Blinkit और Instamart के डार्क स्टोर हुए महंगे, खर्च ₹2.5 करोड़ तक पहुंचा; बड़े स्टोर फॉर्मेट पर जोर

UBS की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब दो साल पहले प्रति डार्क स्टोर अनुमानित ₹1 करोड़ के मुकाबले अब लागत बढ़कर करीब ₹2.5 करोड़ हुई; क्विक कॉमर्स कंपनियां ग्रॉसरी से आगे बढ़ाकर इलेक्ट्रॉनिक्स, ब्यूटी और अन्य कैटेगरी में बढ़ा रही हैं कारोबार

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Saturday, 05 September, 2026
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क्विक कॉमर्स कंपनियां बड़े फुलफिलमेंट सेंटर और ज्यादा प्रोडक्ट रेंज पर फोकस कर रही हैं, जिससे उनके डार्क स्टोर नेटवर्क में निवेश तेजी से बढ़ रहा है. UBS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, Eternal की Blinkit और Swiggy की Instamart ने प्रति डार्क स्टोर अनुमानित पूंजीगत खर्च (Capex) बढ़ाकर करीब ₹2.5 करोड़ कर दिया है, जो करीब दो साल पहले लगभग ₹1 करोड़ आंका गया था.

2,000-3,000 वर्ग फुट से बड़े स्टोर की ओर बढ़ रहीं कंपनियां

UBS के अनुसार, डार्क स्टोर के आकार में यह बदलाव क्विक कॉमर्स सेक्टर की बदलती रणनीति को दिखाता है. पहले 2,000-3,000 वर्ग फुट के पड़ोस आधारित स्टोर इस क्षेत्र में प्रमुख थे, लेकिन अब कंपनियां 5,000 वर्ग फुट से अधिक क्षेत्र वाले स्टोर खोल रही हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2,500-3,000 वर्ग फुट के डार्क स्टोर की मौजूदा लागत करीब ₹1.4-1.6 करोड़ है. वहीं 5,000 वर्ग फुट की सुविधा पर करीब ₹2.4-2.5 करोड़ और 7,000 वर्ग फुट के स्टोर पर लगभग ₹3 करोड़ खर्च आता है. इसमें संबंधित वेयरहाउस इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत भी शामिल है. UBS ने कहा कि पिछले एक से दो वर्षों में नए डार्क स्टोर का आकार 60-100 प्रतिशत तक बढ़ा है. 5,000 वर्ग फुट से ज्यादा क्षेत्र वाले स्टोर अब तेजी से आम हो रहे हैं.

ज्यादा इन्वेंट्री रखने में मदद

बड़े डार्क स्टोर कंपनियों को ज्यादा रिजर्व इन्वेंट्री रखने और स्थानीय स्तर पर लंबी पूंछ वाले स्टॉक-कीपिंग यूनिट्स (SKU) की व्यापक रेंज उपलब्ध कराने में मदद करते हैं. इससे वेयरहाउस से बार-बार सामान मंगाने की जरूरत कम हो जाती है. UBS के अनुमान के अनुसार, 2,500-3,000 वर्ग फुट की सुविधा में वेयरहाउस एरिया मल्टीपल करीब 1.0 गुना है. यह 5,000 वर्ग फुट के स्टोर में घटकर 0.8 गुना और 7,000 वर्ग फुट के स्टोर में 0.6 गुना तक आ सकता है.

डार्क स्टोर बन रहे मिनी फुलफिलमेंट सेंटर

बड़े स्टोर फॉर्मेट के साथ डार्क स्टोर की भूमिका भी बदल रही है. अब इन्हें केवल पड़ोस के ग्राहकों के लिए इन्वेंट्री रखने वाली जगह के बजाय मिनी फुलफिलमेंट सेंटर के रूप में डिजाइन किया जा रहा है.

UBS के मुताबिक, ऑर्डर वॉल्यूम बढ़ने के साथ कंपनियों को पिकिंग के लिए ज्यादा जगह, पैकिंग स्टेशन, डिलीवरी राइडर्स के लिए हैंडओवर एरिया और ऑर्डर स्टेजिंग स्पेस की जरूरत होती है. इससे स्टोर में भीड़ कम करने और डिलीवरी सर्विस का स्तर बनाए रखने में मदद मिलती है.

बढ़ सकता है नेटवर्क विस्तार का फंडिंग खर्च

डार्क स्टोर में बढ़ते पूंजी निवेश से क्विक कॉमर्स कंपनियों के नेटवर्क विस्तार के लिए फंडिंग की जरूरत बढ़ सकती है. हालांकि, बड़े स्टोर ज्यादा ऑर्डर संभालने और उपलब्ध क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद कर सकते हैं. UBS के अनुसार, जैसे-जैसे ऑर्डर वॉल्यूम बढ़ता है, बड़े फुलफिलमेंट सेंटर कंपनियों की थ्रूपुट और यूटिलाइजेशन बेहतर कर सकते हैं. इससे लंबे समय में क्विक कॉमर्स कंपनियों की यूनिट इकनॉमिक्स में सुधार की संभावना है.

सिर्फ डिलीवरी स्पीड नहीं, प्रोडक्ट रेंज भी बनी प्रतिस्पर्धा का आधार

UBS ने कहा कि बड़े डार्क स्टोर की ओर बढ़ने की प्रमुख वजह अब सिर्फ तेज डिलीवरी नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा प्रोडक्ट उपलब्ध कराने की प्रतिस्पर्धा भी है. क्विक कॉमर्स कंपनियां अब ग्रॉसरी और रोजमर्रा की जरूरतों वाले सामान से आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक्स, ब्यूटी और अन्य लॉन्ग-टेल प्रोडक्ट्स जैसी कैटेगरी में विस्तार कर रही हैं. इसके लिए ग्राहकों के नजदीक ज्यादा बड़ी और विविध प्रोडक्ट रेंज रखने की जरूरत पड़ रही है. यही वजह है कि कंपनियां बड़े डार्क स्टोर फॉर्मेट पर तेजी से निवेश कर रही हैं.
 


India-EU FTA: कारोबारियों के लिए खुला 24 ट्रिलियन डॉलर का बाजार, मैन्युफैक्चरिंग से टेक्नोलॉजी तक मिलेंगे बड़े अवसर

पीयूष गोयल ने कहा- 27 देशों के यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता सप्लाई चेन को बनाएगा मजबूत; भारत और बेल्जियम के बीच सेमीकंडक्टर, रक्षा, ग्रीन हाइड्रोजन और कृषि क्षेत्र में सहयोग की बड़ी संभावनाएं

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 05 September, 2026
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Saturday, 05 September, 2026
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वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को कहा कि यूरोपीय संघ (EU) के साथ हाल ही में संपन्न मुक्त व्यापार समझौता (FTA) भारतीय कारोबारियों के लिए मैन्युफैक्चरिंग, सेवाओं, कृषि, टेक्नोलॉजी और निवेश के क्षेत्र में बड़े अवसर खोलेगा. उन्होंने कहा कि यह समझौता भारत और यूरोप के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के साथ वैश्विक सप्लाई चेन में लचीलापन बढ़ाने में भी मदद करेगा.

मुंबई में भारत-बेल्जियम उच्चस्तरीय संवाद के दौरान बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की मौजूदगी में गोयल ने कहा कि इस समझौते पर बातचीत के दौरान दोनों बाजारों के संवेदनशील क्षेत्रों के हितों की सुरक्षा का ध्यान रखा गया है.

25 साल बाद हुआ समझौता

गोयल ने कहा कि करीब 25 वर्षों की बातचीत के बाद यह व्यापार समझौता पूरा हुआ है. इसके जरिए करीब 24 ट्रिलियन डॉलर के बाजार और लगभग 2 अरब लोगों तक पहुंच का रास्ता खुलेगा. उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देश समझौते से जुड़ी औपचारिकताएं जल्द पूरी कर इसे लागू करने के समर्थन में हैं.

बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर ने कहा कि यह समझौता भारत और यूरोप के बीच व्यापार एवं निवेश संबंधों को मजबूत करेगा और दोनों अर्थव्यवस्थाओं को सप्लाई चेन में आने वाले व्यवधानों के प्रति अधिक लचीला बनाएगा. उनके मुताबिक, समझौते के तहत भारत और यूरोप के 95 प्रतिशत से अधिक वस्तु निर्यात पर टैरिफ या तो खत्म किए जाएंगे या उनमें कटौती की जाएगी.

डायमंड, फार्मा और ग्रीन हाइड्रोजन में सहयोग की संभावना

डी वेवर ने कहा कि इस समझौते से डायमंड, फूड प्रोसेसिंग, फार्मास्युटिकल्स, समुद्री सेवाओं, ग्रीन हाइड्रोजन और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा सकता है. उन्होंने एंटवर्प-ब्रुग्स बंदरगाह को भारत और यूरोप के बीच महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स गेटवे बताया. गोयल ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार लगभग दोगुना होकर करीब 140 अरब डॉलर पर पहुंच गया है.

