OPEC+ के मुताबिक, सातों देश हर महीने वैश्विक तेल बाजार की स्थिति और भविष्य की मांग का आकलन करते रहेंगे. अगली बैठक 4 अक्टूबर को प्रस्तावित है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC+ ने अक्टूबर 2026 के लिए कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने से इनकार कर दिया है. रविवार को हुई बैठक में सात प्रमुख देशों ने सितंबर के उत्पादन स्तर को ही अक्टूबर में जारी रखने का फैसला किया. इस फैसले के बाद सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई और ब्रेंट क्रूड 98 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया. भारत के लिए यह फैसला चिंता बढ़ाने वाला है, क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है.
अक्टूबर में नहीं बढ़ेगा तेल उत्पादन
OPEC+ की 6 सितंबर को हुई वर्चुअल बैठक में सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, कजाकिस्तान, अल्जीरिया और ओमान ने हिस्सा लिया. बैठक में इन देशों ने अक्टूबर के लिए सितंबर 2026 के निर्धारित उत्पादन स्तर को बनाए रखने पर सहमति जताई. OPEC+ के मुताबिक, सातों देश हर महीने वैश्विक तेल बाजार की स्थिति और भविष्य की मांग का आकलन करते रहेंगे. अगली बैठक 4 अक्टूबर को प्रस्तावित है.
किस देश का कितना उत्पादन?
अक्टूबर के उत्पादन कार्यक्रम के तहत रूस का उत्पादन लक्ष्य 99.49 लाख बैरल प्रतिदिन और सऊदी अरब का 104.78 लाख बैरल प्रतिदिन रहेगा. अन्य देशों के उत्पादन लक्ष्य इस प्रकार हैं:
1. इराक: 44.31 लाख बैरल प्रतिदिन
2. कुवैत: 26.76 लाख बैरल प्रतिदिन
3. कजाकिस्तान: 16.28 लाख बैरल प्रतिदिन
4. अल्जीरिया: 10.07 लाख बैरल प्रतिदिन
5. ओमान: 8.41 लाख बैरल प्रतिदिन
मुआवजा उत्पादन को छोड़कर इन सात देशों का संयुक्त अक्टूबर उत्पादन लक्ष्य करीब 3.101 करोड़ बैरल प्रतिदिन रहेगा.
होर्मुज संकट के बीच फैसला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, OPEC+ का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका ने वैश्विक बाजार की चिंता बढ़ा दी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के प्रमुख तेल शिपिंग मार्गों में शामिल है. यहां किसी भी तरह की लंबी रुकावट से वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है. ऐसे माहौल में OPEC+ की ओर से उत्पादन बढ़ाने से इनकार ने बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता और बढ़ा दी है.
सितंबर में बढ़ाया था उत्पादन
इससे पहले OPEC+ ने अगस्त में सितंबर के लिए तेल उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया था. इसके साथ समूह ने 2023 में लागू की गई 16.5 लाख बैरल प्रतिदिन की अतिरिक्त उत्पादन कटौती को चरणबद्ध तरीके से वापस लेने की प्रक्रिया पूरी कर ली थी. हालांकि, OPEC+ के 21 सदस्य देशों में से ज्यादातर के लिए 2026 के अंत तक एक और उत्पादन कटौती लागू है. इन कटौतियों को वापस लेने से पहले समूह को सदस्य देशों की वास्तविक उत्पादन क्षमता का आकलन करना होगा. इसके बाद 2027 के लिए नए उत्पादन बेसलाइन तय किए जाएंगे और इन्हीं के आधार पर अगले साल देशों के उत्पादन कोटा निर्धारित होंगे.
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है. महंगे कच्चे तेल का असर व्यापार घाटे और चालू खाता घाटे पर भी पड़ सकता है. इसके अलावा पेट्रोल, डीजल और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से घरेलू अर्थव्यवस्था में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है.
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
OPEC+ के फैसले के बाद सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली. सुबह करीब 11:30 बजे ब्रेंट क्रूड 1.47 फीसदी की बढ़त के साथ 97.70 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. वहीं, WTI क्रूड 1.49 फीसदी उछलकर 92.84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आगे भी बनी रहती है, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था, रुपये और महंगाई के मोर्चे पर देखने को मिल सकता है.
कंपनी ने कीमतें बढ़ाने की वजह इनपुट कॉस्ट में लगातार हो रही बढ़ोतरी को बताया है. कच्चे माल और अन्य लागत में इजाफे से वाहनों के उत्पादन की कुल लागत बढ़ी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की प्रमुख कार निर्माता मारुति सुजुकी ने ग्राहकों को बड़ा झटका दिया है. कंपनी ने सितंबर 2026 से अपनी चुनिंदा कारों की कीमतों में ₹20,000 तक बढ़ोतरी करने का ऐलान किया है. कंपनी के मुताबिक, इनपुट कॉस्ट यानी उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और अन्य लागत में बढ़ोतरी के कारण कीमतें बढ़ाने का फैसला किया गया है. हालांकि, कंपनी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि किन मॉडल और वेरिएंट की कीमत कितनी बढ़ेगी.
सितंबर से लागू होंगी नई कीमतें
मारुति सुजुकी ने सोमवार, 7 सितंबर को बताया कि चुनिंदा मॉडल की कीमतों में अधिकतम ₹20,000 तक की बढ़ोतरी की जाएगी. नई कीमतें सितंबर 2026 से लागू होंगी. हालांकि, कंपनी ने कीमतों में बढ़ोतरी की सटीक तारीख और अलग-अलग मॉडल पर होने वाली बढ़ोतरी की जानकारी फिलहाल साझा नहीं की है.
किन कारों पर पड़ेगा असर?
मारुति सुजुकी के पोर्टफोलियो में ऑल्टो K10, वैगनआर, स्विफ्ट, डिजायर, बलेनो, फ्रॉन्क्स, ब्रेजा, अर्टिगा और ग्रैंड विटारा समेत कई लोकप्रिय मॉडल शामिल हैं. हालांकि, कंपनी ने अभी यह सूची जारी नहीं की है कि इनमें से किन कारों की कीमतें बढ़ाई जाएंगी. इसलिए ग्राहकों को नई कीमतों का इंतजार करना होगा. कीमतों में बढ़ोतरी अलग-अलग मॉडल और वेरिएंट के हिसाब से अलग हो सकती है.
लागत बढ़ने से कंपनी पर दबाव
कंपनी ने कीमतें बढ़ाने की वजह इनपुट कॉस्ट में लगातार हो रही बढ़ोतरी को बताया है. कच्चे माल और अन्य लागत में इजाफे से वाहनों के उत्पादन की कुल लागत बढ़ी है. मारुति सुजुकी ने लागत को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन बढ़ती लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालने का फैसला किया गया है.
शेयर बाजार में मारुति के शेयर मजबूत
कारों की कीमतों में बढ़ोतरी के ऐलान के बीच मारुति सुजुकी के शेयरों में मामूली तेजी देखने को मिली. दोपहर करीब 2 बजे एनएसई पर कंपनी का शेयर लगभग 0.58 फीसदी की बढ़त के साथ ₹12,768.00 पर कारोबार कर रहा था. इस तेजी के साथ कंपनी का बाजार पूंजीकरण ₹4 लाख करोड़ के पार पहुंच गया.
NSE में सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के पास है. LIC के पास एक्सचेंज के करीब 10.72 प्रतिशत शेयर यानी 265.28 मिलियन शेयर हैं. हालांकि, LIC प्रस्तावित आईपीओ में अपनी हिस्सेदारी का कोई भी शेयर बेचने नहीं जा रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का बहुप्रतीक्षित आईपीओ देश की पांच सरकारी बीमा कंपनियों के लिए बड़ी वित्तीय राहत लेकर आ सकता है. ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस के मुताबिक, ये कंपनियां आईपीओ में करीब 4 करोड़ शेयर बेचने की तैयारी में हैं. अगर शेयर का संभावित भाव ₹1,800 रहता है, तो इनकी हिस्सेदारी बिक्री से करीब ₹7,200 करोड़ जुट सकते हैं. इससे वित्तीय दबाव झेल रही सरकारी बीमा कंपनियों की स्थिति मजबूत होने और उनके सॉल्वेंसी रेशियो में सुधार की उम्मीद है.
