मूडीज के मुताबिक भारत के डेटा सेंटर सेक्टर में भारी निवेश के बावजूद आर्थिक वृद्धि और रोजगार पर सीमित असर पड़ेगा. 2030 तक डेटा सेंटर से GDP में करीब 0.13% और रोजगार में महज 0.02% की बढ़ोतरी का अनुमान है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत में डेटा सेंटर सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है और इसमें 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की घोषणाएं हो चुकी हैं. हालांकि, इतनी बड़ी निवेश प्रतिबद्धताओं के बावजूद 2030 तक इस सेक्टर का देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव सीमित रहने का अनुमान है. रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody’s) के मुताबिक, 2030 तक डेटा सेंटर सेक्टर भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सिर्फ 0.13% का योगदान दे सकता है.
Moody’s का अनुमान है कि अगले चार वर्षों में डेटा सेंटर उद्योग से रोजगार में केवल 0.02% की बढ़ोतरी होगी. एजेंसी के मुताबिक, यह योगदान मलेशिया, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे देशों के अनुमानित योगदान से भी कम है.
सरकार के अनुमान के मुताबिक, भारत 2030 तक 7.3 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. इस आधार पर GDP में 0.13% योगदान करीब 9.5 अरब डॉलर के बराबर होगा.
डेटा सेंटर में तेजी से बढ़ रहा निवेश
डेटा सेंटर भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हो गए हैं. घरेलू कारोबारी समूहों, वैश्विक टेक्नोलॉजी कंपनियों और स्वतंत्र ऑपरेटरों की ओर से इस सेक्टर में बड़े निवेश की घोषणाएं की गई हैं. पिछले 12 महीनों में डेटा सेंटर क्षेत्र में 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश का ऐलान हुआ है. गूगल और अडानी ने विशाखापत्तनम में 1 गीगावाट (GW) क्षमता वाले डेटा सेंटर प्रोजेक्ट के लिए 15 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. वहीं, Tata Consultancy Services (TCS) ने अक्टूबर 2025 में 1 GW क्षमता वाले HyperVault प्रोजेक्ट के लिए 7 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी. रिसर्च फर्म Wood Mackenzie ने 27 जुलाई को अनुमान लगाया था कि भारत की नेट एक्टिव डेटा सेंटर क्षमता 2030 तक 12 GW तक पहुंच सकती है.
सरकार भी दे रही है बढ़ावा
भारत को ग्लोबल डेटा सेंटर हब बनाने के लिए सरकार की ओर से भी कई कदम उठाए गए हैं. 1 फरवरी को पेश किए गए केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय डेटा सेंटर का इस्तेमाल करने वाले विदेशी क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए 2047 तक पूरी टैक्स छूट देने का ऐलान किया था. यह सुविधा भारत के डेटा सेंटर में डेटा होस्ट करने या वर्कलोड चलाने वाली कंपनियों के लिए है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच डेटा सेंटर की अहमियत और बढ़ गई है. AI के लिए बड़ी मात्रा में कंप्यूटिंग पावर और स्टोरेज क्षमता की जरूरत होती है. इसी वजह से Tata Sons, Reliance Industries, Adani Enterprises, Larsen & Toubro और Bharti Enterprises जैसे बड़े कारोबारी समूह भी इस सेक्टर में उतर चुके हैं.
बड़े निवेश के बावजूद GDP पर सीमित असर क्यों?
Moody’s के मुताबिक, डेटा सेंटर में होने वाला निवेश और निर्माण से पैदा होने वाला रोजगार रकम के लिहाज से काफी बड़ा है, लेकिन देश की पूरी अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में इसका प्रभाव छोटा है. Moody’s के विश्लेषकों Deborah Tan और अन्य ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि डेटा सेंटर में प्रस्तावित निवेश रणनीतिक और स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण है, लेकिन फिलहाल यह इतना बड़ा नहीं है कि देश की कुल आर्थिक वृद्धि की तस्वीर में बड़ा बदलाव ला सके.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत की कुल नेट राष्ट्रीय बिजली खपत में डेटा सेंटर की हिस्सेदारी 5% से कम रहने का अनुमान है. इसका मतलब है कि राष्ट्रीय स्तर पर संसाधनों की खपत पर भी इसका असर सीमित रहने की संभावना है.
पूंजी-आधारित उद्योग होने से रोजगार कम
डेटा सेंटर उद्योग के GDP और रोजगार पर सीमित प्रभाव की एक बड़ी वजह इसका पूंजी-आधारित बिजनेस मॉडल है. डेटा सेंटर बनाने और चलाने के लिए जमीन, बिजली, कूलिंग सिस्टम और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च करना पड़ता है. इसके बावजूद इन सुविधाओं में निवेश के आकार की तुलना में कर्मचारियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है. यही वजह है कि डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स में अरबों डॉलर का निवेश होने के बावजूद GDP और रोजगार में उसी अनुपात में बढ़ोतरी जरूरी नहीं है.
कुल मिलाकर, भारत में डेटा सेंटर सेक्टर AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल इकोनॉमी की बढ़ती जरूरतों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन रहा है. हालांकि, Moody’s के आकलन के अनुसार, आने वाले वर्षों में इस सेक्टर का राष्ट्रीय GDP और रोजगार पर प्रत्यक्ष प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित ही रहने की संभावना है.
2020 में एनपीए बने खाते से जुड़ी लंबे समय से चल रही वसूली प्रक्रिया खत्म, दिवालिया प्रक्रिया और संपत्ति बिक्री की कार्रवाई के बीच बैंक को मिली पूरी रकम
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कैनरा बैंक ने सोने और आभूषण निर्यातक कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स से करीब ₹510 करोड़ की बकाया राशि वसूल कर ली है. ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) के आदेश के बाद कंपनी ने बैंक का पूरा बकाया चुका दिया. इसके साथ ही कंपनी के खिलाफ बैंक की लंबे समय से चल रही वसूली प्रक्रिया भी समाप्त हो गई है.
राजेश एक्सपोर्ट्स का बैंक खाता 2020 में गैर-निष्पादित परिसंपत्ति यानी एनपीए बन गया था. इसके बाद कैनरा बैंक ने बकाया वसूली के लिए कई कानूनी रास्ते अपनाए. बैंक ने 2021 में ऋण वसूली न्यायाधिकरण का रुख किया था. इसके अलावा राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) में दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने की याचिका दायर की गई थी. बैंक ने वित्तीय परिसंपत्तियों के प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण तथा प्रतिभूति हित प्रवर्तन कानून यानी सरफेसी अधिनियम के तहत भी कार्रवाई की थी.
डीआरटी ने कैनरा बैंक के पक्ष में दिया फैसला
ऋण वसूली न्यायाधिकरण ने अंततः कैनरा बैंक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राजेश एक्सपोर्ट्स को बकाया राशि जमा करने का निर्देश दिया था. आदेश में कहा गया था कि यदि कंपनी बकाया नहीं चुकाती है तो बैंक अपनी गिरवी रखी संपत्तियों को बेच सकता है.
इस आदेश को लागू कराने के लिए कैनरा बैंक ने कर्नाटक उच्च न्यायालय का रुख किया. उच्च न्यायालय ने डीआरटी के आदेश को लागू करने की अनुमति दे दी. इसके बाद राजेश एक्सपोर्ट्स की ओर से बैंक को बकाया राशि का भुगतान कर दिया गया.
