Gensol को भारी भरकम लोन देने वाले बैंकों की भूमिका पर SEBI की गहरी चुप्पी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या SEBI वाकई सरकारी बैंकों को जवाबदेह बनाने और जनता के पैसे की रक्षा करने के लिए गंभीर है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
15 अप्रैल 2025 को, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने एक सख्त अंतरिम आदेश जारी किया. SEBI के Whole-Time Member अश्विनी भाटिया ने Gensol Engineering के प्रमोटर अनमोल सिंह जग्गी और पुनीत सिंह जग्गी को कड़ी फटकार लगाते हुए उन्हें शेयर बाजार से बाहर कर दिया. उन पर कंपनी में कॉरपोरेट गवर्नेंस के खुलेआम उल्लंघन और बड़े पैमाने पर फंड की हेराफेरी के आरोप हैं.
इस आदेश के साथ ही Gensol की 1:10 स्टॉक स्प्लिट योजना को भी रोक दिया गया, जिससे कंपनी की वित्तीय गड़बड़ियों पर गंभीर चिंता जाहिर हुई. लेकिन जिस बात पर SEBI ने अब तक चुप्पी साध रखी है, वह है उन बैंकों की भूमिका, जिन्होंने Gensol को भारी-भरकम लोन दिए. यह चुप्पी इस सवाल को जन्म देती है कि क्या SEBI सरकारी बैंकों को जवाबदेह ठहराने और जनता के पैसे की सुरक्षा के लिए वाकई गंभीर है?
Gensol घोटाला: फंड की हेराफेरी की कहानी
कभी क्लीन एनर्जी की मिसाल मानी जाने वाली Gensol Engineering अब लालच और धोखाधड़ी की चेतावनी बन गई है. जून 2024 में मिली एक शिकायत के बाद SEBI ने जांच शुरू की और पाया कि जग्गी बंधुओं ने इस लिस्टेड कंपनी को अपनी "पर्सनल तिजोरी" की तरह इस्तेमाल किया. वित्त वर्ष 2022 से 2024 के बीच, Gensol ने पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन (PFC) और इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (IREDA) से 977.75 करोड़ रुपये के लोन लिए. यह पैसा 6,400 इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EVs) खरीदने के लिए था, जिन्हें BluSmart Mobility (जो कि जग्गी बंधुओं की ही दूसरी कंपनी है) को लीज पर देना था.
लेकिन सच्चाई यह निकली कि सिर्फ 4,704 गाड़ियां खरीदी गईं. करीब 262.13 करोड़ रुपये कहां गए, इसका कोई हिसाब नहीं मिला. SEBI का आरोप है कि इस पैसे का इस्तेमाल प्रमोटरों ने अपने शौक पूरे करने में किया — जैसे गुरुग्राम के DLF Camellias में 42.94 करोड़ का फ्लैट, 26 लाख रुपये का गोल्फ सेट, और रिश्तेदारों के खातों में ट्रांसफर. घोटाला और गहरा तब हुआ जब Gensol ने CARE Ratings और ICRA जैसी रेटिंग एजेंसियों को झूठे “Conduct Letters” और “No Objection Certificates” (NOC) दिए, जिनमें यह दिखाया गया था कि कंपनी समय पर PFC और IREDA के लोन चुका रही है.
जब रेटिंग एजेंसियों ने खुद बैंकों से पुष्टि की, तो दोनों ने ऐसे किसी भी दस्तावेज को जारी करने से इनकार कर दिया. इसके बाद मार्च 2025 में Gensol की क्रेडिट रेटिंग गिरकर "D" हो गई. इस धोखाधड़ी को लेकर अब कई एजेंसियां जांच कर रही हैं. PFC ने 22 अप्रैल 2025 को दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EoW) में शिकायत दर्ज करवाई. वहीं, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 24 अप्रैल को पुणीत सिंह जग्गी को विदेशी मुद्रा कानून (FEMA) के तहत हिरासत में लिया.
SEBI की बड़ी चूक: बैंकरों पर कोई सवाल नहीं
SEBI ने अपने आदेश में जहां जग्गी बंधुओं की कड़ी आलोचना की और छोटे निवेशकों की सुरक्षा के लिए Gensol का स्टॉक स्प्लिट रोक दिया, वहीं इस पूरे घोटाले में बैंकों की भूमिका को नजरअंदाज कर दिया. Power Finance Corporation (PFC) और Indian Renewable Energy Development Agency (IREDA) — जो कि सरकारी क्षेत्र की एनबीएफसी हैं और क्रमशः बिजली मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के तहत आती हैं — ने Gensol को 663.89 करोड़ और 313.86 करोड़ रुपये का लोन दिया, लेकिन इस पैसे का कहां और कैसे इस्तेमाल हुआ, इसकी सही तरीके से निगरानी नहीं की.
SEBI की जांच में पता चला कि Gensol की गड़बड़ियां एक साल से भी ज्यादा समय तक किसी की नजर में नहीं आईं, लेकिन अश्विनी भाटिया के 29 पन्नों के आदेश में बैंकों की लापरवाही या जांच प्रक्रिया की कोई आलोचना नहीं की गई. इससे विश्लेषकों और निवेशकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारी बैंकों को जानबूझकर जांच से बाहर रखा गया? PFC ने जनवरी 2023 में FAME और PM E-bus Seva जैसी सरकारी योजनाओं के तहत 633 करोड़ रुपये मंजूर किए, जिनमें से 352 करोड़ 3,000 इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए दिए गए। लेकिन सिर्फ 2,741 गाड़ियां ही PFC के नाम पर गिरवी रखी गईं, जबकि 6,400 गाड़ियां खरीदी जानी थीं.
IREDA ने बाकी गाड़ियों के लिए फंड दिया, लेकिन Gensol ने कुल मिलाकर सिर्फ 4,704 गाड़ियां खरीदीं. इस हिसाब से IREDA को भी 1,437 गाड़ियों की कमी का सामना करना पड़ सकता है. इन कमियों के बावजूद, दोनों ही बैंकों ने फंड देना जारी रखा. PFC ने 31 जनवरी 2025 तक नियमित भुगतान होने की बात कही, लेकिन फरवरी और मार्च की किस्तों के लिए उसे "Debt Service Reserve Account" (DSRA) का सहारा लेना पड़ा. SEBI ने इन सारी लापरवाहियों पर कुछ भी नहीं कहा, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या सार्वजनिक क्षेत्र की एनबीएफसी की लोन देने की प्रक्रिया सच में मजबूत और भरोसेमंद है?
PFC और IREDA पर SEBI की देर से कार्रवाई: बहुत कम, बहुत देर?
SEBI ने बैंकों की भूमिका पर जो देरी से कदम उठाए, उस पर अब तीखी आलोचना हो रही है. जनवरी 2025 में जब क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने फर्जी दस्तावेज़ और फंड की गड़बड़ी पकड़ी, तभी से सबूत सामने आने लगे थे. लेकिन SEBI ने अपना अंतरिम आदेश अप्रैल के मध्य में जारी किया. इस बीच, PFC और IREDA पर कोई सीधी कार्रवाई नहीं की गई. PFC ने खुद 22 अप्रैल 2025 को दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EoW) में शिकायत दर्ज करवाई. इस देरी से हालात और बिगड़ गए. अब PFC को 307 करोड़ रुपये की बकाया रकम वसूलने की कोशिश करनी पड़ रही है, जबकि उसके पास सही जमानत भी नहीं है. IREDA का भी लगभग 600 करोड़ रुपये का लोन खतरे में है, और सोशल मीडिया (X) पर लोग चिंता जता रहे हैं कि IREDA ने इन डूबते लोन के लिए कोई तैयारी नहीं की.
MarketWatch India के वित्तीय विश्लेषक रोहन शर्मा कहते हैं, “SEBI को पहले ही PFC और IREDA की लापरवाही पर सवाल उठाने चाहिए थे. जब सरकारी बैंकों के जरिए जनता का पैसा दिया जाता है, तो उनकी ज़िम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए.” आलोचकों का कहना है कि SEBI का यह देरी भरा और सिर्फ प्रतिक्रिया देने वाला रवैया बड़ी समस्या को उजागर करता है — कि सरकारी NBFC पर निगरानी कमजोर है, जिससे टैक्स देने वालों का पैसा खतरे में पड़ सकता है.
बड़ी तस्वीर: क्या यह एक सिस्टम की विफलता है?
