क्या वाकई बिक रही है Voltas? कंपनी ने बताई TATA के मन की बात 

ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि टाटा समूह वोल्टास को बेचने के लिए बातचीत कर रहा है.

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Wednesday, 08 November, 2023
फाइल फोटो

वोल्टास (Voltas) को लेकर हाल ही में सामने आई ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया था. इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि टाटा समूह (TATA Group) होम अप्लायंस और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की अपनी कंपनी वोल्टास Voltas को बेचने जा रहा है. मुख्य तौर पर एयर कंडीशनर, वॉशिंग मशीन, वॉटर कूलर के साथ-साथ कमर्शियल रेफ्रिजरेशन यूनिट्स बनाने वाली इस कंपनी ने अब ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट पर बयान जारी किया है. कंपनी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि टाटा ग्रुप के Voltas को बेचने की कोई योजना नहीं है और इस तरह की खबरें पूरी तरह बकवास हैं. 

चिंता और शर्मिंदगी की वजह 
Voltas ने एक्सचेंज फाइलिंग में बताया है कि मीडिया में टाटा ग्रुप के वोल्टास को बेचने की जो खबरें चल रही हैं, वो पूरी तरह से गलत और तथ्यहीन हैं. इन खबरों ने वोल्टास के शेयरहोल्डर्स और इनवेस्टर्स की चिंता बढ़ाने का काम किया है. इस तरह की खबरें शर्मिंदगी की वजह भी बनती हैं. कंपनी ने यह भी कहा कि वो आवश्यक स्पष्टीकरण जारी करने के लिए इस मामले को न्यूज वेबसाइट के साथ अलग से बातचीत कर रही है. बता दें कि टाटा ग्रुप (Tata Group) ने साल 1954 में वोल्टास कंपनी की शुरुआत की थी, इसका मुख्यालय मुंबई में है. 

इतनी है बाजार हिस्सेदारी
भारतीय बाजार में Voltas एक विश्वसनीय ब्रैंड है. 30 सितंबर तक रेफ्रिजरेटर मार्केट में वोल्टास की 3.3% और वॉशिंग मशीन के बाजार में 5.4% थी. कंपनी के AC भी काफी पसंद किए जाते हैं. Voltas ने हाल ही में अपने Q2 Results जारी किए थे. 30 स‌ितंबर को खत्‍म हुई दूसरी तिमाही में कंपनी को 36 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ (Net Profit) हुआ था. ऐसे में वोल्टास के बिकने की खबर सभी के लिए चौंकाने वाली थी. यहां तक कि स्टॉक मार्केट में कंपनी के शेयरों में गिरावट देखने को मिली थी. अब जब कंपनी ने स्पष्ट कर दिया है कि टाटा ग्रुप की ऐसी कोई योजना नहीं है, तो वोल्टास के शेयर ग्रीन लाइन पर कारोबार कर रहे हैं.

ब्लूमबर्ग ने किया था ये दावा
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया था कि होम अप्लायंस और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में बढ़ती प्रस्तिपर्धा के चलते टाटा समूह खुद को इससे अलग करना चाहता है. समूह को लगता है कि इस सेक्टर में आने वाले दिनों में बिजनेस बढ़ाने में दिक्कतों को सामना करना पड़ सकता है. टाटा ग्रुप के मैनेजमेंट ने वोल्टास को को बेचने की संभावनाओं पर चर्चा की है, लेकिन अब स्पष्ट नहीं है कि इस डील में जॉइंट वेंचर पार्टनर Arcelik AS को शामिल किया जाए या नहीं. गौरतलब है कि भारत में वोल्टास का कारोबार, टाटा समूह अपने ज्वाइंट वेंचर Arcelik AS के साथ करता है. हालांकि, वोल्टास ने अब यह साफ कर दिया है कि ऐसी कोई योजना नहीं है. 


कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और बाजार बिकवाली के बीच रुपये में रिकॉर्ड गिरावट, 95.34 के स्तर तक पहुंचा

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है. पिछले सत्र में ही एफपीआई ने ₹2,468.42 करोड़ की इक्विटी बेच दी.

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Thursday, 30 April, 2026
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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के दबाव में भारतीय रुपया गुरुवार को रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 95.01 पर खुला और शुरुआती कारोबार में ही तेजी से गिरकर 95.34 के रिकॉर्ड इंट्राडे निचले स्तर तक पहुंच गया. बाद में यह 95.25 के आसपास कारोबार करता दिखा, जो पिछले बंद स्तर से 37 पैसे की गिरावट है. इससे पहले सत्र में रुपया 94.88 के सर्वकालिक बंद स्तर तक गिर चुका था.

कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से दबाव
ब्रेंट क्रूड की कीमत 3.46 प्रतिशत बढ़कर 122.11 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. वैश्विक आपूर्ति में बाधा और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण मार्ग में रुकावटों ने तेल कीमतों को बढ़ाया है. विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती तेल कीमतें रुपये पर सबसे बड़ा दबाव बना रही हैं, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है.

विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी कारण
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है. पिछले सत्र में ही एफपीआई ने ₹2,468.42 करोड़ की इक्विटी बेच दी.

डॉलर इंडेक्स और वैश्विक संकेत
अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 98.79 पर मामूली कमजोरी के साथ स्थिर रहा. वहीं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने के फैसले ने भी वैश्विक मुद्रा बाजार को प्रभावित किया.

शेयर बाजार में भी गिरावट
घरेलू शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखी गई. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE Sensex) 687.75 अंक गिरकर 76,808.61 पर आ गया, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE Nifty 50) 228.60 अंक टूटकर 23,949.05 पर पहुंच गया.

