कमजोर मांग और नए ऑर्डर की धीमी ग्रोथ से अगस्त में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों पर पड़ा दबाव, रोजगार में भी करीब ढाई साल बाद गिरावट
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार अगस्त में और सुस्त पड़ गई. उत्पादन और नए ऑर्डर की वृद्धि धीमी होने के कारण HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) अगस्त में घटकर 52.8 पर आ गया. यह पांच साल में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों की सबसे धीमी वृद्धि है. जुलाई में PMI 53.5 रहा था.
अगस्त में यह लगातार तीसरा महीना है जब मैन्युफैक्चरिंग PMI में गिरावट दर्ज की गई. साथ ही, यह 54.2 के दीर्घकालिक औसत से भी नीचे रहा. हालांकि PMI का 50 से ऊपर रहना सेक्टर में विस्तार का संकेत है, लेकिन आंकड़ा यह बताता है कि विस्तार की रफ्तार लगातार कमजोर हो रही है.
उत्पादन और नए ऑर्डर की ग्रोथ धीमी
HSBC की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के मुताबिक, अगस्त में उत्पादन सूचकांक अगस्त 2021 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. कंपनियों ने उत्पादन में बढ़ोतरी जारी रखी, लेकिन कमजोर मांग और नए ऑर्डर में सुस्ती के कारण इसकी रफ्तार काफी कम रही.
सर्वे में शामिल कंपनियों ने बाजार की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों और कुछ उत्पादों की कमजोर मांग को नए कारोबार की धीमी वृद्धि की प्रमुख वजह बताया. तीन प्रमुख औद्योगिक समूहों में से दो में मांग कमजोर हुई, जबकि कंज्यूमर गुड्स सेगमेंट अपेक्षाकृत बेहतर रहा.
करीब ढाई साल बाद रोजगार में गिरावट
मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों में सुस्ती का असर रोजगार पर भी पड़ा. अगस्त में सेक्टर में रोजगार करीब ढाई साल में पहली बार घटा, हालांकि गिरावट मामूली रही. कर्मचारियों की संख्या घटाने वाली कंपनियों ने कारोबार की कम जरूरत को इसकी प्रमुख वजह बताया.
कंपनियों की खरीदारी गतिविधियों में भी सुस्ती देखने को मिली. कच्चे माल और अन्य इनपुट की खरीद लगातार 62वें महीने बढ़ी, लेकिन अगस्त में इसकी वृद्धि दर इस अवधि की सबसे धीमी रही. कुछ कंपनियों ने इन्वेंटरी बढ़ाने के लिए खरीद जारी रखी, जबकि कमजोर मांग के चलते कुछ कंपनियों ने खरीदारी घटा दी.
तैयार माल का स्टॉक बढ़ा
कमजोर बिक्री का असर कंपनियों के तैयार माल के स्टॉक पर भी दिखाई दिया. अगस्त में तैयार माल का स्टॉक लगातार दूसरे महीने बढ़ा. हालांकि इसकी वृद्धि दर जुलाई की तुलना में कम रही. इससे संकेत मिलता है कि कंपनियों की बिक्री उम्मीद के मुकाबले कमजोर रही और कुछ तैयार माल इन्वेंटरी में जमा हुआ.
एक्सपोर्ट ऑर्डर में भी सुस्ती
अगस्त में विदेशी बाजारों से नए ऑर्डर मिलने का सिलसिला जारी रहा. ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, चीन, स्पेन, थाईलैंड और अमेरिका जैसे बाजारों से कंपनियों को नए ऑर्डर मिले. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर की वृद्धि दर जुलाई के मुकाबले धीमी रही.
इनपुट लागत का दबाव हुआ कम
मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए लागत के मोर्चे पर कुछ राहत मिली. स्टील और परिवहन जैसी लागत में बढ़ोतरी के बावजूद कुल इनपुट लागत में वृद्धि की रफ्तार छह महीने के निचले स्तर पर आ गई. लागत दबाव कम होने का असर उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ा. अगस्त में 7 फीसदी से कम कंपनियों ने अपनी बिक्री कीमतें बढ़ाईं. उत्पाद कीमतों में वृद्धि की दर 45 महीने में सबसे कम रही.
भविष्य को लेकर कंपनियों का भरोसा बढ़ा
मौजूदा समय में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों की रफ्तार भले ही कमजोर हुई हो, लेकिन कंपनियां अगले 12 महीनों को लेकर अपेक्षाकृत आशावादी हैं. सर्वे में करीब 16 फीसदी कंपनियों ने अगले एक साल में उत्पादन बढ़ने की उम्मीद जताई. कारोबारी भरोसा मई के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है. हालांकि, ऐतिहासिक आंकड़ों के मुकाबले कंपनियों का भरोसा अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर बना हुआ है.
FSSAI की कार्रवाई के बाद सख्त हुआ जोमैटो, पनीर-घी-मक्खन जैसे डेयरी उत्पादों के कृत्रिम विकल्प इस्तेमाल करने वाले व्यंजनों को हटाया
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ऑनलाइन फूड डिलिवरी प्लेटफॉर्म जोमैटो ने अपने प्लेटफॉर्म पर एनालॉग यानी कृत्रिम डेयरी उत्पादों के इस्तेमाल को लेकर सख्त रुख अपनाया है. कंपनी ने ऐसे व्यंजनों को प्लेटफॉर्म से हटाना शुरू कर दिया है, जिनमें रेस्तरां पार्टनर्स ने एनालॉग डेयरी उत्पादों के इस्तेमाल की जानकारी दी थी. जोमैटो ने साफ किया है कि खाद्य गुणवत्ता और नियमों का पालन नहीं करने वाले रेस्तरां पार्टनर्स को प्लेटफॉर्म से हटाया जा सकता है.
FSSAI की कार्रवाई के बाद बढ़ी सख्ती
जोमैटो का यह फैसला भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) की महाराष्ट्र में की गई कार्रवाई के बाद आया है. FSSAI ने डेयरी उत्पादों की निगरानी और उनकी गुणवत्ता की जांच को मजबूत करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी निर्देश दिए हैं. महाराष्ट्र में जांच के दौरान नियमों का उल्लंघन मिलने पर कई भोजनालयों के लाइसेंस निलंबित किए गए हैं.
क्या होते हैं एनालॉग डेयरी प्रोडक्ट?
एनालॉग डेयरी उत्पाद ऐसे कृत्रिम विकल्प होते हैं, जिनमें पारंपरिक डेयरी सामग्री की जगह अपेक्षाकृत सस्ते अन्य पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है. पनीर, घी, खोया और मक्खन जैसे डेयरी उत्पादों के विकल्प के तौर पर इनका इस्तेमाल किया जा सकता है. ऐसे उत्पादों के इस्तेमाल और उनकी जानकारी ग्राहकों को स्पष्ट रूप से दिए जाने को लेकर खाद्य सुरक्षा नियमों के पालन पर जोर दिया जा रहा है.
रेस्तरां को करनी होगी सामग्री की जांच
जोमैटो ने अपने रेस्तरां पार्टनर्स से तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने को कहा है. कंपनी के मुताबिक, रेस्तरां को प्राकृतिक डेयरी उत्पादों के इस्तेमाल पर ध्यान देना होगा और ऐसे व्यंजनों को अपने मेनू से हटाना होगा जिनमें एनालॉग डेयरी उत्पाद इस्तेमाल किए जा रहे हैं.
इसके अलावा रेस्तरां पार्टनर्स को अपने सप्लायर्स की ओर से दिए गए प्रोडक्ट लेबल और सामग्री से जुड़ी घोषणाओं की समीक्षा करनी होगी. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि खाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की सही जानकारी उपलब्ध हो.
नियम तोड़े तो प्लेटफॉर्म से हटेंगे रेस्तरां
जोमैटो ने कहा है कि वह अपने प्लेटफॉर्म पर केवल गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप उत्पादों की लिस्टिंग को बढ़ावा देगा. अगर किसी रेस्तरां पार्टनर की ओर से नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो कंपनी संबंधित उत्पाद को मेनू से हटाने के साथ-साथ रेस्तरां को अपने प्लेटफॉर्म से भी बाहर कर सकती है. कंपनी ने संकेत दिया है कि खाद्य गुणवत्ता के मामले में किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा.