सेमीकंडक्टर और रक्षा क्षेत्र पर जोर

गोयल ने भारत और बेल्जियम के बीच सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा, उन्नत विनिर्माण, ग्रीन हाइड्रोजन, कृषि और फूड प्रोसेसिंग में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं बताईं. उन्होंने कहा कि माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स रिसर्च में बेल्जियम की विशेषज्ञता को भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और प्रतिभा के साथ जोड़ा जा सकता है. इससे डिजाइन से लेकर सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन तक एक मजबूत इकोसिस्टम विकसित करने में मदद मिलेगी.

गोयल ने बेल्जियम की इंजीनियरिंग कंपनी John Cockerill के साथ काउंटर-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और प्रिसिजन म्यूनिशन जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावना भी जताई. उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने हाल में इस दिशा में समझौता ज्ञापनों का आदान-प्रदान किया है.

एंटवर्प-मुंबई-सूरत के बीच डायमंड सहयोग

जेम्स एंड ज्वेलरी क्षेत्र में गोयल ने एंटवर्प, मुंबई और सूरत के प्रमुख डायमंड केंद्रों के बीच सहयोग बढ़ाने का प्रस्ताव दिया. इसमें लैब-ग्रोउन डायमंड और सर्टिफिकेशन जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं. उन्होंने कहा कि भारत और बेल्जियम ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी साथ काम कर सकते हैं. भारत की उत्पादन क्षमता को एंटवर्प-ब्रुग्स की बंकरिंग और ग्रीन शिपिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ा जा सकता है. कृषि और फूड प्रोसेसिंग में आलू प्रसंस्करण, कोल्ड चेन और टिकाऊ कृषि मूल्य श्रृंखला विकसित करने पर भी दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं हैं.

सेमीकंडक्टर से अंतरिक्ष तक भारत का फोकस

गोयल ने भारत की बढ़ती टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षाओं का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि भारत सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में तेजी से विस्तार कर रहा है. उन्होंने बताया कि भारत के दूसरे सेमीकंडक्टर कार्यक्रम Semicon India 2.0 के लिए 14 अरब डॉलर का प्रावधान है, जिससे इस क्षेत्र में करीब 70 अरब डॉलर का निवेश आकर्षित होने की उम्मीद है.

गोयल के मुताबिक, भारत की स्पेस इकोनॉमी फिलहाल करीब 8.5 अरब डॉलर की है और निजी कंपनियों तथा स्टार्टअप्स की भागीदारी से अगले आठ वर्षों में इसके 44 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है. उन्होंने कहा कि भारत ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी का रास्ता भी खोला है और अगले दो दशकों में 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता विकसित करने की योजना है.

स्किल और वर्कफोर्स मोबिलिटी पर जोर

गोयल ने भारत और बेल्जियम के बीच वर्कफोर्स मोबिलिटी बढ़ाने, योग्यताओं की पारस्परिक मान्यता, संयुक्त कौशल विकास और डुअल-डिग्री कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई. खासकर उन क्षेत्रों में सहयोग पर जोर दिया गया जहां बेल्जियम में कुशल कर्मचारियों की कमी है. उन्होंने कहा कि मौजूदा भू-राजनीतिक और सप्लाई चेन अनिश्चितता के दौर में भारत और बेल्जियम को अधिक स्थिर और भरोसेमंद आर्थिक संबंध विकसित करने चाहिए.

गोयल ने कहा कि बेल्जियम की टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और पूंजी को भारत के बड़े बाजार, प्रतिभा और वर्कफोर्स के साथ जोड़कर दोनों देश वैश्विक स्तर पर बेहद मजबूत प्रतिस्पर्धी क्षमता तैयार कर सकते हैं.

यूरोपीय बाजार के लिए भारत के कारोबारियों का गेटवे बनेगा बेल्जियम

गोयल ने कहा कि बेल्जियम यूरोपीय बाजार में प्रवेश करने की इच्छा रखने वाली भारतीय कंपनियों के लिए गेटवे की भूमिका निभा सकता है. एंटवर्प-ब्रुग्स बंदरगाह सड़क, रेल, अंतर्देशीय जलमार्ग और डीप-वॉटर कनेक्टिविटी के जरिए यूरोप के विभिन्न हिस्सों को जोड़ता है.

उन्होंने बेल्जियम की कंपनियों को भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए आमंत्रित किया. गोयल ने कहा कि भारत में बड़ा बाजार, युवा कार्यबल और तेजी से विस्तार करता औद्योगिक एवं टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम मौजूद है.
 


विदेशी मुद्रा भंडार ने बनाया नया रिकॉर्ड, $11.47 अरब बढ़कर 740.80 अरब डॉलर पर पहुंचा

लगातार दूसरे सप्ताह जोरदार बढ़ोतरी, विदेशी मुद्रा संपत्ति और सोने के भंडार में भी उछाल; 28 अगस्त तक के आंकड़ों में दिखी मजबूत स्थिति

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 05 September, 2026
Last Modified:
Saturday, 05 September, 2026
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भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार दूसरे सप्ताह जोरदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है. 28 अगस्त को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 11.47 अरब डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 740.80 अरब डॉलर पर पहुंच गया. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, इससे पिछले सप्ताह यानी 21 अगस्त को समाप्त सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार 12.422 अरब डॉलर बढ़कर 729.328 अरब डॉलर पर पहुंचा था.

विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार हो रही बढ़ोतरी से देश की बाहरी वित्तीय स्थिति और विदेशी मुद्रा बाजार में मजबूती का संकेत मिलता है. पिछले कुछ सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में तेज वृद्धि देखने को मिली है, जिससे यह एक नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है.

विदेशी मुद्रा संपत्ति में 9.34 अरब डॉलर की बढ़ोतरी

देश के विदेशी मुद्रा भंडार में सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा संपत्तियों (FCA) का होता है. 28 अगस्त को समाप्त सप्ताह में FCA 9.337 अरब डॉलर बढ़कर 600.67 अरब डॉलर हो गई. मार्च 2026 के अंत के मुकाबले विदेशी मुद्रा संपत्तियों में अब तक 48.387 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हो चुकी है. वहीं, एक साल पहले की तुलना में FCA 16.73 अरब डॉलर अधिक है. विदेशी मुद्रा संपत्तियों में बदलाव पर डॉलर के मुकाबले अन्य प्रमुख मुद्राओं की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी असर पड़ता है.

सोने के भंडार में भी जोरदार बढ़ोतरी

विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी के साथ देश के सोने के भंडार में भी इजाफा हुआ है. 28 अगस्त वाले सप्ताह में भारत का गोल्ड रिजर्व 2.191 अरब डॉलर बढ़कर 116.409 अरब डॉलर हो गया. मार्च के अंत के मुकाबले सोने के भंडार में 1.014 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है. वहीं, एक साल पहले की तुलना में इसमें 29.641 अरब डॉलर का बड़ा इजाफा दर्ज किया गया है.

SDR भंडार में मामूली गिरावट

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में भारत का स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) भंडार 18.81 अरब डॉलर रहा. इसमें पिछले सप्ताह की तुलना में 43 मिलियन डॉलर की कमी आई है. हालांकि, मार्च 2026 के अंत के मुकाबले SDR भंडार 188 मिलियन डॉलर बढ़ा है. इसी तरह, IMF में भारत की रिजर्व पोजिशन 11 मिलियन डॉलर घटकर 4.914 अरब डॉलर रह गई. हालांकि, मार्च के अंत के मुकाबले इसमें 106 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई है.

विदेशी मुद्रा बाजार पर RBI की नजर

RBI विदेशी मुद्रा बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव पर लगातार नजर रखता है. जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बैंक बाजार में हस्तक्षेप करता है, ताकि विदेशी मुद्रा बाजार में कारोबार व्यवस्थित तरीके से चलता रहे. हालांकि, RBI का उद्देश्य किसी एक निश्चित विनिमय दर को बनाए रखना नहीं है. केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप मुख्य रूप से बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव और अस्थिरता को नियंत्रित करने पर केंद्रित रहता है.
 


चीनी के दाम घटे, सरकार ने बढ़ाई ड्यूटी-फ्री रॉ शुगर इंपोर्ट की डेडलाइन; त्योहारों से पहले राहत

सरकार के कदमों का असर दिखना शुरू, हफ्तेभर में चीनी की खुदरा कीमत करीब ₹2 प्रति किलो घटी; हालांकि एक महीने पहले के मुकाबले अब भी 25% महंगी

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 05 September, 2026
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Saturday, 05 September, 2026
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त्योहारी सीजन से पहले चीनी की बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए सरकार की ओर से किए जा रहे उपायों का असर अब बाजार में दिखाई देने लगा है. देशभर में चीनी की औसत खुदरा कीमत पिछले एक सप्ताह में करीब 2 रुपये प्रति किलो घट गई है. इसी बीच सरकार ने ड्यूटी-फ्री रॉ शुगर के आयात के लिए चीनी मिलों को आवेदन करने की समयसीमा भी बढ़ाकर 7 सितंबर कर दी है.

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक, चीनी मिलें एडवांस ऑथराइजेशन को टैरिफ रेट कोटा (TRQ) में बदलने के लिए 7 सितंबर तक आवेदन कर सकती हैं. सरकार के इस कदम का उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना और त्योहारी मांग के दौरान कीमतों पर दबाव को नियंत्रित करना है.