बॉन्ड यील्ड और कैपिटल आउटफ्लो का असर
बॉन्ड यील्ड लगभग 7 प्रतिशत तक पहुंचने से भी विदेशी पूंजी बाहर निकल रही है, जिससे मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में रुपया दबाव में रह सकता है. कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक जोखिम और विदेशी निवेश प्रवाह आगे भी मुद्रा की दिशा तय करेंगे.
 


IIM A और IIM B दीक्षांत समारोहों में ‘इंटीग्रेटिव इंटेलिजेंस’ और ‘सोच-समझकर फैसले’ पर जोर

प्रमुख बिजनेस लीडर और ग्रैमी पुरस्कार विजेता संगीतकार चंद्रिका टंडन और एचडीएफसी लाइफ (HDFC Life) की मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ विभा पडालकर ने हाल ही में IIM A और IIM B के दीक्षांत समारोहों को संबोधित किया.

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Thursday, 30 April, 2026
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प्रमुख बिजनेस लीडर और ग्रैमी पुरस्कार विजेता संगीतकार चंद्रिका टंडन और एचडीएफसी लाइफ (HDFC Life) की मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ विभा पडालकर ने हाल ही में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद (IIM A) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद (IIM B) द्वारा आयोजित दीक्षांत समारोहों को संबोधित किया. उन्होंने छात्रों से जीवन और करियर में “इंटीग्रेटिव इंटेलिजेंस” अपनाने और “सोच-समझकर फैसले लेने” की अपील की.

इंटीग्रेटिव इंटेलिजेंस से बनेगा असली नेतृत्व
IIM A की 1975 बैच की पूर्व छात्रा चंद्रिका टंडन ने कहा, ‘इंटीग्रेटिव इंटेलिजेंस’ का मतलब है, “अंतर्दृष्टि, इरादा, आंतरिक शांति और प्रभाव”. उन्होंने छात्रों से कहा कि वे अपने दायरे से बाहर निकलें, रणनीतिक रूप से नए क्षेत्रों को समझें और आलोचनात्मक सोच विकसित करें.

उन्होंने आगे कहा, “किसी एक रास्ते पर अटककर मत रहिए, क्योंकि बड़े बदलाव सीधे रास्तों पर नहीं, बल्कि उनके संगम पर होते हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में ‘इंटीग्रेटिव इंटेलिजेंस’ का मतलब है पूरी तरह इंसान बने रहना, और यही असली नेतृत्व को परिभाषित करेगा.”

संकरी सोच से बाहर निकलने की जरूरत
टंडन ने कहा कि आज अकादमिक दुनिया में अलग-अलग क्षेत्रों का मेल हो रहा है और पुराने पारंपरिक रास्ते खत्म हो रहे हैं. अगर आप अपने सीमित दायरे में ही फंसे रहेंगे, तो नए अवसरों को समझ नहीं पाएंगे. इनोवेशन अब अलग-अलग क्षेत्रों के मेल पर ही होगा. उन्होंने ‘इरादे’ की व्याख्या करते हुए कहा कि जब आप किसी रास्ते को चुनते हैं और उसके प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध होते हैं, वही असली इरादा होता है. यह आपको बिना सोचे-समझे जीने से निकालकर उद्देश्यपूर्ण जीवन की ओर ले जाता है.

सोच-समझकर फैसले लेने की सलाह
वहीं, IIM B के दीक्षांत समारोह में विभा पडालकर ने छात्रों से कहा कि जीवन के अगले चरण में प्रवेश करते समय तीन बातों पर ध्यान दें, पहला, भविष्य का अनुमान लगाने की क्षमता; दूसरा, रुककर सोचने का अनुशासन; और तीसरा, समझदारी से चुनाव करने की बुद्धिमत्ता.

उन्होंने कहा, “हर ‘हां’ के साथ कहीं न कहीं ‘ना’ भी जुड़ी होती है. समय के साथ आपकी जिंदगी सिर्फ इस बात से नहीं तय होगी कि आपने क्या चुना, बल्कि इससे भी कि आपने क्या नहीं चुना.”

व्यक्तिगत जीवन में भी संतुलन जरूरी
पडालकर ने छात्रों को सलाह दी कि वे ऐसे लोगों को चुनें जो उन्हें आगे बढ़ने में मदद करें और जीवन को बेहतर बनाएं. उन्होंने कहा, “अगर सफलता उन लोगों की कीमत पर मिलती है जो आपके लिए महत्वपूर्ण हैं, तो वह सफलता शायद मायने नहीं रखती,”  उन्होंने कहा कि जीवन में कोई एक सही रास्ता नहीं होता. इसमें ठहराव, मोड़ और संदेह के पल आते हैं, और यही जीवन का हिस्सा हैं, असफलता नहीं.

पडालकर ने कहा कि जीवन हजारों छोटे-छोटे फैसलों से बनता है, जहां महत्वाकांक्षा और धैर्य, गति और ठहराव के बीच संतुलन बनाना जरूरी होता है.

(यह शीर्ष बिजनेस और इंजीनियरिंग संस्थानों के दीक्षांत भाषणों पर आधारित श्रृंखला की पहली कड़ी है.)
 


ETF में रिकॉर्ड ₹1.81 लाख करोड़ का निवेश, गोल्ड-सिल्वर ने मारी बाजी

ETF बाजार में ट्रेडिंग गतिविधियां भी तेजी से बढ़ी हैं. FY21 में जहां औसत दैनिक टर्नओवर ₹237 करोड़ था, वहीं अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच यह ₹4,200 करोड़ से ज्यादा पहुंच गया.