राजेश एक्सपोर्ट्स का सबसे बड़ा कर्जदाता था कैनरा बैंक
कैनरा बैंक, राजेश एक्सपोर्ट्स का सबसे बड़ा कर्जदाता था. बैंक का बकाया करीब ₹509-510 करोड़ था. दिवालिया प्रक्रिया के जरिए खाते के समाधान की कोशिशों में अड़चन आने के बाद बैंक ने वसूली के लिए कई कानूनी विकल्पों का सहारा लिया.
इस साल की शुरुआत में कैनरा बैंक ने राजेश एक्सपोर्ट्स पर अपने ₹509.37 करोड़ के कर्ज को संकटग्रस्त कर्ज में निवेश करने वाले निवेशकों को बेचने की पेशकश भी की थी. बैंक की दिवालिया याचिका पर आगे की कार्रवाई का इंतजार किया जा रहा था. ऐसे में ₹510 करोड़ की ताजा वसूली बैंक की उस योजना से अलग है, जिसमें संकटग्रस्त कर्ज को बेचने का विकल्प अपनाया गया था.
सोने के आयात के लिए जारी साख पत्रों से जुड़ा था मामला
डीआरटी में चल रहा मामला राजेश एक्सपोर्ट्स के सोने के आयात के लिए कैनरा बैंक की ओर से जारी किए गए साख पत्रों से जुड़ा था. साख पत्रों की अवधि पूरी होने पर बैंक को संबंधित भुगतान करना पड़ा था, जबकि इसके बाद कंपनी को बैंक की राशि वापस करनी थी. 2020 में कंपनी की भुगतान क्षमता पर दबाव बढ़ने के बाद इन देनदारियों का संकट बढ़ गया और बैंक खाता एनपीए हो गया.
सेबी की कार्रवाई के बीच हुई ₹510 करोड़ की वसूली
राजेश एक्सपोर्ट्स से यह वसूली ऐसे समय हुई है जब कंपनी नियामकीय जांच का भी सामना कर रही है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी ने जून 2026 के अपने अंतरिम आदेश में कंपनी में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगाया था.
सेबी की जांच में प्रथम दृष्टया यह सामने आया था कि कंपनी की ओर से रिपोर्ट किए गए राजस्व का 97-99 फीसदी तक हिस्सा कथित तौर पर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया हो सकता है. इसके अलावा सेबी ने राजेश मेहता को कंपनी की प्रतिभूतियों में लेनदेन करने से भी रोक दिया था. कैनरा बैंक की ताजा वसूली के साथ 2020 में एनपीए बने खाते से जुड़ा करीब ₹510 करोड़ का पूरा बकाया बैंक को वापस मिल गया है.
पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने 25 अगस्त के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्र को पर्सनल गारंटी से जुड़े दावों के निपटारे के लिए रिपेमेंट प्लान की मंजूरी दी गई थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्र को बड़ी राहत देने वाले अपने पिछले आदेश पर रोक लगा दी है. ट्रिब्यूनल ने 25 अगस्त के उस आदेश को फिलहाल लागू करने से रोक दिया है, जिसमें करीब ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए कर्जदाताओं के दावों के मुकाबले लगभग ₹6.25 करोड़ के भुगतान के जरिए मामले के निपटारे की योजना को मंजूरी दी गई थी.
NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ की अध्यक्षता ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल ने की. पीठ ने कहा कि रिपेमेंट प्लान को लेकर स्पष्ट बहुमत की राय सामने नहीं आई है. ऐसे में 25 अगस्त के आदेश को लागू नहीं किया जा सकता.
सुभाष चंद्र की संपत्तियों के हस्तांतरण पर रोक
ट्रिब्यूनल ने सुभाष चंद्र को पर्सनल गारंटर के तौर पर अपनी किसी भी संपत्ति को सीधे या परोक्ष रूप से बेचने, ट्रांसफर करने, अलग करने, उस पर किसी तरह का भार डालने या अन्य तरीके से उसका निपटारा करने से रोक दिया है. NCLT ने सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं. मामले की अगली सुनवाई 23 सितंबर को होगी.
यह आदेश चंद्र की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया को लेकर NCLT में लंबे समय से चले आ रहे मतभेद के बीच आया है.
दो सदस्यीय पीठ में बंट गया था फैसला
मामले की मूल दो सदस्यीय पीठ ने सितंबर 2025 में अलग-अलग फैसले दिए थे. न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज ने रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी थी, जबकि तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी ने इसे खारिज कर दिया था. रीना सिन्हा पुरी ने दावों को स्वीकार करने और उन पर मतदान की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का हवाला देते हुए योजना का विरोध किया था.
इसके बाद मामला तीसरे सदस्य निलेश शर्मा के पास भेजा गया. उन्होंने 25 अगस्त को विवादित दावों से जुड़े कुछ बदलावों के साथ रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दे दी थी. हालांकि, अलग-अलग राय के चलते मामले में स्पष्ट बहुमत नहीं बन सका. इसके बाद NCLT ने विवाद को सुलझाने के लिए पांच सदस्यीय विशेष पीठ का गठन किया.
कर्जदाताओं ने रिकवरी पर उठाए सवाल
प्रस्तावित योजना के तहत ₹22,006.57 करोड़ के दावों के मुकाबले कर्जदाताओं को करीब ₹6.25-6.5 करोड़ की रिकवरी होने का अनुमान है. दस कर्जदाताओं ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था, जबकि HDFC Bank, LIC Housing Finance और Canara Bank समेत कई अन्य कर्जदाताओं ने इसका विरोध किया.
विरोध करने वाले कर्जदाताओं ने इतनी कम रिकवरी पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि सुभाष चंद्र की वित्तीय स्थिति और संपत्तियों की गहन जांच की जरूरत है. उन्होंने फॉरेंसिक जांच और संपत्तियों का पता लगाने की प्रक्रिया की संभावना पर भी जोर दिया है. कर्जदाताओं के मुताबिक, चंद्र से जुड़ी कुछ संस्थाओं के पास रिपेमेंट प्लान के समर्थन में पड़े वोटों का बड़ा हिस्सा था. इससे मतदान प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं.
₹22,006 करोड़ के दावे पर सुभाष चंद्र की आपत्ति
सुभाष चंद्र ने ₹22,006 करोड़ के दावे की प्रस्तुति पर आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा एस्सेल ग्रुप की उन कंपनियों की देनदारियों से जुड़ा है, जिनके लिए उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी दी थी. यह राशि उनके द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिए गए कर्ज का प्रतिनिधित्व नहीं करती. उन्होंने अपनी व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर किए गए दावों का अनुमान करीब ₹3,990 करोड़ लगाया है.
पिछले NCLT आदेश में यह भी कहा गया था कि अगर चंद्र को दिवालिया प्रक्रिया में भेजा जाता है तो कर्जदाताओं को इससे भी कम रिकवरी हो सकती है. आदेश में यह भी उल्लेख था कि चंद्र की संपत्ति में अपेक्षाकृत कम संख्या में संपत्तियां हैं और उनका मूल्य भी बहुत अधिक नहीं है.
NCLAT में भी चल रहा है मामला
यह विवाद नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) तक भी पहुंच चुका है. रिपेमेंट प्लान का विरोध करने वाले कर्जदाताओं ने वहां भी इस योजना को चुनौती दी है. NCLT के ताजा आदेश के बाद पहले से मंजूर किया गया समझौता फिलहाल रुक गया है. अब पांच सदस्यीय विशेष पीठ NCLT की पिछली अलग-अलग राय और कर्जदाताओं की आपत्तियों पर विचार करेगी. मंगलवार के आदेश के बाद सुभाष चंद्र ने कहा कि उन्हें न्यायिक व्यवस्था पर 'पूरा भरोसा और विश्वास' है.
