मौजूदा 80,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर अगले 3-4 तिमाहियों में 1 लाख करोड़ रुपये करने की तैयारी, Tier-2 और Tier-3 शहरों पर फोकस
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
एक्सिस बैंक (Axis Bank) अपने मिड-कॉरपोरेट कारोबार को तेजी से बढ़ाने की तैयारी कर रहा है. निजी क्षेत्र का यह बैंक अगले 3-4 तिमाहियों में अपने मिड-कॉरपोरेट फंडेड लोन बुक को मौजूदा करीब 80,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1 लाख करोड़ रुपये करना चाहता है. बैंक का लक्ष्य इस सेगमेंट में सालाना 25-30 फीसदी की दर से ग्रोथ हासिल करना है. एक्सिस बैंक के मिड-कॉरपोरेट एंड मीडियम एंटरप्राइजेज ग्रुप के ग्रुप हेड प्रशांत टीएस के मुताबिक, यह कारोबार बैंक के लिए ग्रोथ का एक प्रमुख इंजन बना हुआ है.
80,000 करोड़ रुपये का फंडेड एक्सपोजर
बैंक के मिड-कॉरपोरेट कारोबार में फिलहाल करीब 80,000 करोड़ रुपये का फंड-बेस्ड लोन एक्सपोजर है. इसके अलावा लगभग 18,000 करोड़ रुपये का नॉन-फंड-बेस्ड एक्सपोजर है. इस पोर्टफोलियो का रिटर्न ऑन एसेट्स (ROA) करीब 2 फीसदी है, जबकि क्रेडिट कॉस्ट बेहद कम है. इससे बैंक को इस कारोबार के विस्तार के लिए पर्याप्त गुंजाइश मिल रही है.
Tier-2 और Tier-3 शहरों पर बढ़ा फोकस
एक्सिस बैंक अब बड़े शहरों से आगे बढ़कर Tier-2 और Tier-3 शहरों में अपनी मिड-कॉरपोरेट पहुंच मजबूत कर रहा है. बैंक के मुताबिक, उसके इस कारोबार का करीब 30-35 फीसदी हिस्सा गैर-Tier-1 शहरों से आता है. बैंक को इन बाजारों में आगे भी कारोबार बढ़ाने की अच्छी संभावनाएं नजर आ रही हैं. इसके साथ ही कंपनियों की वर्किंग कैपिटल की जरूरत भी बढ़ रही है. वर्किंग कैपिटल लिमिट का औसत इस्तेमाल बढ़कर 60-65 फीसदी हो गया है, जो पहले 50-55 फीसदी था. बैंक के अनुसार, इनपुट लागत बढ़ने के बीच कारोबारों को ज्यादा लिक्विडिटी की जरूरत पड़ रही है. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के दबाव के बावजूद कंपनियों की बिक्री broadly स्थिर बनी हुई है.
ECLGS 5.0 के तहत 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का वितरण
एक्सिस बैंक ने मिड-कॉरपोरेट और मीडियम एंटरप्राइज ग्राहकों को ECLGS 5.0 के तहत 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज वितरित किया है. बैंक का कहना है कि इन सुविधाओं का इस्तेमाल चुनिंदा तौर पर उन कारोबारों को किया गया है, जिन्हें वास्तव में लिक्विडिटी की जरूरत थी. कर्ज देने से पहले ग्राहकों की क्रेडिट क्षमता का आकलन भी किया गया.
लोन ग्रोथ में AI और क्रॉस-सेलिंग की भूमिका
बैंक कंपनी की प्रोफाइल तैयार करने, निगरानी और क्रेडिट असेसमेंट के लिए AI आधारित टूल्स का इस्तेमाल कर रहा है. इसके साथ ही क्रेडिट प्रस्तावों की प्रोसेसिंग को तेज करने के लिए नई तकनीक विकसित की जा रही है, हालांकि बैंक ने रिस्क कंट्रोल को प्राथमिकता देने की बात कही है.
एक्सिस बैंक की रणनीति केवल लोन देने तक सीमित नहीं है. बैंक मिड-कॉरपोरेट ग्राहकों को ट्रांजैक्शन बैंकिंग, कॉरपोरेट सैलरी सॉल्यूशंस, वेल्थ मैनेजमेंट और अपनी सहायक कंपनियों के जरिए अन्य सेवाएं भी दे रहा है. इसका उद्देश्य मिड-साइज कंपनियों के बड़े कारोबार में बदलने के साथ बैंक के साथ उनके संबंधों को और मजबूत करना है.
Q1FY27 में कॉरपोरेट लोन बुक 38 फीसदी बढ़ा
एक्सिस बैंक की कुल कॉरपोरेट लोन बुक में भी अच्छी ग्रोथ दर्ज की गई है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1FY27) में बैंक की कॉरपोरेट लोन बुक सालाना आधार पर 38 फीसदी बढ़ी. वहीं, मिड-कॉरपोरेट पोर्टफोलियो में 27 फीसदी की वृद्धि हुई.
इससे बैंक के कुल क्रेडिट ग्रोथ में मिड-कॉरपोरेट सेगमेंट का योगदान लगातार बढ़ने का संकेत मिलता है. बैंक के मुताबिक, फिलहाल मिड-कॉरपोरेट कारोबार में ऑर्गेनिक ग्रोथ की पर्याप्त संभावनाएं हैं. इसलिए इस सेगमेंट के विस्तार के लिए फिलहाल किसी इनऑर्गेनिक ग्रोथ या अधिग्रहण को रणनीतिक प्राथमिकता नहीं दी जा रही है.
RBI के पास अब रुपये पर दबाव से निपटने के लिए मजबूत सुरक्षा कवच, फरवरी के पुराने रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 21 अगस्त को समाप्त सप्ताह में 12.4 अरब डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 729.3 अरब डॉलर पहुंच गया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, यह फरवरी में दर्ज 728.5 अरब डॉलर के पिछले रिकॉर्ड से भी अधिक है. विदेशी मुद्रा भंडार में इस बढ़ोतरी से RBI को रुपये पर दबाव बढ़ने की स्थिति में विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिलेगी.
यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, वैश्विक ब्याज दरों और पूंजी के उतार-चढ़ाव को लेकर जोखिम बना हुआ है. भारत के लिए आयातित कच्चे तेल की ऊंची कीमतें खास चिंता का विषय हैं, क्योंकि इससे देश का आयात बिल बढ़ता है और डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव पड़ सकता है.
विदेशी पूंजी के बढ़े प्रवाह से मिली मजबूती
विदेशी मुद्रा भंडार में हालिया बढ़ोतरी के पीछे विदेशी मुद्रा के मजबूत प्रवाह की अहम भूमिका रही है. RBI ने जून में विदेशों से पूंजी आकर्षित करने के लिए कुछ कदम उठाए थे. इनमें प्रवासी भारतीयों और अन्य गैर-निवासी ग्राहकों के लिए विशेष जमा योजना भी शामिल थी.
