दुबई का यह कदम रियल एस्टेट बाजार को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे न केवल विदेशी निवेश बढ़ेगा, बल्कि छोटे निवेशकों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय संपत्ति बाजार में प्रवेश आसान हो जाएगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
दुबई ने अपने रियल एस्टेट सेक्टर को नई रफ्तार देने के लिए वीजा नियमों में बड़ा बदलाव किया है. अब छोटे और मिड-इनकम निवेशक भी कम बजट में प्रॉपर्टी खरीदकर रेजिडेंसी वीजा हासिल कर सकेंगे. इस फैसले से विदेशी निवेशकों के लिए दुबई का बाजार पहले से अधिक आकर्षक बन गया है.
वीजा नियमों में बड़ा बदलाव
दुबई सरकार ने दो साल के प्रॉपर्टी-लिंक्ड रेजिडेंसी वीजा के लिए पहले लागू न्यूनतम संपत्ति मूल्य की शर्त को हटा दिया है. पहले निवेशकों को कम से कम AED 750,000 (करीब ₹1.9 करोड़) की संपत्ति खरीदनी जरूरी थी, लेकिन अब यह बाध्यता खत्म कर दी गई है.
संयुक्त निवेश के लिए नई सीमा तय
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नए नियमों के तहत संयुक्त रूप से खरीदी गई प्रॉपर्टी में भी बदलाव किया गया है. अब प्रत्येक निवेशक की न्यूनतम हिस्सेदारी AED 400,000 (करीब ₹1.03 करोड़) होनी जरूरी होगी, पहले यह सीमा AED 750,000 थी. इस बदलाव से छोटे निवेशकों के लिए रियल एस्टेट बाजार में प्रवेश आसान हो गया है.
छोटे निवेशकों के लिए खुला अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला खासकर मिड-सेगमेंट निवेशकों के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है. इससे न केवल व्यक्तिगत खरीदारों की पहुंच बढ़ेगी, बल्कि उन प्रॉपर्टीज की बिक्री भी बढ़ने की उम्मीद है, जो पहले वीजा पात्रता के कारण सीमित दायरे में थीं.
बाजार की स्थिति और दबाव
यह कदम ऐसे समय में आया है जब क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता के कारण दुबई के रियल एस्टेट बाजार में कुछ दबाव देखा जा रहा है. हाल के महीनों में बिक्री में गिरावट के चलते डेवलपर्स को डिस्काउंट और आकर्षक पेमेंट प्लान देने पड़े हैं.
मजबूत आंकड़े और निवेश का रुझान
2025 में दुबई में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी की बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची थी, जहां AED 547 अरब के सौदे दर्ज किए गए. इसमें भारत और ब्रिटेन के निवेशकों की बड़ी हिस्सेदारी रही. रियल एस्टेट विशेषज्ञों का कहना है कि नया नियम बाजार में संतुलन बनाए रखने में मदद करेगा. एक तरफ जहां छोटे निवेशकों को अवसर मिलेगा, वहीं दूसरी ओर संयुक्त निवेश में न्यूनतम हिस्सेदारी की शर्त वीजा के दुरुपयोग और “वीजा पूलिंग” जैसी प्रथाओं पर रोक लगाएगी.
सरकार द्वारा यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उठाया गया है, जिसका उद्देश्य दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की अनावश्यक आवाजाही को कम करना है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नई दिल्ली में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. अब राजधानी में प्रवेश करने वाले कमर्शियल वाहनों को पहले से ज्यादा पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) देना होगा. नई दरों के तहत कुछ भारी वाहनों पर यह शुल्क ₹4000 तक पहुंच गया है. यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उठाया गया है, जिसका उद्देश्य दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की अनावश्यक आवाजाही को कम करना है.
ECC शुल्क में बढ़ोतरी का नया ढांचा
सरकार द्वारा जारी नई अधिसूचना के अनुसार, विभिन्न कैटेगरी के कमर्शियल वाहनों पर शुल्क में ₹600 से ₹1400 तक की बढ़ोतरी की गई है. नई दरें इस प्रकार हैं:
1. कैटेगरी 2 (हल्की कमर्शियल गाड़ियां) और कैटेगरी 3 (2-एक्सल ट्रक):
₹1400 से बढ़ाकर ₹2000
2. कैटेगरी 4 (3-एक्सल ट्रक) और कैटेगरी 5 (4 या उससे अधिक एक्सल ट्रक):
₹2600 से बढ़ाकर ₹4000
इसके साथ ही अब हर साल ECC दरों में 5% की ऑटोमैटिक बढ़ोतरी भी लागू होगी.
सिर्फ राजस्व नहीं, प्रदूषण पर रोक
दिल्ली सरकार में पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा का कहना है कि यह फैसला केवल राजस्व बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि एक सख्त पर्यावरणीय नियंत्रण उपाय है. उन्होंने कहा कि संशोधित ECC का उद्देश्य डीजल से चलने वाले प्रदूषणकारी वाहनों की अनावश्यक एंट्री को कम करना है और ट्रांसपोर्ट सिस्टम को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाना है.
सुप्रीम कोर्ट और CAQM की भूमिका
फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने सुझाव दिया था कि ECC लंबे समय से नहीं बढ़ाया गया है. इस वजह से कई कमर्शियल वाहन वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे की बजाय दिल्ली के रास्ते का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे प्रदूषण बढ़ रहा था.
क्यों लिया गया यह फैसला?
सरकार के अनुसार इस कदम के पीछे मुख्य कारण हैं:
1. 2015 में तय ECC अब प्रभावी नहीं रहा
2. डीजल वाहनों की अनियंत्रित एंट्री रोकना
3. ट्रांसपोर्ट कंपनियों को साफ ईंधन वाले विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित करना
4. दिल्ली में ट्रैफिक और प्रदूषण दोनों को कम करना
ट्रांसपोर्ट सेक्टर में असंतोष भी
ECC बढ़ोतरी के फैसले का ट्रांसपोर्ट सेक्टर ने विरोध किया है. ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन का कहना है कि बढ़े हुए शुल्क से लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ेगी, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ेगा.