जोमैटो के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आदित्य मंगला ने कहा कि कंपनी का लक्ष्य लोगों को बेहतर भोजन उपलब्ध कराना है. उन्होंने कहा कि ग्राहकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के साथ-साथ रेस्तरां पार्टनर्स की ओर से सूचीबद्ध और परोसे जाने वाले उत्पादों के लिए स्पष्ट मानक बनाए रखना भी कंपनी की प्राथमिकता है.
Happiest Minds-ITC Infotech Merger: दोनों कंपनियों के विलय से 19,000 से अधिक कर्मचारियों वाली टेक्नोलॉजी सर्विसेज कंपनी बनेगी. नई कंपनी के पास 30 से ज्यादा देशों में 800 से अधिक ग्राहक होंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
हैपिएस्ट माइंड्स टेक्नोलॉजी (Happiest Minds Technologies) और आईटीसी इंफोटेक (ITC Infotech) ने विलय के लिए समझौता किया है. इस प्रस्तावित सौदे के बाद 19,000 से अधिक कर्मचारियों वाली एक बड़ी टेक्नोलॉजी सर्विसेज कंपनी अस्तित्व में आएगी. दोनों कंपनियों ने संयुक्त कारोबार के लिए वित्त वर्ष 2027-28 तक सालाना 1 अरब डॉलर की आय का लक्ष्य रखा है.
प्रस्तावित विलय से Happiest Minds की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल इंजीनियरिंग, क्लाउड, डेटा और साइबर सिक्योरिटी क्षमताओं को ITC Infotech की एंटरप्राइज ट्रांसफॉर्मेशन, SAP, प्रोडक्ट लाइफसाइकिल मैनेजमेंट और इंडस्ट्री 4.0 विशेषज्ञता के साथ जोड़ा जाएगा.
₹7,033 करोड़ की होगी संयुक्त आय
कंपनियों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के आधार पर संयुक्त कारोबार का सालाना राजस्व करीब ₹7,033 करोड़ होगा. नई कंपनी 30 से अधिक देशों में 800 से ज्यादा ग्राहकों को सेवाएं देगी.
विलय के तहत ITC Infotech, Happiest Minds में उसके प्रमोटर और प्रमोटर संस्थाओं से करीब 22.1 फीसदी की कुल अल्पांश हिस्सेदारी दो चरणों में खरीदेगी. इस सौदे के लिए कुल ₹1,330 करोड़ का भुगतान किया जाएगा. यह करीब ₹395 प्रति शेयर के औसत भाव को दर्शाता है.
शेयर स्वैप के जरिए पूरा होगा विलय
हिस्सेदारी खरीदने के बाद प्रस्तावित विलय शेयर स्वैप के जरिए पूरा किया जाएगा. इसके तहत Happiest Minds के शेयरधारकों को उनके पास मौजूद प्रत्येक 81 शेयर के बदले ITC Infotech के 25 शेयर मिलेंगे. विलय के बाद ITC Ltd की संयुक्त कंपनी में करीब 73.4 फीसदी हिस्सेदारी होगी और वह नई कंपनी की प्रमोटर बनेगी.
AI से साइबर सिक्योरिटी तक सेवाओं का विस्तार
दोनों कंपनियों के संयोजन से AI, डिजिटल और प्रोडक्ट इंजीनियरिंग, क्लाउड, डेटा, साइबर सिक्योरिटी, कंसल्टिंग और इंडस्ट्री-विशिष्ट टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस का व्यापक पोर्टफोलियो तैयार होगा. नई कंपनी अपने विस्तारित ग्राहक आधार के बीच AI, क्लाउड, साइबर सिक्योरिटी, SAP और इंजीनियरिंग सेवाओं की क्रॉस-सेलिंग के जरिए कारोबार बढ़ाने की योजना बना रही है. इसके अलावा बड़ी एंटरप्राइज ट्रांसफॉर्मेशन और डिजिटल इंजीनियरिंग परियोजनाओं पर भी फोकस किया जाएगा.
Generative और Agentic AI पर भी फोकस
कंपनी को Generative AI और Agentic AI सॉल्यूशंस को तेजी से अपनाए जाने से भी कारोबार में वृद्धि की उम्मीद है. इसके साथ ही Microsoft, SAP, ServiceNow और PTC जैसे टेक्नोलॉजी पार्टनर्स के साथ गहरी भागीदारी के जरिए नए अवसर तलाशे जाएंगे.
उत्तरी अमेरिका और यूरोप की बड़ी हिस्सेदारी
संयुक्त कंपनी के भौगोलिक कारोबार में उत्तरी अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 38 फीसदी और यूरोप की करीब 31 फीसदी रहने की उम्मीद है. कंपनियों के मुताबिक, इससे नई कंपनी का अंतरराष्ट्रीय कारोबार पहले के मुकाबले अधिक संतुलित होगा.
15 महीने में पूरा हो सकता है सौदा
दोनों कंपनियों को उम्मीद है कि प्रस्तावित लेनदेन अगले 15 महीनों के भीतर पूरा हो जाएगा. हालांकि, इसके लिए शेयरधारकों, नियामकों, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI), स्टॉक एक्सचेंजों और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) समेत संबंधित संस्थाओं की मंजूरी जरूरी होगी.
जरूरी मंजूरियां मिलने तक Happiest Minds और ITC Infotech स्वतंत्र रूप से अपना कारोबार जारी रखेंगी. सभी मंजूरियां मिलने के बाद संयुक्त कंपनी को संबंधित स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध किया जाएगा.
दोनों कंपनियों ने बताया रणनीतिक कदम
Happiest Minds के चेयरमैन और चीफ मेंटर अशोक सूटा ने कहा कि यह विलय कंपनी को बड़ा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराएगा और दोनों कारोबारों के मूल्यों तथा पोर्टफोलियो में काफी समानताएं हैं.
वहीं, ITC के चेयरमैन संजीव पुरी ने कहा कि दोनों कंपनियों की पूरक क्षमताओं और डोमेन विशेषज्ञता को एक साथ लाने से ITC समूह की विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस उपलब्ध कराने की क्षमता मजबूत होगी.
Jio Platforms के प्रस्तावित IPO को SEBI की मंजूरी मिल गई है. करीब ₹37,700 करोड़ के इस इश्यू के जरिए कंपनी नए शेयर जारी कर पूंजी जुटाएगी. IPO आने के बाद यह देश के सबसे बड़े सार्वजनिक निर्गमों में शामिल हो सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी की टेलीकॉम और डिजिटल कारोबार से जुड़ी कंपनी जियो (Jio Platforms) के बहुप्रतीक्षित IPO का रास्ता साफ हो गया है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने कंपनी के प्रस्तावित पब्लिक इश्यू को मंजूरी दे दी है. कंपनी इस IPO के जरिए करीब ₹37,700 करोड़ जुटाने की तैयारी में है. इश्यू का अंतिम आकार, प्राइस बैंड और लॉन्च की तारीख अभी तय नहीं हुई है.
अगर IPO इसी आकार के साथ बाजार में आता है, तो यह भारत के सबसे बड़े IPO में शामिल हो सकता है. करीब 3 अरब डॉलर के संभावित इश्यू साइज के साथ जियो का सार्वजनिक निर्गम हुंडई मोटर इंडिया के IPO के आकार को पीछे छोड़ सकता है.
पूरी तरह फ्रेश इश्यू होगा IPO
जियो प्लेफॉर्म्स का प्रस्तावित IPO पूरी तरह फ्रेश इश्यू होगा. कंपनी अधिकतम 27 करोड़ नए शेयर जारी कर सकती है. इसमें ऑफर फॉर सेल (OFS) का हिस्सा नहीं होगा. इसका मतलब है कि IPO से जुटाई गई रकम सीधे कंपनी के पास जाएगी और मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी बेचकर रकम नहीं जुटाएंगे.
प्रस्तावित इश्यू में अधिकतम 50 फीसदी हिस्सा क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIBs) के लिए आरक्षित किया जा सकता है, जबकि कम से कम 35 फीसदी हिस्सा रिटेल निवेशकों के लिए रखा जा सकता है. रिलायंस इंडस्ट्रीज के पात्र शेयरधारकों और कर्मचारियों के लिए आरक्षण से जुड़ी अंतिम जानकारी अभी सामने नहीं आई है.