शुक्रवार को ₹61.93 किलो रहा चीनी का औसत भाव

उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, शुक्रवार को देशभर में चीनी का औसत खुदरा भाव 61.93 रुपये प्रति किलो रहा. एक सप्ताह पहले यह कीमत 64.10 रुपये प्रति किलो थी. यानी इस अवधि में चीनी करीब 2.17 रुपये प्रति किलो सस्ती हुई है. हालांकि, एक महीने पहले के मुकाबले चीनी अभी भी काफी महंगी है. एक महीने पहले इसका औसत खुदरा भाव 49.71 रुपये प्रति किलो था. इस लिहाज से मौजूदा कीमत करीब 25 फीसदी ज्यादा है.

सरकार और चीनी उद्योग संगठन इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) दोनों का कहना है कि देश में चीनी की कमी नहीं है. इसके बावजूद त्योहारी मांग और कीमतों में तेजी को देखते हुए सरकार लगातार बाजार की स्थिति पर नजर रख रही है.

10 लाख टन रॉ शुगर के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की मंजूरी

चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कॉमर्स मिनिस्ट्री ने 20 अगस्त को टैरिफ रेट कोटा (TRQ) स्कीम के तहत 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन रॉ शुगर के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की अनुमति दी थी. इसके बाद DGFT ने इस कोटे में बचे करीब 2 लाख टन रॉ शुगर के आयात के लिए नए सिरे से आवेदन आमंत्रित किए थे. अब सरकार ने आवेदन की समयसीमा बढ़ाकर 7 सितंबर कर दी है. इससे चीनी मिलों को आयात प्रक्रिया पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा और घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

त्योहारों से पहले कीमतों पर नजर

देश में त्योहारी सीजन शुरू होने के साथ चीनी की मांग बढ़ने की उम्मीद है. ऐसे में सरकार के सामने घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने के साथ कीमतों को नियंत्रित करने की चुनौती है. पिछले कुछ समय में चीनी की कीमतों में तेजी ने सरकार की चिंता बढ़ाई थी. इसके बाद स्टॉक लिमिट और आयात जैसे कई उपाय किए गए. अब कीमतों में आई शुरुआती नरमी को सरकार के इन कदमों के असर के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि, मौजूदा भाव अभी भी एक महीने पहले की तुलना में काफी ऊंचा है. इसलिए आने वाले दिनों में त्योहारी मांग, घरेलू उपलब्धता और आयात की रफ्तार यह तय करेगी कि चीनी की कीमतों में और कितनी नरमी आती है.
 


बैंकिंग सिस्टम में ₹10.3 लाख करोड़ की रिकॉर्ड नकदी, अक्टूबर में RBI बढ़ा सकता है ब्याज दरें

अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए RBI 7 लाख करोड़ रुपये की 30-दिन की VRRR नीलामी करेगा; अक्टूबर की मौद्रिक नीति बैठक से पहले ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना पर बाजार की नजर

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Published - Saturday, 05 September, 2026
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Saturday, 05 September, 2026
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भारतीय बैंकिंग तंत्र में रिकॉर्ड 10.3 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त लिक्विडिटी के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अगले कदम को लेकर बाजार में हलचल बढ़ गई है. केंद्रीय बैंक ने शुक्रवार को कहा हा कि वह सोमवार को 7 लाख करोड़ रुपये की 30-दिन की वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी करेगा. इसके साथ ही 5 से 7 अक्टूबर को होने वाली मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना भी जताई जा रही है.

बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त लिक्विडिटी गुरुवार को बढ़कर 10.3 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, जबकि बुधवार को यह 9.7 लाख करोड़ रुपये थी. लिक्विडिटी में इस तेज बढ़ोतरी की प्रमुख वजह विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा यानी FCNR(B) के लिए RBI की रियायती स्वैप विंडो रही. इस विंडो के जरिये बैंकों ने रिकॉर्ड 127.2 अरब डॉलर जुटाए थे. यह सुविधा 31 अगस्त को बंद हो गई.

RBI ने VRRR नीलामी में किया बदलाव

RBI ने सोमवार को होने वाली VRRR नीलामी को बैंकों के लिए ज्यादा लचीला बनाया है. पहली बार बैंकों को नीलामी में जमा की गई रकम को तय अवधि पूरी होने से पहले आंशिक रूप से निकालने की अनुमति दी गई है. केंद्रीय बैंक ने कहा कि समय से पहले निकासी का अनुरोध मूल निकासी तारीख से कम से कम दो कार्यदिवस पहले किया जा सकता है.

बाजार के जानकारों का मानना है कि इस बदलाव से VRRR नीलामी में बैंकों की भागीदारी बढ़ सकती है. महीने के अंत में कर भुगतान की जरूरत को देखते हुए बैंक लंबे समय तक अपनी रकम लॉक करने से हिचक रहे थे. ऐसे में समय से पहले रकम निकालने का विकल्प उन्हें नीलामी में अधिक पैसा रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है.

अक्टूबर में ब्याज दर बढ़ने की संभावना

बाजार में इस बात की चर्चा तेज है कि अक्टूबर की मौद्रिक नीति बैठक में RBI ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है. एक निजी बैंक के ट्रेजरी प्रमुख के मुताबिक, रुपये पर दबाव, ऊंची बॉन्ड यील्ड और बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी के असंतुलन को देखते हुए ब्याज दर बढ़ाना केंद्रीय बैंक के लिए उपयुक्त कदम हो सकता है. बाजार भागीदारों का यह भी मानना है कि VRRR के जरिये अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के कदम से अक्टूबर की MPC बैठक से पहले RBI के रुख का संकेत मिल सकता है.

एक सरकारी बैंक के डीलर ने कहा कि आंशिक निकासी की सुविधा से बाजार को राहत मिल सकती है. उनके मुताबिक, इससे बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड में 2-3 आधार अंकों की नरमी देखने को मिल सकती है.

विदेशी मुद्रा भंडार भी रिकॉर्ड स्तर पर

FCNR(B) स्वैप विंडो के कारण बैंकिंग सिस्टम में आई अतिरिक्त लिक्विडिटी का असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दिखाई दिया है. 28 अगस्त को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर रिकॉर्ड 740.8 अरब डॉलर पर पहुंच गया. पिछले लगातार नौ सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में 73.9 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है. यह अप्रैल-जून 2021 के बाद विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी का सबसे लंबा सिलसिला है. भंडार का सबसे बड़ा घटक विदेशी मुद्रा संपत्तियां (FCA) इस सप्ताह 9.34 अरब डॉलर बढ़कर 600 अरब डॉलर पर पहुंच गईं.
 


NSE IPO: ₹30,000 करोड़ के मेगा इश्यू को SEBI की मंजूरी, OFS के जरिए होगी हिस्सेदारी बिक्री

करीब ₹30,000 करोड़ के संभावित इश्यू के साथ NSE का IPO देश के सबसे बड़े सार्वजनिक निर्गमों में शामिल हो सकता है. NSE ने इस साल जून में IPO के लिए ड्राफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट सेबी के पास दाखिल किया था.

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Published - Saturday, 05 September, 2026
Last Modified:
Saturday, 05 September, 2026
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नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के बहुप्रतीक्षित IPO का रास्ता अब लगभग साफ हो गया है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने NSE के ड्राफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट को मंजूरी दे दी है. करीब ₹30,000 करोड़ के संभावित इश्यू के साथ NSE का IPO देश के सबसे बड़े सार्वजनिक निर्गमों में शामिल हो सकता है. NSE ने इस साल जून में IPO के लिए ड्राफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट सेबी के पास दाखिल किया था.

पूरी तरह ऑफर-फॉर-सेल होगा IPO

ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) के मुताबिक, NSE का प्रस्तावित IPO पूरी तरह ऑफर-फॉर-सेल (OFS) होगा. यानी NSE इस इश्यू के जरिए नई पूंजी नहीं जुटाएगा. मौजूदा बड़े शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचेंगे और IPO से मिलने वाली पूरी रकम उन्हीं शेयरधारकों के पास जाएगी. इस इश्यू में ₹1 अंकित मूल्य वाले 14.89 करोड़ तक शेयरों की बिक्री शामिल है. इसमें भारतीय स्टेट बैंक (SBI) समेत NSE के अन्य मौजूदा बड़े निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेच सकते हैं.

लंबे समय से अटका था NSE का IPO

NSE के IPO की प्रक्रिया नई नहीं है. एक्सचेंज ने दिसंबर 2016 में करीब ₹10,000 करोड़ के इश्यू के लिए पहली बार DRHP दाखिल किया था. हालांकि, को-लोकेशन विवाद के बाद IPO की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी थी. अब सेबी की मंजूरी मिलने के बाद NSE के IPO की लिस्टिंग की दिशा में एक बड़ा कदम पूरा हो गया है. कंपनी संभावित निवेशकों से संपर्क और IPO से पहले की तैयारियों पर भी काम कर रही है.

NSE के बाद Jio Platforms पर भी नजर

शेयर बाजार में NSE के IPO के साथ रिलायंस इंडस्ट्रीज की डिजिटल और टेक्नोलॉजी कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स के संभावित IPO पर भी निवेशकों की नजर है. रिपोर्ट के मुताबिक, जियो प्लेटफॉर्म्स करीब 4 अरब डॉलर का IPO अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में ला सकती है. NSE और जियो प्लेटफॉर्म्स जैसे बड़े इश्यू आने वाले महीनों में भारतीय IPO बाजार के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं.