दिल्ली की हवा सुधारने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि जो भारी वाहन जरूरी नहीं हैं, उन्हें दिल्ली में प्रवेश करने के बजाय एक्सप्रेसवे का इस्तेमाल करना चाहिए. सरकरा को इस नई ECC व्यवस्था से उम्मीद है कि अनावश्यक ट्रैफिक कम होगा, प्रदूषण में कमी आएगी और राजधानी की वायु गुणवत्ता में सुधार होगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि ECC बढ़ने का असर परिवहन लागत पर पड़ेगा. इससे माल ढुलाई महंगी हो सकती है, जिसका बोझ धीरे-धीरे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर दिख सकता है. ECC में यह बढ़ोतरी दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में एक सख्त कदम है. हालांकि इससे ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर लागत का दबाव बढ़ेगा, लेकिन सरकार का दावा है कि यह कदम राजधानी की हवा को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
सरकार का लक्ष्य 2030 तक भारत की वैश्विक सीफेरर हिस्सेदारी को 20% तक पहुंचाना है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने समुद्री क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ₹51,383 करोड़ के निवेश की योजना घोषित की है. इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2026–27 में 62 नए जहाज शामिल किए जाएंगे, जिससे देश की शिपिंग क्षमता में बड़ा विस्तार होगा. यह घोषणा केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सरबनंदा सोनोवल ने नई दिल्ली में एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान की.
आत्मनिर्भर शिपिंग कार्यक्रम को गति
सरकार का यह कदम “आत्मनिर्भर शिपिंग कार्यक्रम” के तहत उठाया गया है, जिसका उद्देश्य भारत की समुद्री निर्भरता को कम करना और घरेलू शिपिंग क्षमता को मजबूत करना है. इस योजना से लगभग 2.85 मिलियन ग्रॉस टन (GT) अतिरिक्त क्षमता जुड़ने की उम्मीद है, जिससे भारत का शिपिंग इकोसिस्टम और मजबूत होगा.
किन जहाजों पर होगा निवेश
इस विस्तार योजना में कई प्रकार के जहाज जैसे कंटेनर शिप, एलपीजी कैरियर, कच्चे तेल के टैंकर, ग्रीन टग्स और ड्रेजिंग वेसल्स शामिल हैं. सरकार का फोकस ऊर्जा परिवहन और वैश्विक व्यापार के लिए जरूरी जहाजों की क्षमता बढ़ाने पर है.
भारतीय शिपिंग कॉर्पोरेशन की बड़ी भूमिका
शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) इस योजना में अहम भूमिका निभा रही है. तेल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर SCI 59 जहाजों की खरीद की योजना पर काम कर रही है. इसके अलावा, कंपनी को विशेष रूप से अमोनिया परिवहन के लिए जहाज बनाने की दिशा में भी तैयार किया जा रहा है.
भारत की शिपिंग क्षमता में रिकॉर्ड वृद्धि
वित्त वर्ष 2026 में भारत की कुल शिपिंग क्षमता बढ़कर 142 मिलियन ग्रॉस टन तक पहुंच गई है. इस वर्ष 92 नए जहाज जोड़े गए, जो हाल के वर्षों में सबसे बड़ी वार्षिक वृद्धि में से एक है.
बंदरगाहों और ढांचे में तेज निवेश
वित्त वर्ष 2025–26 में भारत के प्रमुख बंदरगाहों ने 915.17 मिलियन टन कार्गो हैंडल किया, जो लक्ष्य से अधिक है. कार्गो में 7.06% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई, जो समुद्री व्यापार की मजबूत रिकवरी को दर्शाती है. पूंजीगत व्यय भी बढ़कर ₹14,953 करोड़ पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष यह ₹9,708 करोड़ था.
सरकार का नीति फोकस
सरकार ने सभी संबंधित विभागों को एक विस्तृत व्हाइट पेपर तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसमें मौजूदा कमियां, लक्ष्य और समयबद्ध रोडमैप शामिल होगा. इस प्रक्रिया में कई मंत्रालय शामिल होंगे, जिनमें वाणिज्य, पेट्रोलियम, रसायन और शिपिंग विभाग प्रमुख हैं.
वैश्विक समुद्री जोखिम और रणनीति
बैठक में वैश्विक व्यापार मार्गों में बढ़ते जोखिमों, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे क्षेत्रों की स्थिति पर भी चर्चा हुई. सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक कार्गो की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्षमता विस्तार को जरूरी बताया.
भारत की समुद्री ताकत
भारत के पास 11,098 किलोमीटर लंबी तटरेखा, 111 राष्ट्रीय जलमार्ग और 12 प्रमुख बंदरगाह हैं. इसके अलावा, भारत वैश्विक स्तर पर शीर्ष तीन समुद्री श्रमिक आपूर्तिकर्ता देशों में शामिल है, जहां लगभग 12% वैश्विक सीफेरर्स भारतीय हैं.
सरकार का लक्ष्य 2030 तक भारत की वैश्विक सीफेरर हिस्सेदारी को 20% तक पहुंचाना है. बढ़ते निवेश, नए जहाजों और नीति समन्वय के साथ भारत अपने समुद्री क्षेत्र को अधिक आत्मनिर्भर और वैश्विक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
यह निवेश भारत के तेजी से बढ़ते रेस्टोरेंट और फूड सर्विस सेक्टर में वैश्विक निवेशकों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है. आने वाले समय में Trimex Foods के विस्तार और नए ब्रांड्स की एंट्री से इस सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और तेज होने की उम्मीद है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में कंज्यूमर और फूड सर्विस सेक्टर में एक बड़ा निवेश सामने आया है. ग्लोबल प्राइवेट इक्विटी फर्म सिगुलर गफ (Siguler Guff) ने भारतीय कंपनी ट्रिमैक्स फूड्स (Trimex Foods Private Limited) में 40 मिलियन डॉलर (करीब $40 मिलियन) का रणनीतिक निवेश किया है. यह निवेश कंपनी के मल्टी-ब्रांड रेस्टोरेंट नेटवर्क के विस्तार और नए वैश्विक ब्रांड जोड़ने की योजनाओं को तेज करेगा.
ट्रिमेक्स फूड्स की मौजूदा स्थिति
Trimex Foods भारत में Chili's Grill & Bar, PAUL और Cinnabon जैसे अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट ब्रांड्स की एक्सक्लूसिव फ्रेंचाइज़ी पार्टनर है. कंपनी की स्थापना 2010 में हुई थी और वर्तमान में यह भारत के 13 शहरों में 50 से अधिक रेस्टोरेंट और बेकरी-कैफे संचालित करती है.
Trimex ने देश में कैजुअल डाइनिंग और बेकरी सेगमेंट में एक मजबूत प्लेटफॉर्म तैयार किया है. इसके मजबूत ब्रांड पोर्टफोलियो और ऑपरेशनल अनुशासन ने इसे वैश्विक ब्रांड्स के लिए एक भरोसेमंद साझेदार बनाया है.
निवेश का उद्देश्य और रणनीति
यह निवेश Trimex Foods का पहला संस्थागत फंडिंग राउंड है. इसका उद्देश्य मौजूदा ब्रांड्स का भारत में विस्तार, नए अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट ब्रांड्स को जोड़ना और देशभर में नेटवर्क का तेज विस्तार करना है. Siguler Guff का मानना है कि भारत का ऑर्गनाइज़्ड फूड सर्विस सेक्टर आने वाले दशक में सबसे तेजी से बढ़ने वाले उपभोक्ता क्षेत्रों में से एक होगा.
