SC का भूषण पावर फैसला, IBC की कमजोरियों और सिस्टम फेलियर पर करारा प्रहार

JSW स्टील की ₹19,700 करोड़ की समाधान योजना रद्द, BPSL को गंभीर उल्लंघनों के बीच परिसमापन में भेजा गया है.

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Tuesday, 27 May, 2025
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पालक शाह

2 मई 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट (SC) ने भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड (BPSL) की दिवाला समाधान प्रक्रिया की तीखी आलोचना करते हुए, जेएसडब्ल्यू स्टील (JSW) की ₹19,700 करोड़ की समाधान योजना को रद्द कर दिया. साथ ही कंपनी के परिसमापन का आदेश दिया. जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और सतीश चंद्र शर्मा द्वारा लिखित 100 पन्नों के फैसले में प्रक्रियात्मक चूकों, नियामक उल्लंघनों और संस्थागत विफलताओं की श्रृंखला को उजागर किया गया है, जिससे भारत की दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की नींव हिल गई है. तय समयसीमाओं की अनदेखी से लेकर बेरोकटोक हेरफेर तक, यह फैसला एक ऐसी प्रक्रिया को सामने लाता है जो अयोग्यता और अवसरवाद से भरी है, और भारत की दिवाला प्रणाली की पवित्रता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

सीआईआरपी में त्रुटियों की भरमार
भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड के लिए कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी), जो 26 जुलाई 2017 को पंजाब नेशनल बैंक की याचिका पर शुरू हुआ था, आईबीसी के तहत संकटग्रस्त कंपनियों को पुनर्जीवित करने के वादे का प्रतीक बनना चाहिए था. इसके बजाय, यह प्रणालीगत सड़ांध का एक उदाहरण बन गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जेएसडब्ल्यू स्टील, समाधान पेशेवर (आरपी), ऋणदाता समिति (सीओसी), और यहां तक कि राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) की श्रृंखलाबद्ध विफलताओं को रेखांकित किया गया है.

समयसीमा का उल्लंघन: आईबीसी के तहत सीआईआरपी को 270 दिनों के भीतर पूरा करना अनिवार्य है, अधिकतम 330 दिन तक बढ़ाया जा सकता है. बीपीएसएल के मामले में यह प्रक्रिया 26 अप्रैल 2018 तक पूरी हो जानी चाहिए थी। फिर भी, आरपी ने जेएसडब्ल्यू की समाधान योजना को एनसीएलटी में 14 फरवरी 2019 को प्रस्तुत किया, जो वैधानिक सीमा से काफी परे था. कोई विस्तार नहीं मांगा गया, और एनसीएलटी द्वारा इस देर से प्रस्तुत योजना को स्वीकार करना आईबीसी की समयसीमा के प्रति गंभीर लापरवाही को दर्शाता है.

धारा 29ए का उल्लंघन: धारा 29ए के तहत, "संलग्न व्यक्तियों" को बोली लगाने से रोका जाता है, और जेएसडब्ल्यू की पात्रता की सही तरीके से जांच नहीं की गई। 2008 में जेएसडब्ल्यू, बीपीएसएल और जय बालाजी इंडस्ट्रीज के बीच एक संयुक्त उपक्रम ने चिंताएं पैदा कीं, फिर भी आरपी ने आवश्यक फॉर्म एच अनुपालन प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया और न ही जेएसडब्ल्यू के हलफनामे की जांच की. एनसीएलएटी द्वारा इस चूक को हल्के में लेना सुप्रीम कोर्ट द्वारा आईबीसी की अखंडता को कमजोर करने वाला माना गया.

सीसीडी का उल्लंघन: जेएसडब्ल्यू की समाधान योजना ने ₹8,550 करोड़ की अग्रिम इक्विटी निवेश का वादा किया था. इसके बजाय, कंपनी ने केवल ₹100 करोड़ की इक्विटी डाली और ₹8,450 करोड़ को अपने समूह की इकाई, पियोम्बिनो स्टील, के माध्यम से कम्पल्सरी कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (सीसीडी) के रूप में भेजा. सुप्रीम कोर्ट ने जेएसडब्ल्यू के इस दावे को खारिज कर दिया कि इससे इक्विटी की शर्त पूरी हुई है, और इसे स्वीकृत योजना का घोर उल्लंघन बताया.

एकतरफा शर्तें: बिना शर्त समाधान योजना प्रस्तुत करने के बावजूद, जेएसडब्ल्यू ने सफल समाधान आवेदक (एसआरए) घोषित होने के बाद शर्तें जोड़ीं और अनुमोदन के बाद योजना की शर्तों में संशोधन करते हुए अपने पद का दुरुपयोग किया. यह "चालबाजी और अदला-बदली" की रणनीति, जो सीओसी की निष्क्रियता से संभव हुई, ने पूरी प्रक्रिया को और दूषित कर दिया.

भुगतान में देरी: योजना के तहत वित्तीय ऋणदाताओं को एनसीएलटी की स्वीकृति (5 सितंबर 2019) के 30 दिनों के भीतर भुगतान किया जाना था. इसके बजाय, वित्तीय ऋणदाताओं को 540 दिन (मार्च 2021 तक) इंतजार करना पड़ा और परिचालन ऋणदाताओं को 900 दिन (मार्च 2022 तक) की देरी सहनी पड़ी. विनियमन 38 के विपरीत, जो परिचालन ऋणदाताओं को प्राथमिकता देता है, जेएसडब्ल्यू ने पहले वित्तीय ऋणदाताओं को भुगतान किया, और बढ़ती स्टील कीमतों का लाभ उठाकर खुद को समृद्ध किया, जबकि ऋणदाता प्रतीक्षा करते रहे.

अनुचित लाभ: सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि जेएसडब्ल्यू ने योजना के कार्यान्वयन में जानबूझकर देरी की, जिससे लाभकारी स्टील बाजार प्रवृत्तियों का दोहन किया गया। इस अवसरवादिता और सीओसी की सहमति ने समय पर समाधान सुनिश्चित करने के आईबीसी के उद्देश्य को विफल किया.

सरकारी दावे में कटौती: समाधान पेशेवर (आरपी) ने बिना किसी औचित्य के ओडिशा सरकार के बिजली बकाया दावों को भारी रूप से घटा दिया, जिससे राज्य के वैध दावों को नुकसान पहुंचा. इस मनमानी कटौती को सीओसी और एनसीएलटी ने नजरअंदाज किया, जिससे प्रक्रिया में विश्वास और कमजोर हुआ. लचीली प्रभावी तिथि: समाधान योजना में एक निश्चित प्रभावी तिथि का अभाव था, और ऋणदाताओं के एक मुख्य समूह ने, एनसीएलटी की मंजूरी के बाद अधिकार न होते हुए भी, इसे 31 मार्च 2021 तक बढ़ा दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक अवैध चाल बताया, जिसे सभी हितधारकों ने अनदेखा कर दिया.

