80 साल पुराने पारिवारिक कारोबार को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने से लेकर बिजनेस बेचकर नया उद्यम शुरू करने तक बदल रही सोच, TBA India ने भारत में शुरू किया बिजनेस ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत की उद्यमिता की कहानी अब सिर्फ कंपनी शुरू करने, रेवेन्यू बढ़ाने और कारोबार का विस्तार करने तक सीमित नहीं रह गई है. कारोबारियों के सामने अब एक बड़ा सवाल है- बिजनेस बनने के बाद उसका क्या किया जाए? क्या उसे अगली पीढ़ी को सौंपा जाए, किसी दूसरी कंपनी के साथ मिलाया जाए, बेचा जाए या उसकी वैल्यू बढ़ाकर निवेश और अधिग्रहण के लिए तैयार किया जाए? यही बदलाव भारत में ‘Business Economy in Transition’ की नई तस्वीर तैयार कर रहा है.
80 साल पुराने पारिवारिक कारोबार को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने से लेकर दशकों में खड़ी की गई कंपनी से एग्जिट लेने और उस पूंजी से नया उद्यम शुरू करने तक, भारतीय कारोबारी अब बिजनेस ट्रांजिशन, सक्सेशन, M&A और वैल्यू क्रिएशन पर पहले से ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. इसी उभरते अवसर को देखते हुए दुनिया की बड़ी बिजनेस ब्रोकरेज कंपनियों में शामिल Transworld Business Advisors (TBA) ने भारत में अपनी शुरुआत की है.
TBA India ने भारत में शुरू किया ऑपरेशन
TBA India के लॉन्च के साथ कंपनी ने भारतीय बाजार में औपचारिक शुरुआत की. कंपनी भारत में बिजनेस सेल और खरीद, मर्जर एंड एक्विजिशन (M&A), फ्रेंचाइजिंग, सक्सेशन प्लानिंग और वेल्थ क्रिएशन से जुड़े अवसरों पर काम करेगी. इसका लक्ष्य ऐसे कारोबारों को एक प्लेटफॉर्म से जोड़ना है, जो विस्तार, निवेश, अधिग्रहण या एग्जिट के विकल्प तलाश रहे हैं. TBA India के मुताबिक वह करीब 123.8 अरब डॉलर के भारतीय बिजनेस डील मार्केट को टारगेट कर रही है. कंपनी ₹5 करोड़ से ₹200 करोड़ या उससे अधिक सालाना टर्नओवर वाले कारोबारों पर खास फोकस कर रही है.
AI और टेक्नोलॉजी से जुड़ेगा खरीदार और कारोबारी
TBA India अपने प्रोपराइटरी CRM प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करेगी, जिसे AI के जरिए और बेहतर बनाया गया है. कंपनी के मुताबिक इस तकनीक को वैश्विक बाजारों में पहले ही इस्तेमाल किया जा चुका है. प्लेटफॉर्म का उद्देश्य कारोबार बेचने वालों और संभावित खरीदारों के बीच कनेक्शन स्थापित करने के साथ पूरी ट्रांजैक्शन प्रक्रिया को सपोर्ट करना है. इसमें बिजनेस की पहचान, संभावित खरीदारों से कनेक्शन, अधिग्रहण और ग्रोथ से जुड़े अवसरों को एक ही इकोसिस्टम में लाने की कोशिश की जाएगी.
‘भारत में उद्यमियों की कमी नहीं, संस्थान बनने वाले कारोबारों की कमी’
TBA के फाउंडर और चेयरपर्सन Ray Titus के मुताबिक भारत में उद्यमियों की कमी नहीं है, लेकिन ऐसे कारोबारों की कमी है जिन्हें संस्थान के रूप में विकसित किया गया हो. उनका कहना है कि TBA India का लक्ष्य भरोसेमंद कारोबारों, पूंजी, विशेषज्ञता और मजबूत कारोबारी रिश्तों को जोड़ना है, ताकि भारतीय कंपनियां सिर्फ आकार में बड़ी न हों बल्कि वैश्विक निवेश के लिए भी आकर्षक और अधिग्रहण के लिए तैयार बन सकें.
‘सफलता सिर्फ रेवेन्यू से नहीं मापी जानी चाहिए’
वसंत ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर यश वसंत ने कहा कि भारत की उद्यमिता की कहानी के लिए सबसे बड़ा खतरा असफलता नहीं है, बल्कि ऐसे सफल कारोबार हैं जो अपने संस्थापकों पर निर्भर बने रहते हैं. उनके मुताबिक अगर भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी है तो सफलता को केवल रेवेन्यू से नहीं मापा जा सकता. यह देखना भी जरूरी है कि कोई कारोबार कितनी स्वतंत्रता, स्थिरता और रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ सकता है.
तेजी से ग्रोथ के लिए अधिग्रहण बन सकता है बड़ा रास्ता
यश वसंत ने कहा भारतीय कंपनियों के विस्तार में आने वाले समय में अधिग्रहण की भूमिका भी बढ़ सकती है. सिर्फ ऑर्गेनिक ग्रोथ के जरिए किसी कारोबार को तेजी से बड़ा करने में लंबा समय लग सकता है. ऐसे में दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करके नए ग्राहक, नए बाजार, टेक्नोलॉजी या प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को तेजी से हासिल किया जा सकता है. इसी के साथ भारतीय कंपनियां खुद भी विदेशी या घरेलू रणनीतिक निवेशकों के लिए संभावित अधिग्रहण लक्ष्य बन सकती हैं. इससे भारत के MSME और मिड-साइज बिजनेस सेक्टर में M&A गतिविधियों के बढ़ने की संभावना बनती है.
बड़े शहरों से आगे छोटे शहरों पर भी नजर
यश वसंत ने बताया भारत में बिजनेस ट्रांजिशन का यह अवसर केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या अहमदाबाद जैसे बड़े कारोबारी केंद्रों तक सीमित नहीं है. छोटे और मझोले शहरों में भी बड़ी संख्या में पारिवारिक और उद्यमी कारोबार मौजूद हैं. TBA India फ्रेंचाइज मॉडल के जरिए भोपाल, रायपुर, भुवनेश्वर, सिलीगुड़ी, सेलम, त्रिची और तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों तक पहुंच बनाने की दिशा में काम कर रही है. इन शहरों में मौजूद कारोबारों के सामने भी विस्तार, उत्तराधिकार, बिक्री और अधिग्रहण से जुड़ी वही चुनौतियां हैं, जिनका सामना बड़े शहरों की कंपनियां कर रही हैं.
भारत में बिजनेस ट्रांजिशन का नया दौर
भारत का MSME और फैमिली बिजनेस इकोसिस्टम जैसे-जैसे परिपक्व होगा, कारोबारों की खरीद-बिक्री, M&A, फ्रेंचाइजिंग, सक्सेशन और स्ट्रैटेजिक एग्जिट की जरूरत भी बढ़ सकती है. यानी भारतीय उद्यमिता का अगला चरण सिर्फ ‘बिजनेस बनाना’ नहीं होगा. अब चुनौती ऐसे बिजनेस बनाने की है, जो संस्थापक से आगे भी टिके रहें, जिनकी वैल्यू लगातार बढ़े और जरूरत पड़ने पर उन्हें आसानी से ट्रांसफर, बेच या अधिग्रहित किया जा सके. TBA India की भारत में एंट्री इसी बदलते कारोबारी नजरिए और उभरते बिजनेस ट्रांजिशन मार्केट को भुनाने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है.
फैमिली बिजनेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती
यश ने बताया कि भारत में बड़ी संख्या में कारोबार पारिवारिक स्वामित्व वाले हैं. पहली पीढ़ी कारोबार खड़ा करती है और दूसरी या तीसरी पीढ़ी उसे आगे बढ़ाती है. लेकिन बदलती पीढ़ी के साथ यह मॉडल भी चुनौती का सामना कर रहा है. कई मामलों में अगली पीढ़ी पारिवारिक कारोबार में शामिल नहीं होना चाहती. वहीं पहली पीढ़ी भावनात्मक कारणों से दशकों पुराने कारोबार को बेचने के लिए तैयार नहीं होती. ऐसे में सवाल उठता है कि 50, 70 या 80 साल में बनाई गई कारोबारी विरासत का क्या किया जाए. यहीं पर सक्सेशन प्लानिंग, बिजनेस सेल, M&A और स्ट्रैटेजिक एग्जिट जैसे विकल्प महत्वपूर्ण हो जाते हैं. कारोबार को बेचकर उससे मिली पूंजी का इस्तेमाल अगली पीढ़ी नया बिजनेस शुरू करने या किसी दूसरे क्षेत्र में निवेश करने के लिए भी कर सकती है.
1989 में शुरू हुआ कारोबार अब कई विदेशी बाजारों तक पहुंचा, DGFT से Star Export House का दर्जा; मैन्युफैक्चरिंग, प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट को एक साथ रखने पर कंपनी का जोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पुणे से शुरू हुआ एक पारिवारिक स्टोन कारोबार पिछले तीन दशकों में घरेलू बाजार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा है. Petros Stone LLP की शुरुआत 1989 में हुई थी और आज कंपनी ग्रेनाइट, मार्बल और क्वार्ट्ज जैसे नेचुरल स्टोन के प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट कारोबार में सक्रिय है. कंपनी के मुताबिक, उसके उत्पाद 50 से अधिक देशों तक पहुंच चुके हैं और वह अब तक 1,000 से ज्यादा कंटेनर एक्सपोर्ट कर चुकी है.
