SC का भूषण पावर फैसला, IBC की कमजोरियों और सिस्टम फेलियर पर करारा प्रहार

JSW स्टील की ₹19,700 करोड़ की समाधान योजना रद्द, BPSL को गंभीर उल्लंघनों के बीच परिसमापन में भेजा गया है.

Last Modified:
Tuesday, 27 May, 2025
BWHindi

पालक शाह

2 मई 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट (SC) ने भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड (BPSL) की दिवाला समाधान प्रक्रिया की तीखी आलोचना करते हुए, जेएसडब्ल्यू स्टील (JSW) की ₹19,700 करोड़ की समाधान योजना को रद्द कर दिया. साथ ही कंपनी के परिसमापन का आदेश दिया. जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और सतीश चंद्र शर्मा द्वारा लिखित 100 पन्नों के फैसले में प्रक्रियात्मक चूकों, नियामक उल्लंघनों और संस्थागत विफलताओं की श्रृंखला को उजागर किया गया है, जिससे भारत की दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की नींव हिल गई है. तय समयसीमाओं की अनदेखी से लेकर बेरोकटोक हेरफेर तक, यह फैसला एक ऐसी प्रक्रिया को सामने लाता है जो अयोग्यता और अवसरवाद से भरी है, और भारत की दिवाला प्रणाली की पवित्रता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

सीआईआरपी में त्रुटियों की भरमार
भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड के लिए कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी), जो 26 जुलाई 2017 को पंजाब नेशनल बैंक की याचिका पर शुरू हुआ था, आईबीसी के तहत संकटग्रस्त कंपनियों को पुनर्जीवित करने के वादे का प्रतीक बनना चाहिए था. इसके बजाय, यह प्रणालीगत सड़ांध का एक उदाहरण बन गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जेएसडब्ल्यू स्टील, समाधान पेशेवर (आरपी), ऋणदाता समिति (सीओसी), और यहां तक कि राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) की श्रृंखलाबद्ध विफलताओं को रेखांकित किया गया है.

समयसीमा का उल्लंघन: आईबीसी के तहत सीआईआरपी को 270 दिनों के भीतर पूरा करना अनिवार्य है, अधिकतम 330 दिन तक बढ़ाया जा सकता है. बीपीएसएल के मामले में यह प्रक्रिया 26 अप्रैल 2018 तक पूरी हो जानी चाहिए थी। फिर भी, आरपी ने जेएसडब्ल्यू की समाधान योजना को एनसीएलटी में 14 फरवरी 2019 को प्रस्तुत किया, जो वैधानिक सीमा से काफी परे था. कोई विस्तार नहीं मांगा गया, और एनसीएलटी द्वारा इस देर से प्रस्तुत योजना को स्वीकार करना आईबीसी की समयसीमा के प्रति गंभीर लापरवाही को दर्शाता है.

धारा 29ए का उल्लंघन: धारा 29ए के तहत, "संलग्न व्यक्तियों" को बोली लगाने से रोका जाता है, और जेएसडब्ल्यू की पात्रता की सही तरीके से जांच नहीं की गई। 2008 में जेएसडब्ल्यू, बीपीएसएल और जय बालाजी इंडस्ट्रीज के बीच एक संयुक्त उपक्रम ने चिंताएं पैदा कीं, फिर भी आरपी ने आवश्यक फॉर्म एच अनुपालन प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया और न ही जेएसडब्ल्यू के हलफनामे की जांच की. एनसीएलएटी द्वारा इस चूक को हल्के में लेना सुप्रीम कोर्ट द्वारा आईबीसी की अखंडता को कमजोर करने वाला माना गया.

सीसीडी का उल्लंघन: जेएसडब्ल्यू की समाधान योजना ने ₹8,550 करोड़ की अग्रिम इक्विटी निवेश का वादा किया था. इसके बजाय, कंपनी ने केवल ₹100 करोड़ की इक्विटी डाली और ₹8,450 करोड़ को अपने समूह की इकाई, पियोम्बिनो स्टील, के माध्यम से कम्पल्सरी कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (सीसीडी) के रूप में भेजा. सुप्रीम कोर्ट ने जेएसडब्ल्यू के इस दावे को खारिज कर दिया कि इससे इक्विटी की शर्त पूरी हुई है, और इसे स्वीकृत योजना का घोर उल्लंघन बताया.

एकतरफा शर्तें: बिना शर्त समाधान योजना प्रस्तुत करने के बावजूद, जेएसडब्ल्यू ने सफल समाधान आवेदक (एसआरए) घोषित होने के बाद शर्तें जोड़ीं और अनुमोदन के बाद योजना की शर्तों में संशोधन करते हुए अपने पद का दुरुपयोग किया. यह "चालबाजी और अदला-बदली" की रणनीति, जो सीओसी की निष्क्रियता से संभव हुई, ने पूरी प्रक्रिया को और दूषित कर दिया.

भुगतान में देरी: योजना के तहत वित्तीय ऋणदाताओं को एनसीएलटी की स्वीकृति (5 सितंबर 2019) के 30 दिनों के भीतर भुगतान किया जाना था. इसके बजाय, वित्तीय ऋणदाताओं को 540 दिन (मार्च 2021 तक) इंतजार करना पड़ा और परिचालन ऋणदाताओं को 900 दिन (मार्च 2022 तक) की देरी सहनी पड़ी. विनियमन 38 के विपरीत, जो परिचालन ऋणदाताओं को प्राथमिकता देता है, जेएसडब्ल्यू ने पहले वित्तीय ऋणदाताओं को भुगतान किया, और बढ़ती स्टील कीमतों का लाभ उठाकर खुद को समृद्ध किया, जबकि ऋणदाता प्रतीक्षा करते रहे.