उपलब्ध विश्लेषण के अनुसार, 21 अगस्त तक इन उपायों के जरिए करीब 72.8 अरब डॉलर का विदेशी पूंजी प्रवाह हुआ. इससे भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है और पूंजी खाते में लगातार तीसरे साल घाटे का जोखिम भी कम हुआ है.
रुपये को संभालने में RBI की बढ़ी क्षमता
रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार RBI को रुपये में तेज गिरावट आने की स्थिति में ज्यादा मजबूती से हस्तक्षेप करने की क्षमता देता है. मई में रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने के बाद भारतीय मुद्रा में करीब 1.7 फीसदी की रिकवरी हुई है. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और ईंधन के आयात पर भारत की निर्भरता अब भी रुपये के लिए जोखिम बनी हुई है.
तेल की कीमतें बढ़ने पर भारत का आयात बिल बढ़ता है और इसके लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है. ऐसे में RBI अपने बड़े विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ा सकता है और रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित कर सकता है.
विदेशी जमा योजना की लागत भी बढ़ी
विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए शुरू की गई विशेष प्रवासी जमा योजना से जहां भंडार बढ़ाने में मदद मिली है, वहीं इसकी लागत भी RBI के लिए बढ़ी है. इस योजना के तहत RBI बैंकों की हेजिंग लागत वहन करता है, जिससे बैंक विदेशों में रहने वाले ग्राहकों को ज्यादा आकर्षक ब्याज दर देने में सक्षम होते हैं.
अमेरिका में ब्याज दरें 2013 की तुलना में काफी ऊंची रहने के कारण इस तरह से फंड जुटाने की लागत भी बढ़ गई है. इससे पहले RBI ने 2013 में रुपये पर दबाव के दौरान विदेशों में रहने वाले भारतीयों से विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए ऐसी व्यवस्था का सहारा लिया था.
सालाना करीब 5.7 अरब डॉलर की लागत का अनुमान
विश्लेषण में इस योजना से जुड़ी सालाना लागत करीब 5.7 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया है. इसकी एक वजह यह है कि RBI के जरिए जुटाए गए डॉलर आमतौर पर अपेक्षाकृत कम रिटर्न देने वाली परिसंपत्तियों में निवेश किए जाते हैं.
ऐसे में इन परिसंपत्तियों से मिलने वाला रिटर्न, फंड जुटाने की लागत से कम हो सकता है. इससे देश पर 'कैरी कॉस्ट' का बोझ पड़ता है. यानी विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के साथ-साथ उसे बनाए रखने की वित्तीय लागत भी जुड़ी हुई है.
अनुमान से ज्यादा आया विदेशी पूंजी प्रवाह
RBI ने इस महीने की शुरुआत में विशेष प्रवासी जमा योजना को तय समय से पहले बंद करने का फैसला किया था. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि इस योजना के तहत विदेशी पूंजी का प्रवाह अनुमान से ज्यादा रहा. योजना के जरिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार में तेज बढ़ोतरी हुई और बाहरी वित्तीय स्थिति मजबूत हुई.
आगे भी चुनौती बनी रहेंगी वैश्विक परिस्थितियां
विदेशी मुद्रा भंडार का 729.3 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना भारत की बाहरी अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत सुरक्षा कवच है. इससे RBI को वैश्विक आर्थिक झटकों और रुपये पर पड़ने वाले दबाव से निपटने में मदद मिलेगी. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक ब्याज दरों में बदलाव और विदेशी पूंजी के प्रवाह में उतार-चढ़ाव आगे भी चुनौती बने रहेंगे. ऐसे में रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार RBI के लिए रुपये में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण साधन साबित हो सकता है.
Reactin Plus Tablets की पैकेजिंग पर कथित गलत विज्ञापन और नियामकीय नियमों के उल्लंघन के मामले में पुणे FDA ने की कार्रवाई. करीब ₹99.99 लाख का दवा स्टॉक जब्त, कंपनी ने आदेश को अदालत में चुनौती देने की बात कही.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पुणे में खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने गलत विज्ञापन और दवा संबंधी नियमों के कथित उल्लंघन के मामले में सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड के दवा भंडारण एवं वितरण लाइसेंस को रद्द कर दिया है. मामला Reactin Plus Tablets से जुड़ा है, जिसकी पैकेजिंग पर FDA ने नियमों के विपरीत विज्ञापन पाए जाने की बात कही है. हालांकि, कंपनी ने FDA के आदेश को चुनौती दी है और कहा है कि मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है.
जून में कंपनी के वेयरहाउस पर हुई थी कार्रवाई
FDA के मुताबिक, जून 2026 में पुणे के वडकी स्थित कंपनी के मुख्य वेयरहाउस पर कार्रवाई के दौरान Reactin Plus Tablets से जुड़े नियमों के उल्लंघन सामने आए. यह दवा Schedule H श्रेणी में आती है, यानी इसे डॉक्टर की पर्ची के आधार पर ही बेचा जाना चाहिए.
FDA ने कहा कि ऐसी दवाओं की पैकेजिंग पर इस तरह का विज्ञापन उपभोक्ताओं को डॉक्टर की सलाह के बिना दवा लेने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है. इससे स्वयं दवा लेने की प्रवृत्ति बढ़ने और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है.
करीब ₹99.99 लाख का दवा स्टॉक जब्त
जांच के दौरान FDA ने करीब ₹99.99 लाख मूल्य का दवा स्टॉक जब्त किया. प्रशासन ने Reactin Plus Tablets को गलत लेबल या गलत जानकारी वाली दवा (Misbranded Medicine) के तौर पर चिह्नित करते हुए इसके स्टॉक को बाजार से वापस मंगाने का निर्देश दिया. FDA के मुताबिक, कंपनी को स्टॉक वापस लेने से संबंधित जरूरी निर्देश दिए गए थे, लेकिन उनका पूरी तरह पालन नहीं किया गया. इसके बाद विभाग ने दवा भंडारण एवं वितरण लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई की.
दवा कंपनियों के लिए सख्ती का संदेश
FDA की इस कार्रवाई को दवाओं की पैकेजिंग, विज्ञापन और सप्लाई चेन से जुड़े नियामकीय नियमों के अनुपालन के लिहाज से अहम माना जा रहा है. खासकर डॉक्टर की पर्ची पर मिलने वाली दवाओं के प्रचार और बिक्री को लेकर नियामक सख्ती का संदेश गया है.
सिप्ला ने FDA के आदेश को दी चुनौती
सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज (CPLS) ने कहा कि उसने पुणे FDA के आदेश को चुनौती दी है. कंपनी के मुताबिक, यह आदेश उसके द्वारा संचालित कैरी एंड फॉरवर्डिंग (C&F) वेयरहाउस के संचालन से संबंधित है और मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है. ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक इस मामले पर आगे टिप्पणी करना उचित नहीं होगा.
कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि FDA के आदेश में उसके उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता या प्रभावशीलता को लेकर कोई चिंता नहीं जताई गई है. सिप्ला के मुताबिक, आदेश में मरीजों की सुरक्षा से जुड़ी किसी समस्या का भी उल्लेख या संकेत नहीं है. सिप्ला ने कहा कि वह करीब नौ दशकों से स्वास्थ्य क्षेत्र में काम कर रही है और उत्पादों की गुणवत्ता, नियामकीय अनुपालन तथा मरीजों की सुरक्षा के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है.
RPG Enterprises के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने कहा कि सुभाष चंद्रा की वित्तीय स्थिति को लेकर कई तथ्य गलत तरीके से प्रसारित किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले चंद्रा का पक्ष भी सुना जाना चाहिए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
उद्योगपति और RPG Enterprises के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने Essel Group के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की वित्तीय स्थिति और उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही को लेकर जारी विवाद में चंद्रा का पक्ष सामने रखने की जरूरत बताई है. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में गोयनका ने कहा कि चंद्रा की देनदारियों से जुड़े 22,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को व्यापक रूप से गलत समझा गया है और इस मामले में प्रसारित किए जा रहे कई तथ्यों की गहन जांच की जरूरत है.
‘99% से ज्यादा हेयरकट’ वाली खबरों पर उठाए सवाल
गोयनका ने उन खबरों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि सुभाष चंद्रा को बैंकों से 99% से ज्यादा का हेयरकट मिला है. उन्होंने कहा कि इस तरह की सुर्खियों के बीच चंद्रा की ओर से पेश किए जा रहे पक्ष को भी सुनना जरूरी है. गोयनका ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि किसी भी मामले में कहानी के हमेशा दो पहलू होते हैं और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दोनों पक्षों को सुनना चाहिए.
22,000 करोड़ रुपये के कर्ज को लेकर चंद्रा का दावा
गोयनका की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सुभाष चंद्रा ने अपनी वित्तीय स्थिति और राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) की कार्यवाही को लेकर सामने आई खबरों पर आपत्ति जताई है. चंद्रा का कहना है कि कुछ रिपोर्टों में गलत तरीके से यह बताया गया कि करीब 22,000 करोड़ रुपये का उनका कर्ज NCLT की प्रक्रिया के तहत केवल 6.5 करोड़ रुपये में निपट गया. चंद्रा ने इस प्रस्तुति को गलत बताया है.
रिलायंस और मीडिया संस्थानों पर भी लगाए आरोप
चंद्रा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और रिलायंस से जुड़े कुछ मीडिया संस्थानों पर उनके और Essel Group के खिलाफ कथित तौर पर प्रचार किए जाने का आरोप भी लगाया है. उन्होंने आरोप लगाया कि TV18 नेटवर्क के चैनलों, जिनमें CNBC भी शामिल है, ने उनके कर्ज और NCLT कार्यवाही से जुड़ी ऐसी जानकारी प्रसारित की, जिसे वह गलत मानते हैं.
2019 के Zee मामले को फिर उठाया
सुभाष चंद्रा ने Zee से जुड़े 2019 के घटनाक्रम को लेकर भी आरोप दोहराए हैं. उनका दावा है कि अंबानी से जुड़े कुछ संस्थानों की भूमिका Zee के शेयर मूल्य में आई तेज गिरावट में थी. इसके बाद उन्होंने निवेशक Invesco के साथ मिलकर Zee के अधिग्रहण की कथित कोशिश का भी आरोप लगाया.
चंद्रा के मुताबिक, प्रस्तावित व्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकी क्योंकि यह अल्पसंख्यक शेयरधारकों के हित में नहीं थी. उन्होंने Essel Group पर वर्षों से रहे वित्तीय दबाव का भी जिक्र किया और कहा कि वित्तीय दायित्वों को पूरा करने के प्रयासों के तहत समूह को अपनी कुछ परिसंपत्तियां बेचनी पड़ीं.
22,000 करोड़ रुपये के आंकड़े की व्याख्या पर बहस जारी
हर्ष गोयनका की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सुभाष चंद्रा की वित्तीय स्थिति और 22,000 करोड़ रुपये के आंकड़े की व्याख्या को लेकर बहस जारी है. गोयनका ने अपने बयान के जरिए चंद्रा के पक्ष को भी चर्चा में शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया है. हालांकि, चंद्रा की ओर से लगाए गए आरोपों और विभिन्न दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस पोस्ट से नहीं होती है. मामले से जुड़े वित्तीय आंकड़ों और NCLT की कार्यवाही को समझने के लिए संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड को देखना जरूरी है.
जून के संशोधित 8.8% के मुकाबले जुलाई में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर में आई गिरावट, खनन क्षेत्र में फिर संकुचन और मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार भी हुई धीमी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के औद्योगिक क्षेत्र की रफ्तार जुलाई में थोड़ी धीमी पड़ गई. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की वृद्धि दर घटकर 6.7% रह गई, जो जून के संशोधित 8.8% से काफी कम है. मैन्युफैक्चरिंग और खनन क्षेत्र के कमजोर प्रदर्शन का असर औद्योगिक वृद्धि पर पड़ा. पिछले महीने की तुलना में चार प्रमुख क्षेत्रों में से तीन की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) जुलाई में 124.8 पर रहा, जो एक साल पहले 117 था.
मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ 9.5% से घटकर 7.3%
IIP में सबसे ज्यादा भारांश रखने वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि दर जुलाई में घटकर 7.3% रह गई, जो जून में 9.5% थी. हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग के 23 औद्योगिक समूहों में से 19 ने एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले दोहरे अंकों में वृद्धि दर्ज की. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सबसे ज्यादा गति बिजली उपकरणों के उत्पादन से मिली, जिसमें 28.3% की शानदार वृद्धि हुई. इसके बाद मोटर वाहन, ट्रेलर और सेमी-ट्रेलर का उत्पादन 22.2% बढ़ा.
इन चार औद्योगिक समूहों में गिरावट
जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग के कुछ प्रमुख औद्योगिक समूहों में गिरावट भी दर्ज की गई. औषधि क्षेत्र में 5.6%, तंबाकू उत्पादों में 12.2%, रासायनिक उत्पादों में 2.7% और पहनने के कपड़ों के उत्पादन में 0.6% की कमी आई.
बिजली और गैस क्षेत्र की रफ्तार भी हुई धीमी
बिजली और गैस आपूर्ति क्षेत्र जुलाई में 8.7% की वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र रहा. हालांकि, जून में दर्ज 11.3% की वृद्धि के मुकाबले इसकी रफ्तार काफी धीमी रही और यह तीन महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई. इस दौरान गैर-नवीकरणीय स्रोतों से बिजली उत्पादन में 12.5% की वृद्धि हुई, जबकि बिजली सब-कंपोनेंट में 9.3% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
खनन क्षेत्र फिर संकुचन में
जून में 1.6% की वृद्धि दर्ज करने के बाद जुलाई में खनन और उत्खनन क्षेत्र में 0.9% की गिरावट आई. इस गिरावट की प्रमुख वजह नॉन-मेटैलिक मिनरल्स में 12.5% और फ्यूल मिनरल्स में 1.3% की कमी रही. हालांकि, मेटैलिक मिनरल्स ने इस रुझान के उलट प्रदर्शन किया और जुलाई में 24.3% की मजबूत वृद्धि दर्ज की.