कंपनी को भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के तहत डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) से Star Export House का दर्जा भी मिला है. यह मान्यता निर्धारित निर्यात प्रदर्शन के आधार पर दी जाती है. ऐसे में Petros Stone का विस्तार सिर्फ घरेलू कारोबार बढ़ाने की कहानी नहीं, बल्कि एक पारंपरिक फैमिली बिजनेस के धीरे-धीरे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड मॉडल में बदलने का उदाहरण भी है.
1989 में शुरू हुआ सफर
Petros Stone की जड़ें 1989 तक जाती हैं. कारोबार की शुरुआत पुणे से हुई और समय के साथ कंपनी ने नेचुरल स्टोन की खरीद, प्रोसेसिंग और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई पर अपना फोकस बढ़ाया. मौजूदा समय में कंपनी का संचालन विक्रम जैन, ऋषभ जैन और वंश जैन की टीम कर रही है. कंपनी ने पारंपरिक स्टोन कारोबार के साथ मैन्युफैक्चरिंग तकनीक और एक्सपोर्ट ऑपरेशंस को जोड़ने की कोशिश की है.
इस बदलाव का असर कंपनी के बिजनेस मॉडल में भी दिखाई देता है. केवल स्टोन ट्रेडिंग पर निर्भर रहने के बजाय कंपनी ने सोर्सिंग, प्रोसेसिंग, फैब्रिकेशन और एक्सपोर्ट को एक ही सप्लाई चेन में रखने पर जोर दिया है.
DGFT से Star Export House की मान्यता
Petros Stone LLP को DGFT की ओर से Star Export House सर्टिफिकेट मिला है. यह दर्जा Foreign Trade Policy 2023 के तहत निर्धारित निर्यात प्रदर्शन को पूरा करने वाले कारोबारों को दिया जाता है. Star Export House का दर्जा किसी प्रतिस्पर्धी अवॉर्ड या मार्केटिंग रैंकिंग की तरह नहीं है. यह निर्यात प्रदर्शन से जुड़ी सरकारी मान्यता है. इसका आधार कंपनी के निर्धारित निर्यात आंकड़े होते हैं.
कंपनी के पास ISO 9001:2015, ISO 14001, CE मार्किंग, CAPEXIL रजिस्ट्रेशन और अन्य व्यावसायिक प्रमाणन भी हैं. हालांकि, इन प्रमाणनों की उपयोगिता अलग-अलग बाजारों और खरीदारों की जरूरतों पर निर्भर करती है.
ट्रेडिंग से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग पर जोर
नेचुरल स्टोन कारोबार में किसी कंपनी की भूमिका केवल पत्थर की खरीद और बिक्री तक सीमित नहीं रहती. क्वारी से लेकर कटिंग, पॉलिशिंग, फैब्रिकेशन और अंतिम डिलीवरी तक कई चरण होते हैं. Petros Stone ने इसी सप्लाई चेन के कई हिस्सों को अपने ऑपरेशंस में शामिल किया है. कंपनी के अनुसार, उसकी प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां उदयपुर, किशनगढ़, हैदराबाद और होसुर जैसे प्रमुख स्टोन कारोबार केंद्रों से जुड़ी हैं.
इस मॉडल का एक फायदा यह है कि स्टोन की प्रोसेसिंग और फैब्रिकेशन पर ज्यादा नियंत्रण रखा जा सकता है. खासकर विदेशी प्रोजेक्ट्स में जहां खरीदार को केवल कच्चे स्लैब के बजाय तय आकार और स्पेसिफिकेशन के मुताबिक तैयार सामग्री चाहिए होती है, वहां यह मॉडल महत्वपूर्ण हो जाता है.
50 से अधिक देशों तक पहुंच
कंपनी के मुताबिक, उसके उत्पाद 50 से ज्यादा देशों में एक्सपोर्ट किए गए हैं. इनमें मध्य पूर्व, यूरोप, अमेरिका, एशिया और अन्य बाजार शामिल हैं.
अंतरराष्ट्रीय कारोबार में कंपनी की मौजूदगी को कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स के संदर्भ में भी देखा जा सकता है. इनमें मालदीव्स के प्राइवेट आइलैंड रिजॉर्ट, भूटान का एक मठ, लातविया का स्पा-होटल और मियामी का एक फाइव-स्टार होटल शामिल हैं.
इन प्रोजेक्ट्स में अलग-अलग मौसम, उपयोग और डिजाइन जरूरतों के मुताबिक स्टोन की प्रोसेसिंग की गई. उदाहरण के लिए, समुद्री वातावरण वाले प्रोजेक्ट्स में स्टोन की टिकाऊपन और स्लिप रेजिस्टेंस महत्वपूर्ण हो जाती है, जबकि होटल और लक्जरी इंटीरियर प्रोजेक्ट्स में कटिंग, फिनिश और पैटर्न की एकरूपता पर अधिक ध्यान देना पड़ता है.
अलग-अलग बाजार, अलग-अलग जरूरतें
कंपनी द्वारा बताए गए प्रोजेक्ट्स यह भी दिखाते हैं कि नेचुरल स्टोन एक्सपोर्ट केवल एक सामान्य कमोडिटी कारोबार नहीं रह गया है. विदेशी बाजारों में इस्तेमाल होने वाले स्टोन को स्थानीय मौसम, डिजाइन और निर्माण मानकों के अनुरूप तैयार करना पड़ता है.
मालदीव्स के एक प्रोजेक्ट में लाइमस्टोन के लिए विशेष फिनिशिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया. भूटान के एक प्रोजेक्ट में एंटी-स्किड ब्लैक स्लेट सॉल्यूशन तैयार किया गया. वहीं लातविया के स्पा-होटल प्रोजेक्ट में ठंडे मौसम के अनुरूप स्टोन पैनल्स और इंटीरियर बेसिन तैयार किए गए.
मियामी के एक होटल प्रोजेक्ट में कंपनी के अनुसार करीब 108,500 वर्ग मीटर पैटागोनिया क्वार्टज़ाइट की सप्लाई 220 कंटेनरों के जरिए की गई. यह बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट सप्लाई की क्षमता को दर्शाता है, हालांकि ऐसे दावों का स्वतंत्र सत्यापन कंपनी के बाहर के स्रोतों से अलग विषय है.
अब अगला फोकस वैल्यू-एडेड एक्सपोर्ट पर
भारतीय स्टोन इंडस्ट्री लंबे समय से बड़ी मात्रा में नेचुरल स्टोन के उत्पादन और निर्यात के लिए जानी जाती है. हालांकि, वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा अब केवल कच्चे माल की कीमत तक सीमित नहीं है. डिजाइन, प्रोसेसिंग, ट्रेसिबिलिटी और समय पर डिलीवरी भी खरीदारों के फैसले में भूमिका निभाते हैं.
Petros Stone की आगे की रणनीति भी इसी बदलाव से जुड़ी दिखाई देती है. कंपनी प्रीमियम स्टोन की डायरेक्ट और ब्लॉक-लेवल सोर्सिंग, खासकर इटली के टस्कनी क्षेत्र से, पर काम कर रही है. इसका उद्देश्य सोर्सिंग प्रक्रिया में बिचौलियों को कम करना और मटीरियल की ट्रेसिबिलिटी बढ़ाना है.
पारंपरिक कारोबार का बदलता मॉडल
Petros Stone का करीब तीन दशक से ज्यादा का सफर यह दिखाता है कि पारंपरिक फैमिली बिजनेस भी समय के साथ अपने ऑपरेटिंग मॉडल में बदलाव कर सकते हैं. स्थानीय बाजार से शुरुआत, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का विस्तार और फिर अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स पर फोकस ने कंपनी के कारोबार की दिशा बदली है.
Star Export House की सरकारी मान्यता और कई देशों में मौजूदगी इस विस्तार के प्रमुख पड़ाव हैं. हालांकि, ग्लोबल बाजार में लंबे समय तक टिके रहने के लिए कंपनी को लॉजिस्टिक्स लागत, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों, मुद्रा उतार-चढ़ाव और अलग-अलग देशों के निर्माण मानकों जैसी चुनौतियों से लगातार निपटना होगा.
यही वजह है कि Petros Stone की कहानी को केवल एक स्टोन ब्रांड की सफलता के तौर पर देखने के बजाय, एक पारंपरिक भारतीय मैन्युफैक्चरिंग कारोबार के एक्सपोर्ट-फोकस्ड बिजनेस में बदलने की प्रक्रिया के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा.
इस सप्ताह आने वाले मेनबोर्ड IPO में पर्पल स्टाइल लैब्स का इश्यू सबसे बड़ा है. कंपनी IPO के जरिए करीब ₹680 करोड़ जुटाने की योजना बना रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्राइमरी मार्केट में इस हफ्ते भी जबरदस्त हलचल रहने वाली है. पिछले हफ्ते कई बड़े इश्यू आने के बाद अब नए सप्ताह में भी निवेशकों के लिए प्राइमरी मार्केट में कई मौके खुलने जा रहे हैं. 31 अगस्त से शुरू हो रहे इस सप्ताह में कुल 7 कंपनियां IPO के जरिए बाजार से पूंजी जुटाने की तैयारी में हैं. इनमें 3 मेनबोर्ड और 4 SME IPO शामिल हैं. इन सातों कंपनियों के इश्यू से कुल ₹1,400 करोड़ से ज्यादा रकम जुटने की उम्मीद है. मेनबोर्ड सेगमेंट में पर्पल स्टाइल लैब्स सबसे बड़ा IPO होगा, जबकि दीपा ज्वैलर्स और रेज ऑफ बिलीफ भी निवेशकों के लिए बाजार में उतरेंगी.
