जून 2026 तक संगठित सीनियर लिविंग स्टॉक 25,050 यूनिट्स, 2030 तक 7.7 अरब डॉलर के निवेश की संभावना; बढ़ती बुजुर्ग आबादी से असिस्टेड लिविंग की मांग भी बढ़ेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत में तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी अब केवल सामाजिक चुनौती नहीं, बल्कि रियल एस्टेट और केयर इकोनॉमी के लिए बड़ा कारोबारी अवसर बन रही है. एसोसिएशन ऑफ सीनियर लीविंग इंडिया (ASLI) और जेएलएल की रिपोर्ट ‘इंडियाज सिल्वर इकोनॉमी: फ्रॉम निच टू नेसेसिटी’ के मुताबिक, देश का सीनियर लिविंग बाजार 2030 तक करीब 10.1 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. नीति आधारित विकास की स्थिति में इस क्षेत्र में करीब 7.7 अरब डॉलर के पूंजी निवेश की जरूरत पड़ सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 तक देश में संगठित सीनियर लिविंग स्टॉक करीब 25,050 यूनिट्स था. भारत में इसकी बाजार पैठ अभी लगभग 1.5% है, जबकि अमेरिका में यह 6-7% और न्यूजीलैंड में 14-15% के स्तर पर है. इससे संकेत मिलता है कि भारत में इस क्षेत्र के विस्तार की काफी गुंजाइश मौजूद है.
2050 तक 34.6 करोड़ हो सकती है 60 वर्ष से अधिक आबादी
भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी फिलहाल करीब 16.69 करोड़ है, जिसके 2050 तक बढ़कर लगभग 34.6 करोड़ होने का अनुमान है. इसके साथ ही शहरी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से स्वतंत्र वरिष्ठ नागरिक परिवारों की संख्या 2026 में करीब 17 लाख से बढ़कर 2030 तक 21 लाख तक पहुंच सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, सीनियर लिविंग क्षेत्र ने 2024 से जून 2026 के बीच करीब 14.2% की सालाना वृद्धि दर दर्ज की है, जो 2019-2023 के दौरान दर्ज 8.5% की वृद्धि दर से काफी अधिक है. बेहतर तरीके से संचालित सीनियर लिविंग सुविधाओं में ऑक्यूपेंसी 80-85% तक पहुंच रही है.
असिस्टेड लिविंग में बड़ी कमी
असिस्टेड लिविंग सेगमेंट में मांग और उपलब्ध क्षमता के बीच बड़ा अंतर है. वर्तमान में देश में करीब 2,100 असिस्टेड लिविंग बेड उपलब्ध हैं, जबकि 2030 तक करीब 11,000 बेड की जरूरत होने का अनुमान है. खासतौर पर 75 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी में 7.8% की सालाना वृद्धि इस मांग को और बढ़ा सकती है.
जेएलएल के सीनियर मैनेजिंग डायरेक्टर करण सिंह सोढ़ी के मुताबिक, भारत का सीनियर लिविंग सेक्टर मौजूदा करीब 25,050 यूनिट्स से बढ़कर 2030 तक लगभग 74,000 यूनिट्स तक पहुंच सकता है. इसके लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश और नीतिगत समर्थन की जरूरत होगी.
तीन संभावित परिदृश्य
रिपोर्ट ने सीनियर लिविंग बाजार के लिए तीन संभावित विकास परिदृश्य बताए हैं. बेसलाइन स्थिति में 2030 तक करीब 51,000 यूनिट्स और लगभग 4.5 अरब डॉलर का बाजार बनने का अनुमान है. तेज विकास की स्थिति में यह संख्या करीब 63,000 यूनिट्स और बाजार 6.2 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. वहीं, नीति आधारित विकास की स्थिति में करीब 74,000 यूनिट्स और 7.7 अरब डॉलर के पूंजी निवेश की संभावना जताई गई है.
महाराष्ट्र और हरियाणा से मिल सकता है मॉडल
रिपोर्ट में महाराष्ट्र और हरियाणा को सीनियर लिविंग क्षेत्र में नीतिगत पहल के उदाहरण के तौर पर पेश किया गया है. महाराष्ट्र में सीनियर लिविंग को प्लानिंग मानकों और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़कर औपचारिक पहचान देने की दिशा में कदम उठाए गए हैं. वहीं, हरियाणा में अनुमति प्रक्रिया को स्पष्ट करने और अतिरिक्त एफएआर जैसे प्रोत्साहनों से इस क्षेत्र को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है.
‘घर से अमीर, नकद से गरीब’ बुजुर्गों के लिए वित्तीय समाधान जरूरी
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्गों के पास घर और संपत्ति तो है, लेकिन नियमित नकदी प्रवाह सीमित है. ऐसे में ‘घर से अमीर, नकद से गरीब’ की स्थिति सीनियर लिविंग की अफोर्डेबिलिटी के सामने बड़ी चुनौती है. रिवर्स मॉर्गेज और बीमा से जुड़े उत्पाद इस समस्या का समाधान करने में मदद कर सकते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले वर्षों में सीनियर लिविंग का मॉडल केवल प्रॉपर्टी बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा. केयर और सर्विस आधारित मॉडल, खासकर किराये पर उपलब्ध सुविधाएं, अगले तीन से पांच वर्षों में तेजी से बढ़ सकती हैं.
टेक्नोलॉजी और केयर मॉडल पर बढ़ेगा जोर
सीनियर लिविंग के साथ मेमोरी केयर, कंटीन्यूम ऑफ केयर, इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड, वियरेबल डिवाइस और टेलीमेडिसिन जैसी सेवाओं का महत्व भी बढ़ने की उम्मीद है. हालांकि, प्रशिक्षित केयरगिवर्स की कमी और रियल एस्टेट की ऊंची लागत इस क्षेत्र के विस्तार में बड़ी बाधा बनी हुई है.
रिपोर्ट में सीनियर लिविंग सेवाओं पर जीएसटी व्यवस्था को सरल बनाने, रिवर्स मॉर्गेज को बढ़ावा देने, बीमा उत्पादों को सीनियर लिविंग से जोड़ने और अस्पतालों के साथ लंबी अवधि की लीज या एसेट-लाइट साझेदारी को प्रोत्साहित करने जैसे उपाय सुझाए गए हैं. साथ ही, इस पूरे क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीति ढांचा तैयार करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है. बढ़ती उम्र की आबादी के साथ भारत में सीनियर लिविंग अब एक सीमित रियल एस्टेट सेगमेंट नहीं रह गया है. आने वाले वर्षों में यह आवास, स्वास्थ्य सेवा, देखभाल, बीमा और वित्तीय सेवाओं को जोड़ने वाली एक बड़ी ‘सिल्वर इकोनॉमी’ का आधार बन सकता है.
बीमा नियामक ने 2019 की जांच के आधार पर की कार्रवाई, इवेंट मैनेजमेंट गतिविधियों की रिपोर्टिंग और दस्तावेजों को लेकर उठाए सवाल
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बीमा नियामक भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने ICICI लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस पर ₹1 करोड़ का जुर्माना लगाया है. नियामक की यह कार्रवाई 2019 में हुई जांच के दौरान कंपनी की आउटसोर्सिंग प्रैक्टिस, वेंडर मैनेजमेंट और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़ी कुछ कमियों के आधार पर की गई है. मामला कंपनी की सेल्स, मार्केटिंग और बिजनेस सपोर्ट गतिविधियों से जुड़े भुगतान और इवेंट मैनेजमेंट सेवाओं की रिपोर्टिंग से संबंधित है.
₹709.57 करोड़ के खर्च से जुड़ा मामला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वित्त वर्ष 2019 में ICICI लोम्बार्ड ने 'सेल्स, मार्केटिंग और बिजनेस सपोर्ट' के तहत ₹709.57 करोड़ खर्च किए थे. कंपनी के अनुसार, इसमें से करीब ₹35-37 करोड़ का भुगतान अन्य बीमा कंपनियों से जुड़े व्यक्तिगत एजेंटों को किया गया था.
IRDAI की जांच में इन भुगतानों और उनसे जुड़ी गतिविधियों को लेकर कंपनी की आउटसोर्सिंग व्यवस्था की समीक्षा की गई. नियामक ने पाया कि इवेंट मैनेजमेंट गतिविधियों में दूसरी बीमा कंपनियों के एजेंटों का इस्तेमाल किया गया था.
इवेंट मैनेजमेंट की रिपोर्टिंग पर सवाल
IRDAI के मुताबिक, कंपनी इन गतिविधियों को पर्याप्त सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स के साथ स्थापित करने में नाकाम रही. साथ ही, इन गतिविधियों को आउटसोर्स की गई गतिविधियों के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया गया और संबंधित खर्चों की आउटसोर्सिंग रिटर्न में भी रिपोर्टिंग नहीं की गई.
बीमा नियामक ने 7 सितंबर को जारी अपने आदेश में कहा कि इवेंट मैनेजमेंट सेवाओं को आउटसोर्स गतिविधि के तौर पर वर्गीकृत नहीं किए जाने के कारण कंपनी इन खर्चों को आउटसोर्सिंग रिटर्न में रिपोर्ट करने में विफल रही. नियामक के अनुसार, इससे समय पर रेगुलेटरी जांच नहीं हो सकी.