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Thursday, 30 April, 2026
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भारत में एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETF) के प्रति निवेशकों का भरोसा तेजी से बढ़ रहा है. वित्त वर्ष 2026 (FY26) में ETF कैटेगरी में कुल ₹1.81 लाख करोड़ का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है. खास बात यह रही कि इस बार निवेशकों ने सिर्फ इक्विटी ETF पर भरोसा नहीं जताया, बल्कि गोल्ड और सिल्वर ETF में रिकॉर्ड निवेश किया. इससे साफ संकेत मिलता है कि निवेशक अब अपने पोर्टफोलियो को ज्यादा संतुलित और विविध बना रहे हैं.

FY26 में टूटा सभी वर्षों का रिकॉर्ड

डेटा के अनुसार FY26 में ETF में ₹1,81,125 करोड़ का कुल नेट इनफ्लो आया. यह FY22 के ₹83,390 करोड़ के पिछले रिकॉर्ड से दोगुने से भी ज्यादा है. FY21 में ETF में ₹46,739 करोड़, FY22 में ₹83,390 करोड़, FY23 में ₹60,179 करोड़, FY24 में ₹48,142 करोड़ और FY25 में ₹83,079 करोड़ का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया था. इसके मुकाबले FY26 में जबरदस्त उछाल देखने को मिला.

गोल्ड और सिल्वर ETF ने मारी बाजी

FY26 में गोल्ड ETF में ₹68,868 करोड़ और सिल्वर ETF में ₹30,412 करोड़ का निवेश आया. यानी दोनों कैटेगरी में कुल ₹99,280 करोड़ का नेट इनफ्लो दर्ज हुआ, जो कुल ETF निवेश का करीब 55 प्रतिशत है. वहीं इक्विटी ETF में ₹77,780 करोड़ और डेट ETF में ₹4,066 करोड़ का निवेश आया. कुल हिस्सेदारी में गोल्ड ETF का 38 प्रतिशत, सिल्वर ETF का 16.8 प्रतिशत, इक्विटी ETF का 42.9 प्रतिशत और डेट ETF का 2.2 प्रतिशत योगदान रहा.

निवेशकों की रणनीति में आया बदलाव

विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशक अब केवल शेयर बाजार पर निर्भर नहीं रहना चाहते. वैश्विक अनिश्चितता, महंगाई और बाजार उतार-चढ़ाव के बीच निवेशकों ने गोल्ड और सिल्वर जैसे सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख किया है. ETF के जरिए इन एसेट्स में निवेश आसान, पारदर्शी और कम लागत वाला विकल्प बनकर उभरा है.

गोल्ड ETF में जबरदस्त ग्रोथ

FY26 में गोल्ड ETF का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) मार्च 2025 के ₹59,000 करोड़ से बढ़कर मार्च 2026 में ₹1.71 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया. यह करीब 191 प्रतिशत की वृद्धि है. FY21 से FY25 के पूरे पांच वर्षों में गोल्ड ETF में कुल ₹30,200 करोड़ से ज्यादा निवेश आया था, जबकि अकेले FY26 में ₹68,868 करोड़ का निवेश दर्ज हुआ.

सिल्वर ETF भी तेजी से लोकप्रिय

साल 2022 में शुरू हुए सिल्वर ETF ने भी FY26 में शानदार प्रदर्शन किया. इस दौरान ₹30,000 करोड़ से ज्यादा निवेश आया. मार्च 2025 में सिल्वर ETF का कुल AUM ₹15,339 करोड़ था, जिसे FY26 के निवेश ने पीछे छोड़ दिया. चांदी की कीमतों में तेजी और औद्योगिक मांग बढ़ने से निवेशकों का रुझान इस कैटेगरी में बढ़ा.

ETF बाजार में बढ़ी लिक्विडिटी

ETF बाजार में ट्रेडिंग गतिविधियां भी तेजी से बढ़ी हैं. FY21 में जहां औसत दैनिक टर्नओवर ₹237 करोड़ था, वहीं अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच यह ₹4,200 करोड़ से ज्यादा पहुंच गया. कमोडिटी ETF का औसत दैनिक टर्नओवर ₹2,700 करोड़ रहा, जो इक्विटी ETF के ₹745 करोड़ से काफी ज्यादा है.

FY26 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में निवेशकों की सोच तेजी से बदल रही है. अब वे सिर्फ इक्विटी ही नहीं, बल्कि गोल्ड और सिल्वर जैसे एसेट्स को भी पोर्टफोलियो का हिस्सा बना रहे हैं. आने वाले वर्षों में ETF इंडस्ट्री के लिए यह बड़ा ग्रोथ ट्रेंड साबित हो सकता है.


SPNI में नेतृत्व बदलाव, CHRO मनु वाधवा बनेंगी स्ट्रैटेजी एडवाइजर

पिछले सात वर्षों में SPNI के साथ अपने कार्यकाल के दौरान वाधवा ने कंपनी की मानव संसाधन और संगठनात्मक रणनीति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

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Thursday, 30 April, 2026
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सोना पिक्चर्स नेटवर्क्स (Sony Pictures Networks India -SPNI) ने घोषणा की है कि मनु वाधवा 1 जुलाई 2026 से अपनी वर्तमान भूमिका चीफ ह्यूमन रिसोर्सेज ऑफिसर (CHRO) से स्ट्रैटेजी एडवाइजर की नई भूमिका में स्थानांतरित होंगी. नई भूमिका में वाधवा कंपनी के नेतृत्व दल के साथ मिलकर प्रमुख रणनीतिक प्राथमिकताओं पर काम करेंगी. वह अपने गहन संस्थागत अनुभव और संगठनात्मक परिवर्तन में विशेषज्ञता का उपयोग करेंगी.