पर्पल स्टाइल लैब्स का IPO सबसे बड़ा
इस सप्ताह आने वाले मेनबोर्ड IPO में पर्पल स्टाइल लैब्स का इश्यू सबसे बड़ा है. कंपनी IPO के जरिए करीब ₹680 करोड़ जुटाने की योजना बना रही है. इसका IPO 31 अगस्त से 2 सितंबर तक खुला रहेगा. इसके बाद दीपा ज्वैलर्स का नंबर है, जिसका इश्यू 1 सितंबर से 3 सितंबर तक खुला रहेगा. कंपनी करीब ₹459.7 करोड़ जुटाने की तैयारी में है. वहीं रेज ऑफ बिलीफ का IPO भी 1 से 3 सितंबर के बीच सब्सक्रिप्शन के लिए खुला रहेगा और इसके जरिए करीब ₹125 करोड़ जुटाने की योजना है. तीनों मेनबोर्ड IPO से कुल करीब ₹1,264.7 करोड़ जुटाने की योजना है.
SME सेगमेंट में 4 कंपनियां उतरेंगी
SME सेगमेंट में भी इस सप्ताह चार कंपनियां IPO लेकर आ रही हैं. फाइकेम टेक्नोलॉजीज, शांति इनऑर्गेनिक्स और आशुतोष फाइबर के IPO 31 अगस्त से 2 सितंबर तक खुले रहेंगे. वहीं फार्म पीस का इश्यू 1 सितंबर से 3 सितंबर तक सब्सक्रिप्शन के लिए उपलब्ध रहेगा.
चारों SME IPO के जरिए कुल करीब ₹142.6 करोड़ जुटाने की योजना है.
इस हफ्ते खुलने वाले IPO पर नजर
कंपनी सेगमेंट IPO की अवधि जुटाई जाने वाली रकम
पर्पल स्टाइल लैब्स मेनबोर्ड 31 अगस्त-2 सितंबर ₹680 करोड़
दीपा ज्वैलर्स मेनबोर्ड 1-3 सितंबर ₹459.7 करोड़
रेज ऑफ बिलीफ मेनबोर्ड 1-3 सितंबर ₹125 करोड़
फाइकेम टेक्नोलॉजीज SME 31 अगस्त-2 सितंबर ₹13.8 करोड़
शांति इनऑर्गेनिक्स SME 31 अगस्त-2 सितंबर ₹44.9 करोड़
आशुतोष फाइबर SME 31 अगस्त-2 सितंबर ₹53.5 करोड़
फार्म पीस SME 1-3 सितंबर ₹30.4 करोड़
मेनबोर्ड और SME सेगमेंट को मिलाकर इन सात IPO के जरिए करीब ₹1,407 करोड़ जुटाने की योजना है.
पिछले हफ्ते भी रहा IPO का जलवा
इससे पहले पिछले सप्ताह प्राइमरी मार्केट में 6 मेनबोर्ड और 7 SME IPO आए थे. इन इश्यू के जरिए कंपनियों ने कुल मिलाकर ₹4,447 करोड़ से ज्यादा जुटाए थे. इससे साफ है कि 2026 में IPO बाजार में कंपनियों की दिलचस्पी लगातार बनी हुई है.
इस सप्ताह इन IPO की होगी क्लोजिंग और लिस्टिंग
पिछले सप्ताह खुले तीन मेनबोर्ड IPO-प्रायोरिटी ज्वैल्स, ESDS सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस और ल्यूमिनो इंडस्ट्रीज-इस सप्ताह बंद होंगे. वहीं, ऑगमॉन्ट एंटरप्राइजेज, हाई-टेक इंजीनियर्स, स्काईवेज एयर सर्विसेज, सिम्बायोटेक फार्मालैब और अन्नू प्रोजेक्ट्स के IPO पिछले सप्ताह पूरे हो चुके हैं. इन कंपनियों के शेयरों की लिस्टिंग इस सप्ताह होने की उम्मीद है.
SME सेगमेंट में पलक टेक्नोलॉजीज, कम्प्लीट स्पोर्ट्स एंड मैनेजमेंट इंडिया और क्विक फोरेंसिक सॉल्यूशंस के IPO इस सप्ताह बंद होंगे. वहीं सुमैक्स इंजीनियरिंग, ABH हेल्थकेयर और मधुर निट क्राफ्ट्स की लिस्टिंग भी इसी सप्ताह होनी है.
ऊंचे वैल्यूएशन पर प्रमोटर्स और PE निवेशकों ने बेची हिस्सेदारी, म्यूचुअल फंड और इंश्योरेंस कंपनियों ने बढ़ी सप्लाई को खरीदा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अगस्त में भारतीय शेयर बाजार में बड़े ब्लॉक और बल्क डील्स की जोरदार गतिविधि देखने को मिली. इस महीने कम से कम ₹80,000 करोड़ के ब्लॉक और बल्क ट्रेड हुए हैं, जो जून 2025 के बाद किसी एक महीने में सबसे ज्यादा हैं. मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में तेजी और ऊंचे वैल्यूएशन के बीच प्रमोटर्स और प्राइवेट इक्विटी निवेशकों ने अपनी हिस्सेदारी घटाई, वहीं घरेलू म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस कंपनियों, पेंशन फंड और विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इन शेयरों की बढ़ी हुई सप्लाई को खरीदा.
जुलाई के मुकाबले 65% से ज्यादा बढ़े बड़े सौदे
अगस्त में हुए ब्लॉक और बल्क डील्स का आंकड़ा जुलाई के करीब ₹48,500 करोड़ के मुकाबले काफी अधिक है. यानी एक महीने में बड़े सौदों की वैल्यू में करीब 65 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. बाजार में इस तरह की गतिविधि को मजबूत लिक्विडिटी और ऊंचे वैल्यूएशन का संकेत माना जाता है.
अगस्त के दौरान कई बड़ी कंपनियों में प्रमोटर्स, फाउंडर्स और प्राइवेट इक्विटी निवेशकों ने हिस्सेदारी बेची. इनमें एस्टर डीएम क्वालिटी केयर, वन97 कम्युनिकेशंस, लेन्सकार्ट सॉल्यूशंस, एवेन्यू सुपरमार्ट्स और अन्य कंपनियां शामिल हैं.
इन कंपनियों में हुई बड़ी हिस्सेदारी बिक्री
सेंटेला मॉरीशस होल्डिंग्स ने एस्टर डीएम क्वालिटी केयर में 6.67 फीसदी हिस्सेदारी करीब ₹4,451 करोड़ में बेची. वहीं पेटीएम के फाउंडर और CEO विजय शेखर शर्मा के नियंत्रण वाली रेसिलिएंट एसेट मैनेजमेंट ने वन97 कम्युनिकेशंस में करीब 3 फीसदी हिस्सेदारी ₹2,949 करोड़ में बेची.
इसके अलावा अगस्त में हुए प्रमुख सौदों में:
1. सॉफ्टबैंक विजन फंड II लाइटबल्ब (केमैन) ने लेन्सकार्ट सॉल्यूशंस में करीब 2.6 फीसदी हिस्सेदारी ₹2,888 करोड़ में बेची.
2. अमेरिकन फंड्स इंश्योरेंस सीरीज ग्लोबल ग्रोथ एंड इनकम फंड ने एवेन्यू सुपरमार्ट्स में 1.04 फीसदी हिस्सेदारी ₹2,537 करोड़ में बेची.
3. जनरल अटलांटिक सिंगापुर RR Pte ने रुबिकॉन रिसर्च में करीब ₹2,300 करोड़ के शेयर बेचे.
4. रिबिट कैपिटल V और रिबिट केमैन GW होल्डिंग्स V ने बिलियनब्रेन्स गैराज वेंचर्स में कुल ₹2,217 करोड़ के शेयर बेचे.
5. SAIF III मॉरीशस कंपनी, SAIF पार्टनर्स इंडिया IV और एलिवेशन कैपिटल V ने पेटीएम के करीब ₹2,038 करोड़ के शेयर बेचे.
6. एलिवेशन कैपिटल V और पीक XV पार्टनर्स इन्वेस्टमेंट्स V ने मीशो में ₹1,949 करोड़ के शेयर बेचे.
7. वेल्सपन कॉर्प में ₹1,433 करोड़ और वियाश साइंटिफिक में ₹1,259 करोड़ की हिस्सेदारी की बिक्री हुई.
8. लाइट्सपीड अपॉर्चुनिटी फंड II ने फिजिक्सवाला में अपनी पूरी 1.61 फीसदी हिस्सेदारी करीब ₹550 करोड़ में बेच दी.
मई-अगस्त के बीच ₹2.51 लाख करोड़ के सौदे
ब्लॉक और बल्क डील्स की रफ्तार अगस्त के दूसरे हिस्से में और तेज हुई. मई से अगस्त के बीच कुल ₹2.51 लाख करोड़ की ब्लॉक और बल्क डील हुईं. यह जनवरी से अप्रैल के बीच हुए करीब ₹1.25 लाख करोड़ के सौदों के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है. 2026 में अब तक कुल ₹3.77 लाख करोड़ की 9,754 ब्लॉक और बल्क डील हो चुकी हैं. इसकी तुलना में पूरे 2025 में ₹5.85 लाख करोड़ की 14,926 डील हुई थीं.
ऊंचे वैल्यूएशन में क्यों बढ़ती हैं ब्लॉक डील?