अनुचित लाभ: सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि जेएसडब्ल्यू ने योजना के कार्यान्वयन में जानबूझकर देरी की, जिससे लाभकारी स्टील बाजार प्रवृत्तियों का दोहन किया गया। इस अवसरवादिता और सीओसी की सहमति ने समय पर समाधान सुनिश्चित करने के आईबीसी के उद्देश्य को विफल किया.

सरकारी दावे में कटौती: समाधान पेशेवर (आरपी) ने बिना किसी औचित्य के ओडिशा सरकार के बिजली बकाया दावों को भारी रूप से घटा दिया, जिससे राज्य के वैध दावों को नुकसान पहुंचा. इस मनमानी कटौती को सीओसी और एनसीएलटी ने नजरअंदाज किया, जिससे प्रक्रिया में विश्वास और कमजोर हुआ. लचीली प्रभावी तिथि: समाधान योजना में एक निश्चित प्रभावी तिथि का अभाव था, और ऋणदाताओं के एक मुख्य समूह ने, एनसीएलटी की मंजूरी के बाद अधिकार न होते हुए भी, इसे 31 मार्च 2021 तक बढ़ा दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक अवैध चाल बताया, जिसे सभी हितधारकों ने अनदेखा कर दिया.

एनसीएलएटी की सीमा से परे दखल: एनसीएलएटी ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा पीएमएलए के तहत जारी अस्थायी कुर्की आदेश को गलत तरीके से रद्द कर दिया, यह दावा करते हुए कि धारा 32ए के तहत प्रतिरक्षा प्राप्त है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एनसीएलटी और एनसीएलएटी को सार्वजनिक कानून संबंधी निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है, जिससे उनकी सीमा से बाहर की गई कार्रवाई उजागर हुई.

सीओसी की अनधिकृत बातचीत: समाधान योजना के लिए अनुरोध (RFRP) में सर्वोच्च बोलीदाता के साथ अनुमोदन के बाद बातचीत की अनुमति नहीं थी. फिर भी, जेएसडब्ल्यू को 18वीं सीओसी बैठक में सफल समाधान आवेदक (एसआरए) घोषित किए जाने के बाद, एक छोटे ऋणदाता समूह ने संशोधनों पर बातचीत की और 19वीं बैठक से पहले एक समेकित योजना प्रसारित की. ऋणदाताओं की आपत्तियों के बावजूद, सीओसी ने इसे मंजूरी दी, जिससे पारदर्शिता की कमी सामने आई.

ई-वोटिंग का दुरुपयोग: जेएसडब्ल्यू की योजना पर ई-वोटिंग 16 अक्टूबर 2018 को हुई, लेकिन आरपी ने इसे 14 फरवरी 2019 तक एनसीएलटी में दाखिल नहीं किया. इस अकारण देरी और एनसीएलटी की चुप्पी ने आरपी और सीओसी द्वारा प्रक्रिया के दुरुपयोग की ओर इशारा किया.

सीओसी का विरोधाभासी रवैया: 6 मार्च 2020 के हलफनामे में, सीओसी ने स्वयं को पीड़ित पक्ष बताया, ₹19,350 करोड़ के विलंबित भुगतान और बीपीएसएल के परिचालन से उत्पन्न निधियों पर ब्याज की मांग की. फिर भी, इसने मूल राशि पर समझौता कर लिया और बिना आपत्ति के जेएसडब्ल्यू का विलंबित भुगतान स्वीकार कर लिया, जिससे उसकी नीयत पर सवाल उठे.

प्रणालीगत विफलता
बीपीएसएल के परिसमापन का आदेश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 142 का उपयोग इन उल्लंघनों की गंभीरता को दर्शाता है. आरपी की वैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन में विफलता, सीओसी की वाणिज्यिक समझ की कमी, और जेएसडब्ल्यू की चालबाज़ियों ने मिलकर सीआईआरपी को दूषित कर दिया. एनसीएलटी और एनसीएलएटी, जिन्हें संरक्षक की भूमिका निभानी थी, इन चूकों को नजरअंदाज करते हुए ऐसी योजना को मंजूरी दे बैठे जो अनिवार्य आईबीसी प्रावधानों का उल्लंघन करती थी.

यह फैसला भारत की दिवाला प्रणाली के लिए एक चेतावनी है. जबकि आईबीसी का उद्देश्य पुनरुद्धार और ऋणदाता संरक्षण के बीच संतुलन बनाना है, बीपीएसएल की गाथा एक ऐसी प्रणाली को उजागर करती है जो शोषण के प्रति संवेदनशील है. वर्ष 2021 में जेएसडब्ल्यू द्वारा वित्तीय ऋणदाताओं को ₹19,350 करोड़ और परिचालन ऋणदाताओं को ₹350 करोड़ (₹47,157.99 करोड़ के दावों के मुकाबले) का भुगतान एक सफलता के रूप में सराहा गया था. फिर भी, सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक परिणामों की तुलना में प्रक्रियात्मक पवित्रता को प्राथमिकता दी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि प्रवर्तन में चूक होने पर आईबीसी कितना कठोर हो सकता है.