आउटसोर्सिंग और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर फोकस
IRDAI की कार्रवाई से बीमा कंपनियों के लिए आउटसोर्सिंग गतिविधियों की उचित पहचान, दस्तावेजीकरण और नियामकीय रिपोर्टिंग की अहमियत सामने आती है. नियामक लगातार बीमा कंपनियों के वेंडर मैनेजमेंट, आउटसोर्सिंग व्यवस्था और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े नियमों के अनुपालन पर जोर देता रहा है.
रिलायंस इंडस्ट्रीज पांच साल की अवधि वाले बॉन्ड के जरिए करीब ₹12,500 करोड़ जुटाने की तैयारी में है. इस इश्यू पर कंपनी 7.47% सालाना ब्याज की पेशकश करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) घरेलू बॉन्ड बाजार में करीब तीन साल बाद बड़ी वापसी की तैयारी में है. मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली कंपनी पांच साल की अवधि वाले बॉन्ड जारी कर करीब ₹12,500 करोड़ जुटाने की योजना बना रही है. इन बॉन्ड्स पर निवेशकों को 7.47% सालाना ब्याज मिलने की उम्मीद है. कंपनी की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब डॉलर में कर्ज की लागत के मुकाबले घरेलू रुपये में फंड जुटाना अपेक्षाकृत सस्ता पड़ रहा है.
पांच साल के बॉन्ड से जुटाएगी ₹12,500 करोड़
रिलायंस इंडस्ट्रीज पांच साल की अवधि वाले बॉन्ड के जरिए करीब ₹12,500 करोड़ जुटाने की तैयारी में है. इस इश्यू पर कंपनी 7.47% सालाना ब्याज की पेशकश करेगी. जानकारी के मुताबिक, 18 सितंबर को खत्म होने वाले सप्ताह में संस्थागत और अन्य पात्र निवेशकों से बॉन्ड के लिए बोलियां मंगाई जा सकती हैं. अगर यह इश्यू पूरा होता है तो नवंबर 2023 के बाद किसी रेटेड गैर-वित्तीय कंपनी की ओर से एक बार में जुटाई जाने वाली यह बड़ी रकम में से एक होगी. इससे घरेलू कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में रिलायंस की वापसी भी होगी.
डॉलर में कर्ज के मुकाबले रुपये में फंडिंग सस्ती
रिलायंस का घरेलू बाजार से कर्ज जुटाने का फैसला ब्याज दरों और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए अहम माना जा रहा है. हाल के महीनों में भारत में पांच साल की अवधि वाले बॉन्ड की यील्ड में गिरावट आई है. जून की शुरुआत से अब तक पांच साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 33 बेसिस पॉइंट नीचे आई है. दूसरी ओर, अमेरिका में ट्रेजरी यील्ड ऊंची बनी हुई है. ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए डॉलर में कर्ज लेना महंगा पड़ रहा है. इसके मुकाबले रुपये में घरेलू बाजार से फंड जुटाना रिलायंस के लिए ज्यादा किफायती विकल्प बन सकता है.
बड़े निजी बैंक होंगे इश्यू के अरेंजर
इस बॉन्ड इश्यू को पूरा करने के लिए देश के प्रमुख निजी बैंक अरेंजर की भूमिका निभाएंगे. रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से कुछ बैंक खुद भी बॉन्ड के एक हिस्से को सब्सक्राइब कर सकते हैं. इससे इश्यू को संस्थागत निवेशकों के बीच मजबूत मांग मिलने की संभावना है.
10 साल के बॉन्ड पर भी विचार
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पांच साल के बॉन्ड के अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज लंबी अवधि के कर्ज जुटाने के विकल्प पर भी विचार कर रही है. जानकारी के अनुसार, कंपनी 10 साल की मैच्योरिटी वाले बॉन्ड जारी करने की संभावना तलाश रही है. इसके लिए कंपनी की बैंकरों और संभावित बड़े निवेशकों के साथ बातचीत जारी है. कंपनी की यह रणनीति उसके वित्तीय पोर्टफोलियो में विविधता लाने और लंबी अवधि की फंडिंग जरूरतों को पूरा करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है.
दूसरी तिमाही में कारोबारी भरोसा बढ़ा, लेकिन कई कंपनियों ने कहा- जमीनी स्तर पर सुधार आर्थिक आंकड़ों की तुलना में कमजोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की मजबूत व्यापक आर्थिक वृद्धि का असर देश की करीब आधी कंपनियों के कारोबारी प्रदर्शन पर या तो नहीं पड़ा है या फिर इसका लाभ सीमित रूप से मिला है. भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के ताजा बिजनेस आउटलुक सर्वे में यह बात सामने आई है. सर्वे के नतीजे ऐसे समय आए हैं जब इस बात पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या आर्थिक वृद्धि के प्रमुख आंकड़े जमीनी स्तर पर कारोबारियों की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह दर्शा रहे हैं.
सीआईआई के सर्वे के मुताबिक, 13.4 प्रतिशत कंपनियों का मानना है कि मजबूत व्यापक आर्थिक आंकड़ों के बावजूद जमीनी कारोबारी परिस्थितियां कमजोर बनी हुई हैं. वहीं, 36.6 प्रतिशत कंपनियों ने कुछ सुधार की बात कही, लेकिन उनके मुताबिक यह सुधार व्यापक आर्थिक संकेतकों की तुलना में कम है. इस तरह दोनों वर्गों को मिलाकर कुल 50 प्रतिशत कंपनियों ने अर्थव्यवस्था की मजबूती और अपने कारोबारी प्रदर्शन के बीच अंतर की ओर इशारा किया.
दूसरी तिमाही में बढ़ा कारोबारी भरोसा
मैक्रो आर्थिक वृद्धि के कारोबार तक सीमित असर को लेकर चिंता के बावजूद जुलाई-सितंबर तिमाही में कारोबारी धारणा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. सीआईआई का समग्र कारोबारी भरोसा सूचकांक, जो मौजूदा कारोबारी परिस्थितियों और भविष्य की उम्मीदों दोनों को दर्शाता है, वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में बढ़कर 66 पर पहुंच गया. पहली तिमाही में यह 60.8 था. हालांकि, दूसरी तिमाही का यह स्तर पिछले साल की समान तिमाही के बराबर है. सीआईआई के अनुसार, तिमाही आधार पर भरोसे में आई तेज वृद्धि की प्रमुख वजह पश्चिम एशिया संघर्ष से जुड़ी बाधाओं में कमी रही.
कंपनियों को मिला असमान लाभ
सर्वे में यह भी सामने आया कि कुछ कंपनियों की वृद्धि व्यापक अर्थव्यवस्था की गति के अनुरूप रही है. करीब 11.3 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि उनके कारोबार की वृद्धि व्यापक आर्थिक गति के बराबर या उससे अधिक रही. वहीं, 29.4 प्रतिशत कंपनियों ने आर्थिक सुधार का स्पष्ट लाभ मिलने की बात कही, लेकिन यह लाभ समग्र आर्थिक वृद्धि की तुलना में कुछ कम रहा.
सर्वे में शामिल बाकी 9.3 प्रतिशत कंपनियों ने व्यापक आर्थिक वृद्धि और अपने कारोबारी प्रदर्शन के बीच संबंध को किस तरह देखा, इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है.
सीआईआई ने बताया कि इस सर्वे में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की 238 कंपनियों को शामिल किया गया. इसमें सभी उद्योग क्षेत्रों की सूक्ष्म, लघु, मध्यम और बड़ी कंपनियां तथा विभिन्न क्षेत्रों की कंपनियां शामिल थीं.
घरेलू मांग को लेकर बढ़ा भरोसा
घरेलू मांग को लेकर कंपनियों का रुख अपेक्षाकृत सकारात्मक रहा. सर्वे में शामिल 61 प्रतिशत कंपनियों को वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में घरेलू मांग बढ़ने की उम्मीद है. केवल 9.6 प्रतिशत कंपनियों ने मांग में कमी आने का अनुमान जताया है. इससे संकेत मिलता है कि पिछली तिमाही की तुलना में कंपनियों का मांग को लेकर भरोसा मजबूत हुआ है.
मांग में तेज वृद्धि की उम्मीद रखने वाली कंपनियों का अनुपात भी बढ़ा है. करीब 16 प्रतिशत कंपनियों ने दूसरी तिमाही में घरेलू मांग में 20 प्रतिशत से अधिक वृद्धि की उम्मीद जताई. पहली तिमाही में ऐसा मानने वाली कंपनियों का अनुपात 12.9 प्रतिशत था.
कारोबारी माहौल में जोखिम बरकरार
हालांकि, कंपनियों का एक बड़ा वर्ग अभी भी घरेलू मांग में सुधार की उम्मीद नहीं कर रहा है. करीब 29.4 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि दूसरी तिमाही में मांग पहली तिमाही के स्तर पर ही रह सकती है. वहीं, 6.1 प्रतिशत कंपनियों ने मांग में 5-20 प्रतिशत की गिरावट और 3.5 प्रतिशत ने 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट का अनुमान जताया.
