HDFC Bank Succession: शशिधर जगदीशन ने दोबारा नियुक्ति की दौड़ से हटने का फैसला किया, बोर्ड ने स्वीकार किया इस्तीफा; नए CEO की तलाश तेज
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
एचडीएफसी (HDFC) बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ शशिधर जगदीशन 26 अक्टूबर 2026 को अपने पद से हट जाएंगे. उन्होंने बैंक के बोर्ड को सूचित किया है कि वह अपने कार्यकाल के बाद दोबारा नियुक्ति नहीं चाहते हैं. बैंक के बोर्ड ने 29 अगस्त को हुई बैठक में उनके फैसले को स्वीकार कर लिया. इसके साथ ही देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक में नए CEO की तलाश की प्रक्रिया तेज हो गई है.
अक्टूबर में खत्म होगा जगदीशन का कार्यकाल
शशिधर जगदीशन ने अक्टूबर 2020 में HDFC बैंक के एमडी और सीईओ का पद संभाला था. उन्होंने बैंक के लंबे समय तक प्रमुख रहे आदित्य पुरी की जगह ली थी. इसके बाद 2023 में उन्हें तीन साल के दूसरे कार्यकाल के लिए दोबारा नियुक्त किया गया था. उनका मौजूदा कार्यकाल 26 अक्टूबर 2026 को समाप्त होना था.
पिछले कुछ महीनों से जगदीशन के कार्यकाल को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी. बैंक का बोर्ड और उसकी Governance, Nomination and Remuneration Committee उनकी दोबारा नियुक्ति पर विचार कर रही थी. इस बीच निवेशकों की नजर भी बैंक के नेतृत्व को लेकर चल रही प्रक्रिया पर बनी हुई थी.
बोर्ड ने शुरू की नए CEO की तलाश
जगदीशन के दोबारा कार्यकाल नहीं लेने के फैसले के बाद HDFC बैंक के बोर्ड ने उनके उत्तराधिकारी की तलाश की प्रक्रिया तेज कर दी है. यह नेतृत्व परिवर्तन ऐसे समय हो रहा है जब बैंक के शेयरों पर दबाव बना हुआ है और निवेशकों के बीच गवर्नेंस, कानूनी मामलों तथा मैनेजमेंट की निरंतरता को लेकर चिंताएं रही हैं.
2026 में 25% से ज्यादा गिर चुका है शेयर
HDFC बैंक के शेयरों में इस साल अब तक 25 फीसदी से अधिक की गिरावट आ चुकी है. हाल में बैंक का शेयर करीब ढाई साल के निचले स्तर पर पहुंच गया. विश्लेषकों ने पहले भी जगदीशन के कार्यकाल को लेकर बनी अनिश्चितता को शेयर पर दबाव डालने वाले प्रमुख कारणों में शामिल किया था. बैंक में यह नेतृत्व बदलाव ऐसे समय हुआ है जब जुलाई में राजीव कुमार को पार्ट-टाइम नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन नियुक्त किया गया था. इससे पहले पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने मार्च में पद से इस्तीफा दिया था.
HDFC Ltd के साथ हुआ था बड़ा विलय
शशिधर जगदीशन के छह साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में HDFC Ltd के साथ HDFC बैंक का ऐतिहासिक विलय शामिल रहा. यह भारत के सबसे बड़े कॉरपोरेट विलय में से एक था. बैंक के बोर्ड ने जगदीशन के योगदान को स्वीकार करते हुए बैंक की स्थिरता, विकास और विलय को सफलतापूर्वक पूरा करने में उनकी भूमिका की सराहना की.
अब HDFC बैंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती नए सीईओ का चयन और नेतृत्व में सुचारू बदलाव सुनिश्चित करना है. निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि बैंक किसे जगदीशन का उत्तराधिकारी बनाता है और यह बदलाव बैंक के कारोबार की निरंतरता तथा निवेशकों के भरोसे को किस तरह प्रभावित करता है.
पैकेट खोलने से पहले ही पता चलेगा कितना ‘अनहेल्दी’ है खाना, सुप्रीम कोर्ट में FSSAI ने रखा फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल का प्रस्ताव
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पैकेज्ड फूड खाने वालों के लिए आने वाले समय में पैकेट के सामने ही एक बड़ा चेतावनी निशान नजर आ सकता है. फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का प्रस्ताव रखा है. इसके तहत किसी खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा तय सीमा से ज्यादा होने पर पैकेट के सामने लाल रंग का चेतावनी लेबल लगाने का प्रावधान किया जा सकता है.
लाल हेक्सागोन में मिलेगी चेतावनी
प्रस्ताव के मुताबिक, पैकेज्ड फूड के फ्रंट पर लाल रंग का हेक्सागोन यानी छह कोनों वाला निशान लगाया जा सकता है. यह उपभोक्ताओं को खरीदारी से पहले ही संकेत देगा कि संबंधित प्रोडक्ट में चीनी, नमक या फैट की मात्रा अधिक है.
इसके साथ ही पैकेट पर बड़े और स्पष्ट अक्षरों में ‘HIGH SUGAR’, ‘HIGH SALT’ या ‘HIGH FAT’ लिखा जाएगा. यह जानकारी पैकेज के सामने प्रमुखता से दिखाई देगी, ताकि ग्राहक को पोषण संबंधी जानकारी समझने के लिए पैकेट के पीछे दिए गए न्यूट्रिशन लेबल पर निर्भर न रहना पड़े.
दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव
FSSAI ने इस व्यवस्था को दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव रखा है. पहले चरण में उन पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स पर चेतावनी लेबल लगाया जाएगा, जिनमें चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट में से कम से कम दो की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक होगी.
दूसरे चरण में नियम को और सख्त करने का प्रस्ताव है. इसके तहत अगर किसी प्रोडक्ट में इन तीन में से किसी एक पोषक तत्व की मात्रा भी तय सीमा से अधिक पाई जाती है, तो उस पर चेतावनी लेबल लगाना जरूरी हो सकता है.
फॉन्ट भी होगा बड़ा
प्रस्ताव में लेबल की स्पष्टता पर भी जोर दिया गया है. ‘HIGH SUGAR’, ‘HIGH SALT’ और ‘HIGH FAT’ जैसी चेतावनियों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला फॉन्ट पैकेट पर मौजूद न्यूट्रिशन इंफॉर्मेशन के फॉन्ट से कम से कम एक पॉइंट बड़ा रखने का प्रस्ताव है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चेतावनी उपभोक्ता की नजर से आसानी से छिप न जाए और वह प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसके पोषण संबंधी जोखिम को समझ सके.
बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का मुद्दा बच्चों में बढ़ते मोटापे और अनहेल्दी फूड की बढ़ती खपत को लेकर चल रही बहस के बीच सामने आया है. ‘3S and Our Health Society’ की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों में बढ़ते मोटापे को लेकर चिंता जताई थी. कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया था कि अगर किसी खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक और फैट की मात्रा अधिक है, तो उपभोक्ताओं को इसकी स्पष्ट जानकारी पैकेट पर क्यों नहीं दी जानी चाहिए. इसके बाद FSSAI की ओर से पैकेज्ड फूड की लेबलिंग व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव सामने आया है.
किन उत्पादों को मिल सकती है छूट?
प्रस्ताव में कुछ ऐसे उत्पादों को फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल से बाहर रखने की बात कही गई है, जिनमें मुख्य रूप से एक ही सामग्री होती है. इनमें घी, तेल, नमक, चीनी, गुड़ और शहद जैसे उत्पाद शामिल हैं, यानी इन सिंगल-इंग्रीडिएंट प्रोडक्ट्स पर प्रस्तावित लाल चेतावनी लेबल लागू नहीं होने की बात कही गई है.
खाद्य कंपनियों ने जताई चिंता
प्रस्तावित नियमों को लेकर खाद्य उद्योग के कुछ संगठनों और कंपनियों की ओर से आपत्तियां भी सामने आई हैं. कोका-कोला, नेस्ले और पेप्सिको से जुड़े उद्योग समूहों ने प्रस्ताव के कुछ प्रावधानों पर चिंता जताई है. हालांकि, नियामक का जोर इस बात पर है कि उपभोक्ताओं को पैकेज्ड फूड खरीदते समय उसकी पोषण संबंधी जानकारी आसानी से और स्पष्ट रूप से मिल सके.
ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा?
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो पैकेज्ड फूड खरीदने वाले ग्राहकों को प्रोडक्ट की पोषण संबंधी स्थिति समझने में आसानी होगी. पैकेट के सामने ही लाल चेतावनी और ‘HIGH SUGAR’, ‘HIGH SALT’ या ‘HIGH FAT’ जैसे संकेत मिलने से ग्राहक ज्यादा चीनी, नमक या फैट वाले उत्पादों की पहचान तेजी से कर सकेंगे. हालांकि, फिलहाल यह एक प्रस्ताव है. इसे अंतिम रूप दिए जाने और लागू होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन उत्पादों पर किस स्तर की चेतावनी अनिवार्य होगी.
भारत में डिजिटल मर्चेंट पेमेंट का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है. जुलाई में कारोबारियों को किए गए डिजिटल भुगतान में UPI की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 77.3% पर पहुंच गई, जबकि क्रेडिट और डेबिट कार्ड की हिस्सेदारी में गिरावट दर्ज हुई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में डिजिटल पेमेंट के तरीके में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. दुकानों और कारोबारियों को भुगतान करने के लिए लोग क्रेडिट और डेबिट कार्ड के मुकाबले UPI को ज्यादा पसंद कर रहे हैं. इसका असर डिजिटल मर्चेंट पेमेंट मार्केट में साफ दिखाई दे रहा है. UPI की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है, जबकि कार्ड से होने वाले भुगतान का हिस्सा घट रहा है.
इक्विरस की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में मर्चेंट पेमेंट में UPI की हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 77.3% हो गई. एक साल पहले जुलाई में यह 74.9% थी, जबकि जून 2026 में UPI की हिस्सेदारी 77.1% रही थी. इस दौरान भारत का डिजिटल मर्चेंट पेमेंट बाजार भी तेजी से बढ़ा. जुलाई में यह सालाना आधार पर 19.6% बढ़कर 11.7 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यानी डिजिटल पेमेंट का कुल बाजार बढ़ रहा है और इस वृद्धि में UPI की हिस्सेदारी लगातार मजबूत हो रही है.
क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी भी घटी
UPI के बढ़ते इस्तेमाल का असर क्रेडिट कार्ड पर भी दिखाई दे रहा है. जुलाई में मर्चेंट पेमेंट में क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी घटकर 17.7% रह गई. एक साल पहले यह 19.8% थी. पिछले 12 महीनों का औसत भी करीब 19% रहा है.
डेबिट कार्ड की स्थिति और कमजोर हुई है. जुलाई में मर्चेंट पेमेंट में डेबिट कार्ड की हिस्सेदारी घटकर 3.2% रह गई, जबकि एक साल पहले यह 3.9% थी. इससे संकेत मिलता है कि भुगतान के लिए लोग अब कार्ड की जगह UPI को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं.
रिटेल पेमेंट में भी UPI का दबदबा
रिटेल पेमेंट के पूरे बाजार में भी UPI तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है. CareEdge Analytics & Advisory के अनुसार, FY23 में रिटेल पेमेंट ट्रांजैक्शन में UPI की हिस्सेदारी 73.6% थी. FY27 की जून तिमाही में यह बढ़कर 86.8% हो गई. हालांकि, UPI के सामने अब इस सिस्टम को लंबे समय तक मजबूत और टिकाऊ बनाए रखने की चुनौती है. CareEdge के मुताबिक, सरकार कुछ बड़े मर्चेंट पेमेंट पर मामूली MDR यानी पेमेंट शुल्क लगाने की व्यवस्था पर विचार कर सकती है. हालांकि, आम ग्राहकों के UPI भुगतान और व्यक्ति-से-व्यक्ति लेनदेन के मुफ्त रहने की उम्मीद है.
UPI ट्रांजैक्शन में 29% मर्चेंट पेमेंट
CareEdge के मुताबिक, कुल UPI ट्रांजैक्शन वैल्यू में मर्चेंट पेमेंट की हिस्सेदारी करीब 29% है. इनमें 2,000 रुपये से ज्यादा के भुगतान की हिस्सेदारी 67.2% है. FY26 के आंकड़ों के आधार पर कुल UPI वैल्यू का करीब 19.5% हिस्सा संभावित MDR के दायरे में आ सकता है. अगर MDR 0.25% से 0.50% के बीच रखा जाता है, तो इससे सालाना 15,000 करोड़ से 30,000 करोड़ रुपये तक की कमाई का अवसर बन सकता है. हालांकि, रोजमर्रा के छोटे भुगतान और व्यक्ति-से-व्यक्ति UPI ट्रांजैक्शन को मुफ्त रखने की उम्मीद है.
डिजिटल पेमेंट में तेजी से बदल रही तस्वीर
आंकड़ों से साफ है कि भारत में डिजिटल पेमेंट का बाजार लगातार विस्तार कर रहा है, लेकिन इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा UPI को मिल रहा है. आसान इस्तेमाल, व्यापक स्वीकार्यता और तेज भुगतान के कारण UPI ने मर्चेंट पेमेंट में क्रेडिट और डेबिट कार्ड के मुकाबले अपनी स्थिति लगातार मजबूत की है.