 


सेबी का CAS पर बड़ा फैसला, डेरिवेटिव सेटलमेंट कीमत के नियम बदलने की तैयारी

## क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) की कीमत और सामान्य कारोबार के भाव में अंतर पर बाजार प्रतिभागियों की चिंता के बाद सेबी ला सकता है नई व्यवस्था

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Published - Friday, 04 September, 2026
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Friday, 04 September, 2026
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भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की सेटलमेंट कीमत तय करने के मौजूदा तरीके में बदलाव की तैयारी कर रहा है. क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) लागू होने के बाद क्लोजिंग कीमत और सामान्य कारोबारी घंटों के दौरान चल रहे भाव में अंतर को लेकर बाजार प्रतिभागियों ने चिंता जताई थी. इसी फीडबैक के आधार पर सेबी करीब एक सप्ताह के भीतर इस संबंध में कंसल्टेशन पेपर जारी कर सकता है.

एक्सपायरी पर सेटलमेंट कीमत को लेकर बदलाव

नई व्यवस्था में CAS के जरिए तय होने वाली क्लोजिंग कीमत का इस्तेमाल एक्सपायरी के दिन डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की सेटलमेंट कीमत तय करने के लिए किया जाता है. बाजार प्रतिभागियों ने खास तौर पर उन मौकों पर चिंता जताई है, जब CAS के दौरान तय कीमत और सामान्य ट्रेडिंग सत्र के भाव में बड़ा अंतर देखने को मिला.

सेबी ने गुरुवार को जारी एक प्रेस रिलीज में कहा कि CAS लागू होने के शुरुआती अनुभव और विभिन्न हितधारकों से मिली प्रतिक्रिया के आधार पर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की सेटलमेंट कीमत तय करने के तरीके में कुछ बदलाव प्रस्तावित किए जा सकते हैं. इस संबंध में कंसल्टेशन पेपर करीब एक सप्ताह में जारी होने की उम्मीद है.

3 अगस्त से लागू हुआ CAS

क्लोजिंग ऑक्शन सेशन की 20 मिनट की व्यवस्था 3 अगस्त से लागू हुई थी. इसके बाद कई मौकों पर CAS के दौरान कीमतों में अचानक बदलाव और सामान्य ट्रेडिंग के मुकाबले अलग क्लोजिंग प्राइस को लेकर सवाल उठे. एक्सपायरी वाले दिनों में यह अंतर और अधिक स्पष्ट दिखाई दिया.

इसके अलावा, एक्सचेंजों ने CAS से जुड़े कुछ नियमों में भी बदलाव किया है. इसके तहत दोपहर 3 बजे से 3:15 बजे के बीच कारोबार के वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) का इस्तेमाल स्टॉक और इंडेक्स फ्यूचर्स की रेफरेंस कीमत तय करने के लिए किया जा सकता है.

सेंसेक्स-निफ्टी की क्लोजिंग में भी दिखा अंतर

CAS लागू होने के बाद पिछले महीने सेंसेक्स और निफ्टी की क्लोजिंग में अंतर देखने को मिला था. सेंसेक्स की एक्सपायरी वाले एक दिन निफ्टी 40 अंक यानी 0.16 फीसदी गिरकर 24,396 पर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स 114 अंक यानी 0.15 फीसदी बढ़कर 78,080 पर बंद हुआ. दोनों सूचकांकों के प्रदर्शन में 0.31 प्रतिशत अंक का अंतर रहा.

बाजार प्रतिभागियों से सेबी ने मांगा फीडबैक

CAS की समीक्षा के लिए सेबी ने बाजार प्रतिभागियों, स्टॉक ब्रोकरों, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI), म्यूचुअल फंड और अन्य हितधारकों के साथ कई बैठकें की हैं. इन बैठकों में CAS के शुरुआती प्रभाव और उससे जुड़े मुद्दों पर राय ली गई.

सेबी के मुताबिक, हितधारकों की ओर से उठाए गए प्रमुख मुद्दों में एक्सपायरी पर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की सेटलमेंट कीमत तय करने का तरीका भी शामिल है. फिलहाल यह कीमत CAS के जरिए तय होने वाली क्लोजिंग प्राइस के आधार पर निर्धारित की जाती है.

 


सेंसेक्स 76,153 के नीचे, निफ्टी भी कमजोर; 23 शेयरों में गिरावट, आज इन स्टॉक्स पर फोकस

गुरुवार को सेंसेक्स 417.49 अंक यानी 0.55 फीसदी टूटकर 76,152.86 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 41 अंक यानी 0.17 फीसदी की गिरावट के साथ 23,873.45 के स्तर पर रहा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Friday, 04 September, 2026
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Friday, 04 September, 2026
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पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की चिंता के बीच भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को लगातार दूसरे कारोबारी सत्र गिरावट रही. शुरुआती कारोबार में मजबूती के बावजूद बिकवाली हावी होने से सेंसेक्स 417.49 अंक यानी 0.55 फीसदी टूटकर 76,152.86 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 41 अंक यानी 0.17 फीसदी की गिरावट के साथ 23,873.45 के स्तर पर रहा. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 23 गिरावट के साथ बंद हुए, जबकि केवल 7 शेयरों में तेजी रही. टाइटन सबसे ज्यादा 2.17 फीसदी टूटा, जबकि एक्सिस बैंक 0.89 फीसदी की बढ़त के साथ सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले शेयरों में रहा.

शुरुआत में बाजार में दिखी थी तेजी

गुरुवार को घरेलू शेयर बाजार की शुरुआत बढ़त के साथ हुई थी. सेंसेक्स करीब 278 अंक यानी 0.36 फीसदी की तेजी के साथ 76,848.98 के स्तर पर खुला था. वहीं, निफ्टी भी शुरुआती कारोबार में 23,978.85 के स्तर तक पहुंचा. हालांकि, कारोबार आगे बढ़ने के साथ बिकवाली का दबाव बढ़ा और बाजार अपनी शुरुआती बढ़त गंवाकर लाल निशान में बंद हुआ.

टाइटन समेत इन शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट

सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 23 में गिरावट रही. टाइटन 2.17 फीसदी टूटकर 4,960 रुपये के स्तर पर बंद हुआ. इसके अलावा ट्रेंट में 1.93 फीसदी, आईटीसी में 1.63 फीसदी, महिंद्रा एंड महिंद्रा में 1.62 फीसदी, बजाज फिनसर्व में 1.61 फीसदी, एचसीएल टेक में 1.55 फीसदी, टेक महिंद्रा में 1.54 फीसदी, सन फार्मा में 1.50 फीसदी, टीसीएस में 1.41 फीसदी, बजाज फाइनेंस में 1.13 फीसदी, इंडिगो में 1.04 फीसदी, इन्फोसिस में 0.98 फीसदी, रिलायंस इंडस्ट्रीज में 0.92 फीसदी और इटरनल में 0.05 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

एक्सिस बैंक समेत 7 शेयरों में तेजी

इसके उलट सेंसेक्स के 7 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. एक्सिस बैंक 0.89 फीसदी की तेजी के साथ 1,266.15 रुपये पर पहुंचा. अडानी पोर्ट्स में 0.82 फीसदी, एशियन पेंट्स में 0.53 फीसदी, एचडीएफसी बैंक में 0.44 फीसदी, भारती एयरटेल में 0.23 फीसदी, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड में 0.04 फीसदी और टाटा स्टील में 0.03 फीसदी की बढ़त रही.

अमेरिका-ईरान तनाव ने बढ़ाई बाजार की चिंता

बाजार में दबाव की प्रमुख वजह पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव रहा. क्षेत्र में सैन्य संघर्ष बढ़ने से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में महंगे कच्चे तेल से महंगाई और चालू खाते पर दबाव बढ़ने की आशंका निवेशकों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है.

विदेशी और घरेलू निवेशकों की खरीदारी से मिला सहारा

हालांकि, बाजार में घरेलू और विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीदारी से कुछ सहारा मिला. बुधवार को घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब ₹2,813 करोड़ की खरीदारी की थी, जबकि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में करीब ₹6,688 करोड़ की शुद्ध खरीदारी की. इसी खरीदारी के चलते गुरुवार को बाजार की शुरुआत मजबूत रही, लेकिन बाद में बिकवाली के दबाव के सामने यह बढ़त टिक नहीं सकी.

