कोविशील्ड वैक्सीन को लेकर पिछले इसे बनाने वाली कंपनी पर कई गंभीर आरोप लगे थे. लोगों में साइड इफेक्ट के आरोपों के बीच कंपनी ने मार्केट से सभी वैक्सीन वापस मंगाने का फैसला लिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
एस्ट्राजेनेका की कोविड वैक्सीन को लेकर उठ रही सुरक्षा चिंताओं के बीच कंपनी ने दुनिया भर से अपने टीकों को वापस लेने का फैसला कर लिया है. इसमें भारत में बनाई गई कोविशील्ड (Covishield) वैक्सीन भी है. कुछ दिनों पहले ही इस फार्मास्यूटिकल कंपनी ने एक कोर्ट में वैक्सीन के खतरनाक साइड इफेक्ट्स की बात स्वीकार की थी. बता दें कि एस्ट्राजेनिका वैक्सीन को भारत में कोविशील्ड के नाम से इस्तेमाल किया गया था. हालांकि, कंपनी ने वैक्सीन को बाजार से हटाने के पीछे की कुछ और वजह बताई है.
वैक्सीन से हो रहे थे गंभीर साइड इफेक्ट्स
एस्ट्राजेनेका द्वारा बनाई कोरोना वैक्सीन भारत में कोविशील्ड के नाम से लगाई गई थी. अब कंपनी ने खुद से बनाई कोविड-19 वैक्सीन को वैश्विक स्तर पर वापस ले लिया है. इससे पहले कंपनी ने अदालती दस्तावेजों में स्वीकार किया था कि उसके द्वारा बनाई कोरोना वैक्सीन लगने से खून के थक्के जमना जैसे गंभीर साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. हालांकि, फार्मा दिग्गज ने कहा कि वैक्सीन को व्यावसायिक कारणों से बाजारों से हटाया जा रहा है.
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कंपनी ने क्या दी जानकारी?
एस्ट्राजेनेका ने मंगलवार को यह कहा था कि बाजार में जरूरत से ज्यादा मात्रा में वैक्सीन उपलब्ध है इसलिए कंपनी ने बाजार से सभी टीके वापस लेने का फैसला किया है. गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले कंपनी ने इस बात को भी स्वीकार किया था कि वैक्सीन के कुछ साइड इफेक्ट भी हैं. जैसे वैक्सीन की वजह से खून का जम जाना और ब्लड प्लेटलेट्स की संख्या गिर जाना. बता दें कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, भारत में अब तक 220 करोड़ से ज्यादा खुराक दी जा चुकी है.
कैसे सामने आया था मामला
ये पूरा मामला तब सामने आया था, जब एस्ट्राजेनेका ने ब्रिटेन की हाईकोर्ट में माना था कि उसकी कोविड-19 वैक्सीन से थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (TTS) जैसे साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम से शरीर में खून के थक्के जमने लगते हैं या फिर शरीर में प्लेटलेट्स तेजी से गिरने लगते हैं. बॉडी में ब्लड क्लॉट की वजह से ब्रेन स्ट्रोक की भी आशंका बढ़ जाती है. एस्ट्राज़ेनेका के ये स्वीकार करने के बाद कि उनकी वैक्सीन की वजह से कई लोगों की जान गई और कई बीमार हुए, यूके में उनको 100 मिलियन पाउंड के मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है.
भारत में कोवीशिल्ड के नाम से हुआ वैक्सीन का इस्तेमाल
वैक्सीन को बाजार से वापसी के लिए आवेदन 5 मार्च को किया गया था जो 7 मई तक प्रभावी हुआ. एस्ट्राजेनेका ने साल 2020 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर कोरोना वैक्सीन बनाई थी. भारत में इस AstraZeneca की इस वैक्सीन का प्रोडक्शन अदार पूनावाला की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने किया था. कंपनी ने इस वैक्सीन को कोविशील्ड के नाम से बाजार में लॉन्च किया था. भारत में ये वैक्सीन करोड़ों लोगों को लगाई गई थी.
WCOG के उद्घाटन पर जेपी नड्डा बोले- पाचन और लिवर संबंधी बीमारियों से निपटने के लिए इलाज के साथ रोकथाम और शुरुआती जांच पर जोर जरूरी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में पहली बार विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कांग्रेस (WCOG) का आयोजन किया जा रहा है. नई दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित चार दिवसीय कांग्रेस में 61 देशों के करीब 3,000 डॉक्टर और शोधकर्ता हिस्सा ले रहे हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने बुधवार को कांग्रेस का उद्घाटन किया. इस मौके पर उन्होंने कहा कि यह केवल एक सम्मेलन नहीं है, बल्कि दुनियाभर में बढ़ती पाचन तंत्र और लिवर से जुड़ी बीमारियों की चुनौती से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों का महत्वपूर्ण मंच है.
नड्डा ने कहा कि गैस्ट्रोएंटरोलॉजी स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है. इसमें पाचन तंत्र, लिवर, अग्न्याशय और पित्त प्रणाली से जुड़ी बीमारियों का इलाज और अध्ययन किया जाता है. उन्होंने कहा कि गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण और वायरल हेपेटाइटिस के साथ-साथ अग्न्याशय से जुड़ी बीमारियों, अग्नाशयशोथ और पेट-आंत के कैंसर का बोझ भी बढ़ रहा है.
उन्होंने कहा कि बदलती जीवनशैली, खान-पान की आदतों में बदलाव, मोटापा और चयापचय संबंधी बीमारियां इस चुनौती को और बढ़ा रही हैं. हालांकि, बीमारी की पहचान और इलाज के क्षेत्र में भी तेजी से प्रगति हुई है. आधुनिक माइक्रोस्कोपी अब केवल बीमारी की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि कई चिकित्सीय प्रक्रियाओं और इम्यूनोथेरेपी में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है. इमेजिंग, आणविक जांच और आधुनिक एंडोस्कोपी में प्रगति के साथ नई लक्षित और जैविक उपचार पद्धतियों से बीमारियों की शुरुआती पहचान और बेहतर इलाज की संभावनाएं बढ़ी हैं.
सिर्फ इलाज नहीं, रोकथाम पर भी ध्यान जरूरी
नड्डा ने कहा कि पाचन संबंधी बीमारियों के बढ़ते बोझ से केवल नई तकनीक और इलाज के जरिए नहीं निपटा जा सकता. इसके लिए बीमारी की रोकथाम, स्वस्थ खान-पान और जीवनशैली, शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर जांच पर भी बराबर ध्यान देना जरूरी है.
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के जरिए स्वास्थ्य व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए हैं. अब स्वास्थ्य व्यवस्था केवल बीमारी के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बीमारी की रोकथाम, स्वास्थ्य को बढ़ावा देना, इलाज, प्रशामक देखभाल, पुनर्वास और बुजुर्गों की बेहतर देखभाल को भी शामिल किया गया है.
सरकार प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर काम कर रही है. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के साथ उच्च गुणवत्ता वाली विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है.
1.86 लाख स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र
स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि देशभर में 1.86 लाख स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों का नेटवर्क तैयार किया गया है. ये केंद्र बड़ी आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का पहला संपर्क बिंदु हैं. यहां प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य, आंखों की देखभाल, दंत चिकित्सा, मानसिक स्वास्थ्य, बुजुर्गों की देखभाल और प्रशामक देखभाल सहित 12 तरह की स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही हैं.
उन्होंने टीकाकरण को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया. गर्भावस्था से लेकर बच्चे के 16 वर्ष की आयु तक टीका-रोकथाम योग्य बीमारियों से सुरक्षा के लिए बच्चों को 11 टीकों की 27 खुराकें दी जाती हैं, जबकि गर्भवती महिलाओं को दो टीके लगाए जाते हैं. हर साल करीब 5 करोड़ गर्भवती महिलाओं और बच्चों के पूरे समूह की डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए निगरानी की जाती है.
करोड़ों लोगों की गैर-संचारी रोगों की जांच
नड्डा ने कहा कि गैर-संचारी रोगों की शुरुआती जांच भी सरकार की निवारक स्वास्थ्य व्यवस्था का अहम हिस्सा है. स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों के जरिए 30 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मुंह के कैंसर, स्तन कैंसर और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की जांच की जा रही है.
अब तक उच्च रक्तचाप के लिए 42 करोड़, मधुमेह के लिए 42 करोड़, मुंह के कैंसर के लिए 36 करोड़, स्तन कैंसर के लिए 17 करोड़ और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के लिए 9 करोड़ जांच की जा चुकी हैं.
तेल की खपत 10 फीसदी घटाने की अपील
स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने के लिए सरकार भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के ईट राइट अभियान और खेलो इंडिया जैसी पहल चला रही है. इनका उद्देश्य लोगों को बेहतर खान-पान और सक्रिय जीवनशैली के प्रति जागरूक करना है. नड्डा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोटापे की समस्या से निपटने के लिए लोगों से तेल की खपत में कम से कम 10 प्रतिशत कमी करने का भी आग्रह किया है.
स्वास्थ्य क्षेत्र में हुई प्रगति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संस्थागत प्रसव का स्तर 2015-16 में 79 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 90 प्रतिशत हो गया है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से 2023 के बीच भारत में मातृ मृत्यु अनुपात में 86 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह कमी 48 प्रतिशत रही.
इसी तरह 1990 से 2024 के बीच भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 79 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि वैश्विक स्तर पर इसमें 61 प्रतिशत गिरावट हुई. भारत में नवजात मृत्यु दर में भी इसी अवधि में 70 प्रतिशत की कमी आई, जबकि वैश्विक स्तर पर यह कमी 54 प्रतिशत रही.
आयुष्मान भारत से 60 करोड़ से अधिक लोगों को कवर
नड्डा ने कहा कि सरकार का प्रयास है कि बीमारी गरीब, मध्यम वर्ग और समाज के कमजोर वर्गों के लिए आर्थिक संकट का कारण न बने. इसी उद्देश्य से सितंबर 2018 में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू की गई थी.
इस योजना के तहत प्रत्येक परिवार को सालाना 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर दिया जाता है. नड्डा के मुताबिक, योजना अब 60 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को कवर करती है और इसका लक्ष्य 70 करोड़ लाभार्थियों तक पहुंचना है. यह भारत की आबादी का करीब 40 प्रतिशत है. इसके अलावा 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के करीब 6 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों को भी उनकी आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना इस योजना का लाभ दिया जा रहा है. अब तक योजना के तहत करीब 13 करोड़ उपचार उपलब्ध कराए जा चुके हैं, जिन पर 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का स्वास्थ्य खर्च हुआ है.
जनऔषधि केंद्रों से दवाओं पर बचत
स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती बनाने के साथ सरकार दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की लागत कम करने पर भी काम कर रही है. नड्डा ने बताया कि प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के तहत गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 80 प्रतिशत तक कम कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही हैं.
देशभर में 20,149 से अधिक जनऔषधि केंद्र काम कर रहे हैं. इस पहल के जरिए लोगों ने दवाओं पर होने वाले खर्च में सामूहिक रूप से करीब 45,000 करोड़ रुपये की बचत की है. उन्होंने कहा कि इन प्रयासों का असर लोगों के अपनी जेब से किए जाने वाले स्वास्थ्य खर्च में भी दिखा है. कुल स्वास्थ्य खर्च में लोगों की जेब से होने वाले खर्च की हिस्सेदारी 62 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 43.4 प्रतिशत रह गई है.
एआई और आधुनिक तकनीक से बदल रहा इलाज
कांग्रेस में पाचन तंत्र और लिवर से जुड़ी बीमारियों की पहचान और इलाज में हो रही नई प्रगति पर भी चर्चा हो रही है. इसमें अग्न्याशय और पेट-आंत के कैंसर की शुरुआती पहचान, अग्नाशयशोथ, एमएएसएलडी, आईबीडी, सीलिएक रोग और लिवर फेलियर के नए उपचार शामिल हैं. एच. पाइलोरी संक्रमण को खत्म करने, बीमारी के जोखिम का सटीक आकलन, आधुनिक एंडोस्कोपी और आंत में मौजूद सूक्ष्मजीवों यानी माइक्रोबायोम को समझने पर भी विशेषज्ञ चर्चा कर रहे हैं.
भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नई जांच तकनीक, जैव-चिकित्सा अनुसंधान और डेटा विज्ञान में हो रही प्रगति स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नई संभावनाएं पैदा कर रही है. अब जरूरत इन तकनीकों को ऐसे चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित समाधानों में बदलने की है, जिन्हें बड़े स्तर पर लोगों तक पहुंचाया जा सके. इसके लिए डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण होगा.
उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंडोस्कोपी, ईयूएस, अग्न्याशय की बीमारियों, आईबीडी और पाचन तंत्र की गति से जुड़ी समस्याओं के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल रहा है. हालांकि, इसके इस्तेमाल के साथ तकनीक की चिकित्सकीय पुष्टि, सुरक्षा और नियमन से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण हैं.
भारत का शोध वैश्विक स्वास्थ्य चर्चा में योगदान दे रहा
कांग्रेस में आईबीडी, कोलोरेक्टल कैंसर, एमएएसएलडी, लंबे समय से रहने वाली अग्न्याशय की बीमारी और मानव माइक्रोबायोम पर भारत में हो रहे शोध पर भी चर्चा हो रही है. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के पाचन स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को भी समझने पर जोर दिया जा रहा है.
डब्ल्यूसीओजी 2026 की संचालन समिति के सह-अध्यक्ष और इंडियन सोसाइटी ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. प्रमोद कुमार गर्ग तथा स्थानीय आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. गोविंद मखारिया ने कहा कि पाचन स्वास्थ्य दुनियाभर के लिए चिंता का विषय है. इसमें संक्रमण, चयापचय और सूजन संबंधी बीमारियां, कैंसर और लंबे समय से रहने वाली पाचन संबंधी समस्याएं शामिल हैं.
उन्होंने कहा कि भारत बड़ी और विविध रोगी आबादी, महत्वपूर्ण चिकित्सकीय अनुभव और लगातार बढ़ते शोध आधार के साथ इस वैश्विक चर्चा में योगदान दे रहा है. डब्ल्यूसीओजी 2026 विभिन्न देशों के अनुभव साझा करने और स्वास्थ्य प्रणालियों से सीखने का अवसर प्रदान कर रही है. इसका साझा उद्देश्य बीमारी की रोकथाम, शुरुआती पहचान और मरीजों के बेहतर स्वास्थ्य परिणाम हासिल करना है.
‘जीआई स्वास्थ्य के 10 सूत्र’ जारी
कांग्रेस के उद्घाटन दिवस पर “जीआई स्वास्थ्य के 10 सूत्र” भी जारी किए गए. ये भारतीय और अंतरराष्ट्रीय गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विशेषज्ञों द्वारा तैयार साक्ष्य-आधारित सिफारिशें हैं. इनमें बीमारी की रोकथाम, जोखिम कारकों और लक्षणों की पहचान तथा समय पर चिकित्सकीय जांच पर जोर दिया गया है. विशेषज्ञों ने इन संदेशों को अलग-अलग देशों और समुदायों तक पहुंचाने की जरूरत बताई.
WCOG 2026 का आयोजन 3 अक्टूबर तक चलेगा. कांग्रेस की थीम “पाचन स्वास्थ्य में बदलाव, प्रकृति का संरक्षण” है. इंडियन सोसाइटी ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और वर्ल्ड गैस्ट्रोएंटरोलॉजी ऑर्गनाइजेशन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह कांग्रेस पाचन तंत्र और लिवर से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम, जांच और इलाज पर वैश्विक और भारतीय दृष्टिकोण को एक मंच पर ला रही है.
नड्डा ने कहा कि लगातार शोध और नवाचार की जरूरत बनी हुई है. उन्होंने उम्मीद जताई कि दुनियाभर से आए डॉक्टर और शोधकर्ता पाचन तंत्र के प्रमुख संक्रमणों को नियंत्रित करने तथा पाचन तंत्र और लिवर से जुड़ी बीमारियों के बदलते बोझ से निपटने के लिए नए और प्रभावी समाधान विकसित करेंगे.
उन्होंने कहा कि ऐसे सम्मेलन ज्ञान के आदान-प्रदान, विभिन्न स्वास्थ्य प्रणालियों से सीखने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग विकसित करने का अवसर देते हैं. साथ ही, युवा डॉक्टरों के लिए भी ये सम्मेलन भविष्य के शोध, चिकित्सा अभ्यास और नवाचार को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं.
विश्व हृदय दिवस के अवसर पर आयोजित इस कैंप में क्लीनिकल जांच, लैब टेस्ट और कार्डियक इमेजिंग को एक साथ शामिल किया गया. इसका उद्देश्य लोगों को हृदय रोग के जोखिम के बारे में जागरूक करना और गंभीर हृदय संबंधी घटना से पहले बीमारी की पहचान तथा रोकथाम पर जोर देना था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विश्व हृदय दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल में 27 सितंबर को निःशुल्क प्रिवेंटिव कार्डियक हेल्थ कैंप का आयोजन किया गया. इसमें करीब 120 लोगों ने हिस्सा लिया. कैंप में हृदय रोग से जुड़े जोखिम कारकों की शुरुआती पहचान के लिए ब्लड शुगर, HbA1c, लिपिड प्रोफाइल और ECG जैसी जांचें निःशुल्क की गईं. वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को परामर्श भी दिया.
हृदय रोग के जोखिम की शुरुआती पहचान पर जोर
अस्पताल के कार्डियोलॉजी और CT स्कैन विभाग की ओर से आयोजित इस कैंप का उद्देश्य हृदय रोग के जोखिम की समय रहते पहचान और रोकथाम के प्रति लोगों को जागरूक करना था. डॉक्टरों की सलाह के आधार पर कुछ मरीजों के लिए CT Coronary Calcium Scoring भी निःशुल्क किया गया. यह जांच कोरोनरी धमनियों में कैल्सीफाइड प्लाक के बोझ का आकलन करने में मदद करती है और उपयुक्त मरीजों में हृदय संबंधी जोखिम का आकलन करने के लिए उपयोग की जा सकती है.
क्लीनिकल जांच और स्क्रीनिंग के बाद चयनित मरीजों को CT Coronary Angiography की सुविधा 20 फीसदी रियायती दर पर भी उपलब्ध कराई गई. इस जांच के जरिए कोरोनरी धमनियों की विस्तृत और गैर-आक्रामक जांच की जा सकती है.
कैंप में वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. कविता त्यागी, डॉ. मनीष शर्मा, डॉ. आशीष जैन और डॉ. सुशांत वट्टल के अलावा प्रिवेंटिव हेल्थ की निदेशक डॉ. सोनिया रावत और वरिष्ठ स्टाफ फिजिशियन डॉ. नूर फातिमा वारिस ने मरीजों की स्क्रीनिंग की.
'पहले हार्ट अटैक का इंतजार नहीं करना चाहिए'
धर्मवीरा हार्ट सेंटर के चेयरमैन और सर गंगाराम हॉस्पिटल ट्रस्ट के ट्रस्टी डॉ. जे.पी.एस. सावनी ने कहा कि हृदय रोग के जोखिम कारकों की पहचान शुरुआती स्तर पर करके और समय रहते हस्तक्षेप करके हृदय संबंधी बीमारियों का बोझ काफी हद तक कम किया जा सकता है.
उन्होंने कहा कि प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी केवल लक्षणों पर ध्यान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के समग्र हृदय संबंधी जोखिम को समझने पर भी जोर देती है. उनके मुताबिक, इस तरह के कैंप लोगों तक रोकथाम का संदेश पहुंचाने और उन्हें अपने हृदय स्वास्थ्य के प्रति सक्रिय कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद करते हैं.
इलाज से पहले रोकथाम पर ध्यान जरूरी
AIIMS के प्रोफेसर एमेरिटस और कार्डियक साइंसेज के सलाहकार डॉ. एस.सी. मनचंदा ने इंटरैक्टिव सत्र के दौरान हृदय संबंधी जोखिम की शुरुआती पहचान के महत्व पर जोर दिया.
उन्होंने कहा कि हृदय रोग अचानक विकसित नहीं होता. हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, डिस्लिपिडेमिया, मोटापा, धूम्रपान और अन्य जोखिम कारक कई वर्षों तक बिना स्पष्ट लक्षणों के मौजूद रह सकते हैं और बाद में गंभीर हृदय संबंधी घटना का कारण बन सकते हैं. उन्होंने नियमित स्वास्थ्य जांच और समय पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप को बढ़ावा देने की जरूरत बताई.
विशेषज्ञों ने सवाल-जवाब सत्र में दी जानकारी
कैंप में प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी पर सवाल-जवाब सत्र भी आयोजित किया गया. इसमें डॉ. जे.पी.एस. सावनी, डॉ. एस.सी. मनचंदा, सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के चेयरमैन और सर गंगाराम अस्पताल के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट के मानद कोषाध्यक्ष डॉ. सौमित्र रावत, बायोकेमिस्ट्री विभाग की चेयरपर्सन डॉ. सीमा भार्गव और इमेजिंग विभाग के सलाहकार डॉ. टी.बी.एस. बक्सी ने हृदय स्वास्थ्य और बीमारी की रोकथाम से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की.
आधुनिक तकनीक से कोरोनरी बीमारी की शुरुआती पहचान
अस्पताल के CT विभाग के चेयरपर्सन डॉ. अनुराग यादव ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य क्लीनिकल जांच को आधुनिक कार्डियक इमेजिंग की क्षमताओं के साथ जोड़ना था. उन्होंने बताया कि CT Coronary Calcium Scoring कोरोनरी धमनियों में एथेरोस्क्लेरोटिक प्लाक के बोझ से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है, जबकि CT Coronary Angiography उपयुक्त मरीजों में कोरोनरी धमनियों का विस्तृत और गैर-आक्रामक आकलन करने में मदद करती है.
डॉ. यादव ने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल उचित मरीजों की पहचान करने के लिए किया जाना चाहिए, जिन्हें आगे की जांच और समय पर रोकथाम संबंधी हस्तक्षेप से लाभ मिल सकता है. इस पहल की परिकल्पना डॉ. अनुराग यादव ने डॉ. दीपक गुप्ता, डॉ. किशन रावत, डॉ. राजीव मल्होत्रा, डॉ. स्वप्निल शेठ, डॉ. तान्या चंद्रा, डॉ. प्रियंका गुप्ता और डॉ. ईशा पासरे के साथ की थी.
विश्व हृदय दिवस के अवसर पर आयोजित इस कैंप में क्लीनिकल जांच, लैब टेस्ट और कार्डियक इमेजिंग को एक साथ शामिल किया गया. इसका उद्देश्य लोगों को हृदय रोग के जोखिम के बारे में जागरूक करना और गंभीर हृदय संबंधी घटना से पहले बीमारी की पहचान तथा रोकथाम पर जोर देना था.
शुरुआती लक्षणों को उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी, विशेषज्ञों ने समय पर जांच और डॉक्टर से सलाह लेने की दी सलाह
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है. देश में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के करीब 88 लाख लोग डिमेंशिया के साथ जीवन जी रहे हैं. इनमें अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे आम कारण है. एक अध्ययन के मुताबिक भारत में डिमेंशिया के मामलों की संख्या 2036 तक बढ़कर करीब 1.69 करोड़ हो सकती है. ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचानना और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहद महत्वपूर्ण है.
विश्व अल्जाइमर दिवस के मौके पर एली लिली एंड कंपनी (इंडिया) और फोर्टिस हेल्थकेयर ने लोगों से दिमागी सेहत और याददाश्त में होने वाले बदलावों को लेकर जागरूक रहने की अपील की. इस जागरूकता अभियान में पूर्व मिस यूनिवर्स और अभिनेत्री लारा दत्ता भी शामिल हुईं और उन्होंने अल्जाइमर से प्रभावित परिवारों के अनुभवों पर बात की.
अल्जाइमर सिर्फ भूलने की बीमारी नहीं
अल्जाइमर को आमतौर पर भूलने की बीमारी के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसका असर केवल याददाश्त तक सीमित नहीं रहता. यह धीरे-धीरे बढ़ने वाली न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता, बातचीत, निर्णय लेने और रोजमर्रा के काम खुद करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है. बीमारी बढ़ने के साथ मरीज की आत्मनिर्भरता कम हो सकती है और देखभाल की जरूरत बढ़ सकती है.
इसका असर मरीज के साथ-साथ परिवार और देखभाल करने वालों पर भी पड़ता है. विशेषज्ञों के मुताबिक कई बार परिवार शुरुआती बदलावों को सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. इससे डॉक्टर तक पहुंचने और बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है.
शुरुआती पहचान क्यों जरूरी
अल्जाइमर के बदलाव बीमारी के स्पष्ट लक्षण सामने आने से कई साल पहले शुरू हो सकते हैं. शोध के अनुसार बीमारी के शुरुआती चरणों में दिमाग में एमाइलॉयड जैसे प्रोटीन के असामान्य जमाव से जुड़े बदलाव देखे जा सकते हैं. हालांकि, हर व्यक्ति में बीमारी की शुरुआत और बढ़ने की गति एक जैसी नहीं होती.
इसी वजह से याददाश्त, सोचने-समझने या रोजमर्रा के कामकाज में लगातार बदलाव दिखाई देने पर इसे केवल उम्र का असर मानकर छोड़ना उचित नहीं है. समय पर चिकित्सकीय जांच से डॉक्टर इन बदलावों के संभावित कारणों को समझ सकते हैं और आगे की देखभाल की योजना तैयार कर सकते हैं.
