2,800 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर से माल परिवहन में समय और लागत घटने की उम्मीद, दादरी से मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक रेल कनेक्टिविटी हुई मजबूत
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को करीब ₹73,000 करोड़ की लागत से तैयार पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे (Western Dedicated Freight Corridor) को राष्ट्र को समर्पित किया. उत्तर प्रदेश के दादरी से महाराष्ट्र के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) तक फैला यह कॉरिडोर देश के माल परिवहन नेटवर्क के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है. इसके पूरा होने से उत्तर भारत के औद्योगिक क्षेत्रों और पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाहों के बीच माल की आवाजाही तेज होने के साथ लॉजिस्टिक्स लागत घटने की उम्मीद है.
20 साल बाद पूरा हुआ बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट
पश्चिमी DFC करीब 2,800 किलोमीटर लंबा है और इसकी योजना को औपचारिक रूप से वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में शुरू किया गया था. इस परियोजना ने करीब दो दशकों में तीन प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल देखे. इसके साथ ही देश के दो प्रमुख समर्पित माल ढुलाई गलियारों को पूरा करने का लक्ष्य हासिल हो गया है.
इससे पहले पंजाब और बिहार से पश्चिम बंगाल तक जुड़ने वाला पूर्वी समर्पित माल ढुलाई गलियारा अक्टूबर 2023 में पूरा हुआ था. पूर्वी DFC पर करीब ₹51,000 करोड़ खर्च हुए हैं. दोनों कॉरिडोर की कुल लागत लगभग ₹1.24 लाख करोड़ रही है.
30 घंटे की जगह 10-12 घंटे में पूरी होगी यात्रा
पश्चिमी DFC पर मालगाड़ियों की अधिकतम गति 100 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है. अधिकारियों के मुताबिक, जहां सामान्य रेलवे ट्रैक पर 100 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब छह घंटे लगते हैं, वहीं DFC पर यही दूरी औसतन ढाई घंटे में पूरी की जा सकती है.
प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, एक ट्रक को जिस यात्रा में करीब 30 घंटे लगते हैं, वही दूरी DFC के जरिए 10-12 घंटे में पूरी की जा सकती है. इससे माल ढुलाई की गति बढ़ने के साथ कारोबारियों के लिए परिवहन लागत में भी कमी आने की उम्मीद है.
मुंद्रा, कांडला और पिपावाव के साथ JNPA की कनेक्टिविटी मजबूत
पश्चिमी DFC को देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों और बंदरगाहों को जोड़ने वाली अहम कड़ी माना जा रहा है. यह मुंद्रा, कांडला, पिपावाव और JNPA जैसे प्रमुख बंदरगाहों को उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के औद्योगिक केंद्रों से जोड़ता है. विशेष रूप से JNPA से जुड़ने वाला अंतिम महत्वपूर्ण हिस्सा लंबे समय से परियोजना की सबसे बड़ी बाधाओं में शामिल था. अब इसके पूरा होने से देश के सबसे बड़े सरकारी कंटेनर बंदरगाहों में शामिल JNPA को उत्तर भारत से सीधे और तेज रेल संपर्क का फायदा मिलेगा.
कंटेनर ढुलाई में डबल-स्टैक ट्रेन से बढ़ेगी क्षमता
कॉरिडोर के पूरा होने से कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों को भी बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है. JNPA तक डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेन चलने से अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी और बंदरगाह पर कंटेनरों के टर्नअराउंड में भी सुधार आ सकता है. हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक वास्तविक लागत बचत अनुमान से कम रह सकती है. कंटेनर ट्रेन ऑपरेटर एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष पुरी के अनुसार, मौजूदा नियमों और कंटेनरों के वजन एवं आकार से जुड़ी पाबंदियों के कारण डबल-स्टैकिंग का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है.
उनके मुताबिक, डबल-स्टैक कंटेनरों के लिए ट्रेन की गति भी 65-70 किलोमीटर प्रति घंटा तक सीमित हो सकती है, जबकि सिंगल-स्टैक ट्रेनें 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकती हैं.
फीडर रूट और पोर्ट क्षमता में सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि DFC से अधिकतम लाभ हासिल करने के लिए सिर्फ मुख्य कॉरिडोर को तेज करना पर्याप्त नहीं होगा. बंदरगाहों को DFC से जोड़ने वाले फीडर रूट और सामान्य रेलवे नेटवर्क से DFC के इंटरचेंज पॉइंट को भी बेहतर करना होगा.
इसके अलावा, JNPA पर बढ़ने वाले कंटेनर यातायात को संभालने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी. बढ़ते रेल यातायात के साथ अगर बंदरगाह पर भीड़ बढ़ती है तो DFC से मिलने वाला समय लाभ प्रभावित हो सकता है.
लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के लिए गेमचेंजर बनने की उम्मीद
पश्चिमी और पूर्वी DFC के पूरा होने से देश में माल ढुलाई के लिए अलग रेल नेटवर्क तैयार हो गया है. इसका उद्देश्य मालगाड़ियों को यात्री ट्रेनों से अलग करके तेज, भरोसेमंद और अधिक कुशल परिवहन उपलब्ध कराना है.
पश्चिमी DFC खास तौर पर उत्तर भारत के औद्योगिक क्षेत्रों को पश्चिमी तट के बंदरगाहों से जोड़कर निर्यात-आयात कारोबार को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. इससे माल ढुलाई का समय कम होने, लॉजिस्टिक्स लागत घटने और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ने की उम्मीद है.
UPI, आधार आधारित भुगतान और डिजिटल लेंडिंग ने बढ़ाई वित्तीय पहुंच, MSME के लिए कर्ज की राह आसान करने में भी तकनीक की अहम भूमिका
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के फिनटेक इकोसिस्टम ने देश की वित्तीय व्यवस्था को बड़े स्तर पर बदल दिया है. डिजिटल तकनीक की मदद से बैंकिंग और औपचारिक वित्तीय सेवाएं ग्रामीण इलाकों तक पहुंची हैं और लोगों के लिए भुगतान, बैंकिंग तथा कर्ज लेना पहले के मुकाबले आसान हुआ है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मंगलवार को मुंबई में ग्लोबल फिनटेक फेस्ट (GFF) 2026 के उद्घाटन के दौरान यह बात कही.
मल्होत्रा ने कहा कि फिनटेक कंपनियां भारत की विशाल और विविध आबादी तथा औपचारिक वित्तीय व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरी हैं. इनके चलते वित्तीय सेवाओं की लागत कम हुई है, ग्राहक अनुभव बेहतर हुआ है और पूरी व्यवस्था की दक्षता बढ़ी है.
शाखा से निकलकर हर नागरिक के हाथ तक पहुंची बैंकिंग
RBI गवर्नर ने कहा कि पिछले एक दशक में फिनटेक ने भारत की वित्तीय व्यवस्था के ढांचे को बुनियादी रूप से बदल दिया है. बैंकिंग अब सिर्फ बैंक शाखाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि डिजिटल माध्यमों के जरिए सीधे नागरिकों के हाथ तक पहुंच गई है. उन्होंने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI), आधार आधारित भुगतान प्रणाली और जनधन इकोसिस्टम को इस डिजिटल विस्तार की प्रमुख आधारभूत व्यवस्थाओं के रूप में रेखांकित किया. इन प्रणालियों की मदद से उन आबादी वर्गों तक भी वित्तीय सेवाएं पहुंची हैं, जो पहले औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से कम जुड़े हुए थे.