ब्लॉक और बल्क डील की गतिविधि आमतौर पर तब बढ़ती है, जब बाजार में वैल्यूएशन ऊंचे हों और लिक्विडिटी मजबूत हो. ऐसे माहौल में प्रमोटर्स, प्राइवेट इक्विटी निवेशक और अन्य बड़े शेयरधारक बिना शेयर की कीमतों में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव पैदा किए अपनी हिस्सेदारी बेचकर मुनाफा कमा सकते हैं या निवेश से बाहर निकल सकते हैं.
अगस्त में ब्लॉक और बल्क डील्स का बढ़ना इसी ट्रेंड की ओर इशारा करता है. एक तरफ बड़े निवेशकों ने ऊंचे स्तर पर हिस्सेदारी घटाई, तो दूसरी ओर संस्थागत निवेशकों ने बाजार में उपलब्ध शेयरों की इस अतिरिक्त सप्लाई को सोख लिया.
सी राज कुमार की यात्रा केवल एक विश्वविद्यालय के निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत में उच्च शिक्षा को वैश्विक स्तर पर ले जाने की सोच और प्रयासों की कहानी भी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में उच्च शिक्षा का क्षेत्र तेजी से बदल रहा है. ऐसे में प्रोफेसर (डॉ.) सी राज कुमार उन चुनिंदा शिक्षाविदों में शामिल हैं, जिन्होंने वैश्विक सोच के साथ एक संस्थान को शुरुआत से खड़ा करने की कोशिश की. ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी (JGU) के संस्थापक कुलपति और जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल (JGLS) के संस्थापक डीन के तौर पर कुमार ने एक ऐसे संस्थान को आकार देने में अहम भूमिका निभाई, जिसमें अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण, बहुविषयक शिक्षा, शोध और अकादमिक उत्कृष्टता को केंद्र में रखा गया.
रोड्स स्कॉलर और प्रतिष्ठित कानूनी विद्वान कुमार को 2009 में 34 वर्ष की उम्र में JGU का कुलपति नियुक्त किया गया था. उसी वर्ष विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी. संस्थान के साथ उनका जुड़ाव एक विचार से शुरू हुआ था, भारत में एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाना जो वास्तव में वैश्विक स्तर का हो. समय के साथ यह सोच JGU के रूप में सामने आई. आज यह कानून, बिजनेस, अंतरराष्ट्रीय मामलों, सार्वजनिक नीति, लिबरल आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज, पत्रकारिता और संचार, कला एवं वास्तुकला, बैंकिंग एवं फाइनेंस तथा पर्यावरण एवं स्थिरता जैसे क्षेत्रों में शिक्षा देने वाला एक बहुविषयक संस्थान बन चुका है.
कुमार के लिए संस्थान का निर्माण उच्च शिक्षा की समाज में भूमिका को लेकर उनकी व्यापक सोच से जुड़ा रहा है. उनके अकादमिक कार्यों में मानवाधिकार और विकास, तुलनात्मक संवैधानिक कानून, आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा, भ्रष्टाचार और शासन, आपदा प्रबंधन, कानूनी शिक्षा और उच्च शिक्षा जैसे विषय शामिल रहे हैं. उनके शोध में केवल कानूनी मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि संस्थानों, शासन और समाज के बीच संबंधों पर भी ध्यान दिया गया है.
अंतरराष्ट्रीय रहा अकादमिक सफर
कुमार की शिक्षा और अकादमिक यात्रा भी अंतरराष्ट्रीय रही है. उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ सिविल लॉ की पढ़ाई की, जहां वह रोड्स स्कॉलर रहे. इसके बाद उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूल से LLM किया, जहां उन्हें लैंडन गैमन फेलोशिप मिली. उन्होंने हांगकांग विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ लीगल साइंस की डिग्री भी हासिल की. इसके अलावा उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से LLB और लोयोला कॉलेज, यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास से BCom किया. भारत लौटकर JGU का नेतृत्व करने से पहले वह हांगकांग की सिटी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लॉ में फैकल्टी सदस्य रहे.
JGU के विस्तार में अहम भूमिका
JGU का विस्तार कुमार के नेतृत्व की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल है. विश्वविद्यालय ने 2009 में जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के जरिए छात्रों के पहले बैच का दाखिला लिया. इसके बाद विश्वविद्यालय ने कानून से आगे बढ़ते हुए बहुविषयक शिक्षा का मॉडल विकसित किया. इस दौरान अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग और शोध पर भी विशेष जोर दिया गया. 2020 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने JGU को ‘इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस’ के रूप में मान्यता दी.
कुमार ने जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई और इसके संस्थापक डीन के रूप में इसका नेतृत्व किया. JGLS ने भारतीय कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में अपनी पहचान बनाई है. यहां अकादमिक शिक्षा के साथ कानूनी पेशे से जुड़े विशेषज्ञों का अनुभव, अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और अलग-अलग विषयों के बीच तालमेल पर जोर दिया गया.
कॉरपोरेट लॉयरिंग एडवांसमेंट थ्रू इमर्शन एंड मेंटरिंग (CLAIM) कार्यक्रम जैसी पहल कुमार की उस सोच को दर्शाती हैं, जिसमें कानूनी शिक्षा को पेशेवर अभ्यास से जोड़ने पर जोर दिया गया.
शोध और लेखन में भी सक्रिय
संस्थान निर्माण के साथ-साथ कुमार ने अपने शोध और अकादमिक लेखन को भी जारी रखा. उन्होंने नौ पुस्तकों को लिखा, सह-लेखन किया, संपादित या सह-संपादित किया है. उनके नाम 200 से अधिक प्रकाशन भी हैं.
उनकी पुस्तकों में भ्रष्टाचार और मानवाधिकार, उच्च शिक्षा, कानूनी शिक्षा, शासन, आपदा प्रबंधन और भारतीय विश्वविद्यालयों के भविष्य जैसे विषयों पर चर्चा की गई है. उनका शोध भारत और विदेशों की कई पीयर-रिव्यू जर्नल्स और लॉ रिव्यू में प्रकाशित हुआ है.
उच्च शिक्षा की नीतियों पर भी सक्रिय भागीदारी
कुमार का शिक्षा से जुड़ाव विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने उच्च शिक्षा नीति, संस्थागत प्रशासन, अंतरराष्ट्रीयकरण, कानूनी शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन जैसे विषयों पर सार्वजनिक चर्चाओं में योगदान दिया है. उन्होंने कई प्रमुख प्रकाशनों के लिए लिखा है और भारतीय उच्च शिक्षा के भविष्य से जुड़े समकालीन मुद्दों पर लगातार अपनी राय रखते रहे हैं.
कई पुरस्कारों से सम्मानित
कुमार के कार्यों को कई संस्थानों ने सम्मानित किया है. उन्हें 2023 में डॉ. प्रीतम सिंह ट्रांसफॉर्मेशनल लीडर अवॉर्ड, शिक्षा के क्षेत्र में QIMPRO Gold Standard 2019 और मानवाधिकार एवं कानूनी शिक्षा में योगदान के लिए कैपिटल फाउंडेशन जस्टिस पीएन भगवती अवॉर्ड (Capital Foundation Justice PN Bhagwati Award) सहित कई सम्मान मिले हैं. हालांकि, कुमार का योगदान केवल पुरस्कारों और अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है. उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह दिखाना है कि स्पष्ट अकादमिक सोच, अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और लंबे समय की प्रतिबद्धता के साथ संस्थान निर्माण कितना प्रभावी हो सकता है.
भारत में एक वैश्विक विश्वविद्यालय की कल्पना से लेकर JGU को एक बहुविषयक संस्थान के रूप में विकसित करने तक, कुमार का करियर भारतीय उच्च शिक्षा की बदलती आकांक्षाओं से जुड़ा रहा है.
विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने की जगह नहीं
प्रोफेसर (डॉ.) सी राज कुमार की यात्रा यह याद दिलाती है कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं होते. अपनी बेहतर भूमिका में विश्वविद्यालय ज्ञान के निर्माण, जिज्ञासा को बढ़ावा देने, विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करने और युवाओं को तेजी से जटिल होती दुनिया के लिए तैयार करने के केंद्र होते हैं.
डॉ. अन्नुराग बत्रा ने बताया है कि HDFC Bank के अगले CEO के लिए बैंकिंग का लंबा अनुभव ज्यादा जरूरी है या मजबूत नेतृत्व क्षमता, टेक्नोलॉजी की समझ और लोगों को साथ लेकर चलने की काबिलियत अधिक महत्वपूर्ण होगी.
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डॉ. अनुराग बत्रा
किसी बड़े संगठन के लिए CEO ढूंढना कभी आसान काम नहीं रहा है. दशकों में बने ऐसे संस्थान के लिए नेतृत्वकर्ता ढूंढना, जिसके लाखों ग्राहक, हजारों कर्मचारी और वर्षों में बनी प्रतिष्ठा हो, चुनौती को और भी बड़ा बना देता है. और ऐसा लगता है कि कॉरपोरेट भारत इस चुनौती का सामना पहले की तुलना में अधिक बार कर रहा है.
हाल के हफ्तों में, देश के कुछ सबसे बड़े संगठनों में नेतृत्व परिवर्तन और उत्तराधिकार से जुड़े सवाल सामने आए हैं. Godrej पहले ही एक आंतरिक उत्तराधिकारी की पहचान कर चुका है, जबकि Tata Sons के अगले नेता की तलाश लगातार ध्यान आकर्षित कर रही है. अब HDFC Bank भी इस चर्चा में शामिल हो गया है, जहां शशिधर जगदीशन ने MD & CEO के पद से रिटायर होने और दोबारा नियुक्ति की मांग नहीं करने का फैसला किया है.