सात वर्षों का प्रभावशाली कार्यकाल
पिछले सात वर्षों में SPNI के साथ अपने कार्यकाल के दौरान वाधवा ने कंपनी की मानव संसाधन और संगठनात्मक रणनीति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने पीपल फंक्शन को बिजनेस रणनीति के साथ बेहतर तरीके से जोड़ने, नेतृत्व क्षमता को सशक्त बनाने और प्रदर्शन व रिवॉर्ड सिस्टम को आधुनिक बनाने में अहम योगदान दिया.

परिवर्तन और विकास में अहम भूमिका
उनके नेतृत्व में कंपनी ने विकास और परिवर्तन के विभिन्न चरणों, जैसे नेतृत्व परिवर्तन और संरचनात्मक पुनर्गठन, को सफलतापूर्वक पार किया. साथ ही, उन्होंने एक ऐसी कार्य संस्कृति विकसित करने में मदद की, जो प्रदर्शन और समावेशन के बीच संतुलन बनाए रखती है.

SPNI के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ गौरव बनर्जी ने कहा, “मनु पिछले कई वर्षों से SPNI के विकास का अभिन्न हिस्सा रही हैं. उन्होंने हमारे संगठनात्मक ढांचे और संस्कृति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हमें विश्वास है कि स्ट्रैटेजी एडवाइजर के रूप में उनका अनुभव आगे भी कंपनी के लिए मूल्यवान रहेगा.”

मनु वाधवा ने कहा, “SPNI मेरे पेशेवर सफर का एक अहम हिस्सा रहा है. इस दौरान मुझे कंपनी के परिवर्तन और विकास में योगदान देने का अवसर मिला, जिसके लिए मैं आभारी हूं. नई भूमिका में मैं नेतृत्व टीम के साथ मिलकर कंपनी की रणनीतिक प्राथमिकताओं पर काम जारी रखने के लिए उत्साहित हूं.” वाधवा ने GE, American Express और Coca-Cola जैसी वैश्विक कंपनियों में नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभाई हैं, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण मिला है.

SPNI ने यह भी बताया कि कंपनी जल्द ही नए चीफ ह्यूमन रिसोर्सेज ऑफिसर की खोज शुरू करेगी. इस संबंध में आगे की जानकारी समय आने पर साझा की जाएगी.
 


दुबई सरकार ने आसान किए प्रॉपर्टी वीजा नियम, रियल एस्टेट निवेश को मिलेगा बढ़ावा

दुबई का यह कदम रियल एस्टेट बाजार को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे न केवल विदेशी निवेश बढ़ेगा, बल्कि छोटे निवेशकों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय संपत्ति बाजार में प्रवेश आसान हो जाएगा.

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Thursday, 30 April, 2026
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दुबई ने अपने रियल एस्टेट सेक्टर को नई रफ्तार देने के लिए वीजा नियमों में बड़ा बदलाव किया है. अब छोटे और मिड-इनकम निवेशक भी कम बजट में प्रॉपर्टी खरीदकर रेजिडेंसी वीजा हासिल कर सकेंगे. इस फैसले से विदेशी निवेशकों के लिए दुबई का बाजार पहले से अधिक आकर्षक बन गया है.

वीजा नियमों में बड़ा बदलाव

दुबई सरकार ने दो साल के प्रॉपर्टी-लिंक्ड रेजिडेंसी वीजा के लिए पहले लागू न्यूनतम संपत्ति मूल्य की शर्त को हटा दिया है. पहले निवेशकों को कम से कम AED 750,000 (करीब ₹1.9 करोड़) की संपत्ति खरीदनी जरूरी थी, लेकिन अब यह बाध्यता खत्म कर दी गई है.

संयुक्त निवेश के लिए नई सीमा तय

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नए नियमों के तहत संयुक्त रूप से खरीदी गई प्रॉपर्टी में भी बदलाव किया गया है. अब प्रत्येक निवेशक की न्यूनतम हिस्सेदारी AED 400,000 (करीब ₹1.03 करोड़) होनी जरूरी होगी, पहले यह सीमा AED 750,000 थी. इस बदलाव से छोटे निवेशकों के लिए रियल एस्टेट बाजार में प्रवेश आसान हो गया है.

छोटे निवेशकों के लिए खुला अवसर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला खासकर मिड-सेगमेंट निवेशकों के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है. इससे न केवल व्यक्तिगत खरीदारों की पहुंच बढ़ेगी, बल्कि उन प्रॉपर्टीज की बिक्री भी बढ़ने की उम्मीद है, जो पहले वीजा पात्रता के कारण सीमित दायरे में थीं.

बाजार की स्थिति और दबाव

यह कदम ऐसे समय में आया है जब क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता के कारण दुबई के रियल एस्टेट बाजार में कुछ दबाव देखा जा रहा है. हाल के महीनों में बिक्री में गिरावट के चलते डेवलपर्स को डिस्काउंट और आकर्षक पेमेंट प्लान देने पड़े हैं.

मजबूत आंकड़े और निवेश का रुझान

2025 में दुबई में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी की बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची थी, जहां AED 547 अरब के सौदे दर्ज किए गए. इसमें भारत और ब्रिटेन के निवेशकों की बड़ी हिस्सेदारी रही. रियल एस्टेट विशेषज्ञों का कहना है कि नया नियम बाजार में संतुलन बनाए रखने में मदद करेगा. एक तरफ जहां छोटे निवेशकों को अवसर मिलेगा, वहीं दूसरी ओर संयुक्त निवेश में न्यूनतम हिस्सेदारी की शर्त वीजा के दुरुपयोग और “वीजा पूलिंग” जैसी प्रथाओं पर रोक लगाएगी.

 


दिल्ली में एंट्री पर भारी पड़ेगा प्रदूषण चार्ज, कमर्शियल वाहनों पर ₹4000 तक का शुल्क

सरकार द्वारा यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उठाया गया है, जिसका उद्देश्य दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की अनावश्यक आवाजाही को कम करना है.