भारत के कंज्यूमर मार्केट पर भरोसा
शौन खूबचंदानी ने कहा कि भारत का फूड सर्विस सेक्टर एक स्ट्रक्चरल बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जहां उपभोक्ता अब वैश्विक स्तर के डाइनिंग अनुभवों को अधिक पसंद कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि Trimex एक स्केलेबल मल्टी-ब्रांड प्लेटफॉर्म है, जिसने पिछले 15 वर्षों में मजबूत ऑपरेशनल प्रदर्शन और ग्राहक आधार बनाया है.
Trimex Foods के प्रवक्ता ने कहा कि Siguler Guff के साथ साझेदारी कंपनी के अगले ग्रोथ फेज के लिए महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि कंपनी हमेशा से भारतीय उपभोक्ताओं को विश्वस्तरीय डाइनिंग अनुभव देने और ऑपरेशनल स्टैंडर्ड बनाए रखने पर केंद्रित रही है. उन्होंने यह भी कहा कि Siguler Guff की वैश्विक विशेषज्ञता और उभरते बाजारों में निवेश का अनुभव कंपनी के विस्तार में मदद करेगा.
इस सौदे में Ernst & Young (EY) ने Trimex Foods के लिए एक्सक्लूसिव फाइनेंशियल एडवाइजर की भूमिका निभाई. यह निवेश भारत के तेजी से बढ़ते रेस्टोरेंट और फूड सर्विस सेक्टर में वैश्विक निवेशकों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है. आने वाले समय में Trimex Foods के विस्तार और नए ब्रांड्स की एंट्री से इस सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और तेज होने की उम्मीद है.
बैंकों की औसत लेंडिंग दर (WALR) में बदलाव धीरे-धीरे हुआ. यह FY24–FY25 में 9.7–9.8% तक पहुंचने के बाद मार्च 2026 तक घटकर करीब 9% पर आ गई. इसी वजह से बॉन्ड यील्ड और बैंक लोन दरों के बीच का अंतर तेजी से घटा है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय कॉरपोरेट्स और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) अब तेजी से बैंक कर्ज की ओर रुख कर रही हैं. इसकी मुख्य वजह पूंजी बाजार में बढ़ती यील्ड है, जिससे बॉन्ड फाइनेंसिंग का लागत लाभ काफी हद तक कम हो गया है. यह जानकारी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी CareEdge Ratings की एक रिपोर्ट में सामने आई है. रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेज वृद्धि ने वित्तीय स्थितियों को अधिक सख्ती से प्रभावित किया है, जबकि बैंक लेंडिंग दरों में यह बदलाव अपेक्षाकृत धीमा रहा है. इसी कारण कंपनियां अपने फंडिंग विकल्पों में संतुलन बदल रही हैं.
सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी
मार्च 2021 में जहां 1 साल की सरकारी प्रतिभूति (G-Sec) यील्ड लगभग 3.8% और 10 साल की यील्ड करीब 6.4% थी, वहीं मार्च 2026 तक यह बढ़कर लगभग 7% के आसपास पहुंच गई. इस बढ़ोतरी ने यील्ड कर्व को फ्लैट कर दिया है, जिससे सभी तरह के कर्ज की लागत बढ़ गई है. खासकर अल्पकालिक दरों में तेज वृद्धि देखी गई है.
बैंक लोन बनाम बॉन्ड, घटता अंतर
बैंकों की औसत लेंडिंग दर (WALR) में बदलाव धीरे-धीरे हुआ. यह FY24–FY25 में 9.7–9.8% तक पहुंचने के बाद मार्च 2026 तक घटकर करीब 9% पर आ गई. इसी वजह से बॉन्ड यील्ड और बैंक लोन दरों के बीच का अंतर तेजी से घटा है.
1. AAA रेटेड कंपनियों के लिए अंतर, 490 बेसिस पॉइंट (FY21) से घटकर 168 बेसिस पॉइंट (FY26)
2. NBFCs के लिए अंतर, 473 से घटकर 156 बेसिस पॉइंट
A-रेटेड कंपनियों के लिए स्थिति और खराब हुई है, जहां बॉन्ड से उधारी अब बैंक लोन से भी महंगी हो गई है.
फंडिंग पैटर्न में बड़ा बदलाव
बदलते रुझानों का असर बाजार में साफ दिखाई दे रहा है.
1. NBFCs और कॉरपोरेट्स द्वारा NCD (नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर) जारी करना FY23 में ₹1.30 लाख करोड़ तक पहुंचा, लेकिन FY26 में गिरकर ₹0.33 लाख करोड़ रह गया.
2. औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों को बैंक क्रेडिट FY21 के ₹2.5 लाख करोड़ से बढ़कर FY24 में ₹12.6 लाख करोड़ हुआ, हालांकि FY26 तक यह ₹9.3 लाख करोड़ पर आ गया.
3. NBFCs को मिलने वाला बैंक क्रेडिट भी FY21 के ₹0.1 लाख करोड़ से बढ़कर ₹3.1 लाख करोड़ तक पहुंच गया.
बाजार में बदलाव की वजह
रिपोर्ट के अनुसार FY23 इस बदलाव का टर्निंग पॉइंट था. उस समय बढ़ती ब्याज दरें, जोखिम बढ़ना और निवेशकों की सतर्कता के कारण बॉन्ड मार्केट कम आकर्षक हो गया. इसके अलावा, लिक्विडिटी की स्थिति भी महत्वपूर्ण रही. FY21 में सरप्लस लिक्विडिटी थी, लेकिन FY23 के बाद यह तंग हो गई, जिससे शॉर्ट-टर्म उधारी महंगी हो गई. कई मामलों में अल्पकालिक दरें लंबी अवधि की यील्ड से भी ऊपर चली गईं.
विशेषज्ञों की राय
CareEdge Ratings के सीनियर डायरेक्टर संजय अग्रवाल के अनुसार, यह बदलाव क्रेडिट गुणवत्ता में गिरावट नहीं बल्कि एक ट्रांजिशन फेज है. उन्होंने कहा कि यील्ड तेजी से रीप्राइस हुई है जबकि बैंक लोन दरें धीरे बदली हैं, जिससे कंपनियां बैंक फाइनेंसिंग की ओर शिफ्ट हो रही हैं. इससे लिक्विडिटी और रीफाइनेंसिंग जोखिमों में थोड़ी राहत मिली है.