एस्सेल ग्रुप के फाउंडर ने कहा- करीब ₹45,000 करोड़ के कुल कर्ज में से ₹43,000 करोड़ चुका चुके हैं; पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए स्वतंत्र ऑडिट की मांग
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
₹22,000 करोड़ के कर्ज मामले को लेकर उठ रहे सवालों के बीच एस्सेल ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है. उन्होंने दावा किया कि कुछ लोग उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं और पूरे मामले को सही संदर्भ में पेश नहीं किया जा रहा. चंद्रा के मुताबिक, ग्रुप ने करीब ₹45,000 करोड़ के कुल कर्ज में से लगभग ₹43,000 करोड़ चुका दिए हैं. उन्होंने बैंकिंग सिस्टम और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है.
स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग
सुभाष चंद्रा ने कहा कि एक स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त किया जाना चाहिए, जो यह जांच करे कि एस्सेल ग्रुप ने कितना कर्ज लिया, कितना चुकाया और किन मामलों में डिफॉल्ट हुआ. उनका कहना है कि स्वतंत्र जांच से कर्ज से जुड़े पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी.
निजी संपत्तियां बेचकर चुकाया कर्ज
चंद्रा के मुताबिक, ग्रुप की वित्तीय मुश्किलें 24 जनवरी 2019 के आसपास सामने आनी शुरू हुई थीं. उन्होंने इसकी प्रमुख वजह संपत्तियों और देनदारियों के बीच बढ़ता असंतुलन बताया. उन्होंने कहा कि उस समय उन्होंने बैंकिंग सिस्टम को एक खुला पत्र लिखकर अपनी गलती स्वीकार की थी और कर्ज चुकाने का भरोसा दिया था. चंद्रा के अनुसार, कर्ज चुकाने के लिए परिवार और निजी संपत्तियों तक को बेचना पड़ा. उन्होंने बताया कि Zee को बेचने की कोशिश की गई और उनका घर भी गिरवी रखा गया.
करीब ₹2,000 करोड़ का कर्ज अभी बाकी
सुभाष चंद्रा ने कहा कि करीब ₹2,000 करोड़ का कर्ज अभी अटका हुआ है. खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े मामलों में राज्य सरकारों से भुगतान नहीं मिलने के कारण यह समस्या बनी हुई है. उन्होंने कहा कि कुछ संपत्तियां बेचकर भी बकाया रकम जुटाने की कोशिश की जाएगी.
NCLT मामले पर भी दी सफाई
NCLT की कार्रवाई पर चंद्रा ने कहा कि यह उनके निजी कर्ज से जुड़ी नहीं है, बल्कि कुछ बैंकों को दी गई व्यक्तिगत गारंटी से संबंधित है. उन्होंने दावा किया कि करीब ₹620 करोड़ के दावे पहले ही चुकाए जा चुके हैं. हालांकि, NCLT ने हाल ही में करीब ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ के भुगतान प्लान को मंजूरी दी है. HDFC Bank ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है.
₹22,000 करोड़ के आंकड़े पर उठे सवाल
करीब ₹22,000 करोड़ की देनदारी और NCLT में लगभग ₹6.5 करोड़ के भुगतान प्लान की खबरों के बाद इस मामले पर काफी चर्चा हुई है. चंद्रा का कहना है कि इन आंकड़ों को सही संदर्भ में समझने की जरूरत है और उनके पूरे वित्तीय रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए. उनका कहना है कि ग्रुप की ओर से अब तक चुकाई गई बड़ी रकम और संपत्तियों की बिक्री समेत पूरे घटनाक्रम को साथ रखकर ही उनकी वित्तीय स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए.
शिकागो में वैश्विक निवेशकों और कारोबारी नेताओं से वित्त मंत्री की अपील, कहा- भारत को सिर्फ बड़ा बाजार नहीं, बल्कि दुनिया के लिए उत्पादन और इनोवेशन का केंद्र बनाएं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वैश्विक कंपनियों और निवेशकों से भारत में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन सेंटर स्थापित करने का आह्वान किया है. उन्होंने कहा कि भारत को केवल सामान बेचने वाले बड़े बाजार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यहां से भारत और पूरी दुनिया के लिए कारोबार खड़ा करने के अवसरों का लाभ उठाना चाहिए.
सीतारमण ने शुक्रवार को शिकागो में प्रमुख निवेशकों और कारोबारी नेताओं के साथ हाई-लेवल बिजनेस राउंडटेबल को संबोधित किया. यह बैठक भारत के कॉन्सुलेट जनरल, शिकागो ने यूएस-इंडिया स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फोरम के साथ मिलकर आयोजित की थी.
भारत में निवेश के लिए कई मौके
वित्त मंत्री ने कहा कि भारत में निवेश के अवसर किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं. बड़े घरेलू बाजार, मजबूत आर्थिक वृद्धि, कुशल प्रतिभा, बेहतर होता इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी क्षमता और पिछले एक दशक में किए गए लगातार सुधार मिलकर देश को निवेश के लिए आकर्षक बनाते हैं. उन्होंने ग्लोबल कंपनियों से भारत के साथ साझेदारी करने, यहां उत्पादन बढ़ाने और वैश्विक बाजारों के लिए कारोबार खड़ा करने की अपील की.
‘भारत में बनाएं, भारत और दुनिया के लिए’
राउंडटेबल की थीम ‘मैन्युफैक्चर इन इंडिया-फॉर इंडिया एंड फॉर द वर्ल्ड’ थी. सीतारमण ने कहा कि कंपनियों को भारत को सिर्फ घरेलू मांग पूरी करने वाले बाजार के रूप में नहीं देखना चाहिए. देश को मैन्युफैक्चरिंग बेस, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन सेंटर के साथ-साथ लंबे समय के इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के केंद्र के रूप में देखा जा सकता है. बैठक में मैन्युफैक्चरिंग, AI और डिजिटल टेक्नोलॉजी, वित्तीय सेवाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर, फूड प्रोसेसिंग, डिफेंस और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में निवेश के अवसरों पर चर्चा हुई.
डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भारत की बड़ी ताकत
वित्त मंत्री ने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की भी चर्चा की. उन्होंने आधार, UPI, डिजिलॉकर, ONDC और इंडिया स्टैक जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का जिक्र करते हुए कहा कि ये बड़े स्तर पर काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि अब AI, इंजीनियरिंग, एनालिटिक्स, प्रोडक्ट डेवलपमेंट, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे हाई-वैल्यू सेक्टर्स में कारोबार बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं हैं. भारत में स्थापित ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर भी तेजी से ग्लोबल इनोवेशन हब के रूप में विकसित हो रहे हैं.