सर्वे से भारतीय कारोबारी माहौल की मिली-जुली तस्वीर सामने आती है. एक तरफ कारोबारी भरोसा और मांग की उम्मीदों में सुधार हुआ है, वहीं दूसरी ओर व्यापक आर्थिक मजबूती का लाभ सभी कंपनियों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है. इससे संकेत मिलता है कि अर्थव्यवस्था के समग्र आंकड़े भले ही सकारात्मक बने हुए हैं, लेकिन कंपनियों के स्तर पर इसका असर अभी भी असमान है.
27 अक्टूबर से शुरू होगी नई उड़ान, सप्ताह में दो बार गुवाहाटी को सीधे बैंकॉक से जोड़ेगी; पूर्वोत्तर भारत की दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंच होगी आसान
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इंडिगो 27 अक्टूबर 2026 से गुवाहाटी और बैंकॉक के बीच नॉन-स्टॉप उड़ान सेवा शुरू करने जा रही है. यह गुवाहाटी से एयरलाइन की पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान होगी. इसके साथ ही पूर्वोत्तर भारत और थाईलैंड के बीच सीधी अंतरराष्ट्रीय हवाई कनेक्टिविटी भी स्थापित होगी.
नई गुवाहाटी-बैंकॉक सेवा सप्ताह में दो बार संचालित की जाएगी. नियमित उड़ानें 31 अक्टूबर से बुधवार और शनिवार को चलेंगी. वहीं, उद्घाटन के लिए 27 अक्टूबर को विशेष उड़ान संचालित की जाएगी. एयरलाइन ने बताया कि उड़ानों का कार्यक्रम नियामकीय मंजूरी के अधीन है.
उद्घाटन उड़ान के तहत बैंकॉक से गुवाहाटी जाने वाली उड़ान 6ई 1086 सुबह 8:50 बजे रवाना होकर 10:25 बजे गुवाहाटी पहुंचेगी. वहीं, गुवाहाटी से बैंकॉक जाने वाली उड़ान 6ई 1085 शाम 6:15 बजे रवाना होगी और रात 10:45 बजे बैंकॉक पहुंचेगी. सभी समय स्थानीय समयानुसार हैं.
पर्यटन और व्यापार को मिलेगा बढ़ावा
इंडिगो के मुताबिक, सीधी उड़ान सेवा से पूर्वोत्तर भारत और थाईलैंड के बीच पर्यटन और कारोबारी यात्राओं के नए अवसर पैदा होंगे. इससे पर्यटन, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. साथ ही, गुवाहाटी की दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक उभरते अंतरराष्ट्रीय हवाई केंद्र के रूप में स्थिति और मजबूत होगी.
गुवाहाटी इंडिगो के नेटवर्क का हिस्सा एयरलाइन के शुरुआती वर्षों से रहा है. वर्ष 2006 में इंडिगो की पहली दिल्ली-गुवाहाटी-इम्फाल उड़ान भी संचालित हुई थी. एयरलाइन ने कहा कि गुवाहाटी से अंतरराष्ट्रीय परिचालन शुरू करना पूर्वोत्तर क्षेत्र में कनेक्टिविटी बेहतर करने की उसकी निरंतर रणनीति का हिस्सा है.
थाईलैंड नेटवर्क का विस्तार
इंडिगो पहले से ही बैंकॉक को बेंगलुरु, भुवनेश्वर, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई से सीधी उड़ानों के जरिए जोड़ती है. इसके अलावा, बेंगलुरु, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई से फुकेत के लिए भी सीधी उड़ानें संचालित की जाती हैं. दिल्ली से क्राबी के लिए भी सीधी हवाई सेवा उपलब्ध है.
एयरलाइन 26 अक्टूबर 2026 से गया और बैंकॉक के बीच भी सीधी उड़ान शुरू करेगी. इंडिगो के अनुसार, इस सेवा से बौद्ध धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल गया और थाईलैंड के बीच सीधा हवाई संपर्क स्थापित होगा.
430 से अधिक विमानों का बेड़ा
इंडिगो वर्तमान में करीब 2,200 दैनिक उड़ानों का संचालन करती है. एयरलाइन के बेड़े में 430 से अधिक विमान हैं. इसका नेटवर्क 95 से अधिक घरेलू और 40 अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों तक फैला हुआ है. वित्त वर्ष 2026 में इंडिगो ने 12.3 करोड़ से अधिक यात्रियों को सेवा दी.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के प्रमुख तेल सप्लायर्स की सूची में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अमेरिका और नाइजीरिया टॉप 5 सप्लायर्स से बाहर हो गए हैं. उनकी जगह वेनेजुएला और ब्राजील ने ली है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में युद्ध और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत ने कच्चे तेल की आपूर्ति को बनाए रखने के लिए नए रास्ते तलाश लिए हैं. पिछले छह महीनों में भारत ने 31 नए देशों से तेल खरीदने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद आयात का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा देशों पर ही निर्भर रहा. इस दौरान रूस ने भारतीय तेल बाजार में अपनी पकड़ काफी मजबूत कर ली, जबकि इराक से होने वाला आयात तेजी से घट गया.
10 नए देशों से भी खरीदा कच्चा तेल
एनालिटिक्स फर्म केपलर के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च से अगस्त के बीच भारत ने 10 ऐसे देशों से कच्चा तेल खरीदा, जिनसे पिछले छह महीनों में कोई खरीद नहीं हुई थी. हालांकि, वेनेजुएला को छोड़कर इन नए सप्लायर्स का योगदान बेहद सीमित रहा. इन 9 देशों की संयुक्त हिस्सेदारी महज 1.4% रही, जबकि वेनेजुएला ने भारत के कुल कच्चे तेल आयात में करीब 5% हिस्सेदारी हासिल की.
इस अवधि में भारत के कुल तेल आयात में टॉप 5 सप्लायर्स की हिस्सेदारी 76% रही. इससे पहले के छह महीनों में यह आंकड़ा करीब 79% था. यानी नए स्रोत जुड़ने के बावजूद भारत का तेल आयात अभी भी कुछ बड़े सप्लायर्स पर काफी हद तक निर्भर है.
अमेरिका और नाइजीरिया टॉप 5 से बाहर
भारत के प्रमुख तेल सप्लायर्स की सूची में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अमेरिका और नाइजीरिया टॉप 5 सप्लायर्स से बाहर हो गए हैं. उनकी जगह वेनेजुएला और ब्राजील ने ली है. रूस, यूएई और सऊदी अरब अब भी भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं.
सप्लायर्स पर निर्भरता मापने वाले हेरफिंडाल-हिर्शमैन इंडेक्स यानी HHI में भी तेज बढ़ोतरी हुई है. यह मार्च-अगस्त अवधि में 1606 से बढ़कर 2513 हो गया, यानी करीब 56% की वृद्धि. 2500 से ऊपर का HHI अत्यधिक सप्लायर कंसंट्रेशन का संकेत माना जाता है.
रूस से तेल आयात में जबरदस्त उछाल
भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी पिछले छह महीनों में तेजी से बढ़ी है. यह 29% से बढ़कर 47% तक पहुंच गई. इस दौरान भारत का कुल कच्चा तेल आयात करीब 5% घटकर 4.77 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया. वहीं, इराक से होने वाले आयात में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई. भारत के कुल तेल आयात में इराक की हिस्सेदारी 18% से गिरकर महज 2% रह गई. इराक से करीब 8.20 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी आई, जिसकी भरपाई रूस से आयात बढ़ाकर की गई. रूस से आयात में करीब 7.70 लाख बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी हुई और अब भारत रूस से करीब 2.25 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीद रहा है.
नए सप्लायर्स से सीमित रही सप्लाई
भारत ने इस दौरान ईरान, इक्वाडोर, बहामास, अल्जीरिया और कनाडा समेत कई नए स्रोतों से भी कच्चा तेल खरीदा. हालांकि, इनमें से अधिकांश देशों से सप्लाई लंबे समय तक नहीं चली. कई नए सप्लायर्स ने छह महीनों में सिर्फ एक महीने भारत को कच्चा तेल भेजा.
उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, इसे भारत की स्थायी रणनीतिक शिफ्ट के तौर पर नहीं देखा जा सकता. पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र से संभावित सप्लाई बाधित होने की स्थिति में ग्लोबल ट्रेडर्स ने भारतीय रिफाइनरियों की तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए वैकल्पिक स्रोतों का इस्तेमाल किया.
कच्चे तेल की कीमतें फिर चढ़ीं
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भी तेजी देखने को मिली है. मंगलवार सुबह 7 बजे तक ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स करीब 97.04 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. यह कीमत करीब छह सप्ताह के उच्चतम स्तर के आसपास है.