वहीं, CareEdge Ratings के एसोसिएट डायरेक्टर सौरभ भलेराउ का कहना है कि यह बदलाव बैंकिंग सिस्टम के लिए क्रेडिट ग्रोथ बढ़ाता है, लेकिन इससे बैंक बैलेंस शीट पर जोखिम भी केंद्रित हो सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं और लिक्विडिटी कड़ी रहती है, तो बैंक कर्ज की ओर झुकाव जारी रह सकता है. खासकर कम रेटिंग वाले उधारकर्ताओं के लिए बॉन्ड बाजार से फंड जुटाना और मुश्किल हो सकता है.
केमिकल सेक्टर में FY27 के दौरान स्थिर लेकिन अस्थिर (volatile) ग्रोथ देखने को मिल सकती है. कंपनियों के लिए मजबूत लिक्विडिटी और बेहतर वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच साबित होगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) ने वित्त वर्ष 2027 के लिए केमिकल सेक्टर को लेकर सतर्क रुख बनाए रखा है. एजेंसी के मुताबिक भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे माल की ऊंची कीमतें और सप्लाई चेन में बदलाव के चलते इस सेक्टर में तेज उतार-चढ़ाव (volatility) देखने को मिल सकता है, हालांकि धीरे-धीरे मुनाफे में सुधार की उम्मीद भी बनी हुई है.
केमिकल सेक्टर पर ‘न्यूट्रल आउटलुक’ बरकरार
Ind-Ra ने पूरे केमिकल सेक्टर पर न्यूट्रल आउटलुक और FY27 के लिए स्थिर क्रेडिट रेटिंग दृष्टिकोण बनाए रखा है. एजेंसी का कहना है कि सेक्टर में रिकवरी जारी रहेगी, लेकिन इसकी गति पिछली रिकवरी साइकल की तुलना में धीमी होगी.
कीमतों में तेजी के बाद अब अस्थिरता
मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के बाद केमिकल कीमतों में 40% से 50% तक की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. हालांकि अप्रैल 2026 तक इनमें 5% से 10% की गिरावट आई, लेकिन कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं.
मुनाफे पर दबाव, मार्जिन स्थिर लेकिन सीमित
एजेंसी के अनुसार सेक्टर के मार्जिन 13% से 15% के बीच रह सकते हैं, जो ऐतिहासिक औसत से कम है. अलग-अलग उत्पादों में प्रदर्शन भी काफी अलग रहेगा, जिससे कंपनियों के नतीजों में असमानता देखने को मिलेगी.
ग्लोबल सप्लाई और ओवरकैपेसिटी का असर
Ind-Ra ने चेतावनी दी है कि चीन में लगातार ओवरकैपेसिटी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा भारतीय केमिकल सेक्टर के लिए संरचनात्मक जोखिम बनी रहेगी. हालांकि अमेरिका द्वारा टैरिफ में राहत से भारतीय एक्सपोर्टर्स की प्रतिस्पर्धा बढ़ी है.
घरेलू मांग मजबूत बनी हुई
भारत में केमिकल्स की घरेलू मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है, खासकर कंजम्पशन-ड्रिवन सेक्टर्स से सपोर्ट मिल रहा है. हालांकि FY27 की शुरुआत में कुछ क्षेत्रों में डिमांड टेम्पररी तौर पर कमजोर रह सकती है.
अमेरिका के बाजार में भारतीय केमिकल्स की स्थिति बेहतर हुई है, जहां देश का करीब 15% निर्यात जाता है. टैरिफ में बदलाव के बाद भारतीय कंपनियों को कॉस्ट एडवांटेज मिला है, जिससे एक्सपोर्ट मार्जिन में सुधार हुआ है.
वर्किंग कैपिटल और लिक्विडिटी सबसे बड़ा रिस्क
Ind-Ra ने कहा है कि FY27 में लिक्विडिटी मैनेजमेंट सबसे अहम फैक्टर होगा.
- कच्चे माल की ऊंची कीमतें
- बढ़ता इन्वेंटरी स्तर
- लंबा सप्लाई साइकल
इन सभी कारणों से वर्किंग कैपिटल की जरूरत बढ़ सकती है.
कंपनियों की बैलेंस शीट स्थिति
लगभग 60% बड़ी केमिकल कंपनियों का नेट लेवरेज 2.5 गुना से नीचे है, जो स्थिर स्थिति को दर्शाता है. हालांकि करीब 20% कंपनियां एक्सपोर्ट एक्सपोजर और कैश फ्लो दबाव के कारण जोखिम में बनी हुई हैं.
Ind-Ra के मुताबिक FY27 में केमिकल सेक्टर की दिशा मुख्य रूप से भू-राजनीतिक स्थिरता, कच्चे तेल और फीडस्टॉक की कीमतें, चीन की सप्लाई स्ट्रेटजी और ग्लोबल डिमांड रिकवरी जैसे फैक्टर्स पर निर्भर करेगी.
वित्त वर्ष 2026 के दौरान भारत से iPhone का निर्यात करीब ₹2 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है. यह उपलब्धि उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के अंतिम वर्ष में हासिल हुई, जिसने इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को नई गति दी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत अब वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है. वित्त वर्ष 2026 में iPhone निर्यात ने रिकॉर्ड स्तर छूते हुए देश को एक बड़े एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित कर दिया है, जो ‘मेक इन इंडिया’ और PLI योजना की बड़ी सफलता मानी जा रही है.
iPhone निर्यात ने बनाया नया रिकॉर्ड
वित्त वर्ष 2026 के दौरान भारत से iPhone का निर्यात करीब ₹2 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है. यह उपलब्धि उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के अंतिम वर्ष में हासिल हुई, जिसने इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को नई गति दी.
स्मार्टफोन एक्सपोर्ट में iPhone का दबदबा
पूरे वित्त वर्ष 2026 में भारत का कुल स्मार्टफोन निर्यात लगभग ₹2.6 लाख करोड़ रहा, जिसमें iPhone का योगदान 75% से अधिक रहा. इस प्रदर्शन के साथ iPhone भारत का सबसे बड़ा ब्रांडेड निर्यात उत्पाद बनकर उभरा है.
अन्य सेक्टर्स से आगे निकला iPhone
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, निर्यात के लिहाज से iPhone ने कई पारंपरिक सेक्टर्स को पीछे छोड़ दिया. डीजल वाहन, हीरा, दवाएं और पेट्रोल जैसी प्रमुख निर्यात श्रेणियां iPhone के मुकाबले काफी पीछे रहीं, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की बढ़ती ताकत साफ नजर आती है.
PLI योजना से मिली बड़ी बढ़त
PLI योजना शुरू होने के बाद भारत से iPhone निर्यात लगभग शून्य से बढ़कर 5 साल में ₹2 लाख करोड़ तक पहुंच गया.