GIFT City में भी निवेश के अवसर
सीतारमण ने गुजरात की GIFT City को भी वैश्विक निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया. उन्होंने कहा कि जून 2026 तक यहां 1,250 रजिस्टर्ड एंटिटीज मौजूद थीं. GIFT City में बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट, रीइंश्योरेंस, एयरक्राफ्ट और शिप लीजिंग, सस्टेनेबल फाइनेंस समेत कई अंतरराष्ट्रीय कारोबारों के लिए अवसर उपलब्ध हैं.
ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव का फायदा उठाने पर जोर
वित्त मंत्री ने कहा कि ग्लोबल सप्लाई चेन में हो रहे बदलाव के बीच भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार होने के साथ प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता भी है. उन्होंने कहा कि अब भारत में केवल असेंबली पर जोर नहीं है, बल्कि कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की क्षमता विकसित करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है. सरकार इसके लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजनाओं के जरिए नीतिगत समर्थन दे रही है.
इंफ्रास्ट्रक्चर में भी निवेश के बड़े मौके
सीतारमण ने इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश के अवसरों का भी जिक्र किया. उन्होंने डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, रेलवे के आधुनिकीकरण, विद्युतीकरण और हाई-स्पीड रेल जैसी परियोजनाओं को निवेश के महत्वपूर्ण अवसर बताया. उन्होंने कहा कि नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (NIIF) के जरिए वैश्विक निवेशक भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में निवेश कर सकते हैं.
फूड प्रोसेसिंग से डिफेंस तक बढ़ रहे अवसर
वित्त मंत्री ने फूड प्रोसेसिंग, ऑटोमेशन, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और कोल्ड चेन जैसे क्षेत्रों में भी बढ़ते कारोबारी अवसरों का उल्लेख किया. उन्होंने आत्मनिर्भर भारत और iDEX जैसी पहलों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ड्रोन, ऑटोनॉमस सिस्टम और अन्य एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में घरेलू क्षमता को मजबूत कर रहा है.
छह दिन की अमेरिका यात्रा पर हैं सीतारमण
सीतारमण छह दिन की अमेरिका यात्रा पर हैं. इस दौरान वह नॉर्थ कैरोलिना के एशविले में होने वाली G20 वित्त मंत्रियों की बैठक में शामिल होंगी. इसके अलावा वह न्यूयॉर्क का भी दौरा करेंगी.
मौजूदा 80,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर अगले 3-4 तिमाहियों में 1 लाख करोड़ रुपये करने की तैयारी, Tier-2 और Tier-3 शहरों पर फोकस
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एक्सिस बैंक (Axis Bank) अपने मिड-कॉरपोरेट कारोबार को तेजी से बढ़ाने की तैयारी कर रहा है. निजी क्षेत्र का यह बैंक अगले 3-4 तिमाहियों में अपने मिड-कॉरपोरेट फंडेड लोन बुक को मौजूदा करीब 80,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1 लाख करोड़ रुपये करना चाहता है. बैंक का लक्ष्य इस सेगमेंट में सालाना 25-30 फीसदी की दर से ग्रोथ हासिल करना है. एक्सिस बैंक के मिड-कॉरपोरेट एंड मीडियम एंटरप्राइजेज ग्रुप के ग्रुप हेड प्रशांत टीएस के मुताबिक, यह कारोबार बैंक के लिए ग्रोथ का एक प्रमुख इंजन बना हुआ है.
80,000 करोड़ रुपये का फंडेड एक्सपोजर
बैंक के मिड-कॉरपोरेट कारोबार में फिलहाल करीब 80,000 करोड़ रुपये का फंड-बेस्ड लोन एक्सपोजर है. इसके अलावा लगभग 18,000 करोड़ रुपये का नॉन-फंड-बेस्ड एक्सपोजर है. इस पोर्टफोलियो का रिटर्न ऑन एसेट्स (ROA) करीब 2 फीसदी है, जबकि क्रेडिट कॉस्ट बेहद कम है. इससे बैंक को इस कारोबार के विस्तार के लिए पर्याप्त गुंजाइश मिल रही है.
Tier-2 और Tier-3 शहरों पर बढ़ा फोकस
एक्सिस बैंक अब बड़े शहरों से आगे बढ़कर Tier-2 और Tier-3 शहरों में अपनी मिड-कॉरपोरेट पहुंच मजबूत कर रहा है. बैंक के मुताबिक, उसके इस कारोबार का करीब 30-35 फीसदी हिस्सा गैर-Tier-1 शहरों से आता है. बैंक को इन बाजारों में आगे भी कारोबार बढ़ाने की अच्छी संभावनाएं नजर आ रही हैं. इसके साथ ही कंपनियों की वर्किंग कैपिटल की जरूरत भी बढ़ रही है. वर्किंग कैपिटल लिमिट का औसत इस्तेमाल बढ़कर 60-65 फीसदी हो गया है, जो पहले 50-55 फीसदी था. बैंक के अनुसार, इनपुट लागत बढ़ने के बीच कारोबारों को ज्यादा लिक्विडिटी की जरूरत पड़ रही है. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के दबाव के बावजूद कंपनियों की बिक्री broadly स्थिर बनी हुई है.
ECLGS 5.0 के तहत 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का वितरण
एक्सिस बैंक ने मिड-कॉरपोरेट और मीडियम एंटरप्राइज ग्राहकों को ECLGS 5.0 के तहत 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज वितरित किया है. बैंक का कहना है कि इन सुविधाओं का इस्तेमाल चुनिंदा तौर पर उन कारोबारों को किया गया है, जिन्हें वास्तव में लिक्विडिटी की जरूरत थी. कर्ज देने से पहले ग्राहकों की क्रेडिट क्षमता का आकलन भी किया गया.
लोन ग्रोथ में AI और क्रॉस-सेलिंग की भूमिका
बैंक कंपनी की प्रोफाइल तैयार करने, निगरानी और क्रेडिट असेसमेंट के लिए AI आधारित टूल्स का इस्तेमाल कर रहा है. इसके साथ ही क्रेडिट प्रस्तावों की प्रोसेसिंग को तेज करने के लिए नई तकनीक विकसित की जा रही है, हालांकि बैंक ने रिस्क कंट्रोल को प्राथमिकता देने की बात कही है.
एक्सिस बैंक की रणनीति केवल लोन देने तक सीमित नहीं है. बैंक मिड-कॉरपोरेट ग्राहकों को ट्रांजैक्शन बैंकिंग, कॉरपोरेट सैलरी सॉल्यूशंस, वेल्थ मैनेजमेंट और अपनी सहायक कंपनियों के जरिए अन्य सेवाएं भी दे रहा है. इसका उद्देश्य मिड-साइज कंपनियों के बड़े कारोबार में बदलने के साथ बैंक के साथ उनके संबंधों को और मजबूत करना है.
