NSE डेटा चोरी में इनसाइडरों ने सालों तक फायदे लिए, लेकिन CBI ने जांच बिना कार्रवाई के बंद कर दी और न्याय अधूरा रह गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
"मेरे पास एक टीबीटी लाइन है और मैं इसे दूसरों की तुलना में तेजी से प्रोसेस कर सकता हूं. क्या हम लेटेंसी-आधारित आर्ब कर सकते हैं?"
यह कोई यूं ही कही गई बात नहीं थी. यह 2011 में कृष्णा डागली द्वारा नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के एक वरिष्ठ अधिकारी सुप्रभात लाला को लिखा गया ईमेल था. ऊपर से यह वाक्य तकनीकी लग सकता है, ऐसा जार्गन जो मार्केट इनसाइडर्स के इनबॉक्स में भरा होता है. लेकिन असल में, ये 16 शब्द एक कबूलनामा थे, भारत के वित्तीय रत्न तक एक गुप्त रास्ते की सीधी स्वीकारोक्ति.
यह ईमेल, और इससे पहले और बाद में आए कई अन्य ईमेल, एक ऐसा दस्तावेजी सबूत बनते हैं जो आधुनिक भारत की सबसे दुस्साहसी वित्तीय साजिश को उजागर करने के लिए पर्याप्त थे. एनएसई से मिल रहा टिक-बाय-टिक (टीबीटी) डेटा ट्रेडिंग सूचना की सबसे शुद्ध और मूल्यवान धारा को एक छोटे से समूह द्वारा चुराया जा रहा था, दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा था, और इसका फायदा उठाया जा रहा था. इस समूह की अगुवाई कर रहे थे अर्थशास्त्री अजय शाह, उनकी पत्नी सुसान थॉमस, और उनकी बहन सुनीता थॉमस. यह कोई शोध नहीं था. यह कोई अकादमिक अध्ययन नहीं था. यह चोरी योजनाबद्ध, जानबूझकर की गई, और आश्चर्यजनक पैमाने पर थी.
सेबी की टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी ने, 2016 में संसद में प्रस्तुत की गई रिपोर्ट और डेलॉयट फॉरेंसिक ऑडिट में उद्धृत निष्कर्ष में कहा कि टीबीटी आर्किटेक्चर 'छल करने योग्य' था क्योंकि डेटा को क्रम में प्रसारित किया जाता था.
और फिर भी, 2025 में, लगभग एक दशक की जांच के बाद, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने एक क्लोजर रिपोर्ट दायर की. आरोपित ईमेल्स के बावजूद. आयकर विभाग की हजार पन्नों की मूल्यांकन रिपोर्ट के बावजूद. सेबी की अपनी ही अवैध एक्सेस की रिपोर्ट के बावजूद. मामला बंद कर दिया गया, आरोपियों को निर्दोष करार दे दिया गया, और भारत के निवेशकों को विश्वासघात का स्वाद चखाया गया.
यह एक डेटा हीस्ट की संरचना है. और एक पतन की भी न कि किसी स्टॉक मार्केट का, बल्कि जवाबदेही का
ईमेल्स का फुसफुसाता नेटवर्क
कहानी की शुरुआत इससे कहीं पहले, 2006 में, एक और आम-से दिखने वाले ईमेल से होती है.
"हमने 9 महीनों की अवधि में अच्छी मात्रा में टिक डेटा इकट्ठा कर लिया है… क्या आप सुझाव दे सकते हैं कि हम इस टीबीटी डेटा और R के साथ क्या कर सकते हैं?"
यह पंक्ति, डागली द्वारा अजय शाह को भेजी गई, किसी छात्र की मासूम सलाह नहीं थी. यह एक चैनल की शुरुआत थी, एक ऐसा द्वार जो एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग की दुनिया में खुलता था जब भारत में अभी इस शब्द की चर्चा भी नहीं थी. शाह, एक प्रतिष्ठित अकादमिक और यूपीए शासनकाल के दौरान वित्त मंत्रालय के सलाहकार, को इस गोपनीय डेटा के आसपास भी नहीं होना चाहिए था. लेकिन ईमेल्स दिखाते हैं कि न सिर्फ उनके पास यह डेटा था, बल्कि वे दूसरों को सिखा भी रहे थे कि कैसे इसे एक हथियार में बदला जाए.
यह सिर्फ डींगें नहीं थीं. यह सेबी की बाद की रिपोर्ट से लगभग पूरी तरह मेल खाता था: "एनएसई का टिक-बाय-टिक डेटा वितरण संरचना… छेड़छाड़ या बाज़ार के दुरुपयोग की संभावना लिए हुए थी" (सेबी की संसद में टिप्पणी, 2016).
2009 तक, गोपनीयता स्पष्ट हो गई थी. शाह ने अपने सहयोगियों को लिखा:
"लेकिन आपको हर किसी से यह वादा लेना होगा कि हम जो डेटा एनएसई से VIX (वोलैटिलिटी इंडेक्स) और LIX (लिक्विडिटी रिस्क इंडेक्स) के लिए ले रहे हैं, उसे एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग कार्य के लिए उपयोग कर रहे हैं,अगर यह तथ्य उजागर हो गया तो यह एक गंभीर समस्या होगी क्योंकि एनएसई ने किसी और को यह डेटा नहीं दिया है."
यह कोई चूक नहीं थी. यह एक लिखित स्वीकारोक्ति थी कि डेटा का दुरुपयोग हो रहा था, दूसरों को यह डेटा उपलब्ध नहीं था, और एनएसई के नियम तोड़े जा रहे थे.
ऐसे ईमेल्स अभियोजक के लिए किसी सपने जैसे होने चाहिए थे, एक के बाद एक कबूलनामे की कड़ी. लेकिन आपराधिक मामले की नींव बनने के बजाय, इन्हें नज़रअंदाज़ किया गया, कमजोर किया गया, और अंततः दफन कर दिया गया.
पर्दा उठता है: अंदरूनी लोगों की मंडली
इस योजना के केंद्र में एक मजबूत आपसी गठबंधन था:
• अजय शाह: अर्थशास्त्री, नीति सलाहकार, वित्त मंत्रालय के अंदरूनी व्यक्ति.
• सुसान थॉमस: उनकी पत्नी, IGIDR में रिसर्च प्रोफेसर, रणनीतियों की सह-निर्माता.
