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कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज की वापसी कितनी व्यावहारिक? जानिए क्या कहते हैं बाजार विशेषज्ञ

विशेषज्ञों की राय बताती है कि CSE का पुनर्जीवन केवल एक ऐतिहासिक संस्था को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह पूर्वी भारत के वित्तीय भविष्य से जुड़ा मुद्दा भी बन सकता है.

रितु राणा 4 months ago

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा 118 साल पुराने कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) को पुनर्जीवित करने की पहल ने वित्तीय जगत में नई बहस छेड़ दी है. हाल ही में राज्य सरकार ने बजट में एक्सचेंज को दोबारा शुरू करने की मंशा जाहिर की थी, जिसके बाद CSE के भविष्य और उसकी संभावनाओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है. ऐसे में बाजार और निवेश जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि CSE की वापसी केवल एक ऐतिहासिक संस्थान के पुनर्जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूर्वी भारत के लिए नए वित्तीय इकोसिस्टम और पूंजी बाजार के विकास का अवसर भी बन सकती है. हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि NSE और BSE के वर्चस्व वाले मौजूदा दौर में CSE के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी होंगी. 

CSE सिर्फ एक्सचेंज नहीं, 'कैपिटल एक्सेस हब' बन सकता है

एसआईपी यात्रा के संस्थापक और वित्त विशेषज्ञ हर्ष गुप्ता का मानना है कि CSE को केवल एक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के रूप में देखना इसकी भूमिका को सीमित करना होगा. उनके मुताबिक, पूर्वी भारत में MSME, स्टार्टअप और क्षेत्रीय उद्योगों के लिए पूंजी तक पहुंच अभी भी एक बड़ी चुनौती है. यदि CSE को आधुनिक तकनीक, मजबूत नियामकीय ढांचे और निवेशक शिक्षा के साथ दोबारा विकसित किया जाता है, तो यह पूर्वी भारत के लिए एक 'कैपिटल एक्सेस हब' बन सकता है.

हालांकि, उन्होंने कहा कि इस स्तर पर CSE की तुलना GIFT City से करना जल्दबाजी होगी, क्योंकि GIFT City की सफलता अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाओं, कर प्रोत्साहनों और वैश्विक पूंजी प्रवाह पर आधारित है.

NSE और BSE के बीच तीसरे एक्सचेंज की राह आसान नहीं

गौरव भगत अकादमी के संस्थापक गौरव भगत का कहना है कि CSE का ऐतिहासिक महत्व जरूर है, लेकिन केवल भावनात्मक आधार पर किसी एक्सचेंज को सफल नहीं बनाया जा सकता. उन्होंने कहा कि भारतीय पूंजी बाजार में आज NSE और BSE की मजबूत पकड़ है. ऐसे में किसी तीसरे बड़े स्टॉक एक्सचेंज के लिए जगह बनाना चुनौतीपूर्ण होगा.

उनके अनुसार, यदि पश्चिम बंगाल सरकार फिनटेक, वैकल्पिक निवेश फंड, स्टार्टअप कैपिटल और वैश्विक निवेश को आकर्षित करने वाला व्यापक वित्तीय इकोसिस्टम तैयार करती है, तभी CSE की कहानी पुनर्जीवन से आगे बढ़कर बदलाव की कहानी बन सकती है.

लिक्विडिटी और वॉल्यूम सबसे बड़ी चुनौती

129 Wealth के फंड मैनेजर और Paul Asset के रिसर्च एनालिस्ट प्रसनजीत पॉल का मानना है कि आज के दौर में स्टॉक एक्सचेंज स्थान से नहीं, बल्कि लिक्विडिटी और टेक्नोलॉजी से चलते हैं. उन्होंने कहा कि कोलकाता के निवेशकों को पहले से ही NSE और BSE तक आसान पहुंच प्राप्त है. ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती ट्रेडिंग वॉल्यूम और निवेशकों का भरोसा दोबारा हासिल करना होगी.

