बैंकिंग की विरासत पर पुनर्विचार: HDFC बैंक के उत्तराधिकार का सवाल

डॉ. अन्नुराग बत्रा ने बताया है कि HDFC Bank के अगले CEO के लिए बैंकिंग का लंबा अनुभव ज्यादा जरूरी है या मजबूत नेतृत्व क्षमता, टेक्नोलॉजी की समझ और लोगों को साथ लेकर चलने की काबिलियत अधिक महत्वपूर्ण होगी.

डॉ. अनुराग बत्रा by
Published - Monday, 31 August, 2026
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Monday, 31 August, 2026
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किसी बड़े संगठन के लिए CEO ढूंढना कभी आसान काम नहीं रहा है. दशकों में बने ऐसे संस्थान के लिए नेतृत्वकर्ता ढूंढना, जिसके लाखों ग्राहक, हजारों कर्मचारी और वर्षों में बनी प्रतिष्ठा हो, चुनौती को और भी बड़ा बना देता है. और ऐसा लगता है कि कॉरपोरेट भारत इस चुनौती का सामना पहले की तुलना में अधिक बार कर रहा है.

हाल के हफ्तों में, देश के कुछ सबसे बड़े संगठनों में नेतृत्व परिवर्तन और उत्तराधिकार से जुड़े सवाल सामने आए हैं. Godrej पहले ही एक आंतरिक उत्तराधिकारी की पहचान कर चुका है, जबकि Tata Sons के अगले नेता की तलाश लगातार ध्यान आकर्षित कर रही है. अब HDFC Bank भी इस चर्चा में शामिल हो गया है, जहां शशिधर जगदीशन ने MD & CEO के पद से रिटायर होने और दोबारा नियुक्ति की मांग नहीं करने का फैसला किया है.

ऐसे हर प्रस्थान के साथ तुरंत एक अपरिहार्य सवाल उठता है: पदभार किसे संभालना चाहिए?

परंपरागत रूप से, इसका जवाब काफी अनुमानित होता. तलाश वरिष्ठ बैंकरों के बीच शुरू होती, संभवतः ऐसे लोगों के बीच जो 40 के दशक के आखिरी या 50 के दशक में हों, जिनके पास बैंकिंग का दशकों का अनुभव हो, नियमन की मजबूत समझ हो और वित्तीय प्रणाली के साथ स्थापित संबंध हों. लेकिन शायद अब यह पूछने का समय आ गया है कि क्या यही नेतृत्व का एकमात्र मॉडल है, जिसकी बड़े संस्थानों को जरूरत है.

क्या CEO को बैंकिंग के बारे में सब कुछ जानना जरूरी है?

HDFC Bank को ही लें. बैंक के पास पहले से ही एक मजबूत फ्रेंचाइजी है. उसके पास एक बड़ा और वफादार ग्राहक आधार, कॉरपोरेट ग्राहकों के साथ गहरे संबंध, अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म, अनुभवी कर्मचारी और एक अच्छी तरह स्थापित पदानुक्रम है. यह ऐसा संगठन नहीं है जो किसी व्यक्ति के आकर इसे बनाने का इंतजार कर रहा हो.

अगले CEO को एक बेहद विकसित संस्थान विरासत में मिलेगा. चुनौती यह होगी कि जो बनाया गया है, उसकी रक्षा की जाए, उसे और मजबूत किया जाए और बैंक को विकास के अगले चरण के लिए तैयार किया जाए. यह एक दिलचस्प सवाल उठाता है: क्या CEO जरूरी तौर पर वही व्यक्ति होना चाहिए जो बैंकिंग के बारे में सबसे ज्यादा जानता हो?

इसका जवाब शायद तेजी से ‘नहीं’ हो सकता है.

किसी बड़े संगठन में CEO की भूमिका काफी बदल गई है. उसके लिए कारोबार के हर पहलू का विशेषज्ञ होना संभव नहीं है. क्रेडिट, जोखिम, ट्रेजरी, टेक्नोलॉजी, अनुपालन, कानूनी, रिटेल बैंकिंग और कॉरपोरेट बैंकिंग के विशेषज्ञ मौजूद हैं. CEO की वास्तविक जिम्मेदारी इन सभी क्षमताओं को एक साथ लाना और यह सुनिश्चित करना है कि संगठन एक दिशा में आगे बढ़े.

CEO एक ‘ग्रेट इंटीग्रेटर’ के रूप में

आज CEO की भूमिका तेजी से संबंधों, लोगों और परस्पर प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं के प्रबंधन से जुड़ती जा रही है. बैंक में इसका मतलब वित्त मंत्रालय और RBI के साथ रचनात्मक संबंध बनाए रखना, शेयरधारकों और निवेशकों की चिंताओं को समझना, संस्थान के सबसे बड़े ग्राहकों के साथ जुड़ना, टेक्नोलॉजी और कोर टीमों को दिशा देना और सबसे बढ़कर ऐसा माहौल बनाना है, जिसमें लोग आत्मविश्वास के साथ फैसले ले सकें.

मेरी व्यक्तिगत राय में, सबसे मजबूत CEO जरूरी नहीं कि वे हों जो अपनी शक्ति या पद को लेकर अधिकार जताते हों. वे वे लोग होते हैं जो यह समझते हैं कि उनका काम खुद को संस्थान के लिए अपरिहार्य बनाना नहीं, बल्कि एक बेहतरीन संस्थान तैयार करना है.

वे मजबूत टीमें बनाते हैं, लोगों को सशक्त बनाते हैं और सक्षम अधिकारियों को संगठन के सर्वोत्तम हित में निर्णय लेने की स्वतंत्रता देते हैं. जब ऐसा होता है, तो एक उल्लेखनीय चीज सामने आती है: नंबर 1 के पद से हटने के लिए तैयार होने से पहले ही उत्तराधिकारी उभरने लगते हैं.

शायद, यही CEO की सफलता के वास्तविक पैमानों में से एक है.

युवा पीढ़ी पर नजर क्यों नहीं?

यहीं से युवा नेतृत्व को लेकर बातचीत दिलचस्प हो जाती है. शायद अब बोर्ड के लिए पारंपरिक वरिष्ठ बैंकरों के समूह से आगे देखने और मजबूत प्रशासनिक, तकनीकी और प्रबंधकीय क्षमताओं वाले युवा नेताओं पर विचार करने का समय आ गया है. यहां तक कि Gen Z पीढ़ी के किसी व्यक्ति पर विचार करने का विचार, भले ही उकसाने वाला हो, बहस के लायक है.

स्वाभाविक रूप से तत्काल प्रतिक्रिया होगी: क्या इतनी कम उम्र का व्यक्ति HDFC Bank जैसे बड़े बैंक को चला सकता है?

लेकिन शायद यह गलत सवाल है.

बेहतर सवाल यह है: हम CEO से आखिर क्या करने की उम्मीद करते हैं?

अगर उम्मीद यह है कि CEO को व्यक्तिगत रूप से हर बैंकिंग उत्पाद, हर नियामकीय प्रावधान, हर टेक्नोलॉजी आर्किटेक्चर और हर परिचालन विवरण को समझना चाहिए, तो जाहिर तौर पर अनुभव अपरिहार्य हो जाता है. लेकिन अगर उम्मीद यह है कि CEO नेतृत्व प्रदान करे, सही निर्णय ले, विश्वास बनाए, हितधारकों का प्रबंधन करे और संगठन के सर्वश्रेष्ठ दिमागों को एक साथ लाए, तो समीकरण बदल जाता है.

एक युवा CEO को सब कुछ जानने की जरूरत नहीं होगी. उसे यह जानने की जरूरत होगी कि कौन क्या जानता है  और उस ज्ञान को एक साथ कैसे लाया जाए.

टेक्नोलॉजी अनुभव की अहमियत बदल रही है

बैंकिंग भी ऐसी गति से बदल रही है, जिसकी एक पीढ़ी पहले कल्पना करना मुश्किल होता.

टेक्नोलॉजी ने बैंकों के संचालन के तरीके को पहले ही बदल दिया है और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस बदलाव को और तेज कर रहा है. जो ज्ञान हासिल करने में कभी वर्षों लगते थे, वह अब तेजी से एक क्लिक पर उपलब्ध है. कानून, नियम, RBI के सर्कुलर, दिशानिर्देश, अनुपालन संबंधी आवश्यकताएं और केस लॉ को लगभग तुरंत एक्सेस और विश्लेषित किया जा सकता है.