Q1FY27 में कॉरपोरेट लोन बुक 38 फीसदी बढ़ा
एक्सिस बैंक की कुल कॉरपोरेट लोन बुक में भी अच्छी ग्रोथ दर्ज की गई है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1FY27) में बैंक की कॉरपोरेट लोन बुक सालाना आधार पर 38 फीसदी बढ़ी. वहीं, मिड-कॉरपोरेट पोर्टफोलियो में 27 फीसदी की वृद्धि हुई.
इससे बैंक के कुल क्रेडिट ग्रोथ में मिड-कॉरपोरेट सेगमेंट का योगदान लगातार बढ़ने का संकेत मिलता है. बैंक के मुताबिक, फिलहाल मिड-कॉरपोरेट कारोबार में ऑर्गेनिक ग्रोथ की पर्याप्त संभावनाएं हैं. इसलिए इस सेगमेंट के विस्तार के लिए फिलहाल किसी इनऑर्गेनिक ग्रोथ या अधिग्रहण को रणनीतिक प्राथमिकता नहीं दी जा रही है.
RBI के पास अब रुपये पर दबाव से निपटने के लिए मजबूत सुरक्षा कवच, फरवरी के पुराने रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 21 अगस्त को समाप्त सप्ताह में 12.4 अरब डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 729.3 अरब डॉलर पहुंच गया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, यह फरवरी में दर्ज 728.5 अरब डॉलर के पिछले रिकॉर्ड से भी अधिक है. विदेशी मुद्रा भंडार में इस बढ़ोतरी से RBI को रुपये पर दबाव बढ़ने की स्थिति में विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिलेगी.
यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, वैश्विक ब्याज दरों और पूंजी के उतार-चढ़ाव को लेकर जोखिम बना हुआ है. भारत के लिए आयातित कच्चे तेल की ऊंची कीमतें खास चिंता का विषय हैं, क्योंकि इससे देश का आयात बिल बढ़ता है और डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव पड़ सकता है.
विदेशी पूंजी के बढ़े प्रवाह से मिली मजबूती
विदेशी मुद्रा भंडार में हालिया बढ़ोतरी के पीछे विदेशी मुद्रा के मजबूत प्रवाह की अहम भूमिका रही है. RBI ने जून में विदेशों से पूंजी आकर्षित करने के लिए कुछ कदम उठाए थे. इनमें प्रवासी भारतीयों और अन्य गैर-निवासी ग्राहकों के लिए विशेष जमा योजना भी शामिल थी.
उपलब्ध विश्लेषण के अनुसार, 21 अगस्त तक इन उपायों के जरिए करीब 72.8 अरब डॉलर का विदेशी पूंजी प्रवाह हुआ. इससे भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है और पूंजी खाते में लगातार तीसरे साल घाटे का जोखिम भी कम हुआ है.
रुपये को संभालने में RBI की बढ़ी क्षमता
रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार RBI को रुपये में तेज गिरावट आने की स्थिति में ज्यादा मजबूती से हस्तक्षेप करने की क्षमता देता है. मई में रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने के बाद भारतीय मुद्रा में करीब 1.7 फीसदी की रिकवरी हुई है. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और ईंधन के आयात पर भारत की निर्भरता अब भी रुपये के लिए जोखिम बनी हुई है.
तेल की कीमतें बढ़ने पर भारत का आयात बिल बढ़ता है और इसके लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है. ऐसे में RBI अपने बड़े विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ा सकता है और रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित कर सकता है.
विदेशी जमा योजना की लागत भी बढ़ी
विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए शुरू की गई विशेष प्रवासी जमा योजना से जहां भंडार बढ़ाने में मदद मिली है, वहीं इसकी लागत भी RBI के लिए बढ़ी है. इस योजना के तहत RBI बैंकों की हेजिंग लागत वहन करता है, जिससे बैंक विदेशों में रहने वाले ग्राहकों को ज्यादा आकर्षक ब्याज दर देने में सक्षम होते हैं.
अमेरिका में ब्याज दरें 2013 की तुलना में काफी ऊंची रहने के कारण इस तरह से फंड जुटाने की लागत भी बढ़ गई है. इससे पहले RBI ने 2013 में रुपये पर दबाव के दौरान विदेशों में रहने वाले भारतीयों से विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए ऐसी व्यवस्था का सहारा लिया था.
सालाना करीब 5.7 अरब डॉलर की लागत का अनुमान
विश्लेषण में इस योजना से जुड़ी सालाना लागत करीब 5.7 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया है. इसकी एक वजह यह है कि RBI के जरिए जुटाए गए डॉलर आमतौर पर अपेक्षाकृत कम रिटर्न देने वाली परिसंपत्तियों में निवेश किए जाते हैं.
ऐसे में इन परिसंपत्तियों से मिलने वाला रिटर्न, फंड जुटाने की लागत से कम हो सकता है. इससे देश पर 'कैरी कॉस्ट' का बोझ पड़ता है. यानी विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के साथ-साथ उसे बनाए रखने की वित्तीय लागत भी जुड़ी हुई है.
अनुमान से ज्यादा आया विदेशी पूंजी प्रवाह
RBI ने इस महीने की शुरुआत में विशेष प्रवासी जमा योजना को तय समय से पहले बंद करने का फैसला किया था. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि इस योजना के तहत विदेशी पूंजी का प्रवाह अनुमान से ज्यादा रहा. योजना के जरिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार में तेज बढ़ोतरी हुई और बाहरी वित्तीय स्थिति मजबूत हुई.
आगे भी चुनौती बनी रहेंगी वैश्विक परिस्थितियां
विदेशी मुद्रा भंडार का 729.3 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना भारत की बाहरी अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत सुरक्षा कवच है. इससे RBI को वैश्विक आर्थिक झटकों और रुपये पर पड़ने वाले दबाव से निपटने में मदद मिलेगी. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक ब्याज दरों में बदलाव और विदेशी पूंजी के प्रवाह में उतार-चढ़ाव आगे भी चुनौती बने रहेंगे. ऐसे में रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार RBI के लिए रुपये में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण साधन साबित हो सकता है.
Reactin Plus Tablets की पैकेजिंग पर कथित गलत विज्ञापन और नियामकीय नियमों के उल्लंघन के मामले में पुणे FDA ने की कार्रवाई. करीब ₹99.99 लाख का दवा स्टॉक जब्त, कंपनी ने आदेश को अदालत में चुनौती देने की बात कही.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पुणे में खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने गलत विज्ञापन और दवा संबंधी नियमों के कथित उल्लंघन के मामले में सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड के दवा भंडारण एवं वितरण लाइसेंस को रद्द कर दिया है. मामला Reactin Plus Tablets से जुड़ा है, जिसकी पैकेजिंग पर FDA ने नियमों के विपरीत विज्ञापन पाए जाने की बात कही है. हालांकि, कंपनी ने FDA के आदेश को चुनौती दी है और कहा है कि मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है.
