136 अरब डॉलर का दांव: भारत ने बिना कर्ज लिए उधार लिया

न कोई बॉन्ड. न आईएमएफ. न कोई संप्रभु कर्ज. भारतीय रिजर्व बैंक ने प्रवासी भारतीयों की एक कम चर्चित जमा योजना के नियमों में बदलाव किया, रिकॉर्ड मात्रा में डॉलर जुटाए और मुद्रा का जोखिम अपनी बैलेंस शीट पर ले लिया.

Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
BWHindi

पलक शाह

भारत ने हाल ही में बिना एक भी डॉलर का संप्रभु कर्ज जारी किए देश में 136 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है. खास तौर पर तब, जब देश के वित्तीय बाजारों में धारणा अपने सबसे निचले स्तर पर है.

न कोई सरकारी बॉन्ड. न आईएमएफ कार्यक्रम. न बजट में घोषित कोई विदेशी कर्ज. न ऐसी कोई चीज, जिस पर किसी को मतदान करना पड़ा हो. भारतीय रिजर्व बैंक ने प्रवासी भारतीयों की एक कम चर्चित जमा योजना की आर्थिक संरचना बदल दी और 11 सप्ताह में पैसा देश में आ गया. हैरानी की बात यह है कि यह कर्ज लेने जैसा बिल्कुल नहीं दिखता. लेकिन इसमें कर्ज लेने की सबसे महत्वपूर्ण समानता मौजूद है: भारत के पास अभी डॉलर हैं और बाद में इन्हें लौटाने के लिए उसे डॉलर जुटाने होंगे.

फिर इसमें असाधारण क्या है?

जमा करने वाले को रुपये के मुकाबले अपनी सुरक्षा मिलती रही. बैंक को ऐसा पैसा मिला जिसे वह पूरी तरह कर्ज के रूप में दे सकता था. भारतीय रिजर्व बैंक ने मुद्रा का जोखिम अपने ऊपर ले लिया. यह जोखिम खत्म नहीं होता. इसकी देनदारी 2029 से 2031 के बीच सामने आएगी.

दांव

यहां समझिए कि भारत किस कड़ी के जरिए दांव लगा रहा है.

डॉलर देश में आते हैं. बैंकों को रुपये मिलते हैं. बैंक कर्ज देते हैं. कंपनियां निर्माण और निवेश करती हैं. अर्थव्यवस्था बढ़ती है. विदेशी निवेशक इस वृद्धि को देखते हैं और वापस आते हैं. उनका पैसा बाजार को ऊपर उठाता है और देश में और डॉलर लाता है. फिर 2029 में, जब प्रवासी भारतीयों के डॉलर लौटाने होंगे, तो उनका भुगतान उस पैसे से किया जाता है जो तब तक विदेशी निवेशकों के जरिए देश में आ चुका होगा.

पैसा पिछले दरवाजे से आया. उसे उस पैसे से लौटाया जाएगा जो सामने के दरवाजे से आएगा. लेकिन ऊपर बताई गई हर कड़ी का काम करना जरूरी है.

यह कैसे किया गया

इस खाते को एफसीएनआर कहा जाता है और यह सुनने में जितना साधारण लगता है, उतना ही है. विदेश में रहने वाला कोई भारतीय किसी भारतीय बैंक में डॉलर जमा करता है. उसे डॉलर में ब्याज मिलता है. तीन से पांच साल बाद वह अपने डॉलर वापस लेता है. यह योजना 1993 से अस्तित्व में है. जून में आरबीआई ने इसकी आर्थिक संरचना बदल दी.

तीन कदम:

एक, जो बैंक डॉलर लेते हैं, उन्हें उन्हें रुपयों में कर्ज देना होता है. अगर उन डॉलर को लौटाने से पहले रुपया गिर जाता है, तो बैंक को नुकसान होता है  इसलिए वह करीब 3.5% सालाना की लागत पर सुरक्षा खरीदता है. आरबीआई ने कहा: इसे मत खरीदिए. हम आज की दर पर डॉलर वापस देंगे, चाहे रुपया कुछ भी करे. मुफ्त.

दो, आम तौर पर बैंक को हर जमा राशि का कुछ हिस्सा अलग रखना होता है और वह उसे कर्ज के रूप में नहीं दे सकता. इन जमाओं पर ऐसा नहीं है. पूरी राशि कर्ज के रूप में दें.

तीन, जितना चाहें उतना ब्याज दें.

इसलिए बैंकों ने भुगतान किया. 6%. फिर 7%. फिर 7.1%. डॉलर में, रुपये में नहीं, इसलिए जमा करने वाले पर मुद्रा का कोई जोखिम नहीं था. भारत में यह कर-मुक्त था.

अमेरिका में बचत खाते पर करीब 4.8% ब्याज मिल रहा था (नवीनतम). भारत उन्हें इससे अधिक दे रहा था. केवल इन जमाओं के जरिए 127.22 अरब डॉलर आए. बाकी राशि कंपनियों के विदेशी कर्ज के जरिए आई.

आपको भारत पर भरोसा करना जरूरी नहीं था कि आप यह सौदा स्वीकार करें. आपको बस एक कैलकुलेटर और थोड़ी जिज्ञासा चाहिए थी.

इतना अच्छा सौदा है तो इसकी कीमत कोई न कोई जरूर चुकाता है.

गिनिए कि किसे क्या मिला

जमा करने वाले ने डॉलर में 7% कमाया और उसे विनिमय दर का कोई जोखिम नहीं उठाना पड़ा. बैंक को सस्ता वित्त मिला, जिसे वह पूरी तरह कर्ज के रूप में दे सकता था और उसे कोई सुरक्षा खरीदने की जरूरत नहीं थी. भारत को बड़ी मात्रा में डॉलर मिले और करीब 13 लाख करोड़ रुपये ऐसी अर्थव्यवस्था में पहुंचाने के लिए मिले, जहां बैंक जमा की कमी से जूझ रहे थे.

तो जिस सुरक्षा को खरीदने की जरूरत अब बैंकों को नहीं थी, उसकी कीमत किसने चुकाई?

किसी ने नहीं. जोखिम बस आरबीआई ने अपने ऊपर ले लिया.

एक अनुमान के मुताबिक पांच साल की इस लागत करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये हो सकती है, यह भारतीय स्टेट बैंक की शोध रिपोर्ट का मूल आंकड़ा है, जिसे जुटाई गई वास्तविक राशि के आकार के अनुसार बढ़ाया गया है. यह एक अनुमान है, कोई सार्वजनिक रूप से बताई गई राशि नहीं, और इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए.

यह लागत वित्त मंत्रालय की ओर से जारी किसी चेक के रूप में सामने नहीं आएगी. यह आरबीआई की बैलेंस शीट में रहेगी, जहां यह हर साल केंद्रीय बैंक की ओर से सरकार को हस्तांतरित किए जाने वाले अधिशेष को कम कर सकती है, जो सरकार के खजाने की सबसे बड़ी एकल प्राप्तियों में से एक है.

यह कभी सरकारी कर्ज के रूप में दिखाई नहीं देगा. फिर भी यह एक लागत है और अंततः सार्वजनिक लागत ही है. और बैलेंस शीट के दूसरी तरफ एक और संख्या है.

आरबीआई की किताबों में कुछ और भी हो रहा है

उसने 137 अरब डॉलर के बाद की तारीख वाले चेक लिखे हैं.

आप जानते हैं कि बाद की तारीख वाला चेक कैसे काम करता है. पैसा अभी खाते में रखा है. बस अब आप उसे खर्च नहीं कर सकते. कोई व्यक्ति पहले से तय तारीख पर उसे लेने आएगा.

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 729 अरब डॉलर पर है. इसमें से करीब 137 अरब डॉलर के खिलाफ चेक लिखे जा चुके हैं. इसलिए वास्तविक सुरक्षा भंडार की राशि सुर्खियों में दिखाई देने वाले आंकड़े से कम है.

आरबीआई ये चेक आखिर क्यों लिखता है? जब रुपया गिर रहा होता है, तो वह डॉलर बेचकर मुद्रा को सहारा देता है. लेकिन बेचे गए डॉलर हमेशा के लिए चले जाते हैं और घटता हुआ विदेशी मुद्रा भंडार बाजार को डरा सकता है. इसलिए एक और रास्ता है. डॉलर आज देने के बजाय आरबीआई उन्हें बाद में देने का वादा करता है. रुपये को अभी सहारा मिलता है. भंडार अप्रभावित दिखता है. डॉलर वास्तव में भविष्य की किसी तारीख पर बाहर जाते हैं. इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है — यह केंद्रीय बैंकों का एक सामान्य साधन है. लेकिन वादा फिर भी वादा होता है और वादे पूरे करने पड़ते हैं.

यहीं से असहज करने वाला हिस्सा शुरू होता है. 137 अरब डॉलर लगभग उतनी ही राशि है, जितनी अभी देश में आई है. दोनों को सीधे-सीधे एक समान नहीं माना जा सकता, क्योंकि इस बही-खाते का अधिकांश हिस्सा रुपये को बचाने के लिए बनाया गया था और यह कहना गलत होगा कि एक दूसरे के बराबर है.

यही कारण है कि आरबीआई को बताना चाहिए कि इस व्यवस्था के जरिए इसमें से कितनी राशि बनी.

किसी ने पूछा ही नहीं.

भारत ने ऐसा क्यों किया?