1994 में मामूली निवेश, अब हजारों करोड़ की हिस्सेदारी
जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (GIC Re), न्यू इंडिया एश्योरेंस, नेशनल इंश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस और ओरिएंटल इंश्योरेंस NSE के शुरुआती निवेशकों में शामिल थीं. एक्सचेंज की शुरुआत 1994 में हुई थी और उस समय इन कंपनियों ने इसमें मामूली निवेश किया था. अब NSE के प्रस्तावित आईपीओ के जरिए ये पांचों सरकारी बीमा कंपनियां करीब 40 मिलियन यानी 4 करोड़ शेयर बेच सकती हैं.
शेयरों की बिक्री के बाद इन कंपनियों की संयुक्त हिस्सेदारी 6.7 प्रतिशत से घटकर करीब 5.1 प्रतिशत रह जाएगी. चूंकि NSE का यह आईपीओ पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) है, इसलिए शेयरों की बिक्री से मिलने वाली रकम NSE के पास नहीं जाएगी, बल्कि मौजूदा शेयरधारकों को मिलेगी.
LIC नहीं बेचेगी NSE में अपनी हिस्सेदारी
NSE में सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के पास है. LIC के पास एक्सचेंज के करीब 10.72 प्रतिशत शेयर यानी 265.28 मिलियन शेयर हैं. हालांकि, LIC प्रस्तावित आईपीओ में अपनी हिस्सेदारी का कोई भी शेयर बेचने नहीं जा रही है.
LIC को NSE के गवर्निंग बोर्ड में एक निदेशक नामित करने का अधिकार भी हासिल है. वहीं, निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों में HDFC Life और SBI Life भी अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना में शामिल नहीं हैं. दूसरी ओर, ICICI Lombard अपने करीब 2.35 मिलियन शेयर बेचकर लगभग ₹383 करोड़ का मुनाफा बुक कर सकती है.
घाटे में चल रही सरकारी बीमा कंपनियों को बड़ी राहत
NSE IPO से मिलने वाली रकम सरकारी जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के लिए काफी अहम हो सकती है. खासकर उन कंपनियों के लिए जिनका सॉल्वेंसी रेशियो दबाव में है. मार्च 2025 तक ओरिएंटल इंश्योरेंस का सॉल्वेंसी रेशियो माइनस 1.03, नेशनल इंश्योरेंस का माइनस 0.67 और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस का माइनस 0.65 दर्ज किया गया था.
शेयरों की बिक्री से मिलने वाली पूंजी इन कंपनियों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद कर सकती है. अनुमान है कि इससे इनके सॉल्वेंसी रेशियो में करीब 100 बेसिस पॉइंट तक सुधार हो सकता है.
शेयर बेचने के बाद भी बचेंगे हजारों करोड़ के शेयर
आईपीओ में हिस्सेदारी बेचने के बावजूद सरकारी बीमा कंपनियों के पास NSE के बड़ी संख्या में शेयर बने रहेंगे. नेशनल इंश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस और ओरिएंटल इंश्योरेंस करीब 17 मिलियन शेयर बेचने के बाद भी लगभग 73 मिलियन शेयर अपने पास रख सकती हैं.
यदि NSE के शेयर का भाव ₹1,800 माना जाए, तो बची हुई हिस्सेदारी की कीमत करीब ₹13,100 करोड़ बैठती है. NSE की लिस्टिंग के बाद शेयर की कीमत बढ़ने पर इन कंपनियों को मार्क-टू-मार्केट लाभ भी मिल सकता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति को आगे भी सहारा मिलेगा.
अंतिम कमाई NSE के IPO प्राइस पर निर्भर
हालांकि, सरकारी बीमा कंपनियों को वास्तव में कितनी रकम मिलेगी, यह NSE के आईपीओ के अंतिम ऑफर प्राइस पर निर्भर करेगा. फिलहाल ₹1,800 प्रति शेयर का भाव संभावित कीमत के तौर पर माना जा रहा है. ऐसे में करीब 4 करोड़ शेयरों की बिक्री से लगभग ₹7,200 करोड़ जुटाने का अनुमान है. अंतिम कीमत और आईपीओ की शर्तें तय होने के बाद ही इन कंपनियों की वास्तविक कमाई स्पष्ट होगी.
गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा अंशदान की गणना के तरीके पर सरकार कर रही विचार; कारोबार या कामगारों को किए गए भुगतान के आधार पर तय हो सकता है अंशदान
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा का लाभ देने के लिए सरकार नियमों में बदलाव की तैयारी कर रही है. श्रम एवं रोजगार मंत्रालय एग्रीगेटर कंपनियों से लिए जाने वाले सामाजिक सुरक्षा अंशदान की गणना के फॉर्मूले पर विचार कर रहा है. इसमें यह तय किया जाना है कि कंपनियों से अंशदान उनके सालाना कारोबार के आधार पर लिया जाए या कामगारों को किए जाने वाले भुगतान के आधार पर.
इस बदलाव का असर ओला (Ola), उबर (Uber) जैसी कैब और राइड-हेलिंग कंपनियों के साथ-साथ ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले गिग वर्कर्स पर पड़ सकता है. खासतौर पर भुगतान आधारित व्यवस्था लागू होने पर ज्यादा लेनदेन वाले प्लेटफॉर्म पर कंपनियों की लागत बढ़ने की संभावना है.
दो मॉडल पर विचार
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार सामाजिक सुरक्षा अंशदान तय करने के लिए दो विकल्पों पर विचार कर रही है. पहला मॉडल एग्रीगेटर कंपनी के सालाना कारोबार के आधार पर अंशदान तय करने का है, जबकि दूसरे मॉडल में कामगारों को किए गए भुगतान या प्रति लेनदेन को आधार बनाया जा सकता है.
भुगतान आधारित मॉडल का असर उन कारोबारों पर ज्यादा पड़ सकता है, जहां लेनदेन की संख्या बहुत अधिक होती है, लेकिन हर लेनदेन का मूल्य अपेक्षाकृत कम होता है. राइड-हेलिंग कंपनियां इसी श्रेणी में आती हैं, क्योंकि कैब, ऑटो और बाइक सेवाओं में बड़ी संख्या में रोजाना ट्रांजैक्शन होते हैं.
क्या कहती है सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020?
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत एग्रीगेटर कंपनियों के लिए गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के सामाजिक सुरक्षा कोष में अंशदान करना अनिवार्य किया गया है. नियमों के मुताबिक, किसी एक एग्रीगेटर के साथ वित्त वर्ष में कम से कम 90 दिन काम करने वाला गिग वर्कर या एक से अधिक एग्रीगेटर के साथ कुल 120 दिन काम करने वाला वर्कर योजना के तहत लाभ पाने का पात्र हो सकता है.
एग्रीगेटर कंपनियों को अपने सालाना अंशदान का आकलन कर उसे सामाजिक सुरक्षा कोष में जमा करना होता है. अब सरकार इस अंशदान की गणना और भुगतान के लिए तकनीकी व्यवस्था को अंतिम रूप देने पर विचार कर रही है.
कारोबार का 1-2% तक हो सकता है अंशदान
सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 114(4) के तहत एग्रीगेटर कंपनियों को अपने सालाना कारोबार का 1 से 2 प्रतिशत तक सामाजिक सुरक्षा अंशदान करना होगा. हालांकि, यह अंशदान गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को किए गए कुल भुगतान के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता.
सरकार इस व्यवस्था के विकल्प के तौर पर सीधे कामगारों को किए जाने वाले भुगतान को आधार बनाने पर भी विचार कर रही है. इस मॉडल में भुगतान का 5 प्रतिशत तक अंशदान लिया जा सकता है.
Ola-Uber जैसी कंपनियों पर बढ़ सकता है खर्च
विश्लेषकों का मानना है कि अगर भुगतान आधारित व्यवस्था लागू होती है तो राइड-हेलिंग कंपनियों पर इसका वित्तीय असर ज्यादा हो सकता है. कैब, ऑटो और बाइक प्लेटफॉर्म पर रोजाना बड़ी संख्या में ट्रांजैक्शन होते हैं, इसलिए कामगारों को किए जाने वाले भुगतान के आधार पर अंशदान तय होने पर कंपनियों की लागत बढ़ सकती है. वहीं, कारोबार आधारित मॉडल में अंशदान कंपनी के कुल सालाना कारोबार से जुड़ा होगा. ऐसे में अलग-अलग बिजनेस मॉडल वाली एग्रीगेटर कंपनियों पर दोनों व्यवस्थाओं का वित्तीय प्रभाव अलग-अलग हो सकता है.