फोर्टिस एस्कॉर्ट्स फरीदाबाद के न्यूरोलॉजी विभाग के डायरेक्टर और एचओडी डॉ. विनीत बंगा ने कहा कि अल्जाइमर केवल याददाश्त खोने तक सीमित नहीं है. यह सोचने-समझने की क्षमता में बदलाव के साथ व्यक्ति की बातचीत, निर्णय लेने और स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है. उनके मुताबिक मरीज के संज्ञानात्मक बदलावों के साथ रोजमर्रा के कामकाज में आए बदलावों को भी समझना जरूरी है, ताकि सही जांच और आगे की देखभाल तय की जा सके.
गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में न्यूरोलॉजी विभाग के एडिशनल डायरेक्टर,डॉ. साहिल कोहली ने कहा कि शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर डॉक्टर से बातचीत मरीज और परिवार को बीमारी को समझने तथा आगे की देखभाल की योजना बनाने में मदद करती है. इससे मरीज की जरूरतों और उसकी पसंद को लेकर परिवार समय रहते बातचीत कर सकता है.
भारत के लिए बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती
भारत में डिमेंशिया के बढ़ते मामलों का संबंध मुख्य रूप से बढ़ती उम्र की आबादी से है. इसके अलावा बीमारी को लेकर जागरूकता की कमी और चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी भी एक चुनौती है. आने वाले वर्षों में बुजुर्ग आबादी बढ़ने के साथ डिमेंशिया से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं, देखभाल और परिवारों पर पड़ने वाला दबाव भी बढ़ सकता है.
एली लिली एंड कंपनी (इंडिया) के मेडिकल सीनियर डायरेक्टर डॉ. राहुल कपूर ने कहा कि अल्जाइमर का असर मरीजों और उनके परिवारों के साथ स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी पड़ता है. उन्होंने बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ाने, समय पर डॉक्टर से सलाह लेने और स्वास्थ्य व्यवस्था के विभिन्न हिस्सों के बीच बेहतर सहयोग की जरूरत पर जोर दिया.
लारा दत्ता ने भी अल्जाइमर को लेकर सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई. उन्होंने कहा कि बीमारी से प्रभावित परिवारों के अनुभव यह दिखाते हैं कि याददाश्त और दिमागी सेहत में बदलाव को बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. उनके मुताबिक इस विषय पर खुलकर बातचीत होने से परिवार शुरुआती संकेतों को पहचानने और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं.
क्या ध्यान रखें
विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार भूलने की समस्या, परिचित कामों को करने में परेशानी, बातचीत या निर्णय लेने की क्षमता में बदलाव और रोजमर्रा की गतिविधियों में असामान्य कठिनाई जैसे संकेतों पर ध्यान देना चाहिए. हालांकि, ऐसे लक्षण कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी हो सकते हैं. इसलिए खुद से अल्जाइमर का निष्कर्ष निकालने के बजाय योग्य डॉक्टर से जांच और सलाह लेना जरूरी है.
डिमेंशिया के मामलों में संभावित बढ़ोतरी को देखते हुए शुरुआती पहचान, सही चिकित्सकीय मूल्यांकन और मरीज के साथ परिवार को समय पर सहायता उपलब्ध कराना आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
इस अभियान के तहत स्वास्थ्य पेशेवरों को टीका लगाने से जुड़े व्यावहारिक दिशा-निर्देश भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं. इनमें खास तौर पर यह जानकारी शामिल है कि बुखार या किसी बीमारी से ठीक होने के दौरान या उसके बाद टीकाकरण कब कराया जा सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने भारत में Abbott के सहयोग से 21 से 27 सितंबर तक इंडियन इम्यूनाइजेशन वीक (Indian Immunization Week) की शुरुआत की है. इस पहल का उद्देश्य टीकाकरण और बचाव आधारित स्वास्थ्य देखभाल के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना है. इसके तहत खास तौर पर सालाना इन्फ्लुएंजा (फ्लू) वैक्सीनेशन को लेकर लोगों और स्वास्थ्य पेशेवरों को जानकारी देने पर जोर दिया जा रहा है.
इस अभियान के तहत स्वास्थ्य पेशेवरों को टीका लगाने से जुड़े व्यावहारिक दिशा-निर्देश भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं. इनमें खास तौर पर यह जानकारी शामिल है कि बुखार या किसी बीमारी से ठीक होने के दौरान या उसके बाद टीकाकरण कब कराया जा सकता है.
वयस्क टीकाकरण की स्थिति पर चिंता
इन्फ्लुएंजा को आमतौर पर मौसमी बीमारी माना जाता है, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है और अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति भी बन सकती है. बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, लंबे समय से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों और स्वास्थ्यकर्मियों में फ्लू से जुड़ी जटिलताओं का जोखिम अधिक हो सकता है.
नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) के आंकड़ों के अनुसार, 18 वर्ष और उससे अधिक उम्र के केवल 1.98 फीसदी वयस्कों ने वयस्क टीके लगवाए हैं. वहीं, 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों में यह आंकड़ा केवल 0.40 फीसदी है. इससे भारत में वयस्क टीकाकरण की कम पहुंच और जागरूकता की स्थिति का पता चलता है.
2026 में कई शहरों में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के केवल 19.7 फीसदी लोगों को इन्फ्लुएंजा के बारे में जानकारी थी, जबकि सिर्फ 1.4 फीसदी लोगों ने कभी फ्लू का टीका लगवाया था.
बुखार के दौरान टीकाकरण को लेकर भ्रम दूर करने की कोशिश
IMA के मुताबिक, कई लोगों में यह भ्रम रहता है कि बुखार होने या उससे ठीक होने के तुरंत बाद टीका लगवाना सुरक्षित है या नहीं. इस वजह से कई बार टीकाकरण टल जाता है और लोगों को बीमारी से बचाव का अवसर नहीं मिल पाता.
इस स्थिति को देखते हुए IMA की ओर से गठित विशेषज्ञ समिति ने उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय टीकाकरण संबंधी सिफारिशों की समीक्षा की है. इसके आधार पर बुखार की स्थिति में टीकाकरण को लेकर स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए व्यावहारिक दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं.
IMA का कहना है कि भारत में पहली बार इस विषय पर विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा किए गए क्लिनिकल दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं. इनका उद्देश्य डॉक्टरों को यह तय करने में मदद करना है कि बुखार से पीड़ित या उससे ठीक हो रहे व्यक्ति को कब सुरक्षित तरीके से टीका दिया जा सकता है.
हल्का बुखार आमतौर पर टीकाकरण टालने की वजह नहीं
दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि टीकाकरण को अनिश्चित समय तक टालना नहीं चाहिए. अगर किसी वजह से टीकाकरण को कुछ समय के लिए स्थगित करना जरूरी हो, तो स्वास्थ्य पेशेवरों को मरीज को अगली टीकाकरण तारीख या फॉलो-अप की स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए.
दिशा-निर्देशों के मुताबिक, ज्यादातर मामलों में हल्का बुखार टीकाकरण टालने का कारण नहीं होना चाहिए. हालांकि, मध्यम से गंभीर बीमारी की स्थिति में व्यक्ति के ठीक होने तक टीकाकरण स्थगित किया जा सकता है. इससे बीमारी के लक्षणों और टीकाकरण के बाद होने वाली संभावित प्रतिक्रियाओं के बीच अंतर समझने में भी मदद मिल सकती है.
IMA के नेशनल प्रेसिडेंट डॉ. अनिल कुमार जे. नायक ने कहा कि कई लोग बुखार के दौरान या उसके बाद फ्लू का टीका लगवाने को लेकर असमंजस के कारण टीकाकरण टाल देते हैं. उन्होंने कहा कि नए दिशा-निर्देश स्वास्थ्य पेशेवरों को व्यावहारिक मार्गदर्शन देने में मदद करेंगे, ताकि खास तौर पर फ्लू से जुड़ी जटिलताओं के अधिक जोखिम वाले लोगों को सही समय पर टीका लगाया जा सके.
गर्भवती महिलाओं के लिए भी महत्वपूर्ण
यह दिशा-निर्देश बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं वाले लोगों, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण बताए गए हैं.
अभियान में कहा गया है कि गर्भावस्था के दौरान किसी भी चरण में इन्फ्लुएंजा वैक्सीनेशन की सिफारिश की जाती है. इससे मां और बच्चे दोनों को सुरक्षा प्रदान करने में मदद मिल सकती है.
Abbott India के रीजनल मेडिकल डायरेक्टर डॉ. पराग शेठ ने कहा कि मौसमी इन्फ्लुएंजा के प्रभाव को कम करने के लिए रोकथाम महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, खासकर उन लोगों में जिन्हें जटिलताओं का अधिक जोखिम है. उन्होंने कहा कि डॉक्टरों की ओर से स्पष्ट जानकारी मिलने से बुखार को लेकर लोगों की चिंताएं टीकाकरण में बाधा बनने से रोकी जा सकती हैं.
सालाना राष्ट्रीय मंच के रूप में विकसित करने की योजना
IMA और Abbott का कहना है कि Indian Immunization Week के जरिए टीकाकरण को लेकर गलतफहमियों को दूर करने और सालाना फ्लू वैक्सीनेशन के महत्व को समझाने का प्रयास किया जा रहा है. इस पहल को हर साल आयोजित होने वाले राष्ट्रीय मंच के रूप में विकसित करने की योजना है. इसके तहत वयस्क टीकाकरण को लेकर जागरूकता बढ़ाने, बचाव आधारित स्वास्थ्य देखभाल को प्रोत्साहित करने और बीमारी की रोकथाम में टीकाकरण की भूमिका को लेकर बेहतर समझ विकसित करने पर जोर दिया जाएगा.
फैटी लिवर से लेकर कोलोरेक्टल कैंसर तक बढ़ रही चुनौती, 30 सितंबर से नई दिल्ली में होगी विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कॉंग्रेस
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नई दिल्ली स्थित एम्स में 20वीं विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कॉंग्रेस 2026 की मेजबानी से पहले विशेषज्ञों ने भारत में पाचन तंत्र और यकृत से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते बोझ को लेकर चिंता जताई है. विशेषज्ञों के मुताबिक, देश में संक्रमण से जुड़ी कई बीमारियों पर नियंत्रण बेहतर हुआ है, लेकिन अब फैटी लिवर, कोलोरेक्टल कैंसर, सीलिएक रोग और आंतों की सूजन जैसी बीमारियां बड़ी चुनौती बनकर उभर रही हैं. उन्होंने लोगों से लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज न करने और समय पर जांच कराने की अपील की है.
दुनिया में लगभग हर तीन में से एक व्यक्ति में जठरांत्र और यकृत से जुड़ी बीमारी के लक्षण पाए जाते हैं. वहीं, हेलिकोबैक्टर पाइलोरी संक्रमण और आंतों में कृमि संक्रमण भी बड़ी आबादी को प्रभावित करते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बदलती जीवनशैली और चयापचय संबंधी बीमारियों के बढ़ते मामलों के बीच पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है.
हर तीन में से एक भारतीय को फैटी लिवर
विशेषज्ञों के मुताबिक, फैटी लिवर भारत में पाचन तंत्र से जुड़ी प्रमुख चिंताओं में शामिल हो गया है. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के नेतृत्व में किए गए एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण के अनुसार, यह समस्या करीब 38.6 प्रतिशत भारतीय वयस्कों और 35.4 प्रतिशत भारतीय बच्चों में पाई गई है. फैटी लिवर का संबंध मधुमेह, मोटापा और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं से है. चिंता की बात यह है कि शुरुआती चरण में यह बीमारी बिना स्पष्ट लक्षणों के रह सकती है और यकृत को नुकसान पहुंचने के बाद इसका पता चलता है.
हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में यह भी सामने आया कि टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित हर चार मरीजों में से करीब एक में चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण यकृत फाइब्रोसिस पाया जा सकता है.
भारत ने 2021 में गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए चलाए जा रहे राष्ट्रीय कार्यक्रम में फैटी लिवर रोग को शामिल किया था. इसके बाद प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के स्तर पर इसकी पहचान के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए.
‘बीमारी का इलाज ही नहीं, अच्छे स्वास्थ्य पर जोर जरूरी’
एम्स नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं मानव पोषण विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख तथा भारतीय गैस्ट्रोएंटरोलॉजी सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. प्रमोद गर्ग ने कहा कि भारत इस समय महामारी विज्ञान से जुड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. उन्होंने कहा कि जागरूकता, टीकाकरण और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के जरिए रोकथाम योग्य बीमारियों पर नियंत्रण में प्रगति हुई है, लेकिन अब देश को चयापचय संबंधी बीमारियों की ऐसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिसका पहले इतने बड़े स्तर पर सामना नहीं किया गया.