Gensol घोटाला भारत की वित्तीय निगरानी व्यवस्था में गहरी खामियों को उजागर करता है. PFC और IREDA जैसी सरकारी संस्थाएं Gensol की "स्वच्छ ऊर्जा" की कहानी से प्रभावित होकर लोन देती रहीं, लेकिन यह नहीं देखा कि उस पैसे का सही उपयोग हो रहा है या नहीं. SEBI के आदेश में यह भी सामने आया कि Gensol ने Go-Auto Pvt. Ltd., Capbridge Ventures और Wellray Solar Industries जैसी कंपनियों के जरिए पैसे को इधर-उधर घुमाया. इसके बावजूद बैंकों ने इन चेतावनी संकेतों को नज़रअंदाज़ कर दिया. उदाहरण के तौर पर, PFC से मिले लोन में से 96.69 करोड़ रुपये प्रमोटरों की जुड़ी कंपनियों में भेजे गए और 37.5 करोड़ रुपये सीधे अनमोल जग्गी के निजी खाते में चले गए.
ऐसी घटनाएं दिखाती हैं कि बैंकों की ओर से रियल-टाइम निगरानी नहीं हो रही थी, जिससे सरकारी बैंकों पर लोगों का भरोसा डगमगाने लगता है. साल 2025 में Gensol का शेयर 86% गिर चुका है और 22 अप्रैल को इसका दाम 130.15 रुपये तक आ गया — जो कि 52 हफ्तों में सबसे कम है. इससे कंपनी की मार्केट वैल्यू में करीब 3,800 करोड़ रुपये की कमी आ गई है. कंपनी का पुणे EV प्लांट, जिसे 30,000 प्री-ऑर्डर्स का हब बताया गया था, NSE की जांच में लगभग बंद जैसा मिला — वहां सिर्फ 2-3 कर्मचारी और बहुत कम बिजली की खपत पाई गई. इन खुलासों से साफ होता है कि Gensol के दावे खोखले थे और साथ ही, SEBI की ओर से बैंकों की ज़िम्मेदारी पर चुप्पी इस बात को और पुख्ता करती है कि हमारी पूरी वित्तीय व्यवस्था में कॉरपोरेट गवर्नेंस को लागू कराने में बड़ी विफलता हुई है.
जवाबदेही की मांग
Gensol धोखाधड़ी मामला सिर्फ प्रमोटरों पर बैन लगाने या स्टॉक स्प्लिट रोकने से खत्म नहीं होता. अब जरूरी है कि SEBI तुरंत PFC और IREDA की लापरवाही की जांच करे — क्योंकि इन्हीं सरकारी बैंकों की ढीली जांच प्रक्रिया ने इस घोटाले को जन्म दिया. निवेशकों और टैक्स चुकाने वाले आम लोगों को यह जानने का हक है कि जब इन NBFCs को जनता के पैसे की जिम्मेदारी दी गई थी, तो उन्होंने Gensol के लोन का सही इस्तेमाल क्यों नहीं देखा. हालांकि ED की छापेमारी, कॉरपोरेट मंत्रालय की जांच और नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) का ऑडिट एक अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन SEBI की अब तक की चुनिंदा कार्रवाई से ऐसा लगता है जैसे वह बड़े संस्थानों की गलतियों को नजरअंदाज कर रहा है.
अब जब Gensol की सच्चाई सामने आ रही है, SEBI यह गलती नहीं कर सकता कि वह उन बैंकों को छोड़ दे जिन्होंने इस संकट को बढ़ाया. PFC और IREDA की निगरानी में हुई खामियों पर जल्दी और सख्त कार्रवाई बहुत जरूरी है — तभी लोगों का भारत की वित्तीय व्यवस्था पर भरोसा लौटेगा और यह सुनिश्चित होगा कि जनता का पैसा बर्बाद न हो. जब तक ऐसा नहीं होता, Gensol केस एक कड़वी याद बना रहेगा — जो यह दिखाता है कि भारत की स्वच्छ ऊर्जा योजनाओं और निवेशकों के विश्वास को कैसे कुछ चूकें बड़ा नुकसान पहुंचा सकती हैं.
(लेखक- पलक शाह, "द मार्केट माफिया - क्रॉनिकल ऑफ इंडिया’s हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" किताब के लेखक हैं. पलक शाह पिछले दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसे प्रमुख पिंक पेपरों में काम किया है. वह 19 साल की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग से जुड़े थे, लेकिन कुछ सालों में इस क्षेत्र में काम करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि अपराध की संरचना बदल चुकी थी और वह संगठित गिरोह, जैसा कि मुंबई ने 80 के दशक में देखा था, अब अस्तित्व में नहीं थे. 'व्हाइट मनी' अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के उनके जुनून ने पलक को वित्त और नियामकों की दुनिया में पहुंचा दिया.)
सौरभ चंद्राकर के ओमान से भारत प्रत्यर्पण के कुछ दिनों बाद हुई उप्पल की गिरफ्तारी, 75 हजार करोड़ रुपये से अधिक के अवैध सट्टेबाजी नेटवर्क के संचालन का है आरोप
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
महादेव ऑनलाइन बुक सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म के सह-संस्थापक और करोड़ों रुपये के कथित अवैध सट्टेबाजी कारोबार के प्रमुख आरोपी रवि उप्पल को दुबई में गिरफ्तार किया गया है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, यह गिरफ्तारी उनके कारोबारी साझेदार सौरभ चंद्राकर के ओमान से भारत प्रत्यर्पण के कुछ दिनों बाद हुई है. दोनों पर दुबई से सट्टेबाजी नेटवर्क संचालित करने का आरोप है. इस मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) और कई राज्यों की पुलिस एजेंसियां कर रही हैं.
सौरभ चंद्राकर को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के समन्वय से चलाए गए प्रत्यर्पण अभियान के बाद रविवार को भारत लाया गया था. छत्तीसगढ़ के भिलाई के रहने वाले चंद्राकर और उप्पल पर महादेव ऑनलाइन बुक प्लेटफॉर्म के जरिए बड़े पैमाने पर अवैध सट्टेबाजी का नेटवर्क चलाने का आरोप है.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस जारी होने के बाद जून में रॉयल ओमान पुलिस ने चंद्राकर को हिरासत में लिया था. इसके बाद सीबीआई और ईडी ने ओमान के सामने औपचारिक प्रत्यर्पण अनुरोध प्रस्तुत किया था. सीबीआई के एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों प्रमोटरों के पास वानुआतु के पासपोर्ट हैं, जिन्हें कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हासिल किया गया था.
75 हजार करोड़ रुपये से अधिक के नेटवर्क की जांच
रवि उप्पल की गिरफ्तारी और सौरभ चंद्राकर की भारत वापसी के बाद जांच एजेंसियों को इस कथित सट्टेबाजी सिंडिकेट के दोनों प्रमुख संचालकों से पूछताछ का मौका मिलेगा. अधिकारियों को उम्मीद है कि पूछताछ से नेटवर्क के विस्तार, उससे जुड़े वित्तीय लेनदेन और अन्य आरोपियों की भूमिका का पता लगाने में मदद मिलेगी. इस कथित सट्टेबाजी कारोबार का आकार 75 हजार करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा है.
भारत पहुंचने के बाद सौरभ चंद्राकर को रायपुर ले जाया गया, जहां बुधवार को सीबीआई ने अदालत से उसका ट्रांजिट रिमांड हासिल किया. इसके बाद उसे पूछताछ के लिए दिल्ली लाया गया. वहीं, रवि उप्पल फिलहाल दुबई में हिरासत में है. उसे भारत लाने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की उम्मीद है.
द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े सूत्रों का मानना है कि उप्पल से पूछताछ में नेटवर्क से जुड़े प्रमुख लोगों की पहचान करने, सट्टेबाजी कारोबार का दायरा समझने और इसमें शामिल धन के लेनदेन का पता लगाने में मदद मिल सकती है. उप्पल ईडी के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में भी आरोपी है. उससे कथित सट्टेबाजी कारोबार से जुड़े वित्तीय लेनदेन के बारे में पूछताछ की जा सकती है. रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय एजेंसियां विदेश में मौजूद अन्य प्रमुख आरोपियों को भी भारत लाने की तैयारी कर रही हैं.