क्योंकि दो वर्षों से विदेशी निवेशक देश से बाहर जा रहे थे.

विदेशी निवेशकों ने 2025 में भारतीय शेयरों से 1.66 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए. 2026 में उन्होंने और ज्यादा बिक्री की, अकेले मार्च भारतीय बाजारों के इतिहास में विदेशी बिकवाली का सबसे खराब महीना रहा. दोनों वर्षों को मिलाकर करीब 3.9 लाख करोड़ रुपये देश से बाहर चले गए.

भारत के पास इसे भरने के तीन रास्ते थे.

एक, खुले बाजार से कर्ज लेना, विदेश में सरकारी बॉन्ड बेचकर और दो वर्षों तक भारत को बिकते देखने के बाद दुनिया को इसकी कीमत तय करने देना. भारत ने कभी ऐसा नहीं किया है. 2019 के बजट में इसका प्रस्ताव रखा गया था और बाद में इसे चुपचाप हटा दिया गया.

दो, आईएमएफ के पास जाना. राजनीतिक रूप से अकल्पनीय.

तीन,  जमा योजना के नियमों को चुपचाप बदलना और ऐसी कीमत चुकाना, जिसे दो संस्थानों के बाहर कोई कभी नहीं देख पाएगा.

भारत ने तीसरा रास्ता चुना. और इससे विदेशियों द्वारा निकाली गई राशि से करीब तीन गुना पैसा देश में आया.

एक बात याद रखिए. भारत उन डॉलर को नहीं छाप सकता, जिन्हें उसे चुकाना है. उसे हर डॉलर बाहर जाकर खरीदना होगा.

सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा, जिसे किसी ने प्रकाशित नहीं किया

127 अरब डॉलर में से वास्तव में कितना पैसा प्रवासी भारतीयों का है?

प्रवासी भारतीय खाते के जरिए आने वाला हर डॉलर जरूरी नहीं कि प्रवासी भारतीय की बचत हो.

2013 में पिछली एफसीएनआर राशि जुटाने की प्रक्रिया जांच के दायरे में आई थी, क्योंकि कुछ विदेशी बैंकों के प्रवासी भारतीय जमाओं को वित्तपोषित करने की बात सामने आई थी. खाते पर नाम प्रवासी भारतीय का था. लेकिन डॉलर कहीं और से आए थे.

यह संभावना खत्म नहीं हुई है. भारतीय स्टेट बैंक खुद अब ऐसे लीवरेज्ड एफसीएनआर ढांचे की पेशकश करता है, जिसमें प्रवासी भारतीय जमा राशि को बढ़ाने के लिए अपनी पूंजी के खिलाफ कर्ज लेता है. विदेशी कर्जदाता के पास कर्ज वापस मांगने का अधिकार बना रहता है.

यह सवाल नहीं है कि लीवरेज्ड पैसा अच्छा है या बुरा. सवाल यह है कि यह किस तरह का वित्तपोषण है.

वास्तविक जमाकर्ता की बचत लंबे समय तक बनी रहती है. दो ब्याज दरों के बीच के अंतर का फायदा उठाने के लिए विदेशी बैंक की ओर से लगाया गया पैसा ऐसा नहीं होता. अगर आज की 127 अरब डॉलर की राशि का बड़ा हिस्सा लीवरेज्ड है, तो इस देनदारी की प्रकृति पूरी तरह बदल जाती है.

2029 में सवाल केवल यह नहीं होगा कि प्रवासी भारतीय अपनी जमा राशि को आगे बढ़ाता है या नहीं.

सवाल यह होगा कि क्या उस समय भी विदेशी कर्जदाता इस सौदे को जारी रखना चाहता है.

2029

फिलहाल यह दांव शानदार नजर आ रहा है.

भारत को डॉलर मिले. बैंकों को नकदी मिली. जमाकर्ता को रिटर्न मिला. आरबीआई ने समय खरीदा.

लेकिन मुद्रा का जोखिम खत्म नहीं हुआ. वह सिर्फ स्थानांतरित हुआ.

और बिल भी.

2029 तक भारत को ये डॉलर लौटाने होंगे. तब तक इस पैसे को कुछ उपयोगी काम करना होगा — विकास को वित्तपोषित करना, क्षमता का निर्माण करना, पूंजी आकर्षित करना, अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और अंततः उन डॉलर को पैदा करना, जिनसे इसका भुगतान किया जा सके.

अगर ऐसा हुआ, तो यह भारत द्वारा की गई सबसे समझदार बैलेंस-शीट इंजीनियरिंग की कोशिशों में से एक नजर आएगा. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो देश को पता चलेगा कि इस योजना ने वास्तव में क्या किया. इसने डॉलर की समस्या को खत्म नहीं किया. इसने उस समस्या को बस ऐसी तारीख तक आगे बढ़ा दिया है, जब किसी और को उससे निपटना होगा.

2026: डॉलर आते हैं. 2029-2031: हिसाब का वक्त?

 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 

 


ऑटो पार्ट्स कंपनियों को ग्लोबल बनने की सलाह, पीयूष गोयल बोले- भारत से बाहर मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाएं

नए व्यापार समझौतों से 38 विकसित अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंच मिली, अब घरेलू कंपनियों को वैश्विक कारोबार और उच्च मूल्य वाले उत्पादों पर करना होगा फोकस

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
BWHindia

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने ऑटो कंपोनेंट कंपनियों से घरेलू बाजार तक सीमित रहने के बजाय वैश्विक स्तर पर विस्तार करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियों को विकसित देशों में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपनी भूमिका मजबूत करने और कम मूल्य वाले पुर्जों से आगे बढ़कर उच्च मूल्य वाले एकीकृत समाधान विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए.

नई दिल्ली में ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACMA) के 66वें वार्षिक सत्र को संबोधित करते हुए गोयल ने कहा कि भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग का अंतरराष्ट्रीय कारोबार करीब 50 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच रहा है. इसमें आयात और निर्यात का हिस्सा लगभग बराबर है.

उन्होंने कहा, "स्थानीय कारोबार को वैश्विक कारोबार में बदलें." गोयल के मुताबिक, भारतीय कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तकनीकी साझेदारी के जरिए वैश्विक स्तर की गुणवत्ता वाले उत्पाद प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बनाने की क्षमता साबित की है. अब इस क्षमता का इस्तेमाल वैश्विक कंपनियां बनाने में किया जाना चाहिए.

38 विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ी पहुंच

गोयल ने कहा कि पिछले चार-पांच वर्षों में सरकार की ओर से किए गए नौ व्यापार समझौते 38 विकसित अर्थव्यवस्थाओं को कवर करते हैं. इन देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था करीब 60 लाख करोड़ डॉलर की है. इन समझौतों से भारतीय कंपनियों को बड़े और अपेक्षाकृत समृद्ध बाजारों तक पहुंच मिली है.

उन्होंने कहा कि इन समझौतों के जरिए भारतीय विनिर्माण और वैश्विक बाजारों के बीच बेहतर तालमेल की संभावनाएं बनी हैं. ACMA ने भी व्यापार वार्ताओं में भारतीय ऑटो कंपोनेंट्स के लिए शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच की मांग करने के साथ घरेलू बाजार को भी पारस्परिक रूप से खोलने का समर्थन किया है.

गोयल ने कहा कि भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार है.

ऑटो उद्योग में बनी हुई मजबूत मांग

गोयल के अनुसार, ऑटो कंपोनेंट क्षेत्र दोहरे अंक की दर से बढ़ रहा है, जबकि व्यापक ऑटोमोबाइल उद्योग की वृद्धि दर भी ऊंची दोहरे अंक में है. उन्होंने कहा कि इस साल यात्री वाहनों की बिक्री करीब 50 लाख इकाइयों तक पहुंच सकती है.

उन्होंने कहा कि मौजूदा मांग वास्तविक है और केवल कंपनियों के पास जमा अतिरिक्त स्टॉक की वजह से नहीं है. इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग भी मजबूत बनी हुई है और कुछ मॉडलों के लिए छह महीने तक की प्रतीक्षा अवधि देखी जा रही है.

आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने पर जोर

गोयल ने ऑटो कंपोनेंट निर्माताओं से उन क्षेत्रों की पहचान करने को कहा जहां भारत अभी भी आयात पर निर्भर है. उन्होंने कंपनियों से सक्रिय रूप से घरेलू उत्पादन बढ़ाने और स्थानीयकरण कार्यक्रम चलाने की अपील की, ताकि भविष्य में वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आने वाले व्यवधानों का असर कम किया जा सके. उन्होंने कहा कि विशेष इस्पात, तकनीकी वस्त्र और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में सरकार की पहल का उद्देश्य घरेलू औद्योगिक क्षमता को मजबूत करना है.

सरकार 20 औद्योगिक और स्मार्ट शहर परियोजनाओं पर भी काम कर रही है. गोयल ने कहा कि जरूरत पड़ने पर ऑटो कंपोनेंट विनिर्माण के लिए समर्पित औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए जा सकते हैं. अमेरिका-भारत ऑटोमोटिव साझेदारी के लिए प्लग-एंड-प्ले सुविधाओं वाले विशेष औद्योगिक पार्क बनाने की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है.