पानी, सीवरेज और वेस्ट मैनेजमेंट में मजबूत वृद्धि
दूसरी ओर, पानी की आपूर्ति, सीवरेज और वेस्ट मैनेजमेंट क्षेत्र ने जुलाई में 7.4% की वृद्धि दर्ज की. यह इस क्षेत्र की पिछले 12 महीनों की सबसे अधिक वृद्धि रही.
अप्रैल-जुलाई में IIP ग्रोथ 6.3%
मौजूदा वित्त वर्ष 2026-27 के पहले चार महीनों यानी अप्रैल से जुलाई के दौरान औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की संचयी वृद्धि दर 6.3% रही. यह पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में दर्ज 4% की वृद्धि से अधिक है.
वह लगभग कुछ भी लेकर नहीं गए, उन्होंने कर्ज की गारंटी दी. कंपनियां डूब गईं. उनकी संपत्ति की कीमत ₹32 करोड़ थी. बैंकों ने ₹6.5 करोड़ के लिए मतदान किया. बाकी सब उन लोगों के लिए सिर्फ गणित है, जो गणित नहीं कर सकते. सोशल मीडिया ने इस कहानी को पूरी तरह गलत समझ लिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
सोशल मीडिया पर पोस्ट कुछ इस तरह चल रही है: सुभाष चंद्रा ने भारतीय बैंकों से ₹22,006 करोड़ उधार लिए, भुगतान करने से इनकार कर दिया, ट्रिब्यूनल में पहुंचे और उन्हें ₹6.5 करोड़ में छोड़ दिया गया. और सबसे अहम बात, वह बीजेपी सांसद थे, इसलिए जाहिर है कि वह बच निकले. यह एक साफ-सुथरी कहानी है और यह एक शब्द की गलतफहमी पर भी आधारित है: गारंटी.
इस कहानी को सबसे ज्यादा बढ़ावा देने वाली आवाजों में विजय माल्या भी शामिल हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो खुद लंदन से अपने प्रत्यर्पण के खिलाफ मुकदमा लड़ रहा है और भारतीयों को समझा रहा है कि बैंक रिकवरी कैसे होनी चाहिए.
असल में क्या हुआ, आसान भाषा में
इसे इस तरह समझिए. आपका कोई रिश्तेदार फैक्ट्री बनाने के लिए कर्ज लेता है. बैंक आपसे गारंटर के तौर पर हस्ताक्षर करने को कहता है. आपने पैसे को कभी छुआ तक नहीं. फैक्ट्री असफल हो जाती है. अब बैंक आपके पीछे आ सकता है.
चंद्रा ने औद्योगिक स्तर पर यही किया. उनकी समूह कंपनियों ने कर्ज लिया. उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उन कर्जों की गारंटी दी. जब समूह डूब गया, तो कर्जदाताओं ने गारंटर का रुख किया.
₹22,006 करोड़ वह पैसा नहीं है जो सुभाष चंद्रा के बैंक खाते में गया था. यह हर उस कर्जदाता के कुल दावे का आंकड़ा है, जिसके पास उनके हस्ताक्षर थे. एक-दूसरे से जुड़े हुए. एक के ऊपर एक. उन कर्जों की गारंटी के रूप में, जिन्हें दूसरी कंपनियों ने लिया और खर्च किया.
मामला ₹22,000 करोड़ से शुरू भी नहीं हुआ था. इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने अप्रैल 2024 में ₹170 करोड़ के एक कर्ज की गारंटी को लेकर उन्हें नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में घसीटा था. यह कर्ज विवेक इंफ्राकॉन नाम की कंपनी को दिया गया था. एक बार यह रास्ता खुला तो उनके गारंटर होने का दावा रखने वाले हर दूसरे कर्जदाता ने भी अपना दावा दाखिल कर दिया. इसी तरह यह राशि बढ़कर ₹22,006 करोड़ तक पहुंची.
तो फिर सिर्फ ₹6.5 करोड़ क्यों?
क्योंकि लगभग इतना ही उपलब्ध था.
दिवाला अदालत सजा देने वाली अदालत नहीं है. यह बांटने वाली अदालत है. उसका एक साधारण सवाल होता है: इस व्यक्ति के पास वास्तव में क्या बचा है और किसे उसमें से कितना हिस्सा मिलेगा?
अदालत द्वारा नियुक्त रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्यांकन किया. निष्कर्ष: इसकी कीमत ₹6.5 करोड़ की पेशकश से भी कम थी. इसमें से ₹6.25 करोड़ कर्जदाताओं को और ₹25 लाख प्रक्रिया की लागत के लिए जाते हैं.
इसके बाद बैंकों ने खुद मतदान किया. दिवाला कानून के तहत फैसला कर्जदाता लेते हैं, जज नहीं. नवंबर 2024 में 80.81 प्रतिशत वोटिंग हिस्सेदारी रखने वाले कर्जदाताओं ने योजना के पक्ष में मतदान किया. 2026 में ट्रिब्यूनल ने इसे मंजूरी दी, जब विभाजित फैसले को तीसरे सदस्य ने तोड़ा.
ट्रिब्यूनल का तर्क स्पष्ट था: वह बैंकों द्वारा लिए गए व्यावसायिक फैसले को सिर्फ इसलिए पलट नहीं सकता क्योंकि हेयरकट शर्मनाक दिखता है. और अगर वह इस सौदे को खारिज कर देता, तो चंद्रा पूरी तरह दिवालिया हो जाते, ऐसी स्थिति में विरोध करने वाले कर्जदाताओं को अधिक के बजाय कम मिलने की संभावना थी.
आप ऐसी संपत्ति से ₹22,000 करोड़ नहीं निकाल सकते, जिसके पास ₹32 करोड़ हैं. किसी भी अदालत के पास ऐसी मशीनरी नहीं है.
"उन्होंने एक रुपया भी वापस नहीं किया" यह दूसरा झूठ है
IL&FS संकट के बाद भारत का क्रेडिट बाजार ठहर गया था. उस समय एस्सेल ग्रुप पर करीब ₹20,000 करोड़ का कर्ज था. परिवार के पास जी के शेयर कर्जदाताओं के पास गिरवी थे. एक घबराहट में हुई बिक्री से पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो सकती थी.
चंद्रा के परिवार ने खुद जी की हिस्सेदारी बेची, जिस कारोबार को उन्होंने बनाया था और जिसे वह समूह का क्राउन ज्वेल कहते थे. साथ ही अन्य कंपनियों को भी बेचकर कर्जदाताओं का भुगतान किया. 2021 तक उन्होंने कहा था कि 43 कर्जदाताओं और 110 खातों में कुल कर्ज का 91.2 प्रतिशत चुका दिया गया था.
यह ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसने नकदी ली और विजय माल्या की तरह भाग गया. उन्होंने कर्ज चुकाने के लिए अपना साम्राज्य बेच दिया. जो बचा, वह लगभग खाली व्यक्तिगत संपत्ति के ऊपर मौजूद व्यक्तिगत गारंटियां थीं.