निवेशकों को सख्त संदेश
इस फैसले के प्रभाव गहरे हैं. चार साल पहले लागू किए गए एक सौदे को पलटकर, सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत दिया है कि प्रक्रियात्मक चूकें “सफल” समाधान योजनाओं को भी अमान्य कर सकती हैं, जिससे संकटग्रस्त परिसंपत्तियों में निवेश करने वाले निवेशकों को निरुत्साहित किया जा सकता है. ₹40,000–50,000 करोड़ मूल्य वाले बीपीएसएल का परिसमापन भले ही ऋणदाताओं के लिए अधिक वसूली ला सकता है, लेकिन यह एक पुनर्जीवित कंपनी को नष्ट करने का खतरा भी रखता है, जिससे आईबीसी के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचता है.

सीओसी और जेएसडब्ल्यू समीक्षा याचिका दायर करने की योजना बना रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने 26 मई 2025 तक परिसमापन कार्यवाही पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है, जब तक समीक्षा लंबित है. हालांकि, इस फैसले का व्यापक संदेश स्पष्ट है: आईबीसी सख्त अनुपालन की मांग करता है, और संस्थागत विफलताओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. व्यापारिक धारणा पर प्रभाव से चिंतित सरकार इन खामियों को दूर करने के लिए हितधारकों से परामर्श कर रही है.

सुधार का समय
बीपीएसएल की विफलता प्रणालीगत सुधार के लिए एक स्पष्ट आह्वान है। समाधान पेशेवर की लापरवाही, सीओसी की मिलीभगत, और न्यायाधिकरणों की नरमी यह दर्शाते हैं कि सख्त निगरानी, स्पष्ट समयसीमाएं, और समाधान आवेदकों पर मजबूत नियंत्रण की आवश्यकता है. वित्तीय स्थिरता का आईबीसी का वादा संस्थागत समन्वय पर टिका है, इसके बिना, भारत की दिवाला प्रणाली ताश के पत्तों का महल बन सकती है.


ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग जांच में रिलायंस के दो पूर्व अधिकारियों को किया गिरफ्तार

ईडी ने अपनी जांच में पाया कि अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों ने कथित रूप से 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग की.

Last Modified:
Thursday, 16 April, 2026
BWHindia

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए रिलायंस समूह से जुड़े दो पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार किया है. यह मामला कथित लोन फ्रॉड और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा हुआ है.

ईडी के अनुसार, अमिताभ झुनझुनवाला और अमित बापना को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत हिरासत में लिया गया है. यह कार्रवाई केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा पहले दर्ज की गई कई एफआईआर के आधार पर की गई है.

किन कंपनियों से जुड़ा है मामला

सीबीआई की जांच में सामने आया कि यह मामला रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) और रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड (RCFL) से जुड़ा है. इन कंपनियों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं और बैंक फंड के दुरुपयोग के आरोप हैं.

₹40,000 करोड़ से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप

ईडी ने अपनी जांच में पाया कि अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों ने कथित रूप से 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग की. एजेंसी ने अब तक लगभग 17,000 करोड़ रुपये की संपत्तियां अस्थायी रूप से जब्त की हैं. इसमें मुंबई स्थित अनिल अंबानी का करीब 3,700 करोड़ रुपये का आवास भी शामिल है.

अनिल अंबानी से भी हो चुकी है पूछताछ

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जांच एजेंसियों ने अनिल अंबानी से कई बार पूछताछ की है. हालांकि, उनका कहना है कि उन्होंने वर्ष 2017 में संबंधित कंपनियों के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था.

झुनझुनवाला और बापना की भूमिका

अमिताभ झुनझुनवाला, जो रिलायंस अनिल अंबानी ग्रुप के पूर्व ग्रुप मैनेजिंग डायरेक्टर और रिलायंस कैपिटल के वाइस चेयरमैन रह चुके हैं, पहले भी जांच एजेंसियों के रडार पर रहे हैं. जांचकर्ताओं का मानना है कि उन्होंने RHFL और RCFL से जुड़े वित्तीय फैसलों में अहम भूमिका निभाई. वहीं, अमित बापना रिलायंस फाइनेंस में एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में कार्यरत थे.

कैसे हुआ घोटाला

ईडी के अनुसार, RHFL और RCFL ने कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों से जनता का पैसा जुटाया, जिसमें से 11,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बाद में एनपीए (Non-Performing Assets) में बदल गई. जांच में यह भी सामने आया कि इस धन को शेल कंपनियों के नेटवर्क के जरिए अन्य रिलायंस समूह की कंपनियों में ट्रांसफर किया गया, जिनकी वित्तीय स्थिति बेहद कमजोर थी और जिनका कोई ठोस व्यवसाय नहीं था.

किन बैंकों ने दर्ज कराई शिकायत

ईडी ने यह मामला जुलाई 2025 में दर्ज किया था, जो यस बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ महाराष्ट्र की शिकायतों पर आधारित था. सीबीआई ने कंपनियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के उल्लंघन के तहत मामला दर्ज किया है.

ईडी की आगे की कार्रवाई

मार्च 2026 में ईडी ने इस पूरे मामले में पैसे की हेराफेरी के तरीके (मोडस ऑपरेंडी) का खुलासा किया था और संपत्तियों को जब्त करने का आदेश जारी किया था. एजेंसी ने कहा है कि वह वित्तीय अपराधों के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखेगी और अवैध संपत्तियों को उनके वास्तविक हकदारों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है.
 