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Thursday, 30 April, 2026
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नई दिल्ली में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. अब राजधानी में प्रवेश करने वाले कमर्शियल वाहनों को पहले से ज्यादा पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) देना होगा. नई दरों के तहत कुछ भारी वाहनों पर यह शुल्क ₹4000 तक पहुंच गया है. यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उठाया गया है, जिसका उद्देश्य दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की अनावश्यक आवाजाही को कम करना है.

ECC शुल्क में बढ़ोतरी का नया ढांचा

सरकार द्वारा जारी नई अधिसूचना के अनुसार, विभिन्न कैटेगरी के कमर्शियल वाहनों पर शुल्क में ₹600 से ₹1400 तक की बढ़ोतरी की गई है. नई दरें इस प्रकार हैं:

1. कैटेगरी 2 (हल्की कमर्शियल गाड़ियां) और कैटेगरी 3 (2-एक्सल ट्रक):
  ₹1400 से बढ़ाकर ₹2000

2. कैटेगरी 4 (3-एक्सल ट्रक) और कैटेगरी 5 (4 या उससे अधिक एक्सल ट्रक):
  ₹2600 से बढ़ाकर ₹4000

इसके साथ ही अब हर साल ECC दरों में 5% की ऑटोमैटिक बढ़ोतरी भी लागू होगी.

सिर्फ राजस्व नहीं, प्रदूषण पर रोक

दिल्ली सरकार में पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा का कहना है कि यह फैसला केवल राजस्व बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि एक सख्त पर्यावरणीय नियंत्रण उपाय है. उन्होंने कहा कि संशोधित ECC का उद्देश्य डीजल से चलने वाले प्रदूषणकारी वाहनों की अनावश्यक एंट्री को कम करना है और ट्रांसपोर्ट सिस्टम को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाना है.

सुप्रीम कोर्ट और CAQM की भूमिका

फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने सुझाव दिया था कि ECC लंबे समय से नहीं बढ़ाया गया है. इस वजह से कई कमर्शियल वाहन वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे की बजाय दिल्ली के रास्ते का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे प्रदूषण बढ़ रहा था.

क्यों लिया गया यह फैसला?

सरकार के अनुसार इस कदम के पीछे मुख्य कारण हैं:

1. 2015 में तय ECC अब प्रभावी नहीं रहा
2. डीजल वाहनों की अनियंत्रित एंट्री रोकना
3. ट्रांसपोर्ट कंपनियों को साफ ईंधन वाले विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित करना
4. दिल्ली में ट्रैफिक और प्रदूषण दोनों को कम करना

ट्रांसपोर्ट सेक्टर में असंतोष भी

ECC बढ़ोतरी के फैसले का ट्रांसपोर्ट सेक्टर ने विरोध किया है. ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन का कहना है कि बढ़े हुए शुल्क से लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ेगी, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ेगा.

दिल्ली की हवा सुधारने की कोशिश

सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि जो भारी वाहन जरूरी नहीं हैं, उन्हें दिल्ली में प्रवेश करने के बजाय एक्सप्रेसवे का इस्तेमाल करना चाहिए. सरकरा को इस नई ECC व्यवस्था से उम्मीद है कि अनावश्यक ट्रैफिक कम होगा, प्रदूषण में कमी आएगी और राजधानी की वायु गुणवत्ता में सुधार होगा.

विशेषज्ञों का मानना है कि ECC बढ़ने का असर परिवहन लागत पर पड़ेगा. इससे माल ढुलाई महंगी हो सकती है, जिसका बोझ धीरे-धीरे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर दिख सकता है. ECC में यह बढ़ोतरी दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में एक सख्त कदम है. हालांकि इससे ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर लागत का दबाव बढ़ेगा, लेकिन सरकार का दावा है कि यह कदम राजधानी की हवा को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
 


भारत का बड़ा समुद्री दांव: ₹51,383 करोड़ निवेश से शिपिंग सेक्टर को नई ताकत

सरकार का लक्ष्य 2030 तक भारत की वैश्विक सीफेरर हिस्सेदारी को 20% तक पहुंचाना है.

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Thursday, 30 April, 2026
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भारत ने समुद्री क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ₹51,383 करोड़ के निवेश की योजना घोषित की है. इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2026–27 में 62 नए जहाज शामिल किए जाएंगे, जिससे देश की शिपिंग क्षमता में बड़ा विस्तार होगा. यह घोषणा केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सरबनंदा सोनोवल ने नई दिल्ली में एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान की.

आत्मनिर्भर शिपिंग कार्यक्रम को गति

सरकार का यह कदम “आत्मनिर्भर शिपिंग कार्यक्रम” के तहत उठाया गया है, जिसका उद्देश्य भारत की समुद्री निर्भरता को कम करना और घरेलू शिपिंग क्षमता को मजबूत करना है. इस योजना से लगभग 2.85 मिलियन ग्रॉस टन (GT) अतिरिक्त क्षमता जुड़ने की उम्मीद है, जिससे भारत का शिपिंग इकोसिस्टम और मजबूत होगा.

किन जहाजों पर होगा निवेश

इस विस्तार योजना में कई प्रकार के जहाज जैसे कंटेनर शिप, एलपीजी कैरियर, कच्चे तेल के टैंकर, ग्रीन टग्स और ड्रेजिंग वेसल्स शामिल हैं. सरकार का फोकस ऊर्जा परिवहन और वैश्विक व्यापार के लिए जरूरी जहाजों की क्षमता बढ़ाने पर है.