गिग वर्कर्स को मिलेगा सामाजिक सुरक्षा का लाभ
प्रस्तावित व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना है. अंशदान का फॉर्मूला तय होने के बाद सामाजिक सुरक्षा कोष के संचालन और पात्र कामगारों को योजनाओं का लाभ देने की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट किया जा सकेगा. इसका लाभ कैब ड्राइवर, डिलीवरी पार्टनर और अन्य प्लेटफॉर्म आधारित कामगारों को मिल सकता है, जो पारंपरिक रोजगार व्यवस्था से अलग तरीके से काम करते हैं.
इस फंडिंग राउंड में पिक्सल के मौजूदा निवेशक Radical Ventures और growX Ventures ने भी हिस्सा लिया. वहीं, 360 ONE Asset और IMM Investment नए निवेशकों के तौर पर कंपनी से जुड़े हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बेंगलुरु स्थित स्पेसटेक स्टार्टअप पिक्सल ने सीरीज सी फंडिंग राउंड में 100 मिलियन डॉलर जुटाए हैं. इस राउंड की अगुवाई सिंगापुर के सरकारी निवेशक टेमासेक और ब्रिटेन की स्पेस-टेक वेंचर कैपिटल फर्म सेराफिम ने की. इस फंडिंग के साथ पिक्सल की कुल जुटाई गई पूंजी 195 मिलियन डॉलर हो गई है. कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल अपने अर्थ-इंटेलिजेंस और सैटेलाइट कारोबार को विस्तार देने के लिए करेगी.
मौजूदा और नए निवेशकों ने भी लिया हिस्सा
इस फंडिंग राउंड में पिक्सल के मौजूदा निवेशक Radical Ventures और growX Ventures ने भी हिस्सा लिया. वहीं, 360 ONE Asset और IMM Investment नए निवेशकों के तौर पर कंपनी से जुड़े हैं. भारत में सरकार की ओर से अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने वाले सुधारों के बाद स्पेस सेक्टर में निवेशकों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है.
हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट से शुरू हुआ सफर
पिक्सल की स्थापना आवैस अहमद ने की है. कंपनी ने शुरुआत हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट्स पर फोकस के साथ की थी. ये सैटेलाइट्स पारंपरिक अर्थ-इमेजिंग सैटेलाइट्स की तुलना में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक जानकारी की ज्यादा व्यापक रेंज को कैप्चर करते हैं. इससे पृथ्वी की सतह पर होने वाले बदलावों और विभिन्न विशेषताओं की पहचान करने में मदद मिलती है.
सैटेलाइट इमेजिंग से अर्थ इंटेलिजेंस तक विस्तार
समय के साथ पिक्सल ने सैटेलाइट इमेजिंग से आगे बढ़ते हुए अपने Aurora प्लेटफॉर्म के जरिए Earth Intelligence Software और व्यावसायिक व संप्रभु मिशनों के लिए सैटेलाइट सिस्टम विकसित किए हैं. गूगल समर्थित यह स्टार्टअप सेंसर, सॉफ्टवेयर और सैटेलाइट सिस्टम को एकीकृत कर ऐसा प्लैनेटरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना चाहता है, जिससे सरकारें, कंपनियां और संस्थान अर्थ-ऑब्जर्वेशन डेटा से उपयोगी जानकारी हासिल कर सकें.
अब सैटेलाइट से नियमित कमाई पर फोकस
पिक्सल के लिए नई फंडिंग ऐसे समय में आई है जब कंपनी सैटेलाइट तैनाती और बड़े पूंजीगत खर्च के चरण से आगे बढ़कर अपने सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन से नियमित राजस्व हासिल करने की दिशा में बढ़ रही है. कंपनी के संस्थापक आवैस अहमद ने इस साल BW Businessworld को बताया था कि पैमाना बढ़ने के साथ पिक्सल के डेटा कारोबार का सकल मार्जिन 70 से 90 फीसदी के बीच रह सकता है.
छह सैटेलाइट्स पर बड़ा खर्च पहले ही पूरा
अहमद के मुताबिक, कंपनी छह सैटेलाइट्स को लॉन्च करने से जुड़ा बड़ा पूंजीगत खर्च पहले ही कर चुकी है. उन्होंने मई में कहा था कि सैटेलाइट लॉन्च करना कंपनी के लिए सबसे बड़ा खर्च था और छह सैटेलाइट्स के लिए यह पूंजीगत खर्च पूरा किया जा चुका है. इन सैटेलाइट्स को सात साल के परिचालन जीवन के लिए डिजाइन किया गया है, जबकि कई पारंपरिक सैटेलाइट्स की परिचालन अवधि करीब तीन साल होती है.
2026 में EBITDA पॉजिटिव होने की उम्मीद
कंपनी को उम्मीद है कि वह 2026 में EBITDA के स्तर पर मुनाफे में आ जाएगी. वहीं, 2027 के अंत या अधिकतम 2028 की शुरुआत तक कंपनी के कैश फ्लो पॉजिटिव होने की उम्मीद है. पिक्सल का मानना है कि सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन से उसके पूरे परिचालन जीवन के दौरान राजस्व आता रहेगा, जबकि ग्राउंड स्टेशन, क्लाउड स्टोरेज और कर्मचारियों जैसे नियमित खर्च कॉन्ट्रैक्ट्स की वैल्यू की तुलना में अपेक्षाकृत कम रहेंगे.
भारत के स्पेस सेक्टर में बढ़ रहा निजी निवेश
सरकार की ओर से अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने और विभिन्न सुधारों के बाद भारत के स्पेस सेक्टर में निजी निवेश बढ़ा है. स्टार्टअप्स सैटेलाइट निर्माण, लॉन्च सेवाओं, अर्थ ऑब्जर्वेशन और स्पेस आधारित कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में अपनी क्षमताएं विकसित कर रहे हैं.
कृषि से रक्षा तक बढ़ रही सैटेलाइट डेटा की मांग
पिक्सल उन स्पेसटेक स्टार्टअप्स में शामिल है जो सैटेलाइट डेटा और सेवाओं को व्यावसायिक रूप देने पर काम कर रहे हैं. कृषि, रक्षा, जलवायु निगरानी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में अर्थ-ऑब्जर्वेशन डेटा की मांग बढ़ने से इस कारोबार में आगे विकास की संभावनाएं बनी हुई हैं.
शुक्रवार को सेंसेक्स 362.57 अंक चढ़कर 76,515.43 और निफ्टी 24.25 अंक बढ़कर 23,897.70 पर बंद हुआ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार ने शुक्रवार को तेजी के साथ सप्ताह का अंत किया था, लेकिन सोमवार को कारोबार की शुरुआत से पहले बाजार पर दबाव के संकेत मिल रहे हैं. शुक्रवार को सेंसेक्स 362.57 अंक चढ़कर 76,515.43 और निफ्टी 24.25 अंक बढ़कर 23,897.70 पर बंद हुआ था. टाटा स्टील, रिलायंस इंडस्ट्रीज और एचडीएफसी बैंक जैसे दिग्गज शेयरों में खरीदारी से बाजार को सहारा मिला. हालांकि, सोमवार सुबह GIFT Nifty करीब 71 अंक फिसलकर 23,978 के आसपास कारोबार करता दिखा. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, अमेरिका-ईरान तनाव और अमेरिकी बाजारों में कमजोरी से निवेशकों की चिंता बढ़ी है. इस बीच Tata Motors, RVNL, Lupin, JSW Steel, Gland Pharma और Swiggy समेत कई शेयर आज कारोबारी अपडेट के चलते फोकस में रह सकते हैं.
शुक्रवार को कैसा रहा बाजार
शुक्रवार को 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 362.57 अंक यानी 0.48 फीसदी की बढ़त के साथ 76,515.43 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 24.25 अंक यानी 0.10 फीसदी चढ़कर 23,897.70 के स्तर पर पहुंच गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 20 में तेजी और 10 में गिरावट रही. टाटा स्टील 2.91 फीसदी चढ़कर सबसे ज्यादा बढ़ने वाला शेयर रहा. रिलायंस इंडस्ट्रीज में 1.61 फीसदी, बजाज फाइनेंस में 1.47 फीसदी, ट्रेंट में 1.34 फीसदी, अडानी पोर्ट्स में 1.33 फीसदी और एचडीएफसी बैंक में 1.30 फीसदी की तेजी रही. दूसरी ओर भारती एयरटेल और एचसीएल टेक 1.24 फीसदी, जबकि इटरनल 1.09 फीसदी नीचे बंद हुआ.