भारत के लिए तेल की कीमतों में यह तेजी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी घरेलू जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में सप्लाई के नए स्रोत तलाशने के साथ-साथ रूस जैसे प्रमुख सप्लायर्स पर बढ़ती निर्भरता भी आगे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
सेबी का यह बदलाव भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 5 जून, 2026 के परिपत्र के बाद आया है. आरबीआई ने सामान्य रास्ते से सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले एफपीआई के लिए तय कन्संट्रेशन लिमिट की शर्त हटा दी थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए अनुपालन नियमों में बड़ी राहत दी है. अब केवल सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले एफपीआई को निवेशक समूह की जानकारी देने की जरूरत नहीं होगी. सेबी का यह फैसला ऐसे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बॉन्ड बाजार में निवेश की प्रक्रिया को आसान बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.
सभी सरकारी बॉन्ड निवेशकों तक बढ़ाई गई छूट
सेबी ने सोमवार को जारी परिपत्र के जरिए एफपीआई, डेजिग्नेटेड डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट्स (DDP) और पात्र विदेशी निवेशकों से जुड़े अपने मास्टर सर्कुलर में संशोधन किया है. इससे पहले यह छूट केवल फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के तहत सरकारी बॉन्ड में निवेश करने वाले एफपीआई तक सीमित थी. अब इसका दायरा बढ़ाकर उन सभी एफपीआई तक कर दिया गया है, जो केवल सरकारी ऋण प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं.
आरबीआई के फैसले के बाद बदला नियम
सेबी का यह बदलाव भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 5 जून, 2026 के परिपत्र के बाद आया है. आरबीआई ने सामान्य रास्ते से सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले एफपीआई के लिए तय कन्संट्रेशन लिमिट की शर्त हटा दी थी. सेबी के मुताबिक, जब ऐसी कन्संट्रेशन लिमिट ही लागू नहीं है तो इन एफपीआई के लिए निवेशक समूह की पहचान करना भी जरूरी नहीं रह जाता.
तुरंत प्रभाव से लागू हुआ संशोधन
सेबी ने कहा है कि संशोधित प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं. नियामक ने डिपॉजिटरी, कस्टोडियन और डीडीपी को अपने सिस्टम में जरूरी बदलाव करने के निर्देश भी दिए हैं, ताकि नए नियमों को लागू किया जा सके.
विदेशी डेट निवेशकों के लिए अनुपालन होगा आसान
निवेशक समूह का ब्योरा देने की अनिवार्यता हटने से सॉवरिन वेल्थ फंड, केंद्रीय बैंक और भारतीय बॉन्ड बाजार में निवेश करने वाले अन्य बड़े डेट-केंद्रित विदेशी निवेशकों के लिए अनुपालन प्रक्रिया आसान होने की उम्मीद है. सेबी अब तक एफपीआई के बीच मालिकाना हक और नियंत्रण पर नजर रखने के साथ-साथ सेक्टर या किसी कंपनी में निवेश की सीमा लागू करने के लिए निवेशक समूह और लाभार्थी मालिकों से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल करता रहा है.
सोमवार को सेंसेक्स 382.62 अंक यानी 0.50 फीसदी की गिरावट के साथ 76,132.81 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 118 अंक यानी 0.50 फीसदी टूटकर 23,779.15 पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच घरेलू शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला सोमवार को भी जारी रहा. सेंसेक्स और निफ्टी दोनों करीब 0.50 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए. पिछले चार हफ्तों से बाजार पर दबाव बना हुआ है और निवेशकों की नजर अब वैश्विक घटनाक्रम के साथ-साथ कंपनियों से जुड़े अहम कॉरपोरेट अपडेट पर है.
सेंसेक्स 382 अंक लुढ़का, निफ्टी भी लाल निशान में
सोमवार को कारोबार खत्म होने पर सेंसेक्स 382.62 अंक यानी 0.50 फीसदी की गिरावट के साथ 76,132.81 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 118 अंक यानी 0.50 फीसदी टूटकर 23,779.15 पर आ गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में इन्फोसिस सबसे ज्यादा दबाव में रहा और करीब 3.81 फीसदी की गिरावट के साथ 1,087 रुपये पर बंद हुआ.
इन शेयरों में रही तेजी और गिरावट
बाजार में कुछ चुनिंदा शेयरों ने कमजोरी के बीच बढ़त दर्ज की. सेंसेक्स में लार्सन एंड टुब्रो, भारती एयरटेल और मारुति प्रमुख गेनर्स रहे. वहीं, इन्फोसिस, टेक महिंद्रा और टाटा स्टील सबसे ज्यादा दबाव में रहे. निफ्टी में अपोलो हॉस्पिटल 1.27 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. इसके बाद लार्सन एंड टुब्रो 0.88 फीसदी और कोल इंडिया 0.84 फीसदी चढ़े. दूसरी ओर, इन्फोसिस 3.81 फीसदी, एसबीआई लाइफ 2.42 फीसदी और एचडीएफसी लाइफ 2.42 फीसदी टूटे.
शुक्रवार को कैसा रहा था बाजार?
पिछले कारोबारी सत्र यानी 4 सितंबर को सेंसेक्स 76,657.02 के स्तर पर खुला था. कारोबार के दौरान यह 76,883.14 के हाई और 76,515.43 के लो तक गया. अंत में सेंसेक्स 0.48 फीसदी की बढ़त के साथ 76,515.43 पर बंद हुआ था. निफ्टी 23,910.90 पर खुला और 24,005.75 का हाई तथा 23,895.85 का लो बनाया. कारोबार के अंत में निफ्टी 0.10 फीसदी की तेजी के साथ 23,897.70 पर बंद हुआ था.
गिरावट के पीछे क्या हैं बड़ी वजहें?
घरेलू शेयर बाजार में कमजोरी के पीछे पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव में बढ़ोतरी और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी अहम वजहों में शामिल हैं. वैश्विक स्तर पर बढ़ी अनिश्चितता का असर निवेशकों के सेंटीमेंट पर पड़ा है. इसके अलावा विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और बाजार में लगातार बनी बिकवाली पर भी निवेशकों की नजर है.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
मंगलवार के कारोबार में Swiggy, Maruti Suzuki India, Garuda Construction, PVR INOX, Arisinfra Solutions, Asian Energy Services, Adani Power और RBL Bank फोकस में रह सकते हैं. Swiggy अपनी स्टेप-डाउन सब्सिडियरी Lynks Logistics में पूरी हिस्सेदारी Trustroot Internet को शेयर-स्वैप डील के जरिए बेचने वाली है, जबकि Lynks के B2B डिस्ट्रीब्यूशन कारोबार ने वित्त वर्ष 2026 में करीब 668 करोड़ रुपये का राजस्व दर्ज किया था. Maruti Suzuki India ने चुनिंदा कार मॉडलों की कीमतों में 20,000 रुपये तक की बढ़ोतरी की है. Garuda Construction की सब्सिडियरी ने जेद्दा में 93 मंजिला टावर के निर्माण के लिए समझौता ज्ञापन किया है, जिससे अगले पांच वर्षों में करीब 1,800 करोड़ रुपये की अनुमानित आय हो सकती है. PVR INOX ने कथित 200 करोड़ रुपये की किकबैक डील से जुड़े मामले में कहा है कि शुरुआती जांच में रिश्वतखोरी के कोई सबूत नहीं मिले हैं. Arisinfra Solutions की सब्सिडियरी को बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड स्थित Morning Mist रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट के लिए नया ऑर्डर मिला है. Asian Energy Services की सब्सिडियरी Oilmax Energy को अरुणाचल प्रदेश सरकार से Pakro Vanadium and Graphite Block के लिए Composite Licence से जुड़ा Letter of Intent मिला है. वहीं, Adani Power को GVK Energy के अधिग्रहण के लिए Letter of Intent मिला है, जबकि RBL Bank के बोर्ड ने विदेशों से 1 अरब डॉलर तक जुटाने को मंजूरी दी है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
रक्षा खरीद परिषद (DAC) ने थल सेना, नौसेना और वायु सेना के लिए हेलीकॉप्टर, रडार, जैमर, वाहन और अन्य सैन्य उपकरणों की खरीद को दी आवश्यकता की स्वीकृति
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में सोमवार को हुई रक्षा खरीद परिषद (DAC) की बैठक में तीनों सेनाओं के लिए करीब ₹1.10 लाख करोड़ की रक्षा खरीद योजनाओं को आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) दी गई. खास बात यह है कि इन प्रस्तावों में करीब 98 फीसदी खरीद भारतीय उद्योग से की जाएगी. इससे एक ओर सेना की परिचालन क्षमता बढ़ेगी, वहीं घरेलू रक्षा विनिर्माण को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा.
बैठक में थल सेना, नौसेना और वायु सेना के लिए कई आधुनिक सैन्य प्रणालियों और उपकरणों की खरीद के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई. इनमें सीबीआरएन टोही वाहन, हाई मोबिलिटी वाहन, एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर, रडार, जैमर, ब्रिज सिस्टम और अन्य रक्षा उपकरण शामिल हैं.