FMCG बाजार में तेजी से विस्तार कर रही रिलायंस कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने आइसक्रीम सेगमेंट में कदम रखा है. कंपनी ने Bombay Creamery ब्रांड लॉन्च किया है, जिसकी आइसक्रीम असली डेयरी सामग्री से तैयार करने का दावा किया गया है. इसकी शुरुआती कीमत सिर्फ 10 रुपये रखी गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रही रिलायंस अब आइसक्रीम बाजार में भी उतर गई है. रिलायंस इंडस्ट्रीज की कंज्यूमर प्रोडक्ट्स कंपनी रिलायंस कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड (RCPL) ने Bombay Creamery नाम से अपना आइसक्रीम ब्रांड लॉन्च किया है. कंपनी का लक्ष्य प्रीमियम क्वालिटी और किफायती कीमत के बीच संतुलन बनाकर आइसक्रीम को बड़े ग्राहक वर्ग तक पहुंचाना है.
₹10 से शुरू होंगे प्रोडक्ट्स
Bombay Creamery की आइसक्रीम रेंज में कोन, कप, टब, बार और स्टिक जैसे कई विकल्प शामिल होंगे. कंपनी ने इसकी शुरुआती कीमत 10 रुपये रखी है. RCPL का कहना है कि ब्रांड की आइसक्रीम में असली डेयरी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा. कंपनी के मुताबिक, उसका फोकस ऐसे प्रोडक्ट तैयार करने पर है, जिनमें क्वालिटी से समझौता न हो और कीमत आम ग्राहकों की पहुंच में रहे.
पहले पश्चिमी भारत में होगी उपलब्ध
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, Bombay Creamery को शुरुआत में पश्चिमी भारत के बाजारों में उतारा जाएगा. इसके बाद कंपनी चरणबद्ध तरीके से देश के दूसरे हिस्सों में इसका विस्तार करेगी. रिलायंस अपने मौजूदा डिस्ट्रीब्यूशन और रिटेल नेटवर्क का इस्तेमाल इस नए ब्रांड को तेजी से बाजार तक पहुंचाने के लिए करेगी. RCPL के डायरेक्टर टी. कृष्णकुमार के मुताबिक, कंपनी के लिए डेयरी क्वालिटी से समझौता किए बिना आइसक्रीम को ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ताओं तक पहुंचाना महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि Bombay Creamery के जरिए कंपनी सिर्फ बाजार में प्रवेश नहीं कर रही, बल्कि इस सेगमेंट में लंबे समय के लिए अपनी मौजूदगी बनाने की तैयारी कर रही है.
2023 से चल रही थी रिलायंस की एंट्री की चर्चा
रिलायंस की आइसक्रीम बाजार में एंट्री की चर्चा पिछले कुछ वर्षों से चल रही थी. 2023 में भी खबरें सामने आई थीं कि कंपनी इस सेगमेंट में उतरने की तैयारी कर रही है. अब Bombay Creamery के लॉन्च के साथ यह योजना जमीन पर उतर गई है.
रिलायंस पहले ही FMCG और पेय पदार्थों के बाजार में अपने पोर्टफोलियो का विस्तार कर चुकी है. Campa ब्रांड के जरिए कंपनी ने सॉफ्ट ड्रिंक बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है. अब आइसक्रीम सेगमेंट में Bombay Creamery के जरिए रिलायंस का मुकाबला इस बाजार के स्थापित ब्रांड्स से होगा. कंपनी का बड़ा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और 10 रुपये से शुरू होने वाली कीमत इसे मास मार्केट में तेजी से पहुंच बनाने में मदद कर सकती है.
NRI ग्राहकों को अब डॉलर जमा पर पहले के मुकाबले कम ब्याज मिलेगा. RBI की विशेष डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा खत्म होने के बाद बैंकों ने FCNR(B) डिपॉजिट पर मिलने वाला अतिरिक्त ब्याज वापस लेना शुरू कर दिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रवासी भारतीयों (NRI) के लिए भारत में डॉलर जमा कर आकर्षक ब्याज कमाने का दौर अब खत्म होता दिख रहा है. RBI की विशेष डॉलर-रुपया स्वैप विंडो बंद होने के बाद HDFC Bank, ICICI Bank और SBI समेत देश के प्रमुख बैंकों ने फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR-B) डिपॉजिट की ब्याज दरों में बड़ी कटौती की है. खास तौर पर 3 से 5 साल की लंबी अवधि वाली डॉलर जमा पर ब्याज दरों में 310 बेसिस पॉइंट तक की कमी की गई है. नई दरें 1 सितंबर से लागू हो गई हैं.
HDFC Bank और ICICI Bank ने इतनी की कटौती
HDFC Bank ने 5 साल की अमेरिकी डॉलर FCNR(B) जमा पर ब्याज दर को 6.25 फीसदी से घटाकर 3.15 फीसदी कर दिया है. यानी इसमें 310 बेसिस पॉइंट की कटौती हुई है. इसी तरह ICICI Bank ने 5 साल की डॉलर जमा पर ब्याज दर 6 फीसदी से घटाकर 2.90 फीसदी कर दी है. इस तरह यहां भी ब्याज दर में 310 बेसिस पॉइंट की कमी हुई है.
SBI में भी घटा NRI डिपॉजिट पर रिटर्न
देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक SBI ने भी FCNR(B) जमा पर ब्याज दरें कम कर दी हैं. बैंक की 5 साल की नियमित FCNR(B) दर अब 3.05 फीसदी है. इससे पहले 10 लाख डॉलर तक की जमा पर एडवांटेज स्कीम के तहत 5.75 फीसदी तक ब्याज मिल रहा था. वहीं, 10 लाख डॉलर से अधिक की जमा पर 6 फीसदी तक रिटर्न उपलब्ध था. अब इन दरों में क्रमशः 270 बेसिस पॉइंट और 295 बेसिस पॉइंट की कटौती की गई है.
क्यों घटा FCNR जमा पर ब्याज?
FCNR ब्याज दरों में इस तेज कटौती की मुख्य वजह RBI की विशेष डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा का खत्म होना है. RBI ने 8 जून को बैंकों के लिए यह सुविधा शुरू की थी, जिससे उन्हें विदेशी मुद्रा जुटाने में अपेक्षाकृत कम लागत आती थी. इसका फायदा उठाते हुए बैंकों ने NRI ग्राहकों को FCNR जमा पर सामान्य से काफी ज्यादा ब्याज देना शुरू किया था.
इस सुविधा के तहत बैंकों ने महज 10 हफ्तों में 65.4 अरब डॉलर का विदेशी फंड जुटा लिया. ओवरसीज उधारी समेत कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह करीब 73 अरब डॉलर तक पहुंच गया. तय लक्ष्य से ज्यादा फंड आने के बाद RBI ने इस सुविधा की अवधि 30 सितंबर से घटाकर 31 अगस्त कर दी. विंडो बंद होने के साथ ही बैंकों ने FCNR जमा पर दिया जा रहा अतिरिक्त प्रीमियम भी वापस लेना शुरू कर दिया.
छोटी अवधि की जमा पर ज्यादा असर नहीं
हालांकि, बैंकों ने लंबी अवधि की FCNR जमा पर ब्याज दरों में बड़ी कटौती की है, लेकिन छोटी अवधि की जमा पर दरें लगभग स्थिर बनी हुई हैं. इससे संकेत मिलता है कि RBI की विशेष सुविधा खत्म होने के बाद बैंक लंबी अवधि के डॉलर डिपॉजिट के लिए पहले जैसा ऊंचा प्रीमियम देने के इच्छुक नहीं हैं.