ईडी ने I-PAC के सह-संस्थापक विनेश चंदेल को पश्चिम बंगाल कोयला घोटाले में किया गिरफ्तार

ईडी की यह गिरफ्तारी कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की परतें खोलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. एजेंसी इस मामले में शामिल अन्य लोगों की पहचान और नेटवर्क के विस्तार को समझने की कोशिश कर रही है.

Last Modified:
Tuesday, 14 April, 2026
BWHindia

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने राजनीतिक परामर्श फर्म इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी के सह-संस्थापक विनेश चंदेल को पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित कोयला घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया है. यह कार्रवाई प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई है. यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा नवंबर 2020 में दर्ज की गई एफआईआर से जुड़ा है. इसमें पश्चिम बंगाल में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की खदानों से बड़े पैमाने पर कोयले की चोरी का आरोप लगाया गया था. जांच में अवैध खनन और कोयले की हेराफेरी से जुड़े नेटवर्क की पड़ताल की जा रही है.

PMLA के तहत गिरफ्तारी

ईडी ने विनेश चंदेल को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के प्रावधानों के तहत दिल्ली में हिरासत में लिया. उन्हें जल्द ही विशेष अदालत में पेश किया जाएगा. एजेंसी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कमाई के प्रवाह की जांच कर रही है.

वित्तीय लेन-देन की जांच पर फोकस

ईडी की जांच का मुख्य फोकस कथित अपराध से जुड़े पैसों के लेन-देन और उनकी ट्रेल का पता लगाना है. एजेंसी यह भी जांच रही है कि कोयला चोरी के नेटवर्क और चंदेल से जुड़े संस्थानों के बीच क्या संबंध हैं. इससे पहले ईडी ने दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई सहित कई स्थानों पर छापेमारी की थी, जहां से वित्तीय दस्तावेज और अन्य साक्ष्य जुटाए गए.

लंबे समय से जांच के दायरे में घोटाला

पश्चिम बंगाल कोयला घोटाला पिछले कई वर्षों से जांच के दायरे में है. इसमें सरकारी खदानों से संगठित तरीके से अवैध कोयला निकालने और बेचने के आरोप हैं. इस मामले में कई व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका की जांच की जा रही है.

ईडी की यह गिरफ्तारी कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की परतें खोलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. एजेंसी इस मामले में शामिल अन्य लोगों की पहचान और नेटवर्क के विस्तार को समझने की कोशिश कर रही है.


फर्जी बीमा पॉलिसी मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, NIC के CMD समेत कर्मचारियों को आरोपी बनाने का आदेश

यह फैसला बीमा क्षेत्र में जवाबदेही तय करने और फर्जीवाड़े पर रोक लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

Last Modified:
Friday, 03 April, 2026
BWHindia

सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी बीमा पॉलिसी से जुड़े एक गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए नेशनल इंश्योरेंस कंपनी (NIC) के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) को आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने का आदेश दिया है. इसके साथ ही कोर्ट ने पूरे मामले की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित करने का आदेश भी दिया.

यह मामला मोटर दुर्घटना से जुड़े एक क्लेम में कथित रूप से फर्जी बीमा पॉलिसी के इस्तेमाल से संबंधित है. जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह आदेश देते हुए बीमा कंपनी की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई.

कंपनी की लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कंपनी खुद यह दावा कर रही थी कि बीमा पॉलिसी फर्जी है, तब भी उसने कोई आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं कराई, जो गंभीर लापरवाही को दर्शाता है. कोर्ट ने इसे “जिम्मेदारी की घोर कमी” बताया.

कोर्ट ने टिप्पणी की कि अब समय आ गया है कि बीमा कंपनियां अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाएं, क्योंकि वे जो भुगतान करती हैं, वह आम जनता के पैसे से होता है.

SIT को सौंपी गई जांच

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को “राष्ट्रीय महत्व का टेस्ट केस” बताते हुए SIT को निर्देश दिया कि वह नया केस दर्ज करे, जिसमें NIC के CMD से लेकर स्थानीय शाखा प्रबंधक तक सभी संबंधित कर्मचारियों को आरोपी बनाया जाए. साथ ही बस के मालिक को भी आरोपी के रूप में शामिल करने को कहा गया है.

कोर्ट ने SIT को निर्देश दिया कि जांच तेजी और गंभीरता से की जाए तथा फर्जी बीमा दस्तावेज तैयार करने की साजिश की गहराई से पड़ताल की जाए.

DGP ने कोर्ट में मांगी माफी

इस मामले में पहले तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को भी कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया गया था. उनके हलफनामे में कहा गया था कि मोटर दुर्घटना मामलों में पुलिस बीमा दस्तावेजों की सत्यता की जांच नहीं करती.

इस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई. शुक्रवार को DGP ने कोर्ट में पेश होकर बिना शर्त माफी मांगी, जिसे बेंच ने स्वीकार कर लिया. उन्होंने बताया कि अब E-DAR और वाहन पोर्टल के जरिए बीमा विवरण का तुरंत और स्वचालित सत्यापन संभव हो गया है.

पीड़ित को जल्द मुआवजा देने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि दुर्घटना पीड़ित को मुआवजा मिलने में और देरी न हो. कोर्ट ने बीमा कंपनी को चार सप्ताह के भीतर सीधे पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश दिया. हालांकि, कंपनी को यह राशि बाद में वाहन के नियंत्रण में रहे व्यक्ति (लीजधारक) से वसूलने की अनुमति दी गई है.

