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जिस ट्रेड डील का सभी को इंतजार है, जानिए उसकी अंदरूनी कहानी

डील तैयार है, लेकिन अब तक जारी क्यों नहीं हुई. जानिए भारत–अमेरिका ट्रेड डील को रूस–यूक्रेन शांति के एंडगेम से जोड़ने वाले भू-राजनीतिक टकराव के पीछे की कहानी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

पलक शाह

कई महीनों से भारत–अमेरिका ट्रेड डील एक अजीब कूटनीतिक अधर में अटकी हुई है, मूल रूप से तय, लेकिन समय में जमी हुई.

टैरिफ पर बातचीत पूरी.
मार्केट एक्सेस पर सहमति.
दोनों पक्षों से राजनीतिक सहमति हासिल.

फिर भी, न हस्ताक्षर.
न घोषणा.
न कोई जीत का जश्न.

बातचीत से जुड़े कई लोगों के अनुसार, इसकी वजह कस्टम शेड्यूल या ट्रेड चैप्टर्स से कहीं आगे की है. उनका कहना है कि भारत–अमेरिका ट्रेड समझौते का भविष्य अब एक कहीं बड़े मंच से जुड़ गया है, रूस और यूक्रेन के बीच जारी अनसुलझे युद्ध से.

निजी तौर पर वॉशिंगटन, ब्रसेल्स और दिल्ली में जो संदेश घूम रहा है, वह साफ है: रूस–यूक्रेन शांति का संकेत नहीं, तो भारत–अमेरिका ट्रेड उत्सव भी नहीं.

मार-ए-लागो और “लगभग शांति” का मंच

दिसंबर के अंत में यह नाटक और तेज हो गया, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मार-ए-लागो में यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की की मेजबानी की.

दृश्य पूरी तरह स्पष्ट थे. ट्रंप ने कहा कि बातचीत “अंतिम चरणों” में है. ज़ेलेंस्की ने संकेत दिया कि एक ढांचा “काफी हद तक तय” हो चुका है, हालांकि उन्होंने क्षेत्र और सुरक्षा गारंटी जैसे उन दो लाल रेखाओं पर कोई विवरण देने से बचा लिया, जो अब भी कीव, मॉस्को और यूरोप को विभाजित करती हैं.

जो सार्वजनिक रूप से नहीं कहा गया, वही ज्यादा अहम था.

जेलेंस्की के पहुंचने से कुछ घंटे पहले, ट्रंप ने कथित तौर पर सीधे मॉस्को से संवाद किया, जिससे वॉशिंगटन की भूमिका सिर्फ किनारे बैठे मध्यस्थ की नहीं, बल्कि एंडगेम के निर्देशक की बन गई. यूरोपीय राजधानियों को सूचित किया गया, उनसे परामर्श नहीं लिया गया.

बाजारों ने यह संकेत नहीं लिया कि शांति आ चुकी है, बल्कि यह कि उसकी कोरियोग्राफी शुरू हो चुकी है.

और उस कोरियोग्राफी में भारत चुपचाप एक अहम भूमिका निभा रहा है.

यूरोप का गुस्सा, भारत का तेल और वॉशिंगटन की दुविधा

यूरोपीय नेता लगातार अधिक मुखर और असहज होते जा रहे हैं.

उनका तर्क सीधा है: जब यूरोप युद्ध के कारण प्रतिबंधों, ऊर्जा संकट और औद्योगिक व्यवधान का आर्थिक दर्द झेल रहा है, तो अमेरिका भारत को 15% टैरिफ पर सीमित ट्रेड डील से कैसे नवाज़ सकता है?

इस नाराजगी के केंद्र में तेल है.

भारत द्वारा रियायती रूसी कच्चे तेल की निरंतर खरीद को सहन किया गया है, जबकि वॉशिंगटन ने उन्हीं खरीद से जुड़े कारणों का हवाला देते हुए भारतीय निर्यात पर 25–50% तक के दंडात्मक टैरिफ लगाए. रूसी ऊर्जा कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंधों ने दबाव और बढ़ा दिया.

फिर भी, जनवरी में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को चुपचाप एक महीने की छूट दी गई, जिसमें वह बिना किसी दंड के रूसी तेल की खरीद जारी रख सकती थी—एक तकनीकी व्यवस्था, जिसे अंदरूनी लोग अस्थायी, सोच-समझकर की गई और राजनीतिक रूप से समयबद्ध बताते हैं.

ब्रसेल्स, बर्लिन और पेरिस में इससे केवल यह संदेह और मजबूत हुआ है कि भारत को युद्ध के बाद का आर्थिक लाभार्थी बनाया जा रहा है, जबकि यूरोप उस शांति समझौते का इंतजार कर रहा है, जो उसके बलिदानों को सही ठहराए.

यही वह विवाद का बिंदु है, जो इस समय वॉशिंगटन को बांधे हुए है.

रूस–यूक्रेन शांति ढांचे भले ही आंशिक के बिना, भारत–अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा करना यूरोप में राजनीतिक रूप से विस्फोटक हो जाता है.