पुर्जों से आगे बढ़कर एकीकृत समाधान बनाने की जरूरत

वाणिज्य मंत्री ने कहा कि भारतीय कंपनियों को सिर्फ अलग-अलग ऑटो पार्ट्स की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें ऐसे एकीकृत और उच्च मूल्य वाले समाधान विकसित करने चाहिए, जिन्हें भारत में डिजाइन, निर्मित और फिर वैश्विक बाजारों में निर्यात किया जा सके.

उन्होंने प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अधिक इस्तेमाल पर भी जोर दिया. खासकर गुणवत्ता नियंत्रण, ग्राहकों की जरूरतों को समझने और उत्पादन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने में एआई की भूमिका बढ़ाई जा सकती है.

गोयल ने वाहन सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देने और अमेरिका तथा यूरोप जैसे बाजारों में बढ़ती कस्टमाइज्ड वाहनों की मांग के अनुरूप उत्पाद विकसित करने की जरूरत भी बताई.

वाहन कबाड़ नीति को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाने की जरूरत

पुराने वाहनों को कबाड़ में बदलने के मुद्दे पर गोयल ने कहा कि सरकार और उद्योग को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे पुराने वाहन को कबाड़ में देने के बाद नया वाहन खरीदना उपभोक्ताओं के लिए आर्थिक रूप से आकर्षक हो.

उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से प्रोत्साहन देने की कोशिश की गई है, लेकिन वाहन निर्माता और उद्योग के अन्य हिस्सेदारों को भी पुराने वाहनों के लिए उचित मूल्य उपलब्ध कराना होगा.

अमेरिका के साथ ऑटो क्षेत्र में बढ़ सकता है सहयोग

भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने दोनों देशों के संबंधों को "ऐतिहासिक ऊंचाई" पर बताते हुए कहा कि दोनों देश मिलकर भविष्य की गतिशीलता व्यवस्था तैयार कर रहे हैं. उन्होंने भारतीय ऑटो कंपोनेंट कंपनियों को अमेरिका में निवेश बढ़ाने की सलाह दी. इसमें नई विनिर्माण इकाइयां, अनुसंधान एवं विकास केंद्र और वितरण नेटवर्क स्थापित करना शामिल है.

गोर ने अमेरिका में भारत की भारत फोर्ज, सुंदरम क्लेटन और महिंद्रा जैसी कंपनियों की मौजूदगी का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच दवा, रक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी, डेटा सेंटर और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ रहा है.

भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते से नए अवसर

पश्चिमी भारत के लिए ब्रिटेन के उप उच्चायुक्त और दक्षिण एशिया के व्यापार आयुक्त हरजिंदर कांग ने कहा कि ऑटोमोबाइल और भविष्य की गतिशीलता ब्रिटेन की उन्नत विनिर्माण रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

उन्होंने 15 जुलाई से लागू हुए भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे ऑटो कंपोनेंट्स के लिए शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी और आपूर्ति शृंखला साझेदारी तथा संयुक्त उपक्रमों को बढ़ावा मिलेगा.

कांग के मुताबिक, समझौते ने बड़ी संख्या में शुल्क दरों को कम या समाप्त किया है और दोनों देशों के बीच सीमा शुल्क तथा सीमा संबंधी प्रक्रियाओं को भी आसान बनाया है.

उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक मोटर, बैटरी, हाइड्रोजन प्रणाली, हल्के मिश्रित पदार्थ और सॉफ्टवेयर आधारित वाहन तकनीक जैसे क्षेत्रों में ब्रिटेन की विशेषज्ञता भारतीय निर्माताओं के लिए सहयोग के नए अवसर पैदा कर सकती है.

500 अरब डॉलर का उद्योग बनाने का लक्ष्य

गोयल ने कहा कि भारत के बढ़ते व्यापार समझौते और घरेलू विनिर्माण को मिल रहा सरकारी समर्थन ऑटो कंपोनेंट उद्योग को 500 अरब डॉलर का उद्योग बनाने की महत्वाकांक्षा को पूरा करने में मदद कर सकता है.

हालांकि, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार और उद्योग के बीच लगातार संवाद जरूरी है. उन्होंने उद्योग जगत से अपनी समस्याओं, सुझावों और सुधारों की जरूरतों को सरकार के सामने रखने की अपील की. गोयल ने कहा, "हमें आपके विचार चाहिए. हमें आपके सुझाव चाहिए. हमें आपकी मांगें चाहिए."


Adobe ने भारतीय AI स्टार्टअप रिलो का किया अधिग्रहण, एआई आधारित विपणन में बढ़ाएगी पकड़

एजेंटिक एआई और स्वचालन पर अडोबी (Adobe) का फोकस तेज, रिलो का अधिग्रहण भारत में कंपनी का दूसरा ज्ञात अधिग्रहण

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
BWHindia

सॉफ्टवेयर क्षेत्र की दिग्गज कंपनी अडोबी (Adobe) ने भारतीय एआई स्वचालन स्टार्टअप रिलो का अधिग्रहण कर लिया है. कंपनी ने यह कदम एजेंटिक एआई, विपणन स्वचालन और एआई आधारित कार्यप्रवाह के क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए उठाया है. हालांकि, इस सौदे की वित्तीय शर्तों का खुलासा नहीं किया गया है.

सितंबर 2025 में आईआईटी बॉम्बे के स्नातक ध्रुव जगलान और जॉर्जी बॉबी द्वारा स्थापित रिलो ऐसा मंच विकसित करता है, जिसके जरिए तकनीकी जानकारी नहीं रखने वाले उपयोगकर्ता भी सामान्य अंग्रेजी में जटिल कार्यप्रवाह बता सकते हैं. इसके बाद एआई एजेंट इन कार्यों को तैयार कर सैकड़ों अलग-अलग डिजिटल उपकरणों पर पूरा कर सकते हैं.

विपणन टीमों के लिए एआई कर्मचारियों का मंच

शुरुआत में कार्यप्रवाह स्वचालन पर ध्यान देने वाला रिलो बाद में विपणन और बाजार विस्तार टीमों के लिए "एआई कर्मचारियों" के मंच के रूप में विकसित हुआ. इसके जरिए प्रतिस्पर्धी कंपनियों की जानकारी जुटाने, संभावित ग्राहकों की पहचान, लिंक्डइन पर संपर्क, रेडिट विपणन, सामाजिक मीडिया सामग्री और प्रचार अभियानों के लिए शोध जैसे काम स्वचालित किए जा सकते हैं. शुरुआत के कुछ ही महीनों में रिलो के 10,000 से अधिक उपयोगकर्ता हो गए थे. कंपनी को एंथ्रोपिक के क्लॉड काउवर्क का शुरुआती प्रतिस्पर्धी भी माना गया.

पीक एक्सवी और जेड47 से मिला था निवेश

रिलो ने पीक एक्सवी पार्टनर्स और जेड47/डीविसी से निवेश जुटाया था. रिपोर्टों के मुताबिक, निवेश के समय कंपनी का मूल्यांकन करीब 1 करोड़ डॉलर था. रिलो के निवेशक और डे जीरो वेंचर्स के प्रबंध साझेदार राहुल गुप्ता ने कंपनी के कार्यप्रवाह निर्माण मंच की तारीफ करते हुए कहा कि यह "समय से काफी आगे" था और इससे एडोबी को ग्राहक अनुभव और उत्पादकता बेहतर करने में मदद मिल सकती है.

भारत में एडोबी का दूसरा ज्ञात अधिग्रहण

रिलो का अधिग्रहण भारत में एडोबी का दूसरा ज्ञात अधिग्रहण है. इससे पहले 2023 में कंपनी ने जनरेटिव एआई वीडियो स्टार्टअप रीफ्रेज.एआई का अधिग्रहण किया था. इस सौदे के जरिए अडोबी को रिलो की तकनीकी टीम भी मिलेगी. ऐसे समय में यह अधिग्रहण महत्वपूर्ण है जब एआई आधारित विपणन और कार्यप्रवाह स्वचालन के क्षेत्र में बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है.

रिलो के सह-संस्थापक ध्रुव जगलान इससे पहले एआई भर्ती मंच बैबलबाट्स.एआई की सह-स्थापना कर चुके हैं. वहीं, जॉर्जी बॉबी कुकिंग-रोबोटिक्स कंपनी क्लाउडशेफ में प्रौद्योगिकी का नेतृत्व कर चुके हैं. रिलो की टीम में आईआईटी बॉम्बे के कंप्यूटर विज्ञान के स्नातक भी शामिल हैं. इनमें भावेश ढींगरा भी हैं, जिन्होंने 2016 की जेईई एडवांस परीक्षा में अखिल भारतीय स्तर पर दूसरा स्थान हासिल किया था.

एआई कंपनियों की नजर अब विपणन क्षेत्र पर

अडोबी का यह अधिग्रहण ऐसे समय हुआ है जब प्रमुख एआई कंपनियां विपणन क्षेत्र में तेजी से विस्तार कर रही हैं. एंथ्रोपिक भी विपणन पेशेवरों के लिए क्लॉड आधारित समाधान पेश कर चुकी है.

रिलो की स्वचालन तकनीक एडोबी को बड़े उद्यम ग्राहकों के लिए विपणन से जुड़े विभिन्न कार्यों को एक ही मंच से तैयार करने और संचालित करने की क्षमता दे सकती है. इससे कंपनी की एआई आधारित विपणन रणनीति को मजबूती मिलने की उम्मीद है.
 