IPO की रकम से चुकाया जाएगा कर्ज
जियो की ओर से SEBI के पास दाखिल ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) के मुताबिक, IPO से जुटाई गई रकम का बड़ा हिस्सा उसकी सब्सिडियरी रिलायंस जियो इंफोकॉम (RJIL) के कर्ज को समय से पहले चुकाने में इस्तेमाल किया जाएगा. कंपनी करीब ₹27,500 करोड़ का इस्तेमाल RJIL के कुछ बकाया कर्ज के प्रीपेमेंट के लिए करने की योजना बना रही है. बाकी रकम का इस्तेमाल सामान्य कॉरपोरेट जरूरतों के लिए किया जाएगा.
रिलायंस इंडस्ट्रीज की 66.43% हिस्सेदारी
जियो में रिलायंस इंडस्ट्रीज सबसे बड़ी शेयरधारक है और उसकी करीब 66.43 फीसदी हिस्सेदारी है. मेटा की अप्रत्यक्ष सब्सिडियरी जाधू होलीडेज (Jaadhu Holidays) के पास करीब 10 फीसदी हिस्सेदारी है, जबकि गूगल इंटरनेशनल (Google International LLC) की हिस्सेदारी करीब 8 फीसदी है. जियो के IPO को लेकर बाजार में लंबे समय से चर्चा थी. कंपनी ने 19 जून को सेबीके पास DRHP दाखिल किया था. अब नियामक की मंजूरी मिलने के बाद IPO की अगली प्रक्रिया शुरू होगी.
अभी तय नहीं हुआ प्राइस बैंड और तारीख
सेबी की मंजूरी मिलने के बावजूद निवेशकों को IPO की लॉन्च तारीख और शेयर के प्राइस बैंड के लिए अभी इंतजार करना होगा. कंपनी ने इनका अंतिम ऐलान नहीं किया है. इश्यू का अंतिम आकार भी बाजार में आने से पहले बदल सकता है. ऐसे में जियो का IPO कब खुलेगा, कितने रुपये का प्राइस बैंड होगा और कंपनी का अंतिम वैल्यूएशन कितना तय होगा, इन सवालों पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी.
पहली तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही, जो RBI समेत ज्यादातर अनुमानों से बेहतर है. मजबूत विनिर्माण, सेवा गतिविधियों और निवेश मांग ने अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बनाए रखा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 7.8 फीसदी की मजबूत वृद्धि दर्ज की है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, जून तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही, जबकि विभिन्न एजेंसियों ने इसके 6.9 फीसदी से 8 फीसदी के बीच रहने का अनुमान जताया था. भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान 7 फीसदी था. हालांकि, यह वृद्धि पिछली तिमाही के 8.6 फीसदी के मुकाबले कम रही, लेकिन वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया संकट के बीच 7.8 फीसदी की ग्रोथ को भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
GVA ग्रोथ GDP से रही ज्यादा
पहली तिमाही में सकल मूल्य वर्धन (GVA) की वृद्धि दर 8.2 फीसदी रही. GVA की यह वृद्धि वास्तविक GDP ग्रोथ से अधिक है. वहीं, जून तिमाही में नॉमिनल GDP 10.3 फीसदी बढ़ी, जबकि वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में इसकी वृद्धि दर 9.1 फीसदी रही थी.
निवेश मांग में जोरदार तेजी
GDP के आंकड़ों के मुताबिक, जून तिमाही में निवेश मांग में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली. सकल स्थिर पूंजी निर्माण से जुड़े संकेतकों के आधार पर निवेश मांग 11.9 फीसदी बढ़ी. इससे पता चलता है कि कंपनियों और कारोबारों की ओर से आर्थिक गतिविधियों के विस्तार को लेकर भरोसा मजबूत बना हुआ है. इस दौरान निजी अंतिम उपभोग व्यय 7.1 फीसदी बढ़ा. हालांकि, सरकारी खर्च की वृद्धि दर 4.3 फीसदी रही, जो पिछली मार्च तिमाही के मुकाबले धीमी है.
पिछले आंकड़ों में भी हुआ संशोधन
सांख्यिकी मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2023, वित्त वर्ष 2024 और वित्त वर्ष 2026 के तिमाही और वार्षिक राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में भी संशोधन किया है. नए आउटपुट उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) और 2022-23 को आधार वर्ष मानकर तैयार किए गए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक को संशोधित आंकड़ों में शामिल किया गया है. सबसे महत्वपूर्ण संशोधन वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही के GDP आंकड़ों में हुआ है. मार्च तिमाही की GDP ग्रोथ को पहले के 7.8 फीसदी के अनुमान से बढ़ाकर 8.6 फीसदी कर दिया गया है.
PM मोदी ने बताया 'असाधारण उपलब्धि'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में 7.8 फीसदी GDP वृद्धि को 'असाधारण उपलब्धि' बताया. उन्होंने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूत वृद्धि दर्ज की है.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी GDP के मजबूत आंकड़ों का श्रेय देश के लोगों की मेहनत और सरकार के आर्थिक सुधारों को दिया. उन्होंने कहा कि सरकार के सुधारों और अर्थव्यवस्था के कुशल प्रबंधन के परिणाम अब दिखाई दे रहे हैं.
विनिर्माण और सेवा क्षेत्र बने ग्रोथ के प्रमुख आधार
डेलॉयट इंडिया की अर्थशास्त्री रुमकी मजूमदार के मुताबिक, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में व्यापक मजबूती से संकेत मिलता है कि कंपनियां मजबूत मांग की उम्मीद में अपनी गतिविधियों का विस्तार कर रही थीं. इन दोनों क्षेत्रों का बेहतर प्रदर्शन जून तिमाही में आर्थिक वृद्धि के प्रमुख आधारों में रहा. हालांकि, विशेषज्ञों ने आने वाली तिमाहियों को लेकर कुछ जोखिम भी जताए हैं. केयरएज रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा के मुताबिक, आने वाली तिमाहियों में आर्थिक वृद्धि में कुछ नरमी देखने को मिल सकती है. भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार नीति को लेकर अनिश्चितता वैश्विक जोखिमों को बढ़ा सकती है, जिसका असर भारत की ग्रोथ पर भी पड़ सकता है. इसके बावजूद, जून तिमाही के 7.8 फीसदी के आंकड़े से यह संकेत मिलता है कि घरेलू मांग, निवेश और प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों की मजबूती ने वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार दिया है.
सोमवार को भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ बंद हुआ था. सेंसेक्स 307.24 अंक गिरकर 76,957.27 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 95.25 अंक की गिरावट के साथ 24,080.40 पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार के लिए मंगलवार का शुरुआती सेटअप दबाव वाला नजर आ रहा है. पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को फिर ऊपर धकेल दिया है. Brent Crude $90 प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. इसके साथ ही अमेरिकी बाजारों में गिरावट और एशियाई बाजारों के कमजोर रुख का असर घरेलू बाजार की धारणा पर पड़ सकता है. हालांकि, भारत के मजबूत जीडीपी आंकड़े बाजार को कुछ सहारा दे सकते हैं.
कल कितने अंक पर बंद हुआ बाजार?
इससे पहले सोमवार, 31 अगस्त को भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ बंद हुआ था. BSE Sensex 307.24 अंक यानी 0.40 फीसदी गिरकर 76,957.27 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, NSE Nifty 95.25 अंक यानी 0.39 फीसदी की गिरावट के साथ 24,080.40 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान Sensex 76,751.32 के निचले स्तर तक गया, जबकि Nifty ने 23,993.60 का इंट्राडे लो बनाया. हालांकि बैंकिंग शेयरों में मजबूती रही. Nifty Bank 0.92 फीसदी चढ़कर 58,024.95 पर बंद हुआ.
GIFT Nifty क्या संकेत दे रहा है?