खाते खोलने से लेकर भुगतान तक, सब कुछ हुआ तेज
मल्होत्रा के मुताबिक, तकनीक ने केवल वित्तीय सेवाओं की पहुंच नहीं बढ़ाई, बल्कि इन्हें उपलब्ध कराने के तरीके को भी बदल दिया है. डिजिटल सिस्टम ने बैंक खाते खोलने और भुगतान निपटाने में लगने वाला समय कम किया है. इससे लेनदेन की लागत घटी है. साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस आधारित एनालिटिक्स की मदद से धोखाधड़ी की पहचान करने की क्षमता भी मजबूत हुई है.
उन्होंने रियल टाइम सुपरविजन में तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल का भी उल्लेख किया. इसके जरिए वित्तीय संस्थान और नियामक संभावित जोखिमों की पहले पहचान कर सकते हैं और तेजी से कार्रवाई कर सकते हैं.
MSME को कर्ज दिलाने में डिजिटल सिस्टम की बड़ी भूमिका
फिनटेक का प्रभाव
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण रहा है. छोटे कारोबारों के लिए औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से कर्ज हासिल करना लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है. मल्होत्रा ने कहा कि कैश फ्लो आधारित लेंडिंग, अकाउंट एग्रीगेटर और यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म छोटे कारोबारों की वित्तीय स्थिति को बेहतर तरीके से समझने में ऋणदाताओं की मदद कर रहे हैं.
इन प्रणालियों के जरिए कर्ज देने वाली संस्थाएं केवल पारंपरिक संपार्श्विक पर निर्भर रहने के बजाय डिजिटल वित्तीय जानकारी के आधार पर भी उधारकर्ता की क्षमता का आकलन कर सकती हैं. इससे छोटे कारोबारियों और उद्यमियों के लिए औपचारिक कर्ज तक पहुंच बढ़ने की संभावना है.
RBI फिनटेक को मानता है महत्वपूर्ण साझेदार
RBI गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक भविष्य की वित्तीय व्यवस्था तैयार करने में फिनटेक को एक महत्वपूर्ण साझेदार मानता है. उन्होंने नियामकीय सैंडबॉक्स, रिजर्व बैंक इनोवेशन हब और स्टार्टअप्स, फिनटेक कंपनियों तथा अन्य हितधारकों के साथ लगातार संवाद का उल्लेख किया. उनके मुताबिक, लगातार खुले और रचनात्मक संवाद के जरिए ही बेहतर नीतियां तैयार की जा सकती हैं.
नवाचार के साथ ग्राहक सुरक्षा भी जरूरी
फिनटेक क्षेत्र के तेजी से विस्तार के बीच RBI ने उद्योग में स्व-नियमन को भी बढ़ावा दिया है. मल्होत्रा ने कहा कि तकनीकी नवाचार के साथ ग्राहक सुरक्षा, डेटा और लेनदेन की सुरक्षा तथा भरोसे से जुड़े मजबूत उपाय भी जरूरी हैं.
उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक का उद्देश्य ऐसा वित्तीय वातावरण तैयार करना है, जहां नवाचार को बढ़ावा मिले और इसके साथ वित्तीय व्यवस्था सुरक्षित, समावेशी, निष्पक्ष और कुशल भी बनी रहे.
डिजिटल ढांचा बना वित्तीय व्यवस्था का अहम हिस्सा
RBI गवर्नर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब भारत की वित्तीय व्यवस्था में डिजिटल ढांचे की भूमिका लगातार बढ़ रही है. डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लोगों और कारोबारों के भुगतान करने, कर्ज लेने तथा बैंकिंग और अन्य वित्तीय सेवाओं का इस्तेमाल करने के तरीके को तेजी से बदल दिया है.
फिनटेक के विस्तार के साथ भारत में वित्तीय सेवाओं का दायरा अब पारंपरिक बैंक शाखाओं से आगे बढ़कर मोबाइल, डिजिटल पहचान और आंकड़ों पर आधारित प्रणालियों तक पहुंच गया है. इससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलने के साथ छोटे कारोबारों के लिए औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से कर्ज हासिल करना भी आसान होने की उम्मीद है.
इनसाइडर ट्रेडिंग से लेकर शेयर कीमतों में हेरफेर तक पर सख्त निगरानी, नए फ्रेमवर्क में गलत जानकारी फैलाने और कृत्रिम मांग बनाने पर भी कार्रवाई
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
गिफ्ट सिटी के वित्तीय बाजार में इनसाइडर ट्रेडिंग, धोखाधड़ी और बाजार में हेरफेर करने वालों पर अब और सख्त कार्रवाई होगी. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA) ने प्रतिभूति बाजारों में बाजार के दुरुपयोग को रोकने के लिए नया ‘मार्केट अब्यूज फ्रेमवर्क 2026’ अधिसूचित किया है. यह नया ढांचा गिफ्ट सिटी में लागू भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के पुराने इनसाइडर ट्रेडिंग और धोखाधड़ी से जुड़े नियमों की जगह लेगा.
इनसाइडर ट्रेडिंग और हेरफेर पर सख्ती
नए नियमों के तहत धोखाधड़ी वाले लेनदेन, प्रतिभूतियों की कीमतों और बेंचमार्क में हेरफेर, कृत्रिम मांग पैदा करने, सर्कुलर ट्रेडिंग और गलत या भ्रामक जानकारी फैलाने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाई गई है. इसके अलावा ऐसे ऑर्डर देना और बाद में रद्द करना भी नियमों के दायरे में आएगा, जिनका मकसद वास्तविक कारोबार करना नहीं बल्कि किसी प्रतिभूति की मांग, आपूर्ति या कीमत को कृत्रिम रूप से प्रभावित करना हो.
गलत खबर फैलाने पर भी कार्रवाई
नए फ्रेमवर्क में डिजिटल और फिजिकल मीडिया के जरिए गलत या भ्रामक जानकारी फैलाने पर भी रोक लगाई गई है. ऐसी जानकारी भी प्रतिबंधित होगी, जिससे निवेशक किसी प्रतिभूति को खरीदने या बेचने के लिए प्रभावित हो सकते हैं. ग्राहक की अनुमति के बिना ट्रेड करना और कृत्रिम ट्रेडिंग गतिविधियां चलाना भी बाजार दुरुपयोग की श्रेणी में आएगा.
इनसाइडर्स के लिए क्या हैं नियम?
नए नियमों के तहत किसी कंपनी या बाजार से जुड़ी ऐसी अहम जानकारी रखने वाले व्यक्ति, जो अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, उसे बिना वैध कारण साझा नहीं कर सकेंगे. ऐसी जानकारी रखने वाले व्यक्ति को संबंधित प्रतिभूतियों में खुद ट्रेड करने या किसी अन्य व्यक्ति से ट्रेड करवाने की भी अनुमति नहीं होगी. इस तरह की गैर-सार्वजनिक महत्वपूर्ण जानकारी के आधार पर किए गए कारोबार को इनसाइडर ट्रेडिंग माना जाएगा.