इन शेयरों पर रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज शेयर बाजार में पावर ग्रिड, आरवीएनएल, सिप्ला समेत 10 शेयर खबरों और बड़े कारोबारी अपडेट के चलते फोकस में रहेंगे. पावर ग्रिड कॉरपोरेशन को गुजरात में अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़ा बड़ा ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट मिला है, जिसका सालाना ट्रांसमिशन शुल्क ₹1,152.49 करोड़ है. सिप्ला की इकाई इनवाजेन फार्मास्युटिकल्स ने चीन की किलू फार्मास्युटिकल के साथ कैंसर की दवा कीट्रूडा के बायोसिमिलर क्यूएल2107 को लेकर साझेदारी की है. अल्ट्राटेक सीमेंट के तहत आदित्य बिड़ला समूह वायर और केबल कारोबार में उतर रहा है और इसके लिए करीब ₹1,800 करोड़ का निवेश किया जाएगा. स्टरलाइट टेक्नोलॉजीज के निदेशक मंडल ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए करीब ₹3,000 करोड़ के निवेश को मंजूरी दी है, जिससे क्षमता करीब 50 फीसदी बढ़ने की उम्मीद है. भारत फोर्ज की इकाई कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स ने बेल्जियम की एफएन हर्स्टल के साथ भारत में उत्पादन केंद्र स्थापित करने और छोटे हथियारों व ड्रोन रोधी प्रणालियों समेत रक्षा उपकरणों पर काम करने के लिए समझौता किया है. इंडियन एनर्जी एक्सचेंज पर अगस्त में बिजली कारोबार सालाना आधार पर 20.2 फीसदी बढ़कर 13.94 अरब यूनिट पहुंच गया, जबकि रियल टाइम बाजार में कारोबार 10.6 फीसदी बढ़ा. ग्लैंड फार्मा में प्रवर्तक फोसुन फार्मा इंडस्ट्रियल करीब 5 फीसदी हिस्सेदारी लगभग ₹2,279.5 करोड़ में बेच सकती है. आरबीएल बैंक को करीब ₹164.14 करोड़ का जीएसटी कारण बताओ नोटिस मिला है, जो मुख्य रूप से अलग-अलग रिटर्न के आंकड़ों में अंतर से जुड़ा है. मैक्स हेल्थकेयर अपनी इकाई कलिंगा हॉस्पिटल में ₹87.87 करोड़ का निवेश करेगी. वहीं, रामको सिस्टम्स ने सफ्रान हेलीकॉप्टर इंजन्स के साथ समझौता किया है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


‘AI सुझाव दे सकता है, लेकिन हाथ से होने वाला काम नहीं कर सकता’: फैशन, फिल्मों और कड़ी प्रतिस्पर्धा पर रोमा जैन

फैशन डिजाइनर और स्टाइलिस्ट रोमा जैन ने अपने लेबल की शुरुआत, तेलुगु सिनेमा में काम करने, फैशन में AI के बढ़ते इस्तेमाल, Gen Z के स्टाइलिंग ट्रेंड्स और इंडस्ट्री में टिके रहने की चुनौतियों पर बात की

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
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करीब एक दशक से फैशन इंडस्ट्री में काम कर रहीं हैदराबाद की फैशन डिजाइनर और स्टाइलिस्ट रोमा जैन के लिए सफलता का मतलब केवल किसी सेलिब्रिटी के साथ काम करना, किसी फिल्म से जुड़ना या बड़ी कलेक्शन लॉन्च करना नहीं है. उनके लिए किसी ग्राहक का दोबारा लौटकर आना भी एक बड़ी उपलब्धि है.

जैन ने BW Disrupt से बातचीत में कहा, “अगर मैं किसी क्लाइंट के लिए कस्टमाइजेशन कर रही हूं और वह दोबारा आकर मुझसे कुछ और करवाने को कहता है, तो यह भी मेरे लिए एक माइलस्टोन है.”

2014 में ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद जैन ने करीब सात से आठ महीने तक डिजाइनर शिवाली सिंह के साथ काम किया. इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र रूप से काम शुरू किया और करीब 2016 में अपना लेबल शुरू किया.

समय के साथ उनका काम व्यक्तिगत ग्राहकों के लिए डिजाइनिंग से आगे बढ़कर कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की स्टाइलिंग तक पहुंच गया.

2017 में जैन ने तेलुगु सिनेमा में फिल्म ‘Anando Brahma’ के साथ कॉस्ट्यूम डिजाइनर के तौर पर काम शुरू किया. इसके बाद उन्होंने अभिनेता निखिल सिद्धार्थ के साथ एक अन्य तेलुगु फिल्म में काम किया. वह म्यूजिक वीडियो और एक डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट से भी जुड़ी हैं, जो अभी रिलीज नहीं हुआ है.

जैन ने अभिनेत्री तापसी पन्नू को भी स्टाइल किया है. अपने करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने ब्यूटी पेजेंट की विजेताओं के साथ भी काम किया.

हालांकि फैशन और सिनेमा की चमक-दमक के पीछे एक ऐसी इंडस्ट्री भी है, जिसे जैन के मुताबिक अब संभालना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है. जब उनसे फैशन में काम करने की सबसे बड़ी चुनौती के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब था—“Surviving यानी टिके रहना.”

उनके मुताबिक पिछले एक दशक में खुद को डिजाइनर और स्टाइलिस्ट बताने वाले लोगों की संख्या काफी बढ़ी है. वहीं, टेक्नोलॉजी ने इंस्पिरेशन हासिल करने और नए आइडिया तैयार करने की प्रक्रिया को भी आसान बना दिया है.

उन्होंने कहा, “पहले हमारे पास बहुत ज्यादा डिजाइनर नहीं थे. लेकिन अब वे हर जगह हैं.”

AI फैशन बदल रहा है, लेकिन डिजाइनरों की जगह नहीं ले सकता

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने फैशन इंडस्ट्री में हो रहे बदलाव को एक नया आयाम दिया है. अब कोई डिजाइनर किसी AI सिस्टम को किसी परिधान के बारे में बताकर कुछ ही समय में उसके विजुअल रेफरेंस या कॉन्सेप्ट हासिल कर सकता है. जब जैन ने इंडस्ट्री में कदम रखा था, तब इसके लिए काफी ज्यादा मैनुअल काम करना पड़ता था.

हालांकि, जैन नहीं मानतीं कि AI के आने से इंसानी डिजाइनरों की जरूरत खत्म हो जाएगी.

उन्होंने कहा, “अगर आप बहुत क्रिएटिव हैं और डिजाइनिंग में आपकी बहुत रुचि है, तो मुझे नहीं लगता कि AI आपका बिजनेस छीन सकता है.”

उनका तर्क आइडिया तैयार करने और उसे वास्तव में बनाने के बीच के अंतर पर आधारित है.

जैन ने कहा, “AI टाई एंड डाई नहीं कर सकता. AI हाथ से कढ़ाई नहीं कर सकता. AI DIY नहीं कर सकता.”

उनके मुताबिक फैशन में टेक्सटाइल, गारमेंट डिजाइन, स्टाइलिंग और क्राफ्ट्समैनशिप जैसी कई अलग-अलग चीजें शामिल हैं. AI रेफरेंस और सुझाव दे सकता है, लेकिन किसी डिजाइन को वास्तविक रूप देने और उस पर क्रिएटिव जजमेंट लगाने के लिए इंसानों की जरूरत अभी भी है.

उन्होंने कहा, “AI आपको सिर्फ सुझाव दे सकता है. AI आपको सिर्फ तस्वीरें दिखा सकता है, लेकिन बाकी काम हमें ही करना है.”

जेनरेटिव AI, वर्चुअल ट्राय-ऑन और 3D डिजाइन जैसी तकनीकों के फैशन इंडस्ट्री में तेजी से प्रवेश के बीच यह अंतर आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकता है. हालांकि, जैन का मानना है कि टेक्नोलॉजी आखिरकार क्रिएटिविटी को खत्म नहीं कर सकती.

Gen Z फैशन को हमारी सोच से बेहतर समझता है

अगर टेक्नोलॉजी फैशन बनाने के तरीके को बदल रही है, तो युवा ग्राहक इस बात के नियम बदल रहे हैं कि फैशन को पहना कैसे जाए.

जैन Gen Z को लेकर खास तौर पर सकारात्मक हैं. इस पीढ़ी को अक्सर अलग-अलग तरह के कॉम्बिनेशन, लेयरिंग और तेजी से बदलते फैशन ट्रेंड्स के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है.

जैन ने कहा, “Gen Z के लोग हमसे कहीं ज्यादा स्मार्ट हैं.”

उनके मुताबिक जो चीजें पुरानी पीढ़ी को असामान्य लग सकती हैं, उनके पीछे अक्सर सोच होती है.

उन्होंने कहा, “वे जो भी पहन रहे हैं, उसे अच्छी तरह कैरी कर सकते हैं. अगर वे लेयरिंग कर रहे हैं, तो उन्हें बिल्कुल पता होता है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं और यह अच्छा लगेगा या वे इसे कैरी कर पाएंगे या नहीं.”

जैन यह भी देखती हैं कि युवा डिजाइनर और ग्राहक अब अलग-अलग क्षेत्रों को जोड़कर नए प्रयोग कर रहे हैं. इनमें इंजीनियरिंग और फैशन का मेल भी शामिल है. उनके मुताबिक ऐसी चीजें अब बनाई जा रही हैं, जिनकी कल्पना पिछली पीढ़ियां शायद ही कर पातीं.

यह प्रयोग सोशल मीडिया के कारण आए एक और बड़े बदलाव के साथ हो रहा है.

जिन डिजाइनरों ने उस दौर में अपना करियर बनाया था, जब इंस्टाग्राम पर फॉलोअर्स की संख्या पेशेवर पहचान का पैमाना नहीं थी, उनके लिए पहचान के मानदंड बदल गए हैं.

जैन ने कहा, “अभी लोग यह नहीं देखते कि आपने कितना काम किया है. लोग देखते हैं कि आपके कितने फॉलोअर्स हैं, कितने कॉन्टैक्ट्स हैं या आप कितने लोकप्रिय हैं.”

