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भारत में फंडिंग घाटा रोकने के लिए निजी दान को सालाना 25% बढ़ाना जरूरी : रिपोर्ट

रिपोर्ट के मुताबिक, FY20 से भारत के सामाजिक क्षेत्र की फंडिंग 13% CAGR से बढ़ते हुए FY25 में लगभग 27 लाख करोड़ रुपये (310 अरब डॉलर) तक पहुंच गई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago

भारत के विकास की कहानी में निजी परोपकार (फिलैंथ्रॉपी) की भूमिका तेजी से अहम होती जा रही है. Bain & Company और Dasra द्वारा जारी नई रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 (FY25) में भारत में निजी परोपकार की राशि बढ़कर 1.43 लाख करोड़ रुपये (16 अरब डॉलर) तक पहुंचने का अनुमान है. FY25 से FY30 के बीच इसमें 9%–11% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) रहने की संभावना है.

हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि सार्वजनिक व्यय की मौजूदा गति जारी रहती है, तो भारत के बढ़ते विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए निजी क्षेत्र की दानशीलता को 25% से अधिक वार्षिक दर से बढ़ना होगा.

सामाजिक क्षेत्र की फंडिंग दोगुनी, फिर भी गहराता अंतर

रिपोर्ट के मुताबिक, FY20 से भारत के सामाजिक क्षेत्र की फंडिंग 13% CAGR से बढ़ते हुए FY25 में लगभग 27 लाख करोड़ रुपये (310 अरब डॉलर) तक पहुंच गई है. FY30 तक इसके 50 लाख करोड़ रुपये (570 अरब डॉलर) तक पहुंचने का अनुमान है. इसके बावजूद, FY25 में लगभग 16 लाख करोड़ रुपये (180 अरब डॉलर) का फंडिंग घाटा बना हुआ है, जो FY30 तक बढ़कर 18 लाख करोड़ रुपये (210 अरब डॉलर) हो सकता है. वर्तमान में कुल सामाजिक फंडिंग का लगभग 95% हिस्सा सार्वजनिक व्यय से आता है, खासकर स्वास्थ्य क्षेत्र में, जहां सरकार का लक्ष्य GDP का 2.5% खर्च करने का है.

“पूंजी उपलब्ध है, लेकिन क्या वह सही ढंग से संरचित है?

Bain & Company पार्टनर भाविनी मल्होत्रा ने कहा, “असल सवाल यह नहीं है कि पूंजी उपलब्ध है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उसे बड़े पैमाने पर समाधान देने के लिए सही ढंग से संरचित किया गया है. सामाजिक क्षेत्र में फंडिंग की वृद्धि प्रभावशाली है, लेकिन बढ़ता अंतर एक गहरे संरचनात्मक डिजाइन की चुनौती को दर्शाता है. परोपकारी पूंजी और सहयोगी ढांचे को साथ-साथ बढ़ना होगा, ताकि फंडिंग टिकाऊ और दीर्घकालिक प्रभाव में बदल सके.”

भारतीय परिवार निजी परोपकार की रीढ़

Dasra की सह-संस्थापक और पार्टनर नीरा नंदी के अनुसार “भारतीय परिवार निजी परोपकार की रीढ़ बने हुए हैं. FY30 तक 1.25–1.35 लाख करोड़ रुपये की संभावित अतिरिक्त क्षमता है. इस क्षमता को साकार करने के लिए परोपकारी बुनियादी ढांचे को तेजी से विकसित करना होगा.” भारतीय परिवार व्यक्तिगत दान और पारिवारिक व्यवसायों की CSR गतिविधियों के माध्यम से कुल निजी दान का लगभग 42% योगदान देते हैं.

बदलती प्राथमिकताएं और नई नेतृत्व भूमिका

1. लगभग 63% परिवारों में महिलाएं परोपकारी निर्णयों में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं.
2. 49% परिवारों में अंतर-पीढ़ी (Inter-gen) नेतृत्व दान संबंधी निर्णयों को प्रभावित कर रहा है.
3. पहली पीढ़ी के उद्यमी भी तेजी से प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं.

4. महिलाएं और युवा पेशेवर अब जेंडर, इक्विटी, विविधता और समावेशन (GEDI) जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं.

CSR में पारिवारिक व्यवसायों का दबदबा

CSR फंडिंग में 8%–10% की वृद्धि का अनुमान है, जो GDP विस्तार और अनुपालन बढ़ने से समर्थित है.

1. निजी क्षेत्र के CSR खर्च का 65%–70% हिस्सा पारिवारिक स्वामित्व वाले व्यवसायों से आता है.
2. शीर्ष 2–3% परिवार कुल CSR व्यय का लगभग आधा योगदान देते हैं.

हालांकि, CSR फंडिंग का बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली जैसे अपेक्षाकृत समृद्ध राज्यों में केंद्रित है. रिपोर्ट के अनुसार, उच्च बहुआयामी गरीबी वाले और ऐतिहासिक रूप से कम फंडिंग पाने वाले राज्यों की ओर पूंजी पुनर्निर्देशित करने की आवश्यकता है.

डायस्पोरा पूंजी और संस्थागत संपत्ति: नया मोड़

भारतीय डायस्पोरा की संख्या लगभग 3.4 करोड़ तक पहुंच गई है, और FY21 से FY25 के बीच प्रेषण (remittances) में लगभग 14% वार्षिक वृद्धि हुई है. अब प्रवासी भारतीयों का दान केवल शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि वे समय, विशेषज्ञता और वैश्विक नेटवर्क के माध्यम से अधिक सक्रिय और भरोसा-आधारित मॉडल अपना रहे हैं. साथ ही, सिंगापुर, हांगकांग और UAE जैसे एशियाई केंद्रों ने अनुकूल नीतिगत वातावरण और संस्थागत ढांचे के माध्यम से परोपकार को बढ़ावा दिया है. भारत को भी निजी संपत्ति को सामाजिक प्रभाव की ओर निर्देशित करने के लिए ऐसा ही सक्षम ढांचा तैयार करना होगा.

आगे का दशक तय करेगा दिशा

रिपोर्ट के अनुसार, भारत एक महत्वपूर्ण संस्थागत मोड़ पर खड़ा है. अब बदलाव व्यवहार में नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे में लाने की जरूरत है. आने वाला दशक इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या भारत अपनी मजबूत नींव को टिकाऊ परोपकारी संस्थानों में बदल पाता है, जो “विकसित भारत” के लक्ष्यों को आगे बढ़ा सकें.
 


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