थल सेना के लिए सीबीआरएन टोही वाहन और हाई मोबिलिटी वाहन
भारतीय थल सेना के लिए रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (CBRN) खतरों की पहचान करने वाले टोही वाहन खरीदे जाएंगे. ये वाहन संवेदनशील या प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, निगरानी और उन्हें चिह्नित करने में मदद करेंगे. इसके अलावा हाई मोबिलिटी वाहनों की खरीद को भी मंजूरी दी गई है. इनकी मदद से कठिन और दुर्गम इलाकों में सैनिकों तथा जरूरी सैन्य सामान की आवाजाही बेहतर होगी. इससे सेना की अभियान क्षमता और लॉजिस्टिक सपोर्ट मजबूत होने की उम्मीद है. सेना के लिए खुद चलने वाली मैकेनिकल माइन लेयर भी खरीदी जाएगी. इन मशीनों के जरिए मुश्किल इलाकों में तेजी से बारूदी सुरंग बिछाने की क्षमता बढ़ेगी.
हेलीकॉप्टर और ब्रिज सिस्टम से बढ़ेगी अभियान क्षमता
थल सेना और वायु सेना के लिए एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) की खरीद के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिली है. ये हेलीकॉप्टर अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में सैन्य अभियानों को अंजाम देने में उपयोगी होंगे. इसके अलावा थल सेना के लिए ट्रॉल टैंक और सर्वत्र ब्रिज सिस्टम की खरीद को मंजूरी दी गई है. इन प्रणालियों की मदद से दुर्गम इलाकों में सैनिकों और सैन्य वाहनों की आवाजाही के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जा सकेगा.
नौसेना को मिलेंगे नए अरुध्रा रडार
भारतीय नौसेना की निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए अरुध्रा रडार की खरीद को मंजूरी दी गई है. ये रडार नौसेना के विभिन्न हवाई ठिकानों पर मौजूद पुराने एयर रूट सर्विलांस रडार की जगह लगाए जाएंगे. इसके साथ ही मरीन गैस टर्बाइन के डिजाइन और विकास तथा बाद में इसकी खरीद के प्रस्ताव को भी स्वीकृति दी गई है. मरीन गैस टर्बाइन युद्धपोतों की प्रणोदन प्रणाली का अहम हिस्सा होती है. देश में इसके विकास से भविष्य में इस क्षेत्र में विदेशी निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है.
वायु सेना की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता होगी मजबूत
वायु सेना के लड़ाकू विमानों, परिवहन विमानों और हेलीकॉप्टरों की युद्धक क्षमता बढ़ाने से जुड़े कई प्रस्तावों को भी मंजूरी मिली है. इसके अलावा जमीन पर तैनात किए जाने वाले मल्टी-पर्पज जैमर की खरीद को भी स्वीकृति दी गई है. ये जैमर दुश्मन के रडार और संचार प्रणालियों को बाधित करने में मदद कर सकते हैं. इससे भारतीय वायु सेना की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता को मजबूती मिलेगी.
कागजी पास की जगह स्मार्ट कार्ड
तीनों सेनाओं में डिफेंस फोर्सेज सिक्योर एक्सेस कार्ड (DEFSAC) सिस्टम लागू करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई है. इसके तहत मौजूदा कागजी पहचान पत्र, पास और परमिट की जगह रेडियो फ्रीक्वेंसी पहचान तकनीक से लैस स्मार्ट कार्ड जारी किए जाएंगे.
इस व्यवस्था का उद्देश्य सैन्य प्रतिष्ठानों में प्रवेश और पहचान की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और तकनीक आधारित बनाना है. कुल मिलाकर, DAC के इन फैसलों से तीनों सेनाओं की परिचालन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू रक्षा उद्योग को भी बड़े स्तर पर ऑर्डर मिलने की उम्मीद है.
MCX अब भारत का सबसे तेजी से बढ़ता जुआघर है और सेबी इसे जल्द ही को-लोकेशन की सुविधा देने जा रहा है. लाखों रिटेल ट्रेडर्स को ऐसे बाजार में धकेला जा रहा है, जिस पर विकल्पों का दबदबा है, जहां टैक्स इक्विटी के मुकाबले बहुत कम है और नियामक ने एक बार भी यह प्रकाशित नहीं किया है कि वे कितना नुकसान उठा रहे हैं. जेन स्ट्रीट जैसी शार्क पहले ही दरवाजे पर खड़ी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
भारत में कहीं एक ट्रेडर है, जिसके खाते में ₹5,000 हैं. उसके पास कोई रिफाइनरी नहीं है, वह कच्चा तेल आयात नहीं करता, उसने वेस्ट टैक्सेस इंटरमीडिएट (WTI) का एक बैरल कभी देखा नहीं है और न ही कभी देखेगा. उसके पास एक ऐप, एक स्क्रीन और एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट है, जो एक खास दोपहर को समाप्त हो जाता है. उसे लगता है कि उसने तेल बाजार का एक हिस्सा खरीदा है. लेकिन ऐसा नहीं है. और भारत के कमोडिटी एक्सचेंज MCX पर उसके जैसे 20.9 लाख ट्रेडर्स हैं, जो एक साल पहले 13 लाख थे.
जब मोदी सरकार ने इक्विटी F&O पर टैक्स बढ़ाया था, तो इसका आधार रिटेल निवेशकों को "इक्विटी कैसीनो" में अपनी जीवनभर की बचत गंवाने से बचाना था. यही वह आधार है, जिस पर मौजूदा सेबी प्रमुख तुहिन कांता पांडे ने अपना नेतृत्व खड़ा किया है और सही भी है. लेकिन अधिकारियों के कदमों ने लाखों अनजान रिटेल ट्रेडर्स का एक बड़े और खतरनाक तरीके से तेजी से बढ़ते कमोडिटी सट्टे की ओर पलायन करा दिया है.
कमोडिटी बाजारों में टैक्स स्टॉक मार्केट के शुल्क का एक अंश है और इक्विटी के विपरीत सेबी ने एक बार भी यह प्रकाशित नहीं किया है कि रिटेल निवेशक MCX पर कितना नुकसान उठा रहे हैं. और जिन वैश्विक शार्क ने भारत के इक्विटी बाजार में रिटेल ट्रेडर्स के दूसरी तरफ रहकर अरबों डॉलर कमाए, उनमें जेन स्ट्रीट भी शामिल है, अब उन्हें कमोडिटी कैसीनो की चाबियां दी जा रही हैं, क्योंकि सेबी MCX के अंदर को-लोकेशन सर्वर रैक को मंजूरी देने की तैयारी कर रहा है.
को-लोकेशन किसी कंपनी को कतार में सबसे आगे पहुंचने के लिए पैसे खर्च करने की सुविधा देता है, उसकी मशीनें एक्सचेंज के अंदर बैठती हैं, ऑर्डर मिलाने वाले इंजन से केबल के जरिए जुड़ी होती हैं और राजकोट में कहीं बैठे व्यक्ति से कुछ मिलियनवें सेकंड पहले हर कीमत को देख और उस पर कार्रवाई कर सकती हैं.
दूसरी ओर, MCX पहले ही यह रुख अपना चुका है कि उसे FPIs को ट्रेड करने की अनुमति देने के लिए सेबी की मंजूरी की जरूरत नहीं है.
इक्विटी से कमोडिटी: एक मुसीबत से निकलकर दूसरी में
इक्विटी डेरिवेटिव्स पर दबाव वास्तविक और जानबूझकर बनाया गया था. Securities Transaction Tax अक्टूबर 2024 में और फिर अप्रैल 2026 से बढ़ाया गया, जिससे इक्विटी फ्यूचर्स पर 0.05 प्रतिशत और Options पर 0.15 प्रतिशत टैक्स हो गया. सरकार ने खुले तौर पर कहा कि इसका उद्देश्य अल्पकालिक सट्टेबाजी वाले कारोबार को हतोत्साहित करना था. सेबी ने लॉट साइज और कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू बढ़ाई, एक्सपायरी घटाई और नियम कड़े किए. कुल मिलाकर इक्विटी F&O पर पूरी तरह दबाव बनाया गया.
यह काम कर गया. पिछले साल इक्विटी डेरिवेटिव्स में व्यक्तिगत ट्रेडर्स की संख्या करीब 20 प्रतिशत घटी, नए ट्रेडर्स की संख्या करीब 40 प्रतिशत कम हुई और SEBI ने इस गिरावट को सफलता के रूप में दर्ज किया.
गल वाले कमरे पर नजर डालिए
Commodities Transaction Tax 2013 से नहीं बदला है, फ्यूचर्स पर 0.01 प्रतिशत और Options पर प्रीमियम का 0.05 प्रतिशत. तेरह साल तक इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ, जबकि डेरिवेटिव्स में भारतीयों के जुआ खेलने को रोकने के लिए दो बार टैक्स नीति बनाई गई. अब Nifty पर दांव लगाने पर MCX पर Gold पर दांव लगाने की तुलना में टैक्स तीन गुना अधिक लगता है. एक स्टॉक Future की लागत Crude से पांच गुना ज्यादा है. लॉट साइज भी यही कहानी बताते हैं: इक्विटी में इन्हें बढ़ाकर छोटे ट्रेडर को बाहर करने की कोशिश की गई, जबकि MCX पर इन्हें लागत के एक अंश पर ही रखा गया. क्या यह जानबूझकर किया गया, सेबी ? MCX के शेयर की कीमत कौन बढ़ते देखना चाहता है?