जून में कंपनी के वेयरहाउस पर हुई थी कार्रवाई
FDA के मुताबिक, जून 2026 में पुणे के वडकी स्थित कंपनी के मुख्य वेयरहाउस पर कार्रवाई के दौरान Reactin Plus Tablets से जुड़े नियमों के उल्लंघन सामने आए. यह दवा Schedule H श्रेणी में आती है, यानी इसे डॉक्टर की पर्ची के आधार पर ही बेचा जाना चाहिए.
FDA ने कहा कि ऐसी दवाओं की पैकेजिंग पर इस तरह का विज्ञापन उपभोक्ताओं को डॉक्टर की सलाह के बिना दवा लेने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है. इससे स्वयं दवा लेने की प्रवृत्ति बढ़ने और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है.
करीब ₹99.99 लाख का दवा स्टॉक जब्त
जांच के दौरान FDA ने करीब ₹99.99 लाख मूल्य का दवा स्टॉक जब्त किया. प्रशासन ने Reactin Plus Tablets को गलत लेबल या गलत जानकारी वाली दवा (Misbranded Medicine) के तौर पर चिह्नित करते हुए इसके स्टॉक को बाजार से वापस मंगाने का निर्देश दिया. FDA के मुताबिक, कंपनी को स्टॉक वापस लेने से संबंधित जरूरी निर्देश दिए गए थे, लेकिन उनका पूरी तरह पालन नहीं किया गया. इसके बाद विभाग ने दवा भंडारण एवं वितरण लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई की.
दवा कंपनियों के लिए सख्ती का संदेश
FDA की इस कार्रवाई को दवाओं की पैकेजिंग, विज्ञापन और सप्लाई चेन से जुड़े नियामकीय नियमों के अनुपालन के लिहाज से अहम माना जा रहा है. खासकर डॉक्टर की पर्ची पर मिलने वाली दवाओं के प्रचार और बिक्री को लेकर नियामक सख्ती का संदेश गया है.
सिप्ला ने FDA के आदेश को दी चुनौती
सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज (CPLS) ने कहा कि उसने पुणे FDA के आदेश को चुनौती दी है. कंपनी के मुताबिक, यह आदेश उसके द्वारा संचालित कैरी एंड फॉरवर्डिंग (C&F) वेयरहाउस के संचालन से संबंधित है और मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है. ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक इस मामले पर आगे टिप्पणी करना उचित नहीं होगा.
कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि FDA के आदेश में उसके उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता या प्रभावशीलता को लेकर कोई चिंता नहीं जताई गई है. सिप्ला के मुताबिक, आदेश में मरीजों की सुरक्षा से जुड़ी किसी समस्या का भी उल्लेख या संकेत नहीं है. सिप्ला ने कहा कि वह करीब नौ दशकों से स्वास्थ्य क्षेत्र में काम कर रही है और उत्पादों की गुणवत्ता, नियामकीय अनुपालन तथा मरीजों की सुरक्षा के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है.
RPG Enterprises के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने कहा कि सुभाष चंद्रा की वित्तीय स्थिति को लेकर कई तथ्य गलत तरीके से प्रसारित किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले चंद्रा का पक्ष भी सुना जाना चाहिए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
उद्योगपति और RPG Enterprises के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने Essel Group के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की वित्तीय स्थिति और उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही को लेकर जारी विवाद में चंद्रा का पक्ष सामने रखने की जरूरत बताई है. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में गोयनका ने कहा कि चंद्रा की देनदारियों से जुड़े 22,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को व्यापक रूप से गलत समझा गया है और इस मामले में प्रसारित किए जा रहे कई तथ्यों की गहन जांच की जरूरत है.
‘99% से ज्यादा हेयरकट’ वाली खबरों पर उठाए सवाल
गोयनका ने उन खबरों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि सुभाष चंद्रा को बैंकों से 99% से ज्यादा का हेयरकट मिला है. उन्होंने कहा कि इस तरह की सुर्खियों के बीच चंद्रा की ओर से पेश किए जा रहे पक्ष को भी सुनना जरूरी है. गोयनका ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि किसी भी मामले में कहानी के हमेशा दो पहलू होते हैं और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दोनों पक्षों को सुनना चाहिए.
22,000 करोड़ रुपये के कर्ज को लेकर चंद्रा का दावा
गोयनका की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सुभाष चंद्रा ने अपनी वित्तीय स्थिति और राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) की कार्यवाही को लेकर सामने आई खबरों पर आपत्ति जताई है. चंद्रा का कहना है कि कुछ रिपोर्टों में गलत तरीके से यह बताया गया कि करीब 22,000 करोड़ रुपये का उनका कर्ज NCLT की प्रक्रिया के तहत केवल 6.5 करोड़ रुपये में निपट गया. चंद्रा ने इस प्रस्तुति को गलत बताया है.
रिलायंस और मीडिया संस्थानों पर भी लगाए आरोप
चंद्रा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और रिलायंस से जुड़े कुछ मीडिया संस्थानों पर उनके और Essel Group के खिलाफ कथित तौर पर प्रचार किए जाने का आरोप भी लगाया है. उन्होंने आरोप लगाया कि TV18 नेटवर्क के चैनलों, जिनमें CNBC भी शामिल है, ने उनके कर्ज और NCLT कार्यवाही से जुड़ी ऐसी जानकारी प्रसारित की, जिसे वह गलत मानते हैं.
2019 के Zee मामले को फिर उठाया
सुभाष चंद्रा ने Zee से जुड़े 2019 के घटनाक्रम को लेकर भी आरोप दोहराए हैं. उनका दावा है कि अंबानी से जुड़े कुछ संस्थानों की भूमिका Zee के शेयर मूल्य में आई तेज गिरावट में थी. इसके बाद उन्होंने निवेशक Invesco के साथ मिलकर Zee के अधिग्रहण की कथित कोशिश का भी आरोप लगाया.
चंद्रा के मुताबिक, प्रस्तावित व्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकी क्योंकि यह अल्पसंख्यक शेयरधारकों के हित में नहीं थी. उन्होंने Essel Group पर वर्षों से रहे वित्तीय दबाव का भी जिक्र किया और कहा कि वित्तीय दायित्वों को पूरा करने के प्रयासों के तहत समूह को अपनी कुछ परिसंपत्तियां बेचनी पड़ीं.