एनसीएलएटी की सीमा से परे दखल: एनसीएलएटी ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा पीएमएलए के तहत जारी अस्थायी कुर्की आदेश को गलत तरीके से रद्द कर दिया, यह दावा करते हुए कि धारा 32ए के तहत प्रतिरक्षा प्राप्त है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एनसीएलटी और एनसीएलएटी को सार्वजनिक कानून संबंधी निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है, जिससे उनकी सीमा से बाहर की गई कार्रवाई उजागर हुई.

सीओसी की अनधिकृत बातचीत: समाधान योजना के लिए अनुरोध (RFRP) में सर्वोच्च बोलीदाता के साथ अनुमोदन के बाद बातचीत की अनुमति नहीं थी. फिर भी, जेएसडब्ल्यू को 18वीं सीओसी बैठक में सफल समाधान आवेदक (एसआरए) घोषित किए जाने के बाद, एक छोटे ऋणदाता समूह ने संशोधनों पर बातचीत की और 19वीं बैठक से पहले एक समेकित योजना प्रसारित की. ऋणदाताओं की आपत्तियों के बावजूद, सीओसी ने इसे मंजूरी दी, जिससे पारदर्शिता की कमी सामने आई.

ई-वोटिंग का दुरुपयोग: जेएसडब्ल्यू की योजना पर ई-वोटिंग 16 अक्टूबर 2018 को हुई, लेकिन आरपी ने इसे 14 फरवरी 2019 तक एनसीएलटी में दाखिल नहीं किया. इस अकारण देरी और एनसीएलटी की चुप्पी ने आरपी और सीओसी द्वारा प्रक्रिया के दुरुपयोग की ओर इशारा किया.

सीओसी का विरोधाभासी रवैया: 6 मार्च 2020 के हलफनामे में, सीओसी ने स्वयं को पीड़ित पक्ष बताया, ₹19,350 करोड़ के विलंबित भुगतान और बीपीएसएल के परिचालन से उत्पन्न निधियों पर ब्याज की मांग की. फिर भी, इसने मूल राशि पर समझौता कर लिया और बिना आपत्ति के जेएसडब्ल्यू का विलंबित भुगतान स्वीकार कर लिया, जिससे उसकी नीयत पर सवाल उठे.

प्रणालीगत विफलता
बीपीएसएल के परिसमापन का आदेश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 142 का उपयोग इन उल्लंघनों की गंभीरता को दर्शाता है. आरपी की वैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन में विफलता, सीओसी की वाणिज्यिक समझ की कमी, और जेएसडब्ल्यू की चालबाज़ियों ने मिलकर सीआईआरपी को दूषित कर दिया. एनसीएलटी और एनसीएलएटी, जिन्हें संरक्षक की भूमिका निभानी थी, इन चूकों को नजरअंदाज करते हुए ऐसी योजना को मंजूरी दे बैठे जो अनिवार्य आईबीसी प्रावधानों का उल्लंघन करती थी.

यह फैसला भारत की दिवाला प्रणाली के लिए एक चेतावनी है. जबकि आईबीसी का उद्देश्य पुनरुद्धार और ऋणदाता संरक्षण के बीच संतुलन बनाना है, बीपीएसएल की गाथा एक ऐसी प्रणाली को उजागर करती है जो शोषण के प्रति संवेदनशील है. वर्ष 2021 में जेएसडब्ल्यू द्वारा वित्तीय ऋणदाताओं को ₹19,350 करोड़ और परिचालन ऋणदाताओं को ₹350 करोड़ (₹47,157.99 करोड़ के दावों के मुकाबले) का भुगतान एक सफलता के रूप में सराहा गया था. फिर भी, सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक परिणामों की तुलना में प्रक्रियात्मक पवित्रता को प्राथमिकता दी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि प्रवर्तन में चूक होने पर आईबीसी कितना कठोर हो सकता है.

निवेशकों को सख्त संदेश
इस फैसले के प्रभाव गहरे हैं. चार साल पहले लागू किए गए एक सौदे को पलटकर, सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत दिया है कि प्रक्रियात्मक चूकें “सफल” समाधान योजनाओं को भी अमान्य कर सकती हैं, जिससे संकटग्रस्त परिसंपत्तियों में निवेश करने वाले निवेशकों को निरुत्साहित किया जा सकता है. ₹40,000–50,000 करोड़ मूल्य वाले बीपीएसएल का परिसमापन भले ही ऋणदाताओं के लिए अधिक वसूली ला सकता है, लेकिन यह एक पुनर्जीवित कंपनी को नष्ट करने का खतरा भी रखता है, जिससे आईबीसी के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचता है.

सीओसी और जेएसडब्ल्यू समीक्षा याचिका दायर करने की योजना बना रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने 26 मई 2025 तक परिसमापन कार्यवाही पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है, जब तक समीक्षा लंबित है. हालांकि, इस फैसले का व्यापक संदेश स्पष्ट है: आईबीसी सख्त अनुपालन की मांग करता है, और संस्थागत विफलताओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. व्यापारिक धारणा पर प्रभाव से चिंतित सरकार इन खामियों को दूर करने के लिए हितधारकों से परामर्श कर रही है.

सुधार का समय
बीपीएसएल की विफलता प्रणालीगत सुधार के लिए एक स्पष्ट आह्वान है। समाधान पेशेवर की लापरवाही, सीओसी की मिलीभगत, और न्यायाधिकरणों की नरमी यह दर्शाते हैं कि सख्त निगरानी, स्पष्ट समयसीमाएं, और समाधान आवेदकों पर मजबूत नियंत्रण की आवश्यकता है. वित्तीय स्थिरता का आईबीसी का वादा संस्थागत समन्वय पर टिका है, इसके बिना, भारत की दिवाला प्रणाली ताश के पत्तों का महल बन सकती है.


महादेव बेटिंग ऐप केस: स्काईएक्सचेंज की कमाई से हुई थी Ebix डील? ED का बड़ा दावा

जांच एजेंसी का कहना है कि अवैध धन को विदेशी पोर्टफोलियो निवेश, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड, क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट और अन्य विदेशी निवेश माध्यमों के जरिए भारत में लाया गया.

Last Modified:
Thursday, 16 July, 2026
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प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने महादेव ऑनलाइन बुक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ा खुलासा करने का दावा किया है. एजेंसी के अनुसार, अवैध ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म स्काईएक्सचेंज (Skyexchange) से अर्जित धन का इस्तेमाल अमेरिकी सॉफ्टवेयर कंपनी Ebix के अधिग्रहण के लिए किया गया. ED का कहना है कि इस धन को विदेशी निवेश के जरिए वैध निवेश का रूप देकर भारत लाया गया.