- FY22: ₹9,351 करोड़
- FY23: ₹44,269 करोड़
- FY24: ₹85,013 करोड़
- FY25: ₹1.5 लाख करोड़
- FY26: ₹2 लाख करोड़
यह तेज वृद्धि भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत स्थिति दिला रही है.
टाटा और फॉक्सकॉन की अहम भूमिका
iPhone मैन्युफैक्चरिंग में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और फॉक्सकॉन ने प्रमुख भूमिका निभाई. दोनों कंपनियों का निर्यात में लगभग समान योगदान रहा और उन्होंने देश में बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स स्थापित कीं.
रोजगार और सप्लाई चेन का विस्तार
Apple के सप्लाई इकोसिस्टम में 40 से अधिक घरेलू कंपनियां शामिल हैं, जबकि कुल मिलाकर करीब 2.5 लाख लोगों को रोजगार मिला है. खास बात यह है कि इस कार्यबल में 70% से ज्यादा महिलाएं शामिल हैं, जो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बदलाव का संकेत देता है.
वैश्विक रणनीति में भारत की बढ़ती भूमिका
Apple ने भारत में अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करते हुए गैर-चीनी आपूर्तिकर्ताओं पर फोकस किया है. जापान और ताइवान की कंपनियों के साथ मिलकर भारत को एक प्रमुख उत्पादन केंद्र बनाया गया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार जारी रही, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में और बड़ी भूमिका निभा सकता है. iPhone की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब केवल उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि एक मजबूत उत्पादन और निर्यात केंद्र भी बन चुका है.
RBI ने मौजूदा पात्र NBFCs को 31 दिसंबर 2026 तक अपना पंजीकरण रद्द कराने के लिए आवेदन करने का अवसर दिया है. यह आवेदन RBI के ‘प्रवाह’ पोर्टल के माध्यम से करना होगा. नए नियम 1 जुलाई 2026 से प्रभावी होंगे.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
छोटी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) को राहत देते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने नया नियामकीय ढांचा पेश किया है. इसके तहत सीमित आकार और सीमित गतिविधियों वाली कंपनियों को पंजीकरण से छूट दी जाएगी, हालांकि इसके साथ सख्त शर्तें और अनुपालन नियम भी लागू रहेंगे.
छोटी NBFCs के लिए नई राहत
RBI द्वारा जारी अंतिम दिशानिर्देशों के अनुसार, वे NBFCs जिनकी कुल परिसंपत्ति ₹1,000 करोड़ से कम है, जो सार्वजनिक जमा (public funds) का उपयोग नहीं करतीं और जिनका ग्राहकों से सीधा संपर्क (user interface) नहीं है, उन्हें पंजीकरण की अनिवार्यता से छूट मिलेगी. ऐसी कंपनियों को ‘गैर-पंजीकृत टाइप 1 NBFC’ की श्रेणी में रखा जाएगा.
शर्तों के साथ मिलेगी छूट
हालांकि यह छूट पूरी तरह बिना शर्त नहीं है. संबंधित कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे भविष्य में भी सार्वजनिक धन या ग्राहकों से सीधे संपर्क में नहीं आएंगी. इसके लिए कंपनी के बोर्ड को औपचारिक प्रस्ताव पारित करना होगा और वैधानिक ऑडिटर को भी इसकी पुष्टि करनी होगी.
31 दिसंबर 2026 तक आवेदन का मौका
RBI ने मौजूदा पात्र NBFCs को 31 दिसंबर 2026 तक अपना पंजीकरण रद्द कराने के लिए आवेदन करने का अवसर दिया है. यह आवेदन RBI के ‘प्रवाह’ पोर्टल के माध्यम से करना होगा. नए नियम 1 जुलाई 2026 से प्रभावी होंगे.
आवेदन के लिए जरूरी दस्तावेज
पंजीकरण रद्द कराने के लिए कंपनियों को पिछले तीन वर्षों के ऑडिटेड वित्तीय विवरण, सार्वजनिक निधि और ग्राहक संपर्क की अनुपस्थिति का प्रमाण पत्र तथा भविष्य में इन शर्तों का पालन करने का बोर्ड संकल्प प्रस्तुत करना होगा.
RBI के पास रहेगा अंतिम अधिकार
RBI ने स्पष्ट किया है कि वह किसी भी आवेदन को अस्वीकार करने का अधिकार रखता है, यदि उसे लगे कि कंपनी वास्तव में इस श्रेणी के मानकों पर खरी नहीं उतरती. साथ ही ₹1,000 करोड़ या उससे अधिक परिसंपत्ति वाली NBFCs को अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होगा और वे नियामकीय दायरे में रहेंगी.
समूह कंपनियों पर भी सख्ती
अगर किसी समूह की कई NBFCs की कुल परिसंपत्ति ₹1,000 करोड़ से अधिक है, तो सभी संस्थाओं के लिए पंजीकरण अनिवार्य होगा. RBI ने यह कदम नियामकीय खामियों का फायदा उठाने से रोकने के लिए उठाया है.
नियमों को और किया सख्त
RBI ने यह भी स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक निधियों तक परोक्ष पहुंच (जैसे समूह कंपनियों के जरिए) को भी सार्वजनिक निधि ही माना जाएगा. इसके अलावा ऑडिटरों को अधिक जिम्मेदारी दी गई है और किसी भी उल्लंघन की स्थिति में उन्हें सीधे RBI को रिपोर्ट करना होगा.
विदेशी निवेश पर भी शर्तें
गैर-पंजीकृत टाइप 1 NBFCs यदि विदेश में वित्तीय सेवाओं में निवेश करना चाहती हैं, तो उन्हें पहले RBI से पंजीकरण और पूर्व स्वीकृति लेनी होगी. इसके बाद ही वे मौजूदा विदेशी निवेश नियमों के तहत आगे बढ़ सकेंगी.
बुधवार को बीएसई सेंसेक्स 609.45 अंक यानी 0.79% की बढ़त के साथ 77,496.36 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 50 इंडेक्स 181.95 अंक यानी 0.76% उछलकर 24,177.65 पर बंद हुआ.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की संभावनाओं ने घरेलू शेयर बाजार में सकारात्मक माहौल बनाया, जिसके चलते गुरुवार को बाजार ने मजबूती के साथ कारोबार समाप्त किया. वैश्विक बाजारों से मिले मिले-जुले संकेत, अमेरिकी फेड के फैसले और सेंसेक्स की मंथली एक्सपायरी के बीच आज घरेलू शेयर बाजार में हलचल भरा कारोबार देखने को मिल सकता है. पिछले सत्र की तेजी के बाद निवेशक आज सतर्क नजर आ सकते हैं, जबकि चुनिंदा शेयरों में कॉरपोरेट अपडेट्स और तिमाही नतीजों के चलते इंट्रा-डे में तेज मूवमेंट की संभावना है.