नोएल टाटा को बड़ी राहत, टाटा संस के 833 शेयरों के हस्तांतरण की जांच बंद; धर्मार्थ आयुक्त ने दी क्लीन चिट

1989 में नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट से नेवल एच. टाटा को शेयर हस्तांतरित करने के मामले में महाराष्ट्र के धर्मार्थ आयुक्त का फैसला, कानून के मुताबिक हुई थी पूरी प्रक्रिया

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
BWHindia

टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष नोएल टाटा को एक पुराने शेयर हस्तांतरण विवाद में बड़ी राहत मिली है. महाराष्ट्र के धर्मार्थ आयुक्त ने 1989 में नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट से नेवल एच. टाटा को टाटा संस के 833 शेयरों के हस्तांतरण की जांच की मांग वाली शिकायत को बंद कर दिया है. 2 सितंबर 2026 को जारी आदेश में धर्मार्थ आयुक्त ने कहा कि यह हस्तांतरण उस समय लागू कानून के मुताबिक किया गया था और मामले में आगे किसी जांच की जरूरत नहीं है.

यह शिकायत नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी विजय सिंह ने 10 जून 2026 को ईमेल के जरिए दाखिल की थी. उन्होंने शेयर हस्तांतरण की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की थी. धर्मार्थ आयुक्त ने शिकायत, ट्रस्ट के जवाब और इससे जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा करने के बाद यह फैसला सुनाया.

कानून के मुताबिक हुआ था शेयरों का हस्तांतरण

टाटा ट्रस्ट के मुताबिक, धर्मार्थ आयुक्त ने पाया कि शेयरों की बिक्री उस समय लागू वैधानिक जरूरतों के कारण आवश्यक थी और इसके लिए उचित दस्तावेज भी मौजूद थे. शेयरों के लिए भुगतान की गई राशि आयकर आयुक्त द्वारा तय मूल्यांकन के आधार पर निर्धारित की गई थी.

ट्रस्ट को इस लेनदेन से मुनाफा भी हुआ था, जिसे 31 मार्च 1989 को समाप्त वित्त वर्ष की तुलन-पत्र में दर्ज किया गया था. शेयरों का हस्तांतरण इस शर्त के साथ किया गया था कि इन्हें किसी तीसरे पक्ष को नहीं बेचा जाएगा और ये प्राप्तकर्ता के परिवार के भीतर ही रहेंगे.

धर्मार्थ आयुक्त ने निष्कर्ष दिया कि यह हस्तांतरण उस समय लागू कानून के प्रावधानों के पूरी तरह अनुरूप था. इसलिए महाराष्ट्र सार्वजनिक न्यास अधिनियम, 1950 के तहत इस मामले में आगे किसी कार्यवाही की जरूरत नहीं है.

ट्रस्टी के आचरण पर भी धर्मार्थ आयुक्त की टिप्पणी

धर्मार्थ आयुक्त ने शिकायत दाखिल करने वाले ट्रस्टी विजय सिंह के आचरण पर भी टिप्पणी की. टाटा ट्रस्ट के बयान के अनुसार, आयुक्त ने कहा कि सिंह ने 10 जून को भेजे गए अपने ईमेल को ट्रस्ट के सामने उपलब्ध नहीं कराया. इससे यह संकेत मिलता है कि उनका उद्देश्य इस मामले को "अन्य ट्रस्टियों और पूरे ट्रस्ट से छिपाना" था.

आदेश में सिंह के आचरण को नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट की प्रतिष्ठा और साख को नुकसान पहुंचाने वाला बताया गया. आयुक्त के मुताबिक, उनका व्यवहार "नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी के लिए अशोभनीय" था.

बैठक के दो दिन बाद दाखिल की शिकायत

धर्मार्थ आयुक्त ने सिंह की ओर से उठाए गए कदमों के क्रम पर भी हैरानी जताई. आदेश के मुताबिक, सिंह ने 8 जून को हुई ट्रस्ट मंडल की बैठक में हिस्सा लिया था. इस बैठक में नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट की ओर से धर्मार्थ आयुक्त के समक्ष मामले का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रस्ताव पारित किया गया था. इसके महज दो दिन बाद, 10 जून को सिंह ने खुद शेयर हस्तांतरण की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए शिकायत दाखिल कर दी. धर्मार्थ आयुक्त ने इस घटनाक्रम पर भी सवाल उठाए.

इस आदेश के साथ 1989 में हुए टाटा संस के 833 शेयरों के इस पुराने हस्तांतरण को लेकर चल रही जांच की मांग पर फिलहाल विराम लग गया है. अब इसमें अंग्रेजी के शब्दों जैसे ट्रांसफर, चैरिटी कमिश्नर, बोर्ड, बैलेंस शीट, गुडविल, क्लीन चिट आदि को भी हिंदी रूप में रखा गया है.


भारत के विंड पावर सेक्टर में नई छलांग, 2030 तक 100 GW का लक्ष्य; मैन्युफैक्चरिंग, ऑफशोर और रिपावरिंग पर बढ़ा फोकस

58.14 GW पहुंची भारत की पवन ऊर्जा क्षमता, FY26 में रिकॉर्ड 6.05 GW जुड़ी; 43 GW से अधिक परियोजनाएं निर्माणाधीन और 1,164 GW तक आंकी गई क्षमता

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
BWHindia

भारत का पवन ऊर्जा क्षेत्र अब सिर्फ क्लीन एनर्जी का जरिया नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग, एक्सपोर्ट और एनर्जी सिक्योरिटी का भी अहम आधार बनता जा रहा है. देश की स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 31 जुलाई 2026 तक बढ़कर 58.14 गीगावाट (GW) पहुंच गई है. वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 6.05 GW नई क्षमता जुड़ी, जो अब तक की सबसे बड़ी सालाना बढ़ोतरी है. सरकार ने 2030 तक पवन ऊर्जा क्षमता को 100 GW और 2035 तक 155 GW करने का लक्ष्य रखा है.

इसी बढ़ते बाजार और सेक्टर की अगली विकास यात्रा पर चर्चा के लिए Windergy India 2026 का 8वां संस्करण 7 से 9 अक्टूबर 2026 तक चेन्नई ट्रेड सेंटर में आयोजित किया जाएगा. इंडियन विंड टर्बाइन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IWTMA) के मुताबिक, 100 GW के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भारत को हर साल करीब 10 GW नई पवन क्षमता जोड़नी होगी. फिलहाल 43 GW से अधिक की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं, जबकि 150 मीटर हब हाइट पर देश की संभावित पवन ऊर्जा क्षमता 1,164 GW तक आंकी गई है.

100 GW के लक्ष्य के लिए उद्योग को साथ आना होगा

IWTMA के मानद सचिव और Suzlon Energy Ltd के प्रेसिडेंट - कॉरपोरेट अफेयर्स एंड रिटेल बिजनेस, दिनेश जगदाले ने कहा, "भारत के विंड सेक्टर ने साबित कर दिया है कि वह एक शुरुआती उद्योग से बढ़कर 58 GW से अधिक की स्थापित क्षमता और दुनिया भर में टर्बाइन निर्यात करने वाले मजबूत मैन्युफैक्चरिंग बेस तक पहुंच सकता है. अब आगे का रास्ता स्पष्ट है - 2030 तक 100 GW और 2035 तक 155 GW. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मैन्युफैक्चरर्स, डेवलपर्स, नीति निर्माताओं और इनोवेटर्स के बीच सहयोग जरूरी है." उन्होंने कहा कि सेक्टर को अगले चरण में तेजी से विस्तार के लिए मिलकर काम करना होगा.

24 GW हुई घरेलू टर्बाइन मैन्युफैक्चरिंग क्षमता

विंड पावर की बढ़ती मांग के साथ भारत की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता भी तेजी से मजबूत हुई है. देश में विंड टर्बाइन बनाने की वार्षिक क्षमता 2014 के करीब 10 GW से बढ़कर अब 24 GW हो गई है. इसमें 70-80 फीसदी तक घरेलू वैल्यू एडिशन है.

भारत अब सिर्फ घरेलू जरूरत पूरी करने वाला बाजार नहीं रहा. वित्त वर्ष 2025-26 में विंड इक्विपमेंट का एक्सपोर्ट 12,000 करोड़ रुपये को पार कर गया, जो करीब 50 फीसदी की वृद्धि है. इससे भारत के ग्लोबल विंड मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब बनने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं.

Envision Energy India के ग्लोबल बिजनेस डेवलपमेंट प्रमुख और IWTMA की एग्जीक्यूटिव कमेटी के सदस्य सुमन नाग ने कहा, "जैसे-जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियां भारत से मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट बढ़ा रही हैं, हम देश को ग्लोबल विंड एक्सपोर्ट हब के रूप में मजबूत करने और भारत के व्यापक एक्सपोर्ट लक्ष्य में सार्थक योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं."

WT-MARUT से सप्लाई चेन को मिलेगा डिजिटल सपोर्ट

मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने IWTMA के साथ मिलकर WT-MARUT पहल शुरू की है. इसे भारत का पहला विंड सप्लाई-चेन पोर्टल बताया जा रहा है. इसका उद्देश्य विंड सेक्टर में तकनीकी क्षमता, सप्लाई चेन, रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा देना है.