ED का क्या है आरोप?

ED के मुताबिक, कारोबारी विकास गर्ग ने स्काईएक्सचेंज के जरिए कमाई गई अवैध रकम को Eraaya Lifespaces के माध्यम से Ebix के अधिग्रहण में लगाया. एजेंसी ने धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जारी अपने अंतरिम कुर्की आदेश में यह दावा किया है.

जांच एजेंसी का कहना है कि अवैध धन को विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI), प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड (FCCBs), क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) और अन्य विदेशी निवेश माध्यमों के जरिए भारत में लाया गया.

765.77 करोड़ रुपये की कथित अवैध कमाई का इस्तेमाल

ED के अनुसार, लगभग 765.77 करोड़ रुपये की कथित अपराध से अर्जित राशि को विकास गर्ग, उनके परिवार और उनसे जुड़ी कंपनियों तक पहुंचाया गया. इन पैसों का इस्तेमाल Eraaya Lifespaces में हिस्सेदारी खरीदने और बाद में Ebix के अधिग्रहण के लिए किया गया.

एजेंसी का दावा है कि Eraaya Lifespaces ने अगस्त 2024 में अमेरिकी दिवालिया अदालत (US Bankruptcy Court) के जरिए Ebix में 57.58% हिस्सेदारी खरीदी थी.

कैसे हुई फंडिंग?

ED के मुताबिक, Ebix के अधिग्रहण के लिए कई स्रोतों से धन जुटाया गया, जिनमें लगभग 250 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश, करीब 374.4 करोड़ रुपये का QIP और FCCBs के जरिए जुटाई गई राशि शामिल थी.

जांच में यह भी सामने आया कि अगस्त 2024 में Eraaya के QIP एस्क्रो खाते में विदेशी निवेशकों से 248.5 करोड़ रुपये आए, जिन्हें बाद में कंपनी के मुख्य खाते में ट्रांसफर कर Ebix अधिग्रहण में इस्तेमाल किया गया.

इसके अलावा, जांचकर्ताओं ने विकास लाइफकेयर से जुलाई 2024 से जुलाई 2025 के बीच Ebix को लगभग 292.4 करोड़ रुपये के ट्रांसफर का भी पता लगाया. एजेंसी का आरोप है कि इन लेन-देन को कंपनी के वित्तीय विवरणों में ऋण, अग्रिम और निवेश के रूप में दर्ज किया गया.

कोलकाता के एंट्री ऑपरेटर का भी नाम

ED का आरोप है कि कोलकाता स्थित कथित एंट्री ऑपरेटर अमित सरावगी ने लगभग 526 करोड़ रुपये की फर्जी लेखा प्रविष्टियों (एंट्री) की व्यवस्था की. एजेंसी के मुताबिक, इनमें से करीब 175 करोड़ रुपये विकास गर्ग से जुड़ी कंपनियों में भेजे गए, जिनमें GG Engineering जैसी कंपनियां भी शामिल हैं.

हर महीने 450 करोड़ रुपये की कथित अवैध कमाई

ED का दावा है कि महादेव ऑनलाइन और स्काईएक्सचेंज नेटवर्क हर महीने 450 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध कमाई कर रहे थे. इस धन को शेल कंपनियों, फर्जी दस्तावेजों और कई स्तरों वाले वित्तीय लेन-देन के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग कर विभिन्न संपत्तियों में निवेश किया गया.

940.77 करोड़ रुपये की संपत्तियां अटैच

डिजिटल सबूतों, बैंक रिकॉर्ड और PMLA के तहत जुटाए गए दस्तावेजों के आधार पर ED ने निष्कर्ष निकाला कि विकास गर्ग से जुड़ी संस्थाओं में निवेश किए गए 765.77 करोड़ रुपये अपराध से अर्जित आय हैं.

इसी आधार पर एजेंसी ने Ebix में Eraaya Lifespaces की 163.8 करोड़ रुपये की शेयरहोल्डिंग और लगभग 47.74 करोड़ रुपये की अचल संपत्तियों समेत कुल 940.77 करोड़ रुपये की संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया है.

जांच अभी जारी

ED ने कहा है कि महादेव ऑनलाइन बुक और स्काईएक्सचेंज नेटवर्क के संचालकों, प्रमोटरों और सहयोगियों के खिलाफ छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में दर्ज मामलों के आधार पर जांच जारी है. एजेंसी का कहना है कि संपत्तियों को कुर्क करने का उद्देश्य उन्हें बेचे जाने या स्थानांतरित किए जाने से रोकना है, ताकि जांच और कानूनी कार्रवाई प्रभावित न हो.
 


महादेव बेटिंग केस: ईबिक्स चेयरमैन विकास गर्ग को राहत नहीं, कोर्ट ने 24 घंटे की ट्रांजिट रिमांड दी

दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने मंगलवार को ED की याचिका स्वीकार करते हुए विकास गर्ग की 24 घंटे की ट्रांजिट रिमांड मंजूर की. एजेंसी ने अदालत से कहा था कि रायपुर स्थित विशेष PMLA अदालत में पेश करने के लिए गर्ग को वहां ले जाना जरूरी है.

Last Modified:
Tuesday, 14 July, 2026
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महादेव ऑनलाइन बेटिंग ऐप से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार ईबिक्स (Ebix) के चेयरमैन विकास गर्ग को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट से राहत नहीं मिली. कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को 24 घंटे की ट्रांजिट रिमांड मंजूर कर दी है, जिसके बाद उन्हें छत्तीसगढ़ के रायपुर ले जाया जाएगा. वहां उन्हें धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत गठित विशेष अदालत में पेश किया जाएगा. यह कार्रवाई महादेव बेटिंग सिंडिकेट से जुड़े कथित अवैध धन के लेनदेन की जांच के तहत की गई है.

दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विजय शंकर ने मंगलवार को ED की याचिका स्वीकार करते हुए विकास गर्ग की 24 घंटे की ट्रांजिट रिमांड मंजूर की. एजेंसी ने अदालत से कहा था कि रायपुर स्थित विशेष PMLA अदालत में पेश करने के लिए गर्ग को वहां ले जाना जरूरी है.

940.7 करोड़ रुपये की संपत्तियां पहले ही हो चुकी हैं अटैच

गिरफ्तारी से कुछ दिन पहले ही ED ने PMLA के तहत विकास गर्ग, उनके परिवार और उनसे जुड़ी संस्थाओं की करीब 940.7 करोड़ रुपये की संपत्तियां अस्थायी रूप से कुर्क (अटैच) की थीं. एजेंसी के मुताबिक इनमें आवासीय संपत्तियां, जमीन, इक्विटी शेयर और अन्य प्रतिभूतियां शामिल हैं. ED का आरोप है कि ये सभी संपत्तियां अवैध बेटिंग नेटवर्क से अर्जित अपराध की आय (Proceeds of Crime) से खरीदी गईं.

जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा

10 जुलाई को जारी अपने बयान में ED ने कहा था कि विकास गर्ग के खिलाफ "महादेव ऑनलाइन बुक या स्काईएक्सचेंज अवैध ऑनलाइन बेटिंग मामले" में PMLA के तहत कार्रवाई की जा रही है. जांच के दायरे में महादेव बुक ऐप और दुबई स्थित बेटिंग प्लेटफॉर्म स्काईएक्सचेंज भी शामिल हैं.

अप्रैल 2025 में ED ने विकास गर्ग के आवास और उनकी कंपनियों के कार्यालयों पर छापेमारी की थी. उस समय उनकी कंपनियों ने शेयर बाजार को दी जानकारी में कहा था कि जांच कुछ तीसरे पक्ष और उनके लेनदेन से जुड़ी है. बाद में नियामकीय फाइलिंग में कंपनियों ने PMLA के तहत चल रही कार्रवाई की पुष्टि की, लेकिन सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वे कानूनी मंचों पर इसका विरोध कर रही हैं.

कई सूचीबद्ध कंपनियों से जुड़े हैं विकास गर्ग

विकास गर्ग, विकास लाइफकेयर और विकास इकोटेक के प्रमोटर हैं. दोनों कंपनियां नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में सूचीबद्ध हैं. इसके अलावा ईबिज (Ebiz) बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में सूचीबद्ध है. अगस्त 2024 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की दिल्ली इकाई के आर्थिक प्रकोष्ठ का संयोजक भी नियुक्त किया गया था.

क्या है महादेव बेटिंग ऐप मामला?

महादेव बेटिंग ऐप मामले में आरोप है कि सिंडिकेट ने हवाला, क्रिप्टोकरेंसी और बेनामी बैंक खातों के जरिए अवैध कमाई को वैध दिखाने की कोशिश की. ED के अनुसार यह नेटवर्क टाइगर एक्सचेंज, गोल्ड365 और लेजर247 जैसे कई ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म के जरिए फ्रेंचाइजी मॉडल पर पूरे भारत में संचालित होता था. एजेंसी का दावा है कि इसका संचालन दुबई से कथित मास्टरमाइंड सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल करते थे.

ओमान में मिला सौरभ चंद्राकर

इस मामले में एक अन्य बड़ी कार्रवाई के तहत महादेव बेटिंग ऐप के कथित प्रमोटर और लगभग 6,000 करोड़ रुपये के घोटाले के प्रमुख आरोपी सौरभ चंद्राकर का ओमान में पता लगाया गया है. ED और छत्तीसगढ़ पुलिस के अनुरोध पर जारी इंटरपोल रेड नोटिस के आधार पर रॉयल ओमान पुलिस ने उसे हिरासत में लिया है. भारत सरकार ने उसके प्रत्यर्पण (Extradition) की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है.

ED इससे पहले सौरभ चंद्राकर से जुड़ी लगभग 1,700 करोड़ रुपये की संपत्तियां भी कुर्क कर चुकी है, जिनमें दुबई स्थित लग्जरी विला और प्रीमियम अपार्टमेंट शामिल हैं.

2022 से जारी है जांच

महादेव बेटिंग ऐप मामले की जांच 2022 से चल रही है और समय के साथ इसका दायरा काफी बढ़ गया है. ED के अनुसार अब तक देशभर में 175 से अधिक स्थानों पर तलाशी ली जा चुकी है, 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, 74 आरोपियों के खिलाफ पांच अभियोजन शिकायतें (Prosecution Complaints) दायर की गई हैं और भारत व विदेशों में हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियां कुर्क की जा चुकी हैं.


NEET-UG री-एग्जाम से पहले टेलीग्राम पर रोक बरकरार, दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के फैसले को दी मंजूरी

NEET-UG 2026 की पुनर्परीक्षा 21 जून को प्रस्तावित है. ऐसे में सरकार ने किसी भी संभावित पेपर लीक या परीक्षा संबंधी अनियमितता को रोकने के लिए टेलीग्राम पर अस्थायी रोक लगाने का फैसला किया था. यह प्रतिबंध 22 जून तक लागू रहेगा.

Last Modified:
Friday, 19 June, 2026
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दिल्ली हाईकोर्ट ने NEET-UG 2026 की पुनर्परीक्षा से पहले भारत में टेलीग्राम पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को बरकरार रखा है. अदालत ने केंद्र सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि यह कदम परिस्थितियों के अनुसार सबसे कम प्रतिबंधात्मक और उचित उपाय था. इसके साथ ही टेलीग्राम की ओर से दायर चुनौती को खारिज कर दिया गया.

22 जून तक बंद रहेगा Telegram

न्यायमूर्ति तेजस करिया ने शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि केंद्र सरकार का आदेश अनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरता है. अदालत ने माना कि परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए उठाया गया यह कदम आवश्यक था. NEET-UG 2026 की पुनर्परीक्षा 21 जून को प्रस्तावित है. ऐसे में सरकार ने किसी भी संभावित पेपर लीक या परीक्षा संबंधी अनियमितता को रोकने के लिए टेलीग्राम पर अस्थायी रोक लगाने का फैसला किया था. यह प्रतिबंध 22 जून तक लागू रहेगा.

NTA और शिक्षा मंत्रालय की सिफारिश पर हुई कार्रवाई

केंद्र सरकार ने यह कदम राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की सिफारिशों के आधार पर उठाया. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A का इस्तेमाल करते हुए भारत में टेलीग्राम की सेवाओं को अस्थायी रूप से ब्लॉक करने का आदेश जारी किया.

सरकार ने टेलीग्राम को 30 जून तक पुराने संदेशों में एडिटिंग फीचर भी निष्क्रिय करने का निर्देश दिया है.

सरकार का दावा- लीक सामग्री फैलाने में अहम भूमिका

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि टेलीग्राम की तकनीकी संरचना बड़ी मात्रा में सामग्री के प्रसार की अनुमति देती है. उन्होंने कहा कि एक बार किसी बॉट या चैनल को बंद करने के बाद भी उसकी कॉपी या मिरर बॉट्स तेजी से सक्रिय हो जाती हैं और आपत्तिजनक सामग्री का प्रसार जारी रखती हैं.

सरकार का कहना था कि परीक्षा से जुड़ी लीक सामग्री के प्रसार में टेलीग्राम की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसलिए यह कदम जरूरी था.