बाजार में तेजी, सेंसेक्स-निफ्टी मजबूत बंद
कारोबारी सत्र के दौरान बीएसई सेंसेक्स ने 1,000 अंकों से ज्यादा की छलांग लगाई. हालांकि दिन के अंत में कुछ मुनाफावसूली देखने को मिली. जिसके बाद सेंसेक्स 609.45 अंक यानी 0.79% की बढ़त के साथ 77,496.36 पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 इंडेक्स 181.95 अंक यानी 0.76% उछलकर 24,177.65 पर बंद हुआ और दिन में 24,300 के स्तर को भी पार कर गया.
रुपये में कमजोरी, रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद
शेयर बाजार में तेजी के बावजूद भारतीय मुद्रा दबाव में रही. डॉलर के मुकाबले रुपया 0.3% की गिरावट के साथ 94.8450 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ. जो आयात लागत और महंगाई की चिंता बढ़ा सकता है.
इन शेयरों में सबसे ज्यादा तेजी
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 22 बढ़त के साथ बंद हुए. सबसे ज्यादा उछाल आईटीसी में देखने को मिला. जो 3.83% चढ़ा. इसके अलावा टेक महिंद्रा, रिलायंस इंडस्ट्रीज, मारुति सुजुकी, भारती एयरटेल, सन फार्मा, महिंद्रा एंड महिंद्रा, हिंदुस्तान यूनिलीवर, इन्फोसिस, लार्सन एंड टुब्रो और बजाज फाइनेंस जैसे दिग्गज शेयरों में 1% से 3% तक की तेजी दर्ज की गई.
इन शेयरों में गिरावट का दबाव
दूसरी ओर. कुछ शेयरों में बिकवाली हावी रही. इंडिगो, एनटीपीसी, बजाज फिनसर्व, आईसीआईसीआई बैंक, एशियन पेंट्स, ट्रेंट और एचडीएफसी बैंक जैसे स्टॉक्स लाल निशान में बंद हुए. ब्रॉडर मार्केट की बात करें तो यहां निवेशकों का रुख मिश्रित रहा. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.07% गिरा, निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.65% चढ़ गया. सेक्टोरल आधार पर एफएमसीजी और रियल्टी शेयरों में खरीदारी दिखी. जबकि कंस्ट्रक्शन ड्यूरेबल और मीडिया सेक्टर दबाव में रहे.
कच्चे तेल में तेजी
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 3.04% बढ़कर 114.6 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें आगे चलकर बाजार और महंगाई पर असर डाल सकती हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, बाजार की दिशा आगे वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया की स्थिति पर निर्भर करेगी. साथ ही. कंपनियों के तिमाही नतीजे और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की चाल तय करेंगी.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
आज इंट्रा-डे ट्रेडिंग में बजाज फाइनेंस, एलएंडटी और वेदांता जैसे शेयरों में कॉरपोरेट गतिविधियों के चलते तेज हलचल देखने को मिल सकती है. इसके अलावा आज कई बड़ी कंपनियां जैसे हिंदुस्तान यूनिलीवर, बजाज फिनसर्व, अदाणी पोर्ट्स, आईडीबीआई बैंक, इंडियामार्ट, डॉ लाल पैथलैब्स और अन्य अपने तिमाही नतीजे पेश करेंगी, जिससे स्टॉक-विशेष में मूवमेंट बढ़ सकता है. हाल के नतीजों में बजाज फाइनेंस का मुनाफा 22% बढ़ा है, जबकि कुछ कंपनियों में मुनाफे में गिरावट भी दर्ज की गई है. कॉरपोरेट अपडेट्स की बात करें तो एलएंडटी ने हैदराबाद मेट्रो में अपनी हिस्सेदारी बेचने का समझौता किया है, वहीं अन्य कंपनियों को नए प्रोजेक्ट और ऑर्डर मिले हैं. इसके अलावा बाजार में बल्क डील्स, आईपीओ लिस्टिंग और एक्स-डिविडेंड जैसे फैक्टर्स भी निवेशकों के फोकस में रहेंगे, जिससे आज का कारोबार काफी एक्शन से भरपूर रहने की उम्मीद है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
यह लॉन्च दिखाता है कि भारत में प्रीमियम कैफे बाजार तेजी से बढ़ रहा है. उपभोक्ता अब सिर्फ कॉफी नहीं, बल्कि माहौल, कनेक्शन, कहानी और व्यक्तिगत अनुभव खरीदना चाहते हैं.
by
रितु राणा
दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित प्रतिष्ठित हैमिल्टन हाउस में टाटा समूह और स्टारबक्स ने राजधानी का पहला स्टारबक्स रिजर्व (Starbucks Reserve) स्टोर लॉन्च किया है. दरअसल, स्टारबक्स ने हैमिल्टन हाउस में अपने फ्लैगशिप स्टोर को पुनः डिजाइन किया है और इसे स्टारबक्स रिजर्व® स्टोर के रूप में विकसित किया है. यह देश में तीसरा स्टारबक्स रिजर्व आउटलेट है, जो भारत में प्रीमियम कॉफी अनुभव और एक्सपीरियंस-बेस्ड रिटेल की बढ़ती मांग को दर्शाता है. यह नया स्टोर केवल कॉफी शॉप नहीं, बल्कि विरासत, डिजाइन, संस्कृति और वैश्विक कॉफी शिल्प का संगम बनकर उभरा है. कंपनी इसे दिल्ली के ग्राहकों के लिए एक अलग और उन्नत कॉफी अनुभव के रूप में पेश कर रही है.
दिल्ली में प्रीमियम ग्राहकों पर फोकस
कंपनी के अनुसार, राजधानी में यह पहला रिजर्व स्टोर उपभोक्ताओं को एक्सक्लूसिव कॉफी ब्लेंड्स, सीमित संस्करण बीन्स, विशेष पेय पदार्थों और कस्टमाइज्ड ब्रूइंग अनुभव का अवसर देगा. स्टारबक्स का कहना है कि दिल्ली जैसे महानगर में युवा और प्रीमियम ग्राहक अब केवल उत्पाद नहीं, बल्कि अनुभव की तलाश में हैं. इसी रणनीति के तहत रिजर्व फॉर्मेट को राजधानी में लाया गया है.
