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ट्रंप की एक टिप्पणी, 1,677 अंकों की गिरावट और RBI के प्रॉप-ट्रेडिंग प्रतिबंधों से पैदा हुआ लिक्विडिटी का संकट

बुधवार को बाजार में आई भारी गिरावट ने केंद्रीय बैंक के बैंक गारंटी नियमों को लेकर उद्योग की बहस को फिर से तेज कर दिया है. लेकिन जहां एक ओर पूरा उद्योग एकजुट नजर आ रहा है, वहीं अंदरखाने ब्रोकरेज कंपनियां इस मुद्दे पर बंटी हुई हैं. साथ ही RBI के कदम के पीछे भी ठोस वजहें हो सकती हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

पलक शाह

बुधवार के बाजार में आई बड़ी गिरावट के लिए सिर्फ एक बयान काफी था. जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम "खत्म हो गया है", तो सेंसेक्स 1,677 अंक टूट गया. यह पिछले तीन महीनों में उसकी सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट थी. वहीं निफ्टी 24,000 के नीचे फिसल गया. इस दौरान निवेशकों की करीब 8 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई, जबकि इंडिया VIX में लगभग 30% की तेजी दर्ज की गई.

इस गिरावट की वजह भू-राजनीतिक तनाव था. लेकिन बाजार के जानकारों को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की हुई कि गिरावट को थामने के लिए बाजार में खरीदारी लगभग नदारद थी. ब्रोकिंग इंडस्ट्री का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इसकी वजह RBI के नए क्रेडिट नियम हैं, जो 1 अप्रैल से लागू हुए. इन नियमों के तहत बैंकों को ब्रोकर्स की प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग के लिए फंडिंग देने से रोक दिया गया और क्लियरिंग कॉरपोरेशन को दी जाने वाली बैंक गारंटी पर कड़े कोलेटरल नियम लागू कर दिए गए.

लिक्विडिटी की दलील

प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग डेस्क लंबे समय से भारतीय डेरिवेटिव बाजारों में झटकों को संभालने का काम करते रहे हैं. खासकर BSE और MCX में, जहां कुल कारोबार का बड़ा हिस्सा प्रॉप ट्रेडिंग से आता है. ब्रोकर्स का कहना है कि इन डेस्कों को मिलने वाली बैंक फंडिंग पर रोक लगाकर RBI ने बाजार के उसी हिस्से को कमजोर कर दिया, जो अस्थिरता बढ़ने पर खरीदारी के लिए आगे आता था.

उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "उच्च अस्थिरता से निपटने के लिए लिक्विडिटी सबसे अहम होती है. बुधवार जैसे दिन बाजार में दूसरी तरफ खरीदारी करने वाला कोई मौजूद ही नहीं था."

उद्योग की दूसरी शिकायत यह है कि इन प्रतिबंधों को जोखिम प्रबंधन के नाम पर लागू किया गया, जबकि अधिकारियों का कहना है कि पिछले 20 वर्षों में मार्जिन की कमी के कारण एक भी डिफॉल्ट दर्ज नहीं हुआ है. उनका सवाल है कि यदि दो दशक से व्यवस्था बिना किसी समस्या के चल रही थी, तो आखिर किस जोखिम को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है?

इसी तर्क के आधार पर ब्रोकर्स अब RBI और वित्त मंत्रालय के समक्ष एक नया प्रतिनिधित्व तैयार कर रहे हैं. इस बार वे SEBI, मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों और ब्रोकर्स एसोसिएशनों सहित सभी हितधारकों को साथ लेकर समीक्षा की मांग करना चाहते हैं.

अधिकारी ने कहा, "जो उद्योग के लिए अच्छा है, वही सभी हितधारकों के लिए भी अच्छा है."

RBI का पक्ष

हालांकि केंद्रीय बैंक की चिंताएं काल्पनिक नहीं हैं. वे इस बात से जुड़ी हैं कि बैंक गारंटी का इस्तेमाल और उसकी मार्केटिंग किस तरह की जा रही थी.

आमतौर पर बैंक गारंटी केवल 10-25% मार्जिन के आधार पर जारी की जाती है. यानी यदि कोई ब्रोकर 25 रुपये जमा करता है, तो उसे 100 रुपये की बैंक गारंटी मिल सकती है. यदि इस गारंटी का इस्तेमाल डेरिवेटिव ट्रेडिंग में किया जाए, जहां पहले से ही 30-40 गुना एक्सपोजर मिलता है, तो वास्तविक लीवरेज बढ़कर ब्रोकर की अपनी पूंजी का 120-160 गुना तक पहुंच जाता है.