मंगलवार सुबह GIFT Nifty करीब 24,172 के स्तर पर कारोबार कर रहा था और इसमें लगभग 55 अंक यानी 0.22 फीसदी की गिरावट थी. इससे भारतीय बाजार में बड़ी गैप-डाउन ओपनिंग के बजाय सतर्क या कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे थे. हालांकि, बाद के संकेतों में मजबूत भारतीय जीडीपी आंकड़ों के चलते बाजार की शुरुआती तस्वीर कुछ बेहतर हुई. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार के हल्की बढ़त के साथ खुलने की उम्मीद थी, लेकिन बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और महंगे कच्चे तेल से तेजी सीमित रह सकती है.
कच्चा तेल $90 के पार, बाजार के लिए बड़ी चिंता
भारतीय शेयर बाजार के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमत बनी हुई है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बाद Brent Crude की कीमत $90 प्रति बैरल के पार पहुंच गई है और मंगलवार सुबह यह करीब $91 प्रति बैरल तक पहुंची. महंगे कच्चे तेल से भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर दबाव बढ़ सकता है. इससे आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर असर पड़ने की आशंका रहती है. यही वजह है कि तेल की कीमतों में तेज उछाल को भारतीय शेयर बाजार के लिए नकारात्मक संकेत माना जा रहा है.
अमेरिकी बाजार भी दबाव में
सोमवार को अमेरिकी शेयर बाजारों में भी गिरावट देखने को मिली. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई. इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता भी बाजार के लिए दबाव का कारण बनी हुई है.
एशियाई बाजारों में भी कमजोरी
मंगलवार सुबह एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला से कमजोर रुख रहा. पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और तेल की कीमतों में तेजी का असर एशियाई बाजारों की धारणा पर पड़ा. जापान और ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख सूचकांकों में कमजोरी रही, जबकि हांगकांग के बाजारों के फ्यूचर्स में भी दबाव देखने को मिला.
FII बिकवाली से भी बढ़ा दबाव
विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी घरेलू बाजार के लिए चिंता का कारण बनी हुई है. 31 अगस्त को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों में करीब ₹7,986 करोड़ की नेट बिकवाली की. दूसरी ओर घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब ₹4,589 करोड़ की नेट खरीदारी की. हालांकि, अगस्त में विदेशी निवेशकों का कुल रुख पूरी तरह नकारात्मक नहीं रहा. Reuters के मुताबिक, अगस्त 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में करीब $3.1 अरब का निवेश किया, जो 23 महीने में सबसे बड़ा मासिक इनफ्लो रहा.
भारत की GDP ग्रोथ से मिल सकता है सहारा
बाजार के लिए एक सकारात्मक संकेत भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि है. अप्रैल-जून तिमाही में भारत की वास्तविक GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही, जो उम्मीद से बेहतर है. मजबूत निवेश, मैन्युफैक्चरिंग और घरेलू मांग ने आर्थिक वृद्धि को सपोर्ट किया. इसलिए मंगलवार के कारोबार में एक तरफ मजबूत घरेलू आर्थिक आंकड़े बाजार को सहारा दे सकते हैं, वहीं महंगा कच्चा तेल, अमेरिका-ईरान तनाव और कमजोर ग्लोबल संकेत तेजी पर अंकुश लगा सकते हैं.
आज किन शेयरों पर रहेगी नजर?
मंगलवार के कारोबार में PVR INOX, Happiest Minds Technologies, ITC, Tribhovandas Bhimji Zaveri (TBZ), E2E Networks, Milky Mist Dairy Food, Brigade Enterprises, Time Technoplast, Indo Tech Transformers, PNB Housing Finance और Himadri Speciality Chemical समेत कई शेयर खबरों के चलते फोकस में रहेंगे. Happiest Minds-ITC Infotech विलय, PVR INOX के शेयर बायबैक, TBZ में GRT Jewellers की हिस्सेदारी खरीदने की योजना, Milky Mist के मजबूत तिमाही नतीजे, E2E Networks के करीब ₹1,000 करोड़ के AI सौदे, Brigade Enterprises के कोयंबटूर प्रोजेक्ट, Time Technoplast और Indo Tech Transformers के नए ऑर्डर तथा PNB Housing Finance की फंड जुटाने की योजना से इन शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है.
कुल मिलाकर, मंगलवार को बाजार की दिशा तय करने में कच्चे तेल की कीमत, पश्चिम एशिया का तनाव, विदेशी निवेशकों की गतिविधि और वैश्विक बाजारों के संकेत अहम भूमिका निभाएंगे.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
80 साल पुराने पारिवारिक कारोबार को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने से लेकर बिजनेस बेचकर नया उद्यम शुरू करने तक बदल रही सोच, TBA India ने भारत में शुरू किया बिजनेस ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की उद्यमिता की कहानी अब सिर्फ कंपनी शुरू करने, रेवेन्यू बढ़ाने और कारोबार का विस्तार करने तक सीमित नहीं रह गई है. कारोबारियों के सामने अब एक बड़ा सवाल है- बिजनेस बनने के बाद उसका क्या किया जाए? क्या उसे अगली पीढ़ी को सौंपा जाए, किसी दूसरी कंपनी के साथ मिलाया जाए, बेचा जाए या उसकी वैल्यू बढ़ाकर निवेश और अधिग्रहण के लिए तैयार किया जाए? यही बदलाव भारत में ‘Business Economy in Transition’ की नई तस्वीर तैयार कर रहा है.
80 साल पुराने पारिवारिक कारोबार को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने से लेकर दशकों में खड़ी की गई कंपनी से एग्जिट लेने और उस पूंजी से नया उद्यम शुरू करने तक, भारतीय कारोबारी अब बिजनेस ट्रांजिशन, सक्सेशन, M&A और वैल्यू क्रिएशन पर पहले से ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. इसी उभरते अवसर को देखते हुए दुनिया की बड़ी बिजनेस ब्रोकरेज कंपनियों में शामिल Transworld Business Advisors (TBA) ने भारत में अपनी शुरुआत की है.
TBA India ने भारत में शुरू किया ऑपरेशन
TBA India के लॉन्च के साथ कंपनी ने भारतीय बाजार में औपचारिक शुरुआत की. कंपनी भारत में बिजनेस सेल और खरीद, मर्जर एंड एक्विजिशन (M&A), फ्रेंचाइजिंग, सक्सेशन प्लानिंग और वेल्थ क्रिएशन से जुड़े अवसरों पर काम करेगी. इसका लक्ष्य ऐसे कारोबारों को एक प्लेटफॉर्म से जोड़ना है, जो विस्तार, निवेश, अधिग्रहण या एग्जिट के विकल्प तलाश रहे हैं. TBA India के मुताबिक वह करीब 123.8 अरब डॉलर के भारतीय बिजनेस डील मार्केट को टारगेट कर रही है. कंपनी ₹5 करोड़ से ₹200 करोड़ या उससे अधिक सालाना टर्नओवर वाले कारोबारों पर खास फोकस कर रही है.
AI और टेक्नोलॉजी से जुड़ेगा खरीदार और कारोबारी
TBA India अपने प्रोपराइटरी CRM प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करेगी, जिसे AI के जरिए और बेहतर बनाया गया है. कंपनी के मुताबिक इस तकनीक को वैश्विक बाजारों में पहले ही इस्तेमाल किया जा चुका है. प्लेटफॉर्म का उद्देश्य कारोबार बेचने वालों और संभावित खरीदारों के बीच कनेक्शन स्थापित करने के साथ पूरी ट्रांजैक्शन प्रक्रिया को सपोर्ट करना है. इसमें बिजनेस की पहचान, संभावित खरीदारों से कनेक्शन, अधिग्रहण और ग्रोथ से जुड़े अवसरों को एक ही इकोसिस्टम में लाने की कोशिश की जाएगी.
‘भारत में उद्यमियों की कमी नहीं, संस्थान बनने वाले कारोबारों की कमी’
TBA के फाउंडर और चेयरपर्सन Ray Titus के मुताबिक भारत में उद्यमियों की कमी नहीं है, लेकिन ऐसे कारोबारों की कमी है जिन्हें संस्थान के रूप में विकसित किया गया हो. उनका कहना है कि TBA India का लक्ष्य भरोसेमंद कारोबारों, पूंजी, विशेषज्ञता और मजबूत कारोबारी रिश्तों को जोड़ना है, ताकि भारतीय कंपनियां सिर्फ आकार में बड़ी न हों बल्कि वैश्विक निवेश के लिए भी आकर्षक और अधिग्रहण के लिए तैयार बन सकें.