दिल्ली में Windergy India 2026 के कर्टेन रेजर कार्यक्रम में MNRE के जॉइंट सेक्रेटरी राजेश कुलहरी ने कहा, "भारत का एनर्जी ट्रांजिशन अब सिर्फ मेगावाट जोड़ने तक सीमित नहीं है. यह एक पूरा इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम बनाने के बारे में है, जो कुशल रोजगार पैदा करे, विंड मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट को बढ़ावा दे, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करे और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करके सिस्टम लागत घटाए."

अब सिर्फ कम टैरिफ नहीं, प्रोजेक्ट की व्यवहारिकता भी अहम

विंड सेक्टर के लिए टैरिफ और कॉस्ट ऑफ एनर्जी भी Windergy India 2026 के प्रमुख एजेंडे में रहेंगे. उद्योग का मानना है कि अब परियोजनाओं की व्यवहारिकता केवल सबसे कम बोली वाले टैरिफ पर निर्भर नहीं होनी चाहिए. समय पर पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA), ट्रांसमिशन की उपलब्धता और ऐसे बिडिंग स्ट्रक्चर जरूरी हैं, जो विंड, हाइब्रिड और फर्म रिन्यूएबल पावर से मिलने वाली अतिरिक्त सिस्टम वैल्यू को ध्यान में रखें.

भारत के रिन्यूएबल एनर्जी बाजार में स्टैंडअलोन विंड और सोलर से आगे बढ़कर विंड-सोलर हाइब्रिड, स्टोरेज-बैक्ड और Firm & Dispatchable Renewable Energy (FDRE) परियोजनाओं की भूमिका बढ़ रही है. इससे बिजली की उपलब्धता को ज्यादा स्थिर और भरोसेमंद बनाने में मदद मिल सकती है.

लॉजिस्टिक्स और ग्रिड कनेक्टिविटी बनेगी अहम कड़ी

विंड टर्बाइन और उनके बड़े कंपोनेंट्स की आवाजाही के लिए लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर भी सेक्टर के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. रूट प्लानिंग, परमिट, हेवी-लिफ्ट मूवमेंट, वेयरहाउसिंग और स्पेयर-पार्ट लॉजिस्टिक्स में दक्षता परियोजनाओं के समय पर क्रियान्वयन और रखरखाव के लिए जरूरी है.

डिजिटल ट्रैकिंग और बेहतर लॉजिस्टिक्स सिस्टम से सप्लाई चेन में विजिबिलिटी बढ़ाने के साथ उपकरणों की आवाजाही को भी अधिक कुशल बनाया जा सकता है. वहीं, जमीन, ट्रांसमिशन कनेक्टिविटी और विभिन्न मंजूरियों से जुड़ी चुनौतियों को दूर करना भी सेक्टर की तेज ग्रोथ के लिए जरूरी होगा.

रिपावरिंग से पुराने प्रोजेक्ट्स की क्षमता बढ़ाने का मौका

भारत में 19,000 से अधिक विंड टर्बाइन जनरेटर (WTG) पहले से स्थापित हैं, जिनमें बड़ी संख्या पुरानी और 1 MW से कम क्षमता वाली टर्बाइनों की है. खासकर हाई-विंड जोन में मौजूद इन पुराने प्रोजेक्ट्स को आधुनिक टर्बाइन टेक्नोलॉजी से रिपावर करने की बड़ी संभावना है.

उद्योग के मुताबिक, रिपावरिंग के जरिए पुराने टर्बाइनों की क्षमता उपयोग दर (CUF) को मौजूदा 14-15 फीसदी से बढ़ाकर करीब 30 फीसदी तक ले जाया जा सकता है. इससे बिना बड़े पैमाने पर नई जमीन की जरूरत के मौजूदा विंड साइट्स से ज्यादा बिजली उत्पादन संभव होगा.

ऑफशोर विंड बनेगा अगला बड़ा फ्रंटियर

भारत के विंड सेक्टर की अगली बड़ी ग्रोथ स्टोरी ऑफशोर विंड एनर्जी हो सकती है. सरकार और उद्योग की ओर से ऑफशोर विंड परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है और 1 GW के पायलट प्रोजेक्ट को इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. ऑफशोर विंड के विस्तार से भारत के तटीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर स्वच्छ बिजली उत्पादन के साथ-साथ नए मैन्युफैक्चरिंग, सप्लाई चेन और निवेश अवसर पैदा हो सकते हैं.

Windergy India बनेगा ग्लोबल विंड इंडस्ट्री का मंच

IWTMA और PDA Ventures Pvt. Ltd. द्वारा आयोजित Windergy India 2026 को Ministry of Power और MNRE का समर्थन प्राप्त है. आयोजन में 20,000 से अधिक प्रतिभागियों, 400 से ज्यादा डेलीगेट्स और 30 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है. करीब 350 प्रदर्शक अपनी तकनीक, उत्पाद और समाधान पेश करेंगे.

PDA Ventures Pvt. Ltd. के चेयरमैन एवं CEO प्रदीप देवैया ने कहा, "Windergy India एक इंटरनेशनल ट्रेड फेयर और कॉन्फ्रेंस के रूप में पूरे विंड इकोसिस्टम को एक मंच पर लाने वाला प्लेटफॉर्म बन चुका है. भारत जब अपनी क्षमता से जुड़े लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है, तब हम इस उद्योग को कनेक्ट और ग्रो करने के लिए जरूरी प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने में अपनी भूमिका निभाते रहेंगे."

इस वर्ष कार्यक्रम की थीम 'Wind – Powering India's Energy Resilience' रखी गई है. दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस के साथ Academia Session भी आयोजित किया जाएगा, जिसमें विंड सेक्टर की बढ़ती कुशल वर्कफोर्स जरूरतों पर चर्चा होगी. आयोजन ऐसे समय हो रहा है जब भारत की विंड इंडस्ट्री घरेलू क्षमता विस्तार, एक्सपोर्ट, ऑफशोर विंड और रिपावरिंग के जरिए अपने अगले बड़े ग्रोथ फेज में प्रवेश कर रही है.


भारत में NRIs का बढ़ा भरोसा, बैंकों में आया ₹12 लाख करोड़ से ज्यादा का विदेशी फंड; जानिए वजह

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की खास डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा को प्रवासी भारतीयों का जबरदस्त रिस्पॉन्स, FCNR(B) डिपॉजिट से ही 127.23 अरब डॉलर जुटे

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
BWHindia

भारतीय बैंकों में प्रवासी भारतीयों (NRIs) का भरोसा बढ़ता दिख रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से शुरू की गई विशेष डॉलर-रुपया फॉरेन करेंसी स्वैप सुविधा के तहत 31 अगस्त 2026 तक देश में कुल 136.377 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह हुआ. इसमें अकेले FCNR(B) डिपॉजिट से 127.226 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम आई है. इस योजना को मिले जबरदस्त रिस्पॉन्स का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि RBI ने इसे तय समय से करीब एक महीने पहले ही बंद कर दिया.

8 जून को शुरू हुई थी खास सुविधा

RBI ने वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता के बीच देश की बाहरी क्षेत्र की स्थिति मजबूत करने और विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बनाए रखने के लिए 8 जून 2026 को यह विशेष सुविधा शुरू की थी. इसके तहत FCNR(B) जमा, विदेशों से विदेशी मुद्रा में कर्ज और बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ECB) के लिए विशेष डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा उपलब्ध कराई गई.

FCNR(B) से आया सबसे ज्यादा विदेशी फंड

RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 31 अगस्त तक इन उपायों के जरिए कुल 136.377 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह हुआ. इसमें FCNR(B) डिपॉजिट का योगदान सबसे बड़ा रहा और इसके जरिए 127.226 अरब डॉलर से ज्यादा की राशि जुटाई गई.

इसके अलावा विदेशों से विदेशी मुद्रा में कर्ज के जरिए 5.26 अरब डॉलर और बाह्य वाणिज्यिक उधारी के जरिए 3.891 अरब डॉलर का प्रवाह हुआ. इस तरह कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह 136.377 अरब डॉलर से अधिक रहा.

तय समय से पहले बंद करनी पड़ी योजना

FCNR(B) डिपॉजिट सुविधा को पहले 30 सितंबर 2026 तक जारी रखा जाना था, लेकिन प्रवासी भारतीयों की मजबूत प्रतिक्रिया के बाद RBI ने इसे 31 अगस्त को ही बंद कर दिया. केंद्रीय बैंक के मुताबिक, सुविधा ने अपने तय उद्देश्य को समय से पहले हासिल कर लिया.

क्या होता है FCNR(B) डिपॉजिट?

FCNR(B) यानी Foreign Currency Non-Resident (Bank) जमा विदेशी मुद्रा में रखी जाने वाली सावधि जमा होती है. इसमें जमा की गई मूल राशि और उस पर मिलने वाले ब्याज का भुगतान उसी विदेशी मुद्रा में किया जाता है, जिसमें डिपॉजिट रखा गया है. वहीं, विदेशों से विदेशी मुद्रा में कर्ज और ECB के लिए उपलब्ध स्वैप सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगी.
 