बड़े ट्रेड की जानकारी देना जरूरी
नियंत्रक शेयरधारकों, निदेशकों और अन्य निर्धारित व्यक्तियों के लिए भी रिपोर्टिंग की व्यवस्था की गई है. उन्हें 25,000 डॉलर की तय तिमाही सीमा से अधिक के कारोबार की जानकारी दो कारोबारी दिनों के भीतर देनी होगी. सूचीबद्ध कंपनियों को ऐसी जानकारी मिलने के दो कारोबारी दिनों के भीतर संबंधित एक्सचेंज को इसकी सूचना देनी होगी. साथ ही कंपनी की वेबसाइट पर भी इसका खुलासा करना जरूरी होगा.
कंपनियों को मजबूत करना होगा आंतरिक नियंत्रण
नए नियमों के तहत सूचीबद्ध कंपनियों को बाजार के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी आंतरिक नियंत्रण और आचार संहिता तैयार करनी होगी. इन नियंत्रणों में अहम गैर-सार्वजनिक जानकारी की पहचान और उसकी गोपनीयता बनाए रखना, ऐसी जानकारी के अनधिकृत संचार को रोकना और उन कर्मचारियों की पहचान करना शामिल होगा, जिनकी ऐसी संवेदनशील जानकारी तक पहुंच है. इन व्यवस्थाओं की समय-समय पर समीक्षा भी करनी होगी.
नियम तोड़ने पर हो सकती है कड़ी कार्रवाई
IFSCA नियमों के उल्लंघन पर संबंधित कानून के तहत कार्रवाई कर सकता है. इसमें चेतावनी या निंदा से लेकर नियमन वाली इकाइयों या संबंधित व्यक्तियों का पंजीकरण रद्द करने तक की कार्रवाई शामिल है. गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों में गिफ्ट सिटी के नियामक ने कथित उल्लंघनों के मामलों में कार्रवाई तेज की है. इनमें जुर्माना लगाने और पंजीकरण रद्द करने जैसे कदम भी शामिल हैं.
पुराने SEBI नियमों की जगह नया फ्रेमवर्क
नए नियम लागू होने के साथ ही IFSCA में SEBI के ‘इनसाइडर ट्रेडिंग पर रोक लगाने वाले नियम, 2015’ और ‘प्रतिभूति बाजार से जुड़ी धोखाधड़ी एवं अनुचित व्यापार गतिविधियों पर रोक लगाने वाले नियम, 2003’ अब लागू नहीं होंगे. नए फ्रेमवर्क के जरिए IFSCA ने गिफ्ट सिटी के प्रतिभूति बाजार के लिए बाजार दुरुपयोग के मामलों से निपटने का एक व्यापक और एकीकृत नियामकीय ढांचा तैयार किया है.
पहले दौर में मिले 7 आवेदन, NTPC, तालचेर फर्टिलाइजर्स समेत निजी कंपनियों ने भी दिखाई दिलचस्पी; सरकार को बड़े निवेश की उम्मीद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार की 37,500 करोड़ रुपये की कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण योजना को पहले ही दौर में जोरदार प्रतिक्रिया मिली है. योजना के तहत कुल सात आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें अडानी एंटरप्राइजेज ने अकेले यूरिया उत्पादन से जुड़ी तीन परियोजनाओं के लिए बोली लगाई है. इसके अलावा सरकारी कंपनी NTPC, तालचेर फर्टिलाइजर्स और निजी क्षेत्र की गैलेंट इस्पात तथा श्याम सेल एंड पावर ने भी अलग-अलग परियोजनाओं के लिए आवेदन किया है.
सात आवेदनों से बढ़ा सरकार का भरोसा
कोयला मंत्रालय ने मंगलवार को बताया कि सात आवेदन मिलना योजना और देश के कोयला गैसीकरण मिशन में उद्योग जगत के भरोसे को दर्शाता है. मंत्रालय की यह प्रतिक्रिया उन खबरों के बीच आई है, जिनमें योजना के लिए कंपनियों की सीमित रुचि को लेकर सवाल उठाए गए थे.
कोयला मंत्रालय में सलाहकार (प्रोजेक्ट्स) आलोक कुमार सिंह ने कहा कि पहले दौर में सात आवेदन मिलना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उद्योग को योजना पर भरोसा है. उनके मुताबिक, आवेदनों में देश के बड़े औद्योगिक समूहों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की भागीदारी से सरकार के कोयला गैसीकरण मिशन को मजबूती मिली है.
अडानी ने लगाई तीन बोलियां
पहले दौर में सबसे ज्यादा चर्चा अडानी एंटरप्राइजेज की तीन परियोजनाओं को लेकर है. कंपनी ने यूरिया उत्पादन से जुड़ी तीन परियोजनाओं के लिए आवेदन किया है. सात आवेदनों में से चार परियोजनाएं यूरिया उत्पादन से संबंधित हैं. इनमें अडानी एंटरप्राइजेज की तीन और तालचेर फर्टिलाइजर्स की एक परियोजना शामिल है. अन्य आवेदकों में NTPC ने सिंथेटिक प्राकृतिक गैस परियोजना के लिए आवेदन किया है. वहीं गैलेंट इस्पात ने डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन और सिनगैस उत्पादन से जुड़ी परियोजना का प्रस्ताव दिया है. श्याम सेल एंड पावर ने सिनगैस परियोजना के लिए आवेदन किया है.
क्या है कोयला गैसीकरण?
कोयला गैसीकरण की प्रक्रिया में कोयले को सिनगैस यानी सिंथेटिक गैस में बदला जाता है. इस गैस का इस्तेमाल आगे यूरिया, मेथनॉल, अमोनिया, हाइड्रोजन और सिंथेटिक प्राकृतिक गैस जैसे उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है.
सरकार का मकसद इस तकनीक के जरिए देश की LNG, यूरिया, अमोनिया और मेथनॉल जैसे उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम करना है. मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में इन उत्पादों का कुल आयात करीब 2.77 लाख करोड़ रुपये रहा था.
2030 तक 7.5 करोड़ टन क्षमता का लक्ष्य
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मई में इस योजना को मंजूरी दी थी. इसके तहत 2030 तक 7.5 करोड़ टन कोयला गैसीकरण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है. यह 2030 तक देश में 10 करोड़ टन कोयला गैसीकरण क्षमता हासिल करने के व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य में योगदान देगा.
सरकार का अनुमान है कि इस योजना के जरिए 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये तक का निवेश आकर्षित किया जा सकता है. इसके साथ ही कोयला गैसीकरण की पूरी मूल्य श्रृंखला में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के बड़े अवसर पैदा होने की उम्मीद है.
पिछली योजना से आगे बढ़ा मिशन
नई योजना जनवरी 2024 में मंजूर की गई 8,500 करोड़ रुपये की आर्थिक प्रोत्साहन योजना पर आधारित है. पिछली योजना के तहत आठ गैसीकरण परियोजनाएं पहले से लागू की जा रही हैं. पहले दौर में मिले आवेदनों की अब निर्धारित दिशानिर्देशों और आशय पत्र के आधार पर विस्तृत जांच की जाएगी. इस बीच कोयला मंत्रालय ने मंगलवार से आवेदन का दूसरा दौर भी शुरू कर दिया है.