‘सफलता सिर्फ रेवेन्यू से नहीं मापी जानी चाहिए’
वसंत ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर यश वसंत ने कहा कि भारत की उद्यमिता की कहानी के लिए सबसे बड़ा खतरा असफलता नहीं है, बल्कि ऐसे सफल कारोबार हैं जो अपने संस्थापकों पर निर्भर बने रहते हैं. उनके मुताबिक अगर भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी है तो सफलता को केवल रेवेन्यू से नहीं मापा जा सकता. यह देखना भी जरूरी है कि कोई कारोबार कितनी स्वतंत्रता, स्थिरता और रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ सकता है.
तेजी से ग्रोथ के लिए अधिग्रहण बन सकता है बड़ा रास्ता
यश वसंत ने कहा भारतीय कंपनियों के विस्तार में आने वाले समय में अधिग्रहण की भूमिका भी बढ़ सकती है. सिर्फ ऑर्गेनिक ग्रोथ के जरिए किसी कारोबार को तेजी से बड़ा करने में लंबा समय लग सकता है. ऐसे में दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करके नए ग्राहक, नए बाजार, टेक्नोलॉजी या प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को तेजी से हासिल किया जा सकता है. इसी के साथ भारतीय कंपनियां खुद भी विदेशी या घरेलू रणनीतिक निवेशकों के लिए संभावित अधिग्रहण लक्ष्य बन सकती हैं. इससे भारत के MSME और मिड-साइज बिजनेस सेक्टर में M&A गतिविधियों के बढ़ने की संभावना बनती है.
बड़े शहरों से आगे छोटे शहरों पर भी नजर
यश वसंत ने बताया भारत में बिजनेस ट्रांजिशन का यह अवसर केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या अहमदाबाद जैसे बड़े कारोबारी केंद्रों तक सीमित नहीं है. छोटे और मझोले शहरों में भी बड़ी संख्या में पारिवारिक और उद्यमी कारोबार मौजूद हैं. TBA India फ्रेंचाइज मॉडल के जरिए भोपाल, रायपुर, भुवनेश्वर, सिलीगुड़ी, सेलम, त्रिची और तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों तक पहुंच बनाने की दिशा में काम कर रही है. इन शहरों में मौजूद कारोबारों के सामने भी विस्तार, उत्तराधिकार, बिक्री और अधिग्रहण से जुड़ी वही चुनौतियां हैं, जिनका सामना बड़े शहरों की कंपनियां कर रही हैं.
भारत में बिजनेस ट्रांजिशन का नया दौर
भारत का MSME और फैमिली बिजनेस इकोसिस्टम जैसे-जैसे परिपक्व होगा, कारोबारों की खरीद-बिक्री, M&A, फ्रेंचाइजिंग, सक्सेशन और स्ट्रैटेजिक एग्जिट की जरूरत भी बढ़ सकती है. यानी भारतीय उद्यमिता का अगला चरण सिर्फ ‘बिजनेस बनाना’ नहीं होगा. अब चुनौती ऐसे बिजनेस बनाने की है, जो संस्थापक से आगे भी टिके रहें, जिनकी वैल्यू लगातार बढ़े और जरूरत पड़ने पर उन्हें आसानी से ट्रांसफर, बेच या अधिग्रहित किया जा सके. TBA India की भारत में एंट्री इसी बदलते कारोबारी नजरिए और उभरते बिजनेस ट्रांजिशन मार्केट को भुनाने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है.
फैमिली बिजनेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती
यश ने बताया कि भारत में बड़ी संख्या में कारोबार पारिवारिक स्वामित्व वाले हैं. पहली पीढ़ी कारोबार खड़ा करती है और दूसरी या तीसरी पीढ़ी उसे आगे बढ़ाती है. लेकिन बदलती पीढ़ी के साथ यह मॉडल भी चुनौती का सामना कर रहा है. कई मामलों में अगली पीढ़ी पारिवारिक कारोबार में शामिल नहीं होना चाहती. वहीं पहली पीढ़ी भावनात्मक कारणों से दशकों पुराने कारोबार को बेचने के लिए तैयार नहीं होती. ऐसे में सवाल उठता है कि 50, 70 या 80 साल में बनाई गई कारोबारी विरासत का क्या किया जाए. यहीं पर सक्सेशन प्लानिंग, बिजनेस सेल, M&A और स्ट्रैटेजिक एग्जिट जैसे विकल्प महत्वपूर्ण हो जाते हैं. कारोबार को बेचकर उससे मिली पूंजी का इस्तेमाल अगली पीढ़ी नया बिजनेस शुरू करने या किसी दूसरे क्षेत्र में निवेश करने के लिए भी कर सकती है.
1989 में शुरू हुआ कारोबार अब कई विदेशी बाजारों तक पहुंचा, DGFT से Star Export House का दर्जा; मैन्युफैक्चरिंग, प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट को एक साथ रखने पर कंपनी का जोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पुणे से शुरू हुआ एक पारिवारिक स्टोन कारोबार पिछले तीन दशकों में घरेलू बाजार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा है. Petros Stone LLP की शुरुआत 1989 में हुई थी और आज कंपनी ग्रेनाइट, मार्बल और क्वार्ट्ज जैसे नेचुरल स्टोन के प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट कारोबार में सक्रिय है. कंपनी के मुताबिक, उसके उत्पाद 50 से अधिक देशों तक पहुंच चुके हैं और वह अब तक 1,000 से ज्यादा कंटेनर एक्सपोर्ट कर चुकी है.
कंपनी को भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के तहत डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) से Star Export House का दर्जा भी मिला है. यह मान्यता निर्धारित निर्यात प्रदर्शन के आधार पर दी जाती है. ऐसे में Petros Stone का विस्तार सिर्फ घरेलू कारोबार बढ़ाने की कहानी नहीं, बल्कि एक पारंपरिक फैमिली बिजनेस के धीरे-धीरे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड मॉडल में बदलने का उदाहरण भी है.
1989 में शुरू हुआ सफर
Petros Stone की जड़ें 1989 तक जाती हैं. कारोबार की शुरुआत पुणे से हुई और समय के साथ कंपनी ने नेचुरल स्टोन की खरीद, प्रोसेसिंग और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई पर अपना फोकस बढ़ाया. मौजूदा समय में कंपनी का संचालन विक्रम जैन, ऋषभ जैन और वंश जैन की टीम कर रही है. कंपनी ने पारंपरिक स्टोन कारोबार के साथ मैन्युफैक्चरिंग तकनीक और एक्सपोर्ट ऑपरेशंस को जोड़ने की कोशिश की है.
इस बदलाव का असर कंपनी के बिजनेस मॉडल में भी दिखाई देता है. केवल स्टोन ट्रेडिंग पर निर्भर रहने के बजाय कंपनी ने सोर्सिंग, प्रोसेसिंग, फैब्रिकेशन और एक्सपोर्ट को एक ही सप्लाई चेन में रखने पर जोर दिया है.
DGFT से Star Export House की मान्यता
Petros Stone LLP को DGFT की ओर से Star Export House सर्टिफिकेट मिला है. यह दर्जा Foreign Trade Policy 2023 के तहत निर्धारित निर्यात प्रदर्शन को पूरा करने वाले कारोबारों को दिया जाता है. Star Export House का दर्जा किसी प्रतिस्पर्धी अवॉर्ड या मार्केटिंग रैंकिंग की तरह नहीं है. यह निर्यात प्रदर्शन से जुड़ी सरकारी मान्यता है. इसका आधार कंपनी के निर्धारित निर्यात आंकड़े होते हैं.
कंपनी के पास ISO 9001:2015, ISO 14001, CE मार्किंग, CAPEXIL रजिस्ट्रेशन और अन्य व्यावसायिक प्रमाणन भी हैं. हालांकि, इन प्रमाणनों की उपयोगिता अलग-अलग बाजारों और खरीदारों की जरूरतों पर निर्भर करती है.