रेटिंग एजेंसी केयरएज के मुताबिक, विशेष स्वैप सुविधा से बैंकों को विदेशी मुद्रा फंडिंग का एक अतिरिक्त स्रोत मिला था, जिससे उनकी लिक्विडिटी स्थिति बेहतर हुई. अब सुविधा खत्म होने के बाद लंबी अवधि की विदेशी मुद्रा जमा पर मिलने वाला अतिरिक्त लाभ धीरे-धीरे सामान्य स्तर पर लौट सकता है.
मंगलवार को सेंसेक्स 12.99 अंक यानी 0.02 फीसदी गिरकर 76,944.28 पर और निफ्टी 24.60 अंक यानी 0.10 फीसदी टूटकर 24,055.80 पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार, 2 सितंबर को कारोबार की शुरुआत दबाव के साथ होने के संकेत मिल रहे हैं. ग्लोबल बाजारों में कमजोरी, अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. गिफ्ट निफ्टी भी सुबह करीब 24,042 के आसपास सपाट कारोबार करता नजर आया. ऐसे में आज घरेलू बाजार की दिशा ग्लोबल संकेतों और क्रूड की चाल के अलावा विदेशी निवेशकों की गतिविधियों से तय हो सकती है.
इससे पहले मंगलवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी में दिनभर उतार-चढ़ाव रहा. शुरुआती गिरावट के बाद दोनों प्रमुख सूचकांकों ने रिकवरी की कोशिश की, लेकिन कारोबार खत्म होने तक सेंसेक्स 12.99 अंक यानी 0.02 फीसदी गिरकर 76,944.28 पर और निफ्टी 24.60 अंक यानी 0.10 फीसदी टूटकर 24,055.80 पर बंद हुआ. ऑटो, बैंकिंग और फार्मा शेयरों में दबाव देखने को मिला.
मारुति समेत इन शेयरों में रही गिरावट
मंगलवार को सेंसेक्स के शेयरों में मारुति सुजुकी सबसे ज्यादा 4.16 फीसदी टूटा और 12,919 रुपये पर बंद हुआ. इसके अलावा SBI में 2.51 फीसदी, इंडिगो में 2.48 फीसदी, बजाज फिनसर्व में 2.40 फीसदी, महिंद्रा एंड महिंद्रा में 2.36 फीसदी, एक्सिस बैंक में 1.80 फीसदी और टाइटन में 1.58 फीसदी की गिरावट रही. दूसरी ओर ITC में 3.98 फीसदी, HCL Technologies में 3.21 फीसदी, Infosys में 2.44 फीसदी, भारती एयरटेल में 2.30 फीसदी, रिलायंस इंडस्ट्रीज में 1.74 फीसदी और कोटक महिंद्रा बैंक में 1.54 फीसदी की तेजी ने बाजार की गिरावट को सीमित किया.
आज बाजार के लिए ये होंगे बड़े ट्रिगर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, बुधवार के कारोबार में कच्चे तेल की कीमत सबसे अहम संकेतकों में से एक रहेगी. अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड करीब 96 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए क्रूड में लगातार तेजी से महंगाई, कंपनियों की लागत और देश के व्यापार संतुलन पर दबाव बढ़ सकता है. वहीं, मंगलवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 1,143 करोड़ रुपये की भारतीय इक्विटी खरीदी, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब 1,846 करोड़ रुपये की खरीदारी की.
निफ्टी के लिए 24,000 का स्तर अहम
तकनीकी मोर्चे पर निफ्टी के लिए 24,000 का स्तर महत्वपूर्ण माना जा रहा है. 23,950 के नीचे टिकाऊ गिरावट आने पर बाजार में और करेक्शन का दबाव बढ़ सकता है, जबकि ऊपर की तरफ 24,380 के आसपास अहम रेजिस्टेंस है. ऐसे में निवेशकों की नजर आज निफ्टी की इस रेंज पर भी रहेगी.
इन शेयरों पर रखें नजर
आज कई कंपनियों के शेयर खबरों के चलते फोकस में रहेंगे. हीरो मोटोकॉर्प की अगस्त में घरेलू बिक्री सालाना आधार पर 4.5 फीसदी बढ़कर 5.42 लाख वाहन रही, जबकि कुल बिक्री 2.6 फीसदी बढ़कर 5.68 लाख वाहन पहुंच गई. एनएमडीसी का अगस्त लौह अयस्क उत्पादन 20.8 फीसदी बढ़कर 40.7 लाख टन और बिक्री 5.6 फीसदी बढ़कर 35.8 लाख टन रही. कोल इंडिया की अगस्त में कोयला आपूर्ति 5.5 फीसदी बढ़कर 6.06 करोड़ टन रही. अदाणी ग्रीन एनर्जी की सहायक कंपनी ने गुजरात के खावड़ा में 139 मेगावाट की नई सौर परियोजना शुरू की है. ग्लैंड फार्मा के विशाखापत्तनम संयंत्र के अमेरिकी FDA निरीक्षण में कोई आपत्ति नहीं मिली है. रिलायंस कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने ‘बॉम्बे क्रीमरी’ ब्रांड के साथ आइसक्रीम कारोबार में एंट्री की है. विप्रो ने एबीबी के साथ डिजिटल वर्कप्लेस सर्विसेज समझौते को आगे बढ़ाया है. ईएमएस लिमिटेड राजस्थान में करीब 219 करोड़ रुपये की सीवरेज परियोजना के लिए सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी बनी है, जबकि सेंटम इलेक्ट्रॉनिक्स को करीब 30.5 करोड़ रुपये का निर्यात ऑर्डर मिला है. इसके अलावा एलएंडटी फाइनेंस को इरडा से कॉरपोरेट एजेंट के रूप में स्थायी पंजीकरण और उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक को कैरल फर्टाडो की अंतरिम एमडी एवं सीईओ नियुक्ति के लिए आरबीआई की मंजूरी मिली है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
BW Businessworld के नवीनतम अंक में रतन टाटा के बाद नेतृत्व बदलाव, एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल का आकलन और फिनटेक के इंफ्रास्ट्रक्चर बनने पर खास फोकस
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
BW Businessworld के नवीनतम अंक में भारतीय कारोबार की दो बड़ी संस्थागत बदलावों पर विस्तार से चर्चा की गई है. एक ओर अंक में टाटा समूह में रतन टाटा के बाद नेतृत्व परिवर्तन और अगले Tata Sons चेयरमैन के सामने मौजूद चुनौतियों का विश्लेषण किया गया है, वहीं दूसरी ओर फिनटेक के उपभोक्ता-केंद्रित सेक्टर से आगे बढ़कर आधुनिक वित्तीय व्यवस्था के बुनियादी ढांचे में बदलने पर व्यापक स्पेशल पैकेज पेश किया गया है.
इस अंक की कवर स्टोरी ‘Back To Tata’ है, जिसमें टाटा समूह के अगले चरण, टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका और प्रोफेशनल मैनेजमेंट के सामने आने वाले नए दायित्वों का विश्लेषण किया गया है. इसके साथ ही ‘Festival of Fintech 2026’ पर आधारित फिनटेक स्पेशल में AI, पेमेंट्स, लेंडिंग, वेल्थटेक, इंश्योरटेक और वित्तीय समावेशन जैसे क्षेत्रों में हो रहे बदलावों को जगह दी गई है.
अगले चेयरमैन से आगे टाटा समूह की दिशा पर नजर
‘Back To Tata’ कवर स्टोरी केवल अगले Tata Sons चेयरमैन के संभावित नामों तक सीमित नहीं है. इसमें इससे बड़ा सवाल उठाया गया है कि भारत के सबसे प्रभावशाली कारोबारी समूहों में से एक टाटा ग्रुप का अगला स्वरूप कैसा होगा और उसके अगले प्रोफेशनल लीडर के सामने क्या प्राथमिकताएं होंगी.