आज एक अपेक्षाकृत जूनियर कर्मचारी उस जानकारी तक पहुंच सकता है, जिसके लिए पहले वर्षों का अनुभव, एक बड़ी लाइब्रेरी और शायद विशेषज्ञों की एक टीम की जरूरत होती थी.

इसका मतलब यह नहीं है कि अनुभव अप्रासंगिक हो गया है. अनुभव संदर्भ, निर्णय क्षमता और परिणामों को समझने की क्षमता प्रदान करता है. लेकिन टेक्नोलॉजी उस महत्व को बदल रही है, जो हम केवल जानकारी रखने को देते हैं.

टेक्नोलॉजी टीम टेक्नोलॉजी को समझ सकती है. कानूनी टीम कानून को समझ सकती है. जोखिम टीम जोखिम को समझ सकती है. क्रेडिट टीम क्रेडिट को समझ सकती है.

CEO का काम यह समझना है कि ये सभी हिस्से एक साथ कैसे जुड़ते हैं.

लेकिन एक गुण ऐसा है जिसे AI नहीं बदल सकता

हालांकि, एक ऐसा गुण है जिसे टेक्नोलॉजी पैदा नहीं कर सकती, ईमानदारी.

एक बैंक अंततः भरोसे पर चलता है. ग्राहक अपना पैसा उसके भरोसे सौंपते हैं. कर्मचारी उसके नेतृत्व पर भरोसा करते हैं. नियामक उसके प्रशासन पर भरोसा करते हैं. निवेशक उसके खुलासों और फैसलों पर भरोसा करते हैं.

CEO युवा हो सकता है या उम्रदराज. वह बैंकिंग, प्रशासन, टेक्नोलॉजी या किसी अन्य पेशेवर पृष्ठभूमि से आ सकता है. लेकिन ईमानदारी के बिना, बाकी कोई भी योग्यता लंबे समय तक मायने नहीं रखती.

इसलिए ईमानदारी, जवाबदेही और भरोसे की संस्कृति बनाने की क्षमता CEO की कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी हो सकती है.

शायद सवाल बदलने का समय आ गया है

HDFC Bank की उत्तराधिकार प्रक्रिया नेतृत्व के बारे में अलग तरह से सोचने का अवसर देती है.

सिर्फ यह पूछने के बजाय कि, "अगला CEO कौन सा अनुभवी बैंकर होना चाहिए?", शायद बोर्ड को एक व्यापक सवाल पूछना चाहिए: "अगले दस वर्षों के लिए HDFC Bank को किस तरह के नेता की जरूरत है?"

जवाब अब भी एक अनुभवी बैंकर हो सकता है. यह कोई आंतरिक उम्मीदवार हो सकता है. यह नियामकीय या प्रशासनिक व्यवस्था से आने वाला व्यक्ति हो सकता है. लेकिन नई पीढ़ी के ऐसे नेताओं पर नजर डालने का भी अवसर है, जो टेक्नोलॉजी, लोगों और कारोबार की बदलती प्रकृति को समझते हैं.

असल परीक्षा उम्र नहीं होनी चाहिए. यह ईमानदारी, निर्णय क्षमता, अनुकूलनशीलता, नेतृत्व और असाधारण टीमें बनाने की क्षमता होनी चाहिए.

HDFC Bank के पास पहले से ही बैंकिंग विशेषज्ञता है. उसके पास ग्राहक हैं. उसके पास टेक्नोलॉजी है. उसके पास सिस्टम हैं. और उसके पास अनुभवी लोगों का एक विशाल समूह है.

शायद उसे अपने अगले CEO से बैंकिंग के बारे में सब कुछ जानने वाले व्यक्ति की जरूरत नहीं है, बल्कि ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो बैंकिंग को जानने वाले लोगों को एक साथ काम करने के लिए प्रेरित कर सके, ताकि एक और मजबूत संस्थान बनाया जा सके.

और इससे बैंकिंग नेतृत्व की अगली पीढ़ी कैसी दिखनी चाहिए, इसकी एक बिल्कुल अलग अवधारणा के लिए रास्ता खुल सकता है.

डॉ. अन्नुराग बत्रा, BW रिपोर्ट्स
(लेखक BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media ग्रुप के संस्थापक.)


मिल में सस्ती हुई चीनी, फिर भी बाजार में महंगी! ₹74 किलो तक पहुंचा भाव, महीनेभर में 30% उछाल

मिल स्तर पर कीमतें करीब 20% घटीं, फिर भी खुदरा बाजार में राहत नहीं; उत्पादन घटने और सप्लाई को लेकर बढ़ी चिंता

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Monday, 31 August, 2026
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देश में चीनी की कीमतों में तेजी थमने का नाम नहीं ले रही है. सरकार की ओर से 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देने, स्टॉक लिमिट सख्त करने और निर्यात पर रोक जैसे कदम उठाए जाने के बावजूद खुदरा बाजार में चीनी 60 रुपये प्रति किलो से ऊपर बिक रही है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 30 अगस्त को चीनी की अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमत 64.24 रुपये प्रति किलो रही, जबकि अधिकतम कीमत 74 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई. खास बात यह है कि पिछले एक महीने में खुदरा कीमतों में करीब 30 फीसदी का उछाल आया है, जबकि मिल स्तर पर कीमतें करीब 20 फीसदी कम हुई हैं.

एक सप्ताह में भी बढ़े चीनी के दाम

30 अगस्त को चीनी की औसत खुदरा कीमत 64.24 रुपये प्रति किलो रही. एक सप्ताह पहले यह 63.12 रुपये प्रति किलो थी, यानी इस दौरान कीमत में 1.77 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं, एक महीने पहले के मुकाबले चीनी करीब 30 फीसदी और पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 38.63 फीसदी महंगी हो चुकी है. देश के अलग-अलग हिस्सों में कीमतों में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है. 30 अगस्त को चीनी की न्यूनतम खुदरा कीमत 40 रुपये और अधिकतम कीमत 74 रुपये प्रति किलो रही. प्रमुख शहरों में दिल्ली में यह करीब 62 रुपये, मुंबई में 66 रुपये, चेन्नई में 63 रुपये और रांची में 68 रुपये प्रति किलो बिक रही थी.

थोक बाजार में भी कीमतों का दबाव

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, थोक बाजार में भी चीनी की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं. 30 अगस्त को थोक कीमत करीब 59.73 रुपये प्रति किलो रही, जबकि एक सप्ताह पहले यह 58.66 रुपये थी. एक महीने के मुकाबले थोक कीमत में करीब 31 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. हालांकि, यहां सबसे अहम बात यह है कि मिल स्तर पर कीमतों में करीब 20 फीसदी की गिरावट आई है. सरकार की ओर से 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दिए जाने के बाद मिल कीमतों में नरमी देखने को मिली है. आम तौर पर मिल स्तर और थोक कीमत के बीच 2-3 रुपये तथा मिल और खुदरा कीमत के बीच 7-8 रुपये प्रति किलो का अंतर सामान्य माना जाता है.

सरकार ने उठाए कई कदम

चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने कई उपाय किए हैं. सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी है. इसके साथ ही थोक उपभोक्ताओं और डीलरों के लिए स्टॉक लिमिट से जुड़े नियम सख्त किए गए हैं. इससे पहले चीनी के निर्यात पर भी रोक लगाई जा चुकी है. सरकार का कहना है कि देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और कीमतों में तेजी के लिए मिलों को जिम्मेदार ठहराया गया है. इसके बावजूद खुदरा बाजार में कीमतों पर अभी तक इन कदमों का असर नजर नहीं आया है.

उत्पादन घटने से बढ़ी सप्लाई की चिंता

चीनी की कीमतों में तेजी ऐसे समय आई है, जब 2025-26 मार्केटिंग ईयर के लिए देश का उत्पादन पहले के अनुमान से कम रहने की संभावना है. उत्पादन का अनुमान पहले 343 लाख टन लगाया गया था, जिसे घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया है.

दूसरी ओर, देश में चीनी की सालाना घरेलू मांग करीब 280-285 लाख टन रहने का अनुमान है. ऐसे में उत्पादन और घरेलू मांग के बीच सीमित अंतर सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा रहा है.

