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5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन तो गए फिर भी जश्न क्यों नहीं मन रहा?
हम जब कोविड-19 की महामारी के प्रकोप के पहले जाते हैं, तब देखते हैं कि हमारी जीडीपी की जो रफ्तार थी, हम उसके आसपास भी नहीं हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
अजय शुक्ला
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
दुनिया की अर्थव्यवस्था के ताजे आंकड़े बताते हैं कि भारत दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है. ब्रिटेन को पछाड़कर भारत ने यह मुकाम हासिल किया है. अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद भारत का नंबर है. पिछले 10 सालों से लगातार भारत आगे बढ़ता जा रहा है. हमारा देश लंबे समय से सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में एक है.
जीडीपी की जो विकास दर दिख रही, वास्तव में वो वैसी नहीं है
वित्त वर्ष की पहली तिमाही में हमारी जीडीपी दोहरे अंक में 13.5 फीसदी से बढ़ी है. जिस देश से हम दो सौ साल गुलाम रहे हों, उसको पछाड़ने पर हमें जश्न मनाना चाहिए, मगर ऐसा नहीं हो रहा है. वजह, जीडीपी की जो विकास दर हमें दिख रही है, वास्तव में वो वैसी नहीं है. यही वजह है कि वैश्विक मंदी के दौर में भी जब बढ़त मिले, तब भी खुशियां नहीं मिलती. अर्थ विशेषज्ञों का मानना है कि यह 13.5 फीसदी की आर्थिक विकास दर वास्तव में बेहद निराशा करने वाली है, क्योंकि हम जब कोविड-19 की महामारी के प्रकोप के पहले जाते हैं, तब देखते हैं कि हमारी जीडीपी की जो रफ्तार थी, हम उसके आसपास भी नहीं हैं.
जीएसटी ने देश की अर्थव्यवस्था का पहिया रोक दिया
पिछले 10 सालों में हमारी आर्थिक विकास दर साल दर साल बढ़ती गई है. 2012-13 में देश की जीडीपी ग्रोथ रेट 5.46 फीसदी थी. 2013-14 में 6.39 फीसदी, 2014-15 में 7.41 फीसदी, 2015-16 में 8.0 फीसदी, 2016-17 में 8.26 फीसदी थी, मगर नोटबंदी और अचानक आई जीएसटी ने देश की अर्थव्यवस्था का पहिया एकबारगी रोक दिया.
जीडीपी ग्रोथ रेट नकारात्मक रही थी
2017-18 में हमारी जीडीपी 6.80 फीसदी गिरी तो फिर सुधरने का नाम नहीं लिया, 2018-19 में 6.5 फीसदी, 2019-20 में 3.74 फीसदी, 2020-21 में 6.60 फीसदी और 2021-22 में 8.95 फीसदी रही. वित्त वर्ष 2020-21 में कोरोना महामारी के प्रकोप और लॉकडाउन के चलते जीडीपी ग्रोथ रेट नकारात्मक रही थी.
अर्थव्यवस्था की विकास दर कैसे देखी जाती है?
आपको बताते चलें कि अर्थव्यवस्था की विकास दर पिछले साल की विकास दर के मुकाबले देखी जाती है. चूंकि 2020-21 में जो -6.60 फीसदी की दर पर रही हो, वो अगले साल जब 8.95 फीसदी होती है तो साफ है कि उसकी बढ़ोत्तरी नहीं बल्कि संतुलन है. उसके बाद मौजूदा हाल में वो जिस गति से बढ़ी है, वो भी अनुमान से तीन फीसदी कम तो समझा जा सकता है कि उसकी हालत ठीक नहीं है.
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने भी स्वीकारा
केंद्र सरकार के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के मुताबिक, हमारी यह आर्थिक विकास दर वास्तव में सुखद नहीं है. उन्होंने भी नोटबंदी और जीएसटी को बगैर तैयारी के थोपने को खराब आर्थिक हालात के लिए दोषी बताया. उनका यह भी मानना है कि सरकार की अर्थनीतियां संकट पैदा करने वाली रही हैं. वो कारोबारी माहौल नहीं बना सकीं. चुनिंदा पूंजीपतियों को लाभ जरूर हुआ, मगर बहुतायत में लघु-मध्यम उद्योगों को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
खड़े होने के लिए नहीं मिली मदद
महामारी काल में भी उन्हें मदद नहीं मिली, जिससे वो खड़े हो सकें. बगैर तैयारियों के लॉकडाउन लगा देने से अर्थव्यवस्था गर्त में चली गई, जबकि उस वक्त 500 मामले भी नहीं थे. जब लाखों केसेज थे, तब लॉकडाउन नहीं किया गया. नतीजतन 2021-22 की जीडीपी में सुधार हुआ, जो यह साबित करता है कि कोरोना महामारी की पहली लहर में लगा लॉकडाउन नीतिगत रूप से ही गलत था. अर्थव्यवस्था के लिए उद्योग-धंधों के लिए अच्छे माहौल के साथ ही सकारात्मक सरकारी नीतियां भी जरूरी हैं.
जीडीपी की बढ़त से क्यों नहीं मिल रही खुशी?
बहराल, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही की जीडीपी 13.5 फीसदी रही, जो कोरोना महामारी के तुरंत पहले 2019-20 की तुलना में देखें तो वास्तविक वृद्धि दर 2.8 फीसदी ही मिलती है. स्पष्ट है कि यह करीब एक फीसदी सालाना की दर से बढ़ रही है. 2019-20 की पहली तिमाही में जीडीपी का साइज 35.85 लाख करोड़ रुपये था, जो 2022-23 में 36.85 लाख करोड़ रुपये है. बेहद सुस्त रफ्तार से यह विकास कर रही है. यही कारण है कि जीडीपी की दर्शाई गई बढ़त खुशियां नहीं बिखेर पा रही है.
अर्थव्यवस्था को अब रचनात्मक नीतियों के जरिए रीसेट करने की जरूरत
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी के 36.85 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. पिछले साल की पहली तिमाही में यह आंकड़ा 32.46 लाख करोड़ रुपये था. कोविड लॉकडाउन के वक्त 2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी सिकुड़कर 27.04 लाख करोड़ रुपये रह गई थी, जो उससे पहले 2019-20 की पहली तिमाही में 35.49 लाख करोड़ रुपये और उससे पहले वित्त वर्ष 2018-19 की पहली तिमाही में जीडीपी 33.84 लाख करोड़ रुपये रही थी. भले ही प्रचार तंत्र इसको लेकर ढिंढोरा पीटे मगर जश्न मनाने की हालत में हम नहीं हैं. ऐसे में सरकार को देश की अर्थव्यवस्था को अब वास्तव में रचनात्मक नीतियों के जरिए रीसेट करने की जरूरत है.
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