ट्रेडिंग से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग पर जोर
नेचुरल स्टोन कारोबार में किसी कंपनी की भूमिका केवल पत्थर की खरीद और बिक्री तक सीमित नहीं रहती. क्वारी से लेकर कटिंग, पॉलिशिंग, फैब्रिकेशन और अंतिम डिलीवरी तक कई चरण होते हैं. Petros Stone ने इसी सप्लाई चेन के कई हिस्सों को अपने ऑपरेशंस में शामिल किया है. कंपनी के अनुसार, उसकी प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां उदयपुर, किशनगढ़, हैदराबाद और होसुर जैसे प्रमुख स्टोन कारोबार केंद्रों से जुड़ी हैं.
इस मॉडल का एक फायदा यह है कि स्टोन की प्रोसेसिंग और फैब्रिकेशन पर ज्यादा नियंत्रण रखा जा सकता है. खासकर विदेशी प्रोजेक्ट्स में जहां खरीदार को केवल कच्चे स्लैब के बजाय तय आकार और स्पेसिफिकेशन के मुताबिक तैयार सामग्री चाहिए होती है, वहां यह मॉडल महत्वपूर्ण हो जाता है.
50 से अधिक देशों तक पहुंच
कंपनी के मुताबिक, उसके उत्पाद 50 से ज्यादा देशों में एक्सपोर्ट किए गए हैं. इनमें मध्य पूर्व, यूरोप, अमेरिका, एशिया और अन्य बाजार शामिल हैं.
अंतरराष्ट्रीय कारोबार में कंपनी की मौजूदगी को कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स के संदर्भ में भी देखा जा सकता है. इनमें मालदीव्स के प्राइवेट आइलैंड रिजॉर्ट, भूटान का एक मठ, लातविया का स्पा-होटल और मियामी का एक फाइव-स्टार होटल शामिल हैं.
इन प्रोजेक्ट्स में अलग-अलग मौसम, उपयोग और डिजाइन जरूरतों के मुताबिक स्टोन की प्रोसेसिंग की गई. उदाहरण के लिए, समुद्री वातावरण वाले प्रोजेक्ट्स में स्टोन की टिकाऊपन और स्लिप रेजिस्टेंस महत्वपूर्ण हो जाती है, जबकि होटल और लक्जरी इंटीरियर प्रोजेक्ट्स में कटिंग, फिनिश और पैटर्न की एकरूपता पर अधिक ध्यान देना पड़ता है.
अलग-अलग बाजार, अलग-अलग जरूरतें
कंपनी द्वारा बताए गए प्रोजेक्ट्स यह भी दिखाते हैं कि नेचुरल स्टोन एक्सपोर्ट केवल एक सामान्य कमोडिटी कारोबार नहीं रह गया है. विदेशी बाजारों में इस्तेमाल होने वाले स्टोन को स्थानीय मौसम, डिजाइन और निर्माण मानकों के अनुरूप तैयार करना पड़ता है.
मालदीव्स के एक प्रोजेक्ट में लाइमस्टोन के लिए विशेष फिनिशिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया. भूटान के एक प्रोजेक्ट में एंटी-स्किड ब्लैक स्लेट सॉल्यूशन तैयार किया गया. वहीं लातविया के स्पा-होटल प्रोजेक्ट में ठंडे मौसम के अनुरूप स्टोन पैनल्स और इंटीरियर बेसिन तैयार किए गए.
मियामी के एक होटल प्रोजेक्ट में कंपनी के अनुसार करीब 108,500 वर्ग मीटर पैटागोनिया क्वार्टज़ाइट की सप्लाई 220 कंटेनरों के जरिए की गई. यह बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट सप्लाई की क्षमता को दर्शाता है, हालांकि ऐसे दावों का स्वतंत्र सत्यापन कंपनी के बाहर के स्रोतों से अलग विषय है.
अब अगला फोकस वैल्यू-एडेड एक्सपोर्ट पर
भारतीय स्टोन इंडस्ट्री लंबे समय से बड़ी मात्रा में नेचुरल स्टोन के उत्पादन और निर्यात के लिए जानी जाती है. हालांकि, वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा अब केवल कच्चे माल की कीमत तक सीमित नहीं है. डिजाइन, प्रोसेसिंग, ट्रेसिबिलिटी और समय पर डिलीवरी भी खरीदारों के फैसले में भूमिका निभाते हैं.
Petros Stone की आगे की रणनीति भी इसी बदलाव से जुड़ी दिखाई देती है. कंपनी प्रीमियम स्टोन की डायरेक्ट और ब्लॉक-लेवल सोर्सिंग, खासकर इटली के टस्कनी क्षेत्र से, पर काम कर रही है. इसका उद्देश्य सोर्सिंग प्रक्रिया में बिचौलियों को कम करना और मटीरियल की ट्रेसिबिलिटी बढ़ाना है.
पारंपरिक कारोबार का बदलता मॉडल
Petros Stone का करीब तीन दशक से ज्यादा का सफर यह दिखाता है कि पारंपरिक फैमिली बिजनेस भी समय के साथ अपने ऑपरेटिंग मॉडल में बदलाव कर सकते हैं. स्थानीय बाजार से शुरुआत, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का विस्तार और फिर अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स पर फोकस ने कंपनी के कारोबार की दिशा बदली है.
Star Export House की सरकारी मान्यता और कई देशों में मौजूदगी इस विस्तार के प्रमुख पड़ाव हैं. हालांकि, ग्लोबल बाजार में लंबे समय तक टिके रहने के लिए कंपनी को लॉजिस्टिक्स लागत, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों, मुद्रा उतार-चढ़ाव और अलग-अलग देशों के निर्माण मानकों जैसी चुनौतियों से लगातार निपटना होगा.
यही वजह है कि Petros Stone की कहानी को केवल एक स्टोन ब्रांड की सफलता के तौर पर देखने के बजाय, एक पारंपरिक भारतीय मैन्युफैक्चरिंग कारोबार के एक्सपोर्ट-फोकस्ड बिजनेस में बदलने की प्रक्रिया के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा.
इस सप्ताह आने वाले मेनबोर्ड IPO में पर्पल स्टाइल लैब्स का इश्यू सबसे बड़ा है. कंपनी IPO के जरिए करीब ₹680 करोड़ जुटाने की योजना बना रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्राइमरी मार्केट में इस हफ्ते भी जबरदस्त हलचल रहने वाली है. पिछले हफ्ते कई बड़े इश्यू आने के बाद अब नए सप्ताह में भी निवेशकों के लिए प्राइमरी मार्केट में कई मौके खुलने जा रहे हैं. 31 अगस्त से शुरू हो रहे इस सप्ताह में कुल 7 कंपनियां IPO के जरिए बाजार से पूंजी जुटाने की तैयारी में हैं. इनमें 3 मेनबोर्ड और 4 SME IPO शामिल हैं. इन सातों कंपनियों के इश्यू से कुल ₹1,400 करोड़ से ज्यादा रकम जुटने की उम्मीद है. मेनबोर्ड सेगमेंट में पर्पल स्टाइल लैब्स सबसे बड़ा IPO होगा, जबकि दीपा ज्वैलर्स और रेज ऑफ बिलीफ भी निवेशकों के लिए बाजार में उतरेंगी.
पर्पल स्टाइल लैब्स का IPO सबसे बड़ा
इस सप्ताह आने वाले मेनबोर्ड IPO में पर्पल स्टाइल लैब्स का इश्यू सबसे बड़ा है. कंपनी IPO के जरिए करीब ₹680 करोड़ जुटाने की योजना बना रही है. इसका IPO 31 अगस्त से 2 सितंबर तक खुला रहेगा. इसके बाद दीपा ज्वैलर्स का नंबर है, जिसका इश्यू 1 सितंबर से 3 सितंबर तक खुला रहेगा. कंपनी करीब ₹459.7 करोड़ जुटाने की तैयारी में है. वहीं रेज ऑफ बिलीफ का IPO भी 1 से 3 सितंबर के बीच सब्सक्रिप्शन के लिए खुला रहेगा और इसके जरिए करीब ₹125 करोड़ जुटाने की योजना है. तीनों मेनबोर्ड IPO से कुल करीब ₹1,264.7 करोड़ जुटाने की योजना है.