कंपनियों को आगे भी मिलेगा मौका
सरकार ने कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए आवेदन प्रक्रिया को चरणबद्ध रखा है. योजना के तहत आवेदन विंडो दो महीने के अंतराल पर खोली जाएंगी. इससे पात्र कंपनियों को अपनी परियोजनाओं की तैयारी पूरी कर बाद के दौर में आवेदन करने का अवसर मिलेगा. मंत्रालय के अनुसार, कई संभावित आवेदक अपनी परियोजनाओं की तैयारी के उन्नत चरण में हैं. ऐसे में आने वाले दौर में योजना के तहत आवेदन की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है.
मंगलवार को सेंसेक्स 555.23 अंक यानी 0.73 फीसदी गिरकर 75,577.58 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 144.05 अंक यानी 0.61 फीसदी की गिरावट के साथ 23,635.10 पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में बुधवार को भी दबाव बने रहने के संकेत मिल रहे हैं. मंगलवार को भारी बिकवाली के बाद अब निवेशकों की नजर आज बाजार की शुरुआत पर है. गिफ्ट निफ्टी (GIFT Nifty) में कमजोरी और ब्रेंट क्रूड के 99 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत कमजोर रहने की आशंका है. पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक बाजारों में नरमी ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है.
सेंसेक्स 555 अंक टूटा, निफ्टी भी फिसला
मंगलवार, 8 सितंबर को घरेलू शेयर बाजार में जोरदार बिकवाली देखने को मिली. सेंसेक्स 555.23 अंक यानी 0.73 फीसदी गिरकर 75,577.58 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 144.05 अंक यानी 0.61 फीसदी की गिरावट के साथ 23,635.10 पर आ गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में 21 गिरावट के साथ बंद हुए, जबकि सिर्फ 9 शेयरों में तेजी रही.
बैंकिंग और बड़े शेयरों में बिकवाली का बाजार पर सबसे ज्यादा असर पड़ा. ICICI Bank करीब 2 फीसदी टूटकर 1,399.50 रुपये पर बंद हुआ और सेंसेक्स का सबसे बड़ा लूजर रहा. Axis Bank 1.72 फीसदी, UltraTech Cement 1.23 फीसदी, Kotak Mahindra Bank 1.20 फीसदी, Reliance Industries 1.16 फीसदी और HDFC Bank 1.11 फीसदी नीचे बंद हुए. Infosys में भी 0.37 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
BEL और Adani Ports ने संभाला मोर्चा
बाजार में गिरावट के बीच कुछ शेयरों में खरीदारी देखने को मिली. Bharat Electronics यानी BEL 1.48 फीसदी चढ़कर 410.50 रुपये पर बंद हुआ. Adani Ports में 1.06 फीसदी और Hindustan Unilever में 0.84 फीसदी की तेजी रही. इसके अलावा IndiGo, HCLTech, Titan, SBI, Eternal और Tech Mahindra भी बढ़त के साथ बंद हुए.
GIFT Nifty ने दिए कमजोर शुरुआत के संकेत
बुधवार सुबह GIFT Nifty करीब 97 अंक की गिरावट के साथ 23,657 के आसपास कारोबार कर रहा था. इससे घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. शुरुआती कारोबार में बैंकिंग, आईटी और एनर्जी शेयरों की चाल बाजार की दिशा तय करने में अहम रह सकती है.
99 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें भारतीय बाजार के लिए बड़ी चिंता बनी हुई हैं. ब्रेंट क्रूड 99 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है और जुलाई के बाद के ऊंचे स्तरों के करीब कारोबार कर रहा है. Strait of Hormuz क्षेत्र में तनाव और वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं से क्रूड की कीमतों को सहारा मिल रहा है. भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए लंबे समय तक महंगा क्रूड रहने से महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
एशियाई बाजारों में मिला-जुला कारोबार
बुधवार सुबह एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख देखने को मिला. दक्षिण कोरिया का Kospi करीब 1.36 फीसदी की बढ़त में था, जबकि जापान का Nikkei 225 करीब 0.40 फीसदी ऊपर कारोबार कर रहा था. AI से जुड़ी कंपनियों में खरीदारी से कुछ एशियाई बाजारों को सहारा मिला.
अमेरिकी बाजार भी दबाव में
मंगलवार को अमेरिकी शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक भी गिरावट के साथ बंद हुए. Dow Jones Industrial Average में 1.18 फीसदी, S&P 500 में 0.58 फीसदी और Nasdaq Composite में 0.32 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. अमेरिकी बॉन्ड बाजार में 10 वर्षीय ट्रेजरी नोट की यील्ड करीब 4.8 फीसदी रही, जिस पर निवेशकों की नजर बनी हुई है.
आज किन संकेतों पर रहेगी बाजार की नजर?
बुधवार के कारोबार में निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों, पश्चिम एशिया के घटनाक्रम, GIFT Nifty के संकेत और वैश्विक बाजारों की चाल पर रहेगी. मंगलवार की तेज गिरावट के बाद बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ा रह सकता है. ऐसे में बैंकिंग, आईटी, एनर्जी और बड़े बाजार पूंजीकरण वाले शेयरों में खास गतिविधि देखने को मिल सकती है.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज Bandhan Bank से लेकर HCLTech के शेयरों पर खास नजर रहेगी. जैसे Innovision को मध्य प्रदेश में नेशनल हाईवे से जुड़े टोल प्लाजा के लिए 243.6 करोड़ रुपये का Letter of Award मिला है, जबकि Enviro Infra की सहायक कंपनी Suyog Urja को NTPC के 180 MW विंड प्रोजेक्ट के लिए 190 करोड़ रुपये का EPC कॉन्ट्रैक्ट मिला है. Biocon में करीब 638.4 करोड़ रुपये की संभावित ब्लॉक डील की खबर है. Raymond का बोर्ड 214.71 करोड़ रुपये जुटाने के लिए कन्वर्टिबल वारंट जारी करेगा. Great Eastern Shipping ने 2019 में बने Kamsarmax dry bulk carrier को खरीदने का करार किया है. HCLTech ने बेंगलुरु में 185 करोड़ रुपये के निवेश से एडवांस्ड सेमीकंडक्टर लैब शुरू की है. वहीं Moschip Technologies को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत 15 सितंबर से पहले 200 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सुरक्षा राशि जमा करनी है. Sri Lotus Developers के प्रमोटर 2 फीसदी तक हिस्सेदारी बेच सकते हैं. Fermenta Biotech ने VIT के साथ Vitamin B12 fortification तकनीक के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए एक्सक्लूसिव लाइसेंस एग्रीमेंट किया है, जबकि Sanofi India से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की याचिका खारिज कर दी है. Bandhan Bank ने Mastercard क्रेडिट कार्ड लॉन्च को सामान्य कारोबारी गतिविधि बताया है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
11 सितंबर को मोदी-पुतिन की मुलाकात संभव, व्यापार, रक्षा और ऊर्जा सहयोग पर हो सकती है चर्चा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आएंगे. क्रेमलिन ने मंगलवार को पुतिन की भारत यात्रा की पुष्टि की. इस दौरान वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी करेंगे. दोनों नेताओं की मुलाकात 11 सितंबर को होने की संभावना है, जबकि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होगा.