स्टोरी में कहा गया है कि टाटा समूह में परिवार के हाथों में प्रत्यक्ष प्रबंधन की वापसी की बात नहीं हो रही है. इसके बजाय Noel Tata के नेतृत्व में Tata Trusts एक बार फिर उस संस्थागत केंद्र के रूप में उभर रहे हैं, जो मालिकों के दीर्घकालिक उद्देश्य, जोखिम लेने की क्षमता और प्रोफेशनल मैनेजमेंट से अपेक्षाओं को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
कवर पैकेज में एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल का डेटा आधारित आकलन भी किया गया है. FY20 से FY26 के बीच Tata Group का रेवेन्यू 2.1 गुना बढ़ा, जबकि टैक्स के बाद मुनाफा 5.4 गुना बढ़ा. इसी अवधि में समूह की लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन 2.6 गुना बढ़ गया.
नए कारोबारों में बड़ा निवेश, लेकिन घाटा भी बढ़ा
BW Businessworld की रिपोर्ट के मुताबिक Tata Electronics, Air India, Tata Digital और Agratas ने FY26 में संयुक्त रूप से करीब 2.39 लाख करोड़ रुपये का रेवेन्यू दर्ज किया. हालांकि, इन चारों नए कारोबारों का संयुक्त घाटा 29,924 करोड़ रुपये रहा.
इसके विपरीत, Tata Sons ने इस नेतृत्व परिवर्तन के दौर में 31,961 करोड़ रुपये का टैक्स के बाद मुनाफा दर्ज किया. कंपनी के पास 21,841 करोड़ रुपये का नेट कैश था और उस पर कोई उधारी नहीं थी.
ऐसे में समूह के सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय क्षमता की नहीं, बल्कि पूंजी के सही आवंटन, कारोबारों के प्रभावी क्रियान्वयन और संस्थागत तालमेल की है.
BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि टाटा समूह भारत के सबसे बड़े कारोबारी संस्थानों में से एक होने के साथ-साथ एंटरप्राइज, प्रोफेशनल मैनेजमेंट, ओनरशिप स्टूवर्डशिप और सार्वजनिक उद्देश्य के बीच एक अलग तरह का संतुलन भी दर्शाता है.
उन्होंने कहा कि इस बदलाव को केवल अगले चेयरमैन की पहचान तक सीमित नहीं किया जा सकता. ‘Back To Tata’ के जरिए यह समझने की कोशिश की गई है कि Noel Tata की संस्थागत भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है, एन. चंद्रशेखरन अपने पीछे किस स्तर का समूह छोड़कर जा रहे हैं और अगले प्रोफेशनल लीडर के सामने क्या जिम्मेदारियां होंगी.
कवर स्टोरी के साथ डॉ. अनुराग बत्रा के कॉलम भी प्रकाशित किए गए हैं, जिनमें Noel Tata के ऑपरेटर, बिल्डर और टाटा की विचारधारा के संरक्षक के रूप में रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया है.
फिनटेक अब सिर्फ सेवा नहीं, वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर
अंक का दूसरा प्रमुख पैकेज ‘The Infrastructuralisation Of Finance’ है. इसमें बताया गया है कि डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर किस तरह वित्तीय सेवाओं को व्यक्तिगत लेनदेन के स्तर से आगे ले जाकर डिजिटल अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना में बदल रहा है.
यूपीआई (UPI), आधार (Aadhaar), अकाउंट एग्रीगेटर्स (Account Aggregators), ओएनडीसी (ONDC) और ओपन क्रेडिट एनेबलमेंट नेटवर्क (Open Credit Enablement Network) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म इस बदलाव के प्रमुख आधार बन रहे हैं. इनके साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता इस्तेमाल पेमेंट्स, क्रेडिट, इंश्योरेंस और निवेश जैसी सेवाओं को उन डिजिटल प्लेटफॉर्म और ग्राहक अनुभवों में शामिल कर रहा है, जिनका इस्तेमाल लोग और कंपनियां पहले से कर रही हैं.
इसका मतलब है कि वित्तीय सेवाएं धीरे-धीरे अधिक ‘इनविजिबल’ और रोजमर्रा की गतिविधियों में एकीकृत होती जा रही हैं. ट्रैवल बुकिंग, ई-कॉमर्स खरीदारी, सप्लाई चेन प्लेटफॉर्म, गिग वर्क और एंटरप्राइज सिस्टम इसका उदाहरण हैं.
MSME और नए कर्जदारों के लिए खुल रहे नए अवसर
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सहमति आधारित कैश-फ्लो डेटा पारंपरिक कोलेटरल और क्रेडिट हिस्ट्री का विकल्प या पूरक बन रहा है. इससे MSMEs, पहली बार कर्ज लेने वाले लोगों और अब तक वित्तीय सेवाओं से कम जुड़े उपभोक्ताओं के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं.
इस पैकेज में भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर टी. रबी शंकर, Multi Commodity Exchange of India की मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ प्रवीणा राय समेत पेमेंट्स, एम्बेडेड फाइनेंस, पब्लिक डिजिटल सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े कई विशेषज्ञों और उद्योग नेताओं के विचार शामिल हैं.
‘India’s Fintech Architects’ को सम्मान
फिनटेक स्पेशल में ‘India’s Fintech Architects’ भी शामिल है, जिसमें BW Businessworld के Festival of Fintech 2026 में सम्मानित संगठनों और नेताओं को जगह दी गई है. इन पुरस्कारों में लेंडिंग प्लेटफॉर्म, पेमेंट सॉल्यूशंस, वित्तीय समावेशन, कस्टमर एक्सपीरियंस, फिनटेक प्रोडक्ट्स, वेल्थटेक, इंश्योरटेक, फिनटेक में AI के इस्तेमाल, स्टार्टअप्स और नई तकनीकी पहलों के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन को मान्यता दी गई.
प्रतिभागियों का मूल्यांकन इनोवेशन, कारोबारी प्रभाव, स्केलेबिलिटी, ग्राहक मूल्य, गवर्नेंस, तकनीकी उत्कृष्टता, बाजार में अलग पहचान और व्यापक वित्तीय इकोसिस्टम में योगदान जैसे मानकों पर किया गया.
BW Businessworld की ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर Noor Fathima Warsia ने कहा कि टाटा और फिनटेक दोनों ही महत्वपूर्ण संस्थागत बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं. जहां टाटा अपने अगले चरण के लिए ओनरशिप, उद्देश्य और प्रोफेशनल मैनेजमेंट के बीच संतुलन तय कर रहा है, वहीं फिनटेक डिसरप्शन से आगे बढ़कर इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्थान निर्माण की दिशा में जा रहा है.
BW Businessworld का यह नया अंक डिजिटल और प्रिंट, दोनों फॉर्मेट में उपलब्ध है. इसमें टाटा समूह के नेतृत्व परिवर्तन से लेकर भारत के तेजी से बदलते फिनटेक इकोसिस्टम तक कारोबार जगत के अहम बदलावों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है.
BW Businessworld के बारे में
45 साल की विरासत वाला BW Businessworld भारत के तेजी से बढ़ते 360-डिग्री बिजनेस मीडिया हाउस में से एक है. इसका नेटवर्क 23 विशेष कारोबारी समुदायों और 10 मैगजीन तक फैला हुआ है. समूह विभिन्न घरेलू और वैश्विक क्षेत्रों में कॉन्फ्रेंस और फोरम आयोजित करता है, जहां अलग-अलग सेक्टर के कारोबारी नेताओं को संवाद और सहयोग का मंच मिलता है. इसके सभी अंक डिजिटल रूप से भी कवर किए जाते हैं और प्रत्येक अंक का ई-मैगजीन संस्करण उपलब्ध है.