SME सेगमेंट में 4 कंपनियां उतरेंगी
SME सेगमेंट में भी इस सप्ताह चार कंपनियां IPO लेकर आ रही हैं. फाइकेम टेक्नोलॉजीज, शांति इनऑर्गेनिक्स और आशुतोष फाइबर के IPO 31 अगस्त से 2 सितंबर तक खुले रहेंगे. वहीं फार्म पीस का इश्यू 1 सितंबर से 3 सितंबर तक सब्सक्रिप्शन के लिए उपलब्ध रहेगा.
चारों SME IPO के जरिए कुल करीब ₹142.6 करोड़ जुटाने की योजना है.
इस हफ्ते खुलने वाले IPO पर नजर
कंपनी सेगमेंट IPO की अवधि जुटाई जाने वाली रकम
पर्पल स्टाइल लैब्स मेनबोर्ड 31 अगस्त-2 सितंबर ₹680 करोड़
दीपा ज्वैलर्स मेनबोर्ड 1-3 सितंबर ₹459.7 करोड़
रेज ऑफ बिलीफ मेनबोर्ड 1-3 सितंबर ₹125 करोड़
फाइकेम टेक्नोलॉजीज SME 31 अगस्त-2 सितंबर ₹13.8 करोड़
शांति इनऑर्गेनिक्स SME 31 अगस्त-2 सितंबर ₹44.9 करोड़
आशुतोष फाइबर SME 31 अगस्त-2 सितंबर ₹53.5 करोड़
फार्म पीस SME 1-3 सितंबर ₹30.4 करोड़
मेनबोर्ड और SME सेगमेंट को मिलाकर इन सात IPO के जरिए करीब ₹1,407 करोड़ जुटाने की योजना है.
पिछले हफ्ते भी रहा IPO का जलवा
इससे पहले पिछले सप्ताह प्राइमरी मार्केट में 6 मेनबोर्ड और 7 SME IPO आए थे. इन इश्यू के जरिए कंपनियों ने कुल मिलाकर ₹4,447 करोड़ से ज्यादा जुटाए थे. इससे साफ है कि 2026 में IPO बाजार में कंपनियों की दिलचस्पी लगातार बनी हुई है.
इस सप्ताह इन IPO की होगी क्लोजिंग और लिस्टिंग
पिछले सप्ताह खुले तीन मेनबोर्ड IPO-प्रायोरिटी ज्वैल्स, ESDS सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस और ल्यूमिनो इंडस्ट्रीज-इस सप्ताह बंद होंगे. वहीं, ऑगमॉन्ट एंटरप्राइजेज, हाई-टेक इंजीनियर्स, स्काईवेज एयर सर्विसेज, सिम्बायोटेक फार्मालैब और अन्नू प्रोजेक्ट्स के IPO पिछले सप्ताह पूरे हो चुके हैं. इन कंपनियों के शेयरों की लिस्टिंग इस सप्ताह होने की उम्मीद है.
SME सेगमेंट में पलक टेक्नोलॉजीज, कम्प्लीट स्पोर्ट्स एंड मैनेजमेंट इंडिया और क्विक फोरेंसिक सॉल्यूशंस के IPO इस सप्ताह बंद होंगे. वहीं सुमैक्स इंजीनियरिंग, ABH हेल्थकेयर और मधुर निट क्राफ्ट्स की लिस्टिंग भी इसी सप्ताह होनी है.
ऊंचे वैल्यूएशन पर प्रमोटर्स और PE निवेशकों ने बेची हिस्सेदारी, म्यूचुअल फंड और इंश्योरेंस कंपनियों ने बढ़ी सप्लाई को खरीदा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अगस्त में भारतीय शेयर बाजार में बड़े ब्लॉक और बल्क डील्स की जोरदार गतिविधि देखने को मिली. इस महीने कम से कम ₹80,000 करोड़ के ब्लॉक और बल्क ट्रेड हुए हैं, जो जून 2025 के बाद किसी एक महीने में सबसे ज्यादा हैं. मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में तेजी और ऊंचे वैल्यूएशन के बीच प्रमोटर्स और प्राइवेट इक्विटी निवेशकों ने अपनी हिस्सेदारी घटाई, वहीं घरेलू म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस कंपनियों, पेंशन फंड और विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इन शेयरों की बढ़ी हुई सप्लाई को खरीदा.
जुलाई के मुकाबले 65% से ज्यादा बढ़े बड़े सौदे
अगस्त में हुए ब्लॉक और बल्क डील्स का आंकड़ा जुलाई के करीब ₹48,500 करोड़ के मुकाबले काफी अधिक है. यानी एक महीने में बड़े सौदों की वैल्यू में करीब 65 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. बाजार में इस तरह की गतिविधि को मजबूत लिक्विडिटी और ऊंचे वैल्यूएशन का संकेत माना जाता है.
अगस्त के दौरान कई बड़ी कंपनियों में प्रमोटर्स, फाउंडर्स और प्राइवेट इक्विटी निवेशकों ने हिस्सेदारी बेची. इनमें एस्टर डीएम क्वालिटी केयर, वन97 कम्युनिकेशंस, लेन्सकार्ट सॉल्यूशंस, एवेन्यू सुपरमार्ट्स और अन्य कंपनियां शामिल हैं.
इन कंपनियों में हुई बड़ी हिस्सेदारी बिक्री
सेंटेला मॉरीशस होल्डिंग्स ने एस्टर डीएम क्वालिटी केयर में 6.67 फीसदी हिस्सेदारी करीब ₹4,451 करोड़ में बेची. वहीं पेटीएम के फाउंडर और CEO विजय शेखर शर्मा के नियंत्रण वाली रेसिलिएंट एसेट मैनेजमेंट ने वन97 कम्युनिकेशंस में करीब 3 फीसदी हिस्सेदारी ₹2,949 करोड़ में बेची.
इसके अलावा अगस्त में हुए प्रमुख सौदों में:
1. सॉफ्टबैंक विजन फंड II लाइटबल्ब (केमैन) ने लेन्सकार्ट सॉल्यूशंस में करीब 2.6 फीसदी हिस्सेदारी ₹2,888 करोड़ में बेची.
2. अमेरिकन फंड्स इंश्योरेंस सीरीज ग्लोबल ग्रोथ एंड इनकम फंड ने एवेन्यू सुपरमार्ट्स में 1.04 फीसदी हिस्सेदारी ₹2,537 करोड़ में बेची.
3. जनरल अटलांटिक सिंगापुर RR Pte ने रुबिकॉन रिसर्च में करीब ₹2,300 करोड़ के शेयर बेचे.
4. रिबिट कैपिटल V और रिबिट केमैन GW होल्डिंग्स V ने बिलियनब्रेन्स गैराज वेंचर्स में कुल ₹2,217 करोड़ के शेयर बेचे.
5. SAIF III मॉरीशस कंपनी, SAIF पार्टनर्स इंडिया IV और एलिवेशन कैपिटल V ने पेटीएम के करीब ₹2,038 करोड़ के शेयर बेचे.
6. एलिवेशन कैपिटल V और पीक XV पार्टनर्स इन्वेस्टमेंट्स V ने मीशो में ₹1,949 करोड़ के शेयर बेचे.
7. वेल्सपन कॉर्प में ₹1,433 करोड़ और वियाश साइंटिफिक में ₹1,259 करोड़ की हिस्सेदारी की बिक्री हुई.
8. लाइट्सपीड अपॉर्चुनिटी फंड II ने फिजिक्सवाला में अपनी पूरी 1.61 फीसदी हिस्सेदारी करीब ₹550 करोड़ में बेच दी.
मई-अगस्त के बीच ₹2.51 लाख करोड़ के सौदे
ब्लॉक और बल्क डील्स की रफ्तार अगस्त के दूसरे हिस्से में और तेज हुई. मई से अगस्त के बीच कुल ₹2.51 लाख करोड़ की ब्लॉक और बल्क डील हुईं. यह जनवरी से अप्रैल के बीच हुए करीब ₹1.25 लाख करोड़ के सौदों के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है. 2026 में अब तक कुल ₹3.77 लाख करोड़ की 9,754 ब्लॉक और बल्क डील हो चुकी हैं. इसकी तुलना में पूरे 2025 में ₹5.85 लाख करोड़ की 14,926 डील हुई थीं.
ऊंचे वैल्यूएशन में क्यों बढ़ती हैं ब्लॉक डील?