हजारों लोगों का ग्राहक नेटवर्क बनाने का आरोप
जांच एजेंसियों का आरोप है कि दोनों प्रमोटरों ने हजारों लोगों का ग्राहक नेटवर्क तैयार किया और अवैध सट्टेबाजी के जरिए हजारों करोड़ रुपये कमाए. इस रकम को कथित तौर पर हवाला के जरिए विदेश भेजा गया. इसमें से कुछ रकम भारत में लोगों को कमीशन और अन्य अनुचित भुगतान के रूप में दिए जाने का भी आरोप है.
महादेव ऑनलाइन बुक पर क्रिकेट, बैडमिंटन, टेनिस और फुटबॉल जैसे खेलों पर सट्टा लगाने की सुविधा उपलब्ध थी. इसके अलावा तीन पत्ती, पोकर, ड्रैगन टाइगर जैसे कार्ड गेम, अन्य किस्म के खेल और वर्चुअल क्रिकेट पर भी दांव लगाए जाते थे. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्लेटफॉर्म के जरिए भारत में चुनावों पर भी सट्टा लगाने की सुविधा दी जाती थी.
फ्रेंचाइजी मॉडल पर चलाया जा रहा था कारोबार
रिपोर्ट के मुताबिक, सट्टेबाजी का यह नेटवर्क कई वेबसाइटों और इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के निजी समूहों के जरिए संचालित किया जाता था. इसके लिए 'पैनल ओनर' नाम से जाने जाने वाले बिचौलियों की मदद ली जाती थी. इनका काम नए ग्राहकों को जोड़ना और पैसों के लेनदेन की व्यवस्था करना था.
पैनल ओनर ऑनलाइन विज्ञापनों के जरिए महादेव ऑनलाइन बुक से जुड़े संपर्क नंबरों का प्रचार करते थे. विज्ञापनों में रुचि दिखाने वाले लोगों को व्हाट्सऐप नंबरों पर भेजा जाता था, जहां उन्हें प्लेटफॉर्म से जुड़ने और पैसे जमा करने की प्रक्रिया समझाई जाती थी.
यूजर्स को सट्टा लगाने के लिए निर्धारित बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने होते थे. इसके बदले उन्हें क्रेडिट या टोकन दिए जाते थे, जिनका इस्तेमाल ऐप पर दांव लगाने के लिए किया जा सकता था. उदाहरण के तौर पर, 5,000 रुपये जमा करने पर यूजर के खाते में 10,000 टोकन क्रेडिट किए जा सकते थे.
ग्राहकों को जोड़ने और उनसे पैसे जमा कराने की जिम्मेदारी देश के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय पैनल ओनर को दी गई थी. इससे कई बैंक खातों के जरिए बड़ी संख्या में यूजर्स और वित्तीय लेनदेन को संभालना आसान हो जाता था.
हालांकि, जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क का केंद्रीय संचालन दुबई से सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल के नियंत्रण में था. ईडी के एक पुराने बयान में दुबई स्थित मुख्य प्रतिष्ठान को नेटवर्क का 'हेड ऑफिस' बताया गया था.
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों प्रमोटर फ्रेंचाइजी जैसे मॉडल पर इस कारोबार को चला रहे थे. इसमें वे बिचौलियों को अलग-अलग पैनल या शाखाएं बेचते थे, जबकि कारोबार से होने वाले मुनाफे का करीब 80 फीसदी हिस्सा अपने पास रखते थे.
अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी सिंडिकेट के प्रमोटर सौरभ चंद्राकर को CBI की टीम प्रत्यर्पण कर भारत लाई है. उसके खिलाफ CBI के दो मामलों में चार्जशीट दाखिल है, जबकि ED भी मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच कर रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
महादेव ऑनलाइन बेटिंग ऐप मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को बड़ी कामयाबी मिली है. अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी सिंडिकेट के प्रमुख प्रमोटर और मुख्य आरोपी सौरभ चंद्राकर को ओमान से प्रत्यर्पित कर भारत लाया गया है. CBI की विशेष टीम उसे लेकर भारत पहुंची है. अब मेडिकल जांच और ट्रांजिट रिमांड की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे रायपुर ले जाया जाएगा, जहां सोमवार को CBI की विशेष अदालत में पेश किया जाएगा. सौरभ चंद्राकर के खिलाफ CBI के दो मामलों में पहले ही आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं. वहीं, प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी उसके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले की जांच कर रहा है.
इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस के आधार पर हुई गिरफ्तारी
CBI के मुताबिक, भारत सरकार की विभिन्न केंद्रीय एजेंसियों के समन्वय से सौरभ चंद्राकर का प्रत्यर्पण संभव हो पाया है. उसके खिलाफ इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया था. इसी के आधार पर रॉयल ओमान पुलिस ने उसे तलाश कर हिरासत में लिया. इसके बाद CBI और ED ने ओमान को औपचारिक प्रत्यर्पण अनुरोध भेजा. प्रत्यर्पण की मंजूरी मिलने के बाद CBI की टीम मस्कट पहुंची और उसे भारत लेकर आई.
CBI extradites Sourabh Chandrakar the kingpin in Mahadev App betting cases, from Oman
— Central Bureau of Investigation (India) (@CBIHeadquarters) November 1, 2026
क्या है महादेव ऑनलाइन बेटिंग ऐप मामला?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, छत्तीसगढ़ सरकार के अनुरोध पर CBI ने महादेव ऑनलाइन बुक से जुड़े मामलों की जांच अपने हाथ में ली थी. जांच एजेंसी के मुताबिक, महादेव ऑनलाइन बुक देश के बड़े अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी सिंडिकेट में से एक था, जिसका संचालन विदेश से किया जा रहा था. इस नेटवर्क के जरिए क्रिकेट, फुटबॉल, ताश और अन्य खेलों व आयोजनों पर ऑनलाइन सट्टा लगाया जाता था. इसके लिए देशभर में फ्रेंचाइजी पैनल और शाखाओं का नेटवर्क तैयार किया गया था. ये पैनल लोगों को अपने साथ जोड़कर उनसे सट्टे की रकम जमा कराते थे.
म्यूल बैंक खातों और हवाला के जरिए विदेश भेजा जाता था पैसा
CBI की जांच में सामने आया कि अवैध सट्टेबाजी से हासिल रकम को कई म्यूल बैंक खातों के जरिए अलग-अलग स्तरों पर ट्रांसफर किया जाता था. इसके बाद हवाला नेटवर्क के माध्यम से इस पैसे को विदेश भेजा जाता था. जांच एजेंसी के अनुसार, अवैध कमाई का एक हिस्सा सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को कथित तौर पर संरक्षण राशि देने में भी इस्तेमाल किया जाता था, ताकि सट्टेबाजी का नेटवर्क बिना किसी बाधा के चलता रहे.
इस मामले में CBI ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, भारतीय दंड संहिता और छत्तीसगढ़ जुआ (प्रतिषेध) अधिनियम के तहत आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़े आरोपों में चार्जशीट दाखिल की है. सौरभ चंद्राकर को इन मामलों में प्रमुख आरोपियों में शामिल किया गया है. वहीं, ED भारत और विदेशों में उसकी कई संपत्तियां कुर्क कर चुकी है.
सितंबर में अभिषेक कुमार भी हुआ था गिरफ्तार
महादेव ऑनलाइन बेटिंग ऐप मामले में इससे पहले सितंबर 2026 में CBI ने एक अन्य प्रमुख आरोपी अभिषेक कुमार को गिरफ्तार किया था. उसे दुबई से भारत लौटने के दौरान हैदराबाद के राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पकड़ा गया था. जांच एजेंसी के मुताबिक, अभिषेक कुमार ऑनलाइन सट्टेबाजी का नेटवर्क चलाने, अलग-अलग पैनल के बीच तालमेल बनाने और सट्टे से जुटाई गई रकम इकट्ठा करने में सक्रिय भूमिका निभा रहा था.
सौरभ चंद्राकर के भारत आने को विदेश से संचालित अवैध सट्टेबाजी नेटवर्क की जांच में अहम कदम माना जा रहा है. CBI ने इस कार्रवाई में सहयोग के लिए ओमान सरकार और रॉयल ओमान पुलिस का आभार जताया है.
CBI का आरोप है कि DHFL को यस बैंक से वित्तीय मदद मिलने के बदले राणा कपूर के परिवार से जुड़ी कंपनी को 900 करोड़ रुपये का कर्ज दिया गया था.