डॉलर के मुकाबले 94.87 पर पहुंची भारतीय करेंसी, मजबूत घरेलू ग्रोथ, विदेशी निवेश और RBI के हस्तक्षेप से मिला सपोर्ट
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रुपये में मंगलवार को जोरदार रिकवरी देखने को मिली. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 0.3 फीसदी मजबूत होकर 94.87 के स्तर पर पहुंच गया, जो करीब एक महीने का उच्चतम स्तर है. घरेलू करेंसी 95 रुपये प्रति डॉलर पर खुली थी, लेकिन कारोबार के दौरान 94 के दायरे में आ गई. बाजार के जानकारों के मुताबिक, मजबूत घरेलू आर्थिक आंकड़ों, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के संभावित हस्तक्षेप और विदेशी निवेश से रुपये को मजबूती मिली है.
RBI के संभावित हस्तक्षेप से रुपये को मिला सहारा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करेंसी मार्केट के ट्रेडर्स का मानना है कि लोकल स्पॉट मार्केट खुलने से पहले RBI की ओर से डॉलर की संभावित बिक्री ने रुपये को सपोर्ट दिया. ऊंची तेल कीमतों और मजबूत डॉलर जैसे बाहरी दबावों के बावजूद घरेलू करेंसी ने मजबूती दिखाई है.
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स के ट्रेजरी हेड अनिल कुमार भंसाली के मुताबिक, मजबूत घरेलू ग्रोथ, फिस्कल स्लिपेज पर नियंत्रण, RBI का समर्थन और पोर्टफोलियो इनफ्लो ने अगस्त के अंत में रुपये को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई.
7.8% GDP ग्रोथ ने बढ़ाया भरोसा
रुपये की मजबूती को भारत की आर्थिक ग्रोथ के बेहतर आंकड़ों से भी सपोर्ट मिला है. अप्रैल-जून तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही, जो बाजार की उम्मीदों से बेहतर है. इसने RBI और निजी अर्थशास्त्रियों के अनुमानों को भी पीछे छोड़ दिया. मजबूत आर्थिक वृद्धि से भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर निवेशकों का भरोसा बढ़ा है. इसके अलावा राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण में रहने से भी घरेलू करेंसी को सहारा मिला है.
MSCI से जुड़े इनफ्लो का भी असर
बाजार में विदेशी पूंजी का प्रवाह भी रुपये के लिए सकारात्मक रहा है. MSCI से जुड़े इनफ्लो के साथ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की घरेलू इक्विटी में खरीदारी ने भी करेंसी को सपोर्ट किया है. FPIs जुलाई और अगस्त में लगातार दो महीने भारतीय इक्विटी बाजार में नेट खरीदार रहे. अगस्त में उन्होंने 29,631 करोड़ रुपये की नेट खरीदारी की, जबकि जुलाई में यह आंकड़ा 20,200 करोड़ रुपये रहा. हालांकि, साल की शुरुआत से तस्वीर अलग है. जनवरी से अब तक FPIs भारतीय शेयर बाजार से 2.24 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं. यह पिछले साल दर्ज 1.66 लाख करोड़ रुपये के आउटफ्लो से भी ज्यादा है.
डॉलर इंडेक्स में मामूली बढ़त
मंगलवार को डॉलर इंडेक्स 0.07 फीसदी बढ़कर 99.47 पर पहुंच गया. हालांकि, अगस्त में इसमें कुल 0.54 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. डॉलर इंडेक्स छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की स्थिति को मापता है. डॉलर में कमजोरी आम तौर पर उभरते बाजारों की करेंसी और परिसंपत्तियों को विदेशी निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनाती है.
शेयर बाजार की तेजी से भी रुपये को सपोर्ट
मंगलवार को घरेलू शेयर बाजारों में भी तेजी रही. इंट्राडे कारोबार में सेंसेक्स 206.95 अंक यानी 0.27 फीसदी बढ़कर 77,165.73 पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी 0.15 फीसदी की बढ़त के साथ 24,118.35 पर कारोबार करता दिखा. शेयर बाजार में विदेशी निवेश का बढ़ना आम तौर पर रुपये के लिए सकारात्मक माना जाता है, क्योंकि विदेशी निवेशकों को भारतीय परिसंपत्तियों में निवेश के लिए रुपये की जरूरत होती है.
आगे रुपये में और मजबूती की उम्मीद
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर घरेलू आर्थिक आंकड़े मजबूत बने रहते हैं, विदेशी पूंजी का प्रवाह जारी रहता है और RBI रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करता रहता है, तो आने वाले दिनों में भारतीय करेंसी को और मजबूती मिल सकती है. हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, वैश्विक स्तर पर मजबूत डॉलर और विदेशी पूंजी के संभावित आउटफ्लो जैसे जोखिम रुपये पर दबाव बनाए रख सकते हैं.
59% कंपनियां बढ़ा रहीं इन्वेंटरी, संभावित रुकावटों से निपटने के लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी और मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पर भी फोकस
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितताओं और सप्लाई चेन में संभावित रुकावटों के बीच भारतीय कंपनियां अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव कर रही हैं. कंपनियां अब सप्लायर बेस में विविधता लाने, रणनीतिक रूप से इन्वेंटरी बढ़ाने और डिजिटल तकनीक अपनाने पर ज्यादा जोर दे रही हैं. डीपी वर्ल्ड की ग्लोबल ट्रेड ऑब्जर्वेटरी की इंडिया कंट्री रिपोर्ट 2026 के मुताबिक, 70 प्रतिशत भारतीय एक्जीक्यूटिव्स ने सप्लायर डायवर्सिफिकेशन को प्राथमिकता बताया है, जबकि 59 प्रतिशत कंपनियां इन्वेंटरी का स्तर बढ़ा रही हैं.
सप्लाई चेन को मजबूत करना पहली प्राथमिकता
सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स से जुड़े 451 वरिष्ठ एक्जीक्यूटिव्स के सर्वे पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियां वैश्विक कंपनियों की तुलना में अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने को ज्यादा प्राथमिकता दे रही हैं. सप्लायर डायवर्सिफिकेशन के बाद इन्वेंटरी बढ़ाना और फ्रेंड-शोरिंग यानी भरोसेमंद एवं अनुकूल देशों से सोर्सिंग करना कंपनियों की प्रमुख रणनीतियों में शामिल है.
कंपनियां नए बाजारों में विस्तार के साथ टेक्नोलॉजी को भी तेजी से अपना रही हैं. आधे से अधिक भारतीय कंपनियों ने कस्टमर-फेसिंग सर्विसेज को पूरी तरह डिजिटल कर दिया है. वैश्विक स्तर पर ऐसी कंपनियों की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से भी कम है.
रिपोर्ट के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल रूट ऑप्टिमाइजेशन, डॉक्यूमेंटेशन और कस्टम्स प्रोसेस को अधिक प्रभावी बनाने में किया जा रहा है. इससे कंपनियों को लागत और समय कम करने के साथ सप्लाई चेन की रेजिलिएंस बढ़ाने में मदद मिल रही है.
ट्रेड एग्रीमेंट से बढ़े सोर्सिंग और नए बाजारों के अवसर
भारत के बदलते व्यापार परिदृश्य ने भी कंपनियों की रणनीति में इस बदलाव को गति दी है. प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम से घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा मिला है, जबकि बढ़ते व्यापारिक संबंधों से कंपनियों के लिए नए सोर्सिंग और एक्सपोर्ट बाजार खुले हैं.