ब्लॉक और बल्क डील की गतिविधि आमतौर पर तब बढ़ती है, जब बाजार में वैल्यूएशन ऊंचे हों और लिक्विडिटी मजबूत हो. ऐसे माहौल में प्रमोटर्स, प्राइवेट इक्विटी निवेशक और अन्य बड़े शेयरधारक बिना शेयर की कीमतों में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव पैदा किए अपनी हिस्सेदारी बेचकर मुनाफा कमा सकते हैं या निवेश से बाहर निकल सकते हैं.
अगस्त में ब्लॉक और बल्क डील्स का बढ़ना इसी ट्रेंड की ओर इशारा करता है. एक तरफ बड़े निवेशकों ने ऊंचे स्तर पर हिस्सेदारी घटाई, तो दूसरी ओर संस्थागत निवेशकों ने बाजार में उपलब्ध शेयरों की इस अतिरिक्त सप्लाई को सोख लिया.
सी राज कुमार की यात्रा केवल एक विश्वविद्यालय के निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत में उच्च शिक्षा को वैश्विक स्तर पर ले जाने की सोच और प्रयासों की कहानी भी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में उच्च शिक्षा का क्षेत्र तेजी से बदल रहा है. ऐसे में प्रोफेसर (डॉ.) सी राज कुमार उन चुनिंदा शिक्षाविदों में शामिल हैं, जिन्होंने वैश्विक सोच के साथ एक संस्थान को शुरुआत से खड़ा करने की कोशिश की. ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी (JGU) के संस्थापक कुलपति और जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल (JGLS) के संस्थापक डीन के तौर पर कुमार ने एक ऐसे संस्थान को आकार देने में अहम भूमिका निभाई, जिसमें अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण, बहुविषयक शिक्षा, शोध और अकादमिक उत्कृष्टता को केंद्र में रखा गया.
रोड्स स्कॉलर और प्रतिष्ठित कानूनी विद्वान कुमार को 2009 में 34 वर्ष की उम्र में JGU का कुलपति नियुक्त किया गया था. उसी वर्ष विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी. संस्थान के साथ उनका जुड़ाव एक विचार से शुरू हुआ था, भारत में एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाना जो वास्तव में वैश्विक स्तर का हो. समय के साथ यह सोच JGU के रूप में सामने आई. आज यह कानून, बिजनेस, अंतरराष्ट्रीय मामलों, सार्वजनिक नीति, लिबरल आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज, पत्रकारिता और संचार, कला एवं वास्तुकला, बैंकिंग एवं फाइनेंस तथा पर्यावरण एवं स्थिरता जैसे क्षेत्रों में शिक्षा देने वाला एक बहुविषयक संस्थान बन चुका है.
कुमार के लिए संस्थान का निर्माण उच्च शिक्षा की समाज में भूमिका को लेकर उनकी व्यापक सोच से जुड़ा रहा है. उनके अकादमिक कार्यों में मानवाधिकार और विकास, तुलनात्मक संवैधानिक कानून, आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा, भ्रष्टाचार और शासन, आपदा प्रबंधन, कानूनी शिक्षा और उच्च शिक्षा जैसे विषय शामिल रहे हैं. उनके शोध में केवल कानूनी मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि संस्थानों, शासन और समाज के बीच संबंधों पर भी ध्यान दिया गया है.
अंतरराष्ट्रीय रहा अकादमिक सफर
कुमार की शिक्षा और अकादमिक यात्रा भी अंतरराष्ट्रीय रही है. उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ सिविल लॉ की पढ़ाई की, जहां वह रोड्स स्कॉलर रहे. इसके बाद उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूल से LLM किया, जहां उन्हें लैंडन गैमन फेलोशिप मिली. उन्होंने हांगकांग विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ लीगल साइंस की डिग्री भी हासिल की. इसके अलावा उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से LLB और लोयोला कॉलेज, यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास से BCom किया. भारत लौटकर JGU का नेतृत्व करने से पहले वह हांगकांग की सिटी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लॉ में फैकल्टी सदस्य रहे.
JGU के विस्तार में अहम भूमिका
JGU का विस्तार कुमार के नेतृत्व की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल है. विश्वविद्यालय ने 2009 में जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के जरिए छात्रों के पहले बैच का दाखिला लिया. इसके बाद विश्वविद्यालय ने कानून से आगे बढ़ते हुए बहुविषयक शिक्षा का मॉडल विकसित किया. इस दौरान अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग और शोध पर भी विशेष जोर दिया गया. 2020 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने JGU को ‘इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस’ के रूप में मान्यता दी.
कुमार ने जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई और इसके संस्थापक डीन के रूप में इसका नेतृत्व किया. JGLS ने भारतीय कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में अपनी पहचान बनाई है. यहां अकादमिक शिक्षा के साथ कानूनी पेशे से जुड़े विशेषज्ञों का अनुभव, अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और अलग-अलग विषयों के बीच तालमेल पर जोर दिया गया.
कॉरपोरेट लॉयरिंग एडवांसमेंट थ्रू इमर्शन एंड मेंटरिंग (CLAIM) कार्यक्रम जैसी पहल कुमार की उस सोच को दर्शाती हैं, जिसमें कानूनी शिक्षा को पेशेवर अभ्यास से जोड़ने पर जोर दिया गया.
शोध और लेखन में भी सक्रिय
संस्थान निर्माण के साथ-साथ कुमार ने अपने शोध और अकादमिक लेखन को भी जारी रखा. उन्होंने नौ पुस्तकों को लिखा, सह-लेखन किया, संपादित या सह-संपादित किया है. उनके नाम 200 से अधिक प्रकाशन भी हैं.
उनकी पुस्तकों में भ्रष्टाचार और मानवाधिकार, उच्च शिक्षा, कानूनी शिक्षा, शासन, आपदा प्रबंधन और भारतीय विश्वविद्यालयों के भविष्य जैसे विषयों पर चर्चा की गई है. उनका शोध भारत और विदेशों की कई पीयर-रिव्यू जर्नल्स और लॉ रिव्यू में प्रकाशित हुआ है.
उच्च शिक्षा की नीतियों पर भी सक्रिय भागीदारी
कुमार का शिक्षा से जुड़ाव विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने उच्च शिक्षा नीति, संस्थागत प्रशासन, अंतरराष्ट्रीयकरण, कानूनी शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन जैसे विषयों पर सार्वजनिक चर्चाओं में योगदान दिया है. उन्होंने कई प्रमुख प्रकाशनों के लिए लिखा है और भारतीय उच्च शिक्षा के भविष्य से जुड़े समकालीन मुद्दों पर लगातार अपनी राय रखते रहे हैं.
कई पुरस्कारों से सम्मानित
कुमार के कार्यों को कई संस्थानों ने सम्मानित किया है. उन्हें 2023 में डॉ. प्रीतम सिंह ट्रांसफॉर्मेशनल लीडर अवॉर्ड, शिक्षा के क्षेत्र में QIMPRO Gold Standard 2019 और मानवाधिकार एवं कानूनी शिक्षा में योगदान के लिए कैपिटल फाउंडेशन जस्टिस पीएन भगवती अवॉर्ड (Capital Foundation Justice PN Bhagwati Award) सहित कई सम्मान मिले हैं. हालांकि, कुमार का योगदान केवल पुरस्कारों और अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है. उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह दिखाना है कि स्पष्ट अकादमिक सोच, अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और लंबे समय की प्रतिबद्धता के साथ संस्थान निर्माण कितना प्रभावी हो सकता है.
भारत में एक वैश्विक विश्वविद्यालय की कल्पना से लेकर JGU को एक बहुविषयक संस्थान के रूप में विकसित करने तक, कुमार का करियर भारतीय उच्च शिक्षा की बदलती आकांक्षाओं से जुड़ा रहा है.
विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने की जगह नहीं
प्रोफेसर (डॉ.) सी राज कुमार की यात्रा यह याद दिलाती है कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं होते. अपनी बेहतर भूमिका में विश्वविद्यालय ज्ञान के निर्माण, जिज्ञासा को बढ़ावा देने, विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करने और युवाओं को तेजी से जटिल होती दुनिया के लिए तैयार करने के केंद्र होते हैं.