डॉ. गर्ग के मुताबिक, फैटी लिवर इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. बीमारी की पहचान आसान होने के बावजूद लोग अक्सर इसके बारे में तब जागरूक होते हैं, जब मरीज बीमार पड़ जाता है. ऐसे में केवल बीमारियों के इलाज के बजाय सक्रिय रूप से अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने पर जोर देना होगा.
कम उम्र में भी बढ़ रहा कोलोरेक्टल कैंसर
विशेषज्ञों ने कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों को भी चिंता का विषय बताया है. खासकर कम उम्र के वयस्कों में इसके मामले सामने आ रहे हैं. भारत में 2022 के दौरान पुरुषों में कोलोरेक्टल कैंसर के 40,430 और महिलाओं में 24,433 नए मामले दर्ज किए गए थे. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मल में खून आना, आंतों की आदतों में लगातार बदलाव और बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना जैसे लक्षणों को सामान्य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
एम्स के प्रोफेसर और स्थानीय आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. गोविंद मखारिया ने कहा कि भारत में विशेषज्ञ डॉक्टरों या चिकित्सा तकनीक की कमी प्रमुख समस्या नहीं रही है. बड़ी चुनौती शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से लेने और स्वास्थ्य की उपेक्षा न करने की आदत है. उन्होंने कहा कि लोग अक्सर लक्षणों को तनाव से जोड़ देते हैं या डॉक्टर के पास जाने से पहले लंबे समय तक बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएं लेते रहते हैं. उनके मुताबिक, कोई भी लक्षण अगर दो से तीन सप्ताह से अधिक समय तक बना रहता है, तो उसकी जांच करानी चाहिए.
हेलिकोबैक्टर पाइलोरी और कृमि संक्रमण भी चिंता
भारत में संक्रमण से जुड़ी बीमारियां भी पाचन तंत्र से जुड़े रोगों के बोझ का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. हेलिकोबैक्टर पाइलोरी संक्रमण अभी भी व्यापक है और इसका संबंध पेप्टिक अल्सर तथा गैस्ट्रिक कैंसर से पाया गया है.
वहीं, कृमि संक्रमण बच्चों को प्रभावित करते हैं और एनीमिया तथा कुपोषण में योगदान दे सकते हैं. विशेषज्ञों ने सीलिएक रोग और आंतों की सूजन से जुड़ी बीमारी पर भी चर्चा की. एम्स के नेतृत्व में किए गए एक सामुदायिक अध्ययन के अनुसार, उत्तर भारत में करीब हर 96 लोगों में से एक व्यक्ति में सीलिएक रोग पाया गया.
‘पहले दुर्लभ लगने वाली बीमारियां अब हर सप्ताह दिखती हैं’
एम्स की गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं मानव पोषण इकाई की प्रोफेसर डॉ. शालिमार ने कहा कि भारत में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के लिए यह महत्वपूर्ण समय है, खासकर तब जब देश चयापचय संबंधी यकृत रोगों के बढ़ते बोझ का सामना कर रहा है.
उन्होंने कहा कि फैटी लिवर का संबंध मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और रक्त में असामान्य वसा के स्तर जैसी समस्याओं से है. ऐसे में इसके कारणों और उपचार को समझना लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है.
वहीं, एम्स की प्रोफेसर और क्रॉन्स कोलाइटिस फाउंडेशन ऑफ इंडिया की महासचिव डॉ. विनीत आहूजा ने कहा कि उनके प्रशिक्षण के समय आंतों की सूजन और सीलिएक रोग भारत में अपेक्षाकृत दुर्लभ बीमारियां मानी जाती थीं, लेकिन अब ऐसे मरीज हर सप्ताह देखने को मिल रहे हैं.
उन्होंने कहा कि एंडोस्कोपी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आंतों के सूक्ष्मजीवों से जुड़े अनुसंधान में हुई प्रगति से बीमारी की पहचान और उपचार में सुधार हो रहा है. अब चुनौती इन तकनीकों और प्रगति को अधिक से अधिक मरीजों तक पहुंचाने की है.
30 सितंबर से नई दिल्ली में होगी विश्व कांग्रेस
पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते बोझ, शुरुआती पहचान और उपचार की नई रणनीतियों पर चर्चा के लिए 20वीं विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कांग्रेस 30 सितंबर से 3 अक्टूबर 2026 तक नई दिल्ली के द्वारका स्थित यशोभूमि, इंडिया इंटरनेशनल कन्वेंशन एंड एक्सपो सेंटर में आयोजित होगी.
भारत पहली बार विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कांग्रेस की मेजबानी कर रहा है. सम्मेलन में देश और विदेश के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विशेषज्ञ शामिल होंगे और पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के बदलते वैश्विक बोझ पर चर्चा करेंगे.
इस सम्मेलन का आयोजन भारतीय गैस्ट्रोएंटरोलॉजी सोसाइटी, इंडियन नेशनल एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ द लिवर, क्रॉन्स एंड कोलाइटिस फाउंडेशन ऑफ इंडिया, इंडियन पैंक्रियास क्लब और इंडियन न्यूरोगैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड मोटिलिटी एसोसिएशन की ओर से विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी संगठन के साथ मिलकर किया जा रहा है.
सम्मेलन की थीम ‘पाचन स्वास्थ्य में बदलाव, प्रकृति का संरक्षण’ है. इसमें रोगों की पहचान, एंडोस्कोपी, चिकित्सकीय उपचार, आंतों के सूक्ष्मजीव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित स्वास्थ्य सेवाओं में हो रही प्रगति पर चर्चा होगी.
विशेषज्ञों ने एक बार फिर लोगों से पाचन तंत्र से जुड़े लगातार बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करने की अपील की है. उनका कहना है कि मल में खून आना, बिना कारण वजन कम होना, आंतों की आदतों में लगातार बदलाव या लंबे समय तक बने रहने वाले अन्य लक्षणों की समय पर जांच कई गंभीर बीमारियों की जल्द पहचान और उपचार में मदद कर सकती है.
भारत में पर्याप्त विशेषज्ञता और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद जरूरतमंद मरीजों और उपलब्ध डोनर टिशू के बीच बड़ा गैप; विशेषज्ञों ने तेज रिट्रीवल, मजबूत आई-बैंक नेटवर्क और बेहतर टिशू उपयोग पर दिया जोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में हर साल करीब 1 लाख कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, लेकिन इनमें से केवल 25,000–30,000 मरीजों को ही ट्रांसप्लांट मिल पाता है. यानी देश में कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की अनुमानित जरूरत का महज 25–30% ही पूरा हो रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी सबसे बड़ी वजह सर्जिकल क्षमता की कमी नहीं, बल्कि पर्याप्त और उपयुक्त डोनर कॉर्निया की उपलब्धता है.
भारत में कॉर्नियल सर्जरी के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर, आधुनिक तकनीक और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार मजबूत हो रहे हैं. इसके बावजूद डोनर टिशू की कमी विजन रिस्टोर करने की राह में बड़ी बाधा बनी हुई है. 41वें नेशनल आई डोनेशन फोर्टनाइट के मौके पर डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल के विशेषज्ञों ने कहा कि इस गैप को कम करने के लिए केवल आई डोनेशन के प्रति जागरूकता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है. डोनर से लेकर मरीज तक पूरी प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाने की जरूरत है.
अस्पताल की ओर से देशभर में आई डोनेशन को लेकर अवेयरनेस कैंपेन्स चलाए जा रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग मृत्यु के बाद आंखें दान करने के लिए आगे आएं.
रिट्रीव की गई कॉर्निया और ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त टिशू में भी बड़ा अंतर
विशेषज्ञों के मुताबिक, चुनौती सिर्फ डोनेशन की संख्या तक सीमित नहीं है. डोनेट की गई आंख से कॉर्निया रिट्रीवल, टिशू इवैल्यूएशन, ट्रांसपोर्टेशन, एलोकेशन और अंततः ट्रांसप्लांटेशन तक हर चरण महत्वपूर्ण है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2023–24 में भारत में 49,000 से अधिक कॉर्निया रिट्रीव की गईं, लेकिन इनमें से करीब 27,394 कॉर्निया ही ट्रांसप्लांटेशन के लिए उपयुक्त पाई गईं. इससे पता चलता है कि रिट्रीव किए गए टिशू और वास्तव में ट्रांसप्लांट में इस्तेमाल होने वाले टिशू के बीच भी बड़ा गैप मौजूद है.
विशेषज्ञों ने कहा कि डोनर कॉर्निया की क्वालिटी बनाए रखने के लिए मृत्यु के बाद जल्द से जल्द आई बैंक से संपर्क करना बेहद जरूरी है. उचित परिस्थितियों में कॉर्नियल रिट्रीवल आमतौर पर करीब छह घंटे के भीतर करने का लक्ष्य रखा जाता है. देरी होने पर टिशू की क्वालिटी प्रभावित हो सकती है और उसके ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त होने की संभावना घट सकती है.
'आई डोनेशन की अपील से आगे बढ़कर पूरी डोनर-टू-रिसिपिएंट जर्नी मजबूत करनी होगी'
डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल के – क्लिनिकल सर्विसेज रीजनल हेड पद्म श्री प्रो. डॉ. जीवन तितियाल ने कहा कि कॉर्नियल ब्लाइंडनेस विजन लॉस के महत्वपूर्ण कारणों में से एक है और कई मामलों में ट्रांसप्लांटेशन के जरिए मरीज की दृष्टि बहाल की जा सकती है.
उन्होंने कहा, "भारत में कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन के लिए सर्जिकल एक्सपर्टीज और लगातार एडवांस होती तकनीक उपलब्ध हैं, लेकिन सूटेबल और हाई-क्वालिटी डोनर टिशू की उपलब्धता अभी भी बड़ी चुनौती है. इसलिए अब बातचीत केवल लोगों से आंखें डोनेट करने की प्लेज लेने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए."
उन्होंने कहा कि परिवारों को इस बात के बारे में जागरूक करना जरूरी है कि मृत्यु के बाद समय पर निर्णय लेना कितना महत्वपूर्ण है. इसके साथ ही हॉस्पिटल-बेस्ड रिट्रीवल सिस्टम को मजबूत करना, प्रभावी आई-बैंक नेटवर्क विकसित करना और पूरी डोनर-टू-रिसिपिएंट प्रक्रिया में बेहतर कोऑर्डिनेशन सुनिश्चित करना होगा.
समय पर संपर्क नहीं होने से कई संभावित डोनर हो जाते हैं 'लॉस्ट'
विशेषज्ञों के मुताबिक, कई संभावित डोनर केवल इसलिए उपलब्ध नहीं हो पाते क्योंकि परिवारों को मृत्यु के तुरंत बाद आई बैंक से संपर्क करने की जरूरत और इसकी समयसीमा की जानकारी नहीं होती. कॉर्नियल ट्रांसप्लांट उन मरीजों में विजन बहाल करने में मदद कर सकता है, जिनकी दृष्टि कॉर्नियल स्कारिंग, इंफेक्शन, ट्रॉमा या अन्य बीमारियों के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुई है. हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया की सफलता ऑपरेशन थिएटर से काफी पहले शुरू हो जाती है और इसकी पहली कड़ी डोनर तथा उसके परिवार का समय पर लिया गया निर्णय है.
विशेषज्ञों ने कहा कि आई डोनेशन बढ़ाना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ टाइमली रिट्रीवल, उचित टिशू इवैल्यूएशन और हर उपयुक्त कॉर्निया के बेहतर इस्तेमाल पर भी उतना ही ध्यान देना होगा.
नई सर्जिकल तकनीकों से प्रभावित कॉर्निया की खास लेयर का इलाज संभव
कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन अब केवल कन्वेंशनल फुल-थिकनेस प्रोसीजर तक सीमित नहीं है. नई तकनीकों के जरिए उपयुक्त मामलों में कॉर्निया की केवल प्रभावित लेयर को रिप्लेस किया जा सकता है. इससे मरीजों को अधिक टार्गेटेड ट्रीटमेंट और अपेक्षाकृत तेज विजुअल रिहैबिलिटेशन का लाभ मिल सकता है.
डॉ. प्रबजोत कौर, सीनियर कंसल्टेंट ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट, डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल ने कहा कि कॉर्नियल सर्जरी में हुए एडवांसमेंट ने डॉक्टरों को कॉर्निया की विशिष्ट लेयर्स को टार्गेट करके इलाज करने की सुविधा दी है.
उन्होंने कहा, "इन एडवांसमेंट का बेहतर आउटकम में वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है, जब सूटेबल डोनर टिशू उपलब्ध हो. जैसे-जैसे सर्जिकल तकनीक विकसित हो रही है, क्वालिटी डोनर कॉर्निया तक समय पर पहुंच और भी महत्वपूर्ण होती जा रही है."