मामला कैसे शुरू हुआ

यह मामला के. सरवनन नामक एक सड़क दुर्घटना पीड़ित से जुड़ा है, जो बस हादसे में घायल हो गए थे. लंबा इलाज और सर्जरी के बाद उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी. उन्होंने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी.

बीमा कंपनी ने दावा पूरी तरह खारिज करते हुए पॉलिसी को अमान्य बताया, लेकिन MACT और बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने कंपनी की दलीलें खारिज कर दीं और मुआवजा देने का आदेश दिया. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

 


हनी सिंह के मुंबई कॉन्सर्ट पर FIR दर्ज, अवैध लेजर लाइट और सुरक्षा चिंताओं के आरोप

बताया जा रहा है कि NDTV से जुड़े इस कार्यक्रम की खबर पहले NDTV Profit की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई थी, लेकिन बाद में वह खबर वहां से हटा दी गई और लिंक खोलने पर “404 Something Went Wrong” दिखने लगा. 

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2026
BWHindia

मुंबई में मशहूर रैपर और सिंगर यो यो हनी सिंह के NDTV GoodTimes से जुड़े ‘My Story India Tour’ के एक कॉन्सर्ट को लेकर विवाद सामने आया है. जानकारी के मुताबिक, कार्यक्रम में लेजर लाइट के इस्तेमाल से जुड़े नियमों के उल्लंघन के मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की है. इस FIR ने शहर में बड़े सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर बहस को तेज कर दिया है.

कॉन्सर्ट की जानकारी और आयोजन स्थल

यह कॉन्सर्ट 28 मार्च को मुंबई के बांद्रा स्थित एमएमआरडीए ग्राउंड में आयोजित किया गया था. रिपोर्ट्स के अनुसार, शो के दौरान लेजर लाइट्स का इस्तेमाल किया गया, जबकि इसके लिए पहले से निर्धारित सुरक्षा नियमों और दिशानिर्देशों का पालन पूरी तरह नहीं किया गया. स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि संबंधित एजेंसियों की ओर से आयोजकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे, लेकिन उनके उल्लंघन की शिकायत सामने आई. इसके बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने FIR दर्ज की.

लेजर लाइट और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन

कानूनी आरोपों में उच्च-तीव्रता वाली लेजर लाइट का उपयोग शामिल है, जिसके लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी. यह स्थल हवाई मार्ग के पास आता है, जहां ऐसी लाइट के उपयोग पर सख्त नियम हैं. इस तरह की अनियंत्रित लाइट्स से हवाई सुरक्षा को खतरा हो सकता है.

भीड़ नियंत्रण और प्रवेश में अव्यवस्था

कॉन्सर्ट में बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे और प्रवेश द्वार पर अव्यवस्था देखी गई. सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में एक महिला फैन गेट पर चढ़ने की कोशिश करती नजर आई, जिससे सुरक्षा कर्मियों के साथ तकरार हुई. इस मामले ने भीड़ नियंत्रण और एंट्री पॉइंट्स के महत्व को उजागर किया. 

मीडिया में चर्चा

इस मामले का सबसे चर्चित पहलू मीडिया इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बना हुआ है. बताया जा रहा है कि NDTV से जुड़े इस कार्यक्रम की खबर पहले NDTV Profit की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई थी, लेकिन बाद में वह खबर वहां से हटा दी गई और लिंक खोलने पर “404 Something Went Wrong” दिखने लगा. 

FIR में शामिल आरोप

पुलिस ने आयोजकों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिसमें निम्नलिखित आरोप शामिल हैं.
1. अवैध लेजर लाइट का उपयोग जो हवाई सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करता है
2. सुरक्षा नियमों और दिशानिर्देशों का पालन न करना
3. भीड़ नियंत्रण में लापरवाही

जांच यह निर्धारित करेगी कि किन परिस्थितियों में नियमों का उल्लंघन हुआ और क्या आयोजकों ने आवश्यक अनुमति ली थी.

आयोजकों और प्रदर्शन की प्रतिक्रिया

कॉन्सर्ट का प्रदर्शन हाई एनर्जी और दर्शकों में लोकप्रिय रहा, जिसमें हनी सिंह ने अपने कई हिट गानों से मनोरंजन किया. लेकिन यह कानूनी मामला अब विवाद का मुख्य केंद्र बन गया है, जिससे कॉन्सर्ट की सफलता पर सवाल उठे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े आयोजन जैसे लाइव कॉन्सर्ट में सुरक्षा मानकों का पालन और भीड़ प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर हवाई मार्ग के पास के क्षेत्रों में.

पुलिस अब अनुमतियों, सुरक्षा प्रोटोकॉल और आयोजन के दौरान निर्णयों के दस्तावेज़ों की गहन जांच करेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं. जांच के आधार पर आयोजकों और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की संभावना बनी हुई है. 


अनिल अंबानी ने अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी पर किया मानहानि केस

यह मामला मीडिया, कॉरपोरेट जगत और कानून के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं.

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2026
BWHindia

देश के प्रमुख उद्योगपति अनिल अंबानी ने मीडिया जगत से जुड़े एक बड़े विवाद में कानूनी कार्रवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया है. उन्होंने जाने-माने पत्रकार अर्नब गोस्वामी और उनके चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है. यह मामला हाल ही में प्रसारित कुछ टीवी कार्यक्रमों से जुड़ा बताया जा रहा है.

टीवी प्रसारण पर उठे सवाल

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पूरा विवाद उन कार्यक्रमों को लेकर है जिनमें अनिल अंबानी के वित्तीय लेन-देन से संबंधित खबरें दिखाई गई थीं. अंबानी का आरोप है कि इन प्रसारणों में ऐसी सामग्री दिखाई गई, जिससे उनकी छवि और प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचा है.