• सुनीता थॉमस: सुसान की बहन, इंफोटेक फाइनेंशियल्स (IFPL) चलाने वाली, जिससे डेटा और रणनीतियाँ बाजार तक पहुंचती थीं. IGIDR परिसर में सुसान थॉमस के ही पते पर रहने वाली.
• सुप्रभात लाला: एनएसई अधिकारी, सुनीता के पति, वह व्यक्ति जिसने दरवाजे खुले रखे.
2000 के दशक की शुरुआत में, अजय शाह कोई साधारण अकादमिक नहीं थे. कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान वित्त मंत्रालय के सलाहकार होने के नाते वे भारत की वित्तीय अभिजात्य वर्ग में शुमार थे. उनकी पत्नी, सुसान थॉमस, एक फर्जी पीएचडी डिग्री के साथ इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च (IGIDR) में रिसर्च प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थीं, उनकी बौद्धिक साथी. उनके इरादे तेज, और महत्वाकांक्षाएं उससे भी तेज.
सुसान की बहन सुनीता थॉमस, जो एनएसई के वरिष्ठ अधिकारी सुप्रभात लाला की पत्नी थीं, के साथ मिलकर उन्होंने एक अजेय त्रिकोण बना लिया, एक ऐसा सिंडिकेट जिसके पास एनएसई के आंतरिक गलियारों तक बेजोड़ पहुंच थी. इन्हें एक भव्य डकैती के वास्तुकार की तरह कल्पना कीजिए, न कि सोने या हीरे की, बल्कि डिजिटल युग की सबसे कीमती चीज की डेटा की. उनका हथियार? गुप्त टीबीटी डेटा की पाइपलाइन, स्टॉक मार्केट का जीवनरक्त, जो हर ट्रेड, हर कीमत, हर पेंडिंग ऑर्डर की रियल-टाइम जानकारी देता था.
यह कोई ताबड़तोड़ चोरी नहीं थी. यह एक धीमी, योजनाबद्ध लीक थी, जिसे एक सिम्फनी जैसी सटीकता से अंजाम दिया गया. शाह का 2009 का ईमेल, जिसमें गोपनीयता की गुहार थी, दांव को स्पष्ट करता है: यह डेटा, जिसमें VIX और LIX शामिल थे, एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग सिस्टम्स में डाला जा रहा था, जिससे शाह के नेटवर्क को एक ऐसी बढ़त मिल रही थी जिसकी बाकी बाजार प्रतिभागी कल्पना भी नहीं कर सकते थे. यह ईमेल कोई एकल घटना नहीं थी; यह एक दशक लंबे ऑपरेशन की झलक थी, जिसकी शुरुआत 2006 में ही हो चुकी थी, जब शाह और उनके सहयोगी कृष्णा डागली ने टीबीटी डेटा के दोहन पर बात की थी.
मंच तैयार था, और एनएसई (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज), जानबूझकर या अनजाने में, उनका अनचाहा सहयोगी बन गया. उन्होंने एनएसई तक अपनी पहुंच का उपयोग शैक्षणिक अनुसंधान के लिए नहीं, बल्कि बाजार में बढ़त पाने के लिए किया. IFPL के माध्यम से कुछ लोगों को ऐसी ट्रेडिंग रणनीतियाँ मिलीं, जिन्होंने उन्हें दूसरों से कुछ मिलीसेकंड पहले सौदे करने का मौका दिया और यही थोड़ी-सी बढ़त उन्हें करोड़ों कमाने में मदद कर गई.
ईमेल्स ने एक ठंडे सच के साथ कहानी को बताया. शाह ने 2009 में सुनीता को निर्देश दिया कि एक कर्मचारी अनुपम को "ट्रेडिंग रणनीतियों पर काम करने के लिए लगाया जाए, जो सभी एल्गोरिदम ट्रेडिंग कार्यों में जा सकती हैं." डागली ने 2011 में दावा किया कि उसके पास दूसरों की तुलना में तेज़ टीबीटी लाइन थी. यह कोई आकस्मिक रिसाव नहीं था. यह एक संगठित पाइपलाइन थी, जो एक दशक से अधिक समय तक बहती रही और शाह, उनकी पत्नी सुसान थॉमस और उसकी बहन सुनीता थॉमस ने कथित तौर पर एनएसई, भारत के वित्तीय रत्न, से संवेदनशील ट्रेडिंग डेटा को चुराने की एक निर्लज्ज योजना को अंजाम दिया.
फिर भी, एक ऐसे मोड़ में जो विश्वास से परे है, भारत की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई, जिसे दोषियों को न्याय दिलाने का काम सौंपा गया था, 2025 में एक क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करके बुरी तरह विफल हो गई, जिससे मास्टरमाइंड्स पर कोई आरोप नहीं लगा. यह महत्वाकांक्षा, अंदरूनी पहुंच और विश्वासघात की एक चौंकाने वाली कहानी है, जहाँ सीबीआई की विफलता भारत की वित्तीय अखंडता पर एक लंबी छाया डालती है.
डिजिटल सोने की खान
इसकी विशालता को समझने के लिए कल्पना करें कि एनएसई के ट्रेडिंग फ्लोर के नीचे सोने की एक नदी बह रही हो, टिक-बाय-टिक बाजार डेटा की एक धारा, हर कीमत, हर ऑर्डर, हर रद्दीकरण, वास्तविक समय में दर्ज. वह डेटा संरक्षित किया जाना था, किसी के साथ साझा नहीं किया जाना था, जब तक कि 2017–18 में सेबी ने अंततः समान पहुंच को अनिवार्य नहीं कर दिया.
लेकिन शाह का नेटवर्क 2006 से ही उस नदी से पी रहा था. दस साल से अधिक समय तक, उनके पास विशेष, अवैध पहुंच थी उस डेटा तक जिसके लिए देश का हर ट्रेडर जान देने को तैयार होता.
ईमेल्स यह साबित करते हैं कि वे जानते थे कि उनके पास क्या था. “क्या हम लेटेंसी-आधारित आर्ब कर सकते हैं?” डागली ने पूछा. लेटेंसी आर्बिट्राज बाजार डेटा में सूक्ष्म विलंब का फायदा उठाना एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग का पवित्र कंघी है. जवाब स्पष्ट था: हाँ.
यह शोध नहीं था. यह डकैती थी लेकिन डेटा की, नकद की नहीं.