आज कमजोर शुरुआत के संकेत
सोमवार को भारतीय बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत हैं. GIFT Nifty करीब 71 अंक की गिरावट के साथ 23,978 के आसपास कारोबार करता दिखा. हालांकि, एशिया के प्रमुख बाजारों में मजबूती रही. जापान का Nikkei 225 करीब 2.23 फीसदी और दक्षिण कोरिया का Kospi करीब 3.04 फीसदी ऊपर कारोबार कर रहा था. इसके विपरीत अमेरिकी बाजार शुक्रवार को गिरावट के साथ बंद हुए. Dow Jones 0.51 फीसदी, S&P 500 0.38 फीसदी और Nasdaq Composite 0.29 फीसदी गिरा.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें बनी चिंता
बाजार के लिए सबसे बड़ी चिंता इस समय कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा स्ट्रेट ऑफ हार्मुज में टैंकरों से जुड़ी घटनाओं के बीच ब्रेंट क्रूड
करीब 96.73 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, ऐसे में तेल की कीमतों में लगातार तेजी से महंगाई, आयात बिल और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, Tata Motors की सब्सिडियरी TML CV Holdings ने Iveco Group के अधिग्रहण के लिए 14.1 यूरो प्रति शेयर के नकद ऑफर की घोषणा की है. RVNL को SJVN Thermal से करीब 903 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है. JSW Steel का अगस्त में कंसोलिडेटेड क्रूड स्टील उत्पादन सालाना आधार पर 3 फीसदी बढ़कर 24.65 लाख टन रहा. Lupin को अमेरिका में Modafinil Tablets की मंजूरी मिली है. Gland Pharma के प्रमोटर Fosun Pharma ने कंपनी में 4.5 फीसदी हिस्सेदारी करीब 2,121.5 करोड़ रुपये में बेची है. वहीं, Swiggy में BNP Paribas और Goldman Sachs ने मिलकर करीब 1,041 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे हैं. इसके अलावा Lemon Tree Hotels, Mazagon Dock Shipbuilders, Larsen & Toubro, TVS Holdings, Cohance Lifesciences, CARE Ratings और Tata Technologies से जुड़े अपडेट भी आज संबंधित शेयरों में हलचल बढ़ा सकते हैं.
बाजार की दिशा के लिए इन संकेतों पर नजर
कुल मिलाकर, शुक्रवार की मजबूत क्लोजिंग के बाद सोमवार को बाजार के सामने कई चुनौतियां हैं. एशियाई बाजारों की तेजी से कुछ सपोर्ट मिल सकता है, लेकिन GIFT Nifty में कमजोरी, अमेरिकी बाजारों की गिरावट और करीब 97 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा Brent Crude बाजार की धारणा पर दबाव डाल सकता है. निवेशकों की नजर आज वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिका-ईरान तनाव और कंपनियों से जुड़े कारोबारी अपडेट पर रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
आईसीआईसीआई बैंक ने 5 सितंबर को नियामकीय फाइलिंग के जरिए RBI की मंजूरी की जानकारी दी. इसके तहत LIC बैंक की चुकता शेयर पूंजी या वोटिंग अधिकारों में कुल मिलाकर 9.99 प्रतिशत तक हिस्सेदारी हासिल कर सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंक ICICI Bank में 9.99 प्रतिशत तक हिस्सेदारी खरीदने की मंजूरी दे दी है. इस मंजूरी के बाद देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी के पास बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए नियामकीय मंजूरी उपलब्ध हो गई है.
ICICI Bank ने 5 सितंबर को नियामकीय फाइलिंग के जरिए RBI की मंजूरी की जानकारी दी. इसके तहत LIC बैंक की चुकता शेयर पूंजी या वोटिंग अधिकारों में कुल मिलाकर 9.99 प्रतिशत तक हिस्सेदारी हासिल कर सकती है. हालांकि, इसके लिए उसे सभी लागू नियामकीय और वैधानिक नियमों का पालन करना होगा.
यह कदम ऐसे समय में आया है जब बड़े संस्थागत निवेशक भारत के वित्तीय सेवा क्षेत्र में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं. वहीं, बैंकों में किसी एक निवेशक की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी की सीमा नियामकीय मंजूरियों के जरिए तय होती है.
बैंकिंग क्षेत्र में LIC का बढ़ेगा एक्सपोजर
RBI की मंजूरी से LIC को ICICI Bank में अपना निवेश बढ़ाने की अधिक गुंजाइश मिल गई है. हालांकि, मंजूरी का यह मतलब नहीं है कि LIC तुरंत अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 9.99 प्रतिशत कर देगी. LIC देश के सबसे बड़े संस्थागत निवेशकों में शामिल है और वित्तीय सेवा क्षेत्र में उसका पहले से बड़ा निवेश है. ICICI Bank में हिस्सेदारी बढ़ने से देश के प्रमुख निजी बैंकों में से एक के प्रति LIC का एक्सपोजर और बढ़ जाएगा. हिस्सेदारी खरीद से जुड़े लेनदेन में LIC को बैंकिंग, प्रतिभूति बाजार, विदेशी मुद्रा और अन्य लागू नियमों का पालन करना होगा. RBI की मंजूरी के साथ जुड़ी शर्तों का पालन करते हुए ही LIC अतिरिक्त हिस्सेदारी हासिल कर सकेगी.
एक साल के भीतर पूरी करनी होगी खरीद
RBI ने कहा है कि मंजूर की गई हिस्सेदारी खरीद की प्रक्रिया मंजूरी की तारीख से एक वर्ष के भीतर पूरी करनी होगी. नियामकीय खुलासे के अनुसार, यदि LIC निर्धारित अवधि के भीतर अधिग्रहण पूरा नहीं करती है, तो यह मंजूरी रद्द मानी जाएगी. केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि ICICI Bank में LIC की कुल हिस्सेदारी 9.99 प्रतिशत की स्वीकृत सीमा के भीतर ही रहनी चाहिए. यह मंजूरी LIC को बैंकिंग क्षेत्र में अतिरिक्त पूंजी लगाने की सुविधा देती है, जबकि निजी बैंकों में बड़ी हिस्सेदारी रखने से जुड़े नियामकीय सुरक्षा उपाय भी लागू रहेंगे.
ICICI Bank के लिए भी इस कदम से संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी मजबूत हो सकती है. हालांकि, LIC वास्तव में कितनी अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीदेगी, यह उसके निवेश संबंधी फैसलों और बाजार की मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.
मामले से परिचित लोगों के मुताबिक टाटा स्टील के सीईओ और एमडी टी. वी. नरेंद्रन सबसे मजबूत आंतरिक दावेदार हैं, जबकि एनएसई के प्रमुख आशीष चौहान के नाम पर भी विचार किया जा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
2.75 लाख करोड़ डॉलर से अधिक के टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस ने चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के उत्तराधिकारी की तलाश को तीन नामों तक सीमित कर दिया है. मामले से परिचित लोगों के अनुसार, जिन नामों पर विचार चल रहा है, उनमें टाटा स्टील के सीईओ और एमडी टी. वी. नरेंद्रन, टाटा संस के कार्यकारी निदेशक और ग्रुप सीएफओ सौरभ अग्रवाल तथा नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के एमडी और सीईओ आशीष चौहान शामिल हैं.
आंतरिक दावेदारों में नरेंद्रन सबसे आगे बताए जा रहे हैं, जबकि अग्रवाल के निवेश बैंकिंग और पूंजी आवंटन से जुड़े अनुभव को देखते हुए उनके नाम पर विचार किया जा रहा है. वहीं, भारत के पूंजी बाजार के अनुभवी और एनएसई की स्थापना में शामिल रहे चौहान इस दौड़ में संभावित ‘डार्क हॉर्स’ के रूप में उभरे हैं.
उत्तराधिकारी के चयन की प्रक्रिया अभी जारी है और अंतिम फैसला नहीं हुआ है. मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, अगले चेयरमैन के चयन में टाटा संस का बोर्ड और कंपनी को नियंत्रित करने वाले टाटा ट्रस्ट्स अहम भूमिका निभाएंगे.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने शॉर्टलिस्ट किए गए नामों पर वरिष्ठ सरकारी नेताओं के साथ चर्चा की है. संबंधित पक्षों द्वारा उम्मीदवारों पर विचार किए जाने के बाद फैसला होने की उम्मीद है.
चंद्रशेखरन ने 2017 में टाटा संस के चेयरमैन का पद संभाला था और फिलहाल अपने दूसरे पांच साल के कार्यकाल में हैं. उन्होंने पिछले महीने घोषणा की थी कि 20 फरवरी 2027 को कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह दोबारा नियुक्ति की मांग नहीं करेंगे.
मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आए अन्य नामों में नोएल टाटा का संभावित अंतरिम चेयरमैन के तौर पर नाम, टाटा संस की ग्रुप चीफ डिजिटल ऑफिसर आरती सुब्रमण्यम, टाटा मोटर्स के सीईओ शैलेश चंद्रा और टाटा पावर के सीईओ प्रवीर सिन्हा शामिल हैं.
मामले से परिचित लोगों के अनुसार, तकनीक, पूंजी बाजार, वित्तीय सेवाओं और संस्थान निर्माण के क्षेत्र में चौहान के अनुभव को देखते हुए वह एक अप्रत्याशित विकल्प के रूप में उभर सकते हैं.
चौहान 1990 के दशक में एनएसई की स्थापना में शामिल अधिकारियों में रहे हैं. इसके बाद उन्होंने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के एमडी और सीईओ के रूप में काम किया और 2022 में एनएसई के प्रमुख के तौर पर वापस लौटे. वह रिलायंस इंडस्ट्रीज और आईडीबीआई बैंक में भी काम कर चुके हैं.
चौहान आईआईटी बॉम्बे से स्नातक हैं और उनके पास आईआईएम कलकत्ता से प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिग्री है. फिलहाल वह एनएसई के प्रस्तावित आईपीओ की देखरेख कर रहे हैं, जिसके एक्सचेंज का मूल्यांकन करीब 5 लाख करोड़ रुपये रहने की उम्मीद है.
आंतरिक दावेदारों में नरेंद्रन सबसे आगे
नरेंद्रन को समूह के भीतर सबसे मजबूत परिचालन दावेदार माना जा रहा है. वह तीन दशक से अधिक समय से टाटा समूह से जुड़े हैं. उन्होंने 1988 में टाटा स्टील के साथ अपना करियर शुरू किया और एक दशक से अधिक समय से कंपनी के सीईओ और एमडी हैं.
अपने कार्यकाल के दौरान नरेंद्रन ने वैश्विक कमोडिटी चक्रों, बड़े पूंजी निवेश और यूरोपीय कारोबार से जुड़ी चुनौतियों के बीच टाटा स्टील का नेतृत्व किया है. उन्होंने कंपनी के जैविक और अकार्बनिक विस्तार की भी देखरेख की है. इसके अलावा वह वर्ल्ड स्टील एसोसिएशन के चेयरमैन और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के अध्यक्ष जैसे उद्योग पदों पर भी रह चुके हैं.
टाटा समूह के साथ लंबे जुड़ाव की वजह से उन्हें समूह के कारोबार की गहरी समझ है. हालांकि, चर्चा से परिचित लोगों के अनुसार, उनका अनुभव मुख्य रूप से टाटा स्टील तक केंद्रित रहा है और होल्डिंग कंपनी के स्तर पर उनका अनुभव अपेक्षाकृत सीमित है.
अग्रवाल के पास वित्त और रणनीति का अनुभव
अग्रवाल समूह के भीतर वित्त और रणनीति पर केंद्रित विकल्प के तौर पर देखे जा रहे हैं. वह 2017 में चंद्रशेखरन के कार्यकाल में ग्रुप सीएफओ के तौर पर टाटा संस से जुड़े थे और फिलहाल कार्यकारी निदेशक एवं ग्रुप सीएफओ हैं.
उनकी जिम्मेदारियों में समूह के स्तर पर पूंजी आवंटन, निवेश से जुड़े फैसले और पोर्टफोलियो प्रबंधन शामिल हैं. टाटा संस से जुड़ने से पहले अग्रवाल ने टाटा समूह समेत कई बड़ी भारतीय कंपनियों को कारोबारी सौदों में सलाह दी थी. इससे उन्हें वित्तीय बाजारों के साथ-साथ समूह की निवेश संरचना की भी समझ मिली.
वह टाटा स्टील, वोल्टास और टाटा डिजिटल समेत कई टाटा कंपनियों के बोर्ड में रह चुके हैं. इसके अलावा वह टाटा कैपिटल, टाटा प्ले, टाटा एआईए लाइफ इंश्योरेंस, टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस, टाटा पावर रिन्यूएबल एनर्जी, टाटा 1mg और बिगबास्केट जैसी कंपनियों के चेयरमैन भी हैं.
फिलहाल नरेंद्रन आंतरिक दावेदारों में सबसे आगे हैं, जबकि अग्रवाल वित्त पर केंद्रित विकल्प पेश करते हैं. वहीं, चौहान का तकनीक, वित्तीय बाजार और संस्थान निर्माण से जुड़ा अनुभव उन्हें उत्तराधिकार की दौड़ में संभावित ‘वाइल्ड कार्ड’ बनाता है.
उम्मीद है कि चयन समिति आने वाले महीनों में इस प्रक्रिया पर विचार-विमर्श जारी रखेगी. चंद्रशेखरन का कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होने के बाद टाटा संस के नए चेयरमैन पदभार संभालेंगे.
जन्मदिन पर साइबर सुरक्षा उद्यमी, ग्रोथ पार्टनर, M&A रणनीतिकार, निवेशक और कवि सुनील सप्रा पर एक नजर, जिनकी कई पहचानें निर्माण, सक्षम बनाने और बदलाव की एक ही प्रवृत्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
Eventus Security के को-फाउंडर और चीफ ग्रोथ ऑफिसर सुनील सप्रा के लिए उद्यमिता सिर्फ नई कंपनी शुरू करने या उसे खड़ा करने तक सीमित नहीं रही है. साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में उनकी यात्रा ने उन्हें एक अलग मुकाम दिया है. आज 5 सितंबर को सुनील सप्रा अपना जन्मदिन मना रहे है, और इस खास मौके पर हम उनकी उद्यमशीलता की कहानी पर नजर डालें तो Anlyz और PingSafe में साझा निवेशक के तौर पर उनकी भूमिका खास तौर पर सामने आती है. दोनों कंपनियों का क्रमशः Trend Micro और SentinelOne ने अधिग्रहण किया, जिससे सुनील सप्रा का साइबर सुरक्षा क्षेत्र में प्रभाव और उनकी रणनीतिक समझ दोनों उजागर होती हैं.
सात एग्जिट और 1 अरब डॉलर से अधिक का एंटरप्राइज वैल्यू बनाने के साथ, सप्रा ने अपना करियर संभावनाओं को पहचानने, विकास को कई गुना बढ़ाने और संस्थापकों को महत्वाकांक्षा को परिणामों में बदलने में मदद करने के इर्द-गिर्द बनाया है.
उनकी वास्तविक ताकत यह पहचानने में है कि हर महत्वपूर्ण मोड़ पर किसी कारोबार को किस चीज की जरूरत है, पूंजी, बाजार तक पहुंच, रणनीतिक गठजोड़, बेहतर क्रियान्वयन या कभी-कभी सही एग्जिट.
वर्षों के दौरान, एक ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ के रूप में काम करने की इस क्षमता ने उन्हें भारत के साइबर सुरक्षा इकोसिस्टम में गहराई तक पहुंचाया है, जहां उन्होंने कंपनियों में निवेश किया और उन्हें वैश्विक टेक्नोलॉजी लीडर्स द्वारा किए गए महत्वपूर्ण अधिग्रहणों की दिशा में आगे बढ़ाने में मदद की.
2023 में Anlyz का Trend Micro ने अधिग्रहण किया और 2024 में PingSafe का SentinelOne ने अधिग्रहण किया. सप्रा दोनों सौदों में साझा निवेशक थे और M&A वैल्यू को अधिकतम करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इससे उन्हें भारत के साइबर सुरक्षा उद्यमिता परिदृश्य में एक विशिष्ट स्थान मिला है, क्योंकि वह भारत से वैश्विक लीडर्स तक लगातार दो साइबर सुरक्षा एग्जिट से जुड़े एकमात्र व्यक्ति हैं.
'फकीरिज्म' की कहानी
हालांकि, सप्रा की यात्रा को खास तौर पर दिलचस्प बनाने वाली बात यह है कि ये एग्जिट उनके कहीं व्यापक उद्यमशीलता करियर के केवल दिखाई देने वाले पड़ाव हैं. वह अपनी भूमिका को एक ग्रोथ पार्टनर, वेंचर बिल्डर और M&A वैल्यू-मैक्सिमाइजेशन एनेबलर के रूप में बताते हैं, जो तब कदम रखते हैं जब संस्थापकों को सेट-अप से लॉन्च, लॉन्च से स्केल और स्केल से एग्जिट की ओर बढ़ने की जरूरत होती है.