और बीजेपी सांसद वाली बात?
वह कभी बीजेपी सांसद नहीं थे. वह 2016 से 2022 के बीच हरियाणा से निर्दलीय राज्यसभा सदस्य थे और बीजेपी के समर्थन से चुने गए थे. 2022 में वह दोबारा चुनाव जीतने में असफल रहे. दिवाला मामला 2024 में स्वीकार किया गया. योजना को 2026 में मंजूरी मिली. इन सबके शुरू होने से कई साल पहले ही वह संसद से बाहर हो चुके थे.
अब वह हिस्सा, जो वास्तव में परेशान करने वाला है
इसे क्लीन चिट न समझें.
कर्जदाताओं ने बताया कि पुराने नेट-वर्थ सर्टिफिकेट में कभी चंद्रा की संपत्ति का मूल्य ₹40,000 करोड़ से अधिक आंका गया था. इस कार्यवाही में उनकी घोषित नेट वर्थ करीब ₹32 करोड़ थी.
इस अंतर की जांच जरूरी है. ट्रिब्यूनल ने माना कि यह सवाल जायज था और फिर कहा कि दिवाला कानून के तहत किसी योजना को मंजूरी देने से पहले फॉरेंसिक ऑडिट जरूरी नहीं है. यह आरोप भी लगाए गए कि कुछ "हां" वोट मित्रवत संस्थाओं की ओर से आए थे. अगर अपील में यह कभी साबित हो जाता है, तो 80 प्रतिशत की मंजूरी और भी गंभीर सवालों में बदल जाएगी.
और इसकी कीमत वास्तविक है. एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने योजना के खिलाफ मतदान किया. उसके ₹1,322 करोड़ के स्वीकृत दावे से उसे करीब ₹38 लाख मिलेंगे. इस कानून के तहत असहमति जताने वाले कर्जदाता बहुमत के फैसले से बंधे होते हैं.
ईमानदार निष्कर्ष
उन्होंने अपने समूह के कर्ज की जरूरत से ज्यादा गारंटी दी. समूह संकट में फंस गया. उन्होंने ज्यादातर कर्जदाताओं का भुगतान करने के लिए जी का नियंत्रण बेच दिया. जो बचा, वह एक कमजोर व्यक्तिगत संपत्ति के खिलाफ गारंटियां थीं. बैंकों ने खुद ₹6.5 करोड़ को ऐसी संपत्तियों के लिए लड़ने के बजाय चुना, जिनकी कीमत इससे भी कम थी.
यह एक बेहद बड़ा हेयरकट है और भारत में व्यक्तिगत गारंटरों से निपटने के तरीके में गंभीर खामी है.
यह इस बात का सबूत नहीं है कि एक पूर्व निर्दलीय सांसद ने ₹22,000 करोड़ चुराए और खुद के लिए राजनीतिक छूट खरीद ली.
अगर आप नाराज हैं, तो कड़ी जांच की मांग करें. यह एक वयस्क तर्क है. वायरल संस्करण सिर्फ ऐसी गणित है, जिसमें फाइल को शामिल नहीं किया गया है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
716.90 अरब डॉलर पर पहुंचा भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, सात हफ्तों में करीब 50 अरब डॉलर की बढ़ोतरी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये पर बढ़ते दबाव को नियंत्रित करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में अपना हस्तक्षेप बढ़ा दिया है. मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार ने केंद्रीय बैंक को बाजार में जरूरत के मुताबिक डॉलर की आपूर्ति करने और रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए अतिरिक्त गुंजाइश दी है. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, डॉलर की बढ़ती मांग और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता के बीच रुपये पर दबाव बना हुआ है.
छह महीने के उच्च स्तर पर पहुंचा विदेशी मुद्रा भंडार
14 अगस्त को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 10 अरब डॉलर बढ़कर 716.90 अरब डॉलर हो गया. यह पिछले छह महीनों का उच्चतम स्तर है. इस बढ़ोतरी में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों का योगदान 7.2 अरब डॉलर और सोने के भंडार का योगदान 2.7 अरब डॉलर रहा.
पिछले सात सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 50 अरब डॉलर की वृद्धि हुई है. यह फरवरी में दर्ज 728.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर के भी काफी करीब पहुंच गया है. मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार RBI को रुपये पर दबाव बढ़ने की स्थिति में बाजार में डॉलर की आपूर्ति करने की अधिक क्षमता देता है. इससे बाहरी झटकों से निपटने के लिए भी एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच मिलता है. ऐसे में केंद्रीय बैंक का जोर किसी निश्चित विनिमय दर को बनाए रखने के बजाय रुपये में अचानक और असामान्य उतार-चढ़ाव को रोकने पर रह सकता है.
विदेशी मुद्रा प्रवाह से भी मजबूत हुआ भंडार
विदेशी मुद्रा भंडार में हालिया बढ़ोतरी को विदेशों से आए पूंजी प्रवाह से भी समर्थन मिला है. RBI की ओर से विदेशी जमा को आकर्षित करने के लिए उठाए गए कदमों के बाद 8 जून से 21 अगस्त के बीच करीब 73 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह दर्ज किया गया.
RBI के आंकड़ों के मुताबिक, जून में केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा बाजार से शुद्ध रूप से 561 मिलियन डॉलर अवशोषित किए. इससे पहले अप्रैल और मई में RBI ने बाजार में शुद्ध डॉलर बिक्री की थी. यह बदलाव पूंजी प्रवाह में मजबूती और केंद्रीय बैंक के बाजार परिचालन में आए बदलाव को दर्शाता है.
रुपये में अस्थिरता रोकना RBI की प्राथमिकता
विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होने के साथ RBI के पास जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप करने की अधिक flexibility है. हालांकि, केंद्रीय बैंक को विदेशी मुद्रा बाजार में अपने परिचालन के साथ घरेलू लिक्विडिटी की स्थिति का भी संतुलन बनाए रखना होगा.
फिलहाल RBI का मुख्य उद्देश्य रुपये के किसी निश्चित स्तर को बनाए रखना नहीं, बल्कि मुद्रा बाजार में अव्यवस्थित और अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकना है. मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार इस रणनीति में केंद्रीय बैंक को महत्वपूर्ण सहारा दे रहा है.
10 महीनों में जापानी कंपनियों ने भारत में लगाया ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा, 10 ट्रिलियन येन के निवेश लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़े कदम
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में जापानी निवेश को लेकर बड़ी खबर सामने आई है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि जापानी कंपनियों ने पिछले 10 महीनों में भारत में 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया है. यह जापान के उस 10 ट्रिलियन येन निवेश लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति है, जिसकी घोषणा 2025 में की गई थी. मौजूदा निवेश रफ्तार को देखते हुए भारत को उम्मीद है कि करीब 7 लाख करोड़ रुपए का यह लक्ष्य तय समय से काफी पहले, महज तीन से चार साल में पूरा हो सकता है.
