद ले सकते हैं, जिसमें विशेष सत्रों में प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक, बुद्धिजीवी और कलाकार भाग लेंगे. यह उत्सव प्रेरक साहित्यिक पैनल और आकर्षक सांस्कृतिक चर्चाएँ प्रदान करेगा, जो फ्रांस की समृद्ध कलात्मक विरासत को देखने का अवसर प्रदान करेगा. आगंतुक देश की गहरी साहित्यिक और कलात्मक परंपराओं को उजागर करने वाली वार्ता और कार्यक्रमों की एक श्रृंखला के माध्यम से खुद को फ्रांसीसी भाषा, कला और दर्शन में डुबो सकते हैं, जिससे केएलएफ द्वारा पोषित वैश्विक संवाद समृद्ध होगा.

वैश्विक साहित्य और सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा
यह महोत्सव वैश्विक साहित्यिक और सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने के लिए एक मंच के रूप में देखा जाता है. केएलएफ के मुख्य आयोजक रवि डीसी के अनुसार, इस इवेंट का उद्देश्य एक समावेशी स्थान प्रदान करना है, जहां विचारों का आदान-प्रदान सीमाओं को पार करता है.


ब्रिटिश काल के दौरान फैले भ्रष्टाचार और पितृसत्ता को उजागर करता मगही उपन्यास: फूल बहादुर

01 अप्रैल 1928 को प्रकाशित, यह प्रमुख कॉमिक मगही उपन्यास हाल ही में कवि और राजनयिक अभय के द्वारा अंग्रेजी में अनुवादित किया गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 18 November, 2024
Last Modified:
Monday, 18 November, 2024
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काफी समय से समलाल के मन में राय बहादुर बनने का सपना पल रहा था. हालांकि वह भली-भांति जानता था कि वह इस पद के योग्य नहीं है, फिर भी उसे अपने चापलूसी की कला पर पूरा विश्वास थायह उद्धरण मगही साहित्य के रत्न ‘फूल बहादुर’ (Fool Bahadur) से है, जो मूल रूप से भारतीय लेखक जयनाथ पति द्वारा मगही भाषा में लिखा गया है. यह उपन्यास ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बिहार शरीफ के शहरी जीवन पर एक व्यंग्य है, जो कानून और नौकरशाही में कार्यरत लोगों की मूर्खतापूर्ण आकांक्षाओं और जीवन को दर्शाता है.

नौकरशाही और न्यायपालिका में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करता उपन्यास

कहानी का केंद्र है मुख्य पात्र मुख्तार बाबू समलाल की महत्वाकांक्षाएं और उनका वह सफर, जिसमें वह तत्कालीन चर्चित 'राय बहादुर' का खिताब प्राप्त करने की कोशिश करता है. उपन्यास में अन्य महत्वपूर्ण पात्रों में एक नवाब, एक सर्कल अधिकारी और एक दरबारी महिला हैं. लेखक ने अपनी सजीव और हास्यपूर्ण लेखनी से एक छोटे और बेईमान मुख्तार के जीवन को पेश किया है, जो किसी भी हाल में यह खिताब हासिल करना चाहता है. कहानी उस समय की नौकरशाही और न्यायपालिका में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार को उजागर करती है, जैसा कि नवाब के शब्दों से स्पष्ट होता है: "मैं वादा करता हूं कि तुम्हें राय बहादुर बना दूंगा, और अगर ऐसा नहीं हुआ, तो मैं अपने हाथ काट लूंगा. इसके बदले, तुम्हें मेरी मदद करनी होगी." यह दिलचस्प है कि लेखक ने यह सुनिश्चित किया कि अंत हास्यपूर्ण और मनोरंजक हो, जबकि यह जीवन के पूर्ण चक्र को दर्शाते हुए एक शिक्षा भी दे कि आखिरकार न्याय मिलता है.