एक अनुभवी बाजार विशेषज्ञ ने इसे साफ शब्दों में समझाया. "यह दूसरे के पैसे से सट्टेबाजी है. ब्रोकर्स अपनी पूंजी लगाने के बजाय बैंक का पैसा इस्तेमाल करना चाहते हैं. मुनाफा हुआ तो उनका, लेकिन नुकसान हुआ तो वे डिफॉल्ट घोषित कर देते हैं और बैंक का पैसा डूब जाता है."

यह केवल सैद्धांतिक आशंका नहीं है. 2019 से 2021 के बीच कई ब्रोकरेज कंपनियां दिवालिया हुईं. उस दौरान कई बैंकों ने क्लियरिंग हाउस को दी गई बैंक गारंटी का भुगतान करने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वे पहले डिफॉल्ट करने वाले ब्रोकर से अपना बकाया वसूलेंगे, जो कई मामलों में पूरी बैंक गारंटी के बराबर था.

इस नजरिए से देखें तो RBI का संदेश स्पष्ट है. यदि सट्टा लगाना है तो 100% मार्जिन अपनी पूंजी से लाना होगा. बैंक गारंटी उपलब्ध रहेगी, लेकिन उसके पीछे वास्तविक कोलेटरल होना चाहिए. प्रॉपराइटरी एक्सपोजर के लिए कम से कम 50% नकद कोलेटरल जरूरी होगा, ताकि डेरिवेटिव में सट्टेबाजी असुरक्षित बैंक ऋण के सहारे न चल सके.

उद्योग में मतभेद

जिस एकजुटता के साथ उद्योग अपनी बात रखना चाहता है, उसे कायम रखना आसान नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि पुराने सिस्टम का फायदा और नुकसान सभी को समान रूप से नहीं मिला.

छोटे ब्रोकर्स का कहना है कि व्यवहार में बैंक गारंटी का लाभ केवल बड़े खिलाड़ियों को मिलता था. ऐसे संस्थानों को, जिनकी बैलेंस शीट 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की थी और जो बैंकों से आसानी से बैंक गारंटी हासिल कर सकते थे.

वे यह शिकायत भी करते हैं कि ANMI ने भी इस मुद्दे पर बड़े ब्रोकर्स का साथ दिया है.

एक छोटे ब्रोकर ने सवाल किया, "इसमें छोटे ब्रोकर्स की क्या गलती है?"

उनका कहना है कि पत्रकारों और नीति-निर्माताओं तक सबसे ज्यादा आवाज उन्हीं कुछ बड़ी प्रॉप-ट्रेडिंग कंपनियों की पहुंच रही है, जिन्हें बैंक के लीवरेज वाले फंड का सबसे अधिक लाभ मिला.

नियामकीय जांच कुछ बड़ी प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग कंपनियों के कारोबारी मॉडल पर भी केंद्रित रही है. यह मॉडल मुख्य रूप से दिल्ली, मुंबई और गुजरात की कुछ कंपनियों तक सीमित है और उद्योग में इसके बहुत कम उदाहरण हैं.

बाजार से जुड़े लोगों और नियामकीय सोच से परिचित सूत्रों का आरोप है कि कुछ कंपनियां स्वतंत्र ट्रेडर्स को अपनी प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग डेस्क का "कर्मचारी" दिखाती हैं. इस व्यवस्था से मार्जिन दायित्व, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) और आयकर देनदारी कम हो सकती है. आलोचकों का कहना है कि इससे वास्तविक प्रॉप ट्रेडिंग और तीसरे पक्ष की सामूहिक सट्टेबाजी के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.

जिन कंपनियों पर ऐसे आरोप लगे हैं, उन्होंने लगातार इन आरोपों से इनकार किया है. हालांकि SEBI में माधबी पुरी बुच के कार्यकाल के दौरान शुरू हुई नियामकीय सख्ती के पीछे यह पूरा घटनाक्रम भी एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि माना जाता है.

आगे की राह

बुधवार की बाजार गिरावट ने उद्योग को अपनी सबसे मजबूत दलील दे दी है. यह एक वास्तविक उदाहरण था कि जब प्रॉप ट्रेडिंग पर निर्भर और अत्यधिक लीवरेज वाला बाजार बैंक फंडिंग से वंचित हो जाता है और उसी समय कोई बड़ा भू-राजनीतिक झटका लगता है, तो क्या स्थिति बनती है.

अब सवाल यह है कि क्या RBI भी इसी घटना को अपने फैसले की पुष्टि के रूप में देखता है. यानी क्या वह इसे इस बात का प्रमाण मानता है कि इतना अधिक लीवरेज वाला बाजार बैंक गारंटी के सहारे चलना ही नहीं चाहिए था.

आने वाले दिनों में RBI को दिए जाने वाले प्रतिनिधित्व से इसका जवाब मिल सकता है.

फिलहाल दोनों पक्ष एक ही गिरावट को देख रहे हैं, लेकिन उससे बिल्कुल अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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