सेबी की नरमी, एनएसई की मौन संलिप्तता
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने जांच की. उसने पाया कि अजय शाह को एनएसई से तथाकथित "शोध समझौतों" के तहत डेटा मिल रहा था. लेकिन ये समझौते बिना तारीख के, बिना नोटरी के और कानूनी रूप से बेकार थे. एक सेबी के पूर्णकालिक सदस्य ने उन्हें “कानूनी मूल्यहीन कागजों का पुलिंदा” कहकर खारिज कर दिया. फिर भी सेबी ने उन्हें धोखाधड़ी करार नहीं दिया.
एनएसई के शीर्ष अधिकारियों पूर्व एमडी रवि नारायण और चित्रा रामकृष्णा की संलिप्तता ने आग में घी का काम किया. सेबी के निष्कर्षों के अनुसार, नारायण और रामकृष्णा ने 2012 तक किसी भी औपचारिक समझौते के बिना, शोध के नाम पर शाह को डेटा ट्रांसफर करने में मदद की. यहाँ तक कि जब समझौते किए गए, तब भी वे संदिग्ध थे, बिना तारीख, बिना नोटरी प्रमाणीकरण या कानूनी वैधता के. एक्सचेंज के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी, रवि आप्टे, ने सेबी को स्वीकार किया कि उन्होंने अपने बॉस के मौखिक आदेश पर शाह को डेटा साझा किया, यह मानते हुए कि एक गोपनीयता समझौता मौजूद था. एनएसई की ढीली निगरानी एक खुला घाव थी, और शाह के नेटवर्क ने उसे सटीकता से भुनाया.
सुसान थॉमस, यद्यपि इस योजना की मुख्य कड़ी थीं, फिर भी बिना किसी खरोंच के बाहर निकल गईं. एक्सेस से लेकर विश्लेषण तक और रणनीति डिजाइन तक हर चरण में उनकी भागीदारी होने के बावजूद, सेबी के अंतिम आदेशों में उनका नाम मुश्किल से आता है. एनएसई को भी एक हल्की सी नियामकीय डाँट के अलावा कुछ नहीं मिला.
यह प्रवर्तन के रूप में पेश की गई नरमी थी, एक ऐसी अनुपस्थिति जिसने सीबीआई के लिए आगे की कार्यवाही को और कठिन बना दिया.
धुँआधार सबूत और गिरावट
आयकर विभाग ने भारी काम किया था. उसकी 1,000 पन्नों की मूल्यांकन रिपोर्ट में शाह के पास संवेदनशील कैबिनेट दस्तावेज़ों की मौजूदगी, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के कथित उल्लंघन, विवादास्पद व्यक्तियों के पक्ष में ईमेल्स, और सबसे गंभीर रूप से, एनएसई डेटा चोरी में उनकी भूमिका का उल्लेख था.
सीबीआई के पास सब कुछ था. ईमेल्स. मूल्यांकन रिपोर्ट. सेबी के निष्कर्ष.
फिर भी, 2025 में, एजेंसी ने एक क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की. कोई आरोप नहीं. कोई गिरफ्तारी नहीं. कोई जवाबदेही नहीं. 2025 की क्लोजर रिपोर्ट में सीबीआई ने दावा किया कि उसे “आपराधिक इरादे को साबित करने के लिए अपर्याप्त सामग्री” और “ट्रेडिंग सिस्टम के वास्तविक समझौते का कोई प्रमाण” नहीं मिला.
इससे पहले, दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में सीबीआई की प्रारंभिक चार्जशीट की आलोचना की थी कि उसमें मजबूती और प्रक्रियात्मक कठोरता की कमी थी. लेकिन इस बार, अदालत ने क्लोजर स्वीकार कर लिया, यह कहते हुए: “उपलब्ध डेटा ... ट्रेडिंग सदस्यों के किसी ऐसे ट्रेडिंग पैटर्न को स्थापित नहीं करता जिसे रिपोर्ट करने योग्य माना जा सके...” (राउज एवेन्यू कोर्ट आदेश, 25 अगस्त 2025). दूसरे शब्दों में: ईमेल्स, वास्तु दोष, सलाहकार रिपोर्ट्स, आयकर निष्कर्ष, इन सबको आगे की कार्यवाही के लिए अपर्याप्त माना गया.
क्या मामले का बंद होना वित्तीय अपराधों की जटिलता को दर्शाता है, या क्या सबूत अभियोजन के मानक तक नहीं पहुँचे? उत्तर चाहने वालों के लिए यह प्रश्न अनुत्तरित है. जब एक हस्ताक्षरित कबूलनामा सामने पड़ा हो, और जांचकर्ता पीछे हट जाए, तो जनता क्या निष्कर्ष निकाले?
प्रभाव और रहस्यों का जाल
शाह का प्रभाव एनएसई से भी आगे तक फैला था. आयकर रिपोर्ट का आरोप है कि उनके पास संवेदनशील सरकारी दस्तावेज़, जिसमें कैबिनेट नोट्स शामिल थे, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (OSA) का उल्लंघन करते हुए पाए गए. ये दस्तावेज़, जो स्टॉक कीमतों को प्रभावित कर सकते थे, छापों के दौरान उनके पास पाए गए, साथ ही उन ईमेल्स के साथ जिनमें उन्होंने उमर खालिद और रिलिगेयर हेल्थकेयर इंश्योरेंस जैसी संस्थाओं के पक्ष में पैरवी की बात की थी. एक ईमेल में तो यह भी दावा किया गया कि शाह ने वरिष्ठ नौकरशाहों से मुलाकात की ताकि “खालिद को फंसाए जाने से बचाया जा सके.” यह केवल डेटा चोरी नहीं थी; यह एक शक्ति का खेल था, जहाँ शाह ने अपने अंदरूनी दर्जे का उपयोग करके बाजार और नीति दोनों को अपने अनुसार मोड़ने की कोशिश की.
बाजार से विश्वासघात
ईमेल्स, जो डिजिटल युग के मौन गवाह होते हैं, ने पूरी कहानी बता दी. डागली की टीबीटी लाइन की शेखी से लेकर शाह की चुप्पी की याचना तक, और ट्रेडिंग रणनीतियों के खाके तक सबूत वहाँ थे.
लेकिन जिन संस्थानों को बाजार की अखंडता की रक्षा करनी थी, वे बुरी तरह विफल रहीं. सेबी की आधी-अधूरी कोशिशें, एनएसई की संलिप्तता, और सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट इन सभी ने एक खुले और बंद मामले को एक भूतिया कहानी में बदल दिया.
निवेशकों के लिए सबक भयावह है: सबसे बड़ी डकैतियाँ तिजोरियों में नहीं होतीं. वे ईमेल्स में होती हैं और भारत के सबसे बड़े वित्तीय विश्वासघात में, मास्टरमाइंड्स ने सिर्फ डेटा नहीं चुराया, उन्होंने एक निष्पक्ष बाजार का वादा भी चुरा लिया.