मिल से सस्ती, फिर खुदरा में क्यों महंगी?

मौजूदा स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मिल स्तर पर चीनी की कीमतों में करीब 20 फीसदी की गिरावट आ चुकी है, तो खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को राहत क्यों नहीं मिल रही है. मिल, थोक और खुदरा कीमतों के बीच बढ़ता अंतर इस सवाल को और महत्वपूर्ण बनाता है.

आने वाले दिनों में सरकार के शुल्क-मुक्त आयात और स्टॉक लिमिट से जुड़े फैसलों का असर अगर सप्लाई चेन तक पहुंचता है, तो खुदरा कीमतों में नरमी आ सकती है. फिलहाल चीनी की ऊंची कीमतें आम उपभोक्ताओं के बजट पर दबाव बनाए हुए हैं.
 


₹4,262 करोड़ के कर्ज दावों पर सुभाष चंद्रा की सफाई, बोले- उधार लेने वाली संस्थाएं करेंगी भुगतान

सुभाष चंद्रा के कार्यालय ने कहा- व्यक्तिगत तौर पर कोई कर्ज नहीं लिया; विभिन्न संस्थाओं की उधारी के लिए दी थी ₹22,000 करोड़ की गारंटी, ₹1,049 करोड़ के दावों का हो चुका है निपटारा

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Monday, 31 August, 2026
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जी ग्रुप (Zee Group) के फाउंडर और चेयरमैन एमेरिटस डॉ. सुभाष चंद्रा ने अपनी व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही से जुड़े मामले पर सफाई दी है. उन्होंने कहा है कि उनकी व्यक्तिगत उधारी शून्य थी, जबकि अलग-अलग संस्थाओं की ओर से लिए गए कर्ज के लिए उन्होंने कुल ₹22,000 करोड़ की व्यक्तिगत गारंटी दी थी. उनके कार्यालय की ओर से 30 अगस्त को जारी बयान में कहा गया कि सोशल मीडिया पर पिछले तीन दिनों से चल रही पोस्ट के कारण इस मामले को लेकर ‘गलत धारणा और समझ’ बनी है.

₹22,000 करोड़ की गारंटी, व्यक्तिगत उधारी शून्य

बयान के मुताबिक, डॉ. चंद्रा ने विभिन्न संस्थाओं की ओर से लिए गए कर्ज के लिए कुल ₹22,000 करोड़ की व्यक्तिगत गारंटी पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें ₹17,200 करोड़ की गारंटी कर्ज लिए जाने के समय दी गई थी, जबकि करीब ₹4,800 करोड़ की गारंटी डिफॉल्ट होने के बाद दी गई.

डॉ. चंद्रा के कार्यालय ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत दिवाला मामला उनकी निजी उधारी से संबंधित नहीं था. मूल कर्ज अलग-अलग उधार लेने वाली संस्थाओं ने लिया था, जबकि डॉ. चंद्रा ने उनकी ओर से भुगतान की गारंटी दी थी.

NCLT में शुरू हुई व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया

बयान के अनुसार, इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने डॉ. चंद्रा के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही शुरू की थी. ट्रिब्यूनल की ओर से नियुक्त रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने डॉ. चंद्रा की घोषित संपत्तियों और उपलब्ध धनराशि का आकलन किया और इसी आधार पर पुनर्भुगतान योजना तैयार की.

₹39.08 करोड़ की संपत्ति घटकर ₹31.79 करोड़

डॉ. चंद्रा के कार्यालय के मुताबिक, उन्होंने 2016 में संसद के समक्ष ₹39.08 करोड़ की संपत्ति और धनराशि घोषित की थी. रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने यह भी जांच की कि इन संपत्तियों का मूल्य घटकर ₹31.79 करोड़ कैसे रह गया. इसमें करीब ₹25 करोड़ मूल्य की एक आवासीय संपत्ति भी शामिल है, जिसे गिरवी रखा गया है. बयान के अनुसार, इसके बाद लगभग ₹6.79 करोड़ की तरल संपत्तियां बचती हैं.

कर्जदाताओं ने दाखिल किए ₹5,311 करोड़ के दावे

बयान में दिवाला कार्यवाही में शामिल कर्जदाताओं के दावों का ब्योरा भी दिया गया है. इसके मुताबिक, संबंधित उधार लेने वाली संस्थाओं ने सूचीबद्ध कर्जदाताओं से कुल ₹4,808 करोड़ की रकम प्राप्त की थी. इसमें से उधार लेने वाली संस्थाओं ने ₹3,803 करोड़ वापस कर दिए. इससे करीब ₹998 करोड़ की रकम बकाया रह गई थी. हालांकि, व्यक्तिगत गारंटर के तौर पर डॉ. चंद्रा के खिलाफ दाखिल दावों की कुल राशि ₹5,311 करोड़ थी. इनमें से ₹1,049 करोड़ के दावों का भुगतान या निपटारा हो चुका है. इसके बाद शेष दावों की राशि ₹4,262 करोड़ रह गई.

इन कर्जदाताओं में Indiabulls Housing Finance, Axis Bank Group, HDFC Group, Canara Bank, Edelweiss, Franklin Templeton, IndusInd Bank, LIC Housing Finance, RBL Bank और Union Bank समेत अन्य संस्थाएं शामिल हैं. बयान में कहा गया है कि कई मामलों में सिक्योरिटीज, गारंटी और बकाया रकम के मिलान को लेकर अंतर मौजूद है.

₹4,262 करोड़ के भुगतान का उधार लेने वाली संस्थाओं ने दिया भरोसा

सुभाष चंद्रा के कार्यालय के मुताबिक, उन्होंने सभी संबंधित उधार लेने वाली संस्थाओं के साथ बकाया दावों पर चर्चा की है. इन संस्थाओं ने भरोसा दिलाया है कि संबंधित कर्जदाताओं के साथ खातों का मिलान पूरा होने के बाद ₹4,262 करोड़ के बकाया दावों का निपटारा किया जाएगा.

बयान में यह भी कहा गया कि कर्जदाताओं और उधार लेने वाली संस्थाओं के बीच दावों की रकम का पूरा मिलान अभी बाकी है. कार्यालय ने बताया कि पहले जारी किए गए एक प्रेस बयान और मौजूदा आंकड़ों में अंतर इसलिए है क्योंकि कुछ खातों को उस समय शामिल नहीं किया गया था. इन खातों से जुड़े पक्षों ने प्रस्तावित योजना के पक्ष या विपक्ष में मतदान नहीं किया था.

अन्य स्रोतों से लिए गए कर्ज भी चुकाए जा रहे

बयान के अनुसार, संबंधित संस्थाओं ने विदेशी फंड, घरेलू फंड, NBFCs और कॉरपोरेट्स समेत कई अन्य स्रोतों से भी बड़ी रकम उधार ली थी. डॉ. चंद्रा के कार्यालय का कहना है कि इनमें से ज्यादातर देनदारियों का या तो निपटारा हो चुका है या उधार लेने वाली संस्थाएं उनके भुगतान की प्रक्रिया में हैं. बयान के मुताबिक, कुछ बाकी देनदारियों के पीछे पर्याप्त संपत्तियां मौजूद हैं, जबकि कुछ अन्य के भी चुकाए जाने की उम्मीद है.

कर्जदाताओं से उधार लेने वाली संस्थाओं से हिसाब मिलाने की अपील

डॉ. सुभाष चंद्रा ने कर्जदाताओं से अपील की है कि वे संबंधित उधार लेने वाली संस्थाओं के साथ सीधे बातचीत करें, बकाया खातों का मिलान करें और उन्हीं संस्थाओं से देय रकम की वसूली करें. उनके कार्यालय ने कहा कि यह स्पष्टीकरण सोशल मीडिया पर उठाए गए सवालों और #PaisaWapasKaro जैसे हैशटैग के साथ किए जा रहे पोस्ट के बाद जारी किया गया है.
 


शुक्रवार को संभला बाजार, आज फिर दबाव के संकेत; तेल $90 पार, इन शेयरों पर रहेगी नजर

शुक्रवार को सेंसेक्स 330.92 अंक यानी 0.43 फीसदी की बढ़त के साथ 77,264.51 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 84.80 अंक यानी 0.35 फीसदी चढ़कर 24,175.65 के स्तर पर पहुंचा था.