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को यस बैंक के संस्थापक राणा कपूर की पत्नी और उनकी दो बेटियों को DHFL भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया. न्यायमूर्ति भारती डांगरे की एकल पीठ ने राणा कपूर की पत्नी बिंदु कपूर और बेटियों रोशनी कपूर व राधा कपूर की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं.
तीनों ने पिछले सप्ताह विशेष CBI अदालत के 18 सितंबर के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. विशेष अदालत ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए कहा था कि प्रथम दृष्टया उनके कथित गैरकानूनी कृत्यों से यस बैंक को 4,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. निचली अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था. तीनों फिलहाल मुंबई की भायखला महिला जेल में बंद हैं.
जमानत याचिका में निचली अदालत के आदेश को दी थी चुनौती
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हाई कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में बिंदु कपूर और उनकी बेटियों ने कहा था कि विशेष CBI अदालत ने उनके खिलाफ लगे आरोपों का प्रथम दृष्टया आकलन करते हुए गलती की. उनका कहना था कि अदालत ने यह निष्कर्ष निकालने में गंभीर त्रुटि की कि वे कथित तौर पर मिलीभगत और बेईमानी से दिए गए कर्ज के जरिए DHFL को यस बैंक से फायदा पहुंचाने के बदले लाभ हासिल करने में शामिल थीं.
वहीं, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने जमानत याचिकाओं का विरोध किया. जांच एजेंसी ने कहा कि विशेष अदालत के आदेश में कोई खामी नहीं है और इसका उद्देश्य मुकदमे की सुनवाई के लिए आरोपियों की उपस्थिति सुनिश्चित करना है.
क्या है CBI का आरोप?
CBI के मुताबिक, राणा कपूर ने DHFL के कपिल वाधवान के साथ कथित आपराधिक साजिश रची थी. एजेंसी का आरोप है कि अप्रैल से जून 2018 के बीच यस बैंक ने DHFL के अल्पकालिक डिबेंचर में 3,700 करोड़ रुपये का निवेश किया था.
इसके बदले DHFL ने कथित तौर पर राणा कपूर के परिवार से जुड़ी कंपनी DoIT अर्बन वेंचर्स को 900 करोड़ रुपये का कर्ज दिया. यह कंपनी राणा कपूर की पत्नी और बेटियों के नियंत्रण में थी. जांच एजेंसी का आरोप है कि इस कर्ज के जरिए राणा कपूर को कथित तौर पर अनुचित लाभ पहुंचाया गया.
राणा कपूर फिलहाल प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से जांच किए जा रहे एक संबंधित मामले में जेल में बंद हैं. DHFL से जुड़े इस मामले में जांच एजेंसियां कथित वित्तीय अनियमितताओं और लेनदेन की जांच कर रही हैं.
जांच एजेंसी के मुताबिक, अभिषेक कुमार पर ‘महादेव बुक’ के तहत ऑनलाइन बेटिंग और जुए से जुड़ी गतिविधियों के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाने का आरोप है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने महादेव ऑनलाइन बेटिंग ऐप मामले में वांछित आरोपी अभिषेक कुमार को दुबई से भारत पहुंचने के बाद गिरफ्तार किया है. CBI ने उसे हैदराबाद के राजीव गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद हिरासत में लिया.
जांच एजेंसी के मुताबिक, अभिषेक कुमार पर ‘महादेव बुक’ के तहत ऑनलाइन बेटिंग और जुए से जुड़ी गतिविधियों के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाने का आरोप है. जांच में कथित तौर पर बेटिंग पैनल्स के समन्वय, फंड की वसूली और इन गतिविधियों से अर्जित रकम से दुबई में अचल संपत्तियां हासिल करने में उसकी भूमिका सामने आई है.
गिरफ्तारी के बाद सामग्री जब्त
CBI ने अभिषेक कुमार की गिरफ्तारी के बाद उसके ठिकाने पर तलाशी ली, जिसमें कुछ सामग्री जब्त की गई. जांच एजेंसी के सूत्रों के मुताबिक, शुरुआती जांच में जब्त सामग्री से बेटिंग ऑपरेशन में उसकी कथित भूमिका और मामले के अन्य आरोपियों, जिनमें सौरभ चंद्राकर और शुभम सोनी शामिल हैं, के साथ उसके संबंधों के संकेत मिले हैं.
गिरफ्तारी के बाद कुमार को हैदराबाद की स्थानीय अदालत में पेश किया गया. अदालत ने CBI को तीन दिन की ट्रांजिट रिमांड दी. इसके बाद उसे रायपुर की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया.
100 आरोपियों के खिलाफ 8 चार्जशीट दाखिल
महादेव बेटिंग ऐप मामले में छत्तीसगढ़ सरकार ने अलग-अलग पुलिस थानों में दर्ज 13 FIR को पहले CBI को ट्रांसफर कर दिया था. इसके बाद केंद्रीय एजेंसी मामले की जांच कर रही है.
CBI अब तक इस मामले में 100 आरोपियों के खिलाफ आठ चार्जशीट दाखिल कर चुकी है. इनमें महादेव बेटिंग ऐप के कथित मुख्य प्रमोटर्स, पैनल ऑपरेटर्स, हवाला ऑपरेटर्स और छत्तीसगढ़ सरकार के कुछ लोक सेवक शामिल हैं.
सात रेड कॉर्नर नोटिस जारी
जांच के तहत अब तक सात रेड कॉर्नर नोटिस और दो प्रत्यर्पण प्रस्ताव भी जारी किए जा चुके हैं. महादेव ऐप के कथित प्रमोटर्स सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल के खिलाफ प्रत्यर्पण की कार्यवाही चल रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों अभी भी फरार हैं. CBI मामले में आरोपियों की भूमिका, कथित बेटिंग नेटवर्क, फंड के लेनदेन और उससे जुड़ी संपत्तियों की भी जांच कर रही है.
राजरहाट हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़े कथित फर्जीवाड़े में कार्रवाई, बिल्डर और वित्तीय संस्थाओं के अधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप; 31 अन्य मामलों की जांच जारी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने घर खरीदारों से कथित बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी से जुड़े मामले में अपनी 18वीं चार्जशीट दाखिल की है. इस चार्जशीट में MKHS Housing LLP, उसके नामित पार्टनर Indiabulls Distribution Service, Indiabulls Investment Advisors और इनके निदेशकों व अधिकारियों को आरोपी बनाया गया है. सीबीआई के मुताबिक, यह मामला पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के राजरहाट टाउन एरिया में एक हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ी कथित धोखाधड़ी का है. एजेंसी ने यह चार्जशीट अलीपुर स्थित सीबीआई की विशेष अदालत-II के समक्ष दाखिल की है.
बिल्डर और NBFC अधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप
सीबीआई का आरोप है कि जांच में सामने आया कि आरोपी बिल्डर कंपनी और उसके निदेशकों ने एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) के अधिकारियों के साथ कथित मिलीभगत कर घर खरीदारों और निवेशकों को झूठे आश्वासनों और भ्रामक जानकारियों के जरिए निवेश के लिए प्रेरित किया. एजेंसी के अनुसार, आरोपियों ने कथित तौर पर अवैध और धोखाधड़ीपूर्ण तरीकों से वित्तीय लाभ हासिल किया. सीबीआई ने चार्जशीट में आपराधिक साजिश, उकसावे, धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात से संबंधित भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं के तहत आरोप लगाए हैं. हालांकि, सीबीआई ने राजरहाट मामले में कथित तौर पर शामिल रकम या प्रभावित घर खरीदारों की संख्या का खुलासा नहीं किया है.
Rain Forest प्रोजेक्ट से जुड़ा है मामला
सीबीआई की कार्रवाई MKHS Housing LLP से संबंधित है, जिसका जुड़ाव राजरहाट स्थित Rain Forest आवासीय परियोजना से बताया गया है. अलग-अलग अदालतों में चल रही कार्यवाही में भी इस परियोजना से जुड़े घर खरीदारों की शिकायतें सामने आई हैं. एक मामले में एक उपभोक्ता ने दावा किया था कि उसने इस परियोजना में दो फ्लैटों के लिए 11 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया था और बाद में बुकिंग रद्द कर रकम वापस मांगी थी.