भारत में जापानी कंपनियों की संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य
पीयूष गोयल ने बताया कि जापान ने इससे पहले भारत में 10 वर्षों में 5 ट्रिलियन येन निवेश का लक्ष्य रखा था, जिसे महज पांच साल में हासिल कर लिया गया. इसी तेज निवेश और कारोबारी साझेदारी को देखते हुए 2025 में निवेश लक्ष्य को दोगुना कर 10 ट्रिलियन येन किया गया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में काम कर रही जापानी कंपनियों की संख्या को भी मौजूदा करीब 1,500 से बढ़ाकर 3,000 करने का लक्ष्य रखा है. सरकार चाहती है कि जापानी कंपनियां पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज, इंश्योरेंस और पेंशन फंड जैसे क्षेत्रों में भी निवेश बढ़ाएं.
मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी पर खास जोर
गोयल ने भारत के बड़े बाजार, इंजीनियरिंग टैलेंट और उद्यमिता को जापान की प्रिसिजन इंजीनियरिंग, तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं के साथ जोड़ने पर जोर दिया. उनका कहना है कि दोनों देशों की क्षमताओं का बेहतर तालमेल भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में मदद कर सकता है.
टोक्यो में आयोजित इंडिया-जापान स्टार्टअप राउंडटेबल में गोयल ने डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए 'डीप टेक कैपिटल कॉरिडोर' बनाने का प्रस्ताव भी रखा. इसका उद्देश्य शुरुआती स्तर की रिसर्च, डीप-टेक इनोवेशन और उनके कमर्शियलाइजेशन के लिए लंबे समय का निवेश जुटाना है.
यूनिवर्सिटी और रिसर्च संस्थानों को जोड़ने की तैयारी
भारत और जापान के बीच इनोवेशन सहयोग को मजबूत करने के लिए 'टू-वे इनोवेशन ब्रिज' बनाने का भी सुझाव दिया गया. इसके तहत दोनों देशों की यूनिवर्सिटीज, इनक्यूबेटर्स, आरएंडडी संस्थानों, प्रयोगशालाओं और टेस्टिंग सुविधाओं को आपस में जोड़ा जा सकता है. इसके अलावा भारतीय फाउंडर्स, जापानी कंपनियों, वेंचर फंड्स और रणनीतिक निवेशकों के बीच नियमित संवाद के लिए 'जॉइंट स्टार्टअप पिचिंग प्लेटफॉर्म' बनाने पर भी जोर दिया गया.
65 भारतीय स्टार्टअप्स की जापानी कंपनियों से बनी कड़ी
जापान में भारत की राजदूत नगमा मोहम्मद मल्लिक ने बताया कि 'इंडिया-जापान पिचिंग सीरीज' के जरिए अब तक 65 भारतीय स्टार्टअप्स को करीब 100 जापानी कंपनियों से जोड़ा गया है. इस पहल के जरिए 30 से अधिक बिजनेस टाई-अप में भी मदद मिली है. पीयूष गोयल ने भारत के डीप-टेक स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में शुरू किए गए करीब 1 अरब डॉलर के दूसरे 'फंड ऑफ फंड्स' का भी उल्लेख किया.
स्टार्टअप इंडिया के बाद तेजी से बढ़ा इकोसिस्टम
गोयल के मुताबिक भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम दुनिया में तीसरे स्थान पर है. 'स्टार्टअप इंडिया' की शुरुआत के बाद देश में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या करीब 510 से बढ़कर 2.5 लाख हो गई है. इनमें 130 से अधिक स्टार्टअप यूनिकॉर्न बन चुके हैं.
जापान से बढ़ता निवेश और स्टार्टअप, मैन्युफैक्चरिंग व टेक्नोलॉजी में सहयोग भारत-जापान आर्थिक साझेदारी को नई दिशा दे सकता है. इससे 'मेक इन इंडिया' को भी बड़े पैमाने पर मजबूती मिलने की उम्मीद है.
मजबूत आर्थिक संकेतकों और बेहतर ग्रोथ आउटलुक के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार का रुख किया, मिडकैप शेयरों में बढ़ी दिलचस्पी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की वापसी का सिलसिला तेज होता दिखाई दे रहा है. अगस्त 2026 में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय इक्विटी बाजार में ₹27,186 करोड़ का निवेश किया है, जो सितंबर 2024 के बाद किसी एक महीने में सबसे बड़ा निवेश है. लगातार दूसरे महीने विदेशी निवेशकों के शुद्ध खरीदार बने रहने से यह संकेत मिल रहा है कि वैश्विक निवेशकों का भरोसा एक बार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजारों पर मजबूत हो रहा है.
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में अब तक FPI ने भारतीय शेयरों में करीब 2.85 अरब डॉलर यानी ₹27,186 करोड़ का शुद्ध निवेश किया है. इससे पहले जुलाई 2026 में विदेशी निवेशकों ने ₹20,200 करोड़ की खरीदारी की थी.
करीब दो साल का सबसे बड़ा निवेश
अगस्त में आया निवेश सितंबर 2024 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. सितंबर 2024 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में ₹57,724 करोड़ का निवेश किया था. 25 अगस्त तक आए कुल निवेश में से ₹15,491 करोड़ का निवेश सेकेंडरी मार्केट के जरिए हुआ, जबकि ₹11,694 करोड़ प्राइमरी मार्केट और अन्य श्रेणियों में आया.
क्यों बढ़ रहा है भारत का आकर्षण?
विशेषज्ञों का मानना है कि एशियाई बाजारों में ऊंचे वैल्यूएशन के कारण विदेशी निवेशक अब नए अवसर तलाश रहे हैं और भारत उन्हें अपेक्षाकृत स्थिर और आकर्षक बाजार के रूप में दिखाई दे रहा है.
बजाज अल्ट्स के CIO-लिस्टेड इक्विटीज जितेंद्र गोहिल के अनुसार, कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में AI और सेमीकंडक्टर शेयरों में भारी निवेश के कारण वैल्यूएशन काफी बढ़ चुके हैं. ऐसे में भारत जैसे उभरते बाजार विदेशी निवेशकों के लिए बेहतर विकल्प बन रहे हैं. उनका मानना है कि यदि भारतीय अर्थव्यवस्था की गति मजबूत रहती है और कंपनियों की कमाई में सुधार जारी रहता है, तो विदेशी निवेश का प्रवाह आगे भी बढ़ सकता है.
मिडकैप शेयरों पर विदेशी निवेशकों की नजर
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी के विजयकुमार के मुताबिक, विदेशी निवेशकों की खरीदारी पूरे बाजार में समान नहीं है. बड़े बैंकिंग और आईटी शेयरों के बजाय निवेशक चुनिंदा मिडकैप कंपनियों पर अधिक दांव लगा रहे हैं.
यही वजह है कि अगस्त में 27 तारीख तक मिडकैप इंडेक्स लगभग 1.83 फीसदी और स्मॉलकैप इंडेक्स 3.7 फीसदी की बढ़त दर्ज कर चुके हैं, जबकि सेंसेक्स और निफ्टी में करीब 1 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है.