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Monday, 31 August, 2026
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भारतीय शेयर बाजार ने शुक्रवार को पिछले सत्र की गिरावट से उबरते हुए मजबूत वापसी की. सेंसेक्स 330.92 अंक यानी 0.43 फीसदी की बढ़त के साथ 77,264.51 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 84.80 अंक यानी 0.35 फीसदी चढ़कर 24,175.65 के स्तर पर पहुंच गया. शुक्रवार की तेजी में खास तौर पर आईटी शेयरों का योगदान रहा, जहां TCS, Infosys और Tech Mahindra में अच्छी खरीदारी देखने को मिली. हालांकि, सोमवार यानी आज बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं. GIFT Nifty में गिरावट, एशियाई बाजारों में दबाव और कच्चे तेल की कीमतों के 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से निवेशकों की चिंता बढ़ी है. ऐसे में घरेलू शेयर बाजार में आज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.

शुक्रवार को TCS समेत IT शेयरों में रही जोरदार तेजी

शुक्रवार को सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 21 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 9 शेयरों में गिरावट रही. IT सेक्टर में सबसे ज्यादा खरीदारी देखने को मिली. TCS का शेयर 4.09 फीसदी उछलकर 2,344 रुपये पर बंद हुआ. Infosys में 3.34 फीसदी और Tech Mahindra में 3.18 फीसदी की तेजी रही. इसके अलावा HCL Tech 2.68 फीसदी, Titan 1.17 फीसदी, Eternal 1.16 फीसदी, HDFC Bank 1.12 फीसदी, Axis Bank 1.12 फीसदी और Sun Pharma 1.03 फीसदी चढ़े. NTPC, Trent और Power Grid में भी तेजी रही.

इन बड़े शेयरों में आई गिरावट

बाजार में तेजी के बावजूद कुछ प्रमुख शेयर दबाव में रहे. ICICI Bank का शेयर 1.30 फीसदी गिरकर 1,425.20 रुपये पर बंद हुआ. UltraTech Cement में 1.18 फीसदी और Asian Paints में 1.06 फीसदी की गिरावट रही. इसके अलावा ITC, Maruti, Bajaj Finserv, Mahindra & Mahindra, Reliance Industries और Tata Steel भी लाल निशान में बंद हुए.

आज क्यों कमजोर रह सकता है बाजार?

सोमवार सुबह GIFT Nifty करीब 103 अंक की गिरावट के साथ 24,239 के आसपास कारोबार कर रहा था. इससे संकेत मिल रहे हैं कि Nifty50 की शुरुआत कमजोर हो सकती है. एशियाई बाजारों में भी दबाव देखने को मिल रहा है. जापान का Nikkei 225 करीब 1.8 फीसदी और दक्षिण कोरिया का Kospi लगभग 2.4 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा था. अमेरिकी बाजार भी पिछले कारोबारी सत्र में कमजोर रहे. Dow Jones 0.02 फीसदी, S&P 500 करीब 0.3 फीसदी और Nasdaq 0.52 फीसदी गिरकर बंद हुए.

कच्चा तेल 90 डॉलर के पार, बढ़ी चिंता

भारतीय बाजार के लिए सबसे बड़ी चिंता फिलहाल कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं. Brent crude करीब 2.34 फीसदी चढ़कर 90.35 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच तेल की कीमतों में और तेजी की आशंका बाजार के लिए नकारात्मक संकेत है. महंगा कच्चा तेल भारत जैसी बड़ी आयातक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बढ़ाता है और इससे कंपनियों की लागत, महंगाई तथा रुपये पर दबाव बढ़ सकता है.

इन शेयरों पर रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज के कारोबार में Tata Chemicals, Mahindra & Mahindra, ONGC, LIC Housing Finance, Reliance Industries, Ola Electric Mobility, Indraprastha Gas, Hindusthan National Glass, Aurobindo Pharma, Max Estates और HDFC Bank समेत कई शेयर फोकस में रहेंगे. Tata Chemicals की अमेरिकी इकाई को Searles Valley Minerals की दिवालियापन प्रक्रिया में सफल बोलीदाता घोषित किया गया है और वह कंपनी के सोडा ऐश ग्राहकों के कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करेगी, जिनसे दिसंबर 2028 तक 110 मिलियन डॉलर से अधिक राजस्व की उम्मीद है. Mahindra & Mahindra ने अपने Battery-as-a-Service (BaaS) प्रोग्राम को पूरे इलेक्ट्रिक SUV पोर्टफोलियो तक विस्तार दिया है. ONGC गहरे समुद्र में ड्रिलिंग क्षमता बढ़ाने के लिए डीपवाटर ड्रिलशिप खरीदने या जॉइंट वेंचर की संभावनाएं तलाश रही है. LIC Housing Finance ने संदीप कुमार को नया MD और CEO नियुक्त किया है. Reliance Industries की सहायक कंपनी Jio Platforms को प्रस्तावित IPO के लिए SEBI से DRHP पर ऑब्जर्वेशन लेटर मिल गया है. Ola Electric को PLI योजना के तहत 95.81 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि जारी करने की मंजूरी मिली है. Indraprastha Gas ने दिल्ली-NCR में CNG की कीमत 3.89 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ाने का फैसला किया है. Hindusthan National Glass ने B9 Beverages को डिफॉल्ट नोटिस भेजा है और NCLT का रुख करने की तैयारी में है. Aurobindo Pharma की सहायक कंपनी Apitoria Pharma की यूनिट-VI के US FDA निरीक्षण में तीन ऑब्जर्वेशन सामने आए हैं. Max Estates ने पश्चिमी दिल्ली में करीब 84.71 एकड़ जमीन रखने वाली प्रमोटर समूह की कंपनियों का अधिग्रहण करने के लिए शेयर खरीद समझौता किया है, जिससे 10,000-12,000 करोड़ रुपये का संभावित GDV बनने का अनुमान है. वहीं HDFC Bank के MD और CEO शशिधर जगदीशन 26 अक्टूबर 2026 को पद से रिटायर होंगे और बैंक ने उनके उत्तराधिकारी की नियुक्ति प्रक्रिया तेज कर दी है.

निवेशकों की नजर इन संकेतों पर

कुल मिलाकर शुक्रवार को घरेलू बाजार ने मजबूत वापसी की थी, लेकिन सोमवार की शुरुआत के संकेत कमजोर हैं. आज निवेशकों की नजर GIFT Nifty, एशियाई बाजारों की चाल, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक ब्याज दरों से जुड़े संकेतों पर रहेगी. ऐसे में शुक्रवार की तेजी के बाद आज बाजार में सतर्क कारोबार और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. 

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


HDFC बैंक के CEO शशिधर जगदीशन नहीं लेंगे दूसरा कार्यकाल, 26 अक्टूबर को होंगे विदा; शेयर 2.5 साल के निचले स्तर पर

HDFC Bank Succession: शशिधर जगदीशन ने दोबारा नियुक्ति की दौड़ से हटने का फैसला किया, बोर्ड ने स्वीकार किया इस्तीफा; नए CEO की तलाश तेज

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 29 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 29 August, 2026
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एचडीएफसी (HDFC) बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ शशिधर जगदीशन 26 अक्टूबर 2026 को अपने पद से हट जाएंगे. उन्होंने बैंक के बोर्ड को सूचित किया है कि वह अपने कार्यकाल के बाद दोबारा नियुक्ति नहीं चाहते हैं. बैंक के बोर्ड ने 29 अगस्त को हुई बैठक में उनके फैसले को स्वीकार कर लिया. इसके साथ ही देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक में नए CEO की तलाश की प्रक्रिया तेज हो गई है.

अक्टूबर में खत्म होगा जगदीशन का कार्यकाल

शशिधर जगदीशन ने अक्टूबर 2020 में HDFC बैंक के एमडी और सीईओ का पद संभाला था. उन्होंने बैंक के लंबे समय तक प्रमुख रहे आदित्य पुरी की जगह ली थी. इसके बाद 2023 में उन्हें तीन साल के दूसरे कार्यकाल के लिए दोबारा नियुक्त किया गया था. उनका मौजूदा कार्यकाल 26 अक्टूबर 2026 को समाप्त होना था.