2022 से अब तक भारत ने यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, ईएफटीए देशों, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार समझौते किए हैं. यूरोपीय संघ के साथ भी व्यापार समझौते की दिशा में प्रगति हुई है, जबकि गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) और इजरायल के साथ बातचीत चल रही है.
रिपोर्ट में करीब आधे एक्जीक्यूटिव्स ने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) को व्यापार विकास के लिए प्रमुख नीतिगत प्राथमिकता बताया है. डिजिटलाइजेशन और व्यापार सुविधा जैसे कदमों के अलावा भारत में ट्रेड फाइनेंस तक पहुंच भी अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है. 57 प्रतिशत एक्जीक्यूटिव्स का मानना है कि भारत में ट्रेड फाइनेंस आसानी से उपलब्ध है, जबकि वैश्विक स्तर पर ऐसा मानने वाले एक्जीक्यूटिव्स की हिस्सेदारी 39 प्रतिशत है.
ग्राहकों के करीब इन्वेंटरी रखने पर जोर
सोर्सिंग को डायवर्सिफाई करने और नए बाजारों में विस्तार के साथ कंपनियां इन्वेंटरी को ग्राहकों के करीब रखने की रणनीति पर भी जोर दे रही हैं. इसका उद्देश्य सप्लाई में किसी तरह की बाधा आने की स्थिति में ग्राहकों को समय पर उत्पाद उपलब्ध कराना है. इसी बढ़ती जरूरत के बीच भारत में डीपी वर्ल्ड का इंटीग्रेटेड ट्रेड और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क पोर्ट्स, वेयरहाउसिंग, फ्रेट फॉरवर्डिंग और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी को जोड़ता है.
कंपनी के मुताबिक, 60 लाख टीईयू की कुल सालाना क्षमता वाले उसके पांच कंटेनर टर्मिनल भारत के करीब एक-चौथाई आयात-निर्यात (EXIM) कंटेनर बाजार को सेवा देते हैं. इस नेटवर्क में तीन फ्री ट्रेड वेयरहाउसिंग जोन, 50 लाख वर्ग फीट वेयरहाउसिंग स्पेस, पांच कंटेनर फ्रेट स्टेशन और आठ इनलैंड रेल टर्मिनल शामिल हैं.
इसके अलावा नेटवर्क में 16,000 से अधिक कंटेनर, 15,000 पिन कोड को कवर करने वाला एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, डिजिटल फ्रेट फॉरवर्डिंग और ट्रेड फाइनेंस सॉल्यूशंस भी शामिल हैं. इन सुविधाओं का उद्देश्य कंपनियों को ज्यादा प्रभावी और रेजिलिएंट सप्लाई चेन बनाने में मदद करना है.
'डायवर्सिफाइड सोर्सिंग और स्ट्रैटेजिक इन्वेंटरी तेजी से महत्वपूर्ण'
रिपोर्ट के नतीजों पर डीपी वर्ल्ड के सबकॉन्टिनेंट, सेंट्रल एशिया, लेवांत एंड इजिप्ट के सीईओ एवं एमडी रिजवान सूमर ने कहा कि भारत का व्यापार विकास के नए चरण में प्रवेश कर रहा है और कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए रणनीतियों में बदलाव कर रही हैं.
उन्होंने कहा, "वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं से निपटने के लिए डायवर्सिफाइड सोर्सिंग, स्ट्रैटेजिक इन्वेंटरी, डिजिटलाइजेशन और नए बाजारों तक पहुंच तेजी से महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं."
उन्होंने कहा कि डीपी वर्ल्ड पोर्ट्स, इनलैंड मार्केट, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी को जोड़कर कंपनियों को अधिक दक्षता के साथ कारोबार करने में मदद कर रहा है. इससे भारत की प्रतिस्पर्धी क्षमता और ग्लोबल वैल्यू चेन में उसकी भूमिका को मजबूत करने में मदद मिल सकती है.
46% लॉजिस्टिक्स अधिकारियों की पहली पसंद सड़क नेटवर्क
भारत का व्यापारिक आकार बढ़ने के साथ लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर भी कंपनियों की रणनीति का अहम हिस्सा बन रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, 46 प्रतिशत लॉजिस्टिक्स अधिकारियों ने सड़क नेटवर्क को प्राथमिकता दी है. हालांकि, कंपनियां अब सड़क परिवहन के साथ रेल और तटीय शिपिंग जैसे मल्टीमॉडल विकल्पों की ओर भी तेजी से बढ़ रही हैं. मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी से बंदरगाहों को देश के अंदरूनी बाजारों से जोड़ने में मदद मिलती है. इससे लॉजिस्टिक्स की दक्षता बढ़ाने के साथ लागत और उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिल सकती है.
कंपनियों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी का मतलब देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक सामान पहुंचाने के लिए ज्यादा विकल्प और अधिक भरोसेमंद लॉजिस्टिक्स नेटवर्क है.
ग्लोबल ट्रेड कॉरिडोर में भारत की भूमिका बढ़ाने का मौका
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कारोबार के विकास का अगला चरण कंपनियों की बदलते वैश्विक व्यापार माहौल के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता पर निर्भर करेगा. इंटीग्रेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल क्षमताओं और व्यापार को सुगम बनाने वाली व्यवस्थाओं में निवेश से भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत किया जा सकता है. इससे भारत को उभरते ग्लोबल ट्रेड कॉरिडोर में अपनी भूमिका बढ़ाने और नए कारोबारी अवसर हासिल करने में मदद मिल सकती है.
अगस्त में ग्रॉस GST कलेक्शन 14.8% बढ़ा, आयात से टैक्स राजस्व 29% चढ़ा; रिफंड की तेज बढ़ोतरी के कारण नेट कलेक्शन की वृद्धि सिर्फ 8.3% रही
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अगस्त 2026 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) से सरकार की कमाई करीब 2 लाख करोड़ रुपये रही. ग्रॉस GST कलेक्शन सालाना आधार पर 14.8 फीसदी बढ़ा, लेकिन रिफंड में तेज उछाल ने शुद्ध संग्रह की रफ्तार को काफी कम कर दिया. अगस्त में GST रिफंड 68 फीसदी बढ़कर 31,795 करोड़ रुपये पहुंच गया. इसके चलते रिफंड समायोजित करने के बाद नेट GST कलेक्शन की वृद्धि दर 8.3 फीसदी रही.
वित्त मंत्रालय की ओर से मंगलवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में ग्रॉस GST कलेक्शन करीब 2 लाख करोड़ रुपये रहा. हालांकि, यह जुलाई के 2.11 लाख करोड़ रुपये के ग्रॉस कलेक्शन से कम है.
आयात से GST राजस्व में 29% की जोरदार बढ़ोतरी
अगस्त के GST आंकड़ों में आयात से मिलने वाले राजस्व की भूमिका अहम रही. आयात से ग्रॉस GST राजस्व सालाना आधार पर 29 फीसदी बढ़कर 62,604 करोड़ रुपये हो गया. इसके मुकाबले घरेलू लेनदेन से ग्रॉस GST कलेक्शन 9 फीसदी बढ़कर 1.37 लाख करोड़ रुपये रहा. यानी कुल GST राजस्व में बढ़ोतरी को आयात से मिलने वाले टैक्स ने बड़ा सहारा दिया. विशेषज्ञों के अनुसार, आयात से जुड़े GST राजस्व में तेज वृद्धि कुछ क्षेत्रों में बाहरी स्रोतों पर निर्भरता की ओर इशारा करती है. ऐसे में स्थानीय उत्पादन बढ़ाने और आयात के विकल्प विकसित करने के लिए संतुलित नीतिगत प्रयास जरूरी हो सकते हैं.