दिल्ली-एनसीआर में 50 से अधिक केराटोप्लास्टी प्रोसीजर
डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल ने दिल्ली-एनसीआर में 50 से अधिक केराटोप्लास्टी प्रोसीजर पूरे किए हैं. इनमें इंफेक्शन या ट्रॉमा के बाद कॉर्नियल स्कार्स, एडवांस्ड कॉर्नियल डिजीज, केराटोकोनस और कॉर्निया की क्लैरिटी एवं फंक्शन को प्रभावित करने वाली अन्य स्थितियों से जूझ रहे मरीज शामिल रहे.
डॉ. तितियाल ने कहा कि भारत में कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन के गैप को कम करने के लिए पूरे इकोसिस्टम को मिलकर काम करना होगा. जागरूकता बढ़ाने और समय पर कॉर्निया रिट्रीवल से लेकर आई-बैंक इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने और उपलब्ध टिशू के बेहतर उपयोग तक, इस पूरी प्रक्रिया की हर कड़ी को मजबूत करना जरूरी है.
41वें नेशनल आई डोनेशन फोर्टनाइट के तहत अस्पताल ने अवेयरनेस वॉकथॉन का भी आयोजन किया. इसका उद्देश्य आई डोनेशन के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ मृत्यु के बाद समय पर कार्रवाई के महत्व को समझाना था, ताकि अधिक से अधिक उपयुक्त डोनर कॉर्निया जरूरतमंद मरीजों तक पहुंच सके.
ओम गगनगिरी हॉस्पिटल्स एंड ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज के संस्थापक और लैप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. प्रकाशराव शेंडगे ने बताया, कार्यस्थल पर मोबाइल डायग्नोस्टिक्स किस तरह कारोबार के लिए उपयोगी है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रुहैल आमीन
BW बिजनेसवर्ल्ड से बातचीत में ओम गगनगिरी हॉस्पिटल्स एंड ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज के संस्थापक डॉ. प्रकाशराव शेंडगे ने कहा कि फैक्ट्रियों में मेडिकल जांच के दौरान बार-बार आने वाली समस्याओं ने उन्हें ऐसी डायग्नोस्टिक सुविधा तैयार करने के लिए प्रेरित किया, जो कार्यस्थलों तक पहुंच सके. उनका कहना है कि 2012 में शुरू हुआ यह बेड़ा अब पांच बसों तक पहुंच चुका है. वह इसके संचालन मॉडल, सुरक्षा उपायों और इस बात पर चर्चा करते हैं कि कर्मचारियों का स्वास्थ्य केवल कानूनी अनुपालन की आवश्यकताओं तक सीमित नहीं होना चाहिए.
मोबाइल मेडिकल चेक-अप सेवा के जरिए आप किस समस्या का समाधान करना चाहते थे?
सेवा शुरू करने से पहले मैं एक दशक से अधिक समय तक व्यावसायिक स्वास्थ्य जांच कर रहा था. कई जगहों पर उपयुक्त कमरे उपलब्ध नहीं होते थे. ऑडियोमेट्री के लिए साउंडप्रूफ जगह की जरूरत होती है, एक्स-रे के लिए सुरक्षित क्षेत्र और ECG जांच के लिए निजता और स्थिरता जरूरी होती है. अक्सर अस्थायी व्यवस्था पहले तैयार करनी पड़ती थी.
मुझे लगा कि इसका समाधान एक ऐसी पूर्ण डायग्नोस्टिक सुविधा है, जो कार्यस्थल तक जा सके और ग्राहक के परिसर में ही जांच उपलब्ध करा सके, जिससे समय की बचत हो. हमने 2012 में पहली बस शुरू की, इसके बाद 2015, 2018, 2020 और 2025 में अन्य यूनिट्स शुरू कीं.
यह बस पारंपरिक मोबाइल मेडिकल सुविधा से किस तरह अलग है?
कई मेडिकल वाहन मरीजों को ले जाने या सीमित दायरे की बुनियादी सेवाएं देने के लिए होते हैं. हमारी बस विशेष रूप से व्यावसायिक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में तैयार की गई है. इसमें रजिस्ट्रेशन, दृष्टि जांच, ऑडियोमेट्री, ब्लड सैंपल कलेक्शन, ECG, शारीरिक जांच, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और डिजिटल चेस्ट एक्स-रे के लिए अलग-अलग स्टेशन हैं.
नियोक्ता पार्किंग की जगह और बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराता है. इसके बाद हम संगठन के स्वास्थ्य और सुरक्षा कार्यक्रम के तहत जरूरी जांच साइट पर ही कर सकते हैं. इनमें दृष्टि और सुनने की जांच, ECG, फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच, एक्स-रे और रक्त एवं मूत्र की जांच शामिल हो सकती है. कर्मचारी की भूमिका से जुड़े जोखिमों के आधार पर विशेष जांच भी जोड़ी जाती हैं.
नियोक्ता के लिए इसका संचालन संबंधी क्या फायदा है?
एक पूरी जांच में आमतौर पर करीब 25 से 30 मिनट लगते हैं. अलग-अलग स्टेशनों पर विभिन्न जांच एक साथ की जा सकती हैं, इसलिए एक बस आमतौर पर पैकेज और साइट की परिस्थितियों के आधार पर एक दिन में करीब 120 से 150 कर्मचारियों की जांच कर सकती है.
सैकड़ों कर्मचारियों को अस्पताल भेजने में काम का समय प्रभावित हो सकता है और उत्पादन में व्यवधान आ सकता है. कार्यस्थल पर जांच होने से कर्मचारी कम समय गंवाकर वापस काम पर लौट सकते हैं. इस वजह से नियोक्ताओं को इस मॉडल को अपनाने के लिए राजी करने में मदद मिली, हालांकि शुरुआत में हमारी दरें पारंपरिक चेक-अप की तुलना में मामूली रूप से अधिक थीं.
प्रत्येक यूनिट की लागत कितनी है और आपने कितना विस्तार किया है?
प्रत्येक बस को तैयार करने और उसमें उपकरण लगाने में करीब 1 करोड़ रुपये की लागत आती है. हमने एक बस से शुरुआत की थी और अब पांच बसें संचालित कर रहे हैं. हमारा अनुमान है कि हमने करीब 12 लाख कर्मचारियों की स्वास्थ्य जांच की है, जिनमें ज्यादातर महाराष्ट्र में हैं, और अब हमने इस सेवा का विस्तार भारत के अन्य हिस्सों में भी किया है. हमारे ग्राहकों में करीब 50 कर्मचारियों वाली यूनिट्स से लेकर लगभग 10,000 कर्मचारियों के लिए सालाना ऑर्डर देने वाले संगठन तक शामिल हैं.
व्यावसायिक स्वास्थ्य जांच किसी उद्योग या नौकरी के हिसाब से विशेष क्यों होनी चाहिए?
जांच कर्मचारी के वास्तविक जोखिम के अनुरूप होनी चाहिए. शोर वाले क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ऑडियोमेट्री जरूरी है, जबकि धूल के संपर्क में रहने वालों के लिए पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और विशेष चेस्ट एक्स-रे की जरूरत हो सकती है. कुछ विशेष धातुओं से जुड़े काम में ब्लड-लीड टेस्ट की आवश्यकता हो सकती है. रसायनों के संपर्क में आने पर लिवर और किडनी की कार्यक्षमता की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है. जांच की आवृत्ति और दायरा लागू नियमों, काम की प्रकृति और जोखिम के स्तर पर निर्भर करता है. हर कर्मचारी पर एक जैसा पैकेज लागू करने से किसी विशेष विभाग में मौजूद जोखिमों की पहचान नहीं हो सकती. जहां स्वास्थ्य में गिरावट का पता चलता है, वहां अधिक करीबी मेडिकल निगरानी, कर्मचारी को जोखिम वाले क्षेत्र से हटाना और जोखिम को उसके स्रोत पर कम करने के लिए नियंत्रण उपायों की सिफारिश की जा सकती है.
गंभीर असामान्यता पाए जाने पर क्या होता है?
तत्काल ध्यान देने वाले मामलों को प्राथमिकता दी जाती है. हम आमतौर पर 12 से 24 घंटे के भीतर और कई बार इससे भी पहले कर्मचारी और कंपनी के प्रबंधन को जानकारी देते हैं. एक मामले में एक कर्मचारी का ब्लड शुगर 600 mg/dL से अधिक पाया गया. उसी शाम लैब ने हमें इसकी जानकारी दी और कर्मचारी को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराने और उपचार के लिए भेजा गया.
नियमित लैब रिपोर्ट आमतौर पर करीब 48 घंटे के भीतर WhatsApp या ईमेल के जरिए कर्मचारियों को भेज दी जाती हैं. व्यक्तिगत स्वास्थ्य कार्ड, विश्लेषण और प्रबंधन रिपोर्ट समेत पूरा दस्तावेजीकरण आमतौर पर 10 से 15 दिन में पूरा होता है. जहां किसी संगठन के पास अपनी मेडिकल टीम नहीं होती, वहां हमारे डॉक्टर काउंसलिंग, उपचार संबंधी सहायता या टेली-कंसल्टेशन उपलब्ध करा सकते हैं.
वाहन के अंदर सटीकता और सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करते हैं?
साइट पर पहुंचने के बाद हाइड्रोलिक जैक बस को स्थिर करते हैं, ताकि उसकी हलचल से ब्लड सैंपल लेने, ECG रिकॉर्डिंग या अन्य जांचों पर असर न पड़े. ऑडियोमेट्री साउंडप्रूफ केबिन में की जाती है, जबकि सैंपल को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान नियंत्रित रेफ्रिजरेटर में रखा जाता है. हम ECG और पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट के लिए कंप्यूटर आधारित उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं और रजिस्ट्रेशन, सैंपल लेबलिंग, जांच और रिपोर्टिंग के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं का पालन करते हैं.
डिजिटल एक्स-रे क्षेत्र एक अलग, लेड-शील्डेड केबिन है, जिसे लागू रेडिएशन-सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तैयार किया गया है. डिजिटल इमेजिंग से टीम को तुरंत तस्वीर देखने और किसी स्पष्ट चिंता की स्थिति में कर्मचारी को सलाह देने में भी मदद मिलती है.
कार्यस्थल पर होने वाली स्वास्थ्य जांच से कौन से रुझान सामने आ रहे हैं?
हम व्यावसायिक जोखिमों के साथ-साथ जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां भी बढ़ती हुई देख रहे हैं. हमारे अनुभव में जांच किए गए करीब 15 प्रतिशत कर्मचारियों को डायबिटीज हो सकती है, जबकि 8 से 10 प्रतिशत अन्य कर्मचारियों में ब्लड शुगर बढ़ा हुआ या जोखिम की स्थिति हो सकती है. करीब 15 से 20 प्रतिशत कर्मचारियों में हाइपरटेंशन और लगभग 10 से 15 प्रतिशत में दृष्टि संबंधी असामान्यता हो सकती है. ये आंकड़े अलग-अलग कार्यबल और उद्योगों में अलग हो सकते हैं. हालांकि, जांच का महत्व तभी है जब उसके बाद काउंसलिंग, रेफरल, उपचार और निगरानी की व्यवस्था हो. स्वास्थ्य सेवा को अधिक सक्रिय बनाने की जरूरत है. नियोक्ताओं को व्यावसायिक स्वास्थ्य को केवल अनुपालन की कवायद के बजाय कर्मचारियों में निवेश के रूप में देखना चाहिए. समय रहते बीमारी का पता चलने से कर्मचारी कल्याण, उत्पादकता और संगठन की मजबूती को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.
रुहैल आमीन, BW रिपोर्टर्स
(BW Businessworld के वरिष्ठ संपादक हैं और नई दिल्ली में स्थित अनुभवी पत्रकार हैं. वह अपनी पैनी विश्लेषण क्षमता और गहन रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं. उनका काम पत्रकारिता की विश्वसनीयता और उत्कृष्ट कहानी कहने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसने उन्हें उद्योग में एक भरोसेमंद आवाज के रूप में पहचान दिलाई है. उनका योगदान कई प्लेटफॉर्म तक फैला हुआ है और वह लगातार ऐसा कंटेंट उपलब्ध कराते हैं जो व्यापक दर्शकों को जानकारी देता है और उनसे जुड़ता है.)