भारतीय शिपिंग कॉर्पोरेशन की बड़ी भूमिका

शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) इस योजना में अहम भूमिका निभा रही है. तेल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर SCI 59 जहाजों की खरीद की योजना पर काम कर रही है. इसके अलावा, कंपनी को विशेष रूप से अमोनिया परिवहन के लिए जहाज बनाने की दिशा में भी तैयार किया जा रहा है.

भारत की शिपिंग क्षमता में रिकॉर्ड वृद्धि

वित्त वर्ष 2026 में भारत की कुल शिपिंग क्षमता बढ़कर 142 मिलियन ग्रॉस टन तक पहुंच गई है. इस वर्ष 92 नए जहाज जोड़े गए, जो हाल के वर्षों में सबसे बड़ी वार्षिक वृद्धि में से एक है.

बंदरगाहों और ढांचे में तेज निवेश

वित्त वर्ष 2025–26 में भारत के प्रमुख बंदरगाहों ने 915.17 मिलियन टन कार्गो हैंडल किया, जो लक्ष्य से अधिक है. कार्गो में 7.06% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई, जो समुद्री व्यापार की मजबूत रिकवरी को दर्शाती है. पूंजीगत व्यय भी बढ़कर ₹14,953 करोड़ पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष यह ₹9,708 करोड़ था.

सरकार का नीति फोकस

सरकार ने सभी संबंधित विभागों को एक विस्तृत व्हाइट पेपर तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसमें मौजूदा कमियां, लक्ष्य और समयबद्ध रोडमैप शामिल होगा. इस प्रक्रिया में कई मंत्रालय शामिल होंगे, जिनमें वाणिज्य, पेट्रोलियम, रसायन और शिपिंग विभाग प्रमुख हैं.

वैश्विक समुद्री जोखिम और रणनीति

बैठक में वैश्विक व्यापार मार्गों में बढ़ते जोखिमों, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे क्षेत्रों की स्थिति पर भी चर्चा हुई. सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक कार्गो की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्षमता विस्तार को जरूरी बताया.

भारत की समुद्री ताकत

भारत के पास 11,098 किलोमीटर लंबी तटरेखा, 111 राष्ट्रीय जलमार्ग और 12 प्रमुख बंदरगाह हैं. इसके अलावा, भारत वैश्विक स्तर पर शीर्ष तीन समुद्री श्रमिक आपूर्तिकर्ता देशों में शामिल है, जहां लगभग 12% वैश्विक सीफेरर्स भारतीय हैं.

सरकार का लक्ष्य 2030 तक भारत की वैश्विक सीफेरर हिस्सेदारी को 20% तक पहुंचाना है. बढ़ते निवेश, नए जहाजों और नीति समन्वय के साथ भारत अपने समुद्री क्षेत्र को अधिक आत्मनिर्भर और वैश्विक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
 


सिगुलर गफ ने ट्रिमेक्स फूड्स में किया $40 मिलियन का निवेश, भारत के रेस्टोरेंट सेक्टर में बड़ा दांव

यह निवेश भारत के तेजी से बढ़ते रेस्टोरेंट और फूड सर्विस सेक्टर में वैश्विक निवेशकों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है. आने वाले समय में Trimex Foods के विस्तार और नए ब्रांड्स की एंट्री से इस सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और तेज होने की उम्मीद है.

Last Modified:
Thursday, 30 April, 2026
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भारत में कंज्यूमर और फूड सर्विस सेक्टर में एक बड़ा निवेश सामने आया है. ग्लोबल प्राइवेट इक्विटी फर्म सिगुलर गफ (Siguler Guff) ने भारतीय कंपनी ट्रिमैक्स फूड्स (Trimex Foods Private Limited) में 40 मिलियन डॉलर (करीब $40 मिलियन) का रणनीतिक निवेश किया है. यह निवेश कंपनी के मल्टी-ब्रांड रेस्टोरेंट नेटवर्क के विस्तार और नए वैश्विक ब्रांड जोड़ने की योजनाओं को तेज करेगा.

ट्रिमेक्स फूड्स की मौजूदा स्थिति

Trimex Foods भारत में Chili's Grill & Bar, PAUL और Cinnabon जैसे अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट ब्रांड्स की एक्सक्लूसिव फ्रेंचाइज़ी पार्टनर है. कंपनी की स्थापना 2010 में हुई थी और वर्तमान में यह भारत के 13 शहरों में 50 से अधिक रेस्टोरेंट और बेकरी-कैफे संचालित करती है.

Trimex ने देश में कैजुअल डाइनिंग और बेकरी सेगमेंट में एक मजबूत प्लेटफॉर्म तैयार किया है. इसके मजबूत ब्रांड पोर्टफोलियो और ऑपरेशनल अनुशासन ने इसे वैश्विक ब्रांड्स के लिए एक भरोसेमंद साझेदार बनाया है.

निवेश का उद्देश्य और रणनीति

यह निवेश Trimex Foods का पहला संस्थागत फंडिंग राउंड है. इसका उद्देश्य मौजूदा ब्रांड्स का भारत में विस्तार, नए अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट ब्रांड्स को जोड़ना और देशभर में नेटवर्क का तेज विस्तार करना है. Siguler Guff का मानना है कि भारत का ऑर्गनाइज़्ड फूड सर्विस सेक्टर आने वाले दशक में सबसे तेजी से बढ़ने वाले उपभोक्ता क्षेत्रों में से एक होगा.

भारत के कंज्यूमर मार्केट पर भरोसा

शौन खूबचंदानी ने कहा कि भारत का फूड सर्विस सेक्टर एक स्ट्रक्चरल बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जहां उपभोक्ता अब वैश्विक स्तर के डाइनिंग अनुभवों को अधिक पसंद कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि Trimex एक स्केलेबल मल्टी-ब्रांड प्लेटफॉर्म है, जिसने पिछले 15 वर्षों में मजबूत ऑपरेशनल प्रदर्शन और ग्राहक आधार बनाया है.