अलग-अलग न्यायिक कार्यवाहियों में MKHS Housing LLP और Indiabulls Distribution Services के बीच वित्तीय लेनदेन का भी उल्लेख हुआ है. इनमें से एक मामले में परियोजना के निर्माण और विकास के लिए रकम उपलब्ध कराने से जुड़े इंटर-कॉरपोरेट डिपॉजिट समझौते का जिक्र है. हालांकि, ये कार्यवाहियां सीबीआई की मौजूदा आपराधिक जांच से अलग हैं और अपने आप में आरोपियों को दोषी साबित नहीं करती हैं.
दिल्ली-NCR से बाहर भी फैली जांच
सीबीआई की यह कार्रवाई बिल्डरों, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के बीच कथित मिलीभगत से जुड़े बड़े मामले की जांच का हिस्सा है. यह मामला होम लोन सबवेंशन स्कीम से संबंधित शिकायतों के बाद सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में आया था.
मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि इन मामलों में घर खरीदारों, बिल्डरों और बैंकों या वित्तीय संस्थाओं से जुड़े विवाद शामिल हैं. कोर्ट ने यह भी नोट किया था कि कुछ सबवेंशन व्यवस्थाओं में बैंकों ने लोन की बड़ी रकम पहले ही बिल्डरों को जारी कर दी थी.
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सात प्रारंभिक जांच करने का निर्देश दिया. अप्रैल 2025 में कोर्ट ने प्रथम दृष्टया बैंकों या हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों और बिल्डरों के बीच कथित "अपवित्र गठजोड़" पाए जाने की बात कही थी और सीबीआई को मामले की जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया था.
1,000 से ज्यादा लोगों से पूछताछ
जुलाई 2025 तक सीबीआई छह प्रारंभिक जांच पूरी कर चुकी थी और 22 नियमित मामले दर्ज करने की अनुमति मांगी थी. सीबीआई की रिपोर्ट में आगे की जांच के लिए पर्याप्त सबूत मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एजेंसी को आगे बढ़ने की अनुमति दी.
अदालत को यह भी बताया गया था कि सीबीआई की विशेष जांच टीम ने 1,000 से अधिक लोगों से पूछताछ की और 58 परियोजना स्थलों का दौरा किया. टीम ने जांच के दौरान बड़ी मात्रा में दस्तावेजों की भी समीक्षा की. बाद में जांच का दायरा दिल्ली-NCR से बाहर की परियोजनाओं तक बढ़ाया गया. सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता, बेंगलुरु, मुंबई, मोहाली और प्रयागराज की परियोजनाओं से जुड़े छह अतिरिक्त मामले दर्ज करने की सीबीआई को अनुमति दी थी.
पिछले महीने भी दाखिल हुई थीं दो चार्जशीट
सीबीआईकी ताजा कार्रवाई से पहले एजेंसी पिछले महीने दो और चार्जशीट दाखिल कर चुकी है. 14 जुलाई को सीबीआई ने नोएडा की एक हाउसिंग परियोजना में कथित धोखाधड़ी के मामले में Saha Infratech, उसके निदेशक और HDFC Bank तथा ICICI Bank के अधिकारियों के खिलाफ अपनी 16वीं चार्जशीट दाखिल की थी.
इसके बाद एजेंसी ने बेंगलुरु की एक हाउसिंग परियोजना से जुड़े कथित फर्जीवाड़े में Ozone Urbana Infra Developers और उसके एक निदेशक के खिलाफ 17वीं चार्जशीट दाखिल की थी. इस मामले में भी सीबीआई ने आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के आरोप लगाए हैं. MKHS Housing और Indiabulls से जुड़ी ताजा चार्जशीट के साथ सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही इस जांच में CBI की चार्जशीट की संख्या अब 18 हो गई है.
31 अन्य मामलों की जांच जारी
सीबीआई के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत देशभर की अलग-अलग बिल्डर कंपनियों और बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं के अज्ञात अधिकारियों के खिलाफ दर्ज 31 अन्य मामलों की जांच अभी जारी है. इन मामलों में घर खरीदारों के साथ कथित धोखाधड़ी और फंड के कथित डायवर्जन से जुड़े आरोपों की जांच की जा रही है. हालांकि, चार्जशीट में लगाए गए आरोपों पर अभी अदालत में सुनवाई होनी बाकी है. आरोप साबित होने तक सभी आरोपी कानून की नजर में निर्दोष माने जाएंगे.
ED का आरोप है कि जितेश गुप्ता ने फर्जी दावों को दोबारा स्वीकार कर CoC की संरचना बदली और दिनेश गुप्ता से जुड़ी इकाई के रिजॉल्यूशन प्लान को आगे बढ़ाने में मदद की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बेस्ट फूड्स मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल जितेश गुप्ता को गिरफ्तार किया है. ईडी ने एक्स पर एक पोस्ट के साथ प्रेस रीलीज साझा करते हुए बताया है कि जितेश गुप्ता को 12 अगस्त 2026 को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत गिरफ्तार किया गया. उन्हें विशेष PMLA अदालत में पेश किया गया, जहां से आगे की जांच के लिए ईडी की हिरासत में भेज दिया गया.
बता दें, जितेश गुप्ता M/s होमस्टेड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड और M/s गोल्डन पीकॉक रेजिडेंस प्राइवेट लिमिटेड की कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में अंतरिम रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल और रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (IRP/RP) के रूप में कार्य कर चुके हैं.
ED has arrested Jitesh Gupta, Insolvency Professional, who acted as Interim Resolution Professional/Resolution Professional (IRP/RP) in the Corporate Insolvency Resolution Process (CIRP) of M/s Homestead Infrastructure Development Pvt. Ltd. and M/s Golden Peacock Residence Pvt.… pic.twitter.com/H5AATVAxsT
— ED (@dir_ed) August 12, 2026
CBI की FIR के आधार पर शुरू हुई जांच
ईडी ने बताया कि इस मामले में जांच की शुरुआत M/s बेस्ट फूड्स लिमिटेड के खिलाफ CBI द्वारा दर्ज FIR के आधार पर की गई थी. FIR में IPC, 1860 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे.
जांच एजेंसी का आरोप है कि M/s बेस्ट फूड्स लिमिटेड और उससे जुड़ी संस्थाओं का नियंत्रण संभाल रहे दिनेश गुप्ता ने फर्जी और शेल कंपनियों के जरिए लोन की रकम का डायवर्जन किया और अपराध से अर्जित धन को मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए ठिकाने लगाने की कोशिश की.
CoC की संरचना बदलने का आरोप
ईडी के मुताबिक, जांच में यह भी सामने आया कि जितेश गुप्ता ने IRP/RP के रूप में अपनी भूमिका निभाते हुए कुछ ऐसे दावों को दोबारा स्वीकार कर लिया, जिन्हें वह पहले फर्जी और धोखाधड़ीपूर्ण बताते हुए खारिज कर चुके थे. एजेंसी का दावा है कि इससे कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) की संरचना में बदलाव हुआ.
ईडी ने आरोप लगाया कि इस कदम से दिनेश गुप्ता के लिए फ्रंट के रूप में काम करने वाली और उनके नियंत्रण वाली एक इकाई से वित्तपोषित रिजॉल्यूशन प्लान को आगे बढ़ाने में मदद मिली. एजेंसी के अनुसार, जितेश गुप्ता ने दिनेश गुप्ता से जुड़े एक व्यक्ति को संभावित रिजॉल्यूशन आवेदक के तौर पर भी सिफारिश की थी.
NCLT ने भी की थी प्रतिकूल टिप्पणी
प्रेस रिलीज के अनुसार, NCLT ने 9 सितंबर 2025 के अपने आदेश में जितेश गुप्ता के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं. ईडी ने कहा कि आदेश में उनके द्वारा मनगढ़ंत और अनुचित तरीके से प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों पर भरोसा कर अपनी शक्तियों से आगे बढ़कर काम करने का उल्लेख किया गया था. इसके बाद उनके स्थान पर दूसरे रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की नियुक्ति का निर्देश दिया गया था.
संदिग्ध वित्तीय लेनदेन की भी जांच
ईडी की जांच में जितेश गुप्ता को दिनेश गुप्ता, M/s बेस्ट फूड्स लिमिटेड और उसकी समूह कंपनियों से जुड़े कई लोगों से कथित तौर पर अस्पष्ट वित्तीय लेनदेन के जरिए धन मिलने की बात भी सामने आई है. एजेंसी के अनुसार, इन लेनदेन के बदले किसी वैध प्रतिफल का रिकॉर्ड नहीं मिला है.