CBI की नाकामी ने सुनिश्चित कर दिया कि अजय शाह और उनका नेटवर्क बिना किसी सजा के आजाद घूमता रहे. उनके सारे राज सलामत और उनकी विरासत अब एक नई कहानी में ढल चुकी है . लेकिन वे अनुत्तरित ईमेल अब भी बाकी हैं . उस साज़िश की गूंज के रूप में, जो भारतीय वित्त व्यवस्था की नींव हिला सकती थी.
"मेरे पास TBT लाइन है और मैं इसे दूसरों से तेज़ प्रोसेस कर पा रहा हूँ, क्या हम लेटेंसी-आधारित आर्बिट्राज कर सकते हैं?"
यह सवाल पूछा गया था और अफसोस की बात है जवाब हां था.
CBI, जिसे न्याय दिलाने की जिम्मेदारी दी गई थी, ने अपनी जांच बिना किसी ठोस कार्रवाई के समाप्त कर दी.
इस जांच का निष्कर्ष NSE डेटा चोरी को एक ऐसी चेतावनी में बदल देता है, जोकि एक अनियंत्रित ताकत और अनसुलझे सवालों की भयावह कहानी है.
स्त्रोत
1. एल्गो ट्रेडिंग घोटाला और अजय शाह के एनएसई से संबंध (हिंदू बिजनेसलाइन: 7 दिसंबर, 2021)
2. एनएसई को-लोकेशन घोटाला: अजय शाह के खिलाफ आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत दस्तावेज रखने के आरोप में जांच (हिंदू बिजनेसलाइन: 22 जून, 2022)
3. प्रधानमंत्री कार्यालय की सफाई मुहिम में सामने आए एनएसई को-लोकेशन घोटाले के मास्टरमाइंड्स के आधिकारिक संबंध (संडे गार्जियन: 25 जून, 2022)
4. एनएसई के अंदरूनी 'कोजी क्लब' की झलक (15 फरवरी, 2022)
5. कैसे CBI ने एनएसई घोटाले की जांच को बिगाड़ दिया (बिजनेसवर्ल्ड: 21 नवंबर, 2023)
6. सेबी: दया, विफलता और टकराव (बिजनेसवर्ल्ड: 21 सितंबर, 2024)
7. तू गलत निर्णय देगा: सेबी का को-लोकेशन पर फैसला (बिजनेसवर्ल्ड: 21 सितंबर, 2024)
8. मार्केट माफिया: भारत के हाई-टेक स्टॉक मार्केट घोटाले और बच निकले गिरोह का दस्तावेज (7 नवंबर, 2020)
इस मामले में ED दिल्ली, मुंबई और खंडाला में एक साथ रेड, लोन ट्रांजैक्शंस में वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मंगलवार को कथित बैंक लोन असाइनमेंट मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए दिल्ली, मुंबई और खंडाला में 17 स्थानों पर छापेमारी की. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जांच एजेंसी की यह कार्रवाई YES Bank से जुड़े कथित फर्जी ऋण हस्तांतरण (Loan Assignment) मामले में की गई है. जांच के दायरे में बैंक का एक पूर्व कर्मचारी भी आया है.
किन कंपनियों पर है ED की नजर?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईडी ने अपनी तलाशी कार्रवाई के दौरान सुरक्षा एसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी (SARCL), सुरक्षा रियल्टी, ख्याति रियल्टर्स और उनसे जुड़े प्रमोटर्स, निदेशकों तथा कर्मचारियों के परिसरों को निशाना बनाया. एजेंसी इन संस्थाओं और व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर रही है.
क्या है पूरा मामला?
यह जांच वित्त वर्ष 2016-17 और 2017-18 के दौरान मैक्स्टार मार्केटिंग और उससे जुड़ी अन्य कंपनियों के लोन खातों के असाइनमेंट से संबंधित है. ईडी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या इन ऋणों के हस्तांतरण की प्रक्रिया में वित्तीय अनियमितताएं हुईं या फिर धन शोधन निवारण कानून (PMLA) के प्रावधानों का उल्लंघन किया गया.
दस्तावेजों और डिजिटल डेटा की जांच
जांच एजेंसी कथित लेन-देन से जुड़े दस्तावेजों, वित्तीय रिकॉर्ड, डिजिटल डेटा और संचार माध्यमों की बारीकी से जांच कर रही है. रिपोर्ट्स के अनुसार, एक साथ कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाकर साक्ष्य जुटाने की कोशिश की गई है.
बैंक अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में
ईडी यह भी जांच कर रही है कि लोन असाइनमेंट प्रक्रिया में कंपनी अधिकारियों, बैंक कर्मचारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों की क्या भूमिका रही. एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या किसी बैंक अधिकारी या बाहरी संस्था को इन लेन-देन से अनुचित लाभ पहुंचा या उन्होंने कथित अनियमितताओं को बढ़ावा दिया.
अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं
फिलहाल इस मामले में किसी गिरफ्तारी की सूचना नहीं है. ईडी ने तलाशी के दौरान जब्त किए गए दस्तावेजों और अन्य सामग्रियों की जांच शुरू कर दी है. एजेंसी के अनुसार, साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा. जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले से जुड़े और महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं.
एनआईए का कहना है कि यह नेटवर्क देश में बड़े पैमाने पर हमलों की योजना बना रहा था, लेकिन समय रहते इसे रोक दिया गया. अब तक इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने दिल्ली के लाल किला इलाके में हुए कार बम विस्फोट मामले में 10 आरोपियों के खिलाफ लगभग 7,500 पन्नों का आरोपपत्र विशेष अदालत में दाखिल किया है. एजेंसी के अनुसार यह हमला पिछले वर्ष हुआ था, जिसमें 11 लोगों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे.
विस्फोट की साजिश और जांच
जांच एजेंसी का कहना है कि यह विस्फोट 10 नवंबर 2025 को हाई-इंटेंसिटी व्हीकल-बॉर्न इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (VBIED) के जरिए किया गया था. धमाके से क्षेत्र में भारी तबाही और जान-माल का नुकसान हुआ.