Trimex Foods के प्रवक्ता ने कहा कि Siguler Guff के साथ साझेदारी कंपनी के अगले ग्रोथ फेज के लिए महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि कंपनी हमेशा से भारतीय उपभोक्ताओं को विश्वस्तरीय डाइनिंग अनुभव देने और ऑपरेशनल स्टैंडर्ड बनाए रखने पर केंद्रित रही है. उन्होंने यह भी कहा कि Siguler Guff की वैश्विक विशेषज्ञता और उभरते बाजारों में निवेश का अनुभव कंपनी के विस्तार में मदद करेगा.

इस सौदे में Ernst & Young (EY) ने Trimex Foods के लिए एक्सक्लूसिव फाइनेंशियल एडवाइजर की भूमिका निभाई. यह निवेश भारत के तेजी से बढ़ते रेस्टोरेंट और फूड सर्विस सेक्टर में वैश्विक निवेशकों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है. आने वाले समय में Trimex Foods के विस्तार और नए ब्रांड्स की एंट्री से इस सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और तेज होने की उम्मीद है.
 


बढ़ती यील्ड ने कॉरपोरेट्स को बैंकों की ओर मोड़ा, बॉन्ड फाइनेंसिंग का फायदा घटा

बैंकों की औसत लेंडिंग दर (WALR) में बदलाव धीरे-धीरे हुआ. यह FY24–FY25 में 9.7–9.8% तक पहुंचने के बाद मार्च 2026 तक घटकर करीब 9% पर आ गई. इसी वजह से बॉन्ड यील्ड और बैंक लोन दरों के बीच का अंतर तेजी से घटा है.

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Thursday, 30 April, 2026
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भारतीय कॉरपोरेट्स और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) अब तेजी से बैंक कर्ज की ओर रुख कर रही हैं. इसकी मुख्य वजह पूंजी बाजार में बढ़ती यील्ड है, जिससे बॉन्ड फाइनेंसिंग का लागत लाभ काफी हद तक कम हो गया है. यह जानकारी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी CareEdge Ratings की एक रिपोर्ट में सामने आई है. रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेज वृद्धि ने वित्तीय स्थितियों को अधिक सख्ती से प्रभावित किया है, जबकि बैंक लेंडिंग दरों में यह बदलाव अपेक्षाकृत धीमा रहा है. इसी कारण कंपनियां अपने फंडिंग विकल्पों में संतुलन बदल रही हैं.

सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी

मार्च 2021 में जहां 1 साल की सरकारी प्रतिभूति (G-Sec) यील्ड लगभग 3.8% और 10 साल की यील्ड करीब 6.4% थी, वहीं मार्च 2026 तक यह बढ़कर लगभग 7% के आसपास पहुंच गई. इस बढ़ोतरी ने यील्ड कर्व को फ्लैट कर दिया है, जिससे सभी तरह के कर्ज की लागत बढ़ गई है. खासकर अल्पकालिक दरों में तेज वृद्धि देखी गई है.

बैंक लोन बनाम बॉन्ड, घटता अंतर

बैंकों की औसत लेंडिंग दर (WALR) में बदलाव धीरे-धीरे हुआ. यह FY24–FY25 में 9.7–9.8% तक पहुंचने के बाद मार्च 2026 तक घटकर करीब 9% पर आ गई. इसी वजह से बॉन्ड यील्ड और बैंक लोन दरों के बीच का अंतर तेजी से घटा है.

1. AAA रेटेड कंपनियों के लिए अंतर, 490 बेसिस पॉइंट (FY21) से घटकर 168 बेसिस पॉइंट (FY26)
2. NBFCs के लिए अंतर, 473 से घटकर 156 बेसिस पॉइंट

A-रेटेड कंपनियों के लिए स्थिति और खराब हुई है, जहां बॉन्ड से उधारी अब बैंक लोन से भी महंगी हो गई है.

फंडिंग पैटर्न में बड़ा बदलाव

बदलते रुझानों का असर बाजार में साफ दिखाई दे रहा है.

1. NBFCs और कॉरपोरेट्स द्वारा NCD (नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर) जारी करना FY23 में ₹1.30 लाख करोड़ तक पहुंचा, लेकिन FY26 में गिरकर ₹0.33 लाख करोड़ रह गया.
2. औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों को बैंक क्रेडिट FY21 के ₹2.5 लाख करोड़ से बढ़कर FY24 में ₹12.6 लाख करोड़ हुआ, हालांकि FY26 तक यह ₹9.3 लाख करोड़ पर आ गया.
3. NBFCs को मिलने वाला बैंक क्रेडिट भी FY21 के ₹0.1 लाख करोड़ से बढ़कर ₹3.1 लाख करोड़ तक पहुंच गया.

बाजार में बदलाव की वजह

रिपोर्ट के अनुसार FY23 इस बदलाव का टर्निंग पॉइंट था. उस समय बढ़ती ब्याज दरें, जोखिम बढ़ना और निवेशकों की सतर्कता के कारण बॉन्ड मार्केट कम आकर्षक हो गया. इसके अलावा, लिक्विडिटी की स्थिति भी महत्वपूर्ण रही. FY21 में सरप्लस लिक्विडिटी थी, लेकिन FY23 के बाद यह तंग हो गई, जिससे शॉर्ट-टर्म उधारी महंगी हो गई. कई मामलों में अल्पकालिक दरें लंबी अवधि की यील्ड से भी ऊपर चली गईं.