22,000 करोड़ रुपये के आंकड़े की व्याख्या पर बहस जारी
हर्ष गोयनका की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सुभाष चंद्रा की वित्तीय स्थिति और 22,000 करोड़ रुपये के आंकड़े की व्याख्या को लेकर बहस जारी है. गोयनका ने अपने बयान के जरिए चंद्रा के पक्ष को भी चर्चा में शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया है. हालांकि, चंद्रा की ओर से लगाए गए आरोपों और विभिन्न दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस पोस्ट से नहीं होती है. मामले से जुड़े वित्तीय आंकड़ों और NCLT की कार्यवाही को समझने के लिए संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड को देखना जरूरी है.
जून के संशोधित 8.8% के मुकाबले जुलाई में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर में आई गिरावट, खनन क्षेत्र में फिर संकुचन और मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार भी हुई धीमी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के औद्योगिक क्षेत्र की रफ्तार जुलाई में थोड़ी धीमी पड़ गई. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की वृद्धि दर घटकर 6.7% रह गई, जो जून के संशोधित 8.8% से काफी कम है. मैन्युफैक्चरिंग और खनन क्षेत्र के कमजोर प्रदर्शन का असर औद्योगिक वृद्धि पर पड़ा. पिछले महीने की तुलना में चार प्रमुख क्षेत्रों में से तीन की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) जुलाई में 124.8 पर रहा, जो एक साल पहले 117 था.
मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ 9.5% से घटकर 7.3%
IIP में सबसे ज्यादा भारांश रखने वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि दर जुलाई में घटकर 7.3% रह गई, जो जून में 9.5% थी. हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग के 23 औद्योगिक समूहों में से 19 ने एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले दोहरे अंकों में वृद्धि दर्ज की. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सबसे ज्यादा गति बिजली उपकरणों के उत्पादन से मिली, जिसमें 28.3% की शानदार वृद्धि हुई. इसके बाद मोटर वाहन, ट्रेलर और सेमी-ट्रेलर का उत्पादन 22.2% बढ़ा.
इन चार औद्योगिक समूहों में गिरावट
जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग के कुछ प्रमुख औद्योगिक समूहों में गिरावट भी दर्ज की गई. औषधि क्षेत्र में 5.6%, तंबाकू उत्पादों में 12.2%, रासायनिक उत्पादों में 2.7% और पहनने के कपड़ों के उत्पादन में 0.6% की कमी आई.
बिजली और गैस क्षेत्र की रफ्तार भी हुई धीमी
बिजली और गैस आपूर्ति क्षेत्र जुलाई में 8.7% की वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र रहा. हालांकि, जून में दर्ज 11.3% की वृद्धि के मुकाबले इसकी रफ्तार काफी धीमी रही और यह तीन महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई. इस दौरान गैर-नवीकरणीय स्रोतों से बिजली उत्पादन में 12.5% की वृद्धि हुई, जबकि बिजली सब-कंपोनेंट में 9.3% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
खनन क्षेत्र फिर संकुचन में
जून में 1.6% की वृद्धि दर्ज करने के बाद जुलाई में खनन और उत्खनन क्षेत्र में 0.9% की गिरावट आई. इस गिरावट की प्रमुख वजह नॉन-मेटैलिक मिनरल्स में 12.5% और फ्यूल मिनरल्स में 1.3% की कमी रही. हालांकि, मेटैलिक मिनरल्स ने इस रुझान के उलट प्रदर्शन किया और जुलाई में 24.3% की मजबूत वृद्धि दर्ज की.
पानी, सीवरेज और वेस्ट मैनेजमेंट में मजबूत वृद्धि
दूसरी ओर, पानी की आपूर्ति, सीवरेज और वेस्ट मैनेजमेंट क्षेत्र ने जुलाई में 7.4% की वृद्धि दर्ज की. यह इस क्षेत्र की पिछले 12 महीनों की सबसे अधिक वृद्धि रही.
अप्रैल-जुलाई में IIP ग्रोथ 6.3%
मौजूदा वित्त वर्ष 2026-27 के पहले चार महीनों यानी अप्रैल से जुलाई के दौरान औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की संचयी वृद्धि दर 6.3% रही. यह पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में दर्ज 4% की वृद्धि से अधिक है.
वह लगभग कुछ भी लेकर नहीं गए, उन्होंने कर्ज की गारंटी दी. कंपनियां डूब गईं. उनकी संपत्ति की कीमत ₹32 करोड़ थी. बैंकों ने ₹6.5 करोड़ के लिए मतदान किया. बाकी सब उन लोगों के लिए सिर्फ गणित है, जो गणित नहीं कर सकते. सोशल मीडिया ने इस कहानी को पूरी तरह गलत समझ लिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
सोशल मीडिया पर पोस्ट कुछ इस तरह चल रही है: सुभाष चंद्रा ने भारतीय बैंकों से ₹22,006 करोड़ उधार लिए, भुगतान करने से इनकार कर दिया, ट्रिब्यूनल में पहुंचे और उन्हें ₹6.5 करोड़ में छोड़ दिया गया. और सबसे अहम बात, वह बीजेपी सांसद थे, इसलिए जाहिर है कि वह बच निकले. यह एक साफ-सुथरी कहानी है और यह एक शब्द की गलतफहमी पर भी आधारित है: गारंटी.
इस कहानी को सबसे ज्यादा बढ़ावा देने वाली आवाजों में विजय माल्या भी शामिल हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो खुद लंदन से अपने प्रत्यर्पण के खिलाफ मुकदमा लड़ रहा है और भारतीयों को समझा रहा है कि बैंक रिकवरी कैसे होनी चाहिए.
असल में क्या हुआ, आसान भाषा में
इसे इस तरह समझिए. आपका कोई रिश्तेदार फैक्ट्री बनाने के लिए कर्ज लेता है. बैंक आपसे गारंटर के तौर पर हस्ताक्षर करने को कहता है. आपने पैसे को कभी छुआ तक नहीं. फैक्ट्री असफल हो जाती है. अब बैंक आपके पीछे आ सकता है.
चंद्रा ने औद्योगिक स्तर पर यही किया. उनकी समूह कंपनियों ने कर्ज लिया. उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उन कर्जों की गारंटी दी. जब समूह डूब गया, तो कर्जदाताओं ने गारंटर का रुख किया.
₹22,006 करोड़ वह पैसा नहीं है जो सुभाष चंद्रा के बैंक खाते में गया था. यह हर उस कर्जदाता के कुल दावे का आंकड़ा है, जिसके पास उनके हस्ताक्षर थे. एक-दूसरे से जुड़े हुए. एक के ऊपर एक. उन कर्जों की गारंटी के रूप में, जिन्हें दूसरी कंपनियों ने लिया और खर्च किया.