पिछले कुछ महीनों से जगदीशन के कार्यकाल को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी. बैंक का बोर्ड और उसकी Governance, Nomination and Remuneration Committee उनकी दोबारा नियुक्ति पर विचार कर रही थी. इस बीच निवेशकों की नजर भी बैंक के नेतृत्व को लेकर चल रही प्रक्रिया पर बनी हुई थी.

बोर्ड ने शुरू की नए CEO की तलाश

जगदीशन के दोबारा कार्यकाल नहीं लेने के फैसले के बाद HDFC बैंक के बोर्ड ने उनके उत्तराधिकारी की तलाश की प्रक्रिया तेज कर दी है. यह नेतृत्व परिवर्तन ऐसे समय हो रहा है जब बैंक के शेयरों पर दबाव बना हुआ है और निवेशकों के बीच गवर्नेंस, कानूनी मामलों तथा मैनेजमेंट की निरंतरता को लेकर चिंताएं रही हैं.

2026 में 25% से ज्यादा गिर चुका है शेयर

HDFC बैंक के शेयरों में इस साल अब तक 25 फीसदी से अधिक की गिरावट आ चुकी है. हाल में बैंक का शेयर करीब ढाई साल के निचले स्तर पर पहुंच गया. विश्लेषकों ने पहले भी जगदीशन के कार्यकाल को लेकर बनी अनिश्चितता को शेयर पर दबाव डालने वाले प्रमुख कारणों में शामिल किया था. बैंक में यह नेतृत्व बदलाव ऐसे समय हुआ है जब जुलाई में राजीव कुमार को पार्ट-टाइम नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन नियुक्त किया गया था. इससे पहले पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने मार्च में पद से इस्तीफा दिया था.

HDFC Ltd के साथ हुआ था बड़ा विलय

शशिधर जगदीशन के छह साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में HDFC Ltd के साथ HDFC बैंक का ऐतिहासिक विलय शामिल रहा. यह भारत के सबसे बड़े कॉरपोरेट विलय में से एक था. बैंक के बोर्ड ने जगदीशन के योगदान को स्वीकार करते हुए बैंक की स्थिरता, विकास और विलय को सफलतापूर्वक पूरा करने में उनकी भूमिका की सराहना की.

अब HDFC बैंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती नए सीईओ का चयन और नेतृत्व में सुचारू बदलाव सुनिश्चित करना है. निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि बैंक किसे जगदीशन का उत्तराधिकारी बनाता है और यह बदलाव बैंक के कारोबार की निरंतरता तथा निवेशकों के भरोसे को किस तरह प्रभावित करता है.


पैकेज्ड फूड पर लगेगा लाल अलर्ट! ज्यादा चीनी, नमक या फैट वाले प्रोडक्ट्स के लिए FSSAI का नया प्रस्ताव

पैकेट खोलने से पहले ही पता चलेगा कितना ‘अनहेल्दी’ है खाना, सुप्रीम कोर्ट में FSSAI ने रखा फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल का प्रस्ताव

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 29 August, 2026
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Saturday, 29 August, 2026
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पैकेज्ड फूड खाने वालों के लिए आने वाले समय में पैकेट के सामने ही एक बड़ा चेतावनी निशान नजर आ सकता है. फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का प्रस्ताव रखा है. इसके तहत किसी खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा तय सीमा से ज्यादा होने पर पैकेट के सामने लाल रंग का चेतावनी लेबल लगाने का प्रावधान किया जा सकता है.

लाल हेक्सागोन में मिलेगी चेतावनी

प्रस्ताव के मुताबिक, पैकेज्ड फूड के फ्रंट पर लाल रंग का हेक्सागोन यानी छह कोनों वाला निशान लगाया जा सकता है. यह उपभोक्ताओं को खरीदारी से पहले ही संकेत देगा कि संबंधित प्रोडक्ट में चीनी, नमक या फैट की मात्रा अधिक है.

इसके साथ ही पैकेट पर बड़े और स्पष्ट अक्षरों में ‘HIGH SUGAR’, ‘HIGH SALT’ या ‘HIGH FAT’ लिखा जाएगा. यह जानकारी पैकेज के सामने प्रमुखता से दिखाई देगी, ताकि ग्राहक को पोषण संबंधी जानकारी समझने के लिए पैकेट के पीछे दिए गए न्यूट्रिशन लेबल पर निर्भर न रहना पड़े.

दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव

FSSAI ने इस व्यवस्था को दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव रखा है. पहले चरण में उन पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स पर चेतावनी लेबल लगाया जाएगा, जिनमें चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट में से कम से कम दो की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक होगी.

दूसरे चरण में नियम को और सख्त करने का प्रस्ताव है. इसके तहत अगर किसी प्रोडक्ट में इन तीन में से किसी एक पोषक तत्व की मात्रा भी तय सीमा से अधिक पाई जाती है, तो उस पर चेतावनी लेबल लगाना जरूरी हो सकता है.

फॉन्ट भी होगा बड़ा

प्रस्ताव में लेबल की स्पष्टता पर भी जोर दिया गया है. ‘HIGH SUGAR’, ‘HIGH SALT’ और ‘HIGH FAT’ जैसी चेतावनियों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला फॉन्ट पैकेट पर मौजूद न्यूट्रिशन इंफॉर्मेशन के फॉन्ट से कम से कम एक पॉइंट बड़ा रखने का प्रस्ताव है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चेतावनी उपभोक्ता की नजर से आसानी से छिप न जाए और वह प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसके पोषण संबंधी जोखिम को समझ सके.

बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का मुद्दा बच्चों में बढ़ते मोटापे और अनहेल्दी फूड की बढ़ती खपत को लेकर चल रही बहस के बीच सामने आया है. ‘3S and Our Health Society’ की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों में बढ़ते मोटापे को लेकर चिंता जताई थी. कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया था कि अगर किसी खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक और फैट की मात्रा अधिक है, तो उपभोक्ताओं को इसकी स्पष्ट जानकारी पैकेट पर क्यों नहीं दी जानी चाहिए. इसके बाद FSSAI की ओर से पैकेज्ड फूड की लेबलिंग व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव सामने आया है.

किन उत्पादों को मिल सकती है छूट?

प्रस्ताव में कुछ ऐसे उत्पादों को फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल से बाहर रखने की बात कही गई है, जिनमें मुख्य रूप से एक ही सामग्री होती है. इनमें घी, तेल, नमक, चीनी, गुड़ और शहद जैसे उत्पाद शामिल हैं, यानी इन सिंगल-इंग्रीडिएंट प्रोडक्ट्स पर प्रस्तावित लाल चेतावनी लेबल लागू नहीं होने की बात कही गई है.

खाद्य कंपनियों ने जताई चिंता

प्रस्तावित नियमों को लेकर खाद्य उद्योग के कुछ संगठनों और कंपनियों की ओर से आपत्तियां भी सामने आई हैं. कोका-कोला, नेस्ले और पेप्सिको से जुड़े उद्योग समूहों ने प्रस्ताव के कुछ प्रावधानों पर चिंता जताई है. हालांकि, नियामक का जोर इस बात पर है कि उपभोक्ताओं को पैकेज्ड फूड खरीदते समय उसकी पोषण संबंधी जानकारी आसानी से और स्पष्ट रूप से मिल सके.

ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा?

अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो पैकेज्ड फूड खरीदने वाले ग्राहकों को प्रोडक्ट की पोषण संबंधी स्थिति समझने में आसानी होगी. पैकेट के सामने ही लाल चेतावनी और ‘HIGH SUGAR’, ‘HIGH SALT’ या ‘HIGH FAT’ जैसे संकेत मिलने से ग्राहक ज्यादा चीनी, नमक या फैट वाले उत्पादों की पहचान तेजी से कर सकेंगे. हालांकि, फिलहाल यह एक प्रस्ताव है. इसे अंतिम रूप दिए जाने और लागू होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन उत्पादों पर किस स्तर की चेतावनी अनिवार्य होगी.
 


UPI का बढ़ता दबदबा, कार्ड से पीछे छूटा डिजिटल पेमेंट; जुलाई में 77.3% रही हिस्सेदारी

भारत में डिजिटल मर्चेंट पेमेंट का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है. जुलाई में कारोबारियों को किए गए डिजिटल भुगतान में UPI की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 77.3% पर पहुंच गई, जबकि क्रेडिट और डेबिट कार्ड की हिस्सेदारी में गिरावट दर्ज हुई.