क्या आगे भी जारी रहेगी खरीदारी?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि, कॉरपोरेट आय में सुधार और व्यापक सेक्टोरल ग्रोथ विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर सकती है. हालांकि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का ऊंचे स्तर पर बने रहना एक बड़ा जोखिम है. यदि अमेरिकी बॉन्ड ज्यादा आकर्षक बने रहते हैं, तो विदेशी निवेश का रुख फिर बदल सकता है.
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज का भी मानना है कि बेहतर आय वृद्धि और मजबूत आर्थिक संकेतक भारतीय बाजार के जोखिम-रिटर्न समीकरण को और आकर्षक बना सकते हैं.
सालभर का आंकड़ा अब भी नकारात्मक
हालांकि जुलाई और अगस्त में विदेशी निवेशकों की वापसी देखने को मिली है, लेकिन पूरे वर्ष 2026 का आंकड़ा अभी भी कमजोर बना हुआ है. इस साल अब तक FPI भारतीय बाजार से कुल ₹2.27 लाख करोड़ निकाल चुके हैं. इससे पहले 2025 में भी विदेशी निवेशक शुद्ध बिकवाल रहे थे और उन्होंने लगभग ₹1.66 लाख करोड़ की निकासी की थी. इसलिए दो महीने की खरीदारी के आधार पर विदेशी निवेशकों की पूरी वापसी का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी. आने वाले महीनों में निवेश की रफ्तार और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां बाजार की दिशा तय करेंगी.
बाजार के सामने क्या हैं चुनौतियां?
इक्विनॉमिक्स रिसर्च के फाउंडर जी चोक्कालिंगम के मुताबिक, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और बाजार में नई नकदी की सीमित उपलब्धता निकट अवधि में उतार-चढ़ाव बढ़ा सकती हैं. उनका मानना है कि चुनिंदा मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन अत्यधिक वैल्यूएशन वाले शेयरों में निवेश करते समय सावधानी बरतने की जरूरत है.
CineNow ने भारत के मनोरंजन, रचनात्मक, मीडिया और कारोबारी क्षेत्र से जुड़े कई प्रमुख लोगों को एक साथ लाकर मनोरंजन उद्योग में निवेश के लिए संस्थागत और पोर्टफोलियो आधारित मॉडल तैयार करने की पहल की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मनोरंजन उद्योग में निवेश के लिए CineNow ने 150 मिलियन डॉलर के फिल्म निवेश वाहन के लिए अपनी निवेश समिति, इंडिया काउंसिल और नेतृत्व टीम के गठन की घोषणा की है. कंपनी ने भारतीय फिल्म जगत के साथ रचनात्मक सहयोग और कंटेंट की तलाश शुरू कर दी है. इसका उद्देश्य हिंदी के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में अगली पीढ़ी की ब्लॉकबस्टर और स्वतंत्र फिल्मों को बढ़ावा देना है.
मनोरंजन क्षेत्र में संस्थागत निवेश की नई पहल
CineNow ने भारत के मनोरंजन, रचनात्मक, मीडिया और कारोबारी क्षेत्र से जुड़े कई प्रमुख लोगों को एक साथ लाकर मनोरंजन उद्योग में निवेश के लिए संस्थागत और पोर्टफोलियो आधारित मॉडल तैयार करने की पहल की है. कंपनी ने अपनी वेबसाइट के जरिए पूंजी निवेश के लिए रचनात्मक सहयोग शुरू कर दिया है और इस साल के भीतर निवेश राशि जारी करने की प्रक्रिया शुरू करने का लक्ष्य रखा है.
नई निवेश समिति, इंडिया काउंसिल और नेतृत्व टीम में Applause Entertainment, Balaji, NDTV Imagine और Star India के पूर्व CEO समीर नायर, फिल्म रणनीति विशेषज्ञ और स्वतंत्र निर्माता नेहा कौल, चर्चित पटकथा लेखक, गीतकार और रचनात्मक निर्माता जयदीप साहनी, Red Chillies Entertainment के निर्माता और Lyca, Netflix, Balaji तथा Yash Raj Films के पूर्व वरिष्ठ कार्यकारी आशीष सिंह शामिल हैं.
इसके अलावा IMPPA और FFI के अध्यक्ष तथा FIAPF के उपाध्यक्ष अभय सिन्हा, PDL के बोर्ड सदस्य और AP International के सह-संस्थापक एवं प्रबंध साझेदार संजय अर्जुनदास वाधवा, पद्म श्री और ऑस्कर पुरस्कार विजेता साउंड डिजाइनर डॉ. रेसूल पुकुट्टी, वित्त विशेषज्ञ जितेंद्र नागपाल, Matrix Celebrity Management की सह-संस्थापक रेश्मा शेट्टी, MX Player के पूर्व कार्यकारी सुरेश मेनन, Janta Cinema के संस्थापक युसुफ शेख, Tulsea में दक्षिण भारत विस्तार का नेतृत्व कर रहीं राधिका गोपाल और संचार रणनीतिकार एवं प्रतिष्ठा विशेषज्ञ राहत बेरी भी टीम में शामिल हैं. ये सभी CineNow के चेयरमैन व एमडी रोहित डालमिया और प्रधान सलाहकार सिद्धार्थ रॉय कपूर के साथ काम करेंगे.
6 साल में 30 से ज्यादा फिल्मों में निवेश
CineNow अगले छह वर्षों में 30 से अधिक फिल्मों में कुल 150 मिलियन डॉलर यानी करीब 1,200 करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना बना रही है. कंपनी का फोकस फिल्मों के जरिए लंबे समय में मूल्य तैयार करने पर होगा. इसके लिए थिएटर रिलीज, स्ट्रीमिंग, अंतरराष्ट्रीय वितरण, संगीत, लाइसेंसिंग और अन्य अधिकारों से जुड़े अवसरों पर ध्यान दिया जाएगा. कंपनी ने हिंदी के अलावा मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलुगु, तमिल और मलयालम भाषाओं की फिल्मों के लिए रचनात्मक सहयोग और कंटेंट सोर्सिंग शुरू कर दी है.
फिल्मों का चयन रचनात्मक मजबूती, व्यावसायिक क्षमता, दर्शकों के अवसर, प्रतिभा, निर्माण अर्थशास्त्र, वितरण संभावनाओं और लंबे समय में बौद्धिक संपदा (IP) के मूल्य जैसे मानकों के आधार पर किया जाएगा.
रोहित डालमिया ने बताया निवेश का उद्देश्य
रोहित डालमिया ने कहा कि भारत ने एक मजबूत मनोरंजन इकोसिस्टम तैयार किया है, लेकिन मनोरंजन क्षेत्र में निवेश का ढांचा अभी विकसित हो रहा है. उन्होंने कहा कि CineNow कंटेंट, दर्शकों, प्लेटफॉर्म, वितरण और पूंजी की समझ रखने वाले विशेषज्ञों को एक मंच पर ला रही है, ताकि मनोरंजन क्षेत्र में अधिक संस्थागत और पोर्टफोलियो आधारित निवेश मॉडल बनाया जा सके. उनके मुताबिक, टीम के अनुभव और विविधता से कंपनी को सही अवसरों की पहचान करने, उनका सख्ती से मूल्यांकन करने और बेहतर तरीके से पूंजी लगाने में मदद मिलेगी.
