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‘मेडिकल साइंस ने नब्ज देखना, हिंदी ने मरीजों के दिल में उतरना सिखाया’  

हिंदी और उससे जुड़ीं सभी क्षेत्तीय भाषाओं के इस्तेमाल में असीम अनुभव की अनुभूति होती है. इससे मरीज और डॉक्टर एक जुड़ाव का अनुभव करते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • डॉक्टर अंशुमान कुमार, कैंसर विशेषज्ञ

हिंदी केवल भाषा नहीं बल्कि एक समुद्र है, महासागर है. हम मेडिकल साइंस की पढ़ाई अंग्रेजी में करते हैं, लेकिन मरीजों के साथ जो असल जुड़ाव महसूस होता है, वह केवल हिंदी के साथ ही है. हिंदी और उससे उत्पन्न क्षेत्रीय भाषाओं में संवाद हमें एक-दूसरे के करीब लाता है. जब मैं बतौर डॉक्टर मरीजों के संपर्क में आता हूं, तो महसूस होता है कि मेडिकल साइंस ने भले ही हमें नब्ज देखना सिखाया है, लेकिन मरीजों के दिल तक पहुंचना हिंदी और क्षेत्रीय भाषाएं ही सिखाती हैं.

खुलकर कर पाते हैं बात
एक डॉक्टर के रूप में जब मैं हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में मरीजों से संपर्क करता हूं, तो मैं नब्ज के साथ-साथ उनका दिल भी छू लेता हूं. अपनी भाषा में मरीज खुलकर मुझसे बातें कर पाते हैं. मैं उनकी बातों को अच्छे से समझ पाता हूं, इस तरह, भाषा की खाई पट जाती है. जब मरीज अपनी समस्या को अच्छे से समझाएगा और डॉक्टर उसे अच्छे से समझ सकेगा, तभी वो उसकी समस्या का निदान करने की स्थिति में होगा.

आसान हो जाती हैं चीज़ें
उदाहरण के तौर पर, यदि कोई मरीज मुझसे कहे कि डॉक्टर आई हेव पेन. तो यह तो समझ आ जाएगा कि उसे दर्द है, लेकिन वो कौनसा दर्द है, ये समझना कठिन हो जाता है. मगर यही बात अगर कोई मरीज क्षेत्रीय भाषा में कहे तो चीजें काफी आसान हो जाती हैं. उदाहरण के तौर पर, बिहार का कोई मरीज यदि दर्द का वर्णन करता है, तो वो अपनी बात को स्पष्ट रूप से समझा सकता है.  

क्षेत्रीय भाषा का कमाल 
यदि बिहारी मरीज कहता है, पड़पड़ाना, तो यह अलग प्रकार का दर्द है, यह सुपरफिशियल दर्द है. इसमें एक जलन की अनुभूति हो रही होती है. संभव है त्वचा के स्तर पर कोई समस्या हो. इसी तरह, टबटबाना, का मतलब अन्दर कहीं पीड़ा हो रही है. यह डीप स्टेबिंग तरीके का पेन होता है. ऐसे ही मरोड़ना जैसे क्षेत्रीय शब्द दर्द की तुरंत सटीक व्याख्या कर देते हैं.

समझने में मिलती है मदद
गुजराती या बांग्ला में भी इसी तरह दर्द की सटीक और सरल व्याख्या करने वाले शब्द हैं. बंगाली में कहते हैं, व्यथा होच्छे. गुजराती में कहते हैं दर्द थाई छे. इतना कहने के बाद मरीज जब क्षेत्रीय भाषा में आगे बात करेगा तो उसकी समस्या समझने में डॉक्टर को आसानी होगी. इससे डॉक्टर टू-द-पॉइंट समझ पाएगा और उसकी समस्या का सटीक निदान कर पाएगा. जब मैं गुजरात में था और गुजराती में मरीजों को निर्देश लिखकर देता था कि उन्हें क्या फॉलो करना है, तो मरीज अक्सर पूछ लेते थे कि आप कहां के हैं. ये है भाषा का मान, इसमें हिंदी और उससे जुड़ीं सभी क्षेत्तीय भाषाएं हैं. इनके इस्तेमाल में असीम अनुभव की अनुभूति होती है. इससे मरीज और डॉक्टर एक जुड़ाव का अनुभव करते हैं.
 


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