‘ऑलवेज ओपन, ऑलवेज हियर’ अभियान के तहत रविवार को भी कंसल्टेशन, डायग्नोस्टिक्स, हेल्थ चेकअप और फॉलो-अप सेवाएं उपलब्ध होंगी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अपोलो हॉस्पिटल्स ने हेल्थकेयर सेवाओं को लोगों की सुविधा के अनुरूप सातों दिन उपलब्ध कराने के लिए ‘ऑलवेज ओपन, ऑलवेज हियर’ अभियान लॉन्च किया है. इस पहल के तहत अब रविवार को भी मरीजों को आउटपेशेंट कंसल्टेशन, डायग्नोस्टिक्स, प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप, फॉलो-अप कंसल्टेशन और पहले से निर्धारित प्रक्रियाओं की सुविधा मिल सकेगी. कंपनी के मुताबिक, इसका उद्देश्य व्यस्त कामकाजी लोगों और परिवारों के लिए समय की बाधा को कम करना और लोगों को समय पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है.
इमरजेंसी सेवाएं पहले से 24 घंटे उपलब्ध
अपोलो हॉस्पिटल्स की इमरजेंसी, क्रिटिकल केयर और इनपेशेंट सेवाएं पहले से ही 24 घंटे और सातों दिन उपलब्ध हैं. नई पहल के जरिए अब रूटीन और योजनाबद्ध स्वास्थ्य सेवाओं को भी रविवार तक विस्तारित किया गया है.
इसका मतलब है कि मरीजों को स्पेशियलिस्ट से परामर्श, स्वास्थ्य जांच, डायग्नोस्टिक टेस्ट या फॉलो-अप के लिए सोमवार का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. हालांकि, सेवाओं की उपलब्धता संबंधित अस्पताल के शेड्यूल के अनुसार होगी.
कामकाजी लोगों के लिए आसान होगा हेल्थ चेकअप
अपोलो के मुताबिक, व्यस्त कार्यदिवस, पारिवारिक जिम्मेदारियां और अन्य दायित्व अक्सर लोगों को डॉक्टर से परामर्श, टेस्ट और हेल्थ चेकअप टालने के लिए मजबूर करते हैं. रविवार को भी सेवाएं उपलब्ध होने से वर्किंग प्रोफेशनल्स बिना वीकडे में छुट्टी लिए अपना हेल्थ चेकअप करा सकेंगे.
वहीं, बुजुर्गों के लिए डायग्नोस्टिक टेस्ट और अन्य निर्धारित सेवाएं रविवार को भी उपलब्ध होने से सुविधा बढ़ेगी. फॉलो-अप के लिए भी मरीजों को अगले कार्यदिवस तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा.
बिना लक्षण वाली बीमारियों की बढ़ती चुनौती
अपोलो की ‘हेल्थ ऑफ द नेशन 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में मोटापा, हाइपरटेंशन, डायबिटीज और मेटाबोलिक डिसऑर्डर जैसी जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं का बोझ बढ़ रहा है. कंपनी के अनुसार, अपोलो इकोसिस्टम में 25 लाख से अधिक लोगों की हेल्थ स्क्रीनिंग के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए, जिनमें लोगों में बीमारी के स्पष्ट लक्षण नहीं थे.
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 26 फीसदी लोगों में हाइपरटेंशन और 23 फीसदी में डायबिटीज पाई गई. अपोलो का कहना है कि इन आंकड़ों से पता चलता है कि केवल लक्षण सामने आने के बाद इलाज कराने वाला हेल्थकेयर मॉडल पर्याप्त नहीं है और नियमित स्क्रीनिंग व समय पर रोकथाम पर अधिक जोर देने की जरूरत है.
'समय पर परामर्श से बदल सकती है जिंदगी'
अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप के फाउंडर और चेयरमैन डॉ. प्रताप सी. रेड्डी ने कहा कि चार दशक से अधिक समय से अपोलो का मानना रहा है कि हेल्थकेयर का उद्देश्य सिर्फ बीमारी का इलाज करना नहीं, बल्कि उसकी रोकथाम और स्वास्थ्य की रक्षा करना भी है.
उन्होंने कहा कि ‘ऑलवेज ओपन, ऑलवेज हियर’ इसी सोच को आगे बढ़ाने वाली पहल है. इमरजेंसी और क्रिटिकल केयर के लिए अपोलो हमेशा उपलब्ध रहा है और अब रूटीन तथा प्रिवेंटिव केयर भी सातों दिन उपलब्ध कराई जा रही है.
हेल्थकेयर में बदलाव की परंपरा का विस्तार
अपोलो के मुताबिक, संस्थान ने 1983 से भारतीय हेल्थकेयर क्षेत्र में कई नई पहल की हैं. कंपनी ने कार्डियक केयर, कैंसर उपचार, प्रिवेंटिव हेल्थ चेक और ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसे क्षेत्रों में अपनी सेवाओं का विस्तार किया है.
कंपनी के अनुसार, उसके मास्टर हेल्थ चेक कार्यक्रम से अब तक 3 करोड़ से अधिक लोगों को लाभ मिला है. इसके अलावा Apollo ProHealth एआई आधारित रिस्क प्रेडिक्शन और एनालिसिस के जरिए स्वास्थ्य जोखिमों की शुरुआती पहचान में मदद करता है.
'लोगों की सुविधा के समय पर मिलनी चाहिए मेडिकल केयर'
अपोलो हॉस्पिटल्स की एग्जिक्यूटिव वाइस चेयरमैन डॉ. प्रीथा रेड्डी ने कहा कि मेडिकल केयर लोगों को उनके लिए सुविधाजनक समय पर उपलब्ध होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि वर्किंग प्रोफेशनल्स, केयरगिवर्स और परिवारों पर कई जिम्मेदारियां होती हैं. ऐसे में रविवार को डॉक्टर का परामर्श, हेल्थ चेकअप और फॉलो-अप केयर उपलब्ध होने से उनके लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान होगी.
मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर से संचालित होंगी सेवाएं
‘ऑलवेज ओपन, ऑलवेज हियर’ अभियान को अपोलो के मौजूदा क्लिनिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए लागू किया जाएगा. इसमें डॉक्टर, डायग्नोस्टिक सुविधाएं, ऑपरेटिंग थिएटर और कोऑर्डिनेटेड केयर टीमें शामिल होंगी.
कंपनी का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य रविवार को भी व्यवस्थित, सुविधाजनक और मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है. इसके जरिए अपोलो समय पर इलाज, शुरुआती पहचान और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता को आगे बढ़ा रहा है.
डॉ. प्रकाशराव शेंडगे ने BW से भारत के कार्यबल के लिए मोबाइल ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज की शुरुआत, बीमारियों की शुरुआती पहचान में सुधार और एक अत्यंत नवोन्मेषी व प्रिवेंटिव हेल्थकेयर मॉडल विकसित करने पर विस्तार से बात की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रुहैल आमीन
नवी मुंबई स्थित ओम गगनगिरी हॉस्पिटल्स और ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज एलएलपी के संस्थापक और जाने-माने लैप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. प्रकाशराव शेंडगे ने दो दशकों से अधिक समय क्लिनिकल मेडिसिन और कार्यस्थल स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हुए बिताया है. वर्ष 2012 में उन्होंने एक हाई-टेक मोबाइल मेडिकल चेक-अप बस शुरू की, जिसका उद्देश्य डायग्नोस्टिक सुविधाओं को सीधे फैक्ट्रियों, औद्योगिक इकाइयों और कॉरपोरेट परिसरों तक पहुंचाना था. एक वाहन से शुरू हुई यह पहल अब पांच बसों के बेड़े में बदल चुकी है, जो महाराष्ट्र और देशभर में विभिन्न संगठनों को सेवाएं दे रहा है. इस विस्तृत बातचीत में डॉ. शेंडगे इस पहल के पीछे की सोच, बसों में इस्तेमाल की गई तकनीक और सुरक्षा व्यवस्थाओं, इंडस्ट्री के अनुसार होने वाली जांचों की अहमियत और कर्मचारियों की भलाई के लिए प्रिवेंटिव ऑक्यूपेशनल हेल्थकेयर को अनिवार्य बनाने की जरूरत पर बात करते हैं. संपादित अंश:
ऑक्यूपेशनल हेल्थकेयर के इस मॉडल को स्थापित करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
मोबाइल मेडिकल चेक-अप सर्विस शुरू करने से पहले मैं एक दशक से अधिक समय तक ऑक्यूपेशनल हेल्थ एग्जामिनेशन कर रहा था. इस दौरान फैक्ट्रियों और कॉरपोरेट साइट्स पर मुझे बार-बार कई व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ा. अक्सर उपयुक्त कमरे उपलब्ध नहीं होते थे. ऑडियोमेट्री के लिए पूरी तरह साउंडप्रूफ जगह की जरूरत होती थी, एक्स-रे के लिए एक सुरक्षित और अलग स्थान चाहिए होता था और ECG जांच के लिए प्राइवेसी व स्थिर वातावरण जरूरी था. कई मामलों में जांच शुरू होने से पहले ही क्लाइंट के परिसर में पूरा अस्थायी सेटअप तैयार करना पड़ता था.
मुझे महसूस हुआ कि इसका समाधान एक ऐसी पूरी डायग्नोस्टिक सुविधा तैयार करना है, जो खुद कार्यस्थल तक पहुंच सके. उद्देश्य सरल था—कर्मचारियों और नियोक्ताओं का काफी समय बचाते हुए क्लाइंट की साइट पर सटीक, नियमों के अनुरूप और किफायती स्वास्थ्य जांच उपलब्ध कराना. हमने 2012 में अपनी पहली हाई-टेक मेडिकल चेक-अप बस शुरू की. अच्छी प्रतिक्रिया मिलने पर 2015 में दूसरी, 2018 में तीसरी, 2020 में चौथी और 2025 में और अधिक अपग्रेड की गई पांचवीं बस शुरू की गई.
आपका मॉडल मेडिकल बस की पारंपरिक अवधारणा से किस तरह अलग है?
कई मेडिकल वाहनों का इस्तेमाल मुख्य रूप से मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने या सीमित स्तर की बुनियादी सेवाएं देने के लिए किया जाता है. हमारा कॉन्सेप्ट अलग है. यह बस खुद एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए ऑक्यूपेशनल हेल्थ सेंटर की तरह काम करती है. हम टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित कर्मचारियों और रिपोर्टिंग सिस्टम को सीधे फैक्ट्री या कॉरपोरेट परिसर तक लेकर जाते हैं.
नियोक्ता को केवल पार्किंग की जगह और बिजली का कनेक्शन उपलब्ध कराना होता है. जहां बिजली उपलब्ध नहीं होती, वहां हम जनरेटर की व्यवस्था कर सकते हैं. इसके बाद संगठन के हेल्थ और सेफ्टी प्रोग्राम के तहत जरूरी सभी जांच साइट पर ही की जाती हैं. इससे कामकाज में कम बाधा आती है और बड़ी संख्या में कर्मचारी आसानी से अनिवार्य स्वास्थ्य जांच पूरी कर पाते हैं.
मोबाइल मेडिकल चेक-अप बस के अंदर कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं?
बस को सात कार्यात्मक क्षेत्रों के साथ एक पूर्ण डायग्नोस्टिक यूनिट के रूप में डिजाइन किया गया है. इनमें रजिस्ट्रेशन, विजन स्क्रीनिंग, साउंडप्रूफ ऑडियोमेट्री केबिन, ब्लड कलेक्शन एरिया, ECG केबिन, डॉक्टर का एग्जामिनेशन केबिन, फेफड़ों की कार्यक्षमता जांचने का क्षेत्र और रेडिएशन से सुरक्षित डिजिटल एक्स-रे रूम शामिल हैं.
हम फिजिकल एग्जामिनेशन, नजदीक और दूर की दृष्टि जांच, कलर विजन स्क्रीनिंग, ऑडियोमेट्री, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट, ECG, डिजिटल चेस्ट एक्स-रे और कई तरह की ब्लड व यूरिन जांच कर सकते हैं. इंडस्ट्री के आधार पर जांच का दायरा कंप्लीट ब्लड काउंट, ब्लड शुगर और ब्लड ग्रुप जैसी बुनियादी जांचों से लेकर किडनी और लिवर फंक्शन, लिपिड प्रोफाइल, HbA1c और ब्लड-लेड टेस्ट जैसी विशेष जांचों तक हो सकता है.
एक दिन में कितने कर्मचारियों की जांच की जा सकती है और प्रत्येक चेक-अप में कितना समय लगता है?
जब कोई कर्मचारी जांच प्रक्रिया में प्रवेश करता है तो पूरा एग्जामिनेशन सामान्य तौर पर 25 से 30 मिनट में पूरा हो जाता है. अलग-अलग स्टेशनों पर योजनाबद्ध क्रम में कई टेस्ट एक साथ किए जा सकते हैं. ऐसे में एक बस आमतौर पर एक दिन में करीब 120 से 150 कर्मचारियों की जांच कर सकती है, हालांकि यह टेस्ट पैकेज और साइट की परिस्थितियों पर निर्भर करता है.