दुर्लभ कॉफी वैरायटीज की पेशकश
स्टारबक्स रिजर्व ग्राहकों को कॉफी और उसके शिल्प से गहराई से जोड़ता है. रिजर्व बार पर ग्राहक दुर्लभ कॉफी वैरायटीज को खोज सकते हैं, विभिन्न ब्रूइंग मेथड्स को समझ सकते हैं और हर कप के पीछे की कला का अनुभव कर सकते हैं. स्टोर में अत्याधुनिक ब्लैक ईगल एस्प्रेसो मशीन भी मौजूद है, जो कॉफी मास्टर्स को ब्रूइंग और एक्सट्रैक्शन पर बेहतर नियंत्रण देती है, जिससे कॉफी का शानदार स्वाद सामने आता है. ये सभी तत्व मिलकर एक समृद्ध और सूक्ष्म कॉफी अनुभव तैयार करते हैं, जो नए और अनुभवी दोनों तरह के कॉफी प्रेमियों को कॉफी के साथ सीखने, समझने और जुड़ने का अवसर देता है.
कंपनी के एक्सपर्ट पार्टनर्स ने कहा कि स्टारबक्स रिजर्व में पेश की जाने वाली कॉफी बेहद प्रीमियम और चुनिंदा किस्मों की होती है, जिन्हें अन्य स्टोर्स पर उपलब्ध नहीं कराया जाता. इसके लिए कंपनी के कॉफी खरीदार 40 से अधिक देशों की यात्रा कर सीमित मात्रा में उपलब्ध उच्च गुणवत्ता वाली कॉफी बीन्स का चयन करते हैं. उन्होंने बताया कि रिजर्व फॉर्मेट का फोकस केवल बेहतरीन हस्तनिर्मित पेय पदार्थ उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ग्राहकों के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव और विशिष्ट अनुभव तैयार करना भी है. उन्होंने कहा कि प्रीमियम कॉफी, शिल्पकारी और पर्सनल कनेक्शन का यह संयोजन ही स्टारबक्स रिजर्व एक्सपीरियंस को अलग पहचान देता है.
हैमिल्टन हाउस की विरासत से जुड़ा नया अनुभव
स्टोर को कनॉट प्लेस के ऐतिहासिक हैमिल्टन हाउस में स्थापित किया गया है, जो दिल्ली की औपनिवेशिक वास्तुकला और व्यापारिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. कंपनी ने स्टोर डिजाइन में इस विरासत को आधुनिक कॉफी संस्कृति के साथ जोड़ने की कोशिश की है. स्टोर के भीतर लगाए गए म्यूरल्स, इंटीरियर डिजाइन और सजावट में दिल्ली की जीवंत संस्कृति, भारतीय आतिथ्य और कॉफी की फॉर्म-टू-कप (farm-to-cup) यात्रा को दर्शाया गया है.
BW हिंदी से बातचीत के दौरान टाटा स्टारबक्स रिजर्व की हेड ऑफ प्रोडक्ट एंड मार्केटिंग मिताली माहेश्वरी ने बताया कि राजधानी के ऐतिहासिक क्षेत्र में स्थित यह स्टोर भारत में ब्रांड के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जहां विरासत वास्तुकला को आधुनिक इमर्सिव डिजाइन और कॉफी शिल्प कौशल के साथ जोड़ा गया है, ताकि दिल्ली को स्टारबक्स रिजर्व अनुभव का एक नया आयाम दिया जा सके.
मार्केटिंग से ज्यादा भरोसा एक्सपीरियंस पर
मिताली माहेश्वरी ने बताया, हम लगातार अपने स्टोर्स को ग्राहकों के लिए और अधिक जीवंत और प्रासंगिक बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. हैमिल्टन हाउस स्थित हमारे फ्लैगशिप स्टोर को स्टारबक्स रिजर्व में बदलना इसी सोच का हिस्सा है, जहां हम अधिक इमर्सिव और सार्थक अनुभव देने पर फोकस कर रहे हैं. हमारे कॉफी मास्टर्स और एक्सपर्ट पार्टनर्स इस स्टोर के केंद्र में हैं, जिनके माध्यम से हम कॉफी को लेकर गहरी बातचीत को बढ़ावा देना चाहते हैं और ‘थर्ड-प्लेस’ अनुभव को और मजबूत करना चाहते हैं, एक ऐसा स्थान, जहां ग्राहक जुड़ सकें, नए अनुभव खोज सकें और अधिक अर्थपूर्ण तरीके से सहभागिता कर सकें.
उन्होंने आगे बताया कि इस रिजर्व स्टोर के लिए फिलहाल कोई बड़ी विज्ञापन मुहिम नहीं चलाई गई है. कंपनी का मानना है कि शानदार अनुभव, सोशल मीडिया शेयरिंग और ग्राहकों की प्रतिक्रिया खुद इस स्टोर की सबसे बड़ी मार्केटिंग बनेगी. आज के युवा उपभोक्ता नई जगहों और प्रीमियम अनुभवों को तेजी से अपनाते हैं, जिससे ऑर्गेनिक ब्रांड विजिबिलिटी बढ़ती है.
भारत में विस्तार की तैयारी
मिताली ने जानकारी दी है कि, मुंबई और दिल्ली के बाद अब इसी साल जल्द ही स्टारबक्स रिजर्व फॉर्मेट को अन्य शहरों में भी विस्तार दिया जाएगा, हालांकि अगले शहरों के नामों का खुलासा नहीं किया गया है.
यह लॉन्च दिखाता है कि भारत में प्रीमियम कैफे बाजार तेजी से बढ़ रहा है. उपभोक्ता अब सिर्फ कॉफी नहीं, बल्कि माहौल, कनेक्शन, कहानी और व्यक्तिगत अनुभव खरीदना चाहते हैं. स्टारबक्स रिजर्व के जरिए टाटा-स्टारबक्स भारत के हाई-वैल्यू शहरी ग्राहकों को लक्षित कर रहा है, जहां प्रति ग्राहक खर्च और ब्रांड लॉयल्टी दोनों अधिक होती हैं.
गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के लिए केवल एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि आर्थिक परिवर्तन का एक बड़ा इंजन बनकर उभर रहा है. यह परियोजना उद्योग, कृषि, लॉजिस्टिक्स और रियल एस्टेट को एक साथ गति देकर पूरे राज्य की विकास कहानी को नई दिशा दे रही है.
by
रितु राणा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज हरदोई में गंगा एक्सप्रेसवे के उद्घाटन किया. उत्तर प्रदेश के विकास में 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है. इस मौके पर प्रधानमंत्री ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, यह परिवर्तनकारी बुनियादी ढांचा परियोजना कनेक्टिविटी को बढ़ावा देगी और पूरे उत्तर प्रदेश में प्रगति को गति देगी. बता दें, मेरठ से प्रयागराज तक फैला यह एक्सप्रेसवे 12 जिलों को जोड़ते हुए यात्रा समय को 10–12 घंटे से घटाकर लगभग 6–7 घंटे कर देगा. इस परियोजना से राज्य में कनेक्टिविटी, उद्योग, कृषि, लॉजिस्टिक्स और रियल एस्टेट सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है.