हालांकि, वह नहीं मानतीं कि इंफ्लुएंसर्स प्रोफेशनल डिजाइनरों और स्टाइलिस्टों की जगह ले सकते हैं.

फैशन का मतलब आराम है, यह नहीं कि आप कितना शरीर दिखा रहे हैं

सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत ने सेलिब्रिटी आउटफिट्स, बॉडी इमेज और समाज की नजर में स्वीकार्य फैशन को लेकर बहस भी बढ़ा दी है.

जैन का मानना है कि कपड़े आखिरकार उस व्यक्ति के लिए सही होने चाहिए, जो उन्हें पहन रहा है.

सेलिब्रिटी आउटफिट्स पर होने वाली आलोचना को लेकर उन्होंने कहा कि लोगों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर यह तय नहीं किया जाना चाहिए कि कोई आउटफिट सही है या नहीं.

उन्होंने कहा, “सैकड़ों लोग सैकड़ों बातें कहेंगे.”

जैन के लिए आराम सबसे महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कहा, “फैशन आराम के बारे में है, यह इस बारे में नहीं है कि आप कितना शरीर दिखा रहे हैं.”

यही सोच उनके अपने लेबल में भी दिखाई देती है.

जैन के मुताबिक फैशन की शुरुआत चीजें बनाने के जुनून के साथ हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह एक बिजनेस में बदल गया. अब चुनौती अपनी क्रिएटिव सोच और ग्राहकों की पसंद के बीच संतुलन बनाने की है.

उन्होंने कहा, “जब मैं अपने क्लाइंट के लिए कुछ कर रही होती हूं, तो मैं यह सुनिश्चित करती हूं कि वह उनकी कम्फर्ट जोन में भी हो, लेकिन उसमें कुछ creativity भी शामिल हो.”

इससे वह अपनी क्रिएटिव पहचान को बनाए रखते हुए ऐसा परिधान तैयार कर पाती हैं, जिसे ग्राहक आराम से पहन सके.

ज्यादा लोगों तक फैशन पहुंचाना चाहती हैं जैन

जैन फिलहाल हैदराबाद में हैं और अपने लेबल का भौगोलिक विस्तार करने की तत्काल योजना नहीं है. हालांकि, अगले पांच वर्षों में ब्रांड को बड़े स्तर पर विकसित करना उनकी महत्वाकांक्षा है.

उन्होंने कहा, “मैं हर किसी को स्टाइल करना चाहती हूं. ऐसा नहीं है कि सिर्फ ऊंचे या निचले वर्ग या मिडिल क्लास के लोग.”

उनका मानना है कि फैशन को सिर्फ सेलिब्रिटी या अमीर लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए.

उन्होंने कहा, “हर कोई इसे कर सकता है. आपको बस थोड़ी जानकारी और थोड़ी गाइडेंस की जरूरत है.”

रैपिड-फायर राउंड में जब जैन से उनकी अपनी स्टाइल के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने दो शब्द चुने, “Pocket friendly” और “comfort”. ये दोनों शब्द उनकी बिजनेस फिलॉसफी को भी काफी हद तक दर्शाते हैं.

उनकी व्यक्तिगत फैशन पसंद भी भारतीय है. उन्होंने यूरोपीय लग्जरी के बजाय Indian couture को चुना और मनीष मल्होत्रा के बजाय सब्यसाची को पसंद किया. उन्होंने सब्यसाची को उस लग्जरी ब्रांड के तौर पर चुना, जिसे वह पसंद करती हैं.

सेलिब्रिटीज में जैन ने कृति सेनन को सबसे अच्छी ड्रेस पहनने वाली बॉलीवुड अभिनेत्री बताया, जबकि पुरुष कलाकारों में शाहिद कपूर को चुना. दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा जोनस में उन्होंने प्रियंका को चुना, जबकि शाहरुख खान और रणवीर सिंह में रणवीर सिंह उनकी पसंद रहे.

जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें किसी एक भारतीय आइकन को स्टाइल करने का मौका मिले, तो वह किसे चुनेंगी, उनका जवाब था, “रेखा जी.”

वह रेखा की वॉर्डरोब को भी सबसे ज्यादा पसंद करती हैं.

उन्होंने कहा, “मुझे उनकी साड़ी कलेक्शन बहुत पसंद है. मुझे उनका खुद को कैरी करने का तरीका पसंद है.”

एल्गोरिदम, वायरलिटी और तेजी से बदलते ट्रेंड्स से प्रभावित होती फैशन इंडस्ट्री के बीच जैन की सोच अब भी कुछ पारंपरिक चीजों पर टिकी है, क्राफ्ट्समैनशिप, आराम और व्यक्तिगत पहचान.

टेक्नोलॉजी रेफरेंस दे सकती है और सोशल मीडिया ऑडियंस दे सकता है, लेकिन जैन के लिए इनमें से कोई भी कपड़ों के पीछे मौजूद डिजाइनर की जगह नहीं ले सकता.


136 अरब डॉलर का दांव: भारत ने बिना कर्ज लिए उधार लिया

न कोई बॉन्ड. न आईएमएफ. न कोई संप्रभु कर्ज. भारतीय रिजर्व बैंक ने प्रवासी भारतीयों की एक कम चर्चित जमा योजना के नियमों में बदलाव किया, रिकॉर्ड मात्रा में डॉलर जुटाए और मुद्रा का जोखिम अपनी बैलेंस शीट पर ले लिया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
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पलक शाह

भारत ने हाल ही में बिना एक भी डॉलर का संप्रभु कर्ज जारी किए देश में 136 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है. खास तौर पर तब, जब देश के वित्तीय बाजारों में धारणा अपने सबसे निचले स्तर पर है.

न कोई सरकारी बॉन्ड. न आईएमएफ कार्यक्रम. न बजट में घोषित कोई विदेशी कर्ज. न ऐसी कोई चीज, जिस पर किसी को मतदान करना पड़ा हो. भारतीय रिजर्व बैंक ने प्रवासी भारतीयों की एक कम चर्चित जमा योजना की आर्थिक संरचना बदल दी और 11 सप्ताह में पैसा देश में आ गया. हैरानी की बात यह है कि यह कर्ज लेने जैसा बिल्कुल नहीं दिखता. लेकिन इसमें कर्ज लेने की सबसे महत्वपूर्ण समानता मौजूद है: भारत के पास अभी डॉलर हैं और बाद में इन्हें लौटाने के लिए उसे डॉलर जुटाने होंगे.

फिर इसमें असाधारण क्या है?

जमा करने वाले को रुपये के मुकाबले अपनी सुरक्षा मिलती रही. बैंक को ऐसा पैसा मिला जिसे वह पूरी तरह कर्ज के रूप में दे सकता था. भारतीय रिजर्व बैंक ने मुद्रा का जोखिम अपने ऊपर ले लिया. यह जोखिम खत्म नहीं होता. इसकी देनदारी 2029 से 2031 के बीच सामने आएगी.

दांव

यहां समझिए कि भारत किस कड़ी के जरिए दांव लगा रहा है.

डॉलर देश में आते हैं. बैंकों को रुपये मिलते हैं. बैंक कर्ज देते हैं. कंपनियां निर्माण और निवेश करती हैं. अर्थव्यवस्था बढ़ती है. विदेशी निवेशक इस वृद्धि को देखते हैं और वापस आते हैं. उनका पैसा बाजार को ऊपर उठाता है और देश में और डॉलर लाता है. फिर 2029 में, जब प्रवासी भारतीयों के डॉलर लौटाने होंगे, तो उनका भुगतान उस पैसे से किया जाता है जो तब तक विदेशी निवेशकों के जरिए देश में आ चुका होगा.

पैसा पिछले दरवाजे से आया. उसे उस पैसे से लौटाया जाएगा जो सामने के दरवाजे से आएगा. लेकिन ऊपर बताई गई हर कड़ी का काम करना जरूरी है.

यह कैसे किया गया

इस खाते को एफसीएनआर कहा जाता है और यह सुनने में जितना साधारण लगता है, उतना ही है. विदेश में रहने वाला कोई भारतीय किसी भारतीय बैंक में डॉलर जमा करता है. उसे डॉलर में ब्याज मिलता है. तीन से पांच साल बाद वह अपने डॉलर वापस लेता है. यह योजना 1993 से अस्तित्व में है. जून में आरबीआई ने इसकी आर्थिक संरचना बदल दी.

तीन कदम:

एक, जो बैंक डॉलर लेते हैं, उन्हें उन्हें रुपयों में कर्ज देना होता है. अगर उन डॉलर को लौटाने से पहले रुपया गिर जाता है, तो बैंक को नुकसान होता है  इसलिए वह करीब 3.5% सालाना की लागत पर सुरक्षा खरीदता है. आरबीआई ने कहा: इसे मत खरीदिए. हम आज की दर पर डॉलर वापस देंगे, चाहे रुपया कुछ भी करे. मुफ्त.

दो, आम तौर पर बैंक को हर जमा राशि का कुछ हिस्सा अलग रखना होता है और वह उसे कर्ज के रूप में नहीं दे सकता. इन जमाओं पर ऐसा नहीं है. पूरी राशि कर्ज के रूप में दें.

तीन, जितना चाहें उतना ब्याज दें.