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Published - Saturday, 29 August, 2026
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Saturday, 29 August, 2026
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भारत में डिजिटल पेमेंट के तरीके में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. दुकानों और कारोबारियों को भुगतान करने के लिए लोग क्रेडिट और डेबिट कार्ड के मुकाबले UPI को ज्यादा पसंद कर रहे हैं. इसका असर डिजिटल मर्चेंट पेमेंट मार्केट में साफ दिखाई दे रहा है. UPI की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है, जबकि कार्ड से होने वाले भुगतान का हिस्सा घट रहा है.

इक्विरस की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में मर्चेंट पेमेंट में UPI की हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 77.3% हो गई. एक साल पहले जुलाई में यह 74.9% थी, जबकि जून 2026 में UPI की हिस्सेदारी 77.1% रही थी. इस दौरान भारत का डिजिटल मर्चेंट पेमेंट बाजार भी तेजी से बढ़ा. जुलाई में यह सालाना आधार पर 19.6% बढ़कर 11.7 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यानी डिजिटल पेमेंट का कुल बाजार बढ़ रहा है और इस वृद्धि में UPI की हिस्सेदारी लगातार मजबूत हो रही है.

क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी भी घटी

UPI के बढ़ते इस्तेमाल का असर क्रेडिट कार्ड पर भी दिखाई दे रहा है. जुलाई में मर्चेंट पेमेंट में क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी घटकर 17.7% रह गई. एक साल पहले यह 19.8% थी. पिछले 12 महीनों का औसत भी करीब 19% रहा है.

डेबिट कार्ड की स्थिति और कमजोर हुई है. जुलाई में मर्चेंट पेमेंट में डेबिट कार्ड की हिस्सेदारी घटकर 3.2% रह गई, जबकि एक साल पहले यह 3.9% थी. इससे संकेत मिलता है कि भुगतान के लिए लोग अब कार्ड की जगह UPI को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं.

रिटेल पेमेंट में भी UPI का दबदबा

रिटेल पेमेंट के पूरे बाजार में भी UPI तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है. CareEdge Analytics & Advisory के अनुसार, FY23 में रिटेल पेमेंट ट्रांजैक्शन में UPI की हिस्सेदारी 73.6% थी. FY27 की जून तिमाही में यह बढ़कर 86.8% हो गई. हालांकि, UPI के सामने अब इस सिस्टम को लंबे समय तक मजबूत और टिकाऊ बनाए रखने की चुनौती है. CareEdge के मुताबिक, सरकार कुछ बड़े मर्चेंट पेमेंट पर मामूली MDR यानी पेमेंट शुल्क लगाने की व्यवस्था पर विचार कर सकती है. हालांकि, आम ग्राहकों के UPI भुगतान और व्यक्ति-से-व्यक्ति लेनदेन के मुफ्त रहने की उम्मीद है.

UPI ट्रांजैक्शन में 29% मर्चेंट पेमेंट

CareEdge के मुताबिक, कुल UPI ट्रांजैक्शन वैल्यू में मर्चेंट पेमेंट की हिस्सेदारी करीब 29% है. इनमें 2,000 रुपये से ज्यादा के भुगतान की हिस्सेदारी 67.2% है. FY26 के आंकड़ों के आधार पर कुल UPI वैल्यू का करीब 19.5% हिस्सा संभावित MDR के दायरे में आ सकता है. अगर MDR 0.25% से 0.50% के बीच रखा जाता है, तो इससे सालाना 15,000 करोड़ से 30,000 करोड़ रुपये तक की कमाई का अवसर बन सकता है. हालांकि, रोजमर्रा के छोटे भुगतान और व्यक्ति-से-व्यक्ति UPI ट्रांजैक्शन को मुफ्त रखने की उम्मीद है.

डिजिटल पेमेंट में तेजी से बदल रही तस्वीर

आंकड़ों से साफ है कि भारत में डिजिटल पेमेंट का बाजार लगातार विस्तार कर रहा है, लेकिन इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा UPI को मिल रहा है. आसान इस्तेमाल, व्यापक स्वीकार्यता और तेज भुगतान के कारण UPI ने मर्चेंट पेमेंट में क्रेडिट और डेबिट कार्ड के मुकाबले अपनी स्थिति लगातार मजबूत की है.
 


सुभाष चंद्रा ने ₹22,000 करोड़ के कर्ज पर दी सफाई, स्वतंत्र ऑडिट की मांग

एस्सेल ग्रुप के फाउंडर ने कहा- करीब ₹45,000 करोड़ के कुल कर्ज में से ₹43,000 करोड़ चुका चुके हैं; पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए स्वतंत्र ऑडिट की मांग

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Published - Saturday, 29 August, 2026
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Saturday, 29 August, 2026
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₹22,000 करोड़ के कर्ज मामले को लेकर उठ रहे सवालों के बीच एस्सेल ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है. उन्होंने दावा किया कि कुछ लोग उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं और पूरे मामले को सही संदर्भ में पेश नहीं किया जा रहा. चंद्रा के मुताबिक, ग्रुप ने करीब ₹45,000 करोड़ के कुल कर्ज में से लगभग ₹43,000 करोड़ चुका दिए हैं. उन्होंने बैंकिंग सिस्टम और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है.

स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग

सुभाष चंद्रा ने कहा कि एक स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त किया जाना चाहिए, जो यह जांच करे कि एस्सेल ग्रुप ने कितना कर्ज लिया, कितना चुकाया और किन मामलों में डिफॉल्ट हुआ. उनका कहना है कि स्वतंत्र जांच से कर्ज से जुड़े पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी.

निजी संपत्तियां बेचकर चुकाया कर्ज

चंद्रा के मुताबिक, ग्रुप की वित्तीय मुश्किलें 24 जनवरी 2019 के आसपास सामने आनी शुरू हुई थीं. उन्होंने इसकी प्रमुख वजह संपत्तियों और देनदारियों के बीच बढ़ता असंतुलन बताया. उन्होंने कहा कि उस समय उन्होंने बैंकिंग सिस्टम को एक खुला पत्र लिखकर अपनी गलती स्वीकार की थी और कर्ज चुकाने का भरोसा दिया था. चंद्रा के अनुसार, कर्ज चुकाने के लिए परिवार और निजी संपत्तियों तक को बेचना पड़ा. उन्होंने बताया कि Zee को बेचने की कोशिश की गई और उनका घर भी गिरवी रखा गया.

करीब ₹2,000 करोड़ का कर्ज अभी बाकी

सुभाष चंद्रा ने कहा कि करीब ₹2,000 करोड़ का कर्ज अभी अटका हुआ है. खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े मामलों में राज्य सरकारों से भुगतान नहीं मिलने के कारण यह समस्या बनी हुई है. उन्होंने कहा कि कुछ संपत्तियां बेचकर भी बकाया रकम जुटाने की कोशिश की जाएगी.

NCLT मामले पर भी दी सफाई

NCLT की कार्रवाई पर चंद्रा ने कहा कि यह उनके निजी कर्ज से जुड़ी नहीं है, बल्कि कुछ बैंकों को दी गई व्यक्तिगत गारंटी से संबंधित है. उन्होंने दावा किया कि करीब ₹620 करोड़ के दावे पहले ही चुकाए जा चुके हैं. हालांकि, NCLT ने हाल ही में करीब ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ के भुगतान प्लान को मंजूरी दी है. HDFC Bank ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है.

₹22,000 करोड़ के आंकड़े पर उठे सवाल

करीब ₹22,000 करोड़ की देनदारी और NCLT में लगभग ₹6.5 करोड़ के भुगतान प्लान की खबरों के बाद इस मामले पर काफी चर्चा हुई है. चंद्रा का कहना है कि इन आंकड़ों को सही संदर्भ में समझने की जरूरत है और उनके पूरे वित्तीय रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए. उनका कहना है कि ग्रुप की ओर से अब तक चुकाई गई बड़ी रकम और संपत्तियों की बिक्री समेत पूरे घटनाक्रम को साथ रखकर ही उनकी वित्तीय स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए.
 