Telegram ने फैसले का किया विरोध

टेलीग्राम ने अदालत में प्रतिबंध का विरोध करते हुए कहा कि केवल उसी को निशाना बनाना उचित नहीं है, जबकि अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बिना किसी रोक के काम कर रहे हैं. टेलीग्राम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने कहा कि कंपनी लगातार सरकारी एजेंसियों के संपर्क में रही है और अवैध सामग्री के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करती रही है.

कंपनी के अनुसार, 9 जून को अधिकारियों से सूचना मिलने के एक घंटे के भीतर चिह्नित URLs हटा दिए गए थे. साथ ही NEET से जुड़ी अवैध सामग्री वाले 900 से अधिक लिंक भी हटाए गए. टेलीग्राम ने दावा किया कि वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और मैनुअल मॉडरेशन के जरिए नियमों के उल्लंघन वाली सामग्री की पहचान करता है.

अदालत में उठे कानूनी सवाल

सुनवाई के दौरान टेलीग्राम ने यह सवाल भी उठाया कि क्या किसी परीक्षा से जुड़ी चिंताओं के आधार पर देश की संप्रभुता और अखंडता के हित में ब्लॉकिंग आदेश जारी किया जा सकता है. हालांकि, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सरकार के फैसले का बचाव करते हुए टेलीग्राम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि परीक्षा प्रक्रिया की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है.

जांच और निगरानी जारी

फिलहाल टेलीग्राम पर लगा प्रतिबंध 22 जून तक प्रभावी रहेगा. सरकार का मानना है कि पुनर्परीक्षा के दौरान किसी भी प्रकार की गड़बड़ी रोकने और परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक है. वहीं, टेलीग्राम का कहना है कि वह कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सहयोग जारी रखेगा और अवैध गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करता रहेगा.
 


यस बैंक लोन असाइनमेंट मामले में ED का एक्शन, पूर्व कर्मचारी जांच के घेरे में; 17 ठिकानों पर छापेमारी

इस मामले में ED दिल्ली, मुंबई और खंडाला में एक साथ रेड, लोन ट्रांजैक्शंस में वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रही है.

Last Modified:
Wednesday, 17 June, 2026
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प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मंगलवार को कथित बैंक लोन असाइनमेंट मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए दिल्ली, मुंबई और खंडाला में 17 स्थानों पर छापेमारी की. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जांच एजेंसी की यह कार्रवाई YES Bank से जुड़े कथित फर्जी ऋण हस्तांतरण (Loan Assignment) मामले में की गई है. जांच के दायरे में बैंक का एक पूर्व कर्मचारी भी आया है.

किन कंपनियों पर है ED की नजर?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईडी ने अपनी तलाशी कार्रवाई के दौरान सुरक्षा एसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी (SARCL), सुरक्षा रियल्टी, ख्याति रियल्टर्स और उनसे जुड़े प्रमोटर्स, निदेशकों तथा कर्मचारियों के परिसरों को निशाना बनाया. एजेंसी इन संस्थाओं और व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर रही है.

क्या है पूरा मामला?

यह जांच वित्त वर्ष 2016-17 और 2017-18 के दौरान मैक्स्टार मार्केटिंग और उससे जुड़ी अन्य कंपनियों के लोन खातों के असाइनमेंट से संबंधित है. ईडी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या इन ऋणों के हस्तांतरण की प्रक्रिया में वित्तीय अनियमितताएं हुईं या फिर धन शोधन निवारण कानून (PMLA) के प्रावधानों का उल्लंघन किया गया.

दस्तावेजों और डिजिटल डेटा की जांच

जांच एजेंसी कथित लेन-देन से जुड़े दस्तावेजों, वित्तीय रिकॉर्ड, डिजिटल डेटा और संचार माध्यमों की बारीकी से जांच कर रही है. रिपोर्ट्स के अनुसार, एक साथ कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाकर साक्ष्य जुटाने की कोशिश की गई है.

बैंक अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में

ईडी यह भी जांच कर रही है कि लोन असाइनमेंट प्रक्रिया में कंपनी अधिकारियों, बैंक कर्मचारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों की क्या भूमिका रही. एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या किसी बैंक अधिकारी या बाहरी संस्था को इन लेन-देन से अनुचित लाभ पहुंचा या उन्होंने कथित अनियमितताओं को बढ़ावा दिया.

अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं

फिलहाल इस मामले में किसी गिरफ्तारी की सूचना नहीं है. ईडी ने तलाशी के दौरान जब्त किए गए दस्तावेजों और अन्य सामग्रियों की जांच शुरू कर दी है. एजेंसी के अनुसार, साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा. जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले से जुड़े और महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं.


लाल किला विस्फोट मामले में NIA का आरोपपत्र दाखिल, अल-कायदा की साजिश का दावा

एनआईए का कहना है कि यह नेटवर्क देश में बड़े पैमाने पर हमलों की योजना बना रहा था, लेकिन समय रहते इसे रोक दिया गया. अब तक इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.

Last Modified:
Saturday, 16 May, 2026
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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने दिल्ली के लाल किला इलाके में हुए कार बम विस्फोट मामले में 10 आरोपियों के खिलाफ लगभग 7,500 पन्नों का आरोपपत्र विशेष अदालत में दाखिल किया है. एजेंसी के अनुसार यह हमला पिछले वर्ष हुआ था, जिसमें 11 लोगों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे.

विस्फोट की साजिश और जांच

जांच एजेंसी का कहना है कि यह विस्फोट 10 नवंबर 2025 को हाई-इंटेंसिटी व्हीकल-बॉर्न इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (VBIED) के जरिए किया गया था. धमाके से क्षेत्र में भारी तबाही और जान-माल का नुकसान हुआ.

आरोपपत्र पटियाला हाउस कोर्ट स्थित विशेष एनआईए अदालत में दाखिल किया गया. एजेंसी ने आरोप लगाया है कि सभी 10 आरोपी आतंकी संगठन “अंसार गजवत-उल-हिंद” (Ansar Ghazwat-ul-Hind) से जुड़े थे, जिसे वह अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (Al-Qaeda in the Indian Subcontinent) की शाखा बताती है.

‘जिहादी साजिश’ का आरोप

एनआईए के अनुसार यह पूरा मामला एक बड़े “जिहादी षड्यंत्र” का हिस्सा है, जिसकी योजना और क्रियान्वयन वैज्ञानिक और फॉरेंसिक जांच के जरिए सामने आया. एजेंसी का यह भी दावा है कि कुछ आरोपी “कट्टरपंथी मेडिकल प्रोफेशनल्स” थे, जिन्हें अंसार गजवत-उल-हिंद और अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट की विचारधारा से प्रभावित किया गया था.