निवेश समिति और इंडिया काउंसिल की जिम्मेदारी
CineNow की निवेश समिति निवेश के मूल्यांकन, कंटेंट और व्यावसायिक आकलन, पोर्टफोलियो तैयार करने और लंबे समय में बौद्धिक संपदा का मूल्य बढ़ाने की जिम्मेदारी संभालेगी. वहीं, इंडिया काउंसिल मनोरंजन उद्योग, रचनात्मक क्षेत्र, मीडिया, वितरण और वित्त से जुड़े व्यापक दृष्टिकोण उपलब्ध कराएगी. नेतृत्व टीम कंपनी के संचालन और निवेश योजना के क्रियान्वयन में सहयोग करेगी.
मनोरंजन क्षेत्र में टोकनाइजेशन पर भी जोर
CineNow मनोरंजन क्षेत्र में टोकनाइजेशन के इस्तेमाल की दिशा में भी पहल कर रही है. कंपनी तकनीक आधारित ऐसा ढांचा तैयार कर रही है, जिसका उद्देश्य निवेश में तरलता, पारदर्शिता और पहुंच बढ़ाना है. कंपनी के मुताबिक, अपने निवेश वाहन में भागीदारी को टोकनाइज करके पारंपरिक मनोरंजन वित्त और नई पीढ़ी के डिजिटल पूंजी बाजारों के बीच एक सेतु तैयार किया जा सकता है. इस मॉडल के जरिए व्यापक स्तर पर निवेशकों की भागीदारी को सक्षम बनाने का लक्ष्य है. हालांकि, इस व्यवस्था में बौद्धिक संपदा का स्वामित्व रचनाकारों और निर्माण साझेदारों के पास ही रहेगा. CineNow का कहना है कि यह मॉडल मनोरंजन उद्योग में पारंपरिक वित्त व्यवस्था और नई तकनीक आधारित पूंजी के बीच बेहतर तालमेल बनाने की दिशा में काम करेगा.
BPCL का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत में क्विक कॉमर्स का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. Zepto और Blinkit जैसी कंपनियां कुछ ही मिनटों में किराना और रोजमर्रा का सामान पहुंचाने के मॉडल पर काम कर रही हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) अब सिर्फ पेट्रोल-डीजल और LPG कारोबार तक सीमित नहीं रहना चाहती. कंपनी अपने विशाल रिटेल और LPG डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए ई-कॉमर्स कारोबार को विस्तार देने की तैयारी में है. इसके तहत ग्राहकों को LPG सिलेंडर की डिलीवरी के साथ किराना, FMCG और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान भी घर तक पहुंचाने की योजना है. इसके अलावा BPCL अपना पेमेंट गेटवे लॉन्च करने पर भी काम कर रही है.
LPG नेटवर्क बनेगा ई-कॉमर्स की ताकत
BPCL अपने मौजूदा नेटवर्क को नए कारोबार के लिए इस्तेमाल करने की रणनीति पर काम कर रही है. कंपनी की LPG डिस्ट्रीब्यूटर्स को चुनिंदा जगहों पर ‘डार्क स्टोर’ और फुलफिलमेंट सेंटर के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना है. इन केंद्रों पर घर की जरूरी चीजें, किराना, FMCG प्रोडक्ट और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसे सामान रखे जा सकते हैं.
कंपनी अपने पेट्रोल पंपों पर मौजूद In&Out रिटेल स्टोर के जरिए भी इस कारोबार को बढ़ाने की तैयारी कर रही है. इससे BPCL अपने मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करते हुए ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स के क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहती है.
महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में पायलट प्रोजेक्ट
BPCL ने इस मॉडल का पायलट प्रोजेक्ट महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में शुरू किया है. ग्राहक कंपनी के ऐप के जरिए जरूरी सामान ऑर्डर कर सकते हैं और इसे LPG सिलेंडर की डिलीवरी के साथ घर पर मंगाया जा सकता है. हालांकि, शुरुआती स्तर पर इस मॉडल को क्विक कॉमर्स कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, पायलट के नतीजे सकारात्मक रहे हैं, लेकिन बिक्री की मात्रा अभी कंपनी की उम्मीद के मुताबिक नहीं पहुंची है. BPCL के लिए यह कारोबार अभी शुरुआती चरण में है.
Zepto और Blinkit को टक्कर देने की तैयारी
BPCL का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत में क्विक कॉमर्स का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. Zepto और Blinkit जैसी कंपनियां कुछ ही मिनटों में किराना और रोजमर्रा का सामान पहुंचाने के मॉडल पर काम कर रही हैं. BPCL अपनी अलग रणनीति के तहत पहले से मौजूद LPG डिलीवरी नेटवर्क और रिटेल आउटलेट्स का इस्तेमाल कर इस बाजार में जगह बनाने की कोशिश कर रही है. कंपनी का लक्ष्य अपने नॉन-फ्यूल कारोबार को मजबूत करना और मौजूदा ग्राहक आधार से अतिरिक्त कमाई के अवसर तैयार करना है.
अपना पेमेंट गेटवे भी लॉन्च करेगी कंपनी
ई-कॉमर्स के अलावा BPCL डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में भी कदम बढ़ाने की तैयारी कर रही है. कंपनी अपने ‘Hello BPCL’ ऐप में पेमेंट सिस्टम जोड़ने पर काम कर रही है. इसके जरिए ग्राहक BPCL के फ्यूल स्टेशनों पर होने वाले डिजिटल ट्रांजैक्शन को सीधे कंपनी के प्लेटफॉर्म से पूरा कर सकेंगे.
इस पहल के जरिए BPCL अपने डिजिटल इकोसिस्टम को मजबूत करना चाहती है. ई-कॉमर्स, लॉयल्टी प्रोग्राम और डिजिटल पेमेंट को एक ही प्लेटफॉर्म से जोड़ने से कंपनी को ग्राहकों के साथ सीधे जुड़ने और उनके खर्च के पैटर्न को समझने में भी मदद मिल सकती है.
नॉन-फ्यूल कारोबार बढ़ाने पर जोर
पिछले वित्त वर्ष में BPCL ने अपने रिटेल आउटलेट्स को सिर्फ फ्यूल भराने की जगह मोबिलिटी और लाइफस्टाइल डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने पर जोर दिया था. इसके तहत कंपनी ने कैफे, कन्वीनिएंस रिटेल, ग्राहक सुविधाओं और लॉयल्टी प्रोग्राम को अपग्रेड किया.
अब ई-कॉमर्स और डिजिटल पेमेंट जैसी सेवाओं के विस्तार के जरिए BPCL अपने पारंपरिक फ्यूल कारोबार से आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है. हालांकि, कंपनी की ओर से इस पूरी योजना को लेकर अभी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.