इसलिए बैंकों ने भुगतान किया. 6%. फिर 7%. फिर 7.1%. डॉलर में, रुपये में नहीं, इसलिए जमा करने वाले पर मुद्रा का कोई जोखिम नहीं था. भारत में यह कर-मुक्त था.

अमेरिका में बचत खाते पर करीब 4.8% ब्याज मिल रहा था (नवीनतम). भारत उन्हें इससे अधिक दे रहा था. केवल इन जमाओं के जरिए 127.22 अरब डॉलर आए. बाकी राशि कंपनियों के विदेशी कर्ज के जरिए आई.

आपको भारत पर भरोसा करना जरूरी नहीं था कि आप यह सौदा स्वीकार करें. आपको बस एक कैलकुलेटर और थोड़ी जिज्ञासा चाहिए थी.

इतना अच्छा सौदा है तो इसकी कीमत कोई न कोई जरूर चुकाता है.

गिनिए कि किसे क्या मिला

जमा करने वाले ने डॉलर में 7% कमाया और उसे विनिमय दर का कोई जोखिम नहीं उठाना पड़ा. बैंक को सस्ता वित्त मिला, जिसे वह पूरी तरह कर्ज के रूप में दे सकता था और उसे कोई सुरक्षा खरीदने की जरूरत नहीं थी. भारत को बड़ी मात्रा में डॉलर मिले और करीब 13 लाख करोड़ रुपये ऐसी अर्थव्यवस्था में पहुंचाने के लिए मिले, जहां बैंक जमा की कमी से जूझ रहे थे.

तो जिस सुरक्षा को खरीदने की जरूरत अब बैंकों को नहीं थी, उसकी कीमत किसने चुकाई?

किसी ने नहीं. जोखिम बस आरबीआई ने अपने ऊपर ले लिया.

एक अनुमान के मुताबिक पांच साल की इस लागत करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये हो सकती है, यह भारतीय स्टेट बैंक की शोध रिपोर्ट का मूल आंकड़ा है, जिसे जुटाई गई वास्तविक राशि के आकार के अनुसार बढ़ाया गया है. यह एक अनुमान है, कोई सार्वजनिक रूप से बताई गई राशि नहीं, और इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए.

यह लागत वित्त मंत्रालय की ओर से जारी किसी चेक के रूप में सामने नहीं आएगी. यह आरबीआई की बैलेंस शीट में रहेगी, जहां यह हर साल केंद्रीय बैंक की ओर से सरकार को हस्तांतरित किए जाने वाले अधिशेष को कम कर सकती है, जो सरकार के खजाने की सबसे बड़ी एकल प्राप्तियों में से एक है.

यह कभी सरकारी कर्ज के रूप में दिखाई नहीं देगा. फिर भी यह एक लागत है और अंततः सार्वजनिक लागत ही है. और बैलेंस शीट के दूसरी तरफ एक और संख्या है.

आरबीआई की किताबों में कुछ और भी हो रहा है

उसने 137 अरब डॉलर के बाद की तारीख वाले चेक लिखे हैं.

आप जानते हैं कि बाद की तारीख वाला चेक कैसे काम करता है. पैसा अभी खाते में रखा है. बस अब आप उसे खर्च नहीं कर सकते. कोई व्यक्ति पहले से तय तारीख पर उसे लेने आएगा.

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 729 अरब डॉलर पर है. इसमें से करीब 137 अरब डॉलर के खिलाफ चेक लिखे जा चुके हैं. इसलिए वास्तविक सुरक्षा भंडार की राशि सुर्खियों में दिखाई देने वाले आंकड़े से कम है.

आरबीआई ये चेक आखिर क्यों लिखता है? जब रुपया गिर रहा होता है, तो वह डॉलर बेचकर मुद्रा को सहारा देता है. लेकिन बेचे गए डॉलर हमेशा के लिए चले जाते हैं और घटता हुआ विदेशी मुद्रा भंडार बाजार को डरा सकता है. इसलिए एक और रास्ता है. डॉलर आज देने के बजाय आरबीआई उन्हें बाद में देने का वादा करता है. रुपये को अभी सहारा मिलता है. भंडार अप्रभावित दिखता है. डॉलर वास्तव में भविष्य की किसी तारीख पर बाहर जाते हैं. इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है — यह केंद्रीय बैंकों का एक सामान्य साधन है. लेकिन वादा फिर भी वादा होता है और वादे पूरे करने पड़ते हैं.

यहीं से असहज करने वाला हिस्सा शुरू होता है. 137 अरब डॉलर लगभग उतनी ही राशि है, जितनी अभी देश में आई है. दोनों को सीधे-सीधे एक समान नहीं माना जा सकता, क्योंकि इस बही-खाते का अधिकांश हिस्सा रुपये को बचाने के लिए बनाया गया था और यह कहना गलत होगा कि एक दूसरे के बराबर है.

यही कारण है कि आरबीआई को बताना चाहिए कि इस व्यवस्था के जरिए इसमें से कितनी राशि बनी.

किसी ने पूछा ही नहीं.

भारत ने ऐसा क्यों किया?

क्योंकि दो वर्षों से विदेशी निवेशक देश से बाहर जा रहे थे.

विदेशी निवेशकों ने 2025 में भारतीय शेयरों से 1.66 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए. 2026 में उन्होंने और ज्यादा बिक्री की, अकेले मार्च भारतीय बाजारों के इतिहास में विदेशी बिकवाली का सबसे खराब महीना रहा. दोनों वर्षों को मिलाकर करीब 3.9 लाख करोड़ रुपये देश से बाहर चले गए.

भारत के पास इसे भरने के तीन रास्ते थे.

एक, खुले बाजार से कर्ज लेना, विदेश में सरकारी बॉन्ड बेचकर और दो वर्षों तक भारत को बिकते देखने के बाद दुनिया को इसकी कीमत तय करने देना. भारत ने कभी ऐसा नहीं किया है. 2019 के बजट में इसका प्रस्ताव रखा गया था और बाद में इसे चुपचाप हटा दिया गया.

दो, आईएमएफ के पास जाना. राजनीतिक रूप से अकल्पनीय.

तीन,  जमा योजना के नियमों को चुपचाप बदलना और ऐसी कीमत चुकाना, जिसे दो संस्थानों के बाहर कोई कभी नहीं देख पाएगा.

भारत ने तीसरा रास्ता चुना. और इससे विदेशियों द्वारा निकाली गई राशि से करीब तीन गुना पैसा देश में आया.

एक बात याद रखिए. भारत उन डॉलर को नहीं छाप सकता, जिन्हें उसे चुकाना है. उसे हर डॉलर बाहर जाकर खरीदना होगा.

सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा, जिसे किसी ने प्रकाशित नहीं किया

127 अरब डॉलर में से वास्तव में कितना पैसा प्रवासी भारतीयों का है?

प्रवासी भारतीय खाते के जरिए आने वाला हर डॉलर जरूरी नहीं कि प्रवासी भारतीय की बचत हो.

2013 में पिछली एफसीएनआर राशि जुटाने की प्रक्रिया जांच के दायरे में आई थी, क्योंकि कुछ विदेशी बैंकों के प्रवासी भारतीय जमाओं को वित्तपोषित करने की बात सामने आई थी. खाते पर नाम प्रवासी भारतीय का था. लेकिन डॉलर कहीं और से आए थे.

यह संभावना खत्म नहीं हुई है. भारतीय स्टेट बैंक खुद अब ऐसे लीवरेज्ड एफसीएनआर ढांचे की पेशकश करता है, जिसमें प्रवासी भारतीय जमा राशि को बढ़ाने के लिए अपनी पूंजी के खिलाफ कर्ज लेता है. विदेशी कर्जदाता के पास कर्ज वापस मांगने का अधिकार बना रहता है.

यह सवाल नहीं है कि लीवरेज्ड पैसा अच्छा है या बुरा. सवाल यह है कि यह किस तरह का वित्तपोषण है.

वास्तविक जमाकर्ता की बचत लंबे समय तक बनी रहती है. दो ब्याज दरों के बीच के अंतर का फायदा उठाने के लिए विदेशी बैंक की ओर से लगाया गया पैसा ऐसा नहीं होता. अगर आज की 127 अरब डॉलर की राशि का बड़ा हिस्सा लीवरेज्ड है, तो इस देनदारी की प्रकृति पूरी तरह बदल जाती है.

2029 में सवाल केवल यह नहीं होगा कि प्रवासी भारतीय अपनी जमा राशि को आगे बढ़ाता है या नहीं.

सवाल यह होगा कि क्या उस समय भी विदेशी कर्जदाता इस सौदे को जारी रखना चाहता है.

2029

फिलहाल यह दांव शानदार नजर आ रहा है.

भारत को डॉलर मिले. बैंकों को नकदी मिली. जमाकर्ता को रिटर्न मिला. आरबीआई ने समय खरीदा.

लेकिन मुद्रा का जोखिम खत्म नहीं हुआ. वह सिर्फ स्थानांतरित हुआ.

और बिल भी.

2029 तक भारत को ये डॉलर लौटाने होंगे. तब तक इस पैसे को कुछ उपयोगी काम करना होगा — विकास को वित्तपोषित करना, क्षमता का निर्माण करना, पूंजी आकर्षित करना, अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और अंततः उन डॉलर को पैदा करना, जिनसे इसका भुगतान किया जा सके.