भारत की आर्थिक ताकत पर दुनिया का भरोसा बढ़ा, 35 साल बाद JCR ने दी ‘A-’ रेटिंग

मजबूत आर्थिक ग्रोथ, घटता राजकोषीय घाटा और बेहतर होती बैंकिंग व्यवस्था के बीच JCR ने भारत की सॉवरेन रेटिंग BBB+ से बढ़ाकर A- कर दी है. एजेंसी ने रेटिंग का आउटलुक ‘स्टेबल’ रखा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
BWHindia

भारत की आर्थिक साख को लेकर बड़ी खबर सामने आई है. जापान की क्रेडिट रेटिंग एजेंसी JCR ने करीब 35 साल बाद भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग को अपग्रेड कर ‘A-’ कर दिया है. एजेंसी ने भारत की रेटिंग BBB+ से बढ़ाकर A- की है और आउटलुक ‘स्टेबल’ रखा है. JCR ने रेटिंग बढ़ाने के पीछे देश की मजबूत आर्थिक वृद्धि, राजकोषीय स्थिति में सुधार, मजबूत वित्तीय प्रणाली और बेहतर बाहरी स्थिति को प्रमुख वजह बताया है. यह अपग्रेड ऐसे समय हुआ है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियां बनी हुई हैं.

35 साल बाद मिली A- रेटिंग

JCR के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था ने हाल के वर्षों में करीब 7 फीसदी की मजबूत विकास दर बनाए रखी है. निजी खपत और सरकारी निवेश से ग्रोथ को लगातार समर्थन मिला है. पहली तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही, जो RBI के 7 फीसदी के अनुमान से अधिक है. वहीं, वित्त वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटा घटकर GDP के 4.4 फीसदी पर आ गया, जो एक साल पहले 4.7 फीसदी था.

मजबूत इकोनॉमी बनी अपग्रेड की बड़ी वजह

रेटिंग एजेंसी ने कहा कि भारत सरकार ने आर्थिक विकास और उत्पादकता बढ़ाने के लिए लगातार नीतिगत कदम उठाए हैं. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार, GST जैसे सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ता पूंजीगत खर्च अर्थव्यवस्था की बुनियाद को मजबूत कर रहे हैं. JCR को उम्मीद है कि भारत चालू वित्त वर्ष में भी 6 फीसदी से अधिक की आर्थिक वृद्धि बनाए रख सकता है.

बैंकिंग सेक्टर की बेहतर सेहत का भी असर

JCR ने भारत की वित्तीय प्रणाली में आए सुधार को भी रेटिंग अपग्रेड का अहम आधार माना है. दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (IBC), सरकारी पूंजी निवेश और RBI की निगरानी से बैंकों की एसेट क्वालिटी में सुधार हुआ है. इससे भारतीय बैंकिंग सिस्टम पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत हुआ है.

फिस्कल डेफिसिट और सरकारी कर्ज पर फोकस

सरकार लगातार राजकोषीय घाटे और कर्ज के बोझ को कम करने की दिशा में काम कर रही है. वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटा GDP के 4.3 फीसदी के बराबर रहने का अनुमान लगाया है. वहीं, केंद्र का कर्ज-GDP अनुपात 2025-26 के 56.1 फीसदी से घटकर 2026-27 में 55.6 फीसदी रहने का अनुमान है. सरकार का लक्ष्य मार्च 2031 तक इस अनुपात को 50 फीसदी तक लाना है.

विदेशी मुद्रा भंडार ने भी दिया सहारा

भारत की बाहरी स्थिति को भी JCR ने मजबूत बताया है. एजेंसी के मुताबिक चालू खाते का घाटा नियंत्रण में है और सेवाओं के निर्यात से मिलने वाला अधिशेष इसे सहारा देता है. देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी पर्याप्त स्तर पर है. 21 अगस्त को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 729.33 अरब डॉलर पर पहुंच गया था.

दूसरी रेटिंग एजेंसियां भी भारत पर भरोसा जता रहीं

JCR का यह अपग्रेड ऐसे समय हुआ है जब कई अन्य रेटिंग एजेंसियां भी भारत की क्रेडिट प्रोफाइल में सुधार कर चुकी हैं. S&P Global Ratings, Morningstar DBRS और जापान की R&I समेत कई एजेंसियों ने पिछले समय में भारत की रेटिंग में सुधार किया है या सकारात्मक आकलन दिया है. हालांकि, JCR ने राजकोषीय घाटे, राज्यों के बीच आर्थिक असमानता और चुनावों के दौरान राजकोषीय प्रबंधन जैसे जोखिमों को अभी भी चुनौती बताया है.

कुल मिलाकर, JCR की A- रेटिंग भारत की मजबूत होती आर्थिक बुनियाद, बेहतर राजकोषीय स्थिति और वित्तीय प्रणाली पर बढ़ते वैश्विक भरोसे का संकेत है. रेटिंग में सुधार से भारत की अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट प्रोफाइल मजबूत होने के साथ भविष्य में विदेशी निवेशकों के भरोसे को भी समर्थन मिल सकता है.


कल की गिरावट के बाद आज संभलेगा बाजार? क्रूड नरम, गिफ्ट निफ्टी 24,000 के पार; इन शेयरों पर नजर

बुधवार को सेंसेक्स कारोबार के दौरान करीब 800 अंक तक फिसला, हालांकि बाद में रिकवरी के चलते यह 373.93 अंक की गिरावट के साथ 76,570.35 पर बंद हुआ. निफ्टी भी 141.35 अंक टूटकर 23,914.45 पर बंद हुआ.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
BWHindia

भारतीय शेयर बाजार में बुधवार की तेज गिरावट के बाद गुरुवार को राहत के संकेत मिल रहे हैं. कच्चे तेल की कीमतों में हल्की नरमी और एशियाई बाजारों में मजबूती से निवेशकों का सेंटीमेंट सुधरा है. गिफ्ट निफ्टी करीब 90 अंकों की बढ़त के साथ 24,000 के अहम स्तर के ऊपर कारोबार कर रहा है. ऐसे में घरेलू बाजार में आज शुरुआती तेजी देखने को मिल सकती है. हालांकि, पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव और क्रूड की चाल बाजार की दिशा के लिए अहम बनी रहेगी.

कल क्यों गिरा था बाजार?

बाजार जानकारों के अनुसार, बुधवार को पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के 95 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ गया था. सेंसेक्स कारोबार के दौरान करीब 800 अंक तक फिसला, हालांकि बाद में रिकवरी के चलते यह 373.93 अंक की गिरावट के साथ 76,570.35 पर बंद हुआ. निफ्टी भी 141.35 अंक टूटकर 23,914.45 पर बंद हुआ.

बिकवाली का सबसे ज्यादा असर ऑटो, मीडिया और IT सेक्टर पर पड़ा, जहां करीब 1.2% से 1.8% तक की गिरावट रही. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 20 लाल निशान में बंद हुए. एशियन पेंट्स, HDFC, महिंद्रा एंड महिंद्रा, HCL Tech, BEL, Infosys और SBI में गिरावट रही. हालांकि, अडानी पोर्ट्स, पावरग्रिड, NTPC, बजाज फिनसर्व और टाइटन जैसे शेयरों में तेजी ने बाजार की गिरावट को कुछ सीमित किया.

आज बाजार को कहां से मिल रही राहत?

गुरुवार को वैश्विक संकेत बुधवार की तुलना में बेहतर हैं. ब्रेंट क्रूड करीब आधा फीसदी कमजोर होकर 95.10 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया है. कच्चे तेल में नरमी भारत के लिए राहत की खबर है, क्योंकि महंगा क्रूड देश की महंगाई, चालू खाते और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ाता है.

एशियाई बाजारों में भी मजबूती देखने को मिल रही है. कोरियाई कॉस्पी करीब 1.5% ऊपर कारोबार कर रहा है, जबकि जापान का निक्केई भी बढ़त में है. शंघाई और हॉन्गकॉन्ग के बाजारों में भी सकारात्मक रुख है. इन संकेतों का असर भारतीय बाजार की शुरुआती चाल पर पड़ सकता है.

पश्चिम एशिया पर बाजार की नजर

बाजार की आगे की दिशा काफी हद तक अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े घटनाक्रम पर निर्भर करेगी. बुधवार को क्षेत्र में बढ़ते तनाव के चलते क्रूड की कीमतों में तेज उछाल आया था. अगर तनाव और बढ़ता है तो तेल की कीमतों में दोबारा तेजी आ सकती है, जिससे भारतीय बाजार पर दबाव लौट सकता है. इसके उलट, अगर पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और क्रूड 95 डॉलर के आसपास या इससे नीचे बना रहता है, तो बाजार में रिकवरी की गुंजाइश बढ़ सकती है.

आज ल्यूमिनो इंडस्ट्रीज की लिस्टिंग

गुरुवार को Lumino Industries के शेयर BSE और NSE पर लिस्ट होंगे. कंपनी के IPO को निवेशकों की जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली थी और इश्यू अंतिम दिन 118.12 गुना सब्सक्राइब हुआ था. कंपनी ने IPO के जरिए 700 करोड़ रुपये जुटाए हैं, जिसमें 500 करोड़ रुपये का फ्रेश इश्यू और 200 करोड़ रुपये का OFS शामिल है.

इन शेयरों पर भी रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज कई कंपनियों के कॉरपोरेट अपडेट्स के चलते भी शेयरों में हलचल रह सकती है. Meesho में SoftBank की करीब 1.5% हिस्सेदारी बेचने के लिए ब्लॉक डील प्रस्तावित है. Hexaware Technologies ने विवेक जेटली को नया डेजिगनेट CEO नियुक्त किया है. ICICI Bank ने ICICI Prudential Life Insurance में करीब 2% अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीदकर अपनी हिस्सेदारी लगभग 52.8% कर ली है.