प्रोफेशनल जीवन को मापने के कई तरीके हैं. सुनील सप्रा के लिए पारंपरिक पैमाने, बनाई गई कंपनियां, बढ़ाए गए कारोबार, किए गए निवेश और हासिल किए गए एग्जिट, कहानी का केवल एक हिस्सा बताते हैं. दूसरा हिस्सा हिंदी कविता, दर्शन, आत्म-खोज और जिसे वह ‘फकीरिज्म’ कहते हैं, उसमें लिखा गया है.
साइबर सुरक्षा उद्यमी, ग्रोथ पार्टनर और M&A वैल्यू-मैक्सिमाइजेशन विशेषज्ञ सप्रा ने अपने करियर का बड़ा हिस्सा पर्दे के पीछे काम करते हुए बिताया है. उन्होंने संस्थापकों को सेट-अप और लॉन्च से लेकर स्केल और अंततः एग्जिट तक की जटिल यात्रा में आगे बढ़ने में मदद की है. उनके अनुसार, उन्होंने 30 से अधिक कंपनियों के साथ काम किया है, 1 अरब डॉलर से अधिक की एंटरप्राइज वैल्यू बनाने में योगदान दिया है और सात एग्जिट का हिस्सा रहे हैं.
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि वह अपनी पहचान की शुरुआत इन आंकड़ों से नहीं करते. उनके LinkedIn प्रोफाइल की शुरुआत इस सवाल से होती है, “Your startup has hit the ceiling and needs a Force Multiplier?” और इसके तुरंत बाद उनके बाबा की कृपा का उल्लेख आता है. शायद यह संयोजन किसी भी पदनाम से बेहतर तरीके से सप्रा की पहचान को दर्शाता है.
वह खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में बताते हैं, जिसे ‘मिडास टच’ देने के लिए चुना गया है और इस यात्रा का श्रेय वह ‘बाबा के जादू’ को देते हैं. इस श्रेय में विनम्रता है, लेकिन साथ ही उनकी विशिष्ट बेबाकी भी है. उनकी पेशेवर शब्दावली ‘MultiX’, ‘फोर्स मल्टीप्लायर’, ‘वैल्यू मैक्सिमाइजेशन के लिए ग्रोथ’ और ‘AAA+ orchestration, Align, Accelerate, Achieve’ जैसे वाक्यांशों से भरी है. वहीं, उनकी व्यक्तिगत शब्दावली ‘फकीरिज्म’, जुनून और अपनी रोशनी खोजने की बात करती है.
पहली नजर में ये दोनों दुनिया विरोधाभासी लगती हैं.
कारोबार बनाने से आगे, वैल्यू निर्माण
सप्रा का सबसे मजबूत पेशेवर जुड़ाव कारोबारों को महत्वपूर्ण मोड़ पर अपनी वैल्यू को अनलॉक करने में मदद करने से रहा है, चाहे इसका मतलब नए भौगोलिक बाजार में प्रवेश करना हो, सही ग्रोथ इंजन तलाशना हो, रणनीतिक गठजोड़ बनाना हो या भविष्य के किसी सौदे के लिए तैयारी करना हो.
साइबर सुरक्षा क्षेत्र में उनका रिकॉर्ड इसका एक खास अध्याय है.
2023 में Anlyz का Trend Micro ने अधिग्रहण किया. इसके एक साल बाद PingSafe का SentinelOne ने अधिग्रहण किया. सप्रा दोनों सौदों में साझा निवेशक थे और M&A वैल्यू-मैक्सिमाइजेशन की यात्रा में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इससे उन्हें एक ऐसी उपलब्धि हासिल होती है, जिस पर वह गर्व करते हैं: भारत से वैश्विक लीडर्स तक लगातार दो साइबर सुरक्षा एग्जिट में निवेशक के तौर पर शामिल होने वाले एकमात्र व्यक्ति होना.
हालांकि, उनका अनुभव केवल एग्जिट तक सीमित नहीं है. उनके पेशेवर सफर में तीन जॉइंट वेंचर, नौ APAC सेट-अप, लॉन्च और स्केल मैंडेट, चार किकस्टार्ट या रिवाइवल के साथ-साथ विभिन्न कंपनियों और क्षेत्रों में सलाहकारी कार्य और निवेश शामिल हैं.
इसलिए उनकी भूमिका शायद ही कभी किसी पारंपरिक कंसल्टेंट जैसी रही हो, जो कारोबार से बाहर बैठकर सलाह देता है. सप्रा खुद को कार्रवाई के ज्यादा करीब रखते हैं, एक ऐसे ग्रोथ पार्टनर के रूप में, जो संस्थापकों के साथ अपने समय और हितों को जोड़ने के लिए तैयार रहता है.
उनका दर्शन स्पष्ट है, “My time follows my money, and my money follows my time.”
संस्थापकों के लिए इसका मतलब एक सरल प्रस्ताव है: वह उन कारोबारों के साथ काम करना चाहते हैं, जहां उन्हें लगता है कि वह कारोबार की दिशा को वास्तविक रूप से बदल सकते हैं और जहां दोनों पक्ष आगे मिलने वाले लाभ में हिस्सेदारी के लिए तैयार हों.
उद्यमी के पीछे छिपा कवि
और फिर सुनील सप्रा का एक दूसरा रूप भी है. वह व्यक्ति जिसने 1,200 से अधिक हिंदी कविताएं लिखी हैं.
वह व्यक्ति जिसने 2017 में ‘फकीरा चल चला चल’ और 2024 में ‘कहत फकीरा सुन मेरे बंधु’ प्रकाशित कीं और जिसकी दो और किताबें फिलहाल निर्माणाधीन हैं.
वह व्यक्ति जो ‘फकीरा’ को जीवन के सवालों की अपनी खोज बताते हैं “FAQs of Life” का मिलन आत्मा से मिलने वाले विचित्र, ऊंचे उठाने वाले, ताजगी भरे और प्रामाणिक जवाबों से.
यह एंटरप्राइज वैल्यू और M&A की भाषा से एक उल्लेखनीय बदलाव है.
लेकिन शायद यह बदलाव है ही नहीं.
सप्रा के लिए कविता शायद उन सवालों को पूछने का एक और तरीका है, जिनका जवाब कारोबार हमेशा नहीं दे सकता: हम जो कर रहे हैं, वह क्यों कर रहे हैं? सफलता का मतलब क्या है? किसी व्यक्ति को किस चीज को पकड़े रखना चाहिए और किसे छोड़ देना चाहिए?
उनके लीडरशिप-कोचिंग फ्रेमवर्क ‘Rubaru’, ‘The Class Act’ और ‘RocK iT’ भी पेशेवर महत्वाकांक्षा को आत्मनिरीक्षण के साथ जोड़ते हैं. इनके विषयों में स्पष्टता, छोड़ देना, विस्तार, सरलीकरण, लचीलापन और बदलाव शामिल हैं.
इसके केंद्र में बार-बार आने वाला उनका निमंत्रण है, “अपने भीतर के फकीरा को जगाएं.”
## ग्रोथ माइंडसेट वाला योद्धा साधु
सप्रा खुद को “Warrior Monk - playfully curious” बताते हैं. यह अपनी पहचान बताने का एक असामान्य तरीका है, लेकिन उनके लिए उपयुक्त भी है.
योद्धा महत्वाकांक्षा, क्रियान्वयन और कठिन समस्याओं से निपटने की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है. साधु चिंतन, वैराग्य और इस समझ का प्रतिनिधित्व करता है कि परिणाम यात्रा का केवल एक हिस्सा हैं.
यही दर्शन इस बात को भी स्पष्ट करता है कि वह इस बात पर जोर क्यों देते हैं कि ग्रोथ का मतलब केवल राजस्व या वैल्यूएशन नहीं होना चाहिए. उनके फ्रेमवर्क में ‘PEG, Profitable Effective Growth’ के साथ संस्कृति और लचीलापन भी शामिल हैं.
उनके लिए किसी कंपनी की वास्तविक परीक्षा केवल यह नहीं है कि वह बढ़ती है या नहीं, बल्कि यह है कि वह प्रभावी और लाभदायक तरीके से बढ़ती है या नहीं और क्या उसके पास लंबे समय तक टिके रहने की संगठनात्मक ताकत है.