ऐसे हर प्रस्थान के साथ तुरंत एक अपरिहार्य सवाल उठता है: पदभार किसे संभालना चाहिए?
परंपरागत रूप से, इसका जवाब काफी अनुमानित होता. तलाश वरिष्ठ बैंकरों के बीच शुरू होती, संभवतः ऐसे लोगों के बीच जो 40 के दशक के आखिरी या 50 के दशक में हों, जिनके पास बैंकिंग का दशकों का अनुभव हो, नियमन की मजबूत समझ हो और वित्तीय प्रणाली के साथ स्थापित संबंध हों. लेकिन शायद अब यह पूछने का समय आ गया है कि क्या यही नेतृत्व का एकमात्र मॉडल है, जिसकी बड़े संस्थानों को जरूरत है.
क्या CEO को बैंकिंग के बारे में सब कुछ जानना जरूरी है?
HDFC Bank को ही लें. बैंक के पास पहले से ही एक मजबूत फ्रेंचाइजी है. उसके पास एक बड़ा और वफादार ग्राहक आधार, कॉरपोरेट ग्राहकों के साथ गहरे संबंध, अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म, अनुभवी कर्मचारी और एक अच्छी तरह स्थापित पदानुक्रम है. यह ऐसा संगठन नहीं है जो किसी व्यक्ति के आकर इसे बनाने का इंतजार कर रहा हो.
अगले CEO को एक बेहद विकसित संस्थान विरासत में मिलेगा. चुनौती यह होगी कि जो बनाया गया है, उसकी रक्षा की जाए, उसे और मजबूत किया जाए और बैंक को विकास के अगले चरण के लिए तैयार किया जाए. यह एक दिलचस्प सवाल उठाता है: क्या CEO जरूरी तौर पर वही व्यक्ति होना चाहिए जो बैंकिंग के बारे में सबसे ज्यादा जानता हो?
इसका जवाब शायद तेजी से ‘नहीं’ हो सकता है.
किसी बड़े संगठन में CEO की भूमिका काफी बदल गई है. उसके लिए कारोबार के हर पहलू का विशेषज्ञ होना संभव नहीं है. क्रेडिट, जोखिम, ट्रेजरी, टेक्नोलॉजी, अनुपालन, कानूनी, रिटेल बैंकिंग और कॉरपोरेट बैंकिंग के विशेषज्ञ मौजूद हैं. CEO की वास्तविक जिम्मेदारी इन सभी क्षमताओं को एक साथ लाना और यह सुनिश्चित करना है कि संगठन एक दिशा में आगे बढ़े.
CEO एक ‘ग्रेट इंटीग्रेटर’ के रूप में
आज CEO की भूमिका तेजी से संबंधों, लोगों और परस्पर प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं के प्रबंधन से जुड़ती जा रही है. बैंक में इसका मतलब वित्त मंत्रालय और RBI के साथ रचनात्मक संबंध बनाए रखना, शेयरधारकों और निवेशकों की चिंताओं को समझना, संस्थान के सबसे बड़े ग्राहकों के साथ जुड़ना, टेक्नोलॉजी और कोर टीमों को दिशा देना और सबसे बढ़कर ऐसा माहौल बनाना है, जिसमें लोग आत्मविश्वास के साथ फैसले ले सकें.
मेरी व्यक्तिगत राय में, सबसे मजबूत CEO जरूरी नहीं कि वे हों जो अपनी शक्ति या पद को लेकर अधिकार जताते हों. वे वे लोग होते हैं जो यह समझते हैं कि उनका काम खुद को संस्थान के लिए अपरिहार्य बनाना नहीं, बल्कि एक बेहतरीन संस्थान तैयार करना है.
वे मजबूत टीमें बनाते हैं, लोगों को सशक्त बनाते हैं और सक्षम अधिकारियों को संगठन के सर्वोत्तम हित में निर्णय लेने की स्वतंत्रता देते हैं. जब ऐसा होता है, तो एक उल्लेखनीय चीज सामने आती है: नंबर 1 के पद से हटने के लिए तैयार होने से पहले ही उत्तराधिकारी उभरने लगते हैं.
शायद, यही CEO की सफलता के वास्तविक पैमानों में से एक है.
युवा पीढ़ी पर नजर क्यों नहीं?
यहीं से युवा नेतृत्व को लेकर बातचीत दिलचस्प हो जाती है. शायद अब बोर्ड के लिए पारंपरिक वरिष्ठ बैंकरों के समूह से आगे देखने और मजबूत प्रशासनिक, तकनीकी और प्रबंधकीय क्षमताओं वाले युवा नेताओं पर विचार करने का समय आ गया है. यहां तक कि Gen Z पीढ़ी के किसी व्यक्ति पर विचार करने का विचार, भले ही उकसाने वाला हो, बहस के लायक है.
स्वाभाविक रूप से तत्काल प्रतिक्रिया होगी: क्या इतनी कम उम्र का व्यक्ति HDFC Bank जैसे बड़े बैंक को चला सकता है?
लेकिन शायद यह गलत सवाल है.
बेहतर सवाल यह है: हम CEO से आखिर क्या करने की उम्मीद करते हैं?
अगर उम्मीद यह है कि CEO को व्यक्तिगत रूप से हर बैंकिंग उत्पाद, हर नियामकीय प्रावधान, हर टेक्नोलॉजी आर्किटेक्चर और हर परिचालन विवरण को समझना चाहिए, तो जाहिर तौर पर अनुभव अपरिहार्य हो जाता है. लेकिन अगर उम्मीद यह है कि CEO नेतृत्व प्रदान करे, सही निर्णय ले, विश्वास बनाए, हितधारकों का प्रबंधन करे और संगठन के सर्वश्रेष्ठ दिमागों को एक साथ लाए, तो समीकरण बदल जाता है.
एक युवा CEO को सब कुछ जानने की जरूरत नहीं होगी. उसे यह जानने की जरूरत होगी कि कौन क्या जानता है और उस ज्ञान को एक साथ कैसे लाया जाए.
टेक्नोलॉजी अनुभव की अहमियत बदल रही है
बैंकिंग भी ऐसी गति से बदल रही है, जिसकी एक पीढ़ी पहले कल्पना करना मुश्किल होता.
टेक्नोलॉजी ने बैंकों के संचालन के तरीके को पहले ही बदल दिया है और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस बदलाव को और तेज कर रहा है. जो ज्ञान हासिल करने में कभी वर्षों लगते थे, वह अब तेजी से एक क्लिक पर उपलब्ध है. कानून, नियम, RBI के सर्कुलर, दिशानिर्देश, अनुपालन संबंधी आवश्यकताएं और केस लॉ को लगभग तुरंत एक्सेस और विश्लेषित किया जा सकता है.
आज एक अपेक्षाकृत जूनियर कर्मचारी उस जानकारी तक पहुंच सकता है, जिसके लिए पहले वर्षों का अनुभव, एक बड़ी लाइब्रेरी और शायद विशेषज्ञों की एक टीम की जरूरत होती थी.
इसका मतलब यह नहीं है कि अनुभव अप्रासंगिक हो गया है. अनुभव संदर्भ, निर्णय क्षमता और परिणामों को समझने की क्षमता प्रदान करता है. लेकिन टेक्नोलॉजी उस महत्व को बदल रही है, जो हम केवल जानकारी रखने को देते हैं.
टेक्नोलॉजी टीम टेक्नोलॉजी को समझ सकती है. कानूनी टीम कानून को समझ सकती है. जोखिम टीम जोखिम को समझ सकती है. क्रेडिट टीम क्रेडिट को समझ सकती है.
CEO का काम यह समझना है कि ये सभी हिस्से एक साथ कैसे जुड़ते हैं.
लेकिन एक गुण ऐसा है जिसे AI नहीं बदल सकता
हालांकि, एक ऐसा गुण है जिसे टेक्नोलॉजी पैदा नहीं कर सकती, ईमानदारी.
एक बैंक अंततः भरोसे पर चलता है. ग्राहक अपना पैसा उसके भरोसे सौंपते हैं. कर्मचारी उसके नेतृत्व पर भरोसा करते हैं. नियामक उसके प्रशासन पर भरोसा करते हैं. निवेशक उसके खुलासों और फैसलों पर भरोसा करते हैं.
CEO युवा हो सकता है या उम्रदराज. वह बैंकिंग, प्रशासन, टेक्नोलॉजी या किसी अन्य पेशेवर पृष्ठभूमि से आ सकता है. लेकिन ईमानदारी के बिना, बाकी कोई भी योग्यता लंबे समय तक मायने नहीं रखती.
इसलिए ईमानदारी, जवाबदेही और भरोसे की संस्कृति बनाने की क्षमता CEO की कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी हो सकती है.
शायद सवाल बदलने का समय आ गया है
HDFC Bank की उत्तराधिकार प्रक्रिया नेतृत्व के बारे में अलग तरह से सोचने का अवसर देती है.
सिर्फ यह पूछने के बजाय कि, "अगला CEO कौन सा अनुभवी बैंकर होना चाहिए?", शायद बोर्ड को एक व्यापक सवाल पूछना चाहिए: "अगले दस वर्षों के लिए HDFC Bank को किस तरह के नेता की जरूरत है?"