मोदी-पुतिन की यह बैठक शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन से इतर दोनों नेताओं के बीच हुई हालिया मुलाकात के कुछ ही समय बाद होगी. बिश्केक में हुई बैठक के दौरान मोदी और पुतिन ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष सहित कई क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग की समीक्षा की थी. दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी विचार-विमर्श किया था.
व्यापार और आर्थिक सहयोग पर रहेगा जोर
मोदी और पुतिन की आगामी बैठक में व्यापार और आर्थिक सहयोग प्रमुख मुद्दों में शामिल रहने की उम्मीद है. व्यापक भू-राजनीतिक और व्यापारिक अनिश्चितताओं के बीच दोनों देश द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं. बैठक में रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग की भी समीक्षा हो सकती है. दोनों देशों के बीच हालिया चर्चाओं में रक्षा सहयोग को व्यापक बनाने पर जोर दिया गया है. भारत रूस के साथ उन्नत लड़ाकू विमान और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहता है.
अंतर-सरकारी आयोग की बैठक के नतीजों की भी समीक्षा
एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान हुई पिछली बैठक में मोदी और पुतिन ने 24 अगस्त को मॉस्को में हुई भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की व्यापार, आर्थिक और सांस्कृतिक मामलों से संबंधित बैठक के नतीजों की भी समीक्षा की थी. दोनों नेताओं ने भारत और रूस के बीच विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए लगातार संपर्क में रहने पर सहमति जताई थी.
12-13 सितंबर को होगा ब्रिक्स सम्मेलन
पुतिन की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है. भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी. इस सम्मेलन में विस्तारित ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों के नेता हिस्सा लेंगे.
पुतिन की यात्रा के दौरान मोदी के साथ बैठक में ब्रिक्स के ढांचे के तहत भारत-रूस सहयोग पर भी चर्चा होने की उम्मीद है. अगस्त में हुई मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत द्विपक्षीय जुड़ाव पर विचार साझा किए थे. इसके अलावा समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रीय मुद्दों पर भी चर्चा हुई थी.
रूसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा से ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का कूटनीतिक महत्व और बढ़ गया है. भारत अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक शासन से जुड़े मुद्दों पर संवाद को आगे बढ़ा रहा है. ऐसे में मोदी-पुतिन की द्विपक्षीय वार्ता शिखर सम्मेलन के दौरान होने वाली अहम उच्चस्तरीय बैठकों में शामिल होगी.
आरईसी के बाद एलएंडटी टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में उतरने वाली पहली निजी क्षेत्र की कंपनी होगी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
लार्सन एंड टुब्रो (L&T) भारत के उभरते टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में कदम रखने की तैयारी कर रही है. कंपनी ब्लॉकचेन आधारित टोकनाइज्ड बॉन्ड जारी कर करीब 500 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है. ऐसा होने पर एलएंडटी इस तरह के बॉन्ड जारी करने वाली भारत की पहली निजी क्षेत्र की कंपनी बन जाएगी.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित बॉन्ड की अवधि तीन साल हो सकती है और इस पर करीब 7.40 फीसदी कूपन दर रहने की उम्मीद है. इस लेनदेन में ब्लॉकचेन आधारित बुनियादी ढांचे के साथ भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) का इस्तेमाल सेटलमेंट के लिए किया जा सकता है.
यह कदम सरकारी स्वामित्व वाली आरईसी लिमिटेड के भारत के पहले टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड लेनदेन के जरिए 500 करोड़ रुपये जुटाने के कुछ ही समय बाद सामने आया है. आरईसी के बॉन्ड पर 7.30 फीसदी कूपन दर थी और इसे करीब आठ गुना अधिक सब्सक्रिप्शन मिला था.
आरईसी के बाद एलएंडटी की टोकनाइज्ड डेट में एंट्री
टोकनाइज्ड बॉन्ड पारंपरिक डेट सिक्योरिटीज होते हैं, लेकिन इनके स्वामित्व और लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड ब्लॉकचेन या अन्य डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर तकनीक पर दर्ज किए जाते हैं. इस तकनीक से सेटलमेंट प्रक्रिया को तेज करने, लेनदेन की लागत घटाने और पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
एलएंडटी के लिए यह प्रस्तावित लेनदेन वित्तीय व्यवस्था में नई तकनीकों को अपनाने की दिशा में एक और कदम है. कंपनी इससे पहले भी भारत के तेजी से विकसित हो रहे सस्टेनेबल डेट मार्केट में सक्रिय रही है. एलएंडटी ने सेबी के ईएसजी डेट फ्रेमवर्क के तहत 500 करोड़ रुपये का सस्टेनेबिलिटी-लिंक्ड बॉन्ड भी जारी किया था.
सीबीडीसी से तेज हो सकता है सेटलमेंट
टोकनाइज्ड बॉन्ड की संरचना में डिजिटल सेटलमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर एक अहम भूमिका निभाता है. भारत में परीक्षण किए जा रहे इस मॉडल के तहत जरूरी सीबीडीसी और डीमैट सुविधाओं वाले पात्र संस्थागत निवेशक लेनदेन में हिस्सा ले सकते हैं और उसी दिन इसका सेटलमेंट किया जा सकता है.
यह ढांचा भारतीय प्रतिभूति बाजार के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने और मुख्यधारा के पूंजी बाजार में डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाओं को तलाशने की नियामकीय कोशिशों का हिस्सा है. आरईसी का हालिया लेनदेन कॉरपोरेट डेट में इस मॉडल के बड़े स्तर पर इस्तेमाल का पहला उदाहरण बना है.
500 करोड़ रुपये की रकम छोटी, लेकिन बाजार के लिए बड़ा संकेत
एलएंडटी के कुल वित्तपोषण की जरूरतों की तुलना में 500 करोड़ रुपये की रकम भले ही छोटी हो, लेकिन प्रस्तावित बॉन्ड इश्यू भारत के कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार के विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
एलएंडटी की स्टैंडअलोन कुल आय वित्त वर्ष 2025-26 में सालाना आधार पर 8.68 फीसदी बढ़कर 1.61 लाख करोड़ रुपये रही. 31 मार्च 2026 तक कंपनी के बकाया नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर 9,800 करोड़ रुपये थे. इसके अलावा कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान लिस्टेड कमर्शियल पेपर के जरिए 14,600 करोड़ रुपये भी जुटाए.
ऐसे में एलएंडटी का प्रस्तावित टोकनाइज्ड बॉन्ड इश्यू सिर्फ 500 करोड़ रुपये जुटाने तक सीमित नहीं है. इसका बड़ा उद्देश्य कॉरपोरेट उधारी के लिए एक नए माध्यम की व्यवहारिकता को परखना है. अगर ऐसे लेनदेन संचालन के लिहाज से प्रभावी और बड़े स्तर पर लागू करने योग्य साबित होते हैं, तो आने वाले समय में टोकनाइजेशन भारत के डेट मार्केट के बुनियादी ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है.