अगर ऐसा हुआ, तो यह भारत द्वारा की गई सबसे समझदार बैलेंस-शीट इंजीनियरिंग की कोशिशों में से एक नजर आएगा. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो देश को पता चलेगा कि इस योजना ने वास्तव में क्या किया. इसने डॉलर की समस्या को खत्म नहीं किया. इसने उस समस्या को बस ऐसी तारीख तक आगे बढ़ा दिया है, जब किसी और को उससे निपटना होगा.

2026: डॉलर आते हैं. 2029-2031: हिसाब का वक्त?

 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 

 


ऑटो पार्ट्स कंपनियों को ग्लोबल बनने की सलाह, पीयूष गोयल बोले- भारत से बाहर मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाएं

नए व्यापार समझौतों से 38 विकसित अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंच मिली, अब घरेलू कंपनियों को वैश्विक कारोबार और उच्च मूल्य वाले उत्पादों पर करना होगा फोकस

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
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वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने ऑटो कंपोनेंट कंपनियों से घरेलू बाजार तक सीमित रहने के बजाय वैश्विक स्तर पर विस्तार करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियों को विकसित देशों में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपनी भूमिका मजबूत करने और कम मूल्य वाले पुर्जों से आगे बढ़कर उच्च मूल्य वाले एकीकृत समाधान विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए.

नई दिल्ली में ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACMA) के 66वें वार्षिक सत्र को संबोधित करते हुए गोयल ने कहा कि भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग का अंतरराष्ट्रीय कारोबार करीब 50 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच रहा है. इसमें आयात और निर्यात का हिस्सा लगभग बराबर है.

उन्होंने कहा, "स्थानीय कारोबार को वैश्विक कारोबार में बदलें." गोयल के मुताबिक, भारतीय कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तकनीकी साझेदारी के जरिए वैश्विक स्तर की गुणवत्ता वाले उत्पाद प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बनाने की क्षमता साबित की है. अब इस क्षमता का इस्तेमाल वैश्विक कंपनियां बनाने में किया जाना चाहिए.

38 विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ी पहुंच

गोयल ने कहा कि पिछले चार-पांच वर्षों में सरकार की ओर से किए गए नौ व्यापार समझौते 38 विकसित अर्थव्यवस्थाओं को कवर करते हैं. इन देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था करीब 60 लाख करोड़ डॉलर की है. इन समझौतों से भारतीय कंपनियों को बड़े और अपेक्षाकृत समृद्ध बाजारों तक पहुंच मिली है.

उन्होंने कहा कि इन समझौतों के जरिए भारतीय विनिर्माण और वैश्विक बाजारों के बीच बेहतर तालमेल की संभावनाएं बनी हैं. ACMA ने भी व्यापार वार्ताओं में भारतीय ऑटो कंपोनेंट्स के लिए शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच की मांग करने के साथ घरेलू बाजार को भी पारस्परिक रूप से खोलने का समर्थन किया है.

गोयल ने कहा कि भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार है.

ऑटो उद्योग में बनी हुई मजबूत मांग

गोयल के अनुसार, ऑटो कंपोनेंट क्षेत्र दोहरे अंक की दर से बढ़ रहा है, जबकि व्यापक ऑटोमोबाइल उद्योग की वृद्धि दर भी ऊंची दोहरे अंक में है. उन्होंने कहा कि इस साल यात्री वाहनों की बिक्री करीब 50 लाख इकाइयों तक पहुंच सकती है.

उन्होंने कहा कि मौजूदा मांग वास्तविक है और केवल कंपनियों के पास जमा अतिरिक्त स्टॉक की वजह से नहीं है. इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग भी मजबूत बनी हुई है और कुछ मॉडलों के लिए छह महीने तक की प्रतीक्षा अवधि देखी जा रही है.

आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने पर जोर

गोयल ने ऑटो कंपोनेंट निर्माताओं से उन क्षेत्रों की पहचान करने को कहा जहां भारत अभी भी आयात पर निर्भर है. उन्होंने कंपनियों से सक्रिय रूप से घरेलू उत्पादन बढ़ाने और स्थानीयकरण कार्यक्रम चलाने की अपील की, ताकि भविष्य में वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आने वाले व्यवधानों का असर कम किया जा सके. उन्होंने कहा कि विशेष इस्पात, तकनीकी वस्त्र और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में सरकार की पहल का उद्देश्य घरेलू औद्योगिक क्षमता को मजबूत करना है.

सरकार 20 औद्योगिक और स्मार्ट शहर परियोजनाओं पर भी काम कर रही है. गोयल ने कहा कि जरूरत पड़ने पर ऑटो कंपोनेंट विनिर्माण के लिए समर्पित औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए जा सकते हैं. अमेरिका-भारत ऑटोमोटिव साझेदारी के लिए प्लग-एंड-प्ले सुविधाओं वाले विशेष औद्योगिक पार्क बनाने की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है.

पुर्जों से आगे बढ़कर एकीकृत समाधान बनाने की जरूरत

वाणिज्य मंत्री ने कहा कि भारतीय कंपनियों को सिर्फ अलग-अलग ऑटो पार्ट्स की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें ऐसे एकीकृत और उच्च मूल्य वाले समाधान विकसित करने चाहिए, जिन्हें भारत में डिजाइन, निर्मित और फिर वैश्विक बाजारों में निर्यात किया जा सके.

उन्होंने प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अधिक इस्तेमाल पर भी जोर दिया. खासकर गुणवत्ता नियंत्रण, ग्राहकों की जरूरतों को समझने और उत्पादन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने में एआई की भूमिका बढ़ाई जा सकती है.

गोयल ने वाहन सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देने और अमेरिका तथा यूरोप जैसे बाजारों में बढ़ती कस्टमाइज्ड वाहनों की मांग के अनुरूप उत्पाद विकसित करने की जरूरत भी बताई.

वाहन कबाड़ नीति को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाने की जरूरत

पुराने वाहनों को कबाड़ में बदलने के मुद्दे पर गोयल ने कहा कि सरकार और उद्योग को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे पुराने वाहन को कबाड़ में देने के बाद नया वाहन खरीदना उपभोक्ताओं के लिए आर्थिक रूप से आकर्षक हो.

उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से प्रोत्साहन देने की कोशिश की गई है, लेकिन वाहन निर्माता और उद्योग के अन्य हिस्सेदारों को भी पुराने वाहनों के लिए उचित मूल्य उपलब्ध कराना होगा.

अमेरिका के साथ ऑटो क्षेत्र में बढ़ सकता है सहयोग

भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने दोनों देशों के संबंधों को "ऐतिहासिक ऊंचाई" पर बताते हुए कहा कि दोनों देश मिलकर भविष्य की गतिशीलता व्यवस्था तैयार कर रहे हैं. उन्होंने भारतीय ऑटो कंपोनेंट कंपनियों को अमेरिका में निवेश बढ़ाने की सलाह दी. इसमें नई विनिर्माण इकाइयां, अनुसंधान एवं विकास केंद्र और वितरण नेटवर्क स्थापित करना शामिल है.

गोर ने अमेरिका में भारत की भारत फोर्ज, सुंदरम क्लेटन और महिंद्रा जैसी कंपनियों की मौजूदगी का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच दवा, रक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी, डेटा सेंटर और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ रहा है.

भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते से नए अवसर

पश्चिमी भारत के लिए ब्रिटेन के उप उच्चायुक्त और दक्षिण एशिया के व्यापार आयुक्त हरजिंदर कांग ने कहा कि ऑटोमोबाइल और भविष्य की गतिशीलता ब्रिटेन की उन्नत विनिर्माण रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

उन्होंने 15 जुलाई से लागू हुए भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे ऑटो कंपोनेंट्स के लिए शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी और आपूर्ति शृंखला साझेदारी तथा संयुक्त उपक्रमों को बढ़ावा मिलेगा.

कांग के मुताबिक, समझौते ने बड़ी संख्या में शुल्क दरों को कम या समाप्त किया है और दोनों देशों के बीच सीमा शुल्क तथा सीमा संबंधी प्रक्रियाओं को भी आसान बनाया है.

उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक मोटर, बैटरी, हाइड्रोजन प्रणाली, हल्के मिश्रित पदार्थ और सॉफ्टवेयर आधारित वाहन तकनीक जैसे क्षेत्रों में ब्रिटेन की विशेषज्ञता भारतीय निर्माताओं के लिए सहयोग के नए अवसर पैदा कर सकती है.

500 अरब डॉलर का उद्योग बनाने का लक्ष्य

गोयल ने कहा कि भारत के बढ़ते व्यापार समझौते और घरेलू विनिर्माण को मिल रहा सरकारी समर्थन ऑटो कंपोनेंट उद्योग को 500 अरब डॉलर का उद्योग बनाने की महत्वाकांक्षा को पूरा करने में मदद कर सकता है.

हालांकि, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार और उद्योग के बीच लगातार संवाद जरूरी है. उन्होंने उद्योग जगत से अपनी समस्याओं, सुझावों और सुधारों की जरूरतों को सरकार के सामने रखने की अपील की. गोयल ने कहा, "हमें आपके विचार चाहिए. हमें आपके सुझाव चाहिए. हमें आपकी मांगें चाहिए."