ट्रेड डील तैयार है, लेकिन जारी क्यों नहीं हुई

बातचीत से जुड़े लोगों का कहना है कि भारत–अमेरिका ट्रेड समझौता “सिद्धांत रूप में पूरा” है.

इसके व्यापक खाके स्पष्ट हैं:

लगभग 14%–15% का टैरिफ कैप.
पहले के ट्रेड टकरावों के दौरान लगाए गए कई दंडात्मक शुल्कों की वापसी.
भारतीय निर्यात के लिए बेहतर बाजार पहुंच.
ऊर्जा, तकनीक और क्लीन मैन्युफैक्चरिंग में रणनीतिक तालमेल.

जो कमी है, वह है सही समय.

वॉशिंगटन यह हेडलाइन नहीं चाहता: “युद्ध जारी रहते अमेरिका ने भारत को इनाम दिया.”

इसके बजाय, वह एक अलग क्रम चाहता है:

रूस–यूक्रेन शांति का ढांचा या रोडमैप.
प्रतिबंधों के युक्तिकरण के संकेत.
यूरोपीय नेताओं को साथ लाना, चाहे अनिच्छा से ही सही.
फिर, लगभग तुरंत भारत–अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा, जिसे वैश्विक आर्थिक सामान्य स्थिति की वापसी के प्रमाण के रूप में पेश किया जाए.

संक्षेप में, ट्रेड डील अब शांति से खुलने वाला पुरस्कार बन चुकी है.

बाजार पहले ही पटकथा लिख रहे हैं

निवेशकों के लिए यह अब केवल कूटनीति नहीं रह गई है. यह एक लंबित ट्रेड है.

तीन सेक्टर सीधे तौर पर घोषणा के प्रभाव क्षेत्र में हैं:

सोलर और क्लीन एनर्जी
भारतीय सोलर निर्माताओं को ऊंचे अमेरिकी टैरिफ और जांचों ने बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे फैक्ट्रियां कम उपयोग में हैं और निर्यात ठप पड़ा है. ट्रेड रीसेट होते ही अमेरिकी बाजार रातों-रात खुल जाएगा, जिससे भारत अमेरिका की ऊर्जा परिवर्तन रणनीति में एक अहम आपूर्तिकर्ता बन सकता है.

बाजार इसे समझता है. शेयर निर्यात आंकड़ों का इंतजार नहीं करेंगे, वे घोषणा के साथ ही री-रेट होंगे.

एनर्जी और ऑयल-लिंक्ड स्टॉक्स
शांति का ढांचा रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति और प्रतिबंधों के क्रियान्वयन पर दबाव कम करेगा, जिससे रिफाइनिंग मार्जिन और ऊर्जा लागत स्थिर होंगी. साथ ही, अमेरिका के साथ नजदीकी रिश्ते LNG कॉन्ट्रैक्ट्स, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और संयुक्त ऊर्जा निवेश के रास्ते खोलेंगे.

एनर्जी स्टॉक्स मुनाफे पर नहीं भू-राजनीति पर ट्रेड करेंगे.

टेक्सटाइल और श्रम-आधारित निर्यात
जब वैश्विक खरीदार चीन से दूर विविधीकरण कर रहे हैं, तब भारत एक अनूठी स्थिति में है, यदि टैरिफ घटते हैं. 15% का कैप प्रतिस्पर्धा को रातों-रात बदल देता है, जिससे भारतीय टेक्सटाइल पश्चिमी बाजारों के लिए एक पसंदीदा विकल्प बन जाते हैं. इसीलिए फंड मैनेजर बैलेंस शीट नहीं, बल्कि प्रेस ब्रीफिंग्स पर नजर रखे हुए हैं 

जिस पल का सभी को इंतजार है

अब तनाव समय को लेकर है.

व्यापक उम्मीद है कि जनवरी में रूस–यूक्रेन शांति का संकेत मिलेगा, जरूरी नहीं कि अंतिम समझौता हो, लेकिन इतना ठोस ढांचा जरूर होगा कि यह कहा जा सके कि युद्ध का एंडगेम शुरू हो चुका है.

ऐसा होते ही, अंदरूनी सूत्रों का कहना है, भारत–अमेरिका ट्रेड डील लगभग तुरंत सामने आ जाएगी.

न हफ्तों में...
न महीनों में...
दिनों में.

इस मायने में, ट्रेड डील अब केवल द्विपक्षीय आर्थिक समझौता नहीं रह गई है. यह वैश्विक कथा के रीसेट का हिस्सा बन चुकी है, एक घोषणा कि युद्ध, प्रतिबंध और टूटी हुई सप्लाई चेन अब एक नए व्यवस्था को रास्ता दे रही हैं.

भारत के लिए इंतजार रणनीतिक है...
वॉशिंगटन के लिए यह नाटकीय है...
और बाजारों के लिए यह विस्फोटक है.

और जब तक शांति की घोषणा नहीं होती, चाहे वह कितनी भी अपूर्ण क्यों न हो भारत–अमेरिका ट्रेड डील ठीक वहीं रहेगी, जहां वह आज है: भावना में हस्ताक्षरित, गोपनीयता में सील की गई, और दुनिया के बदलने का इंतजार करती हुई.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.

19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)

 


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