मुख्य आरोपी और नेटवर्क

आरोपपत्र में मुख्य साजिशकर्ता के रूप में डॉ. उमर उन नबी का नाम शामिल है. वह पुलवामा के निवासी और पहले Al-Falah University में सहायक प्रोफेसर रह चुके थे. हालांकि उनकी मृत्यु हो चुकी है, इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त करने की सिफारिश की गई है.

अन्य आरोपियों में आमिर राशिद मीर, जसिर बिलाल वानी, डॉ. मुज़म्मिल शकील, डॉ. आदिल अहमद राथर, डॉ. शाहीन सईद, मुफ्ती इरफान अहमद वागे, सोयाब, डॉ. बिलाल नसीर मल्ला और यासिर अहमद डार शामिल हैं.

जांच में दावा किया गया है कि 2022 में एक गुप्त बैठक श्रीनगर में हुई थी, जिसके बाद यह समूह फिर से सक्रिय हुआ. यह बैठक उस समय हुई जब सदस्य तुर्किए के रास्ते अफगानिस्तान जाने की कोशिश में असफल रहे थे.

हथियार, विस्फोटक और ड्रोन प्रयोग

एनआईए के अनुसार आरोपी समूह ने हथियार इकट्ठा किए, प्रचार फैलाया और रसायनों की मदद से विस्फोटक तैयार किए. जांच में यह भी सामने आया कि उन्होंने कई तरह के IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) विकसित और परीक्षण किए.

एजेंसी का दावा है कि रेड फोर्ट हमले में इस्तेमाल विस्फोटक TATP (Triacetone Triperoxide) था, जिसे रासायनिक पदार्थों के जरिए प्रयोगात्मक रूप से तैयार किया गया था.

इसके अलावा आरोपियों पर AK-47, Krinkov राइफल और देसी पिस्तौल जैसे हथियारों की अवैध खरीद का भी आरोप है.

जांच में यह भी सामने आया कि समूह ने ड्रोन आधारित और रॉकेट-आधारित IED बनाने के प्रयोग किए, खासकर जम्मू-कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में, जिनका उद्देश्य सुरक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना था.

जांच का दायरा

एनआईए ने बताया कि यह जांच हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली एनसीआर सहित कई राज्यों में की गई. मामले में 588 गवाहों के बयान, 395 से अधिक दस्तावेज और 200 से ज्यादा जब्त वस्तुएं शामिल हैं. एजेंसी ने यह भी कहा कि डॉ. उमर उन नबी की पहचान डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के जरिए की गई. जांच अभी जारी है और फरार आरोपियों की तलाश की जा रही है.

एनआईए का कहना है कि यह नेटवर्क देश में बड़े पैमाने पर हमलों की योजना बना रहा था, लेकिन समय रहते इसे रोक दिया गया. अब तक इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.
 


ईडी का बड़ा एक्शन: फर्जी GST बिल मामले में पंजाब सरकार के मंत्री संजीव अरोड़ा गिरफ्तार

सूत्रों के अनुसार यह कार्रवाई कथित फर्जी GST खरीद, मनी लॉन्ड्रिंग और निर्यात से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच के तहत की गई.

Last Modified:
Saturday, 09 May, 2026
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पंजाब सरकार में स्थानीय निकाय एवं संसदीय कार्य मंत्री संजीव अरोड़ा के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है. सूत्रों के मुताबिक 100 करोड़ रुपये से अधिक के कथित फर्जी जीएसटी (GST) बिल, इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी ने चंडीगढ़, दिल्ली और गुरुग्राम समेत कई ठिकानों पर छापेमारी की. लंबी पूछताछ के बाद अरोड़ा को हिरासत में लिए जाने की चर्चा तेज है, हालांकि एजेंसी की ओर से आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं की गई है.

सुबह 7 बजे शुरू हुई छापेमारी

जानकारी के अनुसार, शुक्रवार सुबह करीब सात बजे ईडी की कई टीमों ने एक साथ कार्रवाई शुरू की. चंडीगढ़ स्थित सेक्टर-2 आवास के अलावा दिल्ली, गुरुग्राम और अन्य ठिकानों पर भी तलाशी अभियान चलाया गया. सुरक्षा व्यवस्था के लिए सीआईएसएफ और सीआरपीएफ के जवान तैनात रहे. ईडी अधिकारियों ने कई घंटों तक वित्तीय दस्तावेजों, कारोबारी लेनदेन और डिजिटल रिकॉर्ड की गहन जांच की.

फर्जी GST बिल और ITC घोटाले की जांच

सूत्रों के मुताबिक यह कार्रवाई कथित फर्जी GST खरीद, मनी लॉन्ड्रिंग और निर्यात से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच के तहत की गई. जांच एजेंसी को संदेह है कि मोबाइल फोन कारोबार से जुड़े फर्जी बिलों के जरिए करोड़ों रुपये का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) और GST रिफंड हासिल किया गया. ईडी अब दुबई से जुड़े कथित फंड ट्रांजैक्शन और राउंड ट्रिपिंग एंगल की भी जांच कर रही है.

देर रात हिरासत की चर्चा तेज

दिनभर चली कार्रवाई के बाद देर शाम राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि ईडी ने संजीव अरोड़ा को हिरासत में ले लिया है. हालांकि आधिकारिक स्तर पर न तो गिरफ्तारी की पुष्टि की गई और न ही विस्तृत बयान जारी किया गया. सूत्रों का कहना है कि आगे की पूछताछ के लिए उन्हें दिल्ली ले जाया जा सकता है.

पंजाब की राजनीति में बढ़ी हलचल

ईडी की कार्रवाई के बाद पंजाब की राजनीति गरमा गई है. आम आदमी पार्टी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है. वहीं विपक्षी दल लगातार सरकार पर सवाल उठा रहे हैं. मुख्यमंत्री भगवंत मान पहले भी केंद्र सरकार और भाजपा पर केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगा चुके हैं. दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि यदि जांच हो रही है तो सच्चाई सामने आनी चाहिए.

अगले 24 घंटे अहम

सूत्रों के अनुसार, आने वाले 24 घंटों में ईडी इस मामले में आधिकारिक जानकारी साझा कर सकती है. फिलहाल पूरे घटनाक्रम पर पंजाब की राजनीति और कारोबारी जगत की नजरें टिकी हुई हैं.
 


ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग जांच में रिलायंस के दो पूर्व अधिकारियों को किया गिरफ्तार

ईडी ने अपनी जांच में पाया कि अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों ने कथित रूप से 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग की.

Last Modified:
Thursday, 16 April, 2026
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प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए रिलायंस समूह से जुड़े दो पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार किया है. यह मामला कथित लोन फ्रॉड और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा हुआ है.