याचिका में क्या कहा गया?

दायर याचिका में दावा किया गया है कि चैनल के कुछ शो में मानहानिकारक बातें प्रसारित की गईं. इसके चलते आम जनता, कारोबारी समुदाय और निवेशकों के बीच उनके प्रति गलत धारणा बनी. अंबानी का कहना है कि इस तरह की रिपोर्टिंग से उनकी साख पर नकारात्मक असर पड़ा है.

कोर्ट से क्या मांग की गई?

अनिल अंबानी ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि अंतिम फैसला आने तक अर्नब गोस्वामी और ‘रिपब्लिक टीवी’ को उनके खिलाफ किसी भी तरह की सामग्री प्रसारित या प्रकाशित करने से रोका जाए. इसके लिए उन्होंने इंटरिम राहत (अस्थायी रोक) की मांग की है.

याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण जारी रहता है, तो उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर छवि को और अधिक नुकसान हो सकता है. इस नुकसान की भरपाई करना भविष्य में बेहद कठिन होगा.

अगली सुनवाई कब?

यह मामला 1 अप्रैल को जस्टिस मिलिंद जाधव की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो सकता है. फिलहाल केस प्रारंभिक चरण में है और अदालत यह तय करेगी कि अनिल अंबानी को अंतरिम राहत दी जानी चाहिए या नहीं.

 


उच्च न्यायालय के आदेश पर UNI का दिल्ली कार्यालय सील

दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद UNI के राफी मार्ग कार्यालय की भूमि आवंटन रद्द करने के फैसले पर कार्रवाई की गई.

Last Modified:
Saturday, 21 March, 2026
BWHindia

संयुक्त समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) के दिल्ली कार्यालय को 20 मार्च 2026 को सील कर दिया गया. यह कार्रवाई दिल्ली पुलिस और प्रशासन की टीम द्वारा की गई. पुलिस ने बताया कि यह कदम दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद उठाया गया.

UNI के राफी मार्ग कार्यालय की जमीन का आवंटन पहले ही रद्द किया जा चुका था. UNI ने इस फैसले के खिलाफ न्यायालय में अपील की थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज कर दी और जमीन रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा. इसके बाद कार्यालय खाली करने का निर्देश दिया गया.

पुलिस ने किया कार्यालय खाली और सील

उच्च न्यायालय के आदेश के आधार पर पुलिस ने कार्यालय को खाली कराकर सील कर दिया. मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस अधिकारी मौजूद थे. अधिकारियों ने बताया कि यह कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के अनुसार और वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ की गई.

कार्यालय सील होने के दौरान कर्मचारियों में हलचल रही. कर्मचारियों का कहना था कि उन्हें जबरन बाहर निकाला गया और कुछ कर्मचारियों को अपने सामान इकट्ठा करने का समय नहीं मिला. हालांकि, पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पूरी कार्रवाई नियमों के अनुसार की गई.

दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद UNI के राफी मार्ग कार्यालय की भूमि आवंटन रद्द करने के फैसले पर कार्रवाई की गई. अधिकारियों ने सुनिश्चित किया कि सभी कदम कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उठाए गए और कार्यालय सील करने की प्रक्रिया पूरी तरह नियंत्रित तरीके से संपन्न हुई.


CBI मामले में प्रणय-राधिका रॉय को राहत, दिल्ली हाई कोर्ट ने LOC किए खारिज

दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले से रॉय दंपति को बड़ी राहत मिली है. हालांकि, 2019 का मामला अभी जारी है, ऐसे में आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सभी की नजर बनी रहेगी.

Last Modified:
Friday, 20 March, 2026
BWHindia

दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व एनडीटीवी (NDTV) प्रमोटर्स प्रणय रॉय और राधिका रॉय को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर (LOC) को रद्द कर दिया है. यह फैसला CBI द्वारा दर्ज दो मामलों के संदर्भ में आया है, जिनमें से एक पहले ही बंद हो चुका है, जबकि दूसरा अभी लंबित है.

न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने शुक्रवार को यह आदेश सुनाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता जांच में सहयोग करेंगे, इस शर्त पर लुक आउट सर्कुलर रद्द किए जाते हैं. हाई कोर्ट को बताया गया कि यह LOC जून 2017 और अगस्त 2019 में दर्ज दो अलग-अलग FIR के संबंध में CBI की सिफारिश पर जारी किए गए थे.

2017 का मामला हो चुका बंद
2017 में दर्ज मामला प्रणय रॉय, राधिका रॉय, RRPR होल्डिंग्स और NDTV के खिलाफ था. यह शिकायत क्वांटम सिक्योरिटी प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक संजय दत्त द्वारा की गई थी. आरोप था कि NDTV में 20% हिस्सेदारी खरीदने के लिए लिए गए लोन में ICICI बैंक अधिकारियों के साथ साजिश की गई.

हालांकि, बाद में CBI ने इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी. एजेंसी ने कहा कि उस अवधि में कई लोन खातों पर ब्याज दरों में कमी की गई थी और यह मामला कोई अपवाद नहीं था. हाई कोर्ट ने 23 जनवरी को इस क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था.