फंडिंग का इस्तेमाल डीप-टेक आरएंडडी, ‘रीसाइक्लिंग ऑन व्हील्स’ हब और ‘लुब्रिकेंट्स ऐज अ सर्विस’ को विस्तार देने में होगा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
औद्योगिक क्षेत्र में लुब्रिकेंट के लाइफसाइकिल मैनेजमेंट पर काम करने वाली कंपनी मिनिमैक सिस्टम्स (Minimac Systems) ने 30 करोड़ रुपये की फंडिंग जुटाई है. इस फंडिंग राउंड की अगुआई जेरोधा की रेनमैटर (Rainmatter) ने की है, जबकि कुछ चुनिंदा वेंचर कैपिटल फर्मों ने भी इसमें हिस्सा लिया है. कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल डीप-टेक रिसर्च एंड डेवलपमेंट, रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ‘लुब्रिकेंट्स ऐज अ सर्विस’ कारोबार को विस्तार देने में करेगी. आईआईटी धनबाद और आईआईएम इंदौर के पूर्व छात्र अंशुमान अग्रवाल द्वारा स्थापित मिनिमैक सिस्टम्स शुरुआत से ही बूटस्ट्रैप्ड और मुनाफे में रही है.
5 मिलियन टन से ज्यादा लुब्रिकेंट की खपत
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा लुब्रिकेंट बाजार है. देश में हर साल 5 मिलियन टन से अधिक लुब्रिकेंट और ग्रीस की खपत होती है. हालांकि, लुब्रिकेंट बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कच्चे माल बेस ऑयल की 60% से अधिक जरूरत आयात से पूरी होती है. भारत का सालाना बेस ऑयल आयात बिल 2.7 अरब डॉलर से ज्यादा हो चुका है.
कंपनी के मुताबिक, अगले पांच वर्षों में लुब्रिकेंट की मांग सालाना 4-5% की दर से बढ़ने की उम्मीद है. ऐसे में इस्तेमाल किए गए लुब्रिकेंट को दोबारा उपयोग योग्य बनाने और रीसाइक्लिंग की क्षमता बढ़ाने की जरूरत भी बढ़ेगी.
तीन स्तरों पर काम करता है मिनिमैक का मॉडल
मिनिमैक लुब्रिकेंट के पूरे लाइफसाइकिल को तीन स्तरों में मैनेज करता है. पहले स्तर पर कंडीशन मॉनिटरिंग, कंटैमिनेशन कंट्रोल और फ्लूइड-हेल्थ एनालिटिक्स के जरिए मशीन के अंदर मौजूद लुब्रिकेंट की गुणवत्ता बनाए रखने पर जोर दिया जाता है. दूसरे स्तर पर प्लांट में मौजूद इस्तेमाल किए गए लुब्रिकेंट से दूषित पदार्थ, नमी और डिग्रेडेशन से बने अवशेष हटाकर उसे दोबारा इस्तेमाल के योग्य बनाया जाता है. तीसरे स्तर पर ऐसे तेल को, जिसे सुरक्षित तरीके से बहाल नहीं किया जा सकता, पंजीकृत री-रिफाइनर्स तक पहुंचाया जाता है. वहां इसे री-रिफाइंड बेस ऑयल में बदला जाता है.
‘रीसाइक्लिंग ऑन व्हील्स’ से प्लांट तक पहुंचेगी सुविधा
कंपनी का ‘रीसाइक्लिंग ऑन व्हील्स’ एक मोबाइल ट्रीटमेंट सिस्टम है, जिसकी प्रोसेसिंग क्षमता करीब 10 से 4,000 लीटर प्रति मिनट तक है. यह सिस्टम प्लांट पर ही लुब्रिकेंट की जांच, ट्रीटमेंट और दोबारा उपयोग की सुविधा उपलब्ध कराता है.
इसके अलावा, कंपनी ‘लुब्रिकेंट्स ऐज अ सर्विस’ मॉडल के तहत प्लांट के भीतर लुब्रिकेंट की सप्लाई, मॉनिटरिंग, रिस्टोरेशन, अनुपालन और इस्तेमाल के बाद रिकवरी जैसी सेवाओं को एक साथ मैनेज करने की योजना बना रही है.
2,500 से ज्यादा सिस्टम तैनात
मिनिमैक के मुताबिक, कंपनी अब तक 2,500 से अधिक मिनिएचराइज्ड फ्लूइड-ट्रीटमेंट सिस्टम तैनात कर चुकी है. इनकी कुल स्थापित प्रोसेसिंग क्षमता 3 लाख लीटर प्रति मिनट से अधिक है. कंपनी ने 2,200 से अधिक औद्योगिक परिसंपत्तियों के साथ काम किया है और भारत तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में 1.4 करोड़ लीटर से अधिक लुब्रिकेंट को प्रोसेस किया है.
इसके ग्राहकों में एनटीपीसी, अडानी पावर, जेएसडब्ल्यू स्टील, टाटा स्टील, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, रिलायंस इंडस्ट्रीज, शेल, एक्सॉनमोबिल, लार्सन एंड टुब्रो, जीई पावर, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स, सीमेंस एनर्जी, कैटरपिलर और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स जैसी कंपनियां शामिल हैं.
इस्तेमाल किए गए तेल की रीसाइक्लिंग पर बढ़ रहा नियामकीय जोर
भारत में अप्रैल 2024 से लागू एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) व्यवस्था के तहत बेस ऑयल और लुब्रिकेंट के उत्पादकों तथा आयातकों को रीसाइक्लिंग लक्ष्य पूरा करना होता है. वित्त वर्ष 2026-27 में यह रीसाइक्लिंग लक्ष्य 20% है, जिसे वित्त वर्ष 2030-31 से बढ़ाकर 50% किया जाना है. अनुपालन पंजीकृत रीसाइक्लर्स द्वारा जारी EPR सर्टिफिकेट से जुड़ा हुआ है.
फंड का इस्तेमाल तकनीक और विस्तार पर
मिनिमैक फंडिंग का इस्तेमाल अगली पीढ़ी के मिनिएचराइज्ड ट्रीटमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर, फ्लीट ऑटोमेशन और फ्लूइड एनालिटिक्स से जुड़े डीप-टेक आरएंडडी को आगे बढ़ाने में करेगी. इसके साथ ही कंपनी प्रमुख औद्योगिक क्लस्टर्स में क्षेत्रीय हब बनाकर ‘रीसाइक्लिंग ऑन व्हील्स’ नेटवर्क का विस्तार करेगी. ‘लुब्रिकेंट्स ऐज अ सर्विस’ को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए कंपनी अपने कमर्शियल, डिजिटल और ऑपरेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत करेगी.
मिनिमैक सिस्टम्स के संस्थापक और प्रबंध निदेशक अंशुमान अग्रवाल ने कहा कि कंपनी का लक्ष्य लुब्रिकेंट को लंबे समय तक इस्तेमाल में बनाए रखना और नए बेस ऑयल की जरूरत कम करना है. उन्होंने कहा कि कंपनी ने अब तक अपने पूंजी के दम पर मुनाफे के साथ कारोबार खड़ा किया है और नई फंडिंग से भारत के अधिक औद्योगिक संयंत्रों तक रिस्टोरेशन और रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पहुंचाने में मदद मिलेगी.