आरोपपत्र पटियाला हाउस कोर्ट स्थित विशेष एनआईए अदालत में दाखिल किया गया. एजेंसी ने आरोप लगाया है कि सभी 10 आरोपी आतंकी संगठन “अंसार गजवत-उल-हिंद” (Ansar Ghazwat-ul-Hind) से जुड़े थे, जिसे वह अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (Al-Qaeda in the Indian Subcontinent) की शाखा बताती है.
‘जिहादी साजिश’ का आरोप
एनआईए के अनुसार यह पूरा मामला एक बड़े “जिहादी षड्यंत्र” का हिस्सा है, जिसकी योजना और क्रियान्वयन वैज्ञानिक और फॉरेंसिक जांच के जरिए सामने आया. एजेंसी का यह भी दावा है कि कुछ आरोपी “कट्टरपंथी मेडिकल प्रोफेशनल्स” थे, जिन्हें अंसार गजवत-उल-हिंद और अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट की विचारधारा से प्रभावित किया गया था.
मुख्य आरोपी और नेटवर्क
आरोपपत्र में मुख्य साजिशकर्ता के रूप में डॉ. उमर उन नबी का नाम शामिल है. वह पुलवामा के निवासी और पहले Al-Falah University में सहायक प्रोफेसर रह चुके थे. हालांकि उनकी मृत्यु हो चुकी है, इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त करने की सिफारिश की गई है.
अन्य आरोपियों में आमिर राशिद मीर, जसिर बिलाल वानी, डॉ. मुज़म्मिल शकील, डॉ. आदिल अहमद राथर, डॉ. शाहीन सईद, मुफ्ती इरफान अहमद वागे, सोयाब, डॉ. बिलाल नसीर मल्ला और यासिर अहमद डार शामिल हैं.
जांच में दावा किया गया है कि 2022 में एक गुप्त बैठक श्रीनगर में हुई थी, जिसके बाद यह समूह फिर से सक्रिय हुआ. यह बैठक उस समय हुई जब सदस्य तुर्किए के रास्ते अफगानिस्तान जाने की कोशिश में असफल रहे थे.
हथियार, विस्फोटक और ड्रोन प्रयोग
एनआईए के अनुसार आरोपी समूह ने हथियार इकट्ठा किए, प्रचार फैलाया और रसायनों की मदद से विस्फोटक तैयार किए. जांच में यह भी सामने आया कि उन्होंने कई तरह के IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) विकसित और परीक्षण किए.
एजेंसी का दावा है कि रेड फोर्ट हमले में इस्तेमाल विस्फोटक TATP (Triacetone Triperoxide) था, जिसे रासायनिक पदार्थों के जरिए प्रयोगात्मक रूप से तैयार किया गया था.
इसके अलावा आरोपियों पर AK-47, Krinkov राइफल और देसी पिस्तौल जैसे हथियारों की अवैध खरीद का भी आरोप है.
जांच में यह भी सामने आया कि समूह ने ड्रोन आधारित और रॉकेट-आधारित IED बनाने के प्रयोग किए, खासकर जम्मू-कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में, जिनका उद्देश्य सुरक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना था.
जांच का दायरा
एनआईए ने बताया कि यह जांच हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली एनसीआर सहित कई राज्यों में की गई. मामले में 588 गवाहों के बयान, 395 से अधिक दस्तावेज और 200 से ज्यादा जब्त वस्तुएं शामिल हैं. एजेंसी ने यह भी कहा कि डॉ. उमर उन नबी की पहचान डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के जरिए की गई. जांच अभी जारी है और फरार आरोपियों की तलाश की जा रही है.
एनआईए का कहना है कि यह नेटवर्क देश में बड़े पैमाने पर हमलों की योजना बना रहा था, लेकिन समय रहते इसे रोक दिया गया. अब तक इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.
सूत्रों के अनुसार यह कार्रवाई कथित फर्जी GST खरीद, मनी लॉन्ड्रिंग और निर्यात से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच के तहत की गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पंजाब सरकार में स्थानीय निकाय एवं संसदीय कार्य मंत्री संजीव अरोड़ा के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है. सूत्रों के मुताबिक 100 करोड़ रुपये से अधिक के कथित फर्जी जीएसटी (GST) बिल, इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी ने चंडीगढ़, दिल्ली और गुरुग्राम समेत कई ठिकानों पर छापेमारी की. लंबी पूछताछ के बाद अरोड़ा को हिरासत में लिए जाने की चर्चा तेज है, हालांकि एजेंसी की ओर से आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं की गई है.
सुबह 7 बजे शुरू हुई छापेमारी
जानकारी के अनुसार, शुक्रवार सुबह करीब सात बजे ईडी की कई टीमों ने एक साथ कार्रवाई शुरू की. चंडीगढ़ स्थित सेक्टर-2 आवास के अलावा दिल्ली, गुरुग्राम और अन्य ठिकानों पर भी तलाशी अभियान चलाया गया. सुरक्षा व्यवस्था के लिए सीआईएसएफ और सीआरपीएफ के जवान तैनात रहे. ईडी अधिकारियों ने कई घंटों तक वित्तीय दस्तावेजों, कारोबारी लेनदेन और डिजिटल रिकॉर्ड की गहन जांच की.
फर्जी GST बिल और ITC घोटाले की जांच
सूत्रों के मुताबिक यह कार्रवाई कथित फर्जी GST खरीद, मनी लॉन्ड्रिंग और निर्यात से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच के तहत की गई. जांच एजेंसी को संदेह है कि मोबाइल फोन कारोबार से जुड़े फर्जी बिलों के जरिए करोड़ों रुपये का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) और GST रिफंड हासिल किया गया. ईडी अब दुबई से जुड़े कथित फंड ट्रांजैक्शन और राउंड ट्रिपिंग एंगल की भी जांच कर रही है.
देर रात हिरासत की चर्चा तेज
दिनभर चली कार्रवाई के बाद देर शाम राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि ईडी ने संजीव अरोड़ा को हिरासत में ले लिया है. हालांकि आधिकारिक स्तर पर न तो गिरफ्तारी की पुष्टि की गई और न ही विस्तृत बयान जारी किया गया. सूत्रों का कहना है कि आगे की पूछताछ के लिए उन्हें दिल्ली ले जाया जा सकता है.
पंजाब की राजनीति में बढ़ी हलचल
ईडी की कार्रवाई के बाद पंजाब की राजनीति गरमा गई है. आम आदमी पार्टी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है. वहीं विपक्षी दल लगातार सरकार पर सवाल उठा रहे हैं. मुख्यमंत्री भगवंत मान पहले भी केंद्र सरकार और भाजपा पर केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगा चुके हैं. दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि यदि जांच हो रही है तो सच्चाई सामने आनी चाहिए.