ईडी के अनुसार, अमिताभ झुनझुनवाला और अमित बापना को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत हिरासत में लिया गया है. यह कार्रवाई केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा पहले दर्ज की गई कई एफआईआर के आधार पर की गई है.

किन कंपनियों से जुड़ा है मामला

सीबीआई की जांच में सामने आया कि यह मामला रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) और रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड (RCFL) से जुड़ा है. इन कंपनियों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं और बैंक फंड के दुरुपयोग के आरोप हैं.

₹40,000 करोड़ से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप

ईडी ने अपनी जांच में पाया कि अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों ने कथित रूप से 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग की. एजेंसी ने अब तक लगभग 17,000 करोड़ रुपये की संपत्तियां अस्थायी रूप से जब्त की हैं. इसमें मुंबई स्थित अनिल अंबानी का करीब 3,700 करोड़ रुपये का आवास भी शामिल है.

अनिल अंबानी से भी हो चुकी है पूछताछ

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जांच एजेंसियों ने अनिल अंबानी से कई बार पूछताछ की है. हालांकि, उनका कहना है कि उन्होंने वर्ष 2017 में संबंधित कंपनियों के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था.

झुनझुनवाला और बापना की भूमिका

अमिताभ झुनझुनवाला, जो रिलायंस अनिल अंबानी ग्रुप के पूर्व ग्रुप मैनेजिंग डायरेक्टर और रिलायंस कैपिटल के वाइस चेयरमैन रह चुके हैं, पहले भी जांच एजेंसियों के रडार पर रहे हैं. जांचकर्ताओं का मानना है कि उन्होंने RHFL और RCFL से जुड़े वित्तीय फैसलों में अहम भूमिका निभाई. वहीं, अमित बापना रिलायंस फाइनेंस में एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में कार्यरत थे.

कैसे हुआ घोटाला

ईडी के अनुसार, RHFL और RCFL ने कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों से जनता का पैसा जुटाया, जिसमें से 11,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बाद में एनपीए (Non-Performing Assets) में बदल गई. जांच में यह भी सामने आया कि इस धन को शेल कंपनियों के नेटवर्क के जरिए अन्य रिलायंस समूह की कंपनियों में ट्रांसफर किया गया, जिनकी वित्तीय स्थिति बेहद कमजोर थी और जिनका कोई ठोस व्यवसाय नहीं था.

किन बैंकों ने दर्ज कराई शिकायत

ईडी ने यह मामला जुलाई 2025 में दर्ज किया था, जो यस बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ महाराष्ट्र की शिकायतों पर आधारित था. सीबीआई ने कंपनियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के उल्लंघन के तहत मामला दर्ज किया है.

ईडी की आगे की कार्रवाई

मार्च 2026 में ईडी ने इस पूरे मामले में पैसे की हेराफेरी के तरीके (मोडस ऑपरेंडी) का खुलासा किया था और संपत्तियों को जब्त करने का आदेश जारी किया था. एजेंसी ने कहा है कि वह वित्तीय अपराधों के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखेगी और अवैध संपत्तियों को उनके वास्तविक हकदारों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है.
 


ईडी ने I-PAC के सह-संस्थापक विनेश चंदेल को पश्चिम बंगाल कोयला घोटाले में किया गिरफ्तार

ईडी की यह गिरफ्तारी कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की परतें खोलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. एजेंसी इस मामले में शामिल अन्य लोगों की पहचान और नेटवर्क के विस्तार को समझने की कोशिश कर रही है.

Last Modified:
Tuesday, 14 April, 2026
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प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने राजनीतिक परामर्श फर्म इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी के सह-संस्थापक विनेश चंदेल को पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित कोयला घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया है. यह कार्रवाई प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई है. यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा नवंबर 2020 में दर्ज की गई एफआईआर से जुड़ा है. इसमें पश्चिम बंगाल में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की खदानों से बड़े पैमाने पर कोयले की चोरी का आरोप लगाया गया था. जांच में अवैध खनन और कोयले की हेराफेरी से जुड़े नेटवर्क की पड़ताल की जा रही है.

PMLA के तहत गिरफ्तारी

ईडी ने विनेश चंदेल को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के प्रावधानों के तहत दिल्ली में हिरासत में लिया. उन्हें जल्द ही विशेष अदालत में पेश किया जाएगा. एजेंसी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कमाई के प्रवाह की जांच कर रही है.

वित्तीय लेन-देन की जांच पर फोकस

ईडी की जांच का मुख्य फोकस कथित अपराध से जुड़े पैसों के लेन-देन और उनकी ट्रेल का पता लगाना है. एजेंसी यह भी जांच रही है कि कोयला चोरी के नेटवर्क और चंदेल से जुड़े संस्थानों के बीच क्या संबंध हैं. इससे पहले ईडी ने दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई सहित कई स्थानों पर छापेमारी की थी, जहां से वित्तीय दस्तावेज और अन्य साक्ष्य जुटाए गए.

लंबे समय से जांच के दायरे में घोटाला

पश्चिम बंगाल कोयला घोटाला पिछले कई वर्षों से जांच के दायरे में है. इसमें सरकारी खदानों से संगठित तरीके से अवैध कोयला निकालने और बेचने के आरोप हैं. इस मामले में कई व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका की जांच की जा रही है.

ईडी की यह गिरफ्तारी कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की परतें खोलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. एजेंसी इस मामले में शामिल अन्य लोगों की पहचान और नेटवर्क के विस्तार को समझने की कोशिश कर रही है.


फर्जी बीमा पॉलिसी मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, NIC के CMD समेत कर्मचारियों को आरोपी बनाने का आदेश

यह फैसला बीमा क्षेत्र में जवाबदेही तय करने और फर्जीवाड़े पर रोक लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

Last Modified:
Friday, 03 April, 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी बीमा पॉलिसी से जुड़े एक गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए नेशनल इंश्योरेंस कंपनी (NIC) के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) को आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने का आदेश दिया है. इसके साथ ही कोर्ट ने पूरे मामले की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित करने का आदेश भी दिया.

यह मामला मोटर दुर्घटना से जुड़े एक क्लेम में कथित रूप से फर्जी बीमा पॉलिसी के इस्तेमाल से संबंधित है. जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह आदेश देते हुए बीमा कंपनी की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई.

कंपनी की लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कंपनी खुद यह दावा कर रही थी कि बीमा पॉलिसी फर्जी है, तब भी उसने कोई आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं कराई, जो गंभीर लापरवाही को दर्शाता है. कोर्ट ने इसे “जिम्मेदारी की घोर कमी” बताया.