रेनमैटर बाय जेरोधा के लीड-क्लाइमेट एंड डीप टेक अभिनव नेगी ने कहा कि मिनिमैक आयात पर निर्भरता, खतरनाक कचरे और औद्योगिक उपकरणों की उम्र से जुड़ी समस्याओं पर काम कर रही है. उनके मुताबिक, कंपनी ने पुणे से बूटस्ट्रैप्ड तरीके से शुरुआत की और मुनाफे के साथ अपना कारोबार खड़ा किया है. नई पूंजी से रीसाइक्लिंग टेक्नोलॉजी को मजबूत करने और प्लांट तक पहुंचने वाली सेवाओं का विस्तार करने में मदद मिलेगी.
जून 2026 तक संगठित सीनियर लिविंग स्टॉक 25,050 यूनिट्स, 2030 तक 7.7 अरब डॉलर के निवेश की संभावना; बढ़ती बुजुर्ग आबादी से असिस्टेड लिविंग की मांग भी बढ़ेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी अब केवल सामाजिक चुनौती नहीं, बल्कि रियल एस्टेट और केयर इकोनॉमी के लिए बड़ा कारोबारी अवसर बन रही है. एसोसिएशन ऑफ सीनियर लीविंग इंडिया (ASLI) और जेएलएल की रिपोर्ट ‘इंडियाज सिल्वर इकोनॉमी: फ्रॉम निच टू नेसेसिटी’ के मुताबिक, देश का सीनियर लिविंग बाजार 2030 तक करीब 10.1 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. नीति आधारित विकास की स्थिति में इस क्षेत्र में करीब 7.7 अरब डॉलर के पूंजी निवेश की जरूरत पड़ सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 तक देश में संगठित सीनियर लिविंग स्टॉक करीब 25,050 यूनिट्स था. भारत में इसकी बाजार पैठ अभी लगभग 1.5% है, जबकि अमेरिका में यह 6-7% और न्यूजीलैंड में 14-15% के स्तर पर है. इससे संकेत मिलता है कि भारत में इस क्षेत्र के विस्तार की काफी गुंजाइश मौजूद है.
2050 तक 34.6 करोड़ हो सकती है 60 वर्ष से अधिक आबादी
भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी फिलहाल करीब 16.69 करोड़ है, जिसके 2050 तक बढ़कर लगभग 34.6 करोड़ होने का अनुमान है. इसके साथ ही शहरी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से स्वतंत्र वरिष्ठ नागरिक परिवारों की संख्या 2026 में करीब 17 लाख से बढ़कर 2030 तक 21 लाख तक पहुंच सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, सीनियर लिविंग क्षेत्र ने 2024 से जून 2026 के बीच करीब 14.2% की सालाना वृद्धि दर दर्ज की है, जो 2019-2023 के दौरान दर्ज 8.5% की वृद्धि दर से काफी अधिक है. बेहतर तरीके से संचालित सीनियर लिविंग सुविधाओं में ऑक्यूपेंसी 80-85% तक पहुंच रही है.
असिस्टेड लिविंग में बड़ी कमी
असिस्टेड लिविंग सेगमेंट में मांग और उपलब्ध क्षमता के बीच बड़ा अंतर है. वर्तमान में देश में करीब 2,100 असिस्टेड लिविंग बेड उपलब्ध हैं, जबकि 2030 तक करीब 11,000 बेड की जरूरत होने का अनुमान है. खासतौर पर 75 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी में 7.8% की सालाना वृद्धि इस मांग को और बढ़ा सकती है.
जेएलएल के सीनियर मैनेजिंग डायरेक्टर करण सिंह सोढ़ी के मुताबिक, भारत का सीनियर लिविंग सेक्टर मौजूदा करीब 25,050 यूनिट्स से बढ़कर 2030 तक लगभग 74,000 यूनिट्स तक पहुंच सकता है. इसके लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश और नीतिगत समर्थन की जरूरत होगी.
तीन संभावित परिदृश्य
रिपोर्ट ने सीनियर लिविंग बाजार के लिए तीन संभावित विकास परिदृश्य बताए हैं. बेसलाइन स्थिति में 2030 तक करीब 51,000 यूनिट्स और लगभग 4.5 अरब डॉलर का बाजार बनने का अनुमान है. तेज विकास की स्थिति में यह संख्या करीब 63,000 यूनिट्स और बाजार 6.2 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. वहीं, नीति आधारित विकास की स्थिति में करीब 74,000 यूनिट्स और 7.7 अरब डॉलर के पूंजी निवेश की संभावना जताई गई है.
महाराष्ट्र और हरियाणा से मिल सकता है मॉडल
रिपोर्ट में महाराष्ट्र और हरियाणा को सीनियर लिविंग क्षेत्र में नीतिगत पहल के उदाहरण के तौर पर पेश किया गया है. महाराष्ट्र में सीनियर लिविंग को प्लानिंग मानकों और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़कर औपचारिक पहचान देने की दिशा में कदम उठाए गए हैं. वहीं, हरियाणा में अनुमति प्रक्रिया को स्पष्ट करने और अतिरिक्त एफएआर जैसे प्रोत्साहनों से इस क्षेत्र को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है.
‘घर से अमीर, नकद से गरीब’ बुजुर्गों के लिए वित्तीय समाधान जरूरी
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्गों के पास घर और संपत्ति तो है, लेकिन नियमित नकदी प्रवाह सीमित है. ऐसे में ‘घर से अमीर, नकद से गरीब’ की स्थिति सीनियर लिविंग की अफोर्डेबिलिटी के सामने बड़ी चुनौती है. रिवर्स मॉर्गेज और बीमा से जुड़े उत्पाद इस समस्या का समाधान करने में मदद कर सकते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले वर्षों में सीनियर लिविंग का मॉडल केवल प्रॉपर्टी बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा. केयर और सर्विस आधारित मॉडल, खासकर किराये पर उपलब्ध सुविधाएं, अगले तीन से पांच वर्षों में तेजी से बढ़ सकती हैं.
टेक्नोलॉजी और केयर मॉडल पर बढ़ेगा जोर
सीनियर लिविंग के साथ मेमोरी केयर, कंटीन्यूम ऑफ केयर, इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड, वियरेबल डिवाइस और टेलीमेडिसिन जैसी सेवाओं का महत्व भी बढ़ने की उम्मीद है. हालांकि, प्रशिक्षित केयरगिवर्स की कमी और रियल एस्टेट की ऊंची लागत इस क्षेत्र के विस्तार में बड़ी बाधा बनी हुई है.