अगले 24 घंटे अहम
सूत्रों के अनुसार, आने वाले 24 घंटों में ईडी इस मामले में आधिकारिक जानकारी साझा कर सकती है. फिलहाल पूरे घटनाक्रम पर पंजाब की राजनीति और कारोबारी जगत की नजरें टिकी हुई हैं.
ईडी ने अपनी जांच में पाया कि अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों ने कथित रूप से 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए रिलायंस समूह से जुड़े दो पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार किया है. यह मामला कथित लोन फ्रॉड और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा हुआ है.
ईडी के अनुसार, अमिताभ झुनझुनवाला और अमित बापना को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत हिरासत में लिया गया है. यह कार्रवाई केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा पहले दर्ज की गई कई एफआईआर के आधार पर की गई है.
किन कंपनियों से जुड़ा है मामला
सीबीआई की जांच में सामने आया कि यह मामला रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) और रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड (RCFL) से जुड़ा है. इन कंपनियों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं और बैंक फंड के दुरुपयोग के आरोप हैं.
₹40,000 करोड़ से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप
ईडी ने अपनी जांच में पाया कि अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों ने कथित रूप से 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग की. एजेंसी ने अब तक लगभग 17,000 करोड़ रुपये की संपत्तियां अस्थायी रूप से जब्त की हैं. इसमें मुंबई स्थित अनिल अंबानी का करीब 3,700 करोड़ रुपये का आवास भी शामिल है.
अनिल अंबानी से भी हो चुकी है पूछताछ
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जांच एजेंसियों ने अनिल अंबानी से कई बार पूछताछ की है. हालांकि, उनका कहना है कि उन्होंने वर्ष 2017 में संबंधित कंपनियों के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था.
झुनझुनवाला और बापना की भूमिका
अमिताभ झुनझुनवाला, जो रिलायंस अनिल अंबानी ग्रुप के पूर्व ग्रुप मैनेजिंग डायरेक्टर और रिलायंस कैपिटल के वाइस चेयरमैन रह चुके हैं, पहले भी जांच एजेंसियों के रडार पर रहे हैं. जांचकर्ताओं का मानना है कि उन्होंने RHFL और RCFL से जुड़े वित्तीय फैसलों में अहम भूमिका निभाई. वहीं, अमित बापना रिलायंस फाइनेंस में एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में कार्यरत थे.
कैसे हुआ घोटाला
ईडी के अनुसार, RHFL और RCFL ने कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों से जनता का पैसा जुटाया, जिसमें से 11,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बाद में एनपीए (Non-Performing Assets) में बदल गई. जांच में यह भी सामने आया कि इस धन को शेल कंपनियों के नेटवर्क के जरिए अन्य रिलायंस समूह की कंपनियों में ट्रांसफर किया गया, जिनकी वित्तीय स्थिति बेहद कमजोर थी और जिनका कोई ठोस व्यवसाय नहीं था.
किन बैंकों ने दर्ज कराई शिकायत
ईडी ने यह मामला जुलाई 2025 में दर्ज किया था, जो यस बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ महाराष्ट्र की शिकायतों पर आधारित था. सीबीआई ने कंपनियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के उल्लंघन के तहत मामला दर्ज किया है.
ईडी की आगे की कार्रवाई
मार्च 2026 में ईडी ने इस पूरे मामले में पैसे की हेराफेरी के तरीके (मोडस ऑपरेंडी) का खुलासा किया था और संपत्तियों को जब्त करने का आदेश जारी किया था. एजेंसी ने कहा है कि वह वित्तीय अपराधों के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखेगी और अवैध संपत्तियों को उनके वास्तविक हकदारों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है.
ईडी की यह गिरफ्तारी कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की परतें खोलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. एजेंसी इस मामले में शामिल अन्य लोगों की पहचान और नेटवर्क के विस्तार को समझने की कोशिश कर रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने राजनीतिक परामर्श फर्म इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी के सह-संस्थापक विनेश चंदेल को पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित कोयला घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया है. यह कार्रवाई प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई है. यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा नवंबर 2020 में दर्ज की गई एफआईआर से जुड़ा है. इसमें पश्चिम बंगाल में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की खदानों से बड़े पैमाने पर कोयले की चोरी का आरोप लगाया गया था. जांच में अवैध खनन और कोयले की हेराफेरी से जुड़े नेटवर्क की पड़ताल की जा रही है.
PMLA के तहत गिरफ्तारी
ईडी ने विनेश चंदेल को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के प्रावधानों के तहत दिल्ली में हिरासत में लिया. उन्हें जल्द ही विशेष अदालत में पेश किया जाएगा. एजेंसी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कमाई के प्रवाह की जांच कर रही है.
वित्तीय लेन-देन की जांच पर फोकस
ईडी की जांच का मुख्य फोकस कथित अपराध से जुड़े पैसों के लेन-देन और उनकी ट्रेल का पता लगाना है. एजेंसी यह भी जांच रही है कि कोयला चोरी के नेटवर्क और चंदेल से जुड़े संस्थानों के बीच क्या संबंध हैं. इससे पहले ईडी ने दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई सहित कई स्थानों पर छापेमारी की थी, जहां से वित्तीय दस्तावेज और अन्य साक्ष्य जुटाए गए.
लंबे समय से जांच के दायरे में घोटाला
पश्चिम बंगाल कोयला घोटाला पिछले कई वर्षों से जांच के दायरे में है. इसमें सरकारी खदानों से संगठित तरीके से अवैध कोयला निकालने और बेचने के आरोप हैं. इस मामले में कई व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका की जांच की जा रही है.
ईडी की यह गिरफ्तारी कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की परतें खोलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. एजेंसी इस मामले में शामिल अन्य लोगों की पहचान और नेटवर्क के विस्तार को समझने की कोशिश कर रही है.
यह फैसला बीमा क्षेत्र में जवाबदेही तय करने और फर्जीवाड़े पर रोक लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी बीमा पॉलिसी से जुड़े एक गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए नेशनल इंश्योरेंस कंपनी (NIC) के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) को आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने का आदेश दिया है. इसके साथ ही कोर्ट ने पूरे मामले की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित करने का आदेश भी दिया.
यह मामला मोटर दुर्घटना से जुड़े एक क्लेम में कथित रूप से फर्जी बीमा पॉलिसी के इस्तेमाल से संबंधित है. जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह आदेश देते हुए बीमा कंपनी की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई.