उपन्यास में वर्णित भ्रष्टाचार और पितृसत्ता आज भी प्रासंगिक

यह उपन्यास 01 अप्रैल 1928 को पहली बार प्रकाशित हुआ था और हाल ही में इसे कवि और राजनयिक अभय के द्वारा अंग्रेजी में अनुवादित किया गया. यह पहला मगही उपन्यास है जो अंग्रेजी में अनुवादित हुआ है, और अब पेंगुइन मॉडर्न क्लासिक के रूप में प्रकाशित होने के बाद, यह साहित्य के इस अमूल्य खजाने को नए जीवन के साथ एक बड़ी दर्शक वर्ग तक पहुंचाएगा. लेखक के ही गृह राज्य से आने वाले, उनकी मातृभाषा में रुचि रखने वाले और एक नौकरशाह के रूप में अभय का इस विशिष्ट क्लासिक में गहरी रुचि होना स्वाभाविक है. उपन्यास में ब्रिटिश राज काल में एक युवा वकील की सामाजिक ऊँचाइयों को छूने की दौड़, वही आज के समय की तरह ही है. उपन्यास में वर्णित न्यायिक और नौकरशाही भ्रष्टाचार और पितृसत्ता आज भी प्रासंगिक है, जिससे यह जयनाथ पति द्वारा लिखा गया व्यंग्य आज भी हमारे समाज में असर डालता है. उस समय की पितृसत्ता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब फूल बहादुर का पहला संस्करण प्रकाशित हुआ था, तो उपन्यास के कवर पेज पर "महिलाओं और बच्चों के लिए नहीं" लिखा था. हालांकि हम इस मामले में काफी आगे बढ़ चुके हैं, फिर भी समाज के हर स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने में अभी लंबा रास्ता तय करना है.

राजा अशोक के दरबार की आधिकारिक भाषा थी मगही

इस किताब का एक और दिलचस्प हिस्सा है उसका विस्तृत अनुवादक नोट, जो उपन्यास की प्रस्तावना के रूप में दिया गया है. यह नोट पाठकों को मगही साहित्य के महान इतिहास और उत्पत्ति के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है. यह भी बताता है कि कैसे अनुवादक को जून 2020 के बाद ही मगही साहित्य के अस्तित्व का पता चला, जो अब तक उनके लिए अज्ञात था. यह घटना उस समय की है जब उन्होंने अपनी मातृभाषा से जुड़ने के प्रयास में एक कविता लिखी थी, जिसके बाद लोगों ने उन्हें मगही साहित्य के उस खजाने के बारे में बताया जो अब तक अनुवादित और खोजा नहीं गया था. यह माना जाता है कि बुद्ध और महावीर ने मगधी प्राकृत में अपने उपदेश दिए थे, जो बाद में मगही भाषा का रूप बन गई. इसके अलावा, मगही राजा अशोक के दरबार की आधिकारिक भाषा भी थी. इस समृद्ध सांस्कृतिक और भाषाई धरोहर का हिस्सा होना वाकई गर्व की बात है और इसे दुनिया के सामने लाने का श्रेय अभय के ही पास है, जिन्होंने सबसे पहले मगही उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया.

लेखक का परिचय

अभय एक राजनयिक कवि, अनुवादक और मुस्कुराते हुए संपादक हैं और उन्होंने कई काव्य संग्रह लिखे हैं. उनकी कविताएं एशिया लिटरेरी रिव्यू और पोएट्री साल्जबर्ग रिव्यू जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. उन्हें 2020-21 में कालिदास की ऋतु संहार और मेघदूत के अनुवादों के लिए केएलएफ पोएट्री बुक ऑफ द ईयर पुरस्कार भी मिला. उन्हें 2013 में साउथ एशियन आर्ट्स एंड कल्चर के लिए साअर्क साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया और उनकी कविताएं वॉशिंगटन डीसी स्थित लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में रिकॉर्ड की गईं. इस योग्यता और मातृभाषा के साहित्य को दुनिया के मानचित्र पर लाने की इच्छा के साथ, हम उम्मीद कर सकते हैं, कि वह दिन दूर नहीं जब मगही को अपनी उचित पहचान मिलेगी और साहित्य का यह अमूल्य खजाना सभी के लिए सुलभ होगा. अभय के शब्दों में यह भावना स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है, जब वह अनुवादक नोट में लिखते हैं: "मुझे आशा है कि फूल बहादुर का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित होने से मागही साहित्य की समृद्ध दुनिया पर अधिक ध्यान दिया जाएगा और आने वाले वर्षों में मागही साहित्य के और भी काव्य कार्यों का अनुवाद किया जाएगा."