नियोक्ताओं के लिए यह इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा है. सैकड़ों या हजारों कर्मचारियों को जांच के लिए अस्पताल भेजने में एक या दो कार्यदिवस खर्च हो सकते हैं और उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है. सुविधा को सीधे कार्यस्थल पर लाने से कर्मचारी कम से कम समय में जांच कराकर दोबारा काम पर लौट सकते हैं.
इस पहल को इंडस्ट्री से कैसी प्रतिक्रिया मिली है?
जब हमने इसकी शुरुआत की थी, तब प्रतिक्रिया को लेकर कुछ अनिश्चितता थी, क्योंकि पारंपरिक हेल्थ चेक-अप पहले से उपलब्ध थे और इस तरह के विशेष वाहन के लिए काफी बड़ा निवेश करना पड़ता है. प्रत्येक बस को तैयार करने और जरूरी उपकरणों से लैस करने में करीब 1 करोड़ रुपये की लागत आती है. शुरुआत में हमारी दरें कुछ अधिक थीं, लेकिन नियोक्ताओं ने जल्द ही समय की बचत के साथ-साथ रिपोर्ट की गुणवत्ता और एकरूपता का महत्व समझा.
कई संगठन अब करीब 13 वर्षों से लगातार हमारे साथ काम कर रहे हैं. हमने लगभग 12 लाख कर्मचारियों की स्वास्थ्य जांच की है, जिनमें अधिकांश महाराष्ट्र में हैं. पिछले कुछ वर्षों में हमने अपनी सेवाओं का विस्तार पूरे भारत में किया है. हम करीब 50 कर्मचारियों वाली छोटी इकाइयों से लेकर सालाना लगभग 10,000 कर्मचारियों की जांच के ऑर्डर देने वाले बड़े संगठनों तक को सेवाएं दे रहे हैं. लगातार मांग के कारण एक बस से शुरू हुआ यह मॉडल अब पांच बसों तक पहुंच गया है.
किन इंडस्ट्रीज में सबसे अधिक बार ऑक्यूपेशनल हेल्थ एग्जामिनेशन की जरूरत होती है?
जांच की आवृत्ति और दायरा लागू कानून, काम की प्रकृति और जोखिम के स्तर पर निर्भर करता है. कई उद्योगों में सालाना स्वास्थ्य जांच अनिवार्य होती है. फार्मास्युटिकल, केमिकल, पेट्रोकेमिकल और फूड प्रोसेसिंग बिजनेस के साथ-साथ होटल और अन्य निर्दिष्ट प्रतिष्ठानों में उनके संबंधित अनुपालन ढांचे के तहत हर छह महीने में जांच की आवश्यकता हो सकती है.
खतरनाक उद्योगों में विशेष सावधानी की जरूरत होती है, क्योंकि कर्मचारी लंबे समय तक धूल, शोर, रसायनों, धातुओं या अन्य पदार्थों के संपर्क में रह सकते हैं. इसलिए जांच कार्यक्रम सभी के लिए एक जैसा रखने के बजाय प्रत्येक विभाग में मौजूद वास्तविक जोखिमों के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए.
जब कोई कर्मचारी हेल्थ चेक-अप के लिए बस में प्रवेश करता है तो प्रक्रिया क्या होती है?
प्रक्रिया की शुरुआत रजिस्ट्रेशन से होती है. हम कर्मचारी के विभाग, भूमिका और उसकी विशिष्ट पहचान संबंधी जानकारी दर्ज करते हैं. दौरे से पहले हम प्रबंधन, सेफ्टी टीम या फैक्ट्री मेडिकल ऑफिसर के साथ मिलकर अलग-अलग श्रेणी के कर्मचारियों के लिए जरूरी जांचों की पहचान करते हैं. इसके बाद कर्मचारी को क्रमवार संबंधित स्टेशनों पर भेजा जाता है.
एक सामान्य प्रोग्राम में फिजिकल एग्जामिनेशन, विजन टेस्ट, ऑडियोमेट्री, फेफड़ों की कार्यक्षमता जांच, ECG, एक्स-रे इमेजिंग और ब्लड व यूरिन सैंपल कलेक्शन शामिल हो सकते हैं. शोर वाले क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों की ऑडियोमेट्री की जाती है. धूल के संपर्क में रहने वाले कर्मचारियों को पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और चेस्ट एक्स-रे की जरूरत हो सकती है, जबकि विशेष रसायनों या धातुओं के साथ काम करने वाले कर्मचारियों को विशेष लैब जांच की आवश्यकता पड़ सकती है. यह जोखिम आधारित दृष्टिकोण जांच को अधिक उपयोगी बनाता है.
रिपोर्ट कितनी जल्दी मिलती है, खासकर जब कोई गंभीर असामान्यता पाई जाती है?
गंभीर मामलों को प्राथमिकता दी जाती है. अगर कोई बड़ी असामान्यता सामने आती है तो हम कर्मचारी और कंपनी प्रबंधन को 12 से 24 घंटे के भीतर और कई बार इससे भी पहले जानकारी दे देते हैं. एक मामले में एक कर्मचारी का ब्लड शुगर स्तर 600 mg/dL से अधिक पाया गया था. सैंपल मिलने के कुछ घंटों के भीतर उसी शाम हमारी लैब ने हमें इसकी जानकारी दी और कर्मचारी को तत्काल अस्पताल में भर्ती कर इलाज के लिए भेजा गया.
रूटीन लैब रिपोर्ट आमतौर पर करीब 48 घंटे के भीतर कर्मचारियों को WhatsApp या ईमेल के जरिए भेज दी जाती है. पूरी अनुपालन डॉक्यूमेंटेशन प्रक्रिया, जिसमें डेटा एंट्री, जहां लागू हो वहां वैधानिक फॉर्म, व्यक्तिगत हेल्थ कार्ड, विश्लेषण और मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम रिपोर्ट शामिल हैं, आमतौर पर 10 से 15 दिन में पूरी हो जाती है. मेडिकल फॉलो-अप, रिकॉर्ड और ऑडिट के लिए प्रबंधन को जरूरी सॉफ्ट और हार्ड कॉपी उपलब्ध कराई जाती हैं.
जब कोई असामान्य परिणाम सामने आता है तो उसके बाद आप किस तरह की सहायता देते हैं?
स्क्रीनिंग तभी उपयोगी है, जब उसके बाद समय पर कार्रवाई की जाए. किसी गंभीर असामान्यता की स्थिति में हम तुरंत कर्मचारी और नियोक्ता को सूचित करते हैं, ताकि आवश्यक इलाज या अस्पताल में भर्ती कराने की व्यवस्था की जा सके. कई बड़े संगठनों में फैक्ट्री मेडिकल ऑफिसर और कर्मचारी बीमा की सुविधा होती है और हम आगे के इलाज के लिए इन व्यवस्थाओं के साथ समन्वय करते हैं.
अनियंत्रित डायबिटीज या हाइपरटेंशन जैसी स्थितियों में कर्मचारी को काउंसलिंग, दवाओं की समीक्षा और लंबे समय तक निगरानी की जरूरत हो सकती है. जहां किसी छोटे संगठन के पास इन-हाउस मेडिकल टीम नहीं होती, वहां हमारे अस्पताल के डॉक्टर काउंसलिंग और इलाज के लिए साइट पर जा सकते हैं. यदि कर्मचारी किसी दूसरे शहर में है या आसानी से अस्पताल नहीं पहुंच सकता तो हम टेलीकंसल्टेशन की सुविधा भी देते हैं.
डिजिटल एक्स-रे बस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. रेडिएशन से सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है?
एक्स-रे सेक्शन को रेडिएशन से सुरक्षित एक अलग केबिन के रूप में तैयार किया गया है. इस संरचना में दो मिलीमीटर की लेड शील्डिंग वाला कंपोजिट सिस्टम इस्तेमाल किया गया है, जिससे रेडिएशन कमरे के भीतर ही सीमित रहता है. डिजाइन और उपकरणों का निरीक्षण लागू रेडिएशन सेफ्टी मानकों के तहत किया जाता है और आवश्यक मंजूरी ली जाती है. कार्यात्मक रूप से यह जांच अस्पताल स्थित एक्स-रे सुविधा के समान सुरक्षा और डायग्नोस्टिक मानकों को पूरा करने के लिए डिजाइन की गई है.
डिजिटल टेक्नोलॉजी ने पुराने सिस्टम की तुलना में रेडिएशन डोज को काफी कम किया है और पारंपरिक डार्क रूम की जरूरत भी खत्म कर दी है. इमेज लगभग तुरंत समीक्षा के लिए उपलब्ध हो जाती हैं, जिससे टीम किसी स्पष्ट समस्या की तुरंत पहचान कर कर्मचारी को सलाह दे सकती है. हमारी एक बस में धूल वाले वातावरण में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए विशेष चेस्ट इमेजिंग की जरूरत को पूरा करने वाला हाई-फ्रीक्वेंसी, हाई-डेफिनिशन सिस्टम भी मौजूद है.
स्थिर और सटीक जांच सुनिश्चित करने के लिए बस को किस तरह डिजाइन किया गया है?
यह वाहन करीब 40 फीट लंबा है, जिसमें लगभग 34 फीट का उपयोगी क्लिनिकल स्पेस है. साइट पर पहुंचने के बाद हाइड्रोलिक जैक की मदद से इसे ऊपर उठाकर स्थिर किया जाता है, ताकि बस के भीतर होने वाली हलचल ब्लड कलेक्शन, ECG रिकॉर्डिंग या अन्य जांचों को प्रभावित न करे.
सटीकता के लिए वातावरण और उपकरण दोनों महत्वपूर्ण हैं. ऑडियोमेट्री साउंडप्रूफ केबिन में की जाती है. ब्लड सैंपल को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के तापमान नियंत्रित रेफ्रिजरेटर में रखा जाता है, ताकि जांच के पैरामीटर स्थिर रहें. वाहन के भीतर पारंपरिक छह मीटर की विजन टेस्टिंग दूरी तैयार करना मुश्किल होता है, इसलिए हम डिजिटल विजन स्कैनर का उपयोग करते हैं. ECG और पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट कंप्यूटर आधारित उपकरणों से किए जाते हैं. रजिस्ट्रेशन, सैंपल लेबलिंग, टेस्टिंग, डेटा हैंडलिंग और रिपोर्टिंग के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर अपनाई जाती हैं, ताकि तकनीकी और पहचान संबंधी त्रुटियों को कम किया जा सके.
आपकी ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज को किन मंजूरियों और पेशेवर योग्यताओं का समर्थन प्राप्त है?
हमारा काम उन क्षेत्रों के लिए आवश्यक संबंधित मंजूरियों के तहत किया जाता है, जिन्हें हम सेवाएं प्रदान करते हैं. मुझे महाराष्ट्र सरकार द्वारा औद्योगिक कर्मचारियों की मेडिकल जांच के लिए सर्टिफाइंग सर्जन के रूप में मान्यता प्राप्त है. इसके अलावा, मेरे पास समुद्री कर्मचारियों और ऑफशोर या ऑनशोर कर्मियों की जांच के लिए डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ शिपिंग की मंजूरी है, साथ ही पोर्ट और केंद्रीय श्रम से जुड़े ऑक्यूपेशनल हेल्थ कार्यों के लिए भी संबंधित योग्यताएं हैं.
हम अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस तथा समुद्री आवश्यकताओं के अनुरूप जांच भी करते हैं, जिनमें विदेशों और ऑफशोर वातावरण में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानक शामिल हैं. हमारी सेवाओं में लागू नियामकीय आवश्यकताओं के तहत फूड और होटल सेक्टर के कर्मचारियों की मेडिकल जांच भी शामिल है. ये मंजूरियां महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ऑक्यूपेशनल फिटनेस सर्टिफिकेट नियोक्ता, ऑडिटर और संबंधित प्राधिकरण के लिए विश्वसनीय और स्वीकार्य होना चाहिए.
एक इंडस्ट्री से दूसरी इंडस्ट्री में स्वास्थ्य जोखिम किस तरह अलग होते हैं?
हर कर्मचारी के लिए सामान्य फिटनेस का एक बुनियादी आकलन जरूरी होता है, जिसमें भूमिका के अनुसार ऊंचाई, वजन, बॉडी मास इंडेक्स, ब्लड प्रेशर, दृष्टि, हीमोग्लोबिन, ब्लड शुगर, ECG और सुनने की क्षमता की जांच शामिल हो सकती है. इसके अलावा टेस्टिंग कार्यस्थल पर मौजूद जोखिमों के अनुसार होनी चाहिए.