कंपनी की लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कंपनी खुद यह दावा कर रही थी कि बीमा पॉलिसी फर्जी है, तब भी उसने कोई आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं कराई, जो गंभीर लापरवाही को दर्शाता है. कोर्ट ने इसे “जिम्मेदारी की घोर कमी” बताया.
कोर्ट ने टिप्पणी की कि अब समय आ गया है कि बीमा कंपनियां अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाएं, क्योंकि वे जो भुगतान करती हैं, वह आम जनता के पैसे से होता है.
SIT को सौंपी गई जांच
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को “राष्ट्रीय महत्व का टेस्ट केस” बताते हुए SIT को निर्देश दिया कि वह नया केस दर्ज करे, जिसमें NIC के CMD से लेकर स्थानीय शाखा प्रबंधक तक सभी संबंधित कर्मचारियों को आरोपी बनाया जाए. साथ ही बस के मालिक को भी आरोपी के रूप में शामिल करने को कहा गया है.
कोर्ट ने SIT को निर्देश दिया कि जांच तेजी और गंभीरता से की जाए तथा फर्जी बीमा दस्तावेज तैयार करने की साजिश की गहराई से पड़ताल की जाए.
DGP ने कोर्ट में मांगी माफी
इस मामले में पहले तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को भी कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया गया था. उनके हलफनामे में कहा गया था कि मोटर दुर्घटना मामलों में पुलिस बीमा दस्तावेजों की सत्यता की जांच नहीं करती.
इस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई. शुक्रवार को DGP ने कोर्ट में पेश होकर बिना शर्त माफी मांगी, जिसे बेंच ने स्वीकार कर लिया. उन्होंने बताया कि अब E-DAR और वाहन पोर्टल के जरिए बीमा विवरण का तुरंत और स्वचालित सत्यापन संभव हो गया है.
पीड़ित को जल्द मुआवजा देने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि दुर्घटना पीड़ित को मुआवजा मिलने में और देरी न हो. कोर्ट ने बीमा कंपनी को चार सप्ताह के भीतर सीधे पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश दिया. हालांकि, कंपनी को यह राशि बाद में वाहन के नियंत्रण में रहे व्यक्ति (लीजधारक) से वसूलने की अनुमति दी गई है.
मामला कैसे शुरू हुआ
यह मामला के. सरवनन नामक एक सड़क दुर्घटना पीड़ित से जुड़ा है, जो बस हादसे में घायल हो गए थे. लंबा इलाज और सर्जरी के बाद उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी. उन्होंने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी.
बीमा कंपनी ने दावा पूरी तरह खारिज करते हुए पॉलिसी को अमान्य बताया, लेकिन MACT और बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने कंपनी की दलीलें खारिज कर दीं और मुआवजा देने का आदेश दिया. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
बताया जा रहा है कि NDTV से जुड़े इस कार्यक्रम की खबर पहले NDTV Profit की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई थी, लेकिन बाद में वह खबर वहां से हटा दी गई और लिंक खोलने पर “404 Something Went Wrong” दिखने लगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुंबई में मशहूर रैपर और सिंगर यो यो हनी सिंह के NDTV GoodTimes से जुड़े ‘My Story India Tour’ के एक कॉन्सर्ट को लेकर विवाद सामने आया है. जानकारी के मुताबिक, कार्यक्रम में लेजर लाइट के इस्तेमाल से जुड़े नियमों के उल्लंघन के मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की है. इस FIR ने शहर में बड़े सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर बहस को तेज कर दिया है.
कॉन्सर्ट की जानकारी और आयोजन स्थल
यह कॉन्सर्ट 28 मार्च को मुंबई के बांद्रा स्थित एमएमआरडीए ग्राउंड में आयोजित किया गया था. रिपोर्ट्स के अनुसार, शो के दौरान लेजर लाइट्स का इस्तेमाल किया गया, जबकि इसके लिए पहले से निर्धारित सुरक्षा नियमों और दिशानिर्देशों का पालन पूरी तरह नहीं किया गया. स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि संबंधित एजेंसियों की ओर से आयोजकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे, लेकिन उनके उल्लंघन की शिकायत सामने आई. इसके बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने FIR दर्ज की.
लेजर लाइट और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन
कानूनी आरोपों में उच्च-तीव्रता वाली लेजर लाइट का उपयोग शामिल है, जिसके लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी. यह स्थल हवाई मार्ग के पास आता है, जहां ऐसी लाइट के उपयोग पर सख्त नियम हैं. इस तरह की अनियंत्रित लाइट्स से हवाई सुरक्षा को खतरा हो सकता है.
भीड़ नियंत्रण और प्रवेश में अव्यवस्था
कॉन्सर्ट में बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे और प्रवेश द्वार पर अव्यवस्था देखी गई. सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में एक महिला फैन गेट पर चढ़ने की कोशिश करती नजर आई, जिससे सुरक्षा कर्मियों के साथ तकरार हुई. इस मामले ने भीड़ नियंत्रण और एंट्री पॉइंट्स के महत्व को उजागर किया.
मीडिया में चर्चा
इस मामले का सबसे चर्चित पहलू मीडिया इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बना हुआ है. बताया जा रहा है कि NDTV से जुड़े इस कार्यक्रम की खबर पहले NDTV Profit की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई थी, लेकिन बाद में वह खबर वहां से हटा दी गई और लिंक खोलने पर “404 Something Went Wrong” दिखने लगा.
FIR में शामिल आरोप
पुलिस ने आयोजकों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिसमें निम्नलिखित आरोप शामिल हैं.
1. अवैध लेजर लाइट का उपयोग जो हवाई सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करता है
2. सुरक्षा नियमों और दिशानिर्देशों का पालन न करना
3. भीड़ नियंत्रण में लापरवाही
जांच यह निर्धारित करेगी कि किन परिस्थितियों में नियमों का उल्लंघन हुआ और क्या आयोजकों ने आवश्यक अनुमति ली थी.
आयोजकों और प्रदर्शन की प्रतिक्रिया
कॉन्सर्ट का प्रदर्शन हाई एनर्जी और दर्शकों में लोकप्रिय रहा, जिसमें हनी सिंह ने अपने कई हिट गानों से मनोरंजन किया. लेकिन यह कानूनी मामला अब विवाद का मुख्य केंद्र बन गया है, जिससे कॉन्सर्ट की सफलता पर सवाल उठे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े आयोजन जैसे लाइव कॉन्सर्ट में सुरक्षा मानकों का पालन और भीड़ प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर हवाई मार्ग के पास के क्षेत्रों में.