इसे किसने तैयार किया?
इन्हीं 12 महीनों के दौरान MCX पर ट्रेडर्स की संख्या 13 लाख से बढ़कर 20.9 लाख हो गई, जिनमें ज्यादातर रिटेल ग्राहक हैं. केवल जून तिमाही में ही 13.72 लाख लोगों ने ट्रेड किया, जबकि एक साल पहले यह संख्या 7.03 लाख थी.
आप एक कमरे में दांव की कीमत बढ़ाते हैं, अगले कमरे में उसी दांव को बिना बदलाव के छोड़ देते हैं, दोनों कमरों के बीच का दरवाजा खुला रखते हैं और फिर भीड़ के दूसरे कमरे में चले जाने पर हैरानी जताते हैं. इसमें से कुछ भी चोरी-छिपे नहीं हुआ. इनमें से हर कदम दिन के उजाले में उन लोगों ने लिया, जिन्हें अच्छी तरह पता था कि दूसरे कमरे में कितना शुल्क लिया जा रहा है. यह नियमन नहीं है. यह कमोडिटी सट्टे में तेजी लाने की इंजीनियरिंग है.
SEBI, क्या यह एक बड़ी सफलता है?
तेजी
MCX के FY26 के नतीजों में एक आंकड़ा है, जिसे सेबी मुख्यालय में नियामकीय समीक्षा शुरू करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए था. ऐसा नहीं हुआ.
Options में औसत दैनिक कारोबार 146 प्रतिशत बढ़कर ₹4.71 लाख करोड़ हो गया. फ्यूचर्स का कारोबार ₹64,407 करोड़ था. गणना करने पर पता चलता है कि भारत के कमोडिटी एक्सचेंज पर अब कारोबार किए जाने वाले हर एक रुपये में करीब 87 पैसे एक Option हैं, कीमत पर लगाया गया एक दांव, जिसका निपटान नकद में होता है, जिसमें न कुछ खरीदा जाता है, न बेचा जाता है, न स्टोर किया जाता है और न डिलीवरी की जाती है.
Bullion का कारोबार एक ही साल में 496 प्रतिशत बढ़ गया. ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि भारत ने अपने सोने के आयात की हेजिंग शुरू कर दी, बल्कि इसलिए कि सोना तेजी से ऊपर गया और लाखों लोगों ने पाया कि वे ₹40 में उस पर पोजीशन ले सकते हैं. Crude भी यही कहानी बताता है.
Options में जुआ
Options किसी भी एक्सचेंज पर सट्टेबाजी का सबसे खुला रूप हैं. MCX पर वे इससे भी बदतर हैं, एक अत्यधिक लीवरेज वाला डेथ ट्रैप, एक डेरिवेटिव का डेरिवेटिव, जहां राजकोट में बैठा व्यक्ति किसी कमोडिटी पर बिल्कुल भी दांव नहीं लगा रहा, बल्कि उस कमोडिटी के Futures Contract की कीमत पर दांव लगा रहा है. यह एक गणितीय भ्रम है और इसे इस तरह तैयार किया गया है कि छोटे ट्रेडर की पूंजी खत्म हो जाए.
क्योंकि MCX पर किसी Option का underlying कमोडिटी नहीं है. वह एक फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट है. अगर उसका Option मनी में खत्म होता है, तो उसे कोई बैरल नहीं मिलता; एक्सचेंज की अपनी भाषा में वह क्रूड ऑयल फ्यूचर्स में एक पोजीशन में बदल जाता है.
और MCX के क्रूड ऑयल फ्यूचर्स का निपटान नकद में होता है. उस छोर पर भी कोई बैरल नहीं है. कॉन्ट्रैक्ट को New York Mercantile Exchange पर West Texas Intermediate (WTI) की कीमत के आधार पर रुपये में बंद किया जाता है.
इसलिए यह श्रृंखला एक Option से Futures Contract, फिर कैश सेटलमेंट और उसके बाद न्यूयॉर्क में तय होने वाली एक संख्या तक जाती है और इसमें किसी भी बिंदु पर तेल शामिल नहीं होता. किसी भारतीय रिफाइनरी ने कभी MCX से क्रूड की डिलीवरी नहीं ली है, क्योंकि सामान्य कारण यह है कि MCX क्रूड की डिलीवरी करता ही नहीं है. आयातक और तेल कंपनियां अपनी हेजिंग विदेशों में, डॉलर में, उन एक्सचेंजों पर करती हैं जहां वास्तव में बैरल मौजूद होते हैं.
राजकोट में बैठा व्यक्ति न तो उस बैरल को देखता है, न उसका मालिक होता है और न ही उसे ऐसा करने की जरूरत है. उसे सिर्फ इतना चाहिए कि उसके पैसे खत्म होने से पहले संख्या में बदलाव आ जाए.
अपनी इन्वेंट्री की हेजिंग करने वाला ज्वैलर वह नहीं कर रहा है, जो यह व्यक्ति कर रहा है, और न ही वह एयरलाइन जो ईंधन की कीमत पहले से तय कर रही है. ये ऐसे कारोबार हैं जो वास्तविक आर्थिक जोखिम से बचाव कर रहे हैं और डेरिवेटिव्स वास्तव में इन्हीं के लिए बनाए गए थे. ₹5,000 वाले ट्रेडर के पास न तेल है, न रिफाइनरी, न कार्गो और न ही बचाने के लिए कोई चीज. वह किसी कीमत को लेकर एक राय बना रहा है और समय खत्म होने से पहले उसे बेचने की उम्मीद कर रहा है. यह सट्टेबाजी है और किसी मान्यता प्राप्त एक्सचेंज पर सट्टा लगाना अपने आप में अवैध नहीं है. क्या यह केवल सट्टेबाजी तक सीमित रहता है, यह कानून का सवाल है और यह इस जांच के अगले हिस्से का विषय है.
इस बीच एक्सचेंज को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कैसा प्रदर्शन करता है. जब वह हारता है तो MCX नहीं हारता और जब वह जीतता है तो MCX नहीं जीतता; वह ट्रेड करने पर शुल्क लेता है, दूसरी तरफ मौजूद व्यक्ति के ट्रेड करने पर भी शुल्क लेता है और यह शुल्क चाहे पोजीशन हेज हो, दांव हो या गलती, हर स्थिति में लिया जाता है. उसका उत्पाद टर्नओवर है और उस टर्नओवर के परिणामस्वरूप कभी कोई बैरल हाथ बदलता है या नहीं, यह किसी और की समस्या है.
यहां पूंजी निर्माण कहां है? निवेश कहां है? आखिर यह बाजार खुद के अलावा किस चीज को वित्तपोषित कर रहा है?
कौन पहले पहुंचता है
को-लोकेशन किसी कंपनी को अपनी मशीनें एक्सचेंज की इमारत के अंदर लगाने की सुविधा देता है. ये मशीनें ऑर्डर मिलाने वाले इंजन से सीधे केबल के जरिए जुड़ी होती हैं, जिससे ऐसी कतार में, जहां क्रम पूरी तरह पहुंचने के समय से तय होता है, उसके ऑर्डर शहर पार करने के बजाय एक कमरे को पार करते हैं.
भौतिक अर्थव्यवस्था में किसी को कभी इसलिए बर्बाद नहीं होना पड़ा कि किसी हेज को तीन मिलीसेकंड की बजाय तीन सौ माइक्रोसेकंड लगे. ज्वैलर को इसकी जरूरत नहीं है. रिफाइनर को इसकी जरूरत नहीं है. केवल एक तरह की कंपनी है, जिसके लिए ये माइक्रोसेकंड गंभीर रकम के बराबर हैं और वह ऐसी कंपनी नहीं है जिसने कभी किसी चीज की डिलीवरी ली हो.
तो MCX में को-लोकेशन - किस खुशी के लिए? किसके फायदे के लिए?
हमारे पास इसका रिकॉर्ड है. 3 जुलाई 2025 को सेबी ने आरोप लगाया कि जेन स्ट्रीट ने एक्सपायरी वाले दिनों में इंडेक्स के स्तरों में हेरफेर किया और ₹4,844 करोड़ जब्त किए, यह भारत के इतिहास में इस तरह का सबसे बड़ा आदेश था और दर्ज किया कि कंपनी ने जनवरी 2023 से मार्च 2025 के बीच भारत में इंडेक्स Options से ₹44,358 करोड़ कमाए थे. उसी बाजार में पिछले साल सेबी के अपने आंकड़ों के अनुसार, प्रॉपराइटरी डेस्क और विदेशी निवेशकों ने करीब ₹58,000 करोड़ का सकल मुनाफा कमाया, जिसमें 99 प्रतिशत हिस्सा एल्गोरिदम का था और 87.7 प्रतिशत व्यक्तिगत ट्रेडर्स को नुकसान हुआ.
यह अपने आप में MCX में को-लोकेशन के खिलाफ पूरा मामला होना चाहिए, और इसे नियामक ने खुद लिखा है.