2019 का मामला अभी लंबित
वहीं, अगस्त 2019 में दर्ज दूसरा मामला अभी भी लंबित है और इसमें अब तक चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है.  प्रणय रॉय और राधिका रॉय की ओर से अधिवक्ता अनुराधा दत्त, पवन शर्मा, सुमन यादव, कुनाल दत्त, सौरभ सिंह और निशांत वरुण ने पैरवी की. वहीं, विशेष वकील अनुपम एस शर्मा ने प्रतिवादियों का पक्ष रखा.


दिल्ली हाई कोर्ट का नोटिस: कांग्रेस मानहानि मामले में अर्नब गोस्वामी को समन

यह मामला मीडिया और राजनीतिक दलों के बीच जिम्मेदारी और अभिव्यक्ति की सीमा को लेकर एक अहम उदाहरण बन सकता है.

Last Modified:
Tuesday, 17 March, 2026
BWHindia

दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेस पार्टी द्वारा दायर मानहानि मामले में रिपब्लिक टीवी के एडिटर अर्णब गोस्वामी को समन जारी किया है. यह मामला उन दावों को लेकर है जिसमें कहा गया था कि कांग्रेस का तुर्की में एक कार्यालय संचालित होता है.

क्या है पूरा मामला

कांग्रेस पार्टी ने अदालत में दायर याचिका में आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ प्रसारित और प्रकाशित सामग्री मानहानिकारक है. पार्टी का कहना है कि यह कंटेंट अब भी ऑनलाइन उपलब्ध है और इससे जुड़े लेख लगातार प्रसारित हो रहे हैं. मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पक्षों की दलीलों पर ध्यान देते हुए इसे आगे की सुनवाई के लिए मई महीने में सूचीबद्ध करने का फैसला किया. साथ ही, कोर्ट ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया है कि वे चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करें.

अब इस मामले में अगली सुनवाई मई में होगी, जहां अदालत यह तय करेगी कि आरोपों और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आगे क्या कार्रवाई की जाए. यह मामला मीडिया और राजनीतिक दलों के बीच जिम्मेदारी और अभिव्यक्ति की सीमा को लेकर एक अहम उदाहरण बन सकता है. आने वाले समय में इस पर कोर्ट का रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है.


हरदीप सिंह पुरी की बेटी ने 10 करोड़ रुपये का मानहानि मुकदमा दायर किया, एपस्टीन से जोड़ने वाली सामग्री हटाने की मांग

याचिका में अदालत से कहा गया है कि इन डिजिटल मंचों को निर्देश दिया जाए कि वे उन सभी पोस्ट, वीडियो, इंटरनेट लेखों और अन्य डिजिटल सामग्री को हटाएं जिनमें हिमायनी पुरी को एपस्टीन से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है.

Last Modified:
Tuesday, 17 March, 2026
BWHindia

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की बेटी हिमायनी पुरी ने अपने खिलाफ सामाजिक माध्यमों और इंटरनेट पर फैलाए जा रहे आरोपों को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में 10 करोड़ रुपये का मानहानि मुकदमा दायर किया है. याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि उन सभी पोस्ट, वीडियो और इंटरनेट लेखों को हटाने का निर्देश दिया जाए, जिनमें उन्हें बदनाम वित्तीय कारोबारी जेफ्री एपस्टीन से जोड़कर दिखाया गया है. याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स एक्स, गूगल, मेटा और लिंक्डइन सहित कई अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ स्थायी रोक लगाने की भी मांग की गई है. मामले की सुनवाई मंगलवार को होने की संभावना है.

सोशल मीडिया से सामग्री हटाने की मांग

याचिका में अदालत से कहा गया है कि इन डिजिटल मंचों को निर्देश दिया जाए कि वे उन सभी पोस्ट, वीडियो, इंटरनेट लेखों और अन्य डिजिटल सामग्री को हटाएं जिनमें हिमायनी पुरी को एपस्टीन से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है. साथ ही यह भी मांग की गई है कि भविष्य में यदि इसी तरह की मानहानिकारक सामग्री सामने आती है तो उसे भी तुरंत हटाया जाए.

22 फरवरी से फैलने लगे आरोप

मुकदमे में कहा गया है कि 22 फरवरी 2026 से कई सामाजिक माध्यम खातों ने ऐसे आरोप प्रसारित करना शुरू किया, जिनमें दावा किया गया कि हिमायनी पुरी के एपस्टीन और उसकी आपराधिक गतिविधियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष व्यावसायिक, वित्तीय या व्यक्तिगत संबंध रहे हैं. कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि जिस कंपनी रियल पार्टनर्स में वह पहले कार्यरत थीं, उसे एपस्टीन या उसके सहयोगियों से आर्थिक लाभ या संदिग्ध धन प्राप्त हुआ था. एक अन्य आरोप में यह भी दावा किया गया कि कारोबारी रॉबर्ट मिलार्ड ने पुरी के साथ मिलकर निवेश बैंक लेहमन ब्रदर्स के पतन की साजिश रची थी.

आरोपों को बताया पूरी तरह निराधार

हिमायनी पुरी ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है. याचिका में कहा गया है कि इंटरनेट पर प्रसारित किए जा रहे दावे किसी भी तथ्यात्मक आधार पर आधारित नहीं हैं और उनका उद्देश्य केवल उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना है. याचिका के अनुसार कुछ सामाजिक माध्यम खातों और अज्ञात व्यक्तियों ने सनसनीखेज और भ्रामक तरीकों जैसे संपादित वीडियो, गुमराह करने वाले शीर्षक और बदले हुए चित्रों का इस्तेमाल कर इन आरोपों को फैलाया.

पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश

याचिका में कहा गया है कि यह एक सुनियोजित इंटरनेट अभियान है जिसका उद्देश्य भारत और विदेशों में हिमायनी पुरी की पेशेवर छवि को नुकसान पहुंचाना है. इसमें यह भी कहा गया कि उन्हें समन्वित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है ताकि उनकी विश्वसनीयता को कमजोर किया जा सके.

पिता के राजनीतिक पद से जोड़ा गया मामला

याचिका में यह भी कहा गया है कि यह पूरा अभियान उनके पिता के राजनीतिक पद से जुड़ा हुआ है. चूंकि हरदीप सिंह पुरी केंद्र सरकार में वरिष्ठ मंत्री हैं इसलिए उनकी बेटी को निशाना बनाया जा रहा है.

वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी कर रहे हैं पैरवी

इस मानहानि मुकदमे की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी कर रहे हैं. यह कानूनी कार्रवाई ऐसे समय में सामने आई है जब एपस्टीन से जुड़ी जांच के दस्तावेजों में हरदीप सिंह पुरी का नाम आने को लेकर चर्चा हो रही है. केंद्रीय मंत्री ने हाल ही में इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देते हुए किसी भी प्रकार की गलत गतिविधि से अपना संबंध होने से इनकार किया है.

पुरी ने कहा कि न्यूयॉर्क में अपने कार्यकाल के दौरान उनकी एपस्टीन से केवल कुछ बार मुलाकात हुई थी और बातचीत मुख्य रूप से भारत की आर्थिक पहलों और वैश्विक कारोबारी नेताओं की संभावित भारत यात्रा से संबंधित थी. उन्होंने यह भी कहा कि दस्तावेजों में उनके नाम का उल्लेख मुख्य रूप से संक्षिप्त संदर्भों और दोहराव के रूप में है, न कि किसी अवैध गतिविधि के प्रमाण के रूप में.
 


हरियाणा में 590 करोड़ बैंक घोटाले पर ACB का शिकंजा: मास्टरमाइंड समेत 5 गिरफ्तार

इस बड़े एक्शन के बाद हरियाणा की सियासत और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है, और सभी की नजर अब जांच की अगली कड़ी पर टिकी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 25 February, 2026
Last Modified:
Wednesday, 25 February, 2026
BWHindia

हरियाणा में सामने आए बहुचर्चित आईएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC First Bank) घोटाले में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मंगलवार देर रात मास्टरमाइंड रिभव ऋषि सहित पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. जांच एजेंसियों के मुताबिक फर्जी कंपनियों के जरिए सरकारी खातों से करीब 590 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई. अब इस मामले में कुछ सरकारी अफसरों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है, जिस पर जल्द नकेल कसने के संकेत हैं.

फर्जी कंपनियां बनाकर रची गई साजिश

जांच में खुलासा हुआ है कि कथित मास्टरमाइंड रिभव ऋषि पहले IDFC First Bank में मैनेजर रह चुका है और फिलहाल जीरकपुर स्थित AU Small Finance Bank में तैनात था. आरोप है कि उसने अपने साथियों के साथ मिलकर फर्जी कंपनियां खड़ी कीं और हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों के खातों से बड़ी रकम ट्रांसफर कराई. गिरफ्तार आरोपियों में रिभव ऋषि के अलावा अभिषेक सिंगला, अभय, स्वाति और एक अन्य व्यक्ति शामिल हैं. ACB ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि इनमें कितने बैंक कर्मचारी हैं और कितने बाहरी लोग, लेकिन शुरुआती जांच में संगठित नेटवर्क के संकेत मिले हैं.

24 घंटे में रिकवरी का दावा

मामले के तूल पकड़ने के बाद मुख्यमंत्री नायब सैनी ने विधानसभा में बताया कि IDFC First Bank से ब्याज समेत पूरी राशि रिकवर कर ली गई है. सरकार का दावा है कि त्वरित कार्रवाई के चलते सार्वजनिक धन को सुरक्षित कर लिया गया. हालांकि एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इतनी बड़ी राशि की निकासी कैसे संभव हुई और निगरानी तंत्र कहां चूक गया.

सरकारी अफसरों पर भी शक की सुई

ACB सूत्रों के अनुसार कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है. बड़ा सवाल यह है कि पंचकूला में मुख्यालय होने के बावजूद 18 सरकारी विभागों के खाते चंडीगढ़ स्थित बैंकों में क्यों खोले गए. क्या यह महज प्रशासनिक निर्णय था या इसके पीछे किसी तरह का लाभ जुड़ा था? इन बिंदुओं की हाई लेवल जांच शुरू कर दी गई है.

पिछले साल ही मिली थी गड़बड़ी की भनक

चौंकाने वाली बात यह है कि सरकार को जुलाई 2025 में ही संभावित अनियमितताओं की जानकारी मिल गई थी. वित्त विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) ने सभी विभागों को सतर्कता बरतने के निर्देश भी जारी किए थे. इसके बावजूद खातों के संचालन और बैंक इंपैनलमेंट प्रक्रिया पर पर्याप्त सख्ती क्यों नहीं बरती गई, यह भी जांच का अहम हिस्सा है.

सरकार ने IDFC First Bank और AU Small Finance Bank को इंपैनल करने की प्रक्रिया की भी समीक्षा के आदेश दिए हैं. आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां संभव हैं. ACB की कार्रवाई ने साफ संकेत दे दिया है कि सरकारी धन के दुरुपयोग के मामलों में अब सख्त रुख अपनाया जाएगा.