HUDCO ने बिहार सरकार के साथ 25,000 करोड़ रुपये तक की वित्तीय मदद से जुड़ा MoU किया है. Power Grid को राजस्थान REZ Phase-IV के लिए 3,244.33 करोड़ रुपये के सालाना ट्रांसमिशन शुल्क वाले प्रोजेक्ट का LoI मिला है. वहीं, Page Industries को दुबई कोर्ट से 11.35 करोड़ AED के दावे से जुड़ा नोटिस मिला है.

इसके अलावा Pine Labs, Altius Telecom Infrastructure Trust, Aster DM Quality Care, Wonder Electricals और Shreeji Shipping Global में हुए बड़े ब्लॉक और बल्क डील भी आज संबंधित शेयरों में हलचल बढ़ा सकते हैं. मेनबोर्ड सेगमेंट में Lumino Industries और SME सेगमेंट में Quick Forensic Solutions की लिस्टिंग होगी, जबकि एक दर्जन से अधिक शेयर एक्स-डिविडेंड ट्रेड करेंगे.

कुल मिलाकर, बुधवार की गिरावट के बाद गुरुवार को बाजार के लिए शुरुआती संकेत सकारात्मक हैं. क्रूड में नरमी और ग्लोबल मार्केट्स की मजबूती बाजार को सहारा दे सकती है, लेकिन पश्चिम एशिया का तनाव और तेल की कीमतें तेजी की राह में सबसे बड़ी चुनौती बनी रहेंगी.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


 


₹22,006 करोड़ के कर्ज के बीच सुभाष चंद्रा की NCLT प्रक्रिया पर आपत्ति, NCLAT में उठाए 5-सदस्यीय बेंच पर सवाल

जी ग्रुप (Zee Group) के संस्थापक की ओर से कहा गया- ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को लेकर पिछले 15 दिनों से ‘मीडिया ट्रायल’, जबकि अभी तक कोई अंतिम आदेश नहीं

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 02 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 02 September, 2026
BWHindia

जी समूह (ZEE Group) के संस्थापक सुभाष चंद्रा ने अपने खिलाफ चल रही दिवाला कार्यवाही में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं. बुधवार को
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में हुई सुनवाई के दौरान चंद्रा की ओर से पेश वकील सस्मित पात्रा ने खास तौर पर एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ के गठन और उसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए.

चंद्रा के वकील ने कहा कि करीब ₹22,006 करोड़ के स्वीकृत लेनदार दावों के मुकाबले प्रस्तावित ₹6.5 करोड़ के भुगतान प्रस्ताव को लेकर पिछले 15 दिनों से उनके मुवक्किल को देशभर में बदनाम किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि मामले की अत्यधिक सार्वजनिक चर्चा ने कानूनी विवाद को ‘मीडिया ट्रायल’ में बदल दिया है और इससे चंद्र की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है.

‘अभी तक कोई अंतिम आदेश नहीं’

एनसीएलएटी में सस्मित पात्रा ने कहा कि इस मामले में फिलहाल कोई अंतिम आदेश मौजूद नहीं है, लेकिन पिछले कई दिनों से सुभाष चंद्रा की सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. यह मामला यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (यूके), केनरा बैंक और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की ओर से दायर अपीलों से जुड़ा है. इन ऋणदाताओं ने 25 अगस्त को एनसीएलटी की ओर से भुगतान योजना को लेकर दिए गए मत और उससे जुड़ी प्रक्रिया को चुनौती दी है.

केंद्र सरकार के वरिष्ठ विधि अधिकारी तुषार मेहता ने ‘मीडिया ट्रायल’ वाली दलील पर आपत्ति जताते हुए कहा कि एनसीएलएटी की कार्यवाही का इस्तेमाल मीडिया में प्रकाशित होने वाले बयानों के लिए नहीं किया जा सकता. एनसीएलएटी ने इस टिप्पणी पर कोई आदेश पारित नहीं किया और कहा कि चंद्रा अपनी शिकायत एनसीएलटी के सामने उठा सकते हैं, जहां मूल दिवाला कार्यवाही लंबित है.

पांच सदस्यीय एनसीएलटी पीठ के गठन पर सवाल

सुनवाई के दौरान सबसे अहम मुद्दों में से एक एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ के गठन और उसके अधिकारों का रहा. इस पीठ ने भुगतान योजना पर नए सिरे से सुनवाई शुरू की है.

पात्रा ने कंपनी अधिनियम की धारा 419(5) का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रावधान के तहत सदस्यों के बीच मतभेद होने की स्थिति में सीमित तरीके से मामले को दूसरे सदस्य या सदस्यों के सामने रखा जा सकता है. उनके मुताबिक, यह प्रावधान एनसीएलटी को पांच सदस्यीय पीठ गठित करने का अधिकार नहीं देता. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पांच सदस्यीय पीठ ने एनसीएलटी के न्यायिक सदस्य निलेश शर्मा की 25 अगस्त की राय पर रोक किस अधिकार के तहत लगाई. हालांकि, एनसीएलएटी ने कहा कि ऋणदाताओं की ओर से दायर मौजूदा अपीलों में पांच सदस्यीय पीठ के गठन की वैधता को सीधे चुनौती नहीं दी गई है. न्यायाधिकरण ने कहा कि अगर चंद्रा इस पीठ के गठन या उसके कामकाज से असंतुष्ट हैं, तो वह 1 सितंबर के आदेश को अलग से चुनौती दे सकते हैं.

‘एनसीएलटी सदस्यों की राय पूरी तरह अलग नहीं’

चंद्रा के वकील ने ऋणदाताओं की उस दलील को भी चुनौती दी कि भुगतान प्रस्ताव पर विचार करने वाले तीन एनसीएलटी सदस्यों की राय पूरी तरह अलग थी. पात्रा के मुताबिक, न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और निलेश शर्मा इस बुनियादी सवाल पर काफी हद तक सहमत थे कि चंद्र दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा 79 के तहत भुगतान योजना के लिए पात्र हैं.

दोनों के बीच मुख्य मतभेद इस बात को लेकर था कि भुगतान योजना उन लेनदारों पर कैसे लागू होगी, जिन्होंने इसका समर्थन नहीं किया है. भारद्वाज का मत था कि योजना को उन लेनदारों पर लागू किया जाए, जिन्होंने इसका समर्थन किया है, जबकि असहमति जताने वाले ऋणदाताओं को दूसरे वसूली उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी जाए. वहीं, शर्मा का मानना था कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा 115 के तहत भुगतान योजना सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी, जिसमें असहमति जताने वाले ऋणदाता भी शामिल हैं.

चंद्रा के वकील ने कहा कि धारा 79 के तहत पात्रता के सवाल पर दोनों सदस्य मूल रूप से एक ही राय रखते थे. इसलिए पूरे मामले को दोबारा शुरू से सुनने की जरूरत नहीं है.

ऋणदाताओं ने अपील वापस लेने का फैसला बदला

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने शुरुआत में ऋणदाताओं की अपील वापस लेने और भविष्य में जरूरत पड़ने पर उसे फिर से उठाने की अनुमति मांगी. उनका तर्क था कि पांच सदस्यीय एनसीएलटी पीठ पहले ही शर्मा की राय पर रोक लगा चुकी है और मामले की नए सिरे से सुनवाई कर रही है. ऐसे में फिलहाल एनसीएलएटी में अपील पर सुनवाई जरूरी नहीं हो सकती.

हालांकि, चंद्रा के वकील ने इसका विरोध किया. उन्होंने कहा कि शर्मा की राय कभी एनसीएलटी के अंतिम आदेश में तब्दील ही नहीं हुई. इसलिए ऋणदाताओं की अपील की मौजूदा स्थिति पर भी सवाल उठता है.

बाद में मेहता ने अपील वापस लेने की अर्जी पर जोर नहीं दिया और मामले को लंबित रखने का अनुरोध किया. एनसीएलएटी ने इसे स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई 7 अक्टूबर के लिए तय कर दी.

₹6.5 करोड़ बनाम ₹22,006 करोड़ का विवाद

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ₹6.5 करोड़ के भुगतान प्रस्ताव को करीब ₹22,006 करोड़ के स्वीकृत लेनदार दावों के संदर्भ में कैसे देखा जाए. चंद्रा की कानूनी टीम का कहना है कि मामले को सिर्फ ‘₹22,000 करोड़ के दावे के मुकाबले ₹6.5 करोड़ का भुगतान’ के तौर पर पेश करना सही नहीं है. उसके मुताबिक, भुगतान योजना को मंजूरी देने वाला अभी कोई अंतिम और लागू करने योग्य एनसीएलटी आदेश मौजूद नहीं है और अलग-अलग एनसीएलटी सदस्यों की राय की कानूनी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हुई है. दूसरी ओर, ऋणदाताओं का जोर भुगतान प्रस्ताव से जुड़ी एनसीएलटी की प्रक्रिया, उसके प्रभाव और असहमति जताने वाले लेनदारों के अधिकारों पर है.

एनसीएलएटी की ओर से ऋणदाताओं की अपीलों को लंबित रखने का मतलब है कि यह कानूनी चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है. अब एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ भुगतान योजना पर आगे सुनवाई करेगी. मामले में अगली अहम सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी.