पुलिस अब अनुमतियों, सुरक्षा प्रोटोकॉल और आयोजन के दौरान निर्णयों के दस्तावेज़ों की गहन जांच करेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं. जांच के आधार पर आयोजकों और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की संभावना बनी हुई है.
यह मामला मीडिया, कॉरपोरेट जगत और कानून के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के प्रमुख उद्योगपति अनिल अंबानी ने मीडिया जगत से जुड़े एक बड़े विवाद में कानूनी कार्रवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया है. उन्होंने जाने-माने पत्रकार अर्नब गोस्वामी और उनके चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है. यह मामला हाल ही में प्रसारित कुछ टीवी कार्यक्रमों से जुड़ा बताया जा रहा है.
टीवी प्रसारण पर उठे सवाल
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पूरा विवाद उन कार्यक्रमों को लेकर है जिनमें अनिल अंबानी के वित्तीय लेन-देन से संबंधित खबरें दिखाई गई थीं. अंबानी का आरोप है कि इन प्रसारणों में ऐसी सामग्री दिखाई गई, जिससे उनकी छवि और प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचा है.
याचिका में क्या कहा गया?
दायर याचिका में दावा किया गया है कि चैनल के कुछ शो में मानहानिकारक बातें प्रसारित की गईं. इसके चलते आम जनता, कारोबारी समुदाय और निवेशकों के बीच उनके प्रति गलत धारणा बनी. अंबानी का कहना है कि इस तरह की रिपोर्टिंग से उनकी साख पर नकारात्मक असर पड़ा है.
कोर्ट से क्या मांग की गई?
अनिल अंबानी ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि अंतिम फैसला आने तक अर्नब गोस्वामी और ‘रिपब्लिक टीवी’ को उनके खिलाफ किसी भी तरह की सामग्री प्रसारित या प्रकाशित करने से रोका जाए. इसके लिए उन्होंने इंटरिम राहत (अस्थायी रोक) की मांग की है.
याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण जारी रहता है, तो उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर छवि को और अधिक नुकसान हो सकता है. इस नुकसान की भरपाई करना भविष्य में बेहद कठिन होगा.
अगली सुनवाई कब?
यह मामला 1 अप्रैल को जस्टिस मिलिंद जाधव की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो सकता है. फिलहाल केस प्रारंभिक चरण में है और अदालत यह तय करेगी कि अनिल अंबानी को अंतरिम राहत दी जानी चाहिए या नहीं.
दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद UNI के राफी मार्ग कार्यालय की भूमि आवंटन रद्द करने के फैसले पर कार्रवाई की गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
संयुक्त समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) के दिल्ली कार्यालय को 20 मार्च 2026 को सील कर दिया गया. यह कार्रवाई दिल्ली पुलिस और प्रशासन की टीम द्वारा की गई. पुलिस ने बताया कि यह कदम दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद उठाया गया.
UNI के राफी मार्ग कार्यालय की जमीन का आवंटन पहले ही रद्द किया जा चुका था. UNI ने इस फैसले के खिलाफ न्यायालय में अपील की थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज कर दी और जमीन रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा. इसके बाद कार्यालय खाली करने का निर्देश दिया गया.
पुलिस ने किया कार्यालय खाली और सील
उच्च न्यायालय के आदेश के आधार पर पुलिस ने कार्यालय को खाली कराकर सील कर दिया. मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस अधिकारी मौजूद थे. अधिकारियों ने बताया कि यह कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के अनुसार और वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ की गई.
कार्यालय सील होने के दौरान कर्मचारियों में हलचल रही. कर्मचारियों का कहना था कि उन्हें जबरन बाहर निकाला गया और कुछ कर्मचारियों को अपने सामान इकट्ठा करने का समय नहीं मिला. हालांकि, पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पूरी कार्रवाई नियमों के अनुसार की गई.
दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद UNI के राफी मार्ग कार्यालय की भूमि आवंटन रद्द करने के फैसले पर कार्रवाई की गई. अधिकारियों ने सुनिश्चित किया कि सभी कदम कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उठाए गए और कार्यालय सील करने की प्रक्रिया पूरी तरह नियंत्रित तरीके से संपन्न हुई.
दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले से रॉय दंपति को बड़ी राहत मिली है. हालांकि, 2019 का मामला अभी जारी है, ऐसे में आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सभी की नजर बनी रहेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व एनडीटीवी (NDTV) प्रमोटर्स प्रणय रॉय और राधिका रॉय को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर (LOC) को रद्द कर दिया है. यह फैसला CBI द्वारा दर्ज दो मामलों के संदर्भ में आया है, जिनमें से एक पहले ही बंद हो चुका है, जबकि दूसरा अभी लंबित है.
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने शुक्रवार को यह आदेश सुनाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता जांच में सहयोग करेंगे, इस शर्त पर लुक आउट सर्कुलर रद्द किए जाते हैं. हाई कोर्ट को बताया गया कि यह LOC जून 2017 और अगस्त 2019 में दर्ज दो अलग-अलग FIR के संबंध में CBI की सिफारिश पर जारी किए गए थे.
2017 का मामला हो चुका बंद
2017 में दर्ज मामला प्रणय रॉय, राधिका रॉय, RRPR होल्डिंग्स और NDTV के खिलाफ था. यह शिकायत क्वांटम सिक्योरिटी प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक संजय दत्त द्वारा की गई थी. आरोप था कि NDTV में 20% हिस्सेदारी खरीदने के लिए लिए गए लोन में ICICI बैंक अधिकारियों के साथ साजिश की गई.
हालांकि, बाद में CBI ने इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी. एजेंसी ने कहा कि उस अवधि में कई लोन खातों पर ब्याज दरों में कमी की गई थी और यह मामला कोई अपवाद नहीं था. हाई कोर्ट ने 23 जनवरी को इस क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था.
2019 का मामला अभी लंबित
वहीं, अगस्त 2019 में दर्ज दूसरा मामला अभी भी लंबित है और इसमें अब तक चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है. प्रणय रॉय और राधिका रॉय की ओर से अधिवक्ता अनुराधा दत्त, पवन शर्मा, सुमन यादव, कुनाल दत्त, सौरभ सिंह और निशांत वरुण ने पैरवी की. वहीं, विशेष वकील अनुपम एस शर्मा ने प्रतिवादियों का पक्ष रखा.