जवाब अब भी एक अनुभवी बैंकर हो सकता है. यह कोई आंतरिक उम्मीदवार हो सकता है. यह नियामकीय या प्रशासनिक व्यवस्था से आने वाला व्यक्ति हो सकता है. लेकिन नई पीढ़ी के ऐसे नेताओं पर नजर डालने का भी अवसर है, जो टेक्नोलॉजी, लोगों और कारोबार की बदलती प्रकृति को समझते हैं.
असल परीक्षा उम्र नहीं होनी चाहिए. यह ईमानदारी, निर्णय क्षमता, अनुकूलनशीलता, नेतृत्व और असाधारण टीमें बनाने की क्षमता होनी चाहिए.
HDFC Bank के पास पहले से ही बैंकिंग विशेषज्ञता है. उसके पास ग्राहक हैं. उसके पास टेक्नोलॉजी है. उसके पास सिस्टम हैं. और उसके पास अनुभवी लोगों का एक विशाल समूह है.
शायद उसे अपने अगले CEO से बैंकिंग के बारे में सब कुछ जानने वाले व्यक्ति की जरूरत नहीं है, बल्कि ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो बैंकिंग को जानने वाले लोगों को एक साथ काम करने के लिए प्रेरित कर सके, ताकि एक और मजबूत संस्थान बनाया जा सके.
और इससे बैंकिंग नेतृत्व की अगली पीढ़ी कैसी दिखनी चाहिए, इसकी एक बिल्कुल अलग अवधारणा के लिए रास्ता खुल सकता है.
डॉ. अन्नुराग बत्रा, BW रिपोर्ट्स
(लेखक BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media ग्रुप के संस्थापक.)
मिल स्तर पर कीमतें करीब 20% घटीं, फिर भी खुदरा बाजार में राहत नहीं; उत्पादन घटने और सप्लाई को लेकर बढ़ी चिंता
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में चीनी की कीमतों में तेजी थमने का नाम नहीं ले रही है. सरकार की ओर से 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देने, स्टॉक लिमिट सख्त करने और निर्यात पर रोक जैसे कदम उठाए जाने के बावजूद खुदरा बाजार में चीनी 60 रुपये प्रति किलो से ऊपर बिक रही है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 30 अगस्त को चीनी की अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमत 64.24 रुपये प्रति किलो रही, जबकि अधिकतम कीमत 74 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई. खास बात यह है कि पिछले एक महीने में खुदरा कीमतों में करीब 30 फीसदी का उछाल आया है, जबकि मिल स्तर पर कीमतें करीब 20 फीसदी कम हुई हैं.
एक सप्ताह में भी बढ़े चीनी के दाम
30 अगस्त को चीनी की औसत खुदरा कीमत 64.24 रुपये प्रति किलो रही. एक सप्ताह पहले यह 63.12 रुपये प्रति किलो थी, यानी इस दौरान कीमत में 1.77 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं, एक महीने पहले के मुकाबले चीनी करीब 30 फीसदी और पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 38.63 फीसदी महंगी हो चुकी है. देश के अलग-अलग हिस्सों में कीमतों में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है. 30 अगस्त को चीनी की न्यूनतम खुदरा कीमत 40 रुपये और अधिकतम कीमत 74 रुपये प्रति किलो रही. प्रमुख शहरों में दिल्ली में यह करीब 62 रुपये, मुंबई में 66 रुपये, चेन्नई में 63 रुपये और रांची में 68 रुपये प्रति किलो बिक रही थी.
थोक बाजार में भी कीमतों का दबाव
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, थोक बाजार में भी चीनी की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं. 30 अगस्त को थोक कीमत करीब 59.73 रुपये प्रति किलो रही, जबकि एक सप्ताह पहले यह 58.66 रुपये थी. एक महीने के मुकाबले थोक कीमत में करीब 31 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. हालांकि, यहां सबसे अहम बात यह है कि मिल स्तर पर कीमतों में करीब 20 फीसदी की गिरावट आई है. सरकार की ओर से 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दिए जाने के बाद मिल कीमतों में नरमी देखने को मिली है. आम तौर पर मिल स्तर और थोक कीमत के बीच 2-3 रुपये तथा मिल और खुदरा कीमत के बीच 7-8 रुपये प्रति किलो का अंतर सामान्य माना जाता है.
सरकार ने उठाए कई कदम
चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने कई उपाय किए हैं. सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी है. इसके साथ ही थोक उपभोक्ताओं और डीलरों के लिए स्टॉक लिमिट से जुड़े नियम सख्त किए गए हैं. इससे पहले चीनी के निर्यात पर भी रोक लगाई जा चुकी है. सरकार का कहना है कि देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और कीमतों में तेजी के लिए मिलों को जिम्मेदार ठहराया गया है. इसके बावजूद खुदरा बाजार में कीमतों पर अभी तक इन कदमों का असर नजर नहीं आया है.
उत्पादन घटने से बढ़ी सप्लाई की चिंता
चीनी की कीमतों में तेजी ऐसे समय आई है, जब 2025-26 मार्केटिंग ईयर के लिए देश का उत्पादन पहले के अनुमान से कम रहने की संभावना है. उत्पादन का अनुमान पहले 343 लाख टन लगाया गया था, जिसे घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया है.
दूसरी ओर, देश में चीनी की सालाना घरेलू मांग करीब 280-285 लाख टन रहने का अनुमान है. ऐसे में उत्पादन और घरेलू मांग के बीच सीमित अंतर सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा रहा है.
मिल से सस्ती, फिर खुदरा में क्यों महंगी?
मौजूदा स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मिल स्तर पर चीनी की कीमतों में करीब 20 फीसदी की गिरावट आ चुकी है, तो खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को राहत क्यों नहीं मिल रही है. मिल, थोक और खुदरा कीमतों के बीच बढ़ता अंतर इस सवाल को और महत्वपूर्ण बनाता है.
आने वाले दिनों में सरकार के शुल्क-मुक्त आयात और स्टॉक लिमिट से जुड़े फैसलों का असर अगर सप्लाई चेन तक पहुंचता है, तो खुदरा कीमतों में नरमी आ सकती है. फिलहाल चीनी की ऊंची कीमतें आम उपभोक्ताओं के बजट पर दबाव बनाए हुए हैं.
सुभाष चंद्रा के कार्यालय ने कहा- व्यक्तिगत तौर पर कोई कर्ज नहीं लिया; विभिन्न संस्थाओं की उधारी के लिए दी थी ₹22,000 करोड़ की गारंटी, ₹1,049 करोड़ के दावों का हो चुका है निपटारा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जी ग्रुप (Zee Group) के फाउंडर और चेयरमैन एमेरिटस डॉ. सुभाष चंद्रा ने अपनी व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही से जुड़े मामले पर सफाई दी है. उन्होंने कहा है कि उनकी व्यक्तिगत उधारी शून्य थी, जबकि अलग-अलग संस्थाओं की ओर से लिए गए कर्ज के लिए उन्होंने कुल ₹22,000 करोड़ की व्यक्तिगत गारंटी दी थी. उनके कार्यालय की ओर से 30 अगस्त को जारी बयान में कहा गया कि सोशल मीडिया पर पिछले तीन दिनों से चल रही पोस्ट के कारण इस मामले को लेकर ‘गलत धारणा और समझ’ बनी है.
₹22,000 करोड़ की गारंटी, व्यक्तिगत उधारी शून्य
बयान के मुताबिक, डॉ. चंद्रा ने विभिन्न संस्थाओं की ओर से लिए गए कर्ज के लिए कुल ₹22,000 करोड़ की व्यक्तिगत गारंटी पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें ₹17,200 करोड़ की गारंटी कर्ज लिए जाने के समय दी गई थी, जबकि करीब ₹4,800 करोड़ की गारंटी डिफॉल्ट होने के बाद दी गई.
डॉ. चंद्रा के कार्यालय ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत दिवाला मामला उनकी निजी उधारी से संबंधित नहीं था. मूल कर्ज अलग-अलग उधार लेने वाली संस्थाओं ने लिया था, जबकि डॉ. चंद्रा ने उनकी ओर से भुगतान की गारंटी दी थी.
NCLT में शुरू हुई व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया
बयान के अनुसार, इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने डॉ. चंद्रा के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही शुरू की थी. ट्रिब्यूनल की ओर से नियुक्त रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने डॉ. चंद्रा की घोषित संपत्तियों और उपलब्ध धनराशि का आकलन किया और इसी आधार पर पुनर्भुगतान योजना तैयार की.
₹39.08 करोड़ की संपत्ति घटकर ₹31.79 करोड़
डॉ. चंद्रा के कार्यालय के मुताबिक, उन्होंने 2016 में संसद के समक्ष ₹39.08 करोड़ की संपत्ति और धनराशि घोषित की थी. रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने यह भी जांच की कि इन संपत्तियों का मूल्य घटकर ₹31.79 करोड़ कैसे रह गया. इसमें करीब ₹25 करोड़ मूल्य की एक आवासीय संपत्ति भी शामिल है, जिसे गिरवी रखा गया है. बयान के अनुसार, इसके बाद लगभग ₹6.79 करोड़ की तरल संपत्तियां बचती हैं.
कर्जदाताओं ने दाखिल किए ₹5,311 करोड़ के दावे
बयान में दिवाला कार्यवाही में शामिल कर्जदाताओं के दावों का ब्योरा भी दिया गया है. इसके मुताबिक, संबंधित उधार लेने वाली संस्थाओं ने सूचीबद्ध कर्जदाताओं से कुल ₹4,808 करोड़ की रकम प्राप्त की थी. इसमें से उधार लेने वाली संस्थाओं ने ₹3,803 करोड़ वापस कर दिए. इससे करीब ₹998 करोड़ की रकम बकाया रह गई थी. हालांकि, व्यक्तिगत गारंटर के तौर पर डॉ. चंद्रा के खिलाफ दाखिल दावों की कुल राशि ₹5,311 करोड़ थी. इनमें से ₹1,049 करोड़ के दावों का भुगतान या निपटारा हो चुका है. इसके बाद शेष दावों की राशि ₹4,262 करोड़ रह गई.