आज भारतीय कमोडिटी डेरिवेटिव्स में को-लोकेशन पर प्रतिबंध है और यह प्रतिबंध किसी चूक की बजाय एक निशान है. National Stock Exchange में प्राथमिकता वाले सर्वर एक्सेस और डार्क फाइबर भारतीय वित्तीय क्षेत्र के सबसे बड़े तकनीकी घोटाले की पहचान बन गए थे. जून 2025 में NSE ने ₹1,388 करोड़ देकर मामला निपटाया, पूर्व अधिकारियों के खिलाफ मिलीभगत के सबूत न मिलने के कारण आरोप हटा दिए गए और किसी को किसी भी अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया. यही मिसाल है. यही वह कीमत है, जो इस देश ने "दक्षता" के लिए चुकाई.
MCX की भी अपनी एक फाइल है. T R Chadha & Co LLP द्वारा किए गए फोरेंसिक ऑडिट और 1 फरवरी 2019 की एक आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया कि 2016 में एक शैक्षणिक संस्थान के साथ हुए समझौते के तहत उपलब्ध कराया गया डेटा, जिस पर उसकी ओर से सुजान थोमस ने हस्ताक्षर किए थे, वह ऐतिहासिक सामग्री नहीं थी, जिसकी वास्तविक शोध के लिए जरूरत होती है, बल्कि हर सुबह करीब नौ बजे, बाजार खुलने से ठीक पहले लिया गया लाइव टिक-बाय-टिक फीड था. इसमें अन्य चीजों के अलावा वह अंतर भी शामिल था, जो एक ट्रेडर द्वारा प्रदर्शित मात्रा और उसके पास वास्तव में मौजूद मात्रा के बीच था. सेबी का जवाब एक पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर को नोटिस भेजना था. न कोई आपराधिक जांच, न कोई सार्वजनिक आदेश, न बोर्ड की जवाबदेही. फाइल शांत हो गई और अब तक शांत है.
अब इस इतिहास को इस तथ्य के साथ रखिए: अक्टूबर 2018 में सेबी ने NSE और MCX के विलय की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. बैंकर पहले ही नियुक्त किए जा चुके थे, लेकिन विशेष रूप से इसलिए क्योंकि को-लोकेशन का मामला अनसुलझा था. कभी को-लोकेशन ही वह कारण था जिसकी वजह से MCX को छुआ नहीं जा सकता था. मई 2025 से SEBI की एक समिति MCX को खुद को-लोकेशन देने पर चर्चा कर रही है.
जरूरत क्या है, सेबी? शार्क को रिटेल ट्रेडर्स के और करीब लाने की?
स्पीड पर ट्रेड करने वाली कंपनियों ने स्थिति को पहले ही समझ लिया है. जब NCDEX ने अगस्त 2025 में ₹500 करोड़ से अधिक जुटाए, तो निवेशकों की सूची में दो नाम Citadel Securities के ₹17 करोड़ और Tower Research के ₹34 करोड़ थे, हाई-फ्रीक्वेंसी कंपनियां किसी एक सर्वर रैक के लगाए जाने से पहले ही भारतीय कमोडिटी एक्सचेंज में निवेश कर रही थीं. कोई भी व्यक्ति टेबल के नियम बनते हुए देखे बिना उस घर में निवेश नहीं करता.
विदेशी पैसा भी सामने के दरवाजे से अंदर लाया जा रहा है. 11 अगस्त 2026 को सेबी ने भारतीय कमोडिटी कॉन्ट्रैक्ट्स क्रूड, गैस, गोल्ड, सिल्वर, बेस मेटल्स को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए व्यापक रूप से खोलने का प्रस्ताव दिया. क्योंकि ये निवेशक कानूनी रूप से डिलीवरी नहीं ले सकते, इसलिए प्रस्ताव में ऐसी व्यवस्था बनाई गई है जिससे यह सुनिश्चित हो कि उन्हें कभी डिलीवरी न लेनी पड़े: डिलीवरी विंडो से तीन दिन पहले बाहर निकलना या रोल करना, एक दिन पहले भारतीय सदस्य को स्वतः हस्तांतरण और उस पोजीशन को विरासत में लेने वाले व्यक्ति के लिए शुल्क. कुछ भी खरीदा नहीं जाता, किसी चीज को वित्तपोषित नहीं किया जाता, किसी उत्पादक का जोखिम कम नहीं होता.
FPI में "I" का कोई काम ही नहीं रह गया है. जिसे बुलाया जा रहा है, वह पूंजी नहीं है. यह सिर्फ MCX के शेयर की कीमत बढ़ाने के लिए वॉल्यूम है और भारत के रिटेल निवेशकों को इसका कोई लाभ नहीं है.
₹5,000 वाला ट्रेडर भी उसी कतार में है. वह बस कतार में सबसे आगे से बहुत दूर है.
बोर्डरूम में नियामक
इनमें से हर फैसला को-लोकेशन, विदेशी पैसा, नए कॉन्ट्रैक्ट, अप्रैल 2026 में सेबी द्वारा MCX को जिस कोयला एक्सचेंज को शामिल करने की मंजूरी दी गई और जिसमें ₹100 करोड़ की प्रतिबद्धता है, आज सेबी की फाइल में मौजूद है. इनमें से हर फैसला एक सूचीबद्ध कंपनी के लिए वास्तविक धन के लिहाज से महत्वपूर्ण है.
और 28 मई 2026 को MCX ने अपने बोर्ड में सेबी के एक व्यक्ति को शामिल किया.
संतोष कुमार मोहंती को एक्सचेंज का Public Interest Director नियुक्त किया गया, यह कोई सामान्य डायरेक्टर पद नहीं है, बल्कि नियमों में मौजूद वह सीट है, जिसका एक उद्देश्य है: एक्सचेंज के अपने व्यावसायिक हितों के खिलाफ जनता का प्रतिनिधित्व करना.
उनके सीवी की तुलना इस पद से कीजिए. मोहंती जून 2018 से जून 2023 तक सेबी के पूर्णकालिक सदस्य रहे. इससे पहले सितंबर 2015 से वह सेबी में कार्यकारी निदेशक थे, ठीक उसी महीने जब वायदा बाजार आयोग का विलय हुआ और कमोडिटी एक्सचेंज सेबी के अधिकार क्षेत्र में आए. इससे पहले वह स्वयं वायदा बाजार आयोग में निदेशक थे, जो एमसीएक्स का मूल नियामक था. सेबी में उनके अधीन जिन विभागों की जिम्मेदारी थी, उनमें बाजार नियमन, निगरानी और जांच शामिल थे. यही वे कार्य थे, जिनके पास इस एक्सचेंज की आंकड़ा फाइल और कमोडिटी में सट्टेबाजी की अधिकता से जुड़े सभी सवाल होने चाहिए थे.
जनहित निदेशकों का चयन केवल एक्सचेंज नहीं करते. उनकी नियुक्ति सेबी की मंजूरी से होती है. इसलिए नियामक ने अपने ही पूर्व पूर्णकालिक सदस्य को उस कुर्सी पर मंजूरी दी, जिसका उद्देश्य इसी एक्सचेंज से जनता के हितों की रक्षा करना है.
इस घर का जनहित निदेशक वह व्यक्ति है, जो कभी लाइसेंस अपने हाथ में रखता था.
यह कोई तकनीकी उल्लंघन नहीं है और यहां यह आरोप भी नहीं है कि मोहंती ने अपने पद पर रहते हुए कुछ अनुचित किया. समस्या संरचनात्मक है और संरचनात्मक होने के कारण और भी गंभीर है. नियामक की स्वतंत्रता किसी के अच्छे इरादों का मामला नहीं है; यह इस बात का मामला है कि इमारत के अंदर मौजूद लोग बाहर अपने लिए क्या अवसर इंतजार करते देख सकते हैं. एमसीएक्स की किसी फाइल पर काम कर रहा हर अधिकारी अब जानता है कि ₹81,000 करोड़ के सूचीबद्ध एक्सचेंज में निदेशक मंडल की एक सीट मौजूद है और यह भी जानता है कि पिछली सीट किसे मिली.
अगर सेबी को लगता है कि यह उचित है, तो उसे वह कारण सार्वजनिक करना चाहिए जिसके आधार पर उसने इस नियुक्ति को मंजूरी दी. जनहित की निगरानी कहां खत्म होती है और एक्सचेंज की अर्थव्यवस्था कहां शुरू होती है?
कोई गिनती नहीं कर रहा
सेबी जानता है कि भारतीय Nifty Options में ट्रेडिंग करते हुए कितना पैसा गंवाते हैं. वह हर साल यह आंकड़ा प्रकाशित करता है. उसने इसी आंकड़े का इस्तेमाल टैक्स, प्रतिबंधों और चेतावनियों को उचित ठहराने के लिए किया, FY22 और FY24 के बीच 93 प्रतिशत व्यक्तिगत ट्रेडर्स को नुकसान हुआ, करीब ₹1.8 लाख करोड़; FY25 में करीब 91 प्रतिशत; और पिछले साल 87.7 प्रतिशत, 12 महीनों में ₹91,685 करोड़.
लेकिन जब वही रिटेल भीड़ कमोडिटी Options में चली जाती है, तो हिसाब-किताब गायब हो जाता है.