‘भारत में बनाएं मैन्युफैक्चरिंग बेस’, निर्मला सीतारमण ने ग्लोबल कंपनियों को दिया निवेश का न्योता

शिकागो में वैश्विक निवेशकों और कारोबारी नेताओं से वित्त मंत्री की अपील, कहा- भारत को सिर्फ बड़ा बाजार नहीं, बल्कि दुनिया के लिए उत्पादन और इनोवेशन का केंद्र बनाएं.

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Published - Saturday, 29 August, 2026
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Saturday, 29 August, 2026
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केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वैश्विक कंपनियों और निवेशकों से भारत में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन सेंटर स्थापित करने का आह्वान किया है. उन्होंने कहा कि भारत को केवल सामान बेचने वाले बड़े बाजार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यहां से भारत और पूरी दुनिया के लिए कारोबार खड़ा करने के अवसरों का लाभ उठाना चाहिए.

सीतारमण ने शुक्रवार को शिकागो में प्रमुख निवेशकों और कारोबारी नेताओं के साथ हाई-लेवल बिजनेस राउंडटेबल को संबोधित किया. यह बैठक भारत के कॉन्सुलेट जनरल, शिकागो ने यूएस-इंडिया स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फोरम के साथ मिलकर आयोजित की थी.

भारत में निवेश के लिए कई मौके

वित्त मंत्री ने कहा कि भारत में निवेश के अवसर किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं. बड़े घरेलू बाजार, मजबूत आर्थिक वृद्धि, कुशल प्रतिभा, बेहतर होता इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी क्षमता और पिछले एक दशक में किए गए लगातार सुधार मिलकर देश को निवेश के लिए आकर्षक बनाते हैं. उन्होंने ग्लोबल कंपनियों से भारत के साथ साझेदारी करने, यहां उत्पादन बढ़ाने और वैश्विक बाजारों के लिए कारोबार खड़ा करने की अपील की.

‘भारत में बनाएं, भारत और दुनिया के लिए’

राउंडटेबल की थीम ‘मैन्युफैक्चर इन इंडिया-फॉर इंडिया एंड फॉर द वर्ल्ड’ थी. सीतारमण ने कहा कि कंपनियों को भारत को सिर्फ घरेलू मांग पूरी करने वाले बाजार के रूप में नहीं देखना चाहिए. देश को मैन्युफैक्चरिंग बेस, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन सेंटर के साथ-साथ लंबे समय के इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के केंद्र के रूप में देखा जा सकता है. बैठक में मैन्युफैक्चरिंग, AI और डिजिटल टेक्नोलॉजी, वित्तीय सेवाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर, फूड प्रोसेसिंग, डिफेंस और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में निवेश के अवसरों पर चर्चा हुई.

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भारत की बड़ी ताकत

वित्त मंत्री ने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की भी चर्चा की. उन्होंने आधार, UPI, डिजिलॉकर, ONDC और इंडिया स्टैक जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का जिक्र करते हुए कहा कि ये बड़े स्तर पर काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि अब AI, इंजीनियरिंग, एनालिटिक्स, प्रोडक्ट डेवलपमेंट, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे हाई-वैल्यू सेक्टर्स में कारोबार बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं हैं. भारत में स्थापित ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर भी तेजी से ग्लोबल इनोवेशन हब के रूप में विकसित हो रहे हैं.

GIFT City में भी निवेश के अवसर

सीतारमण ने गुजरात की GIFT City को भी वैश्विक निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया. उन्होंने कहा कि जून 2026 तक यहां 1,250 रजिस्टर्ड एंटिटीज मौजूद थीं. GIFT City में बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट, रीइंश्योरेंस, एयरक्राफ्ट और शिप लीजिंग, सस्टेनेबल फाइनेंस समेत कई अंतरराष्ट्रीय कारोबारों के लिए अवसर उपलब्ध हैं.

ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव का फायदा उठाने पर जोर

वित्त मंत्री ने कहा कि ग्लोबल सप्लाई चेन में हो रहे बदलाव के बीच भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार होने के साथ प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता भी है. उन्होंने कहा कि अब भारत में केवल असेंबली पर जोर नहीं है, बल्कि कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की क्षमता विकसित करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है. सरकार इसके लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजनाओं के जरिए नीतिगत समर्थन दे रही है.

इंफ्रास्ट्रक्चर में भी निवेश के बड़े मौके

सीतारमण ने इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश के अवसरों का भी जिक्र किया. उन्होंने डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, रेलवे के आधुनिकीकरण, विद्युतीकरण और हाई-स्पीड रेल जैसी परियोजनाओं को निवेश के महत्वपूर्ण अवसर बताया. उन्होंने कहा कि नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (NIIF) के जरिए वैश्विक निवेशक भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में निवेश कर सकते हैं.

फूड प्रोसेसिंग से डिफेंस तक बढ़ रहे अवसर

वित्त मंत्री ने फूड प्रोसेसिंग, ऑटोमेशन, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और कोल्ड चेन जैसे क्षेत्रों में भी बढ़ते कारोबारी अवसरों का उल्लेख किया. उन्होंने आत्मनिर्भर भारत और iDEX जैसी पहलों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ड्रोन, ऑटोनॉमस सिस्टम और अन्य एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में घरेलू क्षमता को मजबूत कर रहा है.

छह दिन की अमेरिका यात्रा पर हैं सीतारमण

सीतारमण छह दिन की अमेरिका यात्रा पर हैं. इस दौरान वह नॉर्थ कैरोलिना के एशविले में होने वाली G20 वित्त मंत्रियों की बैठक में शामिल होंगी. इसके अलावा वह न्यूयॉर्क का भी दौरा करेंगी.
 


एक्सिस बैंक का मिड-कॉरपोरेट लोन पर बड़ा दांव, 1 लाख करोड़ रुपये का बुक बनाने का लक्ष्य

मौजूदा 80,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर अगले 3-4 तिमाहियों में 1 लाख करोड़ रुपये करने की तैयारी, Tier-2 और Tier-3 शहरों पर फोकस

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Published - Saturday, 29 August, 2026
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Saturday, 29 August, 2026
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एक्सिस बैंक (Axis Bank) अपने मिड-कॉरपोरेट कारोबार को तेजी से बढ़ाने की तैयारी कर रहा है. निजी क्षेत्र का यह बैंक अगले 3-4 तिमाहियों में अपने मिड-कॉरपोरेट फंडेड लोन बुक को मौजूदा करीब 80,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1 लाख करोड़ रुपये करना चाहता है. बैंक का लक्ष्य इस सेगमेंट में सालाना 25-30 फीसदी की दर से ग्रोथ हासिल करना है. एक्सिस बैंक के मिड-कॉरपोरेट एंड मीडियम एंटरप्राइजेज ग्रुप के ग्रुप हेड प्रशांत टीएस के मुताबिक, यह कारोबार बैंक के लिए ग्रोथ का एक प्रमुख इंजन बना हुआ है.

80,000 करोड़ रुपये का फंडेड एक्सपोजर

बैंक के मिड-कॉरपोरेट कारोबार में फिलहाल करीब 80,000 करोड़ रुपये का फंड-बेस्ड लोन एक्सपोजर है. इसके अलावा लगभग 18,000 करोड़ रुपये का नॉन-फंड-बेस्ड एक्सपोजर है. इस पोर्टफोलियो का रिटर्न ऑन एसेट्स (ROA) करीब 2 फीसदी है, जबकि क्रेडिट कॉस्ट बेहद कम है. इससे बैंक को इस कारोबार के विस्तार के लिए पर्याप्त गुंजाइश मिल रही है.

Tier-2 और Tier-3 शहरों पर बढ़ा फोकस

एक्सिस बैंक अब बड़े शहरों से आगे बढ़कर Tier-2 और Tier-3 शहरों में अपनी मिड-कॉरपोरेट पहुंच मजबूत कर रहा है. बैंक के मुताबिक, उसके इस कारोबार का करीब 30-35 फीसदी हिस्सा गैर-Tier-1 शहरों से आता है. बैंक को इन बाजारों में आगे भी कारोबार बढ़ाने की अच्छी संभावनाएं नजर आ रही हैं. इसके साथ ही कंपनियों की वर्किंग कैपिटल की जरूरत भी बढ़ रही है. वर्किंग कैपिटल लिमिट का औसत इस्तेमाल बढ़कर 60-65 फीसदी हो गया है, जो पहले 50-55 फीसदी था. बैंक के अनुसार, इनपुट लागत बढ़ने के बीच कारोबारों को ज्यादा लिक्विडिटी की जरूरत पड़ रही है. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के दबाव के बावजूद कंपनियों की बिक्री broadly स्थिर बनी हुई है.