ईडी का दावा है कि अब तक जुटाए गए सबूतों से यह सामने आया है कि जितेश गुप्ता ने जानबूझकर अपराध से अर्जित आय से जुड़ी प्रक्रिया और गतिविधियों को सुविधाजनक बनाया. एजेंसी ने कहा कि इस मामले में PMLA के तहत आगे की जांच जारी है.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दुबई के अरबपति की "बच निकलने की रणनीति" को ध्वस्त कर दिया है, जिसे BW Businessworld की उन स्टोरीज ने व्यवस्थित रूप से उजागर किया था, जिनके बाद UAE में उनकी संपत्तियां फ्रीज होने की खबरें सामने आईं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भारत मूल के दुबई के अरबपति सतीश सनपाल के खिलाफ जबलपुर में दर्ज करीब आधा दर्जन FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया है. नेटफ्लिक्स (Netflix) के Desi Bling में दिखाई दे चुके उद्यमी सतीश सनपाल के खिलाफ भारत में कथित IPL सट्टेबाजी रैकेट के सिलसिले में ये FIR दर्ज की गई थीं.
12 अगस्त 2026 को याचिकाओं को खारिज करते हुए जस्टिस हिमांशु जोशी ने कहा कि किसी आरोपी की छापेमारी वाली जगह पर भौतिक मौजूदगी उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए जरूरी शर्त नहीं है. उन्होंने कहा कि जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों की सुनवाई के दौरान जांच होनी चाहिए, न कि FIR रद्द करके उससे पहले ही मामले को खत्म कर दिया जाए. इसी राहत की मांग करने वाले चार सह-आरोपियों की याचिकाएं भी खारिज कर दी गईं. इन मामलों में चार्जशीट पहले ही दाखिल की जा चुकी है और अदालत ने प्रथम दृष्टया अपराध बनता पाया है, जिससे मामलों को ट्रायल के लिए आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है. सतीश सनपाल के वकीलों ने अपनी दलीलें एक शब्द पर खड़ी की थीं: दूरी.
सतीश सनपाल 14 मार्च 2020 को भारत से चले गए थे और वापस नहीं लौटे. दुबई से उनके वकीलों ने दलील दी कि जो व्यक्ति देश में मौजूद नहीं था, किसी छापेमारी के दौरान नहीं था, किसी जब्त फोन में नहीं था, किसी चैट में नहीं था, उसे जबलपुर से चल रहे सट्टेबाजी रैकेट से नहीं जोड़ा जा सकता. 12 अगस्त 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने उन्हें बताया कि दूरी बचाव नहीं है.
जबलपुर में एकल पीठ के रूप में बैठे जस्टिस हिमांशु जोशी ने करीब आधा दर्जन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनके जरिए सनपाल ने जबलपुर के चार पुलिस थानों में उनके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी. इसी राहत की मांग करने वाले चार सह-आरोपियों की याचिकाएं भी साथ में खारिज कर दी गईं.
अदालत का मुख्य निष्कर्ष वही पंक्ति है जो सबसे महत्वपूर्ण है. इस तरह के अपराधों में अदालत ने कहा कि छापेमारी वाली जगह पर आरोपी की भौतिक मौजूदगी उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए जरूरी शर्त नहीं है. अदालत ने कहा कि जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री का परीक्षण ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए, FIR रद्द करके उससे पहले ही मामले को खत्म नहीं किया जा सकता. चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी थी और अदालत ने प्रथम दृष्टया अपराध बनता पाया.
बचाव की वह दलील जो विफल हुई
सनपाल की याचिकाओं में FIR के खिलाफ हर संभव दलील दी गई थी. याचिकाओं में कहा गया कि उन्हें मास्टरमाइंड केवल गिरफ्तार किए गए आरोपियों के दर्ज बयानों के आधार पर बनाया गया. उनके बैंक खाते से कोई पैसा नहीं गया था; उनसे कुछ बरामद नहीं हुआ था; सह-आरोपी के फोन की फॉरेंसिक जांच में उनके खिलाफ कुछ नहीं मिला; अभियोजन जिन चैट्स पर भरोसा कर रहा था, उनमें न तो उनका नाम था और न ही उनसे जुड़ा कोई मोबाइल नंबर. याचिकाओं में जोर देकर कहा गया कि वह 2020 से दुबई में रह रहे थे और अपराध होने के समय भारत में नहीं थे. यह भी कहा गया कि जिन कंपनियों के इस्तेमाल का आरोप उन पर लगाया गया, वे वास्तविक कंपनियां थीं, उन्होंने अपने वैधानिक रिटर्न दाखिल किए थे और उन्हें गलत तरीके से उनका निदेशक बताया गया.
राज्य ने जवाब दिया कि उचित जांच के बाद याचिकाकर्ता की संलिप्तता दिखाने वाली पर्याप्त सामग्री जुटाई गई है, चार्जशीट पहले ही अदालत में दाखिल की जा चुकी है और उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है. हाई कोर्ट ने अभियोजन का पक्ष माना और ऐसा करते हुए "बच निकलने की रणनीति" की परतें खोल दीं.
BW Businessworld ने इस सीरीज में जिस पूरी व्यवस्था को दस्तावेजों के आधार पर सामने रखा, वह एक ही धारणा पर टिकी थी: विदेश में रहना सतीश सनपाल को मामले की पहुंच से बाहर कर देता है. अब एक हाई कोर्ट ने इसके उलट फैसला दिया है. अदालत ने कहा कि घटनास्थल से अनुपस्थिति जिम्मेदारी खत्म नहीं करती; सबूत भागीदारी साबित करते हैं या नहीं, यह ट्रायल का सवाल है, न कि ट्रायल शुरू होने से पहले FIR खत्म करने का आधार. BW की स्टोरीज के बाद UAE में सनपाल की संपत्तियां फ्रीज होने की खबरें सामने आईं.
इसका क्या मतलब है
व्यावहारिक असर सीधा और गंभीर है. FIR कायम हैं. चार्जशीट कायम है. अब मामले जबलपुर में ट्रायल के लिए आगे बढ़ेंगे. ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसने छह साल यह सुनिश्चित करने में बिताए कि किसी काउंटर पर कभी कोई शरीर मौजूद न हो, दुबई में रहकर वह जिस अदालत से बच नहीं सकता था, वह अब उसके मामलों की अगली मंजिल के रूप में तय हो गई है.
हाल के महीनों की घटनाओं की कड़ी में इस फैसले को देखें तो दिशा साफ दिखाई देती है. दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा पुष्टि किया गया लुक-आउट सर्कुलर. पत्नी, जिसे ₹352 करोड़ के साथ घोषित अपराधी बताया गया और जिसे दुबई से मांगा गया पासपोर्ट नहीं दिया गया. UAE द्वारा खुद उनकी संपत्तियां फ्रीज किए जाने की खबर. और अब हाई कोर्ट का उन FIR को रद्द करने से इनकार, जिन्हें वह सबसे ज्यादा खत्म कराना चाहते थे. इनमें से हर घटना अपने आप में एक झटका है; साथ मिलकर वे एक घेरा कसने की तस्वीर पेश करते हैं.
यह फैसला जिस सवाल को और तेज करता है
FIR रद्द करने से इनकार ने उस सवाल को भी और धार दे दी है, जिसे BW पहले उठाता रहा है. अगर एक हाई कोर्ट ने दर्ज किया है कि जांच की सामग्री प्रथम दृष्टया उनकी भागीदारी की ओर इशारा करती है और चार्जशीट पहले ही ट्रायल कोर्ट के सामने है, तो प्रवर्तन निदेशालय द्वारा ECIR दर्ज करने, पैसों के ट्रेल शेल कंपनियों और ऑफशोर रास्तों का पीछा करने और भगोड़े आर्थिक अपराधी अधिनियम की संभावनाओं पर विचार करने की मांग अब समय से पहले की नहीं लगती. यह लंबित नजर आती है.
इनमें से कोई भी बात दोषसिद्धि नहीं है. FIR रद्द करने से इनकार करना अपराध का दोषी पाए जाने के बराबर नहीं है; यह केवल यह फैसला है कि मामला ट्रायल के योग्य है. सतीश सनपाल अब भी आरोपी हैं, उन्हें निर्दोष माने जाने का अधिकार है और वह ट्रायल के दौरान अपनी याचिकाओं में कही गई बातों को साबित करने के लिए स्वतंत्र हैं. लेकिन जिस दरवाजे को बंद कराने के लिए वह हाई कोर्ट गए थे, उसे खुला रखा गया है और जिस ट्रायल से वह बुर्ज खलीफा के पेंटहाउस में रहकर बच नहीं सकते, अब वही उस दरवाजे से आगे जाने का एकमात्र रास्ता है.
UAE में संपत्तियां फ्रीज किए जाने की खबर को आधिकारिक पुष्टि लंबित रहने तक प्रेस रिपोर्ट्स के हवाले से बताया गया है. सतीश सनपाल को आपराधिक मामलों में जमानत मिल चुकी है, उन्हें दोषी नहीं ठहराया गया है और उन्हें न्यायिक रूप से घोषित अपराधी नहीं माना गया है; वह आरोपों से इनकार करते हैं और मानहानि की कार्यवाही शुरू कर चुके हैं. वह, सोनिया सनपाल और नामित सभी व्यक्ति आरोपी हैं और उन्हें निर्दोष माने जाने का अधिकार है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
अदालत ने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को साइबर ठगी की शिकायतों के त्वरित निपटारे और पीड़ितों की रकम वापस दिलाने के लिए प्रभावी व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देशभर में बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को चार सप्ताह के भीतर साइबर वित्तीय धोखाधड़ी से निपटने के लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश दिया है. साथ ही राज्यों, बैंकों और जांच एजेंसियों को पीड़ितों का पैसा वापस दिलाने, फर्जी खातों पर कार्रवाई और जागरूकता बढ़ाने के लिए कई अहम निर्देश जारी किए हैं.
RBI को 4 हफ्ते में SOP तैयार करने का निर्देश
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने RBI को चार सप्ताह के भीतर ऐसी SOP तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसमें म्यूल अकाउंट (फर्जी खातों) और अन्य बैंक खातों के जरिए होने वाली साइबर ठगी पर रोक लगाने के प्रभावी उपाय शामिल हों.
अदालत ने कहा कि SOP में संदिग्ध खातों से अस्थायी निकासी रोकने, शिकायतों के त्वरित निपटारे, ठगी में गंवाई गई रकम वापस दिलाने की व्यवस्था और इन सुविधाओं के बारे में लोगों को जागरूक करने के प्रावधान होने चाहिए.
क्या होता है म्यूल अकाउंट?
म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खाते होते हैं, जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधी ठगी से हासिल रकम को एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करने के लिए करते हैं. कई मामलों में लोग मामूली पैसे के लालच में अपने बैंक खाते या पहचान संबंधी दस्तावेज दूसरों को उपलब्ध करा देते हैं, जिनका बाद में साइबर अपराध में इस्तेमाल होता है.
डिजिटल अरेस्ट मामलों पर स्वत: संज्ञान
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े साइबर धोखाधड़ी के मामलों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए यह आदेश दिया. डिजिटल अरेस्ट एक ऐसा साइबर फ्रॉड है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, CBI, ED या किसी अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल के जरिए लोगों को डराते हैं और उन्हें ऑनलाइन 'नजरबंद' जैसा माहौल बनाकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं.
राज्यों और एजेंसियों को भी दिए निर्देश
अदालत ने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को साइबर ठगी की शिकायतों के त्वरित निपटारे और पीड़ितों की रकम वापस दिलाने के लिए प्रभावी व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया है. अदालत ने कहा कि पीड़ितों को जल्द राहत मिलनी चाहिए.
बनेगी अंतर-विभागीय समिति
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों को मुआवजा देने और विभिन्न एजेंसियों की साझा जिम्मेदारी तय करने के लिए एक अंतर-विभागीय समिति गठित करने का भी निर्देश दिया है. यह समिति सरकार और संबंधित विभागों को डिजिटल अरेस्ट जैसी धोखाधड़ी रोकने, बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने और केंद्र की SOP को प्रभावी तरीके से लागू करने के संबंध में सुझाव देगी.
बैंकों के साथ मिलकर बनेगी रणनीति
अदालत ने कहा कि यह समिति बैंकों के साथ मिलकर साइबर धोखाधड़ी रोकने, चोरी हुए पैसे की रिकवरी तेज करने और जांच एजेंसियों को बेहतर सहयोग देने की दिशा में काम करेगी.
हजारों पीड़ितों को वापस मिले 18 करोड़ रुपये
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की स्टेटस रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत ने बताया कि 57 बैंकों और सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के सहयोग से 36,290 मामलों में पीड़ितों को अब तक 18.05 करोड़ रुपये वापस दिलाए जा चुके हैं.
CBI भी कर रही बड़े नेटवर्क की जांच
सुप्रीम कोर्ट ने संगठित साइबर फ्रॉड नेटवर्क के खिलाफ CBI की कार्रवाई का भी उल्लेख किया. एजेंसी ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े कई मामले दर्ज किए हैं, 67 बैंक खातों के जरिए हुए लेनदेन के आधार पर पीड़ितों की पहचान की है और 16 राज्यों में 93 स्थानों पर छापेमारी की है.
बैंक AI की मदद से कर रहे निगरानी
एक सरकारी बैंक के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, बैंक अब साइबर अपराध से जुड़े मोबाइल नंबरों की निगरानी, संदिग्ध ट्रांजैक्शन का विश्लेषण और AI आधारित फ्रॉड डिटेक्शन टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके अलावा रियल-टाइम ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग, बड़ी रकम के ट्रांसफर पर कॉलबैक वेरिफिकेशन, OTP आधारित प्रमाणीकरण और मजबूत KYC प्रक्रिया के जरिए सुरक्षा बढ़ाई जा रही है.
हालांकि, बैंकिंग विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों से है, जो थोड़े से पैसे के लालच में अपने बैंक खाते या पहचान पत्र दूसरों को इस्तेमाल करने के लिए दे देते हैं. यही खाते बाद में साइबर अपराधियों के लिए मनी ट्रांसफर का माध्यम बन जाते हैं.
जांच एजेंसी का कहना है कि अवैध धन को विदेशी पोर्टफोलियो निवेश, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड, क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट और अन्य विदेशी निवेश माध्यमों के जरिए भारत में लाया गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने महादेव ऑनलाइन बुक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ा खुलासा करने का दावा किया है. एजेंसी के अनुसार, अवैध ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म स्काईएक्सचेंज (Skyexchange) से अर्जित धन का इस्तेमाल अमेरिकी सॉफ्टवेयर कंपनी Ebix के अधिग्रहण के लिए किया गया. ED का कहना है कि इस धन को विदेशी निवेश के जरिए वैध निवेश का रूप देकर भारत लाया गया.
ED का क्या है आरोप?
ED के मुताबिक, कारोबारी विकास गर्ग ने स्काईएक्सचेंज के जरिए कमाई गई अवैध रकम को Eraaya Lifespaces के माध्यम से Ebix के अधिग्रहण में लगाया. एजेंसी ने धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जारी अपने अंतरिम कुर्की आदेश में यह दावा किया है.
जांच एजेंसी का कहना है कि अवैध धन को विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI), प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड (FCCBs), क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) और अन्य विदेशी निवेश माध्यमों के जरिए भारत में लाया गया.
765.77 करोड़ रुपये की कथित अवैध कमाई का इस्तेमाल
ED के अनुसार, लगभग 765.77 करोड़ रुपये की कथित अपराध से अर्जित राशि को विकास गर्ग, उनके परिवार और उनसे जुड़ी कंपनियों तक पहुंचाया गया. इन पैसों का इस्तेमाल Eraaya Lifespaces में हिस्सेदारी खरीदने और बाद में Ebix के अधिग्रहण के लिए किया गया.
एजेंसी का दावा है कि Eraaya Lifespaces ने अगस्त 2024 में अमेरिकी दिवालिया अदालत (US Bankruptcy Court) के जरिए Ebix में 57.58% हिस्सेदारी खरीदी थी.
कैसे हुई फंडिंग?
ED के मुताबिक, Ebix के अधिग्रहण के लिए कई स्रोतों से धन जुटाया गया, जिनमें लगभग 250 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश, करीब 374.4 करोड़ रुपये का QIP और FCCBs के जरिए जुटाई गई राशि शामिल थी.
जांच में यह भी सामने आया कि अगस्त 2024 में Eraaya के QIP एस्क्रो खाते में विदेशी निवेशकों से 248.5 करोड़ रुपये आए, जिन्हें बाद में कंपनी के मुख्य खाते में ट्रांसफर कर Ebix अधिग्रहण में इस्तेमाल किया गया.
इसके अलावा, जांचकर्ताओं ने विकास लाइफकेयर से जुलाई 2024 से जुलाई 2025 के बीच Ebix को लगभग 292.4 करोड़ रुपये के ट्रांसफर का भी पता लगाया. एजेंसी का आरोप है कि इन लेन-देन को कंपनी के वित्तीय विवरणों में ऋण, अग्रिम और निवेश के रूप में दर्ज किया गया.
कोलकाता के एंट्री ऑपरेटर का भी नाम
ED का आरोप है कि कोलकाता स्थित कथित एंट्री ऑपरेटर अमित सरावगी ने लगभग 526 करोड़ रुपये की फर्जी लेखा प्रविष्टियों (एंट्री) की व्यवस्था की. एजेंसी के मुताबिक, इनमें से करीब 175 करोड़ रुपये विकास गर्ग से जुड़ी कंपनियों में भेजे गए, जिनमें GG Engineering जैसी कंपनियां भी शामिल हैं.
हर महीने 450 करोड़ रुपये की कथित अवैध कमाई
ED का दावा है कि महादेव ऑनलाइन और स्काईएक्सचेंज नेटवर्क हर महीने 450 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध कमाई कर रहे थे. इस धन को शेल कंपनियों, फर्जी दस्तावेजों और कई स्तरों वाले वित्तीय लेन-देन के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग कर विभिन्न संपत्तियों में निवेश किया गया.
940.77 करोड़ रुपये की संपत्तियां अटैच
डिजिटल सबूतों, बैंक रिकॉर्ड और PMLA के तहत जुटाए गए दस्तावेजों के आधार पर ED ने निष्कर्ष निकाला कि विकास गर्ग से जुड़ी संस्थाओं में निवेश किए गए 765.77 करोड़ रुपये अपराध से अर्जित आय हैं.
इसी आधार पर एजेंसी ने Ebix में Eraaya Lifespaces की 163.8 करोड़ रुपये की शेयरहोल्डिंग और लगभग 47.74 करोड़ रुपये की अचल संपत्तियों समेत कुल 940.77 करोड़ रुपये की संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया है.
जांच अभी जारी
ED ने कहा है कि महादेव ऑनलाइन बुक और स्काईएक्सचेंज नेटवर्क के संचालकों, प्रमोटरों और सहयोगियों के खिलाफ छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में दर्ज मामलों के आधार पर जांच जारी है. एजेंसी का कहना है कि संपत्तियों को कुर्क करने का उद्देश्य उन्हें बेचे जाने या स्थानांतरित किए जाने से रोकना है, ताकि जांच और कानूनी कार्रवाई प्रभावित न हो.
दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने मंगलवार को ED की याचिका स्वीकार करते हुए विकास गर्ग की 24 घंटे की ट्रांजिट रिमांड मंजूर की. एजेंसी ने अदालत से कहा था कि रायपुर स्थित विशेष PMLA अदालत में पेश करने के लिए गर्ग को वहां ले जाना जरूरी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
महादेव ऑनलाइन बेटिंग ऐप से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार ईबिक्स (Ebix) के चेयरमैन विकास गर्ग को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट से राहत नहीं मिली. कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को 24 घंटे की ट्रांजिट रिमांड मंजूर कर दी है, जिसके बाद उन्हें छत्तीसगढ़ के रायपुर ले जाया जाएगा. वहां उन्हें धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत गठित विशेष अदालत में पेश किया जाएगा. यह कार्रवाई महादेव बेटिंग सिंडिकेट से जुड़े कथित अवैध धन के लेनदेन की जांच के तहत की गई है.
दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विजय शंकर ने मंगलवार को ED की याचिका स्वीकार करते हुए विकास गर्ग की 24 घंटे की ट्रांजिट रिमांड मंजूर की. एजेंसी ने अदालत से कहा था कि रायपुर स्थित विशेष PMLA अदालत में पेश करने के लिए गर्ग को वहां ले जाना जरूरी है.
940.7 करोड़ रुपये की संपत्तियां पहले ही हो चुकी हैं अटैच
गिरफ्तारी से कुछ दिन पहले ही ED ने PMLA के तहत विकास गर्ग, उनके परिवार और उनसे जुड़ी संस्थाओं की करीब 940.7 करोड़ रुपये की संपत्तियां अस्थायी रूप से कुर्क (अटैच) की थीं. एजेंसी के मुताबिक इनमें आवासीय संपत्तियां, जमीन, इक्विटी शेयर और अन्य प्रतिभूतियां शामिल हैं. ED का आरोप है कि ये सभी संपत्तियां अवैध बेटिंग नेटवर्क से अर्जित अपराध की आय (Proceeds of Crime) से खरीदी गईं.
जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा
10 जुलाई को जारी अपने बयान में ED ने कहा था कि विकास गर्ग के खिलाफ "महादेव ऑनलाइन बुक या स्काईएक्सचेंज अवैध ऑनलाइन बेटिंग मामले" में PMLA के तहत कार्रवाई की जा रही है. जांच के दायरे में महादेव बुक ऐप और दुबई स्थित बेटिंग प्लेटफॉर्म स्काईएक्सचेंज भी शामिल हैं.
अप्रैल 2025 में ED ने विकास गर्ग के आवास और उनकी कंपनियों के कार्यालयों पर छापेमारी की थी. उस समय उनकी कंपनियों ने शेयर बाजार को दी जानकारी में कहा था कि जांच कुछ तीसरे पक्ष और उनके लेनदेन से जुड़ी है. बाद में नियामकीय फाइलिंग में कंपनियों ने PMLA के तहत चल रही कार्रवाई की पुष्टि की, लेकिन सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वे कानूनी मंचों पर इसका विरोध कर रही हैं.
कई सूचीबद्ध कंपनियों से जुड़े हैं विकास गर्ग
विकास गर्ग, विकास लाइफकेयर और विकास इकोटेक के प्रमोटर हैं. दोनों कंपनियां नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में सूचीबद्ध हैं. इसके अलावा ईबिज (Ebiz) बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में सूचीबद्ध है. अगस्त 2024 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की दिल्ली इकाई के आर्थिक प्रकोष्ठ का संयोजक भी नियुक्त किया गया था.
क्या है महादेव बेटिंग ऐप मामला?
महादेव बेटिंग ऐप मामले में आरोप है कि सिंडिकेट ने हवाला, क्रिप्टोकरेंसी और बेनामी बैंक खातों के जरिए अवैध कमाई को वैध दिखाने की कोशिश की. ED के अनुसार यह नेटवर्क टाइगर एक्सचेंज, गोल्ड365 और लेजर247 जैसे कई ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म के जरिए फ्रेंचाइजी मॉडल पर पूरे भारत में संचालित होता था. एजेंसी का दावा है कि इसका संचालन दुबई से कथित मास्टरमाइंड सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल करते थे.
ओमान में मिला सौरभ चंद्राकर
इस मामले में एक अन्य बड़ी कार्रवाई के तहत महादेव बेटिंग ऐप के कथित प्रमोटर और लगभग 6,000 करोड़ रुपये के घोटाले के प्रमुख आरोपी सौरभ चंद्राकर का ओमान में पता लगाया गया है. ED और छत्तीसगढ़ पुलिस के अनुरोध पर जारी इंटरपोल रेड नोटिस के आधार पर रॉयल ओमान पुलिस ने उसे हिरासत में लिया है. भारत सरकार ने उसके प्रत्यर्पण (Extradition) की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है.
ED इससे पहले सौरभ चंद्राकर से जुड़ी लगभग 1,700 करोड़ रुपये की संपत्तियां भी कुर्क कर चुकी है, जिनमें दुबई स्थित लग्जरी विला और प्रीमियम अपार्टमेंट शामिल हैं.
2022 से जारी है जांच
महादेव बेटिंग ऐप मामले की जांच 2022 से चल रही है और समय के साथ इसका दायरा काफी बढ़ गया है. ED के अनुसार अब तक देशभर में 175 से अधिक स्थानों पर तलाशी ली जा चुकी है, 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, 74 आरोपियों के खिलाफ पांच अभियोजन शिकायतें (Prosecution Complaints) दायर की गई हैं और भारत व विदेशों में हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियां कुर्क की जा चुकी हैं.