रिफंड 68% बढ़ा, नेट कलेक्शन की रफ्तार घटी
ग्रॉस GST कलेक्शन में करीब 15 फीसदी की बढ़ोतरी के बावजूद नेट कलेक्शन में वृद्धि केवल 8.3 फीसदी रही. रिफंड समायोजित करने के बाद अगस्त में सरकार का शुद्ध GST कलेक्शन 1.68 लाख करोड़ रुपये रहा. जुलाई के मुकाबले अगस्त में नेट GST कलेक्शन में 7 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज हुई. इसकी प्रमुख वजह GST रिफंड में तेज बढ़ोतरी रही.
अगस्त में कुल GST रिफंड सालाना आधार पर 68 फीसदी बढ़कर 31,795 करोड़ रुपये पहुंच गया. इसमें घरेलू लेनदेन से जुड़े रिफंड का हिस्सा 18,490 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की तुलना में करीब 73 फीसदी अधिक है. वहीं, आयात पर चुकाए गए GST का रिफंड करीब 62 फीसदी बढ़कर 13,305 करोड़ रुपये हो गया.
पांच महीने में ₹10.43 लाख करोड़ का ग्रॉस GST कलेक्शन
चालू वित्त वर्ष 2026-27 के पहले पांच महीनों में GST कलेक्शन की रफ्तार मजबूत बनी हुई है. अप्रैल से अगस्त के बीच ग्रॉस GST कलेक्शन सालाना आधार पर 11 फीसदी बढ़कर 10.43 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि में रिफंड के बाद नेट GST कलेक्शन 9 फीसदी बढ़कर 8.89 लाख करोड़ रुपये रहा. इससे संकेत मिलता है कि चालू वित्त वर्ष में अप्रत्यक्ष कर संग्रह अब तक स्थिर गति से बढ़ रहा है.
त्योहारी सीजन से मिल सकता है कलेक्शन को सहारा
आने वाले महीनों में GST कलेक्शन को त्योहारी सीजन से अतिरिक्त सहारा मिलने की उम्मीद है. त्योहारों के दौरान उपभोक्ता खर्च और खरीदारी बढ़ने से घरेलू लेनदेन से मिलने वाले GST राजस्व में तेजी आ सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार, त्योहारी मांग में बढ़ोतरी से आने वाले महीनों में GST राजस्व को मजबूती मिल सकती है. हालांकि, अगस्त के आंकड़ों में यह भी साफ दिखाई देता है कि ग्रॉस कलेक्शन में मजबूत बढ़ोतरी के बावजूद रिफंड में तेज वृद्धि ने सरकार के शुद्ध राजस्व पर दबाव डाला है.
कमजोर मांग और नए ऑर्डर की धीमी ग्रोथ से अगस्त में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों पर पड़ा दबाव, रोजगार में भी करीब ढाई साल बाद गिरावट
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार अगस्त में और सुस्त पड़ गई. उत्पादन और नए ऑर्डर की वृद्धि धीमी होने के कारण HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) अगस्त में घटकर 52.8 पर आ गया. यह पांच साल में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों की सबसे धीमी वृद्धि है. जुलाई में PMI 53.5 रहा था.
अगस्त में यह लगातार तीसरा महीना है जब मैन्युफैक्चरिंग PMI में गिरावट दर्ज की गई. साथ ही, यह 54.2 के दीर्घकालिक औसत से भी नीचे रहा. हालांकि PMI का 50 से ऊपर रहना सेक्टर में विस्तार का संकेत है, लेकिन आंकड़ा यह बताता है कि विस्तार की रफ्तार लगातार कमजोर हो रही है.
उत्पादन और नए ऑर्डर की ग्रोथ धीमी
HSBC की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के मुताबिक, अगस्त में उत्पादन सूचकांक अगस्त 2021 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. कंपनियों ने उत्पादन में बढ़ोतरी जारी रखी, लेकिन कमजोर मांग और नए ऑर्डर में सुस्ती के कारण इसकी रफ्तार काफी कम रही.
सर्वे में शामिल कंपनियों ने बाजार की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों और कुछ उत्पादों की कमजोर मांग को नए कारोबार की धीमी वृद्धि की प्रमुख वजह बताया. तीन प्रमुख औद्योगिक समूहों में से दो में मांग कमजोर हुई, जबकि कंज्यूमर गुड्स सेगमेंट अपेक्षाकृत बेहतर रहा.
करीब ढाई साल बाद रोजगार में गिरावट
मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों में सुस्ती का असर रोजगार पर भी पड़ा. अगस्त में सेक्टर में रोजगार करीब ढाई साल में पहली बार घटा, हालांकि गिरावट मामूली रही. कर्मचारियों की संख्या घटाने वाली कंपनियों ने कारोबार की कम जरूरत को इसकी प्रमुख वजह बताया.
कंपनियों की खरीदारी गतिविधियों में भी सुस्ती देखने को मिली. कच्चे माल और अन्य इनपुट की खरीद लगातार 62वें महीने बढ़ी, लेकिन अगस्त में इसकी वृद्धि दर इस अवधि की सबसे धीमी रही. कुछ कंपनियों ने इन्वेंटरी बढ़ाने के लिए खरीद जारी रखी, जबकि कमजोर मांग के चलते कुछ कंपनियों ने खरीदारी घटा दी.
तैयार माल का स्टॉक बढ़ा
कमजोर बिक्री का असर कंपनियों के तैयार माल के स्टॉक पर भी दिखाई दिया. अगस्त में तैयार माल का स्टॉक लगातार दूसरे महीने बढ़ा. हालांकि इसकी वृद्धि दर जुलाई की तुलना में कम रही. इससे संकेत मिलता है कि कंपनियों की बिक्री उम्मीद के मुकाबले कमजोर रही और कुछ तैयार माल इन्वेंटरी में जमा हुआ.
एक्सपोर्ट ऑर्डर में भी सुस्ती
अगस्त में विदेशी बाजारों से नए ऑर्डर मिलने का सिलसिला जारी रहा. ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, चीन, स्पेन, थाईलैंड और अमेरिका जैसे बाजारों से कंपनियों को नए ऑर्डर मिले. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर की वृद्धि दर जुलाई के मुकाबले धीमी रही.
इनपुट लागत का दबाव हुआ कम
मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए लागत के मोर्चे पर कुछ राहत मिली. स्टील और परिवहन जैसी लागत में बढ़ोतरी के बावजूद कुल इनपुट लागत में वृद्धि की रफ्तार छह महीने के निचले स्तर पर आ गई. लागत दबाव कम होने का असर उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ा. अगस्त में 7 फीसदी से कम कंपनियों ने अपनी बिक्री कीमतें बढ़ाईं. उत्पाद कीमतों में वृद्धि की दर 45 महीने में सबसे कम रही.
भविष्य को लेकर कंपनियों का भरोसा बढ़ा
मौजूदा समय में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों की रफ्तार भले ही कमजोर हुई हो, लेकिन कंपनियां अगले 12 महीनों को लेकर अपेक्षाकृत आशावादी हैं. सर्वे में करीब 16 फीसदी कंपनियों ने अगले एक साल में उत्पादन बढ़ने की उम्मीद जताई. कारोबारी भरोसा मई के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है. हालांकि, ऐतिहासिक आंकड़ों के मुकाबले कंपनियों का भरोसा अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर बना हुआ है.