प्रसनजीत पॉल के अनुसार, CSE को NSE और BSE से सीधी प्रतिस्पर्धा करने के बजाय MSME, स्टार्टअप्स और क्षेत्रीय व्यवसायों के लिए एक विशेष प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया जाना चाहिए.

क्या बन सकता है पूर्वी भारत का GIFT City?

विशेषज्ञों की राय में CSE के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह केवल एक पुराने स्टॉक एक्सचेंज के रूप में लौटेगा या फिर पूर्वी भारत के लिए नए वित्तीय इकोसिस्टम का आधार बनेगा. GIFT City की तरह किसी वित्तीय केंद्र के विकास के लिए कर प्रोत्साहन, नीतिगत समर्थन, वैश्विक पूंजी, फिनटेक इकोसिस्टम और दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत होती है. ऐसे में CSE का भविष्य काफी हद तक सरकार की नीतियों, नियामकीय मंजूरी और निवेशकों के भरोसे पर निर्भर करेगा.

एक समय BSE को भी देता था कड़ी टक्कर

बता दें, कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज कभी देश के सबसे सक्रिय क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंजों में शामिल था. 1990 के दशक के आखिर और 2000 के शुरुआती वर्षों में कई मौकों पर CSE का दैनिक कारोबार हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच गया था. एक समय यहां 4,000 से अधिक कंपनियां सूचीबद्ध थीं और यह देश का दूसरा सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज माना जाता था. 

क्षेत्रीय एक्सचेंजों का दौर लगभग खत्म हो चुका है

विशेषज्ञों के अनुसार, देश में कभी 20 से अधिक क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंज सक्रिय हुआ करते थे, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग, ऑनलाइन ब्रोकिंग और केंद्रीकृत क्लियरिंग सिस्टम के विस्तार के बाद अधिकांश क्षेत्रीय एक्सचेंज बंद हो गए. आज भारतीय शेयर बाजार में NSE और BSE का दबदबा है, जबकि अन्य एक्सचेंजों की हिस्सेदारी बेहद सीमित है. ऐसे में CSE के सामने सबसे बड़ी चुनौती निवेशकों और ब्रोकरों को दोबारा आकर्षित करने की होगी. 

तकनीक और लिक्विडिटी बनेगी सफलता की कुंजी

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक पूंजी बाजार में किसी स्टॉक एक्सचेंज की सफलता उसकी भौगोलिक स्थिति से ज्यादा ट्रेडिंग वॉल्यूम, तकनीकी क्षमता और लिक्विडिटी पर निर्भर करती है. यदि किसी एक्सचेंज पर पर्याप्त कारोबार नहीं होता, तो निवेशकों और ब्रोकरों की रुचि भी सीमित रह जाती है. यही कारण है कि CSE के पुनर्जीवन में तकनीकी प्लेटफॉर्म और बाजार सहभागिता दोनों अहम भूमिका निभाएंगे. 

राज्य सरकार की व्यापक वित्तीय रणनीति

पश्चिम बंगाल सरकार केवल CSE के पुनर्जीवन तक सीमित नहीं रहना चाहती. राज्य सरकार लाभ में चल रही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को भी पूंजी बाजार में सूचीबद्ध करने की संभावनाएं तलाश रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य की कंपनियां भविष्य में सूचीबद्ध होती हैं, तो इससे CSE को शुरुआती कारोबार और लिस्टिंग गतिविधियों का आधार मिल सकता है.

पूर्वी भारत के लिए नया अवसर

पूर्वी भारत में MSME, स्टार्टअप, विनिर्माण और निर्यात आधारित उद्योगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. यदि CSE क्षेत्रीय उद्यमों, SME कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए विशेष प्लेटफॉर्म विकसित करता है, तो यह पूर्वी भारत में पूंजी तक पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. यही कारण है कि कई विशेषज्ञ CSE को पारंपरिक एक्सचेंज के बजाय एक विशेष क्षेत्रीय वित्तीय मंच के रूप में विकसित करने की वकालत कर रहे हैं.
 


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