रिपोर्ट में सीनियर लिविंग सेवाओं पर जीएसटी व्यवस्था को सरल बनाने, रिवर्स मॉर्गेज को बढ़ावा देने, बीमा उत्पादों को सीनियर लिविंग से जोड़ने और अस्पतालों के साथ लंबी अवधि की लीज या एसेट-लाइट साझेदारी को प्रोत्साहित करने जैसे उपाय सुझाए गए हैं. साथ ही, इस पूरे क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीति ढांचा तैयार करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है. बढ़ती उम्र की आबादी के साथ भारत में सीनियर लिविंग अब एक सीमित रियल एस्टेट सेगमेंट नहीं रह गया है. आने वाले वर्षों में यह आवास, स्वास्थ्य सेवा, देखभाल, बीमा और वित्तीय सेवाओं को जोड़ने वाली एक बड़ी ‘सिल्वर इकोनॉमी’ का आधार बन सकता है.
बीमा नियामक ने 2019 की जांच के आधार पर की कार्रवाई, इवेंट मैनेजमेंट गतिविधियों की रिपोर्टिंग और दस्तावेजों को लेकर उठाए सवाल
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बीमा नियामक भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने ICICI लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस पर ₹1 करोड़ का जुर्माना लगाया है. नियामक की यह कार्रवाई 2019 में हुई जांच के दौरान कंपनी की आउटसोर्सिंग प्रैक्टिस, वेंडर मैनेजमेंट और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़ी कुछ कमियों के आधार पर की गई है. मामला कंपनी की सेल्स, मार्केटिंग और बिजनेस सपोर्ट गतिविधियों से जुड़े भुगतान और इवेंट मैनेजमेंट सेवाओं की रिपोर्टिंग से संबंधित है.
₹709.57 करोड़ के खर्च से जुड़ा मामला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वित्त वर्ष 2019 में ICICI लोम्बार्ड ने 'सेल्स, मार्केटिंग और बिजनेस सपोर्ट' के तहत ₹709.57 करोड़ खर्च किए थे. कंपनी के अनुसार, इसमें से करीब ₹35-37 करोड़ का भुगतान अन्य बीमा कंपनियों से जुड़े व्यक्तिगत एजेंटों को किया गया था.
IRDAI की जांच में इन भुगतानों और उनसे जुड़ी गतिविधियों को लेकर कंपनी की आउटसोर्सिंग व्यवस्था की समीक्षा की गई. नियामक ने पाया कि इवेंट मैनेजमेंट गतिविधियों में दूसरी बीमा कंपनियों के एजेंटों का इस्तेमाल किया गया था.
इवेंट मैनेजमेंट की रिपोर्टिंग पर सवाल
IRDAI के मुताबिक, कंपनी इन गतिविधियों को पर्याप्त सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स के साथ स्थापित करने में नाकाम रही. साथ ही, इन गतिविधियों को आउटसोर्स की गई गतिविधियों के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया गया और संबंधित खर्चों की आउटसोर्सिंग रिटर्न में भी रिपोर्टिंग नहीं की गई.
बीमा नियामक ने 7 सितंबर को जारी अपने आदेश में कहा कि इवेंट मैनेजमेंट सेवाओं को आउटसोर्स गतिविधि के तौर पर वर्गीकृत नहीं किए जाने के कारण कंपनी इन खर्चों को आउटसोर्सिंग रिटर्न में रिपोर्ट करने में विफल रही. नियामक के अनुसार, इससे समय पर रेगुलेटरी जांच नहीं हो सकी.
आउटसोर्सिंग और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर फोकस
IRDAI की कार्रवाई से बीमा कंपनियों के लिए आउटसोर्सिंग गतिविधियों की उचित पहचान, दस्तावेजीकरण और नियामकीय रिपोर्टिंग की अहमियत सामने आती है. नियामक लगातार बीमा कंपनियों के वेंडर मैनेजमेंट, आउटसोर्सिंग व्यवस्था और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े नियमों के अनुपालन पर जोर देता रहा है.
रिलायंस इंडस्ट्रीज पांच साल की अवधि वाले बॉन्ड के जरिए करीब ₹12,500 करोड़ जुटाने की तैयारी में है. इस इश्यू पर कंपनी 7.47% सालाना ब्याज की पेशकश करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) घरेलू बॉन्ड बाजार में करीब तीन साल बाद बड़ी वापसी की तैयारी में है. मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली कंपनी पांच साल की अवधि वाले बॉन्ड जारी कर करीब ₹12,500 करोड़ जुटाने की योजना बना रही है. इन बॉन्ड्स पर निवेशकों को 7.47% सालाना ब्याज मिलने की उम्मीद है. कंपनी की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब डॉलर में कर्ज की लागत के मुकाबले घरेलू रुपये में फंड जुटाना अपेक्षाकृत सस्ता पड़ रहा है.
पांच साल के बॉन्ड से जुटाएगी ₹12,500 करोड़
रिलायंस इंडस्ट्रीज पांच साल की अवधि वाले बॉन्ड के जरिए करीब ₹12,500 करोड़ जुटाने की तैयारी में है. इस इश्यू पर कंपनी 7.47% सालाना ब्याज की पेशकश करेगी. जानकारी के मुताबिक, 18 सितंबर को खत्म होने वाले सप्ताह में संस्थागत और अन्य पात्र निवेशकों से बॉन्ड के लिए बोलियां मंगाई जा सकती हैं. अगर यह इश्यू पूरा होता है तो नवंबर 2023 के बाद किसी रेटेड गैर-वित्तीय कंपनी की ओर से एक बार में जुटाई जाने वाली यह बड़ी रकम में से एक होगी. इससे घरेलू कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में रिलायंस की वापसी भी होगी.
डॉलर में कर्ज के मुकाबले रुपये में फंडिंग सस्ती
रिलायंस का घरेलू बाजार से कर्ज जुटाने का फैसला ब्याज दरों और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए अहम माना जा रहा है. हाल के महीनों में भारत में पांच साल की अवधि वाले बॉन्ड की यील्ड में गिरावट आई है. जून की शुरुआत से अब तक पांच साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 33 बेसिस पॉइंट नीचे आई है. दूसरी ओर, अमेरिका में ट्रेजरी यील्ड ऊंची बनी हुई है. ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए डॉलर में कर्ज लेना महंगा पड़ रहा है. इसके मुकाबले रुपये में घरेलू बाजार से फंड जुटाना रिलायंस के लिए ज्यादा किफायती विकल्प बन सकता है.
बड़े निजी बैंक होंगे इश्यू के अरेंजर
इस बॉन्ड इश्यू को पूरा करने के लिए देश के प्रमुख निजी बैंक अरेंजर की भूमिका निभाएंगे. रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से कुछ बैंक खुद भी बॉन्ड के एक हिस्से को सब्सक्राइब कर सकते हैं. इससे इश्यू को संस्थागत निवेशकों के बीच मजबूत मांग मिलने की संभावना है.
10 साल के बॉन्ड पर भी विचार
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पांच साल के बॉन्ड के अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज लंबी अवधि के कर्ज जुटाने के विकल्प पर भी विचार कर रही है. जानकारी के अनुसार, कंपनी 10 साल की मैच्योरिटी वाले बॉन्ड जारी करने की संभावना तलाश रही है. इसके लिए कंपनी की बैंकरों और संभावित बड़े निवेशकों के साथ बातचीत जारी है. कंपनी की यह रणनीति उसके वित्तीय पोर्टफोलियो में विविधता लाने और लंबी अवधि की फंडिंग जरूरतों को पूरा करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है.