गाजियाबाद बना नया विकास केंद्र
बेहतर कनेक्टिविटी के चलते गाजियाबाद अब केवल एनसीआर का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक हब के रूप में उभर रहा है. कार्यन ग्रुप के डायरेक्टर वरुण गर्ग ने कहा, “गाजियाबाद आज जिस तरह से दिल्ली-एनसीआर के प्रवेश द्वार से आगे बढ़कर उत्तर प्रदेश के आर्थिक विकास का एक मजबूत केंद्र बन रहा है, वह इस बात का संकेत है कि इंफ्रास्ट्रक्चर किस तरह किसी शहर की दिशा बदल सकता है. नमो भारत, मेट्रो और एक्सप्रेसवे जैसे आधुनिक कनेक्टिविटी नेटवर्क ने यहां रियल एस्टेट और आर्थिक गतिविधियों को मजबूत आधार दिया है. अब गंगा एक्सप्रेसवे इस विकास को एक नई ऊंचाई पर ले जाने का काम करेगा. यह कॉरिडोर राजनगर एक्सटेंशन और एनएच-24 जैसे क्षेत्रों को सीधे प्रयागराज और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बड़े बाजारों से जोड़ देगा, जिससे अगले 5 से 10 वर्षों में पूरे क्षेत्र की आर्थिक और शहरी तस्वीर पूरी तरह बदलने की संभावना है.”
व्यापार, उद्योग और लॉजिस्टिक्स को फायदा
मेरठ, हापुड़ और बुलंदशहर जैसे जिलों में माल ढुलाई तेज होगी और नए इंडस्ट्रियल क्लस्टर विकसित होंगे. इससे रोजगार, निवेश और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार मिलेगा.
किसानों और छोटे शहरों को बड़ा लाभ
कृषि आधारित जिलों में अब किसानों को अपने उत्पाद बड़े बाजारों तक तेजी से पहुंचाने का अवसर मिलेगा. गन्ना, आम और आंवला जैसे उत्पादों की सप्लाई चेन मजबूत होगी. छोटे शहरों में औद्योगिक विकास और शहरीकरण की गति भी बढ़ेगी.
रियल एस्टेट में तेज उछाल
अल्फा कॉर्प डेवलपमेंट लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और सीएफओ, संतोष अग्रवाल ने कहा, “गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है. लगभग ₹36,000 करोड़ के निवेश से बना यह 594 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर यात्रा समय को घटाकर लगभग 5–6 घंटे तक सीमित करने की क्षमता रखता है. 12 जिलों से गुजरने वाला यह एक्सप्रेसवे नए माइक्रो-मार्केट्स को जन्म दे रहा है, जहां रियल एस्टेट विकास, निवेश और एंड-यूज़र डिमांड तेजी से बढ़ेगी. मेरठ जैसे शहरों में इसे एक सैटेलाइट हब के रूप में विकसित होते देखना इस क्षेत्र की दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती को दर्शाता है.”
रिहायशी कीमतों में 20-30% की तेजी
ओमैक्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहित गोयल कहते हैं गंगा एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के साथ प्रयागराज कॉरिडोर में प्रॉपर्टी की कीमतों में शुरुआती मजबूती के संकेत दिखने लगे हैं. इसकी वजह बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और एक प्रमुख धार्मिक शहर के रूप में इसकी पहचान है, सरकार द्वारा मंदिर शहरों के विकास के लिए प्रस्तावित 5,000 करोड़ रुपये के निवेश से पर्यटन और नागरिक सुविधाओं में सुधार होगा, जिससे रियल एस्टेट की मांग और मजबूत होने की उम्मीद है. फिलहाल प्रयागराज के प्रमुख इलाकों में रिहायशी कीमतें करीब 7,900 से 8,000 रुपये प्रति वर्ग फुट के आसपास हैं. कनेक्टिविटी बेहतर होने के साथ अगले 3 से 5 साल में इसमें 20–30% तक बढ़ोतरी की उम्मीद है, खासकर उन इलाकों में जहां इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से विकसित हो रहा है.
अंसल हाउसिंग के डायरेक्टर कुशाग्र अंसल ने कहा, “टियर-2 शहर आज रिहायशी विकास के अगले चरण में प्रवेश कर रहे हैं और जमीन के सौदों में बढ़ोतरी इसका स्पष्ट संकेत है. गंगा एक्सप्रेसवे के कारण नए डेवलपमेंट कॉरिडोर खुल रहे हैं, जिससे मेरठ जैसे शहरों में संगठित रियल एस्टेट गतिविधियां तेज हो रही हैं. फिलहाल मेरठ में कीमतें लगभग 6,400 से 6,600 रुपये प्रति वर्ग फुट के बीच हैं, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित मांग बढ़ने पर मध्यम अवधि में 25–35% तक कीमतों में वृद्धि की संभावना बन सकती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो एक्सप्रेसवे के आसपास विकसित हो रहे हैं.”
निवेश और सप्लाई चेन होगी मजबूत
जे इंफ्राटेक लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहित जांदू ने कहा, “गंगा एक्सप्रेसवे देश के इंफ्रास्ट्रक्चर रोडमैप में एक महत्वपूर्ण कदम है. यह कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स की दक्षता को बढ़ाकर आर्थिक गतिविधियों को गति देगा. इसके साथ ही निवेश का दायरा भी बढ़ेगा और सप्लाई चेन अधिक मजबूत और विश्वसनीय बनेगी.”
एसीई (एक्शन कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट लिमिटेड) के सीईओ-क्रेन्स, मनीष माथुर ने कहा, “यह परियोजना भारत के अगली पीढ़ी के रोड इंफ्रास्ट्रक्चर का प्रतीक है, जिसमें गति, तकनीक और दक्षता को प्राथमिकता दी गई है. एक्सेस-कंट्रोल्ड डिजाइन और बेहतर टोलिंग सिस्टम यात्रा को अधिक सुरक्षित और पूर्वानुमानित बनाएंगे, जिससे लॉजिस्टिक्स और क्षेत्रीय विकास दोनों को लाभ मिलेगा.”
विशेषज्ञों के अनुसार, गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के लिए केवल एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि आर्थिक परिवर्तन का एक बड़ा इंजन बनकर उभर रहा है. यह परियोजना उद्योग, कृषि, लॉजिस्टिक्स और रियल एस्टेट को एक साथ गति देकर पूरे राज्य की विकास कहानी को नई दिशा दे रही है.