शायद यही वजह है कि उनकी पेशेवर पहचान धीरे-धीरे उद्यमी और निवेशक से आगे बढ़कर कुछ ऐसी बन गई है, जिसे परिभाषित करना मुश्किल है: संस्थापकों के लिए एक साउंडिंग बोर्ड, कारोबार के महत्वपूर्ण मोड़ पर एक रणनीतिक ऑपरेटर, एग्जिट की संभावना बनने पर एक M&A एनेबलर और जब सवाल ‘कंपनी के लिए आगे क्या?’ से बदलकर ‘मेरे लिए आगे क्या?’ हो जाए, तब एक कोच.
सफलता, थोड़े वैराग्य के साथ
सप्रा की प्रोफाइल में एक पंक्ति है, जो खास तौर पर उनकी सोच को उजागर करती है, “A cat that dreams of becoming a lion must lose its appetite for rats.”
यह पूरी तरह सप्रा के अंदाज की है, एक साथ उकसाने वाली, चंचल और दार्शनिक.
इसके बाद एक और पंक्ति आती है, “*Sach se badi koi maya nahin Faqeera, aur na maya se bada koi sach.*” इसका अर्थ है: सत्य से बड़ी कोई माया नहीं है और माया से बड़ा कोई सत्य नहीं है.
कोई इस दर्शन से सहमत हो या केवल शब्दों के खेल का आनंद ले, यह उनके पेशेवर उपलब्धियों के पीछे मौजूद व्यक्ति के बारे में कुछ बताता है. सप्रा शायद खुद को किसी एक श्रेणी में व्यवस्थित रूप से फिट करने के बजाय लगातार अपनी खुद की पहचान बनाने में अधिक रुचि रखते हैं.
साइबर सुरक्षा उद्यमी. ग्रोथ पार्टनर. निवेशक. M&A रणनीतिकार. लीडरशिप कोच. कवि. लेखक. फकीरा.
शायद सुनील सप्रा की यात्रा की सबसे दिलचस्प बात यह है कि वह इन सभी को अलग-अलग पहचान नहीं मानते. ये सभी एक ही जिज्ञासा की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं—निर्माण करना, सक्षम बनाना, सवाल करना और अंततः लगातार आगे बढ़ते रहना.
‘चल चला चल’—वह लिखते हैं. चलते रहो.
9 सितंबर को एक साथ 9 IPO खुलेंगे, इनमें Rentomojo का ₹1,255 करोड़ का इश्यू भी शामिल; नए सप्ताह में 3 मेनबोर्ड कंपनियों समेत 9 स्टॉक्स बाजार में करेंगे डेब्यू
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
7 सितंबर से शुरू होने वाला सप्ताह भारतीय प्राथमिक बाजार के लिए बेहद व्यस्त रहने वाला है. इस दौरान कुल 15 नए IPO खुलेंगे, जिनमें 11 मेनबोर्ड सेगमेंट के हैं. सबसे ज्यादा हलचल 9 सितंबर को देखने को मिलेगी, जब एक ही दिन 9 पब्लिक इश्यू खुलेंगे. इनमें फर्नीचर और घरेलू अप्लायंसेज किराए पर देने वाली कंपनी Rentomojo का ₹1,255.57 करोड़ का IPO भी शामिल है. इसके अलावा पहले से खुले Qualiance International IPO में भी निवेश का मौका मिलेगा. वहीं, नए सप्ताह में 9 कंपनियां शेयर बाजार में लिस्ट होंगी.
7 सितंबर को खुलेंगे दो IPO
Pranav Constructions IPO 7 सितंबर को खुलेगा और 9 सितंबर को बंद होगा. कंपनी इस इश्यू के जरिए ₹351.03 करोड़ जुटाना चाहती है. IPO का प्राइस बैंड ₹118-124 प्रति शेयर तय किया गया है और लॉट साइज 120 शेयर है. कंपनी के शेयरों की NSE और BSE पर 15 सितंबर को लिस्टिंग हो सकती है. Apana Logistics IPO भी 7 सितंबर को खुलेगा और 9 सितंबर को बंद होगा. इश्यू का साइज ₹34.14 करोड़ है और फाइनल इश्यू प्राइस ₹60 प्रति शेयर तय किया गया है. लॉट साइज 2,000 शेयर है. कंपनी के शेयर BSE SME पर 15 सितंबर को लिस्ट होने की उम्मीद है.
8 सितंबर को तीन बड़े IPO
Kanohar Electricals IPO 8 सितंबर को खुलेगा और 10 सितंबर को बंद होगा. कंपनी इस इश्यू से ₹1,055.74 करोड़ जुटाएगी. IPO का प्राइस बैंड ₹601-632 प्रति शेयर और लॉट साइज 23 शेयर है. शेयरों की NSE और BSE पर 16 सितंबर को लिस्टिंग हो सकती है. Prasol Chemicals IPO भी 8 सितंबर को खुलेगा. ₹500 करोड़ के इस इश्यू के लिए प्राइस बैंड ₹643-676 प्रति शेयर तय किया गया है. लॉट साइज 22 शेयर है और IPO 10 सितंबर को बंद होगा. कंपनी के शेयर NSE और BSE पर 16 सितंबर को लिस्ट हो सकते हैं.
Glass Wall Systems IPO का इश्यू साइज ₹427.89 करोड़ है. यह IPO 8 सितंबर को खुलेगा और 10 सितंबर को बंद होगा. प्राइस बैंड ₹172-182 प्रति शेयर और लॉट साइज 82 शेयर है. शेयरों की लिस्टिंग NSE और BSE पर 16 सितंबर को होने की उम्मीद है.
9 सितंबर को खुलेंगे 9 IPO
Rentomojo IPO 9 सितंबर को खुलेगा और 11 सितंबर को बंद होगा. कंपनी ₹1,255.57 करोड़ जुटाने की तैयारी में है. IPO का प्राइस बैंड ₹384-404 प्रति शेयर और लॉट साइज 37 शेयर है. कंपनी के शेयर NSE और BSE पर 17 सितंबर को लिस्ट होने वाले हैं. Asset Reconstruction Company IPO भी 9 सितंबर को खुलेगा. कंपनी इस इश्यू के जरिए ₹732.97 करोड़ जुटाना चाहती है. प्राइस बैंड ₹132-139 प्रति शेयर और लॉट साइज 107 शेयर है. IPO 11 सितंबर को बंद होगा और शेयर 17 सितंबर को NSE और BSE पर लिस्ट हो सकते हैं.
Manipal Payment & Identity Solutions IPO के जरिए कंपनी ₹805 करोड़ जुटाएगी. IPO 9 सितंबर से 11 सितंबर तक खुला रहेगा. प्राइस बैंड ₹322-339 प्रति शेयर और लॉट साइज 44 शेयर है. शेयरों की NSE और BSE पर 17 सितंबर को लिस्टिंग हो सकती है. LCC Projects IPO का साइज ₹427.14 करोड़ है. यह इश्यू 9 सितंबर को खुलेगा और 11 सितंबर को बंद होगा. प्राइस बैंड ₹139-146 प्रति शेयर और लॉट साइज 102 शेयर है. कंपनी के शेयर 17 सितंबर को NSE और BSE पर लिस्ट हो सकते हैं.
Karamtara Engineering IPO ₹875 करोड़ का है. इसमें 9 से 11 सितंबर तक बोली लगाई जा सकेगी. IPO का प्राइस बैंड ₹241-254 प्रति शेयर और लॉट साइज 59 शेयर है. कंपनी के शेयर NSE और BSE पर 17 सितंबर को लिस्ट होने की उम्मीद है. Infrax Renewable IPO का साइज ₹40.88 करोड़ है. यह इश्यू 9 सितंबर को खुलेगा और 11 सितंबर को बंद होगा. फाइनल इश्यू प्राइस ₹104 प्रति शेयर और लॉट साइज 1,200 शेयर है. शेयरों की BSE SME पर 17 सितंबर को लिस्टिंग हो सकती है.
Amtech Esters IPO के जरिए कंपनी ₹17.88 करोड़ जुटाएगी. IPO 9 सितंबर को खुलेगा और 11 सितंबर को बंद होगा. प्राइस बैंड ₹71-75 प्रति शेयर और लॉट साइज 1,600 शेयर है. कंपनी के शेयर BSE SME पर 17 सितंबर को लिस्ट होंगे. Vinod Texworld IPO ₹42.83 करोड़ का है. यह इश्यू 9 सितंबर से 11 सितंबर तक खुला रहेगा. फाइनल इश्यू प्राइस ₹94 प्रति शेयर और लॉट साइज 1,200 शेयर है. कंपनी की NSE SME पर 17 सितंबर को लिस्टिंग होने की उम्मीद है.