ECLGS 5.0 के तहत 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का वितरण

एक्सिस बैंक ने मिड-कॉरपोरेट और मीडियम एंटरप्राइज ग्राहकों को ECLGS 5.0 के तहत 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज वितरित किया है. बैंक का कहना है कि इन सुविधाओं का इस्तेमाल चुनिंदा तौर पर उन कारोबारों को किया गया है, जिन्हें वास्तव में लिक्विडिटी की जरूरत थी. कर्ज देने से पहले ग्राहकों की क्रेडिट क्षमता का आकलन भी किया गया.

लोन ग्रोथ में AI और क्रॉस-सेलिंग की भूमिका

बैंक कंपनी की प्रोफाइल तैयार करने, निगरानी और क्रेडिट असेसमेंट के लिए AI आधारित टूल्स का इस्तेमाल कर रहा है. इसके साथ ही क्रेडिट प्रस्तावों की प्रोसेसिंग को तेज करने के लिए नई तकनीक विकसित की जा रही है, हालांकि बैंक ने रिस्क कंट्रोल को प्राथमिकता देने की बात कही है.

एक्सिस बैंक की रणनीति केवल लोन देने तक सीमित नहीं है. बैंक मिड-कॉरपोरेट ग्राहकों को ट्रांजैक्शन बैंकिंग, कॉरपोरेट सैलरी सॉल्यूशंस, वेल्थ मैनेजमेंट और अपनी सहायक कंपनियों के जरिए अन्य सेवाएं भी दे रहा है. इसका उद्देश्य मिड-साइज कंपनियों के बड़े कारोबार में बदलने के साथ बैंक के साथ उनके संबंधों को और मजबूत करना है.

Q1FY27 में कॉरपोरेट लोन बुक 38 फीसदी बढ़ा

एक्सिस बैंक की कुल कॉरपोरेट लोन बुक में भी अच्छी ग्रोथ दर्ज की गई है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1FY27) में बैंक की कॉरपोरेट लोन बुक सालाना आधार पर 38 फीसदी बढ़ी. वहीं, मिड-कॉरपोरेट पोर्टफोलियो में 27 फीसदी की वृद्धि हुई.

इससे बैंक के कुल क्रेडिट ग्रोथ में मिड-कॉरपोरेट सेगमेंट का योगदान लगातार बढ़ने का संकेत मिलता है. बैंक के मुताबिक, फिलहाल मिड-कॉरपोरेट कारोबार में ऑर्गेनिक ग्रोथ की पर्याप्त संभावनाएं हैं. इसलिए इस सेगमेंट के विस्तार के लिए फिलहाल किसी इनऑर्गेनिक ग्रोथ या अधिग्रहण को रणनीतिक प्राथमिकता नहीं दी जा रही है.

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RBI के पास अब रुपये पर दबाव से निपटने के लिए मजबूत सुरक्षा कवच, फरवरी के पुराने रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ा

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Published - Saturday, 29 August, 2026
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Saturday, 29 August, 2026
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भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 21 अगस्त को समाप्त सप्ताह में 12.4 अरब डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 729.3 अरब डॉलर पहुंच गया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, यह फरवरी में दर्ज 728.5 अरब डॉलर के पिछले रिकॉर्ड से भी अधिक है. विदेशी मुद्रा भंडार में इस बढ़ोतरी से RBI को रुपये पर दबाव बढ़ने की स्थिति में विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिलेगी.

यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, वैश्विक ब्याज दरों और पूंजी के उतार-चढ़ाव को लेकर जोखिम बना हुआ है. भारत के लिए आयातित कच्चे तेल की ऊंची कीमतें खास चिंता का विषय हैं, क्योंकि इससे देश का आयात बिल बढ़ता है और डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव पड़ सकता है.

विदेशी पूंजी के बढ़े प्रवाह से मिली मजबूती

विदेशी मुद्रा भंडार में हालिया बढ़ोतरी के पीछे विदेशी मुद्रा के मजबूत प्रवाह की अहम भूमिका रही है. RBI ने जून में विदेशों से पूंजी आकर्षित करने के लिए कुछ कदम उठाए थे. इनमें प्रवासी भारतीयों और अन्य गैर-निवासी ग्राहकों के लिए विशेष जमा योजना भी शामिल थी.

उपलब्ध विश्लेषण के अनुसार, 21 अगस्त तक इन उपायों के जरिए करीब 72.8 अरब डॉलर का विदेशी पूंजी प्रवाह हुआ. इससे भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है और पूंजी खाते में लगातार तीसरे साल घाटे का जोखिम भी कम हुआ है.

रुपये को संभालने में RBI की बढ़ी क्षमता

रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार RBI को रुपये में तेज गिरावट आने की स्थिति में ज्यादा मजबूती से हस्तक्षेप करने की क्षमता देता है. मई में रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने के बाद भारतीय मुद्रा में करीब 1.7 फीसदी की रिकवरी हुई है. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और ईंधन के आयात पर भारत की निर्भरता अब भी रुपये के लिए जोखिम बनी हुई है.

तेल की कीमतें बढ़ने पर भारत का आयात बिल बढ़ता है और इसके लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है. ऐसे में RBI अपने बड़े विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ा सकता है और रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित कर सकता है.

विदेशी जमा योजना की लागत भी बढ़ी

विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए शुरू की गई विशेष प्रवासी जमा योजना से जहां भंडार बढ़ाने में मदद मिली है, वहीं इसकी लागत भी RBI के लिए बढ़ी है. इस योजना के तहत RBI बैंकों की हेजिंग लागत वहन करता है, जिससे बैंक विदेशों में रहने वाले ग्राहकों को ज्यादा आकर्षक ब्याज दर देने में सक्षम होते हैं.

अमेरिका में ब्याज दरें 2013 की तुलना में काफी ऊंची रहने के कारण इस तरह से फंड जुटाने की लागत भी बढ़ गई है. इससे पहले RBI ने 2013 में रुपये पर दबाव के दौरान विदेशों में रहने वाले भारतीयों से विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए ऐसी व्यवस्था का सहारा लिया था.

सालाना करीब 5.7 अरब डॉलर की लागत का अनुमान

विश्लेषण में इस योजना से जुड़ी सालाना लागत करीब 5.7 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया है. इसकी एक वजह यह है कि RBI के जरिए जुटाए गए डॉलर आमतौर पर अपेक्षाकृत कम रिटर्न देने वाली परिसंपत्तियों में निवेश किए जाते हैं.

ऐसे में इन परिसंपत्तियों से मिलने वाला रिटर्न, फंड जुटाने की लागत से कम हो सकता है. इससे देश पर 'कैरी कॉस्ट' का बोझ पड़ता है. यानी विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के साथ-साथ उसे बनाए रखने की वित्तीय लागत भी जुड़ी हुई है.

अनुमान से ज्यादा आया विदेशी पूंजी प्रवाह

RBI ने इस महीने की शुरुआत में विशेष प्रवासी जमा योजना को तय समय से पहले बंद करने का फैसला किया था. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि इस योजना के तहत विदेशी पूंजी का प्रवाह अनुमान से ज्यादा रहा. योजना के जरिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार में तेज बढ़ोतरी हुई और बाहरी वित्तीय स्थिति मजबूत हुई.

आगे भी चुनौती बनी रहेंगी वैश्विक परिस्थितियां

विदेशी मुद्रा भंडार का 729.3 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना भारत की बाहरी अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत सुरक्षा कवच है. इससे RBI को वैश्विक आर्थिक झटकों और रुपये पर पड़ने वाले दबाव से निपटने में मदद मिलेगी. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक ब्याज दरों में बदलाव और विदेशी पूंजी के प्रवाह में उतार-चढ़ाव आगे भी चुनौती बने रहेंगे. ऐसे में रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार RBI के लिए रुपये में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण साधन साबित हो सकता है.