नुकसान का आंकड़ा कहां है?
ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है. कमोडिटी नियमन के 11 साल, 20.9 लाख ग्राहक, जून तिमाही में ₹10.5 लाख करोड़ का दैनिक कारोबार और एक भी प्रकाशित आंकड़ा नहीं. न क्रूड के लिए, न बुलियन के लिए, न एक साल के लिए.
इसके केवल दो स्पष्टीकरण हो सकते हैं और दोनों ही बचाव योग्य नहीं हैं.
अगर सेबी के पास यह आंकड़ा नहीं है, तो वह ऐसे बाजार की निगरानी कर रहा है, जिसे वह माप नहीं सकता, 20.9 लाख ग्राहकों वाला एक एक्सचेंज इस तरह चल रहा है कि नियामक को यह तक पता नहीं कि इसके अंदर कौन बर्बाद हो रहा है.
अगर सेबी के पास यह आंकड़ा है और उसने जनता को नहीं बताया है, तो सवाल बिल्कुल अलग है. क्यों?
क्या सेबी का रुख यह है कि MCX पर रिटेल भागीदारी महत्वपूर्ण नहीं है? तो उसे इसे लिखित रूप में कहना चाहिए और इसे उस एक्सचेंज के साथ जोड़कर देखना चाहिए, जो Crude Oil Mini और Silver Micro जैसे कॉन्ट्रैक्ट चला रहा है, जिन्हें इस तरह आकार दिया गया है कि ₹5,000 वाला व्यक्ति भी Brent पर पोजीशन ले सके.
जो नियामक एक बाजार में रिटेल निवेशकों की तबाही के आंकड़े प्रकाशित करता है और दूसरे बाजार पर चुप रहता है, वह सावधानी नहीं बरत रहा. वह चयनात्मक रवैया अपना रहा है. और जानकारी देने में चयनात्मकता खुद एक तरह का प्रचार है.
यह आंकड़ा इस कहानी में एकमात्र ऐसी चीज है, जिस पर बहस नहीं की जा सकती. इसे प्रकाशित कर दीजिए और बाकी हर फाइल टैक्स का अंतर, सर्वर, विदेशी पैसा, बोर्ड की सीट को इसी के सामने जवाब देना होगा. शायद यही वजह है कि 11 साल में किसी ने इसकी तलाश नहीं की.
MCX के शेयर की कीमत का खेल
जब कोई गिनती नहीं कर रहा था, तब एक्सचेंज ने अपने जीवन का सबसे अच्छा साल देखा. MCX की आय दोगुनी होकर ₹2,429 करोड़ हो गई और 73 प्रतिशत ऑपरेटिंग मार्जिन पर मुनाफा 138 प्रतिशत बढ़कर ₹1,332 करोड़ हो गया. ऐसे साल में स्टॉक 102 प्रतिशत ऊपर है, जब Nifty गिरा, और 12 महीनों में बाजार मूल्य ₹40,500 करोड़ बढ़कर ₹81,021 करोड़ हो गया.
निवेशक प्रस्तुति में इनमें से हर आंकड़ा एक उपलब्धि है. इनमें से हर आंकड़ा इस बात का भी माप है कि उस बाजार में कितना पैसा हाथ बदला, जहां लगभग कोई भी कमोडिटी नहीं चाहता.
तुहिन कांता पांडे ने मार्च 2025 में सेबी के चेयरमैन का पद संभाला. उनका नियामक हर साल इस देश को रुपये तक का हिसाब बताता है कि भारतीय शेयरों पर दांव लगाते हुए कितना पैसा गंवाते हैं. तेल के मामले में उसने कभी एक भी आंकड़ा प्रकाशित नहीं किया और किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि क्यों.
राजकोट में कहीं, ₹5,000 वाला व्यक्ति अब भी उस संख्या को देख रहा है.
यह संख्या हजारों मील दूर तय हुई थी, उसके जागने से पहले. उसका कॉन्ट्रैक्ट कभी किसी चीज का एक बैरल पैदा नहीं करेगा. उसका टैक्स बिल उस टैक्स का पांचवां हिस्सा है, जो उसे इक्विटी इंडेक्स पर यही दांव लगाने पर देना पड़ता. और किसी ने कभी उसे यह नहीं बताया कि उसके जैसे ट्रेडर्स सामूहिक रूप से इस एक्सचेंज पर कितना नुकसान उठाते हैं.
ट्रेडर को MCX में ट्रेड करने के लिए लाया जा रहा है. शार्क को MCX में और तेजी से ट्रेड करने के लिए लाया जा रहा है. और उनके ऊपर कहीं कोई शायद सिर्फ एक संख्या देख रहा है: MCX के शेयर की कीमत.
इस एक्सचेंज पर कीमतें वास्तव में कहां से आती हैं, यहां वास्तव में कौन हेजिंग करता है और इसके डिलीवरी के आंकड़े वास्तव में क्या दिखाते हैं, यह इस कहानी का दूसरा हिस्सा है. इसकी रिपोर्टिंग की जा रही है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
OPEC+ के मुताबिक, सातों देश हर महीने वैश्विक तेल बाजार की स्थिति और भविष्य की मांग का आकलन करते रहेंगे. अगली बैठक 4 अक्टूबर को प्रस्तावित है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC+ ने अक्टूबर 2026 के लिए कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने से इनकार कर दिया है. रविवार को हुई बैठक में सात प्रमुख देशों ने सितंबर के उत्पादन स्तर को ही अक्टूबर में जारी रखने का फैसला किया. इस फैसले के बाद सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई और ब्रेंट क्रूड 98 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया. भारत के लिए यह फैसला चिंता बढ़ाने वाला है, क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है.
अक्टूबर में नहीं बढ़ेगा तेल उत्पादन
OPEC+ की 6 सितंबर को हुई वर्चुअल बैठक में सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, कजाकिस्तान, अल्जीरिया और ओमान ने हिस्सा लिया. बैठक में इन देशों ने अक्टूबर के लिए सितंबर 2026 के निर्धारित उत्पादन स्तर को बनाए रखने पर सहमति जताई. OPEC+ के मुताबिक, सातों देश हर महीने वैश्विक तेल बाजार की स्थिति और भविष्य की मांग का आकलन करते रहेंगे. अगली बैठक 4 अक्टूबर को प्रस्तावित है.
किस देश का कितना उत्पादन?
अक्टूबर के उत्पादन कार्यक्रम के तहत रूस का उत्पादन लक्ष्य 99.49 लाख बैरल प्रतिदिन और सऊदी अरब का 104.78 लाख बैरल प्रतिदिन रहेगा. अन्य देशों के उत्पादन लक्ष्य इस प्रकार हैं:
1. इराक: 44.31 लाख बैरल प्रतिदिन
2. कुवैत: 26.76 लाख बैरल प्रतिदिन
3. कजाकिस्तान: 16.28 लाख बैरल प्रतिदिन
4. अल्जीरिया: 10.07 लाख बैरल प्रतिदिन
5. ओमान: 8.41 लाख बैरल प्रतिदिन
मुआवजा उत्पादन को छोड़कर इन सात देशों का संयुक्त अक्टूबर उत्पादन लक्ष्य करीब 3.101 करोड़ बैरल प्रतिदिन रहेगा.
होर्मुज संकट के बीच फैसला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, OPEC+ का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका ने वैश्विक बाजार की चिंता बढ़ा दी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के प्रमुख तेल शिपिंग मार्गों में शामिल है. यहां किसी भी तरह की लंबी रुकावट से वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है. ऐसे माहौल में OPEC+ की ओर से उत्पादन बढ़ाने से इनकार ने बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता और बढ़ा दी है.
सितंबर में बढ़ाया था उत्पादन
इससे पहले OPEC+ ने अगस्त में सितंबर के लिए तेल उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया था. इसके साथ समूह ने 2023 में लागू की गई 16.5 लाख बैरल प्रतिदिन की अतिरिक्त उत्पादन कटौती को चरणबद्ध तरीके से वापस लेने की प्रक्रिया पूरी कर ली थी. हालांकि, OPEC+ के 21 सदस्य देशों में से ज्यादातर के लिए 2026 के अंत तक एक और उत्पादन कटौती लागू है. इन कटौतियों को वापस लेने से पहले समूह को सदस्य देशों की वास्तविक उत्पादन क्षमता का आकलन करना होगा. इसके बाद 2027 के लिए नए उत्पादन बेसलाइन तय किए जाएंगे और इन्हीं के आधार पर अगले साल देशों के उत्पादन कोटा निर्धारित होंगे.
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है. महंगे कच्चे तेल का असर व्यापार घाटे और चालू खाता घाटे पर भी पड़ सकता है. इसके अलावा पेट्रोल, डीजल और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से घरेलू अर्थव्यवस्था में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है.
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
OPEC+ के फैसले के बाद सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली. सुबह करीब 11:30 बजे ब्रेंट क्रूड 1.47 फीसदी की बढ़त के साथ 97.70 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. वहीं, WTI क्रूड 1.49 फीसदी उछलकर 92.84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आगे भी बनी रहती है, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था, रुपये और महंगाई के मोर्चे पर देखने को मिल सकता है.