Steamhouse IPO भी 9 सितंबर को खुलेगा और 11 सितंबर को बंद होगा. इस इश्यू का साइज ₹414 करोड़ है. हालांकि, कंपनी ने अभी प्राइस बैंड तय नहीं किया है. शेयरों की NSE और BSE पर 17 सितंबर को लिस्टिंग हो सकती है.
10 सितंबर को खुलेगा Veegaland Developers IPO
Veegaland Developers IPO 10 सितंबर को खुलेगा और 15 सितंबर को बंद होगा. कंपनी इस इश्यू के जरिए ₹210 करोड़ जुटाना चाहती है. प्राइस बैंड ₹130-140 प्रति शेयर और लॉट साइज 107 शेयर है. कंपनी के शेयर NSE और BSE पर 18 सितंबर को लिस्ट हो सकते हैं.
पहले से खुले IPO में भी निवेश का मौका
Qualiance International IPO 4 सितंबर को खुल चुका है और इसमें 8 सितंबर तक निवेश किया जा सकता है. ₹45.11 करोड़ के इस इश्यू का प्राइस बैंड ₹120-127 प्रति शेयर और लॉट साइज 1,000 शेयर है. IPO अब तक 13.78 गुना सब्सक्राइब हो चुका है. कंपनी के शेयर NSE SME पर 11 सितंबर को लिस्ट हो सकते हैं.
7 सितंबर से 9 कंपनियों की लिस्टिंग
नए सप्ताह में 9 कंपनियां शेयर बाजार में कदम रखेंगी. 7 सितंबर को Purple Style Labs के शेयर NSE और BSE पर लिस्ट होंगे. इसी दिन NSE SME पर Ashutosh Fibre और Shanti Inorganics तथा BSE SME पर Phychem Technologies की लिस्टिंग हो सकती है.
8 सितंबर को Deepa Jewellers और Rays of Belief के शेयर NSE और BSE पर लिस्ट होने की उम्मीद है. इसी दिन BSE SME पर Fly-Hi Maritime Travels और Farm Peace के शेयरों की भी शुरुआत हो सकती है. वहीं, 11 सितंबर को Qualiance International के शेयर NSE SME पर लिस्ट हो सकते हैं.
निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?
एक ही सप्ताह में इतनी बड़ी संख्या में IPO खुलने और कंपनियों की लिस्टिंग से प्राथमिक बाजार में गतिविधियां तेज रहने की उम्मीद है. खासतौर पर मेनबोर्ड IPO में निवेशकों की दिलचस्पी पर बाजार की नजर रहेगी. हालांकि, किसी भी IPO में निवेश से पहले कंपनी के कारोबार, वित्तीय प्रदर्शन, वैल्यूएशन, इश्यू के उद्देश्य और जोखिमों का स्वतंत्र रूप से आकलन करना जरूरी है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
UBS की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब दो साल पहले प्रति डार्क स्टोर अनुमानित ₹1 करोड़ के मुकाबले अब लागत बढ़कर करीब ₹2.5 करोड़ हुई; क्विक कॉमर्स कंपनियां ग्रॉसरी से आगे बढ़ाकर इलेक्ट्रॉनिक्स, ब्यूटी और अन्य कैटेगरी में बढ़ा रही हैं कारोबार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
क्विक कॉमर्स कंपनियां बड़े फुलफिलमेंट सेंटर और ज्यादा प्रोडक्ट रेंज पर फोकस कर रही हैं, जिससे उनके डार्क स्टोर नेटवर्क में निवेश तेजी से बढ़ रहा है. UBS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, Eternal की Blinkit और Swiggy की Instamart ने प्रति डार्क स्टोर अनुमानित पूंजीगत खर्च (Capex) बढ़ाकर करीब ₹2.5 करोड़ कर दिया है, जो करीब दो साल पहले लगभग ₹1 करोड़ आंका गया था.
2,000-3,000 वर्ग फुट से बड़े स्टोर की ओर बढ़ रहीं कंपनियां
UBS के अनुसार, डार्क स्टोर के आकार में यह बदलाव क्विक कॉमर्स सेक्टर की बदलती रणनीति को दिखाता है. पहले 2,000-3,000 वर्ग फुट के पड़ोस आधारित स्टोर इस क्षेत्र में प्रमुख थे, लेकिन अब कंपनियां 5,000 वर्ग फुट से अधिक क्षेत्र वाले स्टोर खोल रही हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2,500-3,000 वर्ग फुट के डार्क स्टोर की मौजूदा लागत करीब ₹1.4-1.6 करोड़ है. वहीं 5,000 वर्ग फुट की सुविधा पर करीब ₹2.4-2.5 करोड़ और 7,000 वर्ग फुट के स्टोर पर लगभग ₹3 करोड़ खर्च आता है. इसमें संबंधित वेयरहाउस इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत भी शामिल है. UBS ने कहा कि पिछले एक से दो वर्षों में नए डार्क स्टोर का आकार 60-100 प्रतिशत तक बढ़ा है. 5,000 वर्ग फुट से ज्यादा क्षेत्र वाले स्टोर अब तेजी से आम हो रहे हैं.
ज्यादा इन्वेंट्री रखने में मदद
बड़े डार्क स्टोर कंपनियों को ज्यादा रिजर्व इन्वेंट्री रखने और स्थानीय स्तर पर लंबी पूंछ वाले स्टॉक-कीपिंग यूनिट्स (SKU) की व्यापक रेंज उपलब्ध कराने में मदद करते हैं. इससे वेयरहाउस से बार-बार सामान मंगाने की जरूरत कम हो जाती है. UBS के अनुमान के अनुसार, 2,500-3,000 वर्ग फुट की सुविधा में वेयरहाउस एरिया मल्टीपल करीब 1.0 गुना है. यह 5,000 वर्ग फुट के स्टोर में घटकर 0.8 गुना और 7,000 वर्ग फुट के स्टोर में 0.6 गुना तक आ सकता है.
डार्क स्टोर बन रहे मिनी फुलफिलमेंट सेंटर
बड़े स्टोर फॉर्मेट के साथ डार्क स्टोर की भूमिका भी बदल रही है. अब इन्हें केवल पड़ोस के ग्राहकों के लिए इन्वेंट्री रखने वाली जगह के बजाय मिनी फुलफिलमेंट सेंटर के रूप में डिजाइन किया जा रहा है.
UBS के मुताबिक, ऑर्डर वॉल्यूम बढ़ने के साथ कंपनियों को पिकिंग के लिए ज्यादा जगह, पैकिंग स्टेशन, डिलीवरी राइडर्स के लिए हैंडओवर एरिया और ऑर्डर स्टेजिंग स्पेस की जरूरत होती है. इससे स्टोर में भीड़ कम करने और डिलीवरी सर्विस का स्तर बनाए रखने में मदद मिलती है.
बढ़ सकता है नेटवर्क विस्तार का फंडिंग खर्च
डार्क स्टोर में बढ़ते पूंजी निवेश से क्विक कॉमर्स कंपनियों के नेटवर्क विस्तार के लिए फंडिंग की जरूरत बढ़ सकती है. हालांकि, बड़े स्टोर ज्यादा ऑर्डर संभालने और उपलब्ध क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद कर सकते हैं. UBS के अनुसार, जैसे-जैसे ऑर्डर वॉल्यूम बढ़ता है, बड़े फुलफिलमेंट सेंटर कंपनियों की थ्रूपुट और यूटिलाइजेशन बेहतर कर सकते हैं. इससे लंबे समय में क्विक कॉमर्स कंपनियों की यूनिट इकनॉमिक्स में सुधार की संभावना है.
सिर्फ डिलीवरी स्पीड नहीं, प्रोडक्ट रेंज भी बनी प्रतिस्पर्धा का आधार
UBS ने कहा कि बड़े डार्क स्टोर की ओर बढ़ने की प्रमुख वजह अब सिर्फ तेज डिलीवरी नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा प्रोडक्ट उपलब्ध कराने की प्रतिस्पर्धा भी है. क्विक कॉमर्स कंपनियां अब ग्रॉसरी और रोजमर्रा की जरूरतों वाले सामान से आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक्स, ब्यूटी और अन्य लॉन्ग-टेल प्रोडक्ट्स जैसी कैटेगरी में विस्तार कर रही हैं. इसके लिए ग्राहकों के नजदीक ज्यादा बड़ी और विविध प्रोडक्ट रेंज रखने की जरूरत पड़ रही है. यही वजह है कि कंपनियां बड़े डार्क स्टोर फॉर्मेट पर तेजी से निवेश कर रही हैं.