इन कर्जदाताओं में Indiabulls Housing Finance, Axis Bank Group, HDFC Group, Canara Bank, Edelweiss, Franklin Templeton, IndusInd Bank, LIC Housing Finance, RBL Bank और Union Bank समेत अन्य संस्थाएं शामिल हैं. बयान में कहा गया है कि कई मामलों में सिक्योरिटीज, गारंटी और बकाया रकम के मिलान को लेकर अंतर मौजूद है.
₹4,262 करोड़ के भुगतान का उधार लेने वाली संस्थाओं ने दिया भरोसा
सुभाष चंद्रा के कार्यालय के मुताबिक, उन्होंने सभी संबंधित उधार लेने वाली संस्थाओं के साथ बकाया दावों पर चर्चा की है. इन संस्थाओं ने भरोसा दिलाया है कि संबंधित कर्जदाताओं के साथ खातों का मिलान पूरा होने के बाद ₹4,262 करोड़ के बकाया दावों का निपटारा किया जाएगा.
बयान में यह भी कहा गया कि कर्जदाताओं और उधार लेने वाली संस्थाओं के बीच दावों की रकम का पूरा मिलान अभी बाकी है. कार्यालय ने बताया कि पहले जारी किए गए एक प्रेस बयान और मौजूदा आंकड़ों में अंतर इसलिए है क्योंकि कुछ खातों को उस समय शामिल नहीं किया गया था. इन खातों से जुड़े पक्षों ने प्रस्तावित योजना के पक्ष या विपक्ष में मतदान नहीं किया था.
अन्य स्रोतों से लिए गए कर्ज भी चुकाए जा रहे
बयान के अनुसार, संबंधित संस्थाओं ने विदेशी फंड, घरेलू फंड, NBFCs और कॉरपोरेट्स समेत कई अन्य स्रोतों से भी बड़ी रकम उधार ली थी. डॉ. चंद्रा के कार्यालय का कहना है कि इनमें से ज्यादातर देनदारियों का या तो निपटारा हो चुका है या उधार लेने वाली संस्थाएं उनके भुगतान की प्रक्रिया में हैं. बयान के मुताबिक, कुछ बाकी देनदारियों के पीछे पर्याप्त संपत्तियां मौजूद हैं, जबकि कुछ अन्य के भी चुकाए जाने की उम्मीद है.
कर्जदाताओं से उधार लेने वाली संस्थाओं से हिसाब मिलाने की अपील
डॉ. सुभाष चंद्रा ने कर्जदाताओं से अपील की है कि वे संबंधित उधार लेने वाली संस्थाओं के साथ सीधे बातचीत करें, बकाया खातों का मिलान करें और उन्हीं संस्थाओं से देय रकम की वसूली करें. उनके कार्यालय ने कहा कि यह स्पष्टीकरण सोशल मीडिया पर उठाए गए सवालों और #PaisaWapasKaro जैसे हैशटैग के साथ किए जा रहे पोस्ट के बाद जारी किया गया है.
शुक्रवार को सेंसेक्स 330.92 अंक यानी 0.43 फीसदी की बढ़त के साथ 77,264.51 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 84.80 अंक यानी 0.35 फीसदी चढ़कर 24,175.65 के स्तर पर पहुंचा था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार ने शुक्रवार को पिछले सत्र की गिरावट से उबरते हुए मजबूत वापसी की. सेंसेक्स 330.92 अंक यानी 0.43 फीसदी की बढ़त के साथ 77,264.51 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 84.80 अंक यानी 0.35 फीसदी चढ़कर 24,175.65 के स्तर पर पहुंच गया. शुक्रवार की तेजी में खास तौर पर आईटी शेयरों का योगदान रहा, जहां TCS, Infosys और Tech Mahindra में अच्छी खरीदारी देखने को मिली. हालांकि, सोमवार यानी आज बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं. GIFT Nifty में गिरावट, एशियाई बाजारों में दबाव और कच्चे तेल की कीमतों के 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से निवेशकों की चिंता बढ़ी है. ऐसे में घरेलू शेयर बाजार में आज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
शुक्रवार को TCS समेत IT शेयरों में रही जोरदार तेजी
शुक्रवार को सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 21 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 9 शेयरों में गिरावट रही. IT सेक्टर में सबसे ज्यादा खरीदारी देखने को मिली. TCS का शेयर 4.09 फीसदी उछलकर 2,344 रुपये पर बंद हुआ. Infosys में 3.34 फीसदी और Tech Mahindra में 3.18 फीसदी की तेजी रही. इसके अलावा HCL Tech 2.68 फीसदी, Titan 1.17 फीसदी, Eternal 1.16 फीसदी, HDFC Bank 1.12 फीसदी, Axis Bank 1.12 फीसदी और Sun Pharma 1.03 फीसदी चढ़े. NTPC, Trent और Power Grid में भी तेजी रही.
इन बड़े शेयरों में आई गिरावट
बाजार में तेजी के बावजूद कुछ प्रमुख शेयर दबाव में रहे. ICICI Bank का शेयर 1.30 फीसदी गिरकर 1,425.20 रुपये पर बंद हुआ. UltraTech Cement में 1.18 फीसदी और Asian Paints में 1.06 फीसदी की गिरावट रही. इसके अलावा ITC, Maruti, Bajaj Finserv, Mahindra & Mahindra, Reliance Industries और Tata Steel भी लाल निशान में बंद हुए.
आज क्यों कमजोर रह सकता है बाजार?
सोमवार सुबह GIFT Nifty करीब 103 अंक की गिरावट के साथ 24,239 के आसपास कारोबार कर रहा था. इससे संकेत मिल रहे हैं कि Nifty50 की शुरुआत कमजोर हो सकती है. एशियाई बाजारों में भी दबाव देखने को मिल रहा है. जापान का Nikkei 225 करीब 1.8 फीसदी और दक्षिण कोरिया का Kospi लगभग 2.4 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा था. अमेरिकी बाजार भी पिछले कारोबारी सत्र में कमजोर रहे. Dow Jones 0.02 फीसदी, S&P 500 करीब 0.3 फीसदी और Nasdaq 0.52 फीसदी गिरकर बंद हुए.
कच्चा तेल 90 डॉलर के पार, बढ़ी चिंता
भारतीय बाजार के लिए सबसे बड़ी चिंता फिलहाल कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं. Brent crude करीब 2.34 फीसदी चढ़कर 90.35 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच तेल की कीमतों में और तेजी की आशंका बाजार के लिए नकारात्मक संकेत है. महंगा कच्चा तेल भारत जैसी बड़ी आयातक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बढ़ाता है और इससे कंपनियों की लागत, महंगाई तथा रुपये पर दबाव बढ़ सकता है.
इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज के कारोबार में Tata Chemicals, Mahindra & Mahindra, ONGC, LIC Housing Finance, Reliance Industries, Ola Electric Mobility, Indraprastha Gas, Hindusthan National Glass, Aurobindo Pharma, Max Estates और HDFC Bank समेत कई शेयर फोकस में रहेंगे. Tata Chemicals की अमेरिकी इकाई को Searles Valley Minerals की दिवालियापन प्रक्रिया में सफल बोलीदाता घोषित किया गया है और वह कंपनी के सोडा ऐश ग्राहकों के कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करेगी, जिनसे दिसंबर 2028 तक 110 मिलियन डॉलर से अधिक राजस्व की उम्मीद है. Mahindra & Mahindra ने अपने Battery-as-a-Service (BaaS) प्रोग्राम को पूरे इलेक्ट्रिक SUV पोर्टफोलियो तक विस्तार दिया है. ONGC गहरे समुद्र में ड्रिलिंग क्षमता बढ़ाने के लिए डीपवाटर ड्रिलशिप खरीदने या जॉइंट वेंचर की संभावनाएं तलाश रही है. LIC Housing Finance ने संदीप कुमार को नया MD और CEO नियुक्त किया है. Reliance Industries की सहायक कंपनी Jio Platforms को प्रस्तावित IPO के लिए SEBI से DRHP पर ऑब्जर्वेशन लेटर मिल गया है. Ola Electric को PLI योजना के तहत 95.81 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि जारी करने की मंजूरी मिली है. Indraprastha Gas ने दिल्ली-NCR में CNG की कीमत 3.89 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ाने का फैसला किया है. Hindusthan National Glass ने B9 Beverages को डिफॉल्ट नोटिस भेजा है और NCLT का रुख करने की तैयारी में है. Aurobindo Pharma की सहायक कंपनी Apitoria Pharma की यूनिट-VI के US FDA निरीक्षण में तीन ऑब्जर्वेशन सामने आए हैं. Max Estates ने पश्चिमी दिल्ली में करीब 84.71 एकड़ जमीन रखने वाली प्रमोटर समूह की कंपनियों का अधिग्रहण करने के लिए शेयर खरीद समझौता किया है, जिससे 10,000-12,000 करोड़ रुपये का संभावित GDV बनने का अनुमान है. वहीं HDFC Bank के MD और CEO शशिधर जगदीशन 26 अक्टूबर 2026 को पद से रिटायर होंगे और बैंक ने उनके उत्तराधिकारी की नियुक्ति प्रक्रिया तेज कर दी है.