विशेषज्ञों की राय

CareEdge Ratings के सीनियर डायरेक्टर संजय अग्रवाल के अनुसार, यह बदलाव क्रेडिट गुणवत्ता में गिरावट नहीं बल्कि एक ट्रांजिशन फेज है. उन्होंने कहा कि यील्ड तेजी से रीप्राइस हुई है जबकि बैंक लोन दरें धीरे बदली हैं, जिससे कंपनियां बैंक फाइनेंसिंग की ओर शिफ्ट हो रही हैं. इससे लिक्विडिटी और रीफाइनेंसिंग जोखिमों में थोड़ी राहत मिली है.

वहीं, CareEdge Ratings के एसोसिएट डायरेक्टर सौरभ भलेराउ का कहना है कि यह बदलाव बैंकिंग सिस्टम के लिए क्रेडिट ग्रोथ बढ़ाता है, लेकिन इससे बैंक बैलेंस शीट पर जोखिम भी केंद्रित हो सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं और लिक्विडिटी कड़ी रहती है, तो बैंक कर्ज की ओर झुकाव जारी रह सकता है. खासकर कम रेटिंग वाले उधारकर्ताओं के लिए बॉन्ड बाजार से फंड जुटाना और मुश्किल हो सकता है.
 


केमिकल सेक्टर में FY27 के दौरान तेज उतार-चढ़ाव की आशंका, कीमतों में भारी अस्थिरता बनी रहेगी: Ind-Ra

केमिकल सेक्टर में FY27 के दौरान स्थिर लेकिन अस्थिर (volatile) ग्रोथ देखने को मिल सकती है. कंपनियों के लिए मजबूत लिक्विडिटी और बेहतर वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच साबित होगा.

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Thursday, 30 April, 2026
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इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) ने वित्त वर्ष 2027 के लिए केमिकल सेक्टर को लेकर सतर्क रुख बनाए रखा है. एजेंसी के मुताबिक भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे माल की ऊंची कीमतें और सप्लाई चेन में बदलाव के चलते इस सेक्टर में तेज उतार-चढ़ाव (volatility) देखने को मिल सकता है, हालांकि धीरे-धीरे मुनाफे में सुधार की उम्मीद भी बनी हुई है.

केमिकल सेक्टर पर ‘न्यूट्रल आउटलुक’ बरकरार

Ind-Ra ने पूरे केमिकल सेक्टर पर न्यूट्रल आउटलुक और FY27 के लिए स्थिर क्रेडिट रेटिंग दृष्टिकोण बनाए रखा है. एजेंसी का कहना है कि सेक्टर में रिकवरी जारी रहेगी, लेकिन इसकी गति पिछली रिकवरी साइकल की तुलना में धीमी होगी.

कीमतों में तेजी के बाद अब अस्थिरता

मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के बाद केमिकल कीमतों में 40% से 50% तक की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. हालांकि अप्रैल 2026 तक इनमें 5% से 10% की गिरावट आई, लेकिन कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं.

मुनाफे पर दबाव, मार्जिन स्थिर लेकिन सीमित

एजेंसी के अनुसार सेक्टर के मार्जिन 13% से 15% के बीच रह सकते हैं, जो ऐतिहासिक औसत से कम है. अलग-अलग उत्पादों में प्रदर्शन भी काफी अलग रहेगा, जिससे कंपनियों के नतीजों में असमानता देखने को मिलेगी.

ग्लोबल सप्लाई और ओवरकैपेसिटी का असर

Ind-Ra ने चेतावनी दी है कि चीन में लगातार ओवरकैपेसिटी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा भारतीय केमिकल सेक्टर के लिए संरचनात्मक जोखिम बनी रहेगी. हालांकि अमेरिका द्वारा टैरिफ में राहत से भारतीय एक्सपोर्टर्स की प्रतिस्पर्धा बढ़ी है.

घरेलू मांग मजबूत बनी हुई

भारत में केमिकल्स की घरेलू मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है, खासकर कंजम्पशन-ड्रिवन सेक्टर्स से सपोर्ट मिल रहा है. हालांकि FY27 की शुरुआत में कुछ क्षेत्रों में डिमांड टेम्पररी तौर पर कमजोर रह सकती है.

अमेरिका के बाजार में भारतीय केमिकल्स की स्थिति बेहतर हुई है, जहां देश का करीब 15% निर्यात जाता है. टैरिफ में बदलाव के बाद भारतीय कंपनियों को कॉस्ट एडवांटेज मिला है, जिससे एक्सपोर्ट मार्जिन में सुधार हुआ है.

वर्किंग कैपिटल और लिक्विडिटी सबसे बड़ा रिस्क

Ind-Ra ने कहा है कि FY27 में लिक्विडिटी मैनेजमेंट सबसे अहम फैक्टर होगा.

- कच्चे माल की ऊंची कीमतें
- बढ़ता इन्वेंटरी स्तर
- लंबा सप्लाई साइकल

इन सभी कारणों से वर्किंग कैपिटल की जरूरत बढ़ सकती है.

कंपनियों की बैलेंस शीट स्थिति

लगभग 60% बड़ी केमिकल कंपनियों का नेट लेवरेज 2.5 गुना से नीचे है, जो स्थिर स्थिति को दर्शाता है. हालांकि करीब 20% कंपनियां एक्सपोर्ट एक्सपोजर और कैश फ्लो दबाव के कारण जोखिम में बनी हुई हैं.

Ind-Ra के मुताबिक FY27 में केमिकल सेक्टर की दिशा मुख्य रूप से भू-राजनीतिक स्थिरता, कच्चे तेल और फीडस्टॉक की कीमतें, चीन की सप्लाई स्ट्रेटजी और ग्लोबल डिमांड रिकवरी जैसे फैक्टर्स पर निर्भर करेगी.