मामला ₹22,000 करोड़ से शुरू भी नहीं हुआ था. इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने अप्रैल 2024 में ₹170 करोड़ के एक कर्ज की गारंटी को लेकर उन्हें नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में घसीटा था. यह कर्ज विवेक इंफ्राकॉन नाम की कंपनी को दिया गया था. एक बार यह रास्ता खुला तो उनके गारंटर होने का दावा रखने वाले हर दूसरे कर्जदाता ने भी अपना दावा दाखिल कर दिया. इसी तरह यह राशि बढ़कर ₹22,006 करोड़ तक पहुंची.
तो फिर सिर्फ ₹6.5 करोड़ क्यों?
क्योंकि लगभग इतना ही उपलब्ध था.
दिवाला अदालत सजा देने वाली अदालत नहीं है. यह बांटने वाली अदालत है. उसका एक साधारण सवाल होता है: इस व्यक्ति के पास वास्तव में क्या बचा है और किसे उसमें से कितना हिस्सा मिलेगा?
अदालत द्वारा नियुक्त रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्यांकन किया. निष्कर्ष: इसकी कीमत ₹6.5 करोड़ की पेशकश से भी कम थी. इसमें से ₹6.25 करोड़ कर्जदाताओं को और ₹25 लाख प्रक्रिया की लागत के लिए जाते हैं.
इसके बाद बैंकों ने खुद मतदान किया. दिवाला कानून के तहत फैसला कर्जदाता लेते हैं, जज नहीं. नवंबर 2024 में 80.81 प्रतिशत वोटिंग हिस्सेदारी रखने वाले कर्जदाताओं ने योजना के पक्ष में मतदान किया. 2026 में ट्रिब्यूनल ने इसे मंजूरी दी, जब विभाजित फैसले को तीसरे सदस्य ने तोड़ा.
ट्रिब्यूनल का तर्क स्पष्ट था: वह बैंकों द्वारा लिए गए व्यावसायिक फैसले को सिर्फ इसलिए पलट नहीं सकता क्योंकि हेयरकट शर्मनाक दिखता है. और अगर वह इस सौदे को खारिज कर देता, तो चंद्रा पूरी तरह दिवालिया हो जाते, ऐसी स्थिति में विरोध करने वाले कर्जदाताओं को अधिक के बजाय कम मिलने की संभावना थी.
आप ऐसी संपत्ति से ₹22,000 करोड़ नहीं निकाल सकते, जिसके पास ₹32 करोड़ हैं. किसी भी अदालत के पास ऐसी मशीनरी नहीं है.
"उन्होंने एक रुपया भी वापस नहीं किया" यह दूसरा झूठ है
IL&FS संकट के बाद भारत का क्रेडिट बाजार ठहर गया था. उस समय एस्सेल ग्रुप पर करीब ₹20,000 करोड़ का कर्ज था. परिवार के पास जी के शेयर कर्जदाताओं के पास गिरवी थे. एक घबराहट में हुई बिक्री से पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो सकती थी.
चंद्रा के परिवार ने खुद जी की हिस्सेदारी बेची, जिस कारोबार को उन्होंने बनाया था और जिसे वह समूह का क्राउन ज्वेल कहते थे. साथ ही अन्य कंपनियों को भी बेचकर कर्जदाताओं का भुगतान किया. 2021 तक उन्होंने कहा था कि 43 कर्जदाताओं और 110 खातों में कुल कर्ज का 91.2 प्रतिशत चुका दिया गया था.
यह ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसने नकदी ली और विजय माल्या की तरह भाग गया. उन्होंने कर्ज चुकाने के लिए अपना साम्राज्य बेच दिया. जो बचा, वह लगभग खाली व्यक्तिगत संपत्ति के ऊपर मौजूद व्यक्तिगत गारंटियां थीं.
और बीजेपी सांसद वाली बात?
वह कभी बीजेपी सांसद नहीं थे. वह 2016 से 2022 के बीच हरियाणा से निर्दलीय राज्यसभा सदस्य थे और बीजेपी के समर्थन से चुने गए थे. 2022 में वह दोबारा चुनाव जीतने में असफल रहे. दिवाला मामला 2024 में स्वीकार किया गया. योजना को 2026 में मंजूरी मिली. इन सबके शुरू होने से कई साल पहले ही वह संसद से बाहर हो चुके थे.
अब वह हिस्सा, जो वास्तव में परेशान करने वाला है
इसे क्लीन चिट न समझें.
कर्जदाताओं ने बताया कि पुराने नेट-वर्थ सर्टिफिकेट में कभी चंद्रा की संपत्ति का मूल्य ₹40,000 करोड़ से अधिक आंका गया था. इस कार्यवाही में उनकी घोषित नेट वर्थ करीब ₹32 करोड़ थी.
इस अंतर की जांच जरूरी है. ट्रिब्यूनल ने माना कि यह सवाल जायज था और फिर कहा कि दिवाला कानून के तहत किसी योजना को मंजूरी देने से पहले फॉरेंसिक ऑडिट जरूरी नहीं है. यह आरोप भी लगाए गए कि कुछ "हां" वोट मित्रवत संस्थाओं की ओर से आए थे. अगर अपील में यह कभी साबित हो जाता है, तो 80 प्रतिशत की मंजूरी और भी गंभीर सवालों में बदल जाएगी.
और इसकी कीमत वास्तविक है. एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने योजना के खिलाफ मतदान किया. उसके ₹1,322 करोड़ के स्वीकृत दावे से उसे करीब ₹38 लाख मिलेंगे. इस कानून के तहत असहमति जताने वाले कर्जदाता बहुमत के फैसले से बंधे होते हैं.
ईमानदार निष्कर्ष
उन्होंने अपने समूह के कर्ज की जरूरत से ज्यादा गारंटी दी. समूह संकट में फंस गया. उन्होंने ज्यादातर कर्जदाताओं का भुगतान करने के लिए जी का नियंत्रण बेच दिया. जो बचा, वह एक कमजोर व्यक्तिगत संपत्ति के खिलाफ गारंटियां थीं. बैंकों ने खुद ₹6.5 करोड़ को ऐसी संपत्तियों के लिए लड़ने के बजाय चुना, जिनकी कीमत इससे भी कम थी.
यह एक बेहद बड़ा हेयरकट है और भारत में व्यक्तिगत गारंटरों से निपटने के तरीके में गंभीर खामी है.
यह इस बात का सबूत नहीं है कि एक पूर्व निर्दलीय सांसद ने ₹22,000 करोड़ चुराए और खुद के लिए राजनीतिक छूट खरीद ली.
अगर आप नाराज हैं, तो कड़ी जांच की मांग करें. यह एक वयस्क तर्क है. वायरल संस्करण सिर्फ ऐसी गणित है, जिसमें फाइल को शामिल नहीं किया गया है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)