चीनी कंपनियों की चुनौतियों से कमजोर हुई Samsung, भारत में नौकरियों पर चलेगी कैंची!

सैमसंग को भारत में कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, खासतौर पर कंपनी का मोबाइल कारोबार प्रभावित हुआ है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 11 September, 2024
Last Modified:
Wednesday, 11 September, 2024
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भारतीय मोबाइल बाजार में कई विदेशी कंपनियां मौजूद हैं. दक्षिण कोरियाई कंपनी सैमसंग (Samsung) भी काफी समय में भारत में कारोबार कर रही है. हालांकि, पिछला कुछ समय उसके लिए परेशानियों भरा रहा है. कंपनी की सेल्स के आंकड़े लगातार नीचे आ रहे हैं और अब इस इसका असर उसके कर्मचारियों पर पड़ने वाला है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें, तो सैमसंग ने भारत में छंटनी का फैसला लिया है. 

यहां चलेगी कैंची
छंटनी की जद में कंपनी के सेल्स, मार्केटिंग और ऑपरेशंस से जुड़े कर्मचारी आ सकते हैं. कहा तो यहां तक जा रहा है कि सैमसंग के भारत में जितने कर्मचारी हैं, उनमें से 20 फीसदी तक की छुट्टी हो सकती है. हालांकि, Samsung की तरफ से इस बारे में अब तक कोई बयान सामने नहीं आया है. रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सैमसंग अपने स्मार्टफोन, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और होम एप्लाएंसेज कारोबार के ढांचे में बदलाव कर रही है. इसके चलते कंपनी कुछ प्रमुख एग्जीक्यूटिव्स की भी छुट्टी कर सकती है. गौर करने वाली बात यह है कि एग्जीक्यूटिव्स के जो पद खाली पड़े हैं उन्हें भी नहीं भरा जा रहा है.

चेन्नई प्लांट में हड़ताल
सैमसंग में छंटनी की खबर ऐसे समय सामने आई है जब उसके चेन्नई स्थित मैनुफैक्चरिंग प्लांट के कर्मचारी  अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं. इस हड़ताल के चलते कंपनी का उत्पादन प्रभावित हो रहा है. फेस्टिवल सीजन में मोबाइल के साथ-साथ टीवी, फ्रिज और वॉशिंग मशीन जैसे उत्पादों की जमकर बिक्री होती है. यदि हड़ताल जल्द खत्म नहीं होती, तो सैमसंग को काफी नुकसान उठाना पड़ेगा. स्थिति की गंभीरता को समझते हुए सैमसंग के मैनेजमेंट ने भारतीय अधिकारियों को दक्षिण कोरिया बुलाया है.

कई परेशानियां एक साथ
मोबाइल सेक्टर में सैमसंग को भारत में मौजूद चीनी कंपनियों से कड़ी टक्कर मिल रही है. एक मार्केट रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-जून 2024 तिमाही में वॉल्यूम के हिसाब से सैमसंग तीसरे स्थान पर खिसक गई है. इस दौरान कंपनी के स्मार्टफोन शिपमेंट्स में 15.4% की कमी आई है. सैमसंग एक साथ कई मोर्चों पर परेशानियों का सामना कर रही है. शाओमी और वीवो जैसे ब्रैंड उसके सामने कड़ी प्रतियोगिता पेश कर रहे हैं. ऑफलाइन रिटेलर्स के साथ कंपनी का विवाद चल रहा है. इसके अलावा, सेल्स और मार्केटिंग के कुछ टॉप एग्जीक्यूटिव्स से कंपनी छोड़ने से सैमसंग की दिक्कतें बढ़ी हैं.