निवेशकों की नजर इन संकेतों पर
कुल मिलाकर शुक्रवार को घरेलू बाजार ने मजबूत वापसी की थी, लेकिन सोमवार की शुरुआत के संकेत कमजोर हैं. आज निवेशकों की नजर GIFT Nifty, एशियाई बाजारों की चाल, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक ब्याज दरों से जुड़े संकेतों पर रहेगी. ऐसे में शुक्रवार की तेजी के बाद आज बाजार में सतर्क कारोबार और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
HDFC Bank Succession: शशिधर जगदीशन ने दोबारा नियुक्ति की दौड़ से हटने का फैसला किया, बोर्ड ने स्वीकार किया इस्तीफा; नए CEO की तलाश तेज
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एचडीएफसी (HDFC) बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ शशिधर जगदीशन 26 अक्टूबर 2026 को अपने पद से हट जाएंगे. उन्होंने बैंक के बोर्ड को सूचित किया है कि वह अपने कार्यकाल के बाद दोबारा नियुक्ति नहीं चाहते हैं. बैंक के बोर्ड ने 29 अगस्त को हुई बैठक में उनके फैसले को स्वीकार कर लिया. इसके साथ ही देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक में नए CEO की तलाश की प्रक्रिया तेज हो गई है.
अक्टूबर में खत्म होगा जगदीशन का कार्यकाल
शशिधर जगदीशन ने अक्टूबर 2020 में HDFC बैंक के एमडी और सीईओ का पद संभाला था. उन्होंने बैंक के लंबे समय तक प्रमुख रहे आदित्य पुरी की जगह ली थी. इसके बाद 2023 में उन्हें तीन साल के दूसरे कार्यकाल के लिए दोबारा नियुक्त किया गया था. उनका मौजूदा कार्यकाल 26 अक्टूबर 2026 को समाप्त होना था.
पिछले कुछ महीनों से जगदीशन के कार्यकाल को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी. बैंक का बोर्ड और उसकी Governance, Nomination and Remuneration Committee उनकी दोबारा नियुक्ति पर विचार कर रही थी. इस बीच निवेशकों की नजर भी बैंक के नेतृत्व को लेकर चल रही प्रक्रिया पर बनी हुई थी.
बोर्ड ने शुरू की नए CEO की तलाश
जगदीशन के दोबारा कार्यकाल नहीं लेने के फैसले के बाद HDFC बैंक के बोर्ड ने उनके उत्तराधिकारी की तलाश की प्रक्रिया तेज कर दी है. यह नेतृत्व परिवर्तन ऐसे समय हो रहा है जब बैंक के शेयरों पर दबाव बना हुआ है और निवेशकों के बीच गवर्नेंस, कानूनी मामलों तथा मैनेजमेंट की निरंतरता को लेकर चिंताएं रही हैं.
2026 में 25% से ज्यादा गिर चुका है शेयर
HDFC बैंक के शेयरों में इस साल अब तक 25 फीसदी से अधिक की गिरावट आ चुकी है. हाल में बैंक का शेयर करीब ढाई साल के निचले स्तर पर पहुंच गया. विश्लेषकों ने पहले भी जगदीशन के कार्यकाल को लेकर बनी अनिश्चितता को शेयर पर दबाव डालने वाले प्रमुख कारणों में शामिल किया था. बैंक में यह नेतृत्व बदलाव ऐसे समय हुआ है जब जुलाई में राजीव कुमार को पार्ट-टाइम नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन नियुक्त किया गया था. इससे पहले पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने मार्च में पद से इस्तीफा दिया था.
HDFC Ltd के साथ हुआ था बड़ा विलय
शशिधर जगदीशन के छह साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में HDFC Ltd के साथ HDFC बैंक का ऐतिहासिक विलय शामिल रहा. यह भारत के सबसे बड़े कॉरपोरेट विलय में से एक था. बैंक के बोर्ड ने जगदीशन के योगदान को स्वीकार करते हुए बैंक की स्थिरता, विकास और विलय को सफलतापूर्वक पूरा करने में उनकी भूमिका की सराहना की.
अब HDFC बैंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती नए सीईओ का चयन और नेतृत्व में सुचारू बदलाव सुनिश्चित करना है. निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि बैंक किसे जगदीशन का उत्तराधिकारी बनाता है और यह बदलाव बैंक के कारोबार की निरंतरता तथा निवेशकों के भरोसे को किस तरह प्रभावित करता है.
पैकेट खोलने से पहले ही पता चलेगा कितना ‘अनहेल्दी’ है खाना, सुप्रीम कोर्ट में FSSAI ने रखा फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल का प्रस्ताव
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पैकेज्ड फूड खाने वालों के लिए आने वाले समय में पैकेट के सामने ही एक बड़ा चेतावनी निशान नजर आ सकता है. फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का प्रस्ताव रखा है. इसके तहत किसी खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा तय सीमा से ज्यादा होने पर पैकेट के सामने लाल रंग का चेतावनी लेबल लगाने का प्रावधान किया जा सकता है.
लाल हेक्सागोन में मिलेगी चेतावनी
प्रस्ताव के मुताबिक, पैकेज्ड फूड के फ्रंट पर लाल रंग का हेक्सागोन यानी छह कोनों वाला निशान लगाया जा सकता है. यह उपभोक्ताओं को खरीदारी से पहले ही संकेत देगा कि संबंधित प्रोडक्ट में चीनी, नमक या फैट की मात्रा अधिक है.
इसके साथ ही पैकेट पर बड़े और स्पष्ट अक्षरों में ‘HIGH SUGAR’, ‘HIGH SALT’ या ‘HIGH FAT’ लिखा जाएगा. यह जानकारी पैकेज के सामने प्रमुखता से दिखाई देगी, ताकि ग्राहक को पोषण संबंधी जानकारी समझने के लिए पैकेट के पीछे दिए गए न्यूट्रिशन लेबल पर निर्भर न रहना पड़े.
दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव
FSSAI ने इस व्यवस्था को दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव रखा है. पहले चरण में उन पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स पर चेतावनी लेबल लगाया जाएगा, जिनमें चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट में से कम से कम दो की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक होगी.
दूसरे चरण में नियम को और सख्त करने का प्रस्ताव है. इसके तहत अगर किसी प्रोडक्ट में इन तीन में से किसी एक पोषक तत्व की मात्रा भी तय सीमा से अधिक पाई जाती है, तो उस पर चेतावनी लेबल लगाना जरूरी हो सकता है.
फॉन्ट भी होगा बड़ा
प्रस्ताव में लेबल की स्पष्टता पर भी जोर दिया गया है. ‘HIGH SUGAR’, ‘HIGH SALT’ और ‘HIGH FAT’ जैसी चेतावनियों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला फॉन्ट पैकेट पर मौजूद न्यूट्रिशन इंफॉर्मेशन के फॉन्ट से कम से कम एक पॉइंट बड़ा रखने का प्रस्ताव है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चेतावनी उपभोक्ता की नजर से आसानी से छिप न जाए और वह प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसके पोषण संबंधी जोखिम को समझ सके.
बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का मुद्दा बच्चों में बढ़ते मोटापे और अनहेल्दी फूड की बढ़ती खपत को लेकर चल रही बहस के बीच सामने आया है. ‘3S and Our Health Society’ की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों में बढ़ते मोटापे को लेकर चिंता जताई थी. कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया था कि अगर किसी खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक और फैट की मात्रा अधिक है, तो उपभोक्ताओं को इसकी स्पष्ट जानकारी पैकेट पर क्यों नहीं दी जानी चाहिए. इसके बाद FSSAI की ओर से पैकेज्ड फूड की लेबलिंग व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव सामने आया है.
किन उत्पादों को मिल सकती है छूट?
प्रस्ताव में कुछ ऐसे उत्पादों को फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल से बाहर रखने की बात कही गई है, जिनमें मुख्य रूप से एक ही सामग्री होती है. इनमें घी, तेल, नमक, चीनी, गुड़ और शहद जैसे उत्पाद शामिल हैं, यानी इन सिंगल-इंग्रीडिएंट प्रोडक्ट्स पर प्रस्तावित लाल चेतावनी लेबल लागू नहीं होने की बात कही गई है.
खाद्य कंपनियों ने जताई चिंता
प्रस्तावित नियमों को लेकर खाद्य उद्योग के कुछ संगठनों और कंपनियों की ओर से आपत्तियां भी सामने आई हैं. कोका-कोला, नेस्ले और पेप्सिको से जुड़े उद्योग समूहों ने प्रस्ताव के कुछ प्रावधानों पर चिंता जताई है. हालांकि, नियामक का जोर इस बात पर है कि उपभोक्ताओं को पैकेज्ड फूड खरीदते समय उसकी पोषण संबंधी जानकारी आसानी से और स्पष्ट रूप से मिल सके.
ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा?
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो पैकेज्ड फूड खरीदने वाले ग्राहकों को प्रोडक्ट की पोषण संबंधी स्थिति समझने में आसानी होगी. पैकेट के सामने ही लाल चेतावनी और ‘HIGH SUGAR’, ‘HIGH SALT’ या ‘HIGH FAT’ जैसे संकेत मिलने से ग्राहक ज्यादा चीनी, नमक या फैट वाले उत्पादों की पहचान तेजी से कर सकेंगे. हालांकि, फिलहाल यह एक प्रस्ताव है. इसे अंतिम रूप दिए जाने और लागू होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन उत्पादों पर किस स्तर की चेतावनी अनिवार्य होगी.