मोदी की अपील- गैर-जरूरी सोना खरीदने और विदेश यात्रा से बचें, ‘स्वदेशी’ पर दिया जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा- वैश्विक संकट और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के बावजूद भारत ने 7.8% GDP ग्रोथ हासिल की, अब आत्मनिर्भरता की रफ्तार बनाए रखना जरूरी

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 02 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 02 September, 2026
BWHindia

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से गैर-जरूरी खर्च और विदेशी मुद्रा के इस्तेमाल को कम करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि जब तक बेहद जरूरी न हो, विदेश यात्रा से बचें, विदेश में शादियां आयोजित न करें और सोना न खरीदें. किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक से जारी वीडियो संदेश में मोदी ने एक बार फिर ‘स्वदेशी’ और आत्मनिर्भर भारत पर जोर दिया.

प्रधानमंत्री ने यह अपील ऐसे समय की है जब भारत वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और आर्थिक अनिश्चितता के बीच तेज आर्थिक वृद्धि दर्ज कर रहा है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की GDP वृद्धि दर 7.8% रही.

‘आत्मनिर्भर भारत बनाना जरूरी’

मोदी ने कहा कि भारत को आर्थिक वृद्धि की मौजूदा रफ्तार को बनाए रखना होगा और इसके लिए आत्मनिर्भरता जरूरी है. उन्होंने कहा कि स्वदेशी को अपनाने से देश के युवाओं को 2047 तक विकसित भारत बनाने में मदद मिलेगी.

प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया में युद्ध और संकट की स्थिति बनी हुई है, आपूर्ति श्रृंखला बाधित है और कोविड-19 के बाद से वैश्विक स्तर पर स्थिरता का अभाव रहा है. इसके बावजूद भारत तेज गति से आगे बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि पहली तिमाही में 7.8% की आर्थिक वृद्धि दर देश में बढ़ते आर्थिक आत्मविश्वास को दर्शाती है. प्रधानमंत्री ने इस उपलब्धि का श्रेय देश की जनता के सामूहिक प्रयासों को दिया.

मई में भी की थी ऐसी अपील

प्रधानमंत्री इससे पहले 10 मई को हैदराबाद में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान भी लोगों से गैर-जरूरी विदेश यात्रा से बचने, विदेश में शादियां आयोजित न करने और सोना नहीं खरीदने की अपील कर चुके हैं. उस समय पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते भारत के सामने ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां थीं और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव बढ़ रहा था.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी अमेरिका में एक कार्यक्रम से इतर कहा कि विदेशी मुद्रा के गैर-जरूरी इस्तेमाल को कम करने की अपील ऐसे समय में की गई है जब भारत कच्चे तेल और उर्वरक का बड़ा आयातक है और उसे बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

‘निराशावाद’ फैलाने वालों पर निशाना

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में सरकार की आर्थिक नीतियों का बचाव करते हुए आलोचकों पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि देश ने उन लोगों के दावों को गलत साबित किया है जो निराशा का माहौल बनाने में लगे हैं. मोदी ने कहा कि सरकार की नीतियां अच्छी हैं और उसकी नीयत स्पष्ट है, जिसकी वजह से भारत प्रगति की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है.

कांग्रेस ने GDP आंकड़ों पर उठाए सवाल

वहीं, कांग्रेस ने सरकार के GDP आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने GDP के आंकड़ों को ‘आंकड़ों की कलाबाजी’ बताया. उन्होंने दावा किया कि GDP की गणना की पद्धति में बार-बार बदलाव किया गया है.

रमेश ने नॉमिनल और वास्तविक GDP के बीच के अंतर को लेकर भी सवाल उठाया. उनके मुताबिक, जून तिमाही में थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति 9% से अधिक रही, जबकि सरकार के आंकड़ों में नॉमिनल और वास्तविक GDP के बीच का अंतर केवल 2.3% है.

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इस वर्ष GDP की गणना की पद्धति में दो बार बदलाव किया है और जून में GDP के अनुमान के समय थोक मूल्य सूचकांक का इस्तेमाल करना बंद कर दिया.


डेटा सेंटर में ₹250 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश, फिर भी 2030 तक GDP में योगदान सिर्फ 0.13%

मूडीज के मुताबिक भारत के डेटा सेंटर सेक्टर में भारी निवेश के बावजूद आर्थिक वृद्धि और रोजगार पर सीमित असर पड़ेगा. 2030 तक डेटा सेंटर से GDP में करीब 0.13% और रोजगार में महज 0.02% की बढ़ोतरी का अनुमान है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 02 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 02 September, 2026
BWHindia

भारत में डेटा सेंटर सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है और इसमें 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की घोषणाएं हो चुकी हैं. हालांकि, इतनी बड़ी निवेश प्रतिबद्धताओं के बावजूद 2030 तक इस सेक्टर का देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव सीमित रहने का अनुमान है. रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody’s) के मुताबिक, 2030 तक डेटा सेंटर सेक्टर भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सिर्फ 0.13% का योगदान दे सकता है.

Moody’s का अनुमान है कि अगले चार वर्षों में डेटा सेंटर उद्योग से रोजगार में केवल 0.02% की बढ़ोतरी होगी. एजेंसी के मुताबिक, यह योगदान मलेशिया, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे देशों के अनुमानित योगदान से भी कम है.

सरकार के अनुमान के मुताबिक, भारत 2030 तक 7.3 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. इस आधार पर GDP में 0.13% योगदान करीब 9.5 अरब डॉलर के बराबर होगा.

डेटा सेंटर में तेजी से बढ़ रहा निवेश

डेटा सेंटर भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हो गए हैं. घरेलू कारोबारी समूहों, वैश्विक टेक्नोलॉजी कंपनियों और स्वतंत्र ऑपरेटरों की ओर से इस सेक्टर में बड़े निवेश की घोषणाएं की गई हैं. पिछले 12 महीनों में डेटा सेंटर क्षेत्र में 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश का ऐलान हुआ है. गूगल और अडानी ने विशाखापत्तनम में 1 गीगावाट (GW) क्षमता वाले डेटा सेंटर प्रोजेक्ट के लिए 15 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. वहीं, Tata Consultancy Services (TCS) ने अक्टूबर 2025 में 1 GW क्षमता वाले HyperVault प्रोजेक्ट के लिए 7 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी. रिसर्च फर्म Wood Mackenzie ने 27 जुलाई को अनुमान लगाया था कि भारत की नेट एक्टिव डेटा सेंटर क्षमता 2030 तक 12 GW तक पहुंच सकती है.

सरकार भी दे रही है बढ़ावा

भारत को ग्लोबल डेटा सेंटर हब बनाने के लिए सरकार की ओर से भी कई कदम उठाए गए हैं. 1 फरवरी को पेश किए गए केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय डेटा सेंटर का इस्तेमाल करने वाले विदेशी क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए 2047 तक पूरी टैक्स छूट देने का ऐलान किया था. यह सुविधा भारत के डेटा सेंटर में डेटा होस्ट करने या वर्कलोड चलाने वाली कंपनियों के लिए है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच डेटा सेंटर की अहमियत और बढ़ गई है. AI के लिए बड़ी मात्रा में कंप्यूटिंग पावर और स्टोरेज क्षमता की जरूरत होती है. इसी वजह से Tata Sons, Reliance Industries, Adani Enterprises, Larsen & Toubro और Bharti Enterprises जैसे बड़े कारोबारी समूह भी इस सेक्टर में उतर चुके हैं.

बड़े निवेश के बावजूद GDP पर सीमित असर क्यों?

Moody’s के मुताबिक, डेटा सेंटर में होने वाला निवेश और निर्माण से पैदा होने वाला रोजगार रकम के लिहाज से काफी बड़ा है, लेकिन देश की पूरी अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में इसका प्रभाव छोटा है. Moody’s के विश्लेषकों Deborah Tan और अन्य ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि डेटा सेंटर में प्रस्तावित निवेश रणनीतिक और स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण है, लेकिन फिलहाल यह इतना बड़ा नहीं है कि देश की कुल आर्थिक वृद्धि की तस्वीर में बड़ा बदलाव ला सके.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत की कुल नेट राष्ट्रीय बिजली खपत में डेटा सेंटर की हिस्सेदारी 5% से कम रहने का अनुमान है. इसका मतलब है कि राष्ट्रीय स्तर पर संसाधनों की खपत पर भी इसका असर सीमित रहने की संभावना है.

पूंजी-आधारित उद्योग होने से रोजगार कम

डेटा सेंटर उद्योग के GDP और रोजगार पर सीमित प्रभाव की एक बड़ी वजह इसका पूंजी-आधारित बिजनेस मॉडल है. डेटा सेंटर बनाने और चलाने के लिए जमीन, बिजली, कूलिंग सिस्टम और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च करना पड़ता है. इसके बावजूद इन सुविधाओं में निवेश के आकार की तुलना में कर्मचारियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है. यही वजह है कि डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स में अरबों डॉलर का निवेश होने के बावजूद GDP और रोजगार में उसी अनुपात में बढ़ोतरी जरूरी नहीं है.

कुल मिलाकर, भारत में डेटा सेंटर सेक्टर AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल इकोनॉमी की बढ़ती जरूरतों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन रहा है. हालांकि, Moody’s के आकलन के अनुसार, आने वाले वर्षों में इस सेक्टर का राष्ट्रीय GDP और रोजगार पर प्रत्यक्ष प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित ही रहने की संभावना है.