पेट्रोकेमिकल और केमिकल वातावरण में रसायनों का संपर्क लिवर या किडनी को प्रभावित कर सकता है, इसलिए लिवर और रीनल फंक्शन टेस्ट महत्वपूर्ण हो जाते हैं. स्टील और मेटल प्रोसेसिंग यूनिट्स में लेड के संपर्क के कारण ब्लड-लेड टेस्ट की जरूरत हो सकती है. अधिक धूल वाले कार्यस्थलों पर फेफड़ों की कार्यक्षमता जांच और विशेष चेस्ट एक्स-रे जरूरी हो सकते हैं. अत्यधिक जोखिम वाली जगहों पर जांच अधिक बार करनी पड़ सकती है. यदि किसी तरह का ट्रेंड या असामान्यता सामने आती है तो मेडिकल मॉनिटरिंग, कर्मचारी को उस जोखिम वाले स्थान से हटाने और जोखिम को उसके स्रोत पर कम करने के लिए इंजीनियरिंग उपायों की सिफारिश की जा सकती है.
आप किन ऑक्यूपेशनल बीमारियों को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं?
सिलिका, एस्बेस्टस और अन्य औद्योगिक धूल के लंबे समय तक संपर्क में रहने से सिलिकोसिस और न्यूमोकोनियोसिस सहित गंभीर और कई बार अपरिवर्तनीय फेफड़ों की बीमारियां हो सकती हैं. खदानों, टाइल निर्माण और अत्यधिक धूल वाले अन्य उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारी विशेष रूप से जोखिम में हो सकते हैं, यदि पर्याप्त सुरक्षा उपाय और निगरानी न हो.
अधिक शोर वाले वातावरण में काम करने से नॉइज-इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस हो सकता है. रसायनों के संपर्क से लिवर या किडनी को नुकसान पहुंच सकता है, जबकि कुछ पदार्थों के लंबे समय तक संपर्क से ऑक्यूपेशनल कैंसर और त्वचा संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है.
चुनौती यह है कि कई ऑक्यूपेशनल बीमारियां धीरे-धीरे विकसित होती हैं और शुरुआती चरण में स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. नियमित और जोखिम-विशिष्ट स्क्रीनिंग के जरिए समस्या को पहले पहचाना जा सकता है और नुकसान गंभीर होने से पहले सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं.
कर्मचारियों में लाइफस्टाइल से जुड़ी कौन-सी बड़ी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आ रही हैं?
ऑक्यूपेशनल स्क्रीनिंग में अब कार्यस्थल से जुड़े जोखिमों के साथ-साथ लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां भी तेजी से सामने आ रही हैं. हमारे अनुभव में, जांच किए गए करीब 15 फीसदी कर्मचारियों में डायबिटीज हो सकती है, जबकि अन्य 8 से 10 फीसदी कर्मचारियों में इसका जोखिम या बढ़ा हुआ शुगर लेवल देखा जा सकता है. लगभग 15 से 20 फीसदी कर्मचारियों में हाइपरटेंशन और करीब 10 से 15 फीसदी में दृष्टि संबंधी असामान्यताएं देखी जाती हैं, हालांकि ये आंकड़े कार्यबल और इंडस्ट्री के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं. मोटापा, खराब खानपान, तनाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं भी बढ़ रही हैं.
इसी वजह से कई संगठन अब विस्तृत वार्षिक हेल्थ पैकेज की मांग कर रहे हैं, जिनमें फास्टिंग और पोस्ट-मील ब्लड शुगर, HbA1c, लिपिड प्रोफाइल और लिवर फंक्शन टेस्ट शामिल होते हैं. कार्यस्थल स्वास्थ्य कार्यक्रम अब सिर्फ वैधानिक अनुपालन तक सीमित नहीं रह सकते. उन्हें कर्मचारियों को पुरानी बीमारियों को समझने और उन्हें मैनेज करने में भी मदद करनी होगी.
भारत में प्रिवेंटिव और ऑक्यूपेशनल हेल्थकेयर को लेकर आपका व्यापक विजन क्या है?
हेल्थकेयर को अधिक सक्रिय और प्रोएक्टिव बनना होगा. किसी कर्मचारी के बीमार पड़ने का इंतजार करना और उसके बाद उसे अस्पताल भेजना एक रिएक्टिव मॉडल है. डायग्नोस्टिक सुविधाओं को कार्यस्थल तक पहुंचाकर हम बड़ी संख्या में लोगों की प्रभावी तरीके से स्क्रीनिंग कर सकते हैं, जोखिमों की शुरुआती पहचान कर सकते हैं और व्यक्ति व संगठन दोनों के लिए उपयोगी स्वास्थ्य डेटा तैयार कर सकते हैं.
मेरा विजन एक्सेसिबिलिटी, टेक्नोलॉजी, क्लिनिकल एक्यूरेसी और फॉलो-अप को एक साथ जोड़ने का है. एक मोबाइल यूनिट का काम सिर्फ टेस्ट करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे प्रिवेंशन, काउंसलिंग, समय पर रेफरल और लंबे समय तक निगरानी में भी सहयोग देना चाहिए. अगर नियोक्ता ऑक्यूपेशनल हेल्थ को सिर्फ एक कंप्लायंस एक्सरसाइज के बजाय कर्मचारियों में निवेश के रूप में देखें, तो इसका लाभ कर्मचारी कल्याण, उत्पादकता और संगठन की मजबूती के रूप में दिखाई देगा.
रुहैल आमीन, BW रिपोर्टर्स
(रुहैल अमीन, BW Businessworld में सीनियर एडिटर हैं और नई दिल्ली में आधारित एक अनुभवी पत्रकार हैं. वे अपने गहन विश्लेषण और विस्तृत रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं. उनका कार्य पत्रकारिता की निष्पक्षता और उत्कृष्ट कहानी कहने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसने उन्हें उद्योग में एक विश्वसनीय आवाज के रूप में स्थापित किया है. उनके योगदान विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर फैले हुए हैं, जहां वे लगातार ऐसी सामग्री प्रस्तुत करते हैं जो पाठकों को जानकारी देने के साथ-साथ उन्हें जोड़कर भी रखती है.)
कंपनी का कहना है कि इस नई थेरेपी से मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल में कम समय बिताना पड़ेगा. साथ ही बार-बार लंबे सफर और उपचार से जुड़े अप्रत्यक्ष खर्चों में भी कमी आएगी.
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रितु राणा
भारत में फेफड़ों के कैंसर के इलाज को अधिक तेज़, सुविधाजनक और मरीज-केंद्रित बनाने की दिशा में एक बड़ी पहल हुई है. रॉश फार्मा इंडिया ने देश में टिसेंट्रिक® एससी (एटजोलिजुमैब) लॉन्च करने की घोषणा की है. यह दुनिया की पहली सबक्यूटेनियस यानी त्वचा के नीचे दी जाने वाली इम्यूनोथेरेपी है, जिसे मात्र 7 मिनट में दिया जा सकता है. पारंपरिक आईवी इन्फ्यूजन आधारित उपचार में जहां कई घंटे लगते हैं, वहीं यह नई तकनीक इलाज के समय को करीब 80 प्रतिशत तक कम कर देती है.
कंपनी का कहना है कि इस नई थेरेपी से मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल में कम समय बिताना पड़ेगा. साथ ही बार-बार लंबे सफर और उपचार से जुड़े अप्रत्यक्ष खर्चों में भी कमी आएगी.
एक मरीज की जगह अब 5 मरीजों का इलाज संभव
टिसेंट्रिक एससी के लॉन्च को भारत के हेल्थकेयर सिस्टम के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. वैश्विक आकलनों के मुताबिक, जितने समय में आईवी इन्फ्यूजन के जरिए एक मरीज का इलाज किया जाता है, उतने समय में सबक्यूटेनियस तकनीक से पांच मरीजों तक का उपचार किया जा सकता है. इससे अस्पतालों में बेड और मेडिकल स्टाफ पर दबाव कम होगा और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकेगा.
मरीजों ने बताया ज्यादा आरामदायक इलाज
वैश्विक अध्ययनों में भी सबक्यूटेनियस इम्यूनोथेरेपी को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई है. यूरोपियन लंग कैंसर कांग्रेस 2024 में पेश किए गए IMSCiN002 अध्ययन के अनुसार, पांच में से चार मरीजों ने आईवी की तुलना में टिसेंट्रिक एससी को अधिक पसंद किया.
मरीजों ने इसके पीछे अस्पताल में कम समय लगने, भावनात्मक तनाव कम होने और ज्यादा आरामदायक अनुभव जैसे कारण बताए. अध्ययनों में यह भी सामने आया कि इस तकनीक से दर्द, जलन और बेचैनी अपेक्षाकृत कम होती है.
वहीं ESMO 2023 में प्रस्तुत IMSCiN001 अध्ययन में 90 प्रतिशत हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स ने माना कि एससी फॉर्मूलेशन देना अधिक आसान है, जबकि 75 प्रतिशत विशेषज्ञों ने कहा कि इससे मेडिकल टीमों का समय बच सकता है.
डॉक्टरों ने बताया कैंसर केयर में गेमचेंजर
मेदांता में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के प्रमुख एवं डायरेक्टर डॉ. सज्जन राजपुरोहित ने कहा कि इम्यूनोथेरेपी ने कैंसर उपचार में बड़ा बदलाव लाया है, लेकिन पारंपरिक आईवी उपचार लंबा और कई बार मरीजों के लिए कष्टदायक साबित होता है.
उन्होंने कहा कि बार-बार अस्पताल जाना और लंबा उपचार मरीजों के शारीरिक और मानसिक तनाव को बढ़ाता है. ऐसे में सबक्यूटेनियस तकनीक इलाज को अधिक तेज़ और सुविधाजनक बनाती है, जिससे मरीजों का समग्र अनुभव बेहतर होता है.
भारत में कैंसर केयर को विकेंद्रीकृत करने की दिशा में कदम
भारत जैसे देश में, जहां छोटे शहरों और कस्बों से मरीज बड़े महानगरों में इलाज के लिए पहुंचते हैं, वहां यह तकनीक कैंसर केयर को अधिक सुलभ बना सकती है. कम समय में दवा देने की सुविधा से डे-केयर सेंटरों और छोटे हेल्थकेयर संस्थानों में भी इलाज संभव हो सकेगा.
मणिपाल हॉस्पिटल, बेंगलुरु में मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के कंसल्टेंट एवं एचओडी डॉ. अमित रौथन ने कहा कि सबक्यूटेनियस इम्यूनोथेरेपी जैसी तकनीकें अस्पतालों पर बढ़ते दबाव को कम करने और इलाज को विकेंद्रीकृत करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.
85 देशों में मंजूरी, 10 हजार से ज्यादा मरीजों को फायदा
टिसेंट्रिक एससी दुनिया का पहला और एकमात्र पीडी-(एल)1 इनहिबिटर है, जो इंट्रावीनस और सबक्यूटेनियस दोनों रूपों में उपलब्ध है. इसे सबसे पहले 2023 में ब्रिटेन की MHRA और बाद में 2024 में USFDA से मंजूरी मिली थी.
फिलहाल इसे 85 से अधिक देशों में मंजूरी मिल चुकी है और दुनियाभर में 10,000 से ज्यादा मरीज इसका लाभ उठा चुके हैं. भारत में डीसीजीआई ने इसे एडजुवेंट और मेटास्टेटिक नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (NSCLC) के इलाज के लिए मंजूरी दी है.
कैसे काम करती है यह नई तकनीक
टिसेंट्रिक एससी में हेलोजाइम थेराप्यूटिक्स की ENHANZE® ड्रग डिलीवरी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. इसमें रिकॉम्बिनेंट ह्यूमन हायलुरोनिडेज PH20 एंजाइम का उपयोग होता है, जो त्वचा के नीचे दवा के तेजी से अवशोषण में मदद करता है. इससे दवा कम समय में शरीर में प्रभावी रूप से पहुंच पाती है. इस ट्रीटमेंट में मरीज को सामान्य तौर पर 6 डोज दी जाती है, जिसमें एक डोज की कीमत 3.7 लाख रुपये का खर्च आता है. वहीं, कंपनी ने जानकारी दी है कि सरकार ने सीजीएचएस पैनल के अंदर भी मरीजों को ट्रीटमेंट निशुल्क मिलेगा.
मरीज-केंद्रित कैंसर केयर पर फोकस
रॉश फार्मा इंडिया के एमडी एवं सीईओ राजविंदर (राज्जी) मेहदवान ने कहा कि कंपनी भारत में ऐसे इनोवेशन लाने के लिए प्रतिबद्ध है, जो केवल क्लीनिकल परिणामों को बेहतर न बनाएं, बल्कि मरीजों के इलाज के अनुभव को भी आसान और सुविधाजनक बनाएं.
वहीं कंपनी के चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. सिवाबालन सिवानेसन ने कहा कि आधुनिक कैंसर उपचार अब केवल मरीज को जीवित रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि बेहतर जीवन गुणवत्ता और मरीजों की सुविधा पर भी उतना ही जोर दिया जा रहा है.