कोर्ट ने टिप्पणी की कि अब समय आ गया है कि बीमा कंपनियां अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाएं, क्योंकि वे जो भुगतान करती हैं, वह आम जनता के पैसे से होता है.

SIT को सौंपी गई जांच

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को “राष्ट्रीय महत्व का टेस्ट केस” बताते हुए SIT को निर्देश दिया कि वह नया केस दर्ज करे, जिसमें NIC के CMD से लेकर स्थानीय शाखा प्रबंधक तक सभी संबंधित कर्मचारियों को आरोपी बनाया जाए. साथ ही बस के मालिक को भी आरोपी के रूप में शामिल करने को कहा गया है.

कोर्ट ने SIT को निर्देश दिया कि जांच तेजी और गंभीरता से की जाए तथा फर्जी बीमा दस्तावेज तैयार करने की साजिश की गहराई से पड़ताल की जाए.

DGP ने कोर्ट में मांगी माफी

इस मामले में पहले तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को भी कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया गया था. उनके हलफनामे में कहा गया था कि मोटर दुर्घटना मामलों में पुलिस बीमा दस्तावेजों की सत्यता की जांच नहीं करती.

इस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई. शुक्रवार को DGP ने कोर्ट में पेश होकर बिना शर्त माफी मांगी, जिसे बेंच ने स्वीकार कर लिया. उन्होंने बताया कि अब E-DAR और वाहन पोर्टल के जरिए बीमा विवरण का तुरंत और स्वचालित सत्यापन संभव हो गया है.

पीड़ित को जल्द मुआवजा देने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि दुर्घटना पीड़ित को मुआवजा मिलने में और देरी न हो. कोर्ट ने बीमा कंपनी को चार सप्ताह के भीतर सीधे पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश दिया. हालांकि, कंपनी को यह राशि बाद में वाहन के नियंत्रण में रहे व्यक्ति (लीजधारक) से वसूलने की अनुमति दी गई है.

मामला कैसे शुरू हुआ

यह मामला के. सरवनन नामक एक सड़क दुर्घटना पीड़ित से जुड़ा है, जो बस हादसे में घायल हो गए थे. लंबा इलाज और सर्जरी के बाद उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी. उन्होंने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी.

बीमा कंपनी ने दावा पूरी तरह खारिज करते हुए पॉलिसी को अमान्य बताया, लेकिन MACT और बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने कंपनी की दलीलें खारिज कर दीं और मुआवजा देने का आदेश दिया. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

 


हनी सिंह के मुंबई कॉन्सर्ट पर FIR दर्ज, अवैध लेजर लाइट और सुरक्षा चिंताओं के आरोप

बताया जा रहा है कि NDTV से जुड़े इस कार्यक्रम की खबर पहले NDTV Profit की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई थी, लेकिन बाद में वह खबर वहां से हटा दी गई और लिंक खोलने पर “404 Something Went Wrong” दिखने लगा. 

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2026
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मुंबई में मशहूर रैपर और सिंगर यो यो हनी सिंह के NDTV GoodTimes से जुड़े ‘My Story India Tour’ के एक कॉन्सर्ट को लेकर विवाद सामने आया है. जानकारी के मुताबिक, कार्यक्रम में लेजर लाइट के इस्तेमाल से जुड़े नियमों के उल्लंघन के मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की है. इस FIR ने शहर में बड़े सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर बहस को तेज कर दिया है.

कॉन्सर्ट की जानकारी और आयोजन स्थल

यह कॉन्सर्ट 28 मार्च को मुंबई के बांद्रा स्थित एमएमआरडीए ग्राउंड में आयोजित किया गया था. रिपोर्ट्स के अनुसार, शो के दौरान लेजर लाइट्स का इस्तेमाल किया गया, जबकि इसके लिए पहले से निर्धारित सुरक्षा नियमों और दिशानिर्देशों का पालन पूरी तरह नहीं किया गया. स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि संबंधित एजेंसियों की ओर से आयोजकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे, लेकिन उनके उल्लंघन की शिकायत सामने आई. इसके बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने FIR दर्ज की.

लेजर लाइट और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन

कानूनी आरोपों में उच्च-तीव्रता वाली लेजर लाइट का उपयोग शामिल है, जिसके लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी. यह स्थल हवाई मार्ग के पास आता है, जहां ऐसी लाइट के उपयोग पर सख्त नियम हैं. इस तरह की अनियंत्रित लाइट्स से हवाई सुरक्षा को खतरा हो सकता है.

भीड़ नियंत्रण और प्रवेश में अव्यवस्था

कॉन्सर्ट में बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे और प्रवेश द्वार पर अव्यवस्था देखी गई. सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में एक महिला फैन गेट पर चढ़ने की कोशिश करती नजर आई, जिससे सुरक्षा कर्मियों के साथ तकरार हुई. इस मामले ने भीड़ नियंत्रण और एंट्री पॉइंट्स के महत्व को उजागर किया. 

मीडिया में चर्चा

इस मामले का सबसे चर्चित पहलू मीडिया इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बना हुआ है. बताया जा रहा है कि NDTV से जुड़े इस कार्यक्रम की खबर पहले NDTV Profit की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई थी, लेकिन बाद में वह खबर वहां से हटा दी गई और लिंक खोलने पर “404 Something Went Wrong” दिखने लगा. 

FIR में शामिल आरोप

पुलिस ने आयोजकों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिसमें निम्नलिखित आरोप शामिल हैं.
1. अवैध लेजर लाइट का उपयोग जो हवाई सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करता है
2. सुरक्षा नियमों और दिशानिर्देशों का पालन न करना
3. भीड़ नियंत्रण में लापरवाही

जांच यह निर्धारित करेगी कि किन परिस्थितियों में नियमों का उल्लंघन हुआ और क्या आयोजकों ने आवश्यक अनुमति ली थी.

आयोजकों और प्रदर्शन की प्रतिक्रिया

कॉन्सर्ट का प्रदर्शन हाई एनर्जी और दर्शकों में लोकप्रिय रहा, जिसमें हनी सिंह ने अपने कई हिट गानों से मनोरंजन किया. लेकिन यह कानूनी मामला अब विवाद का मुख्य केंद्र बन गया है, जिससे कॉन्सर्ट की सफलता पर सवाल उठे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े आयोजन जैसे लाइव कॉन्सर्ट में सुरक्षा मानकों का पालन और भीड़ प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर हवाई मार्ग के पास के क्षेत्रों में.

पुलिस अब अनुमतियों, सुरक्षा प्रोटोकॉल और आयोजन के दौरान निर्णयों के दस्तावेज़ों की गहन जांच करेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं. जांच के आधार पर आयोजकों और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की संभावना बनी हुई है.