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जिनकी कंपनी ने दिया 'विको टरमरिक,नहीं कॉस्‍मेटिक' जैसा जिंगल, वो यशवंत पंढ़ेरकर नहीं रहे

ये कंपनी उस दौर में खड़ी हुई जब देश में लोग कई विदेशी ब्रैंड की क्रीम को इस्‍तेमाल कर रहे थे. उनका इस बाजार पर एकछत्र राज था. लेकिन ये इस कारोबारी की हिम्‍मत थी कि उसने देश का ब्रैंड शुरू किया. 

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

ये वो दौर था जब टीवी पर सिर्फ दूरदर्शन आया करता था, टीवी की दिवानगी ऐसी थी कि जो भी विज्ञापन आता वो गाना बनकर लोगों की जुबां पर चढ़ जाता था. उन्‍होंने अपनी कंपनी का एक ऐसा टीवी जिंगल बनाया जो लोगों की जुबां पर चढ़ गया. यहां गीत लोगों की जुबां पर चढ़ा और वहां कंपनी का टर्नओवर दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ने लगा. अपने प्रोडक्‍ट की बेहतरीन क्‍वॉलिटी और टीवी जिंगल से कारोबार खड़ा करने वाले यशवंत पढ़ेरकर अब हमारे बीच नहीं रहे. 85 साल के यशवंत ने शुक्रवार को आखिरी सांस थी. यशवंत पढ़ेरकर भारत के पहले आयुवेर्दिक क्रीम के जनक थे. 

आखिर कहां से शुरू हुआ था विको का सफर 
अगर ये कहा जाए कि विको की शुरुआत शून्‍य से शुरू होकर आज शिखर तक जा पहुंची है तो शायद गलत नहीं होगा. विको की शुरुआत केशव विष्‍णु पढ़ेरकर ने मुंबई के एक छोटे से गोदाम से की थी. शुरुआती दिनों में उन्‍होंने एक घर से इस क्रीम और पेस्‍ट को बनाना शुरू किया उसके बाद देखते ही देखते कंपनी का प्रोडक्‍ट लोगों को ऐसा भाया कि कंपनी निकल पड़ी. 1952 से शुरू हुआ कंपनी का सफर 1955 आते आते ऐसा तेजी से आगे बढ़ा कि      कंपनी का टर्नओवर 10 लाख रुपये सालाना हो गया. परेल के एक छोटे से गोदाम से शुरू हुई कंपनी जल्‍द ही बड़ी कंपनी में तब्‍दील हो गई. 

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2016 में बने कंपनी के चेयरमैन 
केशव विष्‍णु पढ़ेरकर नागपुर के रहने वाले थे. वहां वो एक राशन की दुकान चलाते थे लेकिन कुछ अलग करने की चाहत उनके हमेशा ही उनके दिल में थी. इसी का नतीजा था कि वो एक दिन मुंबई आ गए. उन्‍होंने मुंबई आकर देखा कि बाजार में पॉन्‍ड्स, नीविया, अफगान स्‍नो, जैसे विदेशी कॉस्‍मेटिक का लोग खूब इस्‍तेमाल करते हैं. यहीं से उन्‍हें विको को शुरू करने का आईडिया मिला. उन्‍होंने शुरुआत की और एक दिन ये हुआ कि आखिरकार उनकी कंपनी की हर ओर चर्चा होने लगी. विको ने अपने दौर में हिमालया और डाबर जैसे ब्रैंड्स को कड़ी टक्‍कर दी. वहीं इंटरनेशनल मार्केट में भी विको ने अपनी पहचान बनाई. 

यशवंत ने अपनी एलएलबी की पढ़ाई से किया कमाल 
यशवंत ने अपनी एलएलबी की पढ़ाई पूरी करके विको लेबोरेट्रीज में काम करना शुरू कर दिया. उन दिनों देश में इंस्‍पेक्‍टर राज चल रहा था. तभी एक्‍साइज डिपार्र्टमेंट से एक मामले को लेकर उनकी कानूनी लड़ाई शुरू हो गई. विको लेबोरेट्रीज और यशवंत के बीच 30 साल लंबी कानूनी लड़ाई चली. इस लड़ाई में उनकी कानूनी पढ़ाई ने उन्‍हें काफी मदद की और वो 1978 में एक्‍साइज डिपार्टमेंट से केस जीत गए. विको की शुरुआत भले ही मुंबई से हुई थी लेकिन यशवंत ने कंपनी की फैक्‍ट्री